हिंदी-हिंदी रटने वाले राहुल देव ने बिटिया को अंग्रेजी में दी बड्डे की बधाई तो उठे सवाल, पढ़ें उनकी सफाई

राहुल देव : बेटी के जन्मदिन पर अंग्रेजी में लिखना कई मित्रों को अखरा है। अधिकांश को अगर बुरा नहीं लगा तो कम से कम आश्चर्य तो जरूर हुआ होगा। हालांकि वात्सल्य की भाषा पर सफाई देना कोई जरूरी नहीं किंतु चूंकि मैं स्वयं बहुत हिंदी-हिंदी करता हूं और अनावश्यक अंग्रेजी पर दूसरों को टोकता …

अंग्रेजी न जानने से इंजीनियरिंग छात्र द्वारा आत्महत्या समूचे हिंदी समाज को तमाचा : राहुल देव

इंदौर में इंजीनियरिंग छात्र शुभम मालवीय द्वारा अंग्रेजी न जानने के कारण होने वाले अपमान में की गई आत्महत्या समूचे हिन्दी समाज के मुंह पर तमाचा है। हर साल 4-5 छात्र अंग्रेजी की बलिवेदी पर यूं ही शहीद होते हैं। पर हिन्दी के मठाधीशों, नीति निर्माताओं, शिक्षाविदों, राजनेताओं, साहित्यकारों, पत्रकारों का इन पर ध्यान नहीं …

हिंदी भावना प्रधान है तो अंग्रेजी प्रोफेशन की भाषा

लखनऊ। अंग्रेजीदां आदमी अपनी भाषा का रौब दिखाता है। लेकिन हिंदी दुनिया की सबसे बड़ी भाषा है। अदालतों में हिंदी में बहस नहीं होती है। मुअक्किल को पता ही नहीं कि बहस उसके पक्ष में हो रही कि विपक्ष में, यह बड़ा दुखद है। हिंदी पूरे भारत में स्वीकार्य है। हिंदी को हम जितना अधिक …

मेडिकल की पढ़ाई अब हिंदी में

आजकल मैं इंदौर में हूं। यहां के अखबारों में छपी एक खबर ऐसी है कि जिस पर पूरे देश का ध्यान जाना चाहिए। केंद्र सरकार का भी और प्रांतीय सरकारों का भी। चिकित्सा के क्षेत्र में यह क्रांतिकारी कदम है। पिछले 50 साल से देश के नेताओं और डाॅक्टरों से मैं आग्रह कर रहा हूं …

हिन्दी के दाँत खाने के कुछ, दिखाने के कुछ

हिंदी दिवस पर विशेष

जयराम शुक्ल

दिलचस्प संयोग है कि हिन्दी दिवस हर साल पितरपक्ष में आता है। हम लगे हाथ हिन्दी के पुरखों को याद करके उनका भी श्राद्ध और तर्पण कर लेते हैं। पिछले साल भोपाल में विश्व हिंदी सम्मेलन रचा गया था। सरकारी स्तर पर कई दिशा-निर्देश निकले,संकल्प व्यक्त किए गए। लगा मध्यप्रदेश देश में हिन्दी का ध्वजवाहक बनेगा, पर ढाँक के वही तीन पांत। सरकार हिन्दी को लेकर कितनी निष्ठावान है,यह जानना है तो जा के भोपाल का अटलबिहारी हिंदी विश्वविद्यालय की दशा देख आइए। विश्वविद्यालय की परिकल्पना यह थी कि विज्ञान,संचार से लेकर चिकित्सा और अभियंत्रिकी तक सभी विषय हिन्दी में पढ़ाएंगे। आज भी विश्वविद्यालय नामचार का है। सरकार को अपने नाक की चिंता न हो तो इसे कब का बंद कर चुकी होती। हाँ नरेन्द मोदी को इस बात के लिए साधुवाद दिया जाना चाहिए कि वे हिन्दी के लोकव्यापीकरण में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। उन्हें विदेशों में भी हिंदी में सुनकर अच्छा लगता है। जब बहुत ही जरुरी होता है तभी वे अँग्रेजी में बोलते हैं।

हिंदी वाले आईएएस बनने का सपना अब छोड़ ही दें!

सफलता के हज़ार साथी होते हैं, किन्तु असफलता एकान्त में विलाप करती है। यूँ तो सफलता या असफलता का कोई निश्चित गणितीय सूत्र नहीं होता, किन्तु जब पता चले कि आपकी असफलता कहीं न कहीं पूर्व नियोजित है, तो वह स्थिति निश्चित रूप से चिंताजनक है। देश की सबसे बड़ी मानी जाने वाली आईएएस की परीक्षा को आयोजित करने वाली संस्था ‘संघ लोक सेवा आयोग’ आज घोर अपारदर्शिता और विभेदपूर्ण व्यवहार में लिप्त है।

Oppose attempts at reducing the status of National languages to local languages

On the occasion of International Mother languages Day, today, we announce the inauguration of Bharatiya Bhasha Samooh and declare our intention to make people aware of the imminent threat to their languages. We will resist and expose every attempt  to downgrade Indian languages.

क्‍यों प्रहसन में बदल गया हिंदी अकादमी का ‘भाषादूत सम्‍मान’!

हिंदी अकादमी द्वारा हिंदी दिवस के अवसर पर ‘भाषादूत सम्मान’ देने का पूरा आयोजन जिस तरह एक प्रहसन में बदल गया, वह दुर्भाग्यपूर्ण है. चिंताजनक रूप से हिन्दी में सम्मानों का सम्मान लगातार घटता गया है और उस सिलसिले में जुड़ने वाली सबसे ताज़ा कड़ी हिन्दी अकादमी का यह आयोजन है.  हिन्दी अकादमी ने कुछ …

हैप्पी हिंदी डे

एक साल में ६९ दिन को हम विभिन्न दिवसों (इसमें बाज़ार आधारित दिवस मसलन वेलेनटाइन डे, फादर-मदर आदि दिवस शामिल नहीं हैं) के रूप में मनाते हैं….किसी-किसी महीने तो १०-१० दिवस मना लेते हैं, एक दिन एक अक्टूबर विश्व प्रौढ़ दिवस होता हैं तो इसी दिन रक्तदान दिवस भी है। क्यों है, यह तो पता नहीं अगर होता भी तो क्या कर लेते। हम आजाद हैं जब चाहे तब दिवस जो चाहे वो दिवस मनायें। फिर हिंदी राष्ट्र भाषा है राष्ट्र भाषा को एक दिन या सप्ताह/पखवाड़ा दे दिया तो कौन सा पहाड़ टूट गया|

कुमार विश्वास ‘हिन्दी हैं सब-वतन हैं’ टापिक पर 17 करोड़ लोगों से हुए आनलाइन रू-ब-रू

मशहूर कवि और आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता डा कुमार विश्वास मंगलवार को 17 करोड़ भारतीय फेसबुक यूज़र्स से रू-ब-रू हुए। मौका था विश्वास के ‘फेसबुक क्यू एंड ए’ सेशन का, जिसका विषय रखा गया था ‘हिन्दी हैं सब-वतन हैं – The Global Outreach of Hindi’। विश्वास द्वारा गूगल हेडक्वार्टर्स, कैलिफ़ोर्निया असेम्ब्ली, विक्टोरियन पार्लियामेंट और विश्व भर के अन्य विश्वविद्यालयों में हिन्दी भाषा का प्रतिनिधित्व करने के बाद यह वृहद् ऑनलाइन सेशन एक बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है।

पत्रकारिता दिवस पर हिंदी की दुर्दशा के बारे में अंग्रेजी में विस्तार से समझा रहे हैं जस्टिस मार्कंडेय काटजू

Today is Hindi Patrikarita Diwas. In this connection I wish to say that the language of the common man in large parts of India is khariboli or Hindustani, not Hindi. Hindi is an artificially created language, created by some bigots. To illustrate the difference between Hindi and Hindustani ( or khariboli ), let me give an example. In Khariboli we say ‘ udhar dekhiye ‘. In Hindi we will say ‘ udhar avlokan keejiye ‘, or ‘udhar drishtipaat keejiye ‘.

नरेंद्र मोदी के राज में भी हिंदी की वही दशा जो सोनिया-मनमोहन राज में थी : डा. वेदप्रताप वैदिक

नरेंद्र मोदी के राज में हिंदी की वही दशा क्यों हैं, जो सोनिया-मनमोहन राज में थी? सोनिया इटली में पैदा हुईं थीं और मनमोहनजी पाकिस्तान में! मोदी उस गुजरात में पैदा हुए हैं, जहां महर्षि दयानंद और महात्मा गांधी पैदा हुए थे। इन दोनों ने गुजराती होते हुए भी हिंदी के लिए जो किया, किसी ने नहीं किया। और फिर मोदी तो संघ के स्वयंसेवक भी रहे याने दूध और वह भी मिश्री घुला हुआ। फिर भी हिंदी की इतनी दुर्दशा क्यों है? यह दूध खट्टा क्यों लग रहा है?

गांधीवादी अनुपम मिश्र की रसोई में यम-नियम हैं मांस-मछली?

अनुपम मिश्र, अहिंसावादी मोहनदास करम चंद गांधी के अनुयायी हैं. ऐसे गांधीवादी अनुपम मिश्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के अभिनंदन ग्रंथ में छपे एक चित्र के जरिए मांस-मछली को रसोई का यम-नियम घोषित कर रहे हैं… और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की 150वीं जयंती वर्ष पर प्रकाशित स्मारिका ‘आचार्य पथ’ के पहले पन्ने पर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के चित्र के स्थान पर उनकी आवक्ष प्रतिमा को मालार्पण करती सोनिया गांधी को प्रमुखता दी गयी है…

बिहार की कचहरियों में देवनागरी लिपि में हिन्दी प्रयोग के लिए ‘बिहार बंधु’ अखबार को हमेशा याद किया जाएगा

वह भी क्या समय रहा होगा जब कोर्ट-कचहरियों में हिन्दी में बहस करना गुनाह माना जाता था, उन वकीलों को हेय दृष्टि से देखा जाता था। बोल-बाला था तो अंग्रेजी का। जज को ‘श्रीमान’ कहने वाले कम और ‘मी लार्ड’ कहने वाले अधिक। धोती-कुरता जैसे भारतीय परिधान धारण कर कोर्ट में उपस्थित होने वालों की संख्या कम और हाय-हल्लो कहने वाले पैंट, शर्ट, टाई और हैटधारियों की संख्या अधिक। ऐसी बात नहीं कि तब हिन्दी के प्रचार की गति मंद थी। दरअसल उस वक्त प्रचारक ही कम थे। नवजागरण और हिन्दी की यत्र-तत्र सर्वत्र मजबूती के साथ स्थापित करने का बीड़ा यदि किसी ने उठाया तो वह था बिहार का प्रथम हिन्दी पत्र ‘बिहार बन्धु’।

हिन्दी वर्णमाला संग मानव श्रृंखला बनाकर ली शपथ

विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर हिन्दी वर्णमाला के साथ मानव श्रृंखला बनाते जनसंचार विभाग के विद्यार्थी।

: हिन्दी और हम विषयक परिचर्चा का आयोजन : जौनपुर। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग में हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी और हम विषयक परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा के बाद विभाग के विद्यार्थियों ने हिन्दी के उत्थान के लिए मुख्य द्वार पर हिन्दी वर्णमाला के साथ मानव श्रृंखला बनाकर शपथ ली।

सुषमा और नरेंद्र मोदी के मुंह से नौकरशाहों ने ऐसी बात कहलवा दी, जो कोई महामूर्ख ही कह सकता है

भोपाल में हुए 10 वें विश्व हिंदी सम्मेलन से बहुत आशाएं थीं. विदेशों में होनेवाले विश्व हिंदी सम्मेलनों से इतनी आशा कभी नहीं रहती थी, क्योंकि सबको पता रहता है कि वे तो सैर-सपाटा सम्मेलन ही होते हैं. हिंदीवालों को विदेशों में कौन पूछता है? वे हिंदी के नाम पर मुफ्त में सैर-सपाटा कर आते हैं. लेकिन इस बार लगभग तीस साल बाद यह सम्मेलन भारत में हुआ. भारत में होने के बावजूद इसे विदेश मंत्रालय ने क्यों आयोजित किया? विदेश मंत्रालय का हिंदी से क्या लेना-देना? विदेश मंत्रालय तो अंग्रेजी की गुलामी का सबसे बड़ा गढ़ है. हमारी विदेश नीति कई बार सिर्फ अंग्रेजी के कारण ही गच्चा खा जाती है.

आखिर कब ख़त्म होगा हिन्दी का वनवास… अनुवादकों और चुटियाछापों ने किया हिन्दी का कबाड़ा

भोपाल में हो रहा विश्व हिन्दी सम्मेलन देश के हृदयस्थल–मध्य प्रदेश, विशेषतः राजधानी भोपाल के लिए अत्यन्त गौरव का विषय है। इस आयोजन ने एक बार फिर, हिन्दी-प्रेमियों की विश्व-बिरादरी के समक्ष हिन्दी की दिशा और दशा के बारे में विचार-मंथन करने का एक और अवसर प्रदान किया है। यह आयोजन भी, पूर्ववर्ती आयोजनों की तरह, एक व्यर्थ की कवायद बन कर न रह जाये, इसके लिए ज़रूरी है कि इसमें शामिल हो रहे महानुभाव हिन्दी के सही स्वरूप, इसके समुचित विकास और इसके प्रचार-प्रसार के मार्ग में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए कुछ सार्थक और ठोस कदम उठायें।

हिंदी सम्मेलन और भोपाल के अखबारों का मोदीकरण शर्मनाक है : ओम थानवी

Om Thanvi : भोपाल पहुँच कर देखा – हवाई अड्डे से शहर तक चप्पे-चप्पे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तसवीरों वाले विशाल पोस्टर लगे हैं, खम्भों पर भी मोदीजी के पोस्टर हैं। इनकी तादाद सैकड़ों में होगी। यह विश्व हिंदी सम्मलेन हो रहा है या भाजपा का कोई अधिवेशन? अधिकांश पोस्टर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ओर से हैं – शहर में मोदीजी के स्वागत वाले। अनेक में चौहान की अपनी छवि भी अंकित है।

परम आदरणीय जनरल वीके सिंहजी, आप आचमनकर्ता हिन्दी प्रेमियों को आखिर बुलाते ही क्यों हैं?

Vineet Kumar : नवरात्र के दौरान विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित करवाने के संदर्भ में;

परम आदरणीय जनरल वी.के.सिंहजी
जय हिन्दी
जय भारत

हिन्दी के आयोजनों को चश्मा उतार कर देखें

मध्य प्रदेश भारत का ह्दयप्रदेश है और हिन्दी के एक बड़ी पट्टी वाले प्रदेश के रूप में हमारी पहचान है। हिन्दी हमारे प्रदेश की पहचान है और लगातार निर्विकार भाव से हिन्दी में कार्य व्यवहार की गूंज का ही परिणाम है कि चालीस साल बाद हिन्दी के विश्वस्तरीय आयोजन को लेकर जब भारत का चयन किया गया तो इस आयोजन के लिए मध्यप्रदेश को दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन की मेजबानी सौंपी गई। गंगा-जमुनी संस्कृति वाले भोपाल में हिन्दी का यह आयोजन न केवल भोपाल के लिए अपितु समूचे हिन्दी समाज के लिए गौरव की बात है।

आईएएनएस हिंदी को चाहिए उपसंपादक

दिल्ली : IANS को एक उपसंपादक की आवश्यकता है। प्रेषित विज्ञप्तिन में बताया गया है कि आवेदन भेजते समय कवर लेटर में अपनी रुचि के विषय मसलन, राजनीति, खेल, वाणिज्य, विज्ञान, स्वास्थ्य, मनोरंजन, अंतर्राष्ट्रीय मामले आदि का उल्लेख अवश्य करें। वर्तमान सीटीसी एवं अपेक्षित सीटीसी अवश्य लिखें।  

बदल रही है हिन्दी की दुनिया

हिन्दी और पत्रकारों के बीच लोकप्रिय साइट भड़ास4मीडिया (Bhadas4Media) पर ‘जिन्दगी’ का विज्ञापन अमैजन की ओर से। हिन्दी के दिन बदलेंगे? सरकारी खरीद के भरोसे रहने वाले हिन्दी के प्रकाशकों ने हिन्दी के लेखकों को खूब छकाया है। किताबें बिकती नहीं हैं, खरीदार कहां हैं – का रोना रोने वाले प्रकाशकों के रहते हुए मुमकिन है कि हिन्दी के लेखक भविष्य में खुद ही प्रकाशक भी बन जाएं। या लेखक और रचना को पहचानने वाले नए प्रकाशक सामने आएं और लेखक पाठकों तक आसानी से पहुंच सकें। भड़ास4मीडिया चलाने वाले यशवंत सिंह नेट पर लिखकर पैसा कमाने के तरीके बताने के लिए अलग आयोजन कर चुके हैं और चाहते हैं कि हिन्दी वाले कुछ अलग और नया करें। आत्म निर्भर हों। इसपर फिर कभी। 

शीघ्र आ रहा लोकप्रिय हिंदी पत्रिका ‘पहल’ का सेंचुरी अंक

हिंदी जगत की अनिवार्य पत्रिका के रूप में मान्‍य ‘पहल’ का 100वां अंक शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रहा है। जबलपुर जैसे मध्‍यम शहर से पहल जैसी अंतरराष्‍ट्रीय पत्रिका का प्रकाशन वर्ष 1973 में शुरू हुआ और इसने विश्‍व स्‍तर को प्राप्‍त किया। ‘पहल’ के जरिए इसके संपादक ज्ञानरंजन ने लगातार जड़ता तोड़ने के काम किया। इसलिए पिछले 42 वर्षों से ‘पहल’ गंभीर लेखन व विचारों से जुड़ी पत्रिकाओं के बीच शीर्ष स्‍थान पर है और नए संपादकों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाती जा रही है। 

हिंदी न्यूज चैनलों की दुर्गति देख शर्म या हंसी नहीं, गुस्सा आता है

बुरा मत मानिएगा लेकिन भारत में हिन्दी न्यूज चैनलों की दुर्गति देखकर शर्म या हंसी नहीं आती, अब गुस्सा आता है. लगता है कि -पत्रकार- का पत्र कहीं दूर छूट गया है, सिर्फ -कार- ही बची है. कोई चैनल बेशर्मी से भारत में गर्मी के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहरता है (कम पढ़े-लिखे लोगों के मन में पाकिस्तान के खिलाफ भावनाएं भड़काने के लिए वे भड़काऊ हेडिंग चलाते हैं) तो किसी चैनल का मालिक मोदी सरकार के एक साल पूरे होने के कार्यक्रम में अपने एडिटर-इन-चीफ के साथ खुद मंच पर विराजमान हो जाता है, भाषण देता है और फिर मंच पर विराजमान केंद्रीय मंत्रियों से गुफ्तगू के लिए लालायित अपने सम्पादक से मंच से ही कहता है कि (पढ़िए हड़काता है) –आप सरकार को नम्बर देते रहिए, लेकिन ख्याल रखिएगा. मैं मानता हूं कि एक साल का समय काफी नहीं होता किसी सरकार के काम को आंकने के लिए. और चैनल का सम्पादक “सर-सर” कहता हुआ चैनल मालिक की सार्वजनिक जी-हुजूरी करता रहता है.

हिंदी संस्थान : त्रैवार्षिक हिंदीसेवी अवार्ड घोषित, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को राहुल सांकृत्यायन अवार्ड

आगरा : केंद्रीय हिंदी संस्थान के हिंदी सेवी सम्मानों के नामों का ऐलान हो चुका है। केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा 3 वर्ष के हिंदी सेवी अवार्ड से सम्मानित होने वालों व्यक्तियों के नामों की घोषणा की है। यह पुरस्कार वर्ष 2012, 2013 तथा 2014 के लिए चयन हुए हिंदी सेवियों की लिस्ट में केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष डॉ. कमलकिशोर गोयनका की अध्यक्षता में संस्थान के डायरेक्टर प्रो. मोहन ने पेश किया है।

हिंदी पत्रकारिता में दलित चिंतकों की मजबूत हिस्सेदारी : अरविंद मोहन

नई दिल्ली : वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता में दलित चिंतकों की हिस्सेदारी इतनी मजबूत हो गई है कि यदि उनके सामाजिक-साहित्यिक मुद्दों को केन्द्र में नहीं रखा गया तो यह पत्रकारिता के पेशे से बेईमानी और इसकी व्यवसायिकता की हानि होगी। प्रो. राजकुमार ने कहा कि शिक्षा ही प्रतिरोध की शक्ति देती है। 

इंद्रजीत गुप्ता ने लांच किया डिजिटल कंटेंट प्लेटफार्म ‘फाउंडिंग फ्यूल’

मुंबई: ‘फोर्ब्स इंडिया’ के पूर्व संपादक इंद्रजीत गुप्ता ने पियर्सन के ऑनलाइन शिक्षण उपक्रम ट्यूटर विस्टा के पूर्व प्रमुख सीएस स्वामीनाथन के साथ एक डिजिटल कंटेंट प्लेटफार्म फाउंडिंग फ्यूल लॉन्च किया है़। फाउंडिंग फ्यूल सोल्यूशन अत्याधुनिक डिजिटल उपकरणों का उपयोग करेगा और प्रोडक्ट्स के लिए बाज़ार मुहैया कराएगा। अंग्रेज़ी अखबार मिंट और डिजिटल टीवी नेटवर्क पिंग के साथ कंटेंट संबंधी समझौतों पर इसका हस्ताक्षर हो चुका है।

अंग्रेजी में आरटीआई नियमावली के ड्राफ्ट पर आपत्ति

लखनऊ : सामाजिक कार्यर्ता डॉ. नूतन ठाकुर ने आरटीआई कार्यकर्ताओं महेन्द्र अग्रवाल, देवेन्द्र दीक्षित, सलीम बेग, अनुपम पाण्डेय के साथ मुख्य सूचना आयुक्त जावेद उस्मानी को आरटीआई नियमावली, 2015 और उसके संलग्नकों के ड्राफ्ट मात्र अंग्रेजी भाषा में होने के सम्बन्ध में अपनी प्राथमिक आपत्ति प्रस्तुत की है. 

भाजपा शासित गोवा में हिंदी में बात करने पर पिटे पत्रकार ने सुबूत के तौर पर घटना की रिकार्डिंग पेश की

यह राष्ट्रीय शर्म की खबर है. जो भाजपा हिंदी भाषा को लेकर जाने क्या क्या दावे करती फिरती है, उसी के राज में हिंदी भाषा में बात करने पर एक पत्रकार पीट दिया गया. जी हां. वाकया पणजी का है. गोवा में यह शर्मनाक वाकया पत्रकार मुकेश कुमार के साथ हुआ. गोवा के एक स्थानीय चैनल में काम करने वाले मुकेश कुमार को राजभाषा हिंदी में बात करना महंगा पड़ गया. हिंदी में बात करने पर गोवा पुलिस ने उनके साथ मारपीट की.

फेसबुक, हिंदी भाषा और पंकज सिंह का दुख

Pankaj Singh : भाषा के बारे में लापरवाह सा नज़रिया फ़ेसबुक के बहुत सारे मित्रों में आम है। उनमें यश:प्रार्थी कवि-लेखकों से लेकर बढ़ती उम्र के स्वनामधन्य भी शामिल हैं। हर सुबह मेरे लिए ‘मित्रों’ की भाषिक भूलें दुख और सन्ताप का कारण बनती हैं। इन ‘मित्रों’ के प्रति मेरे मन में अपनत्व और शुभकामना है, इसलिए कई लोगों से मैं भूल सुधार का आग्रह करता रहता हूँ। शायद इसलिए भी कि उनकी प्रतिष्ठा-अप्रतिष्ठा को मैं अपनी छवि से जोड़कर देखने का आदी हूँ।