क्‍यों प्रहसन में बदल गया हिंदी अकादमी का ‘भाषादूत सम्‍मान’!

हिंदी अकादमी द्वारा हिंदी दिवस के अवसर पर भाषादूत सम्मानदेने का पूरा आयोजन जिस तरह एक प्रहसन में बदल गया, वह दुर्भाग्यपूर्ण है. चिंताजनक रूप से हिन्दी में सम्मानों का सम्मान लगातार घटता गया है और उस सिलसिले में जुड़ने वाली सबसे ताज़ा कड़ी हिन्दी अकादमी का यह आयोजन है. 

हिन्दी अकादमी ने कुछ दिन पहले ब्लॉगिंग एवं अन्य माध्यमों से जुड़े नौ लेखकों के नामों का चयन किया और उन्हें ईमेल से इसकी सूचना दी गयी कि 14 सितम्बर को दिल्ली के हिंदी भवन में उन्हें सम्मानित किया जाएगा. उसके दो-तीन दिन बाद ही गुज़रे सोमवार को उनमें से तीन लेखकों अरुणदेव (समालोचन’), संतोष चतुर्वेदी (पहली बार’) और अशोक कुमार पाण्डेय (असुविधा’) – को ईमेल से सूचित किया गया कि उन्हें त्रुटिवशइस सम्मान का निमंत्रण मिल गया था, वे पिछले पत्र को मानवीय भूलमानकर उसकी अनदेखी करें.

बताया जा रहा है कि सम्मानित होने वाले लेखकों की सूची को अंतिम समय में मंत्रालय के स्तर बदला गया. सम्मान देने के निर्णय को संचालन समिति में विचार-विमर्श के लिए न रखने और जो भी चयन हुआ था, उसमें संस्कृति मंत्री द्वारा मनमाने बदलाव किये जाने के विरोध में अकादमी की संचालन समिति से श्री ओम थानवी ने इस्तीफा भी दिया है.

हिंदी अकादमी दिल्ली सरकार के कला एवं संस्कृति मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्तशासी संस्था है. दिल्ली में हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के परिवर्धन और प्रचार-प्रसारके लिए बनी इस संस्था की जो संचालन समिति हिंदी अकादमी के अध्यक्ष (मुख्यमंत्री, दिल्ली सरकार) द्वारा दो साल की अवधि के लिए गठित की जाती है, वह अगर स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम न हो तो ऐसी संस्थाओं का कोई मतलब नहीं है.

मसला सिर्फ़ पुरस्कारों और सम्मानों का नहीं. किसी भी तरह की गतिविधि के मामले में स्वायत्तता और पारदर्शिता ऐसी संस्थाओं के उपयोगी एवं उत्पादक बन पाने / बने रहने की बुनियादी शर्त हैं. वह न होने की स्थिति में वे जिनके परिवर्धन और प्रचार-प्रसारके लिए गठित की गयी हैं, उनका अहित करने वाले तंत्र में तब्दील हो जाती हैं. इसलिए हम इस तरह के सरकारी हस्तक्षेप की कठोर शब्दों में निंदा करते हैं. हम आम आदमी पार्टी की सरकार से यह मांग करते हैं कि जिन साहित्यकारों को उसने अकादमी का संचालन करने के लिए चुना है, उन्हें अपने विवेक से काम करने दे और अकादमी की स्वायत्तता का सम्मान करे.

साथ ही, जनवादी लेखक संघ हिंदी अकादमी के लेखक पदाधिकारियों से भी यह उम्मीद करता है कि वे इस संस्था की स्वायत्तता की रक्षा को अपना ज़रूरी दायित्व मानेंगे और अनपेक्षित सरकारी हस्तक्षेप को अस्वीकार करेंगे. वे हिंदी में लिखने वाले लेखक-समाज के प्रतिनिधि के रूप में अपनी ज़िम्मेदार भूमिका को समझें, ऐसी उनसे उम्मीद की जाती है.  

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)

संजीव कुमार (उप-महासचिव)

जनवादी लेखक संघ 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *