‘सौहार्द’ और ‘सौहार्द्र’

Rajeev Sharma-

कई लोगों को ‘सौहार्द’ और ‘सौहार्द्र’ में भ्रम रहता है। वे ‘सौहार्द / सौहार्द्र’ दोनों लिखते हैं। बड़े-बड़े अख़बार कभी ‘सौहार्द’ तो कभी ‘सौहार्द्र’ लिख देते हैं। इनमें से सही कौनसा है?

हिंदी/संस्कृत के विद्वानों ने ‘सौहार्द’ को सही और ‘सौहार्द्र’ को ग़लत माना है। डॉ. हरदेव बाहरी के शब्दकोश में पृष्ठ संख्या 852 पर ‘सौहार्द’ शब्द मिलता है, जिसका अर्थ ‘दोस्ती, मैत्री, सद्भाव’ बताया गया है।

मैंने दो शब्दकोश और देखे। दोनों में ही ‘सौहार्द’ ज़रूर मिला, लेकिन ‘सौहार्द्र’ कहीं नहीं मिला।

आज (4 सितंबर, 2022) के दैनिक भास्कर में ‘रसरंग’ के दूसरे पृष्ठ (ऐप के अनुसार पृष्ठ सं. 12) पर प्रकाशित लघुकथा में ‘सौहार्द’ को ‘सौहार्द्र’ लिख दिया गया- ‘सौहार्द्र के मसीहा का संदेश!’

कथा में अंतिम से चौथी पंक्ति में भी ‘सौहार्द्र’ लिखा है, जो कि ग़लत है। हालांकि यह लघुकथा अच्छी है।

इसी तरह भास्कर के ‘देश-विदेश’ वाले पृष्ठ पर नीतीश कुमार के बयान पर आधारित एक ख़बर में ‘सामाजिक सौहार्द’ को ‘सामाजिक ‘सौहार्द्र’ लिखा है।

प्रसिद्ध भाषा विशेषज्ञ अजित वडनेरकर बताते हैं, ‘अब यह जानने-समझने की ज़रूरत नहीं रह गई है कि ‘सौहार्द्र’ या ‘सौहार्द्रता’ शब्द ग़लत है। इसका सही उच्चारण और वर्तनी है ‘सौहार्द’, जिसका रिश्ता हार्दिकता से जुड़ता है। ‘सौहार्द्र’ में ‘आर्द्रता’ का जो स्पर्श है, उससे ‘सौहार्द’ में निहित भाव प्रकट नहीं होता। ‘सौहार्द्र’ जैसा कोई शब्द किसी कोश में नहीं मिलेगा, मगर यह शब्द चल पड़ा है। भाषा ख़ुद अपना रास्ता चुनती है, मगर ‘सौहार्द’ का ‘सौहार्द्र’ हो जाना ‘भाखा बहता नीर’ वाला उदाहरण नहीं है, क्योंकि ‘सौहार्द्र’ की तुलना में ‘सौहार्द’ उच्चारण कहीं सहज और आसान है। यह विशुद्ध भाषा के प्रति असावधानी और अगंभीर नज़रिए का परिणाम है।’

अगर दोबारा बात करें ‘रसरंग’ की, तो इसके प्रथम पृष्ठ पर ‘ग़ुलामी’ को ‘गुलामी’, ‘अफ़ग़ानिस्तान’ को ‘अफगानिस्तान’ लिखा है। हालांकि आजकल इसे ख़ास ग़लती नहीं माना जाता है, क्योंकि सभी अख़बारों ने नुक़्ते और चंद्र बिंदी के नियम हटा दिए हैं।

मैं मानता हूं कि विशेष दिनों/अवधि पर प्रकाशित होनेवाले परिशिष्ट को इस नियम का पालन करना चाहिए। उन्हें पढ़कर बच्चों का भाषाज्ञान अच्छा होता है। अगर चंद्र बिंदी न लगाएं तो कोई बात नहीं, लेकिन नुक़्ता ज़रूर लगाएं।

राजीव शर्मा, जयपुर



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