ग्वालियर में नगर निगम.. इंडियन काफी हाउस को जगह दे सकता है. इटेलियन गार्डन का एक हिस्सा भाजपा नेता को रेस्टोरेंट के लिए दे सकता है लेकिन प्रेस क्लब को नहीं….

राकेश अचल-
ग्वालियर में प्रेस क्लब पत्रकारों की जरूरत है, लेकिन नेताओं की जरूरत नहीं. वर्षों पहले हमारे मित्र और तत्कालीन निगमायुक्त श्री अखिलेंदु अरजरिया ने अपनी सेवानिवृत्ति वाले दिन ये भवन मुझे प्रेस क्लब चलाने के लिए आवंटित किया था. मैंने इसे 19 साल बचाकर रखा लेकिन यहाँ के सांसद, विधायक इतने कंजूस निकले कि किसी ने इसके विस्तार में अपनी ओर से एक फूटी कौडी नहीं दी. सब इंदौर प्रेस क्लब पर मेहरबान बने रहे.
बिरादरी के कुर्सी प्रेमी मित्रों ने मुझे हटाने की साजिशें की तो गुस्से में मैंने ये भवन नगर निगम को वापस कर दिया. मेरी यह अक्षम्य गलती थी किंतु साथी राजेश शर्मा ने इसे दोबारा हासिल कर लिया. वर्षों पहले बिरादरी ने जो हरकत मेरे साथ की थी, वैसी ही हरकत राजेश शर्मा के साथ भी पिछले दिनों की गई.
ग्वालियर में प्रेस क्लब भवन एक है लेकिन अध्यक्ष दो हैं. इसलिए मैंने प्रेस क्लब जाना बंद कर दिया, क्योंकि यह प्रेस क्लब से ज्यादा बर्थडे क्लब है.
ग्वालियर के ठेकेदार केंद्रीय मंत्री हों या राज्य के मंत्री, विधायक हों या सांसद प्रेस क्लब की न मदद करना चाहते है न उसे बचाना चाहते हैं. बडे़ अखबारों के संपादक यहाँ आते नहीं. आज पत्रकार बिरादरी सैकडों में है. ग्वालियर को एक स्वतंत्र जगह प्रेस क्लब के लिए चाहिए, पैसा चाहिए लेकिन दे कौन?
ग्वालियर में नगर निगम.. इंडियन काफी हाउस को जगह दे सकता है. इटेलियन गार्डन का एक हिस्सा भाजपा नेता को रेस्टोरेंट के लिए दे सकता है लेकिन प्रेस क्लब को नहीं. सिर्फ इसलिए क्योंकि ग्वालियर में पत्रकार एक नहीं हैं. वे सेफ भी नहीं हैं. वे क्लब के लिए लड़ना भी नहीं जानते. सब बेचारे हैं.
यदि नहीं हैं तो कल से मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और पार्षदों की गणेश परिक्रमा बंद करें. बडे़ और स्थापित अखबार इस मुद्दे पर साथ खडे़ हों. अन्यथा प्रेस क्लब ऐसे ही धक्के खाता रहेगा. एक दिन विकास के नाम पर प्रेस क्लब छीन लिया जाएगा. बने रहिये तुर्रम खाँ.
नीचे इस पोस्ट पर आए कुछ कमेंट्स भी पढ़ें..
गिरिजेश वशिष्ठ-
जब पत्रकारिता ही नहीं बची तो क्लब का क्या करना है.
विजय कुमार तिवारी-
इतनी सुंदर स्थान और इमारत भी अच्छी है ,आठ दस लोग मिल कर शुरू कर दीजिए।
मिलिंद कुलकर्णी-
पत्रकारिता के पेशे का सम्मान लौटना चाहिए। और यह तभी होगा जब पत्रकारगण, पत्रकारिता को लेकर समाज में नकारात्मक टिप्पणियाँ करना बंद कर देंगे। पत्रकारों की समझदारी से ही यह भवन उनके पास बना रहेगा। सभी पत्रकार मित्र अपने छोटे-मोटे मतांतर छोड़ कर इस भवन की बेहतरी के लिए साथ आएं।
ओम प्रकाश गौर-
भोपाल के पत्रकार भवन की दशा तो इससे भी खराब है। कुछ महान महान पत्रकार मित्रों ने तब तक चैन नहीं लिया जब तक वह धूल में मिल नहीं गया।
वैसे यह भी सच है कि इसी प्रकार से कुछ महान महान मित्र साम, दाम, दंड, भेद और बाहुबल से पत्रकार भवन पर तब तक कब्जा जमाए बैठे रहे जब तक वह धूल में मिल नहीं गया।
नरेंद्र पांडेय-
दादा प्रणाम… क्षमा करें मुझे ऐसा क्यों लग रहा है ये सब बात रणछोड़ दास की जैसी हों कि मैदान छोड़कर बिगुल बजाना अरे जहां कुनबा बड़ा होता है वहां मन मुटाव तो होता रहता ही है लेकिन हक की लड़ाई हमेशा लड़नी चाहिए, यह लड़ाई तो आपको अब भी लड़ना चाहिए फायदा किसी को भी मिले, हैं तो आपके छोटे भाई. नाम आपका ही रहेगा आप उन तथाकथित क्रांतिकारी जैसे ना बने जो बाद में निकलते हैं बताओ कौन था।
नहीं तो किसी शायर ने लिखा है कि-
संचय की क्षमता ना रही तो त्यागी बन गए
और समय ने नंगा किया तो बैरागी बन गए
नवीन नायक-
दिक्कत ग्वालियर प्रेस क्लब की यह है की इसकी शुरुआत एक दान की बछिया के रूप में हुई और जिसे भी यह दान स्वरूप मिला उसने इसे अपना दान समझकर इसपर अधिकार रखना चाहा किसी ने भी इस दान को वैधानिक व लोकतांत्रिक रूप से इसकी नींव को मजबूत नही करना चाहा कई बार निष्पक्ष चुनाव किये जाने की बात की जाती रही लेकिन दुर्भाग्य है कि किसी ने भी चुनाव कराकर समिति का गठन करने की वजाए अपने अपने सामर्थ्य और ग्रुप बनाकर इस प्रेस क्लब पर अधिकार जताया है और यह परंपरा शुरू से लेकर अब तक चल रही है।
यशवंत सिंह पवार-
सर जी, पत्रकार का इगो आसमान पर होता है इसीलिए यह समस्या आती है। यह समस्या हर जगह पर है। अभी जो नए पत्रकार आ रहे हैं,वे तो पहले दिन से ही अपने आप को तीसमारखा समझने लगते हैं। पूरा फायदा इसका नेता व अधिकारी उठाते हैं।
ठाकुर संग्राम सिंह-
जब हम छोटे थे तब इस भवन में सिंधिया लोकोमोटिव का एक स्टीम इंजन रखा होता था जो बाद में शायद रेलवे म्यूजियम भिजवा दिया गया । तब हम इसके शटर में झांक कर उस इंजन को देख करते थे। हमें तो वही याद आता है।


