अंग्रेजी न जानने से इंजीनियरिंग छात्र द्वारा आत्महत्या समूचे हिंदी समाज को तमाचा : राहुल देव

इंदौर में इंजीनियरिंग छात्र शुभम मालवीय द्वारा अंग्रेजी न जानने के कारण होने वाले अपमान में की गई आत्महत्या समूचे हिन्दी समाज के मुंह पर तमाचा है। हर साल 4-5 छात्र अंग्रेजी की बलिवेदी पर यूं ही शहीद होते हैं। पर हिन्दी के मठाधीशों, नीति निर्माताओं, शिक्षाविदों, राजनेताओं, साहित्यकारों, पत्रकारों का इन पर ध्यान नहीं जाता। Continue reading

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हिंदी भावना प्रधान है तो अंग्रेजी प्रोफेशन की भाषा

लखनऊ। अंग्रेजीदां आदमी अपनी भाषा का रौब दिखाता है। लेकिन हिंदी दुनिया की सबसे बड़ी भाषा है। अदालतों में हिंदी में बहस नहीं होती है। मुअक्किल को पता ही नहीं कि बहस उसके पक्ष में हो रही कि विपक्ष में, यह बड़ा दुखद है। हिंदी पूरे भारत में स्वीकार्य है। हिंदी को हम जितना अधिक बोलचाल में लेकर आएंगे। हिंदी उतनी ही समृद्ध हो जाएगी। Continue reading

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मेडिकल की पढ़ाई अब हिंदी में

आजकल मैं इंदौर में हूं। यहां के अखबारों में छपी एक खबर ऐसी है कि जिस पर पूरे देश का ध्यान जाना चाहिए। केंद्र सरकार का भी और प्रांतीय सरकारों का भी। चिकित्सा के क्षेत्र में यह क्रांतिकारी कदम है। पिछले 50 साल से देश के नेताओं और डाॅक्टरों से मैं आग्रह कर रहा हूं कि मेडिकल की पढ़ाई आप हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में शुरु करें। ताकि उसके कई फायदे देश को एक साथ हों। एक तो पढ़ाई के आसान होने से डाॅक्टरों की संख्या बढ़ेगी। गांव-गांव तक रोगियों का इलाज हो सकेगा। Continue reading

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हिन्दी के दाँत खाने के कुछ, दिखाने के कुछ

हिंदी दिवस पर विशेष

जयराम शुक्ल

दिलचस्प संयोग है कि हिन्दी दिवस हर साल पितरपक्ष में आता है। हम लगे हाथ हिन्दी के पुरखों को याद करके उनका भी श्राद्ध और तर्पण कर लेते हैं। पिछले साल भोपाल में विश्व हिंदी सम्मेलन रचा गया था। सरकारी स्तर पर कई दिशा-निर्देश निकले,संकल्प व्यक्त किए गए। लगा मध्यप्रदेश देश में हिन्दी का ध्वजवाहक बनेगा, पर ढाँक के वही तीन पांत। सरकार हिन्दी को लेकर कितनी निष्ठावान है,यह जानना है तो जा के भोपाल का अटलबिहारी हिंदी विश्वविद्यालय की दशा देख आइए। विश्वविद्यालय की परिकल्पना यह थी कि विज्ञान,संचार से लेकर चिकित्सा और अभियंत्रिकी तक सभी विषय हिन्दी में पढ़ाएंगे। आज भी विश्वविद्यालय नामचार का है। सरकार को अपने नाक की चिंता न हो तो इसे कब का बंद कर चुकी होती। हाँ नरेन्द मोदी को इस बात के लिए साधुवाद दिया जाना चाहिए कि वे हिन्दी के लोकव्यापीकरण में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। उन्हें विदेशों में भी हिंदी में सुनकर अच्छा लगता है। जब बहुत ही जरुरी होता है तभी वे अँग्रेजी में बोलते हैं।

सही पूछा जाए तो अहिंदी क्षेत्रवासियों ने ही हिन्दी का बाना उठाया। बालगंगाधर तिलक,महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, सी.सुब्रह्मण्यम जैसे मनीषी थे जिन्होंने हिन्दी की प्राण प्रतिष्ठा में मदद की। ये सभी यह मानते थे कि हिन्दी ही देश को एक सूत्र में बाँध सकती थी। क्योंकि यह संघर्ष भी भाषा है,यह आंदोलन की जुबान है। महात्मा गांधी खुद स्वीकार करते थे कि उनकी हिन्दी कमजोर है फिर भी यह भाषा राष्ट्र की आन,बान,शान है। संविधान में हिन्दी को जब राजभाषा स्वीकार किया गया तो ये बात कही गई कि निकट भविष्य में देश अँग्रेजी की केंचुल उतार फेकेगा लेकिन यह एक झांसेबाजी थी।

भारतीय प्रशासनिक एवं समकक्षीय सेवाएं जिनसे देसी लाटसाहब तैयार होते हैं, वहां हिन्दी के संस्कार नहीं दिए गए। ये देश के नए राजे-महाराजे हैं और हर बाप अपने बेटों का भविष्य इन्हीं की छवि में देखता है। इसलिए सरकारी स्कूलों के समानांतर पब्लिक स्कूलों का कारोबार आजादी के बाद न सिर्फ जारी रहा,वरन दिन दूना रात चौगुना बढ़ता रहा। साठ के दशक तक आते आते यह धारणा पुख्ता हो गई कि अँग्रेजी अफसर पैदा करती है और हिन्दी चपरासी। इन्हीं दिनों जब डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने हिन्दी का आंदोलन चलाया तो मध्य व पिछड़ा वर्ग इसलिए जुडा़ कि उनके बच्चों के लिए भी भविष्य का रास्ता हिंदी से ही साफ होगा। समाजवादी नेताओं ने इसका फायदा उठाया। कई राज्यों की सरकारें बदलीं। इधर डा.लोहिया सत्तर का दशक नहीं देख पाए उधर इनके चेलों ने लोहिया के संकल्पों को विसर्जित करना शुरू कर दिया। चरण सिंह और मुलायम सिंह लोहिया टोपी लगाकर बात तो हिन्दी की बढ़ाने की करते थे पर बेटों को विलायत पढ़ने के लिए भेजते रहे।

हिन्दी सरकारी और राजनीतिक,दोनों के दोगलेपन का शिकार हो गई और आज भी जारी है। लाटसाहबियत में अँग्रजी अभी भी है,कल भी रहेगी नेता कुछ भी बोलें उसे फर्जी समझिए। हिन्दी अब तक न्याय की भी भाषा नहीं बन पाई। उच्च न्यायालयों में नख से शिख तक अँग्रजी है। मुव्वकिलों को हिन्दी की एक एक चिंदी का अँग्रजी रूपांतरण करवाना होता है और उसके लिए भी रकम खर्चनी पड़ती है। यहां अँग्रजी शोषण की भाषा है। कल्पना करिए यदि उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में हिन्दी व देश की अन्य भाषाओं को उनके क्षेत्र हिसाब से चलन में  आ जाए तो अँग्रजी का एकाधिकार टूटने में पल भर भी नहीं लगेगा। मंहगे वकीलों की फीस जमीन पर आ जाएगी और न्याय भी सहज और सस्ता हो जाएगा।
हिन्दी और देशी भाषाओं की लडा़ई लड़ने वाले श्यामरुद्र पाठक की सुधि लेने वाली न भाजपा है न स्वदेशी आंदोलन वाले। सन् 2011में यूपीए सरकार के खिलाफ लंबी लडा़ई लड़ी। सालों-साल धरने में बैठे रहे। एक दिन सरकार ने पकड़कर तिहाड़ भेज दिया तब से पता नहीं कि वे कहां हैं। श्यामरुद पाठक कोई मामूली आदमी नहीं हैं। उच्च शिक्षित, व हिंदी माध्यम से विज्ञान विषय में पीएचडी करने वाले, हिंदी माध्यम से आईएएस की परीक्षा पास करने वाले। हर मुद्दे पर गत्ते की तलवार भांजने वाले चैनलिया एंकरों को भी इधर देखने की फुरसत नहीं।

मोदी जी भले ही हिन्दी की बात करें पर वे ऊँची अदालतों और लाटसाहबी की भाषा हिन्दी को बना पाएंगें, मुश्किल है। इसकी साफ वजह है। पिछली सरकारों से लेकर अब की सरकार में भी बडे़ वकील ही प्रभावशाली मंत्री हैं। ये जब कुछ नहीं रहते तब वकील होते हैं। जब अँग्रजी ही इनकी विशिष्टता है तो भला ये क्यों राय देंगे कि हिन्दी और देशी भाषाओं को न्याय की भाषा बनाई जाए। सरकार के नीति निर्देशक प्रारूप यही अँग्रेजीदा लाटसाहब लोग बनाते हैं तो ये अपनी ही पीढ़ी के पाँव में कुल्हाड़ी क्यों मारेंगे। सो यह मानकर चलिए कि ये सरकारोँ में आने जाने वाले लोग बातें तो हिन्दी की बहुत करेंगे, कसमें खाएंगे और संकल्प भी लेंगे पर हिन्दी की बरकत के लिए करेंगे कुछ भी नहीं।

हिन्दी को हिन्दी के मूर्धन्य भी नहीं पालपोस रहे हैं। उनकी रचनाओं, कृतियों को पढ़ता कौन है..जो पीएचडी कर रहे होते हैं वे, या वे जिन्होंने समालोचकों का हुक्का भरा व उसके प्रतिद्वंदी को गरियाया वो, फिर कमराबंद संगोष्ठियों में अपनी-अपनी सुनाने की प्रत्याशा में बैठे साहित्य के कुछ लोभार्थी और लाभार्थी। यदि ये माने कि हिन्दी इनके माथे बची है या आगे बढ़ रही है तो मुगालते में हैं। हिन्दी में कोई बेस्टसेलर क्यों नहीं निकलती…? मैंने ही कमलेश्वर की..कितने पाकिस्तान ..के बाद कोई पुस्तक नहीं खरीदी। प्रेमचंद, निराला,दिनकर और इनके समकलीन ही बुक स्टाल्स में अभी भी चल खप रहे हैं।

दरअसल जो लोकरूचि का लेखक है उसे ये महंत और उनके पंडे साहित्यकार मानते ही नहीं। बाहर गॉडफादर, और  लोलिता जैसे उपन्यासों को साहित्यिक कृति का दर्जा है। यहां ऐसी कृतियों को लुगदी साहित्य करार कर पल भर में खारिज कर दिया जाता है। हिन्दी के कृतिकार अपने खोल में घुसे हैं । यही इनकी दुनिया है। हिन्दी को बाजार पालपोस रहा है। यह उत्पादक और उपभोक्ता की भाषा है। बाजार के आकार के साथ साथ हिन्दी का भी आकार बढ़ रहा है। फिल्में हिन्दी को सात समंदर पार ले जा रही हैं। जिस काम की अपेक्षा साहित्यकारों से है वह काम अपढ़ फिल्मकार कर रहे हैं। हिन्दी की गति उसकी नियति से तय हो रही है। जैसे फैले फैलने दीजिए। अपन तो यही मानते हैं कि जैसे घूरे के दिन भी कभी न कभी फिरते हैं, वैसे ही हिन्दी के भी फिरेंगे।

लेखक जयराम शुक्ला मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क 8225812813 के जरिए किया जा सकता है.

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हिंदी वाले आईएएस बनने का सपना अब छोड़ ही दें!

सफलता के हज़ार साथी होते हैं, किन्तु असफलता एकान्त में विलाप करती है। यूँ तो सफलता या असफलता का कोई निश्चित गणितीय सूत्र नहीं होता, किन्तु जब पता चले कि आपकी असफलता कहीं न कहीं पूर्व नियोजित है, तो वह स्थिति निश्चित रूप से चिंताजनक है। देश की सबसे बड़ी मानी जाने वाली आईएएस की परीक्षा को आयोजित करने वाली संस्था ‘संघ लोक सेवा आयोग’ आज घोर अपारदर्शिता और विभेदपूर्ण व्यवहार में लिप्त है।

हिंदी माध्यम के सिविल सेवा अभ्यर्थियों का  विशेषतः 2011 के बाद से, गिरता हुआ चयन अनुपात सारी कहानी बयान करता है। सम्पूर्ण रिक्तियों का लगभग 3 या 4% ही केवल हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के हिस्से में आ पा रहा है। हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के चयन की गिरती दर का कारण क्या उनकी अयोग्यता/अक्षमता को ठहराया जा सकता है? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है, इसके पीछे कोई तार्किक आधार नहीं है।

यह सर्वविदित है इस परीक्षा के लिए तैयारी करने वालों में सबसे ज़ियादः संख्या हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों की ही है, और उनके परिश्रम तथा क्षमताओं को ख़ारिज करने का कोई तार्किक आधार किसी के पास नहीं है। अस्ल समस्या संघ लोक सेवा आयोग के भेदभावपूर्ण रवैये और अपारदर्शिता में निहित है, उस मानसिकता में निहित है जो चाहती है कि ग्रामीण और क़स्बाई पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों के स्थान पर शहरी पृष्ठभूमि के, अंग्रेज़ी माध्यम के एंजिनियर्स और डॉक्टर्स ज़ियादः से ज़ियादः चयनित होकर आएँ।

भेदभाव और अपारदर्शिता का यह सिलसिला प्रारम्भिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार, तीनों ही स्तरों तक जारी रहता है। प्रारम्भिक परीक्षा के दोनों प्रश्न पत्रों में व्यावहारिक हिन्दी अनुवाद पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। फलस्वरूप, ‘कन्वेंशन’ की हिन्दी ‘अभिसमय’ दे दी जाती है और ‘प्रोजेक्टेड’ की हिन्दी ‘प्रकल्पित’। ऐसे ही क्लिष्ट और अलोकप्रचलित हिन्दी अनुवाद के कई उदाहरण हैं। इतने जटिल प्रश्न पत्रों में, जहाँ अभ्यर्थी की एक सेकण्ड भी क़ीमती होती है, वहाँ कई मिनट्स  इस भाषायी अनुवाद के चलते ख़राब हो जाते हैं; साथ ही, कई बार ऐसे अनुवाद की साम्यता किसी अन्य शब्द से बिठाकर, अभ्यर्थी ग़लत उत्तर का चयन कर लेता है और हज़ारों की संख्या में हर साल ऐसे अभ्यर्थी होते हैं जो एक या दो अंकों से ही प्रारम्भिक परीक्षा में ही उनका पत्ता कट जाता हैं।

कुल मिला कर ये कहा जा सकता है कि गलत अनुवाद के कारण छात्रों से गलत प्रश्न के सही उत्तर मांगे जाते है जो कि असंभव है। प्रारम्भिक परीक्षा की उत्तर कुंजी (answer key), अभ्यर्थियों के प्राप्तांक उन्हें इस परीक्षा के लगभग एक साल बाद बताए जाते हैं, जिसका कोई औचित्य नहीं। ओएमआर शीट की कार्बन कॉपी भी अभ्यर्थियों को दिए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है। 

हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों की मुख्य परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं को भी हिन्दी में अदक्ष मूल्यांकनकर्ताओं द्वारा जाँचा जाता है। ऐसे में पूरी संभावना यह रहती है कि अभ्यर्थी का लिखा हुआ मूल्यांकनकर्ता तक सही से प्रेषित ही न हो। इस वजह से मुख्य परीक्षा में ही हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों का स्कोर, अंग्रेज़ी माध्यम के अभ्यर्थियों की तुलना में काफ़ी कम रह जाता है। अपारदर्शिता का आलम ये है कि मुख्य परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाएँ अभ्यर्थियों को दिखाए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है, जबकि कुछ राज्य लोक सेवा आयोग तक आरटीआई/एप्लीकेशन के माध्यम से ऐसी सुविधा प्रदान करते हैं। साक्षात्कार में जानबूझकर कई बार हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों को असहज करने वाले प्रश्न अंग्रेज़ी में पूछे जाते हैं, साथ ही, साक्षात्कार के लिए लिये निर्धारित 275 अंक परीक्षा में आत्मनिष्ठ प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं, जो किसी भी तरह से उचित नहीं है।

यह लड़ाई हिंदी बनाम अंग्रेज़ी की लड़ाई नहीं है। अभ्यर्थी किसी भाषायी द्वेष से ग्रस्त नहीं हैं। वैसे भी, अपारदर्शिता से तो अंग्रेज़ी और अन्य भाषायी माध्यम के अभ्यर्थी भी समान रूप से त्रस्त हैं ही। लड़ाई है, भाषाओं के साथ समान व्यवहार करने की। वह हिन्दी जो पूरे देश में सबसे ज़ियादः लोगों द्वारा बोले जाने वाली भाषा है, वह हिंदी जो आज़ादी के संघर्ष के दौरान जनसंचार की भाषा बनी थी, वह हिंदी जो लोचशील है, जो ‘ट्रेन’ और ‘शायद’ जैसे अन्य भाषायी मूल के शब्दों को भी सहजता के साथ अपने में समाहित कर लेती है, वही हिंदी और हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थी आज इतने उपेक्षित क्यों हैं? “India got freedom in 1947”, जैसा वाक्य, “भारत ने 1947 में आज़ादी पाई”, से कैसे श्रेष्ठ साबित होता है? ये समस्या केवल उस मानसिकता की है जो हिंदी को तुलनात्मक रूप से अधिक वैज्ञानिक भाषा होने के बावजूद कम करके आँकती है। समस्या अंग्रेज़ी से नहीं, बल्कि अंग्रेज़ियत की उस मानसिकता से है जो आज भी देश के शीर्ष संस्थानों में छायी हुई है, जो केवल भाषा विशेष में दक्ष होने के आधार पर किसी व्यक्ति की योग्यता के सम्बंध में पूर्वाग्रह पाल लेती है।

ग्रामीण और क़स्बाई पृष्ठभूमि के लाखों अभ्यर्थी सीमित संसाधनों में, कई बार तो अमानवीय दशाओं में गुज़ारा करके इस परीक्षा के लिए अपना अमूल्य समय और ऊर्जा लगाते हैं, इसके बावजूद उनके लिए परिणाम बेहद निराशाजनक हैं। या तो देश के संचालकों/नीति निर्माताओं द्वारा स्पष्ट कह दिया जाए कि हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के लिए इस परीक्षा में कोई जगह नहीं है ताकि वे भ्रम में ना रहें और  समय, संसाधन तथा ऊर्जा को कहीं और लगा सकें ; या इस संस्था में व्याप्त घोर अपारदर्शिता और भाषायी भेदभाव को यथाशीघ्र समाप्त किया जाए।

यूपीएससी में हिंदी वालों के हक के लिए लड़ रहे निखिलेश सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : 9582182362

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Oppose attempts at reducing the status of National languages to local languages

On the occasion of International Mother languages Day, today, we announce the inauguration of Bharatiya Bhasha Samooh and declare our intention to make people aware of the imminent threat to their languages. We will resist and expose every attempt  to downgrade Indian languages.

There are 22 major Indian languages, constitutionally recognized as national languages and so called dialects, or languages without scripts. But they are being downgraded and removed from the national scene by pushing them back to particular regional boundaries. The worse part of it is, the languages spoken in the South of Vindhya are getting step-motherly treatment just because their basic structure is non-Aryan.

This government has worked to belittle all languages; instances have come to light that make the government intentions clear.

In the universities languages are relegated to the secondary status. The language is taught as the seventh subject which means it is not necessary to score marks in a language paper;

Language academies have to manage with meager budgets that may not be enough even for the upkeep of the existing dispensation.

Recently Prasar Bharati has taken the decision to shift its language news broadcasts from the national capital to different regions of the country. The argument is, the news bulletins in a language are being listened to only in a particular region. This shows that the government thinks that these are but local languages.

The excuses given are:

There is staff shortage. This is unacceptable because the staff can always be recruited if the government decides to do so. There has been no new appointment to the language news set up in the last 20 years. Languages are made to suffer the artificial staff shortage and manage with empanelled Casual Assignees who are booked for a limited period of say 72 days in a year. Since the language bulletins are managed by the casual and contract staff for so many years we must presume that there is a sufficient number of people available within the framework of employment decided by the government. After all, states are not independent sovereign nations that follow different recruitment policies. Staff shortage is the creation of the government.

Dearth of talent: They also argue that there is a dearth of talent in languages in the national capital and by shifting bulletins the AIR would be able to use local talent for its news bulletins. It is inconceivable that the talent was in abundance in the past but has dried out in 2017? Rather, there is now greater mobility resulting in various languages being spoken in a region.

It is a myth that listeners are confined to the main language area.

This myth is being deliberately spread to justify the attack on languages. There are people speaking languages other than the main regional language in a particular state. People now do not confine themselves to the areas where the only language spoken is their mother tongues. The government policy completely ignores these listeners who reside outside their mother-tongue areas.

The reason for shifting national languages is to be found in the government design to have one national language for the entire nation. Sindhi, Bengali, Punjabi and Tamil, are cross-border languages. Sindhi enjoyed vast following in the Sindh of Pakistan, Bangladesh speaks Bengali, Tamil bulletins were listened to in Jafna region of Sri Lanka and Punjabi bulletins are being listened to in Lahore. Instead of downgrading them, they should be promoted as cross-border languages.

Punjabi is not Delhi’s language, so thinks the government.  Delhi has a vast population of Punjabis. But ignoring this segment, Punjabi bulletins are also being shifted to Chandigarh. Already, Doordarshan has  stopped telecasting a Punjabi language programme PUNJABI DARPAN which was running for the last 32 years.

There is no Sindhi speaking state! New services Division of All India Radio shifted three languages: Sindhi, Kannada and Telugu to particular regions in 2005. Though, the Sindhi speaking people do not have their own state, the Sindhi bulletins were sent to Ahmedabad. Sindhi population is spread over different regions of the country: They are in Kutch and Ahmedabad in Gujarat, In Mumbai in Maharashtra, in Jaipur in Rajasthan, in Indore in Madhya Pradesh. What was the logic behind sending it to Gujarat?If there was dearth of talent in Delhi, what is the condition in Ahmedabad?The fact is, had the government properly evaluated the listening area of the Sindhi news bulletins these would have been retained in Delhi.

The same is the case with Kannada and Telugu.  These bulletins were shifted to Bengaluru and Hyderabad. There is more regional content now in these bulletins than the national or international, and the authorities have never bothered to correct the situation. Those who want to know more about the other regions of the country have perforce to change over to Hindi or English bulletins. The shifting has thus reduced the listening of language bulletins.

History is being wiped out : Language bulletins were started in Delhi in the wake of WWII and later, during wars with neighbouring countries. This is the history which records first footsteps of none other than Sardar Patel who had launched 6 national language bulletins from Delhi as the first I&B minister and made talent available in Delhi. His admirers make an about turn. The quality of language bulletins will suffer.

There are somw specific terms used in a particular culture, like Lavni, Jallikattu, Ghallughaara, Kaar seva, Onam, Pongal, Lohri, Bisu,These are not prevalent among people outside that frame of culture. India is with many cultural and linguistic traditions. Presently the language news staff exchanges notes when required but now we should expect a language editor in one place to call up his counterpart at some other station learn such cultural nuances.. Even emails and internet can not be faster than the direct access which is available now in Delhi where all languages work together. Ultimately, it will reduce the status of languages from national to local. People will stop thinking in terms of broader cultural perspective.

Diffusion in Delhi, concentration in states. Simultaneously with this diffusion Government is also moving towards concentration of bulletins broadcast from different regions of a state. There are local stations that cater to local population of a region in a state.  Almost all states have more than one originating stations. All will be brought to the state capitals under one roof.
Only NDA government makes such attempts. 

It is not a coincidence that the attempts to shift the language bulletins  get a fresh lease of life whenever the NDA government is in power. Sindhi,  Kannada and Telugu bulletins in Delhi were killed in 2005 as planned by the then NDA government, and again the unfinished agenda is vigorously taken up. From 1st March Assamese, Odiya and Tamil bulletins will stop broadcasts from Delhi, and other languages too will follow suit from 15th March.

What is the reason behind this paradoxical policy?

We suspect that this plan is is linked to the plan of handing over news broadcasts to Hindusthan Samachar, the RSS controlled news agency. It was quietly given opportunity to run Hindi and English News Rooms of News Services division of AIR on trial basis for three months from July to October. There was no competition for such a trial and the trial was conducted without any immediate reason or justification. The agency   has already announced it plans to train 2000 persons in the news making process in all languages over a period of two years. We can expect Hindusthan Samachar to take over the Radio news in the states before the 2019 General Elections.

The situation is bad for the ideal of Unity in Diversity.

Bharatiya Bhasha Samooh

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क्‍यों प्रहसन में बदल गया हिंदी अकादमी का ‘भाषादूत सम्‍मान’!

हिंदी अकादमी द्वारा हिंदी दिवस के अवसर पर भाषादूत सम्मानदेने का पूरा आयोजन जिस तरह एक प्रहसन में बदल गया, वह दुर्भाग्यपूर्ण है. चिंताजनक रूप से हिन्दी में सम्मानों का सम्मान लगातार घटता गया है और उस सिलसिले में जुड़ने वाली सबसे ताज़ा कड़ी हिन्दी अकादमी का यह आयोजन है. 

हिन्दी अकादमी ने कुछ दिन पहले ब्लॉगिंग एवं अन्य माध्यमों से जुड़े नौ लेखकों के नामों का चयन किया और उन्हें ईमेल से इसकी सूचना दी गयी कि 14 सितम्बर को दिल्ली के हिंदी भवन में उन्हें सम्मानित किया जाएगा. उसके दो-तीन दिन बाद ही गुज़रे सोमवार को उनमें से तीन लेखकों अरुणदेव (समालोचन’), संतोष चतुर्वेदी (पहली बार’) और अशोक कुमार पाण्डेय (असुविधा’) – को ईमेल से सूचित किया गया कि उन्हें त्रुटिवशइस सम्मान का निमंत्रण मिल गया था, वे पिछले पत्र को मानवीय भूलमानकर उसकी अनदेखी करें.

बताया जा रहा है कि सम्मानित होने वाले लेखकों की सूची को अंतिम समय में मंत्रालय के स्तर बदला गया. सम्मान देने के निर्णय को संचालन समिति में विचार-विमर्श के लिए न रखने और जो भी चयन हुआ था, उसमें संस्कृति मंत्री द्वारा मनमाने बदलाव किये जाने के विरोध में अकादमी की संचालन समिति से श्री ओम थानवी ने इस्तीफा भी दिया है.

हिंदी अकादमी दिल्ली सरकार के कला एवं संस्कृति मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्तशासी संस्था है. दिल्ली में हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के परिवर्धन और प्रचार-प्रसारके लिए बनी इस संस्था की जो संचालन समिति हिंदी अकादमी के अध्यक्ष (मुख्यमंत्री, दिल्ली सरकार) द्वारा दो साल की अवधि के लिए गठित की जाती है, वह अगर स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम न हो तो ऐसी संस्थाओं का कोई मतलब नहीं है.

मसला सिर्फ़ पुरस्कारों और सम्मानों का नहीं. किसी भी तरह की गतिविधि के मामले में स्वायत्तता और पारदर्शिता ऐसी संस्थाओं के उपयोगी एवं उत्पादक बन पाने / बने रहने की बुनियादी शर्त हैं. वह न होने की स्थिति में वे जिनके परिवर्धन और प्रचार-प्रसारके लिए गठित की गयी हैं, उनका अहित करने वाले तंत्र में तब्दील हो जाती हैं. इसलिए हम इस तरह के सरकारी हस्तक्षेप की कठोर शब्दों में निंदा करते हैं. हम आम आदमी पार्टी की सरकार से यह मांग करते हैं कि जिन साहित्यकारों को उसने अकादमी का संचालन करने के लिए चुना है, उन्हें अपने विवेक से काम करने दे और अकादमी की स्वायत्तता का सम्मान करे.

साथ ही, जनवादी लेखक संघ हिंदी अकादमी के लेखक पदाधिकारियों से भी यह उम्मीद करता है कि वे इस संस्था की स्वायत्तता की रक्षा को अपना ज़रूरी दायित्व मानेंगे और अनपेक्षित सरकारी हस्तक्षेप को अस्वीकार करेंगे. वे हिंदी में लिखने वाले लेखक-समाज के प्रतिनिधि के रूप में अपनी ज़िम्मेदार भूमिका को समझें, ऐसी उनसे उम्मीद की जाती है.  

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)

संजीव कुमार (उप-महासचिव)

जनवादी लेखक संघ 

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हैप्पी हिंदी डे

एक साल में ६९ दिन को हम विभिन्न दिवसों (इसमें बाज़ार आधारित दिवस मसलन वेलेनटाइन डे, फादर-मदर आदि दिवस शामिल नहीं हैं) के रूप में मनाते हैं….किसी-किसी महीने तो १०-१० दिवस मना लेते हैं, एक दिन एक अक्टूबर विश्व प्रौढ़ दिवस होता हैं तो इसी दिन रक्तदान दिवस भी है। क्यों है, यह तो पता नहीं अगर होता भी तो क्या कर लेते। हम आजाद हैं जब चाहे तब दिवस जो चाहे वो दिवस मनायें। फिर हिंदी राष्ट्र भाषा है राष्ट्र भाषा को एक दिन या सप्ताह/पखवाड़ा दे दिया तो कौन सा पहाड़ टूट गया|

बात मुद्दे की. हिन्दी दिवस आ गया है. अब यह बताने जरूरत नहीं कि यह वर्षों से आ रहा है और आता रहेगा, हम मनाते रहे हैं और मनाते रहेंगे. वैसे जब आपका बच्चा हिन्दी पर निबंध लिखने के लिए रिरियाने लगे तो समझ जाईये क़ि हिन्दी दिवस आने वाला है| बच्चा न भी रिरियाए तो बैंक और बीमा कम्पनियों में लटके बैनर और दीवारों पर चिपकाए गए सालाना स्लोगन (उपदेश) याद दिला देंगे|

सूत्रों (बिना इस वाक्य के कोई खबर पूरी नहीं होती) ने बताया क़ि सरकारी कार्यालयों, बैंकों, बीमा कम्पनियों और स्कूलों में तैयारियां युद्धस्तर पर चल रही हैं, हर अधिकारी अपने मातहत क़ि पेच कस रहा है.. “ऊपर” से आये संदेशों को नीचे तक पहुंचाया जा रहा है|

अधिकारियों ने हिन्दी में दखल रखने क़ि मान-मनौवल शुरू कर दी है| आलमारी से हिन्दी के कवि-लेखकों की सूचीं को झाड़-पोंछकर उसे फाइनल कर है..हरकारों (अब हिन्दी के साहित्यकार हैं तो सूचना के अत्याधुनिक संसाधन तो इनके पास होते नहीं) सो निमंत्रण भिजवाये जा रहे हैं..चमचे अधिकारियों के लिए भाषण लिखने में जुट गए हैं…साल भर अंगरेजी में डांट पिलाने वाला अधिकारी भी एक दिन, एक सप्ताह या एक पखवाड़ा अपने मातहतों से हिन्दी बोलेगा वो भी निखालिस…| किसी ने सच ही कहा है क़ि घूर (जहां कूड़ा डाला जाता है) के दिन भी एक दिन फिरते है यह तो हमारी प्यारी भाषा है राष्ट्रीय भाषा ….अफसोस कि आज भारतेंदु जी नही हैं वरना तो उनका भी दिल भी इन तैयारियों को देखकर गार्डेन-गार्डेन हो जाता।

अरुण श्रीवास्तव
देहरादून
arun.srivastava06@gmail.com

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कुमार विश्वास ‘हिन्दी हैं सब-वतन हैं’ टापिक पर 17 करोड़ लोगों से हुए आनलाइन रू-ब-रू

मशहूर कवि और आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता डा कुमार विश्वास मंगलवार को 17 करोड़ भारतीय फेसबुक यूज़र्स से रू-ब-रू हुए। मौका था विश्वास के ‘फेसबुक क्यू एंड ए’ सेशन का, जिसका विषय रखा गया था ‘हिन्दी हैं सब-वतन हैं – The Global Outreach of Hindi’। विश्वास द्वारा गूगल हेडक्वार्टर्स, कैलिफ़ोर्निया असेम्ब्ली, विक्टोरियन पार्लियामेंट और विश्व भर के अन्य विश्वविद्यालयों में हिन्दी भाषा का प्रतिनिधित्व करने के बाद यह वृहद् ऑनलाइन सेशन एक बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है।

इस सेशन का उद्देश्य था हिन्दी भाषा के वैश्विक विस्तार के विषय पर हिन्दी प्रेमियों और एक हिन्दी कवि के बीच का संवाद। इसके लिए मंगलवार शाम 7:30 से 8:15 तक का समय निर्धारित था जिसके बारे में विश्वास ने कई फेसबुक पोस्ट के माध्यमों से पहले ही अवगत कराया था। इस संवाद से सम्बद्ध एक पोस्टर फेसबुक इण्डिया के पेज पर भी शेयर किया गया था। उल्लेखनीय है कि इस पेज पर सत्रह करोड़ से ज़्यादा भारतीय फेसबुक यूज़र्स जुड़े हुए हैं। विश्वास के ऑफिसियल पेज पर इकत्तीस लाख से ज़्यादा यू ज़र्स हैं। इस लिहाज़ से हिन्दी भाषा के विस्तार पर यह अब तक की सबसे बड़ी ऑनलाइन चर्चा रही।

तय समय में लगभग 5500 सवाल पूछे गए। इसके बाद भी सवालों का आना लगातार जारी रहा और विश्वास को समय सीमा 8:15 से 8:30 कर देनी पड़ी। इस सेशन के दौरान हिन्दी से जुड़े कई सवाल पूछे गए। ज़्यादातर सवाल विश्वास के देश और विदेशों में होने वाले कवि-सम्मेलनों और विश्व भर के बड़े विश्वविद्यालयों में उनके व्याख्यानों से सम्बद्ध थे। इसके अलावा हिन्दी साहित्य मंचों और कवि सम्मेलनों से जुड़ने के सवाल भी पूछे गए। इस दौरान कई नवोदित कवियों ने भी उनसे संवाद किया। सेशन समाप्त होने के बाद भी सवाल आते रहे और रिपोर्ट लिखे जाने तक 8000 से भी ज़्यादा सवाल पूछे गए। सूत्रों के अनुसार यह अब तक का दूसरा सब से बड़ा क्यू एंड ए सेशन था।

विश्वास इस सेशन से खासे उत्साहित दिखे और इस सेशन के फ़ौरन बाद उन्होंने एक लाइव विडिओ जारी किया, जिसमें उन्होंने इस संवाद से जुड़े सभी हिन्दी प्रेमियों का धन्यवाद किया और साथ ही यह भी वादा किया कि समय समय पर विभिन्न मुद्दों पर वो ऐसी चर्चा करते रहेंगे।

Kumar Vishwas reaches out to 170 million people for Hindi

Renowned poet and senior leader of Aam Aadmi Party Dr Kumar Vishwas came face to face with more than 170 million Indian facebook users on Tuesday. This was a Facebook Q&A session titled ‘Hindi Hain Sab-Watan Hain – The Global Outreach of Hindi’. This grand online session is being seen as a big achievement by Dr Kumar Vishwas for Hindi after his presence at the Google HQ, California Assembly, Victorian Parliament and several international Universities as a torch bearer of Hindi language.
The said session was aimed at bridging the exchange of concepts among Hindi lovers and a Hindi poet.

It was set to be scheduled between 7:30 pm and 8:15 pm on Tuesday, but had to be extended for fifteen more minutes after the bombarding of questions continued past the deadline. The announcement of the event was shared by the Facebook India page which has more than one hundred seventy million likes. The official page of Dr Kumar vishwas has over 3 million likes.

This figures made this session the largest ever online session on the topic related to Globalization of Hindi language. Vishwas received more than 5500 questions in the set time and the questions kept coming after that too. More than 8000 questions that hit the timeline included questions related to the domestic as well as foreign tours of Vishwas. Also, newcomer poets wished to ask how they could write better and reach to bigger dais. Sources said that this is the second largest Facebook Q & A session ever. Dr Vishwas seemed to be high on this session and released a live video immediately after this session where he thanked all the participants and promised to hold more such sessions for his followers on social media.

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पत्रकारिता दिवस पर हिंदी की दुर्दशा के बारे में अंग्रेजी में विस्तार से समझा रहे हैं जस्टिस मार्कंडेय काटजू

Today is Hindi Patrikarita Diwas. In this connection I wish to say that the language of the common man in large parts of India is khariboli or Hindustani, not Hindi. Hindi is an artificially created language, created by some bigots. To illustrate the difference between Hindi and Hindustani ( or khariboli ), let me give an example. In Khariboli we say ‘ udhar dekhiye ‘. In Hindi we will say ‘ udhar avlokan keejiye ‘, or ‘udhar drishtipaat keejiye ‘.

Hindi was an artificial language created by certain bigots who wanted to propagate the idea that Hindi was the language of Hindus, and Urdu of Muslims. This was part of the British policy of divide and rule. In fact Urdu was the common language of all educated persons, whether Hindu, Muslim or Sikh, in large parts of India upto 1947 ( see my article ‘What is Urdu ‘ on my blog justicekatju.blogspot.in ).

Thus, while Hindustani was, and still is, the language of the common man, Urdu was the language of the educated class in large parts of India. I have explained in my article ‘ What is Urdu ‘ that Urdu is a combination of two languages, Hindustani, which was the common man’s language in urban India ( in rural areas there were dialects like Awadhi, Brijbhasha, Bjojpuri, Maghai, Maithili, mewari, marwari, etc ), and Persian which was the language of the aristocrats or elite in India for several centuries. The foundation of Urdu is Hindustani, on which a layer of Persian was placed to make it sophisticated and elegant. This gives Urdu great power and elegance, and Urdu poetry, in expressing the voice of the human heart, is perhaps the greatest poetry in the world.

After 1947 a massive propaganda was launched by certain fanatics that Urdu was a foreign language, and a language of Muslims alone. Persian words which had come into common usage in Hindustani were sought to be hatefully and systematically replaced by Sanskrit words which were not in common use. For example, ‘zila’ was replaced by ‘janapad ‘.

When I was a judge in Allahabad High Court, a lawyer who argues only in Hindi, filed a petition before me titled ‘Pratibhu Avedan Patra ‘. I asked him what the word ‘ pratibhu’ meant. He said it meant bail. I then told him that he should have used the word bail or zamaanat, which everybody understands in most parts of India, instead of ‘ pratibhu ‘ which no one understands.

Once in Allahabad I was taking a walk in the Cantonment area and saw a board in which it was written ‘ Pravaran Kendra ‘ I could not understand what it meant. Looking lower down I saw the words ‘ Recruitment Centre ‘. Surely the better words would have been ‘ Bharti daftar ‘ which everybody could understand, instead of ‘ pravaran kendra ‘ which nobody would understand.

It is fallacious to believe that a language becomes weaker if foreign words enter into it, in fact it becomes stronger. For example, the English language became stronger and was enriched by foreign words entering into it, e.g. from French, German, Arabic, Hindustani, etc

Once at Allahabad I offered a certain fare to a rickshawall, and he said my offer was ‘wajib; i.e. appropriate. Now this word ‘wajib’ is pure Persian, but it had come into common usage in Hindustani, as even a rickshawalla was using it.

So it is silly to try to remove Persian and Arabic words which had come into common vogue in Hindustani, and in fact this created an artificial language Hindi, which is sometimes difficult for the common man to understand. Often in Courts it was difficult to understand the Hindi used in Government notifications.

This policy of spitefully trying to remove Persian and Arabic words from Hindustani did great harm to Urdu, and almost amounted to genocide on a great language. Great injustice has been done in our country to Urdu, which is in fact a shining gem in the treasury of Indian culture. My attempt has been to restore its old glory.

I may mention here that while Arabic and Persian are foreign languages ( though I have great respect for them too, as I have great respect for all languages ), Urdu is an indigenous Indian language. It is totally false to call it a foreign language, and bracket it with Arabic and Persian. Urdu is the grand daughter of Sanskrit, not of Persian and Arabic, and over 70% of its words are from Sanskrit. It is a totally secular language, not a language of Muslims alone, as the bigots sought to depict it.

This bigoted policy also did harm to Sanskrit, as it was depicted as an oppressor, when in fact.Sanskrit was a language of free thinkers who questioned everything ( see my article ‘ Sanskrit as a language of Science ‘ online and on my blog justicekatju.blogspot.in ). Some people think that Sanskrit was only a language of chanting mantras in temples or Hindu religious ceremonies. In fact that was only 5% of Sanskrit literature. 95% of it has nothing to do with religion, and deals with philosophy, science, art, literature, grammar, etc.

लेखक जस्टिस मार्कंडेय काटजू जाने माने जज रहे हैं और अपने बेबाक विचारों व लेखन के लिए जाने जाते हैं.

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नरेंद्र मोदी के राज में भी हिंदी की वही दशा जो सोनिया-मनमोहन राज में थी : डा. वेदप्रताप वैदिक

नरेंद्र मोदी के राज में हिंदी की वही दशा क्यों हैं, जो सोनिया-मनमोहन राज में थी? सोनिया इटली में पैदा हुईं थीं और मनमोहनजी पाकिस्तान में! मोदी उस गुजरात में पैदा हुए हैं, जहां महर्षि दयानंद और महात्मा गांधी पैदा हुए थे। इन दोनों ने गुजराती होते हुए भी हिंदी के लिए जो किया, किसी ने नहीं किया। और फिर मोदी तो संघ के स्वयंसेवक भी रहे याने दूध और वह भी मिश्री घुला हुआ। फिर भी हिंदी की इतनी दुर्दशा क्यों है? यह दूध खट्टा क्यों लग रहा है?

मुझे पहले ही से डर था। यदि मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो अन्य प्रधानमंत्रियों की तरह वे भी नौकरशाहों की नौकरी करने लगेंगे। इसीलिए मैंने कुछ सभाओं में भाषण देते हुए, जिनमें मोदी भी मौजूद थे, मैंने साफ-साफ कहा कि मोदी क्या-क्या व्रत लें। उनमें तीन बातें मुख्य थीं। एक तो गरीबी-रेखा 32 रु. नहीं, 100 रु. हो। दूसरी, 16 पड़ौसी राष्ट्रों का महासंघ बनाएं। अखंड भारत नहीं, आर्यावर्त्त! बृहद् भारत। और तीसरी, हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलाएं। मोदी ने बड़ी जोर से सहमति भी व्यक्त की लेकिन 20 महीने बीत गए और हमारे मोदीजी उस दिशा में 20 कदम तो क्या, दो कदम भी आगे नहीं बढ़े। ये व्रत भी ‘जुमले’ बन गए, काले धन की वापसी की तरह! हर भारतीय को 15-15 लाख रु. तो क्या, 15 रु. भी नहीं मिले।

आज अंग्रेजी के अखबार ‘इकनामिक टाइम्स’ ने हिंदी में शीर्षक खबर छापकर बताया है कि सरकार के दफ्तरों में लगभग 100 प्रतिशत अधिकारी हिंदी जानते हैं लेकिन कई मंत्रालयों में उसका प्रयोग 10-12 प्रतिशत भी नहीं होता है। जहां थोड़ा ज्यादा होता है, वह निचली श्रेणी के कर्मचारी करते हैं। ऊंचे स्तरों पर कहीं-कहीं तो हिंदी बिल्कुल शून्य है। याने इस देश में हुकूमत किसकी चल रही है? बाबुओं की, नौकरशाहों की, अंग्रेजों के गुलामों की। प्रधानमंत्रीजी की नहीं। वे तो बस टीवी के पर्दों पर और अखबारों के पन्नों पर हैं। प्रधानमंत्री बाहर-बाहर हैं और नौकरशाह अंदर-अंदर! हिंदी है, नौकरानी और अंग्रेजी है, महारानी! इस गोरी महारानी ने मोदी को भी मोहित कर लिया है।

आप देखते नहीं क्या, कि मोदी फिल्मी सितारों की तरह ‘टेलीप्राम्पटर’ पर देख-देखकर अपने अंग्रेजी भाषण पढ़ते रहते हैं। वे भाषण देते नहीं, पढ़ते हैं, क्योंकि वे अंग्रेजी में होते हैं। इन भाषणों को लिखनेवाला नौकरशाह ऊपर और हमारे मोदीजी नीचे! ऐसे मोदीजी हिंदी को संयुक्तराष्ट्र की भाषा क्यों बनाएंगे? देश में ही हिंदी की इतनी दुर्दशा है। वे उसे राष्ट्रभाषा ही नहीं बना पा रहे हैं तो उसे वे विश्वभाषा कैसे बनाएंगे? शायद बना दें, क्योंकि उन्हें देश से ज्यादा विदेश अच्छा लगता है। इसीलिए उनके लगभग सारे अभियानों के नाम विदेशी भाषा में हैं। भाजपा और संघ के लाखों कार्यकर्ताओं की बोलती बंद है। बेचारे परेशान हैं। हिंदी की जो भी दशा हो, वे अपनी दुर्दशा क्यों करवाएं?

लेखक डा. वेदप्रताप वैदिक जाने माने वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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गांधीवादी अनुपम मिश्र की रसोई में यम-नियम हैं मांस-मछली?

अनुपम मिश्र, अहिंसावादी मोहनदास करम चंद गांधी के अनुयायी हैं. ऐसे गांधीवादी अनुपम मिश्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के अभिनंदन ग्रंथ में छपे एक चित्र के जरिए मांस-मछली को रसोई का यम-नियम घोषित कर रहे हैं… और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की 150वीं जयंती वर्ष पर प्रकाशित स्मारिका ‘आचार्य पथ’ के पहले पन्ने पर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के चित्र के स्थान पर उनकी आवक्ष प्रतिमा को मालार्पण करती सोनिया गांधी को प्रमुखता दी गयी है…

इन दोनों घटनाओँ से मेरा दिल और दिमाग विचलित हो उठा है…सोनिया गांधी जो रोमन लिपि में स्क्रिप्ट न मिलने पर आज भी हिंदी नहीं बोल पाती हैं…वो सोनिया गांधी ‘आचार्य पथ’ परिवार पर विशेष कृपा कर रही हैं…आचार्य की मूर्ति का अनावरण सोनिया गांधी से करवा कर गदगद हो रहा है ‘आचार्य पथ’ परिवार. दो साल पहले प्रकाशित स्मारिका ‘आचार्य पथ’ को दिल्ली में अब बांटा जा रहा है…इसीलिए ही तो निकृष्ट नेता-मुख्यमंत्रियों के पैरों में बुजुर्ग साहित्यकार गिर रहे हैं…पहले तो मगध में एक ही घनानंद था…आज के भारत में तो अनेक घनानंद अलग-अलग शक्ल में खड़े हैं…!!!

‘…नेता विशेष, व्यक्ति विशेष की गुलामियत से आज के साहित्यकार न जाने कब मुक्त होंगे’

अपनी पीड़ा को अपने शब्दों में व्यक्त कर रहा हूं. किसी को बुरा लगे तो लगता रहे. मेरी किसी से कोई रंजिश नहीं है. सार्वजनिक हो चुकी बातों पर मेरी प्रतिक्रिया भर है वो भी कुछ इस तरहः-

भाद्रपद शुक्ल पक्ष सप्तमी, संवत् २०७२ तदानुसार २० सितम्बर २०१५.

दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित प्रवासी भवन.

अवसर था आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को समर्पित पुनः प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ के लोकार्पण का. निमंत्रण राकेश सिंह ने दिया था.

मैनेजर पाण्डेय, अनुपम मिश्र और रामबहादुर राय जैसी हस्तियों से एक साथ, एक जगह मिलने का लोभ था.

वायरल से बदन तप रहा था और दर्द से कपाल तड़क रहा था…लेकिन हिंदी साहित्य के विद्वज्जन के बीच बैठने का लोभ प्रवासी भवन की ओर खींच रहा था. कहते हैं न कि भगवान सत्यनारायण की कथा कहने और सुनने वाले को एक समान पुण्य मिलता है. सो मैं भी कथा सुनकर पुण्य लूटने वाले और गंगाजी का दर्शन-आचमन कर स्वर्ग पाने का लोभ रखने वाले की हैसियत से प्रवासी भवन पहुँच गया. प्रवासी भवन से कुछ कदम पहले ही मेरी आकांक्षा को झटका लगा. मैंने देखा कि राकेश सिंह सामने से आ रहे हैं…!!

मैंने पूछा, क्या आयोजन पूरा हो गया ?
नहीं सर, चल रहा है- राकेश ने कहा.
तो फिर तुम कहां जा रहे हो ?
जीपीएफ में किसी से मिलना है, कुछ दस्तावेज़ लेने हैं, बस मिलकर आ रहा हूं- राकेश ने बहाना बनया.

मैं, उसके बहाने को समझ तो चुका था, लेकिन सोचा कि यह तो गंगा जी में डुबकी लगाकर अपना मकसद हल कर चुका है. मैं किनारे पहुंचकर क्यों लौट जाऊं ?

प्रवासी भवन का भूगर्भीय कक्ष खचाखच भरा हुआ था. सीढी और कक्ष के बीच की जगह में कई लोग खड़े थे. सिर पर टोपी से लेकर जूतों तक सफेद लकदक पोशाक में लहीम-सहीम इंसान आचार्य पथ के पन्ने पलट रहा था. मैनेजर पाण्डेय क्या बोल रहे हैं, समझ में नहीं आ रहा था. भीड़ में शायद किसी ने मेरी पीड़ा को भांपा और मुझे कैमरे के ठीक दांये खाली पड़ी कुर्सी लपक लेने का इशारा किया. इसी बीच एक सज्जन ने आचार्य पथ की एक प्रति भी मुझे देदी.

युग दृष्टा और युग सृष्टा के उपमानों के साथ मैनेजर पाण्डेय का सम्बोधन पूरा हुआ। अब बारी अनुपम मिश्र की थी. अनुपम मिश्र को मैं पहले भी कई ऐसे सार्वजनिक कार्यक्रमों में देख और सुन चुका हूं. लेकिन प्रवासी भवन के भूगर्भ में उनकी शैली साहित्यकार कम एक महत्वाकांक्षी राजनीतिक प्रेरक-चिंतक और आलोचक की जादा दिखी. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्मान में हो रहे आयोजन में उनकी इस शैली से मुझ जैसे लोगों को अजीब सा लगा. लगभग वैसा ही जैसे कलात्मक फिल्म की अभिनेत्री को, किसी दूसरी फिल्म में बिकनी पहने हुए देख कर लगता है.

अनुपम मिश्र ने अभिनंदन ग्रंथ में प्रकाशित दो चित्रों को आज के परिवेश से जोड़ा. एक चित्र में मछली बेचती आधे अधूरे कपड़ों में लिपटी लड़की और उससे मोलभाव में लिप्त टीका टम्बर लगाए जनेऊ पहने हुए ब्राह्मण का जिक्र किया और बोले एक वैष्णव जिसका चित्र में जनेऊ दिख रहा है… जनेऊ दिख रहा है… वो मछली खरीद रहा है…मांस-मछली हमारी रसोई में यम-नियम की तरह रही हैं…कोई उन लोगों को बताए जो मांस-मछली बेचने पर रोक लगा रहे हैं…हंगामा खडा़ कर रहे हैं…!!!

अनुपम मिश्र यह कहना चाहते थे कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के अभिनंदन पत्र में कोई चित्र छापने से अहिंसक पंथियों के पर्व पर मांस-मछली न बेचने का आग्रह करने महापाप है ? या मछली खरीदते हुए ब्राह्मण का चित्र छपने का अभिप्राय है कि महावीर प्रसाद द्विवेदी जी भी मांस-मछली भक्षण के समर्थक थे… या वो कहना चाहते हैं कि असली और उम्दा साहित्य का सृजन केवल वे साहित्यकार ही कर सकते हैं जो मांस मछली का भक्षण करते हैं. अनुपम मिश्र से इस तरह की बेतुकी तुलना की अपेक्षा नहीं थी. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के अभिनंदन ग्रंथ में छपे किसी चित्र के बजाए अनुपम मिश्र, आचार्य की कालजयी कृतियों में से किसी एक से भी प्रेरणा लेने को कहते तो अच्छा लगता. अगर वो कल्लू अल्हैत के नाम से लिखी गयी आल्हा से कोई उदाहरण निकालते तो और भी अच्छा होता. मेरा मानना है कि साठ की उम्र के बावजूद सठियाने का लाभ या अधिकार अनुपम मिश्र और उनकी श्रेणी में आने वालों को नहीं दिया जाना चाहिए.

अनुपम मिश्र का उदाहरण दिमाग में दही मथ रहा था. सो आचार्य पथ के पन्ने पलटने लगा. पहले पन्ने पर ही सोनिया माता का चित्र वो भी आचार्य महावीर प्रसाद की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते हुए…लगी ठोकर और खोपड़ा भी फूटा. सोचने लगा कि क्या किसी राजनीतिक दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष होना सबसे बड़ी काबिलीयत है…या साहित्यकारों की राजनीतिक चाटुकारिता की पराकाष्ठा है. आचार्य पथ में संदेश भी सिर्फ सोनिया माता का संदेश है… कमल किशोर गोयनका जैसे और भी लोगों के संदेश मिल सकते थे, काश! आचार्य पथ के सम्पादक और उनके सहयोगियों में राजनीतिक चाटुकारिता और गुलामी से बाहर आने की मानसिकता बनायी होती…!!

आचार्य पथ के प्रकाशकीय में तो तलुवे चाटने की सभी सीमाएं तोड़ दी गयीं. सोनिया गांधी ने आचार्य की प्रतिमा का अनावरण कर दिया तो प्रकाशक ने घोषित कर दिया कि अभियान को नई ऊर्जा मिल गयी. प्रकाशक गौरव अवस्थी क्या कभी इतना प्रकाश भी डालने की स्थिति में होंगे कि 30 नवम्बर 2010 से पहले और उसके बाद सोनिया गांधी ने हिंदी साहित्य और साहित्यकारों के लिए क्या किया है. गौरव अवस्थी सोनिया गांधी की विशेष कृपा और संरक्षण पर भी प्रकाश डालने की हिम्मत करेंगे.

जय हिंदी/जय नागरी का नारा बुलंद करने वाले आचार्य पथ के संपादक आनंद स्वरूप श्रीवास्तव मैंने से फोन पर सम्पर्क किया…क्षमा सहित उनसे पूछा कि क्या सोनिया गांधी से माल्यार्पण कराने वाले चित्र से जादा महत्वपूर्ण चित्र उपलब्ध नहीं था…या सोनिया गांधी ने आचार्य महावीर प्रसाद पर पीएचडी की है…इसलिए यह चित्र ही प्रकाशित किया जाना था…या सोनिया गांधी ने आचार्य पथ परिवार को विपुल आर्थिक सहायता की है…?

मेरे सवालों पर आचार्य पथ के संपादक आनंद स्वरूप का सिर्फ एक जवाब था- यह उनका निर्णय नहीं था. यह एक समिति और संपादक मण्डल का फैसला था…!!!

अब जरा आचार्य पथ के संपादकीय पर गौर करलीजिए. शायद इसे खुद संपादक आनंद स्वरूप ने लिखा होगा. किसी समिति या संपादक मण्डल ने नहीं. सम्पादकीय का पहला वाक्य ‘दुखद संयोग’ से शुरु होता है. अगर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जीवित होते तो वो पता नहीं सम्पादक महोदय के साथ कैसा व्यवहार करते…अब दूसरा पैरा देखिए… ‘हमने स्मारिका का दूसरा अंक निकालना चाहा तो हमारे सुप्रसिद्ध नवगीत पुरौधा, बैसवारा विभूति डा. शिव बहादुर सिंह भदौरिया हमारे बीच नहीं रहे…’ किसी ने आनंद स्वरूप से पूछा हो या न पूछा हो लेकिन हिंदी के एक पाठक के नाते मैं यह पूछने का अधिकार रखता हूं कि संपादक आनंद स्वरूप श्रीवास्तव, यह आचार्य पथ का सम्पादकीय है या आप आत्म विलापकिये हैं !!

मान लीजिए…आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का अभी ने पुनर्जन्म न हुआ हो और वो अभी यहीं-कहीं वायु-विचरण कर रहे हों तो निश्चित ही बहुत दुखी हो रहे होंगे…जिन्होंने प्रेमचंद और भारतेंदु की रचनाओं को संपादित किया हो उसके बारे में छप रही स्मारिका आचार्य पथ के संपादक और संपादकीय का यह हाल…यह पथ तो आचार्य पथ नहीं हो सकता…!!!

लेखक राजीव शर्मा प्रिंट और टीवी मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों व चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.

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बिहार की कचहरियों में देवनागरी लिपि में हिन्दी प्रयोग के लिए ‘बिहार बंधु’ अखबार को हमेशा याद किया जाएगा

वह भी क्या समय रहा होगा जब कोर्ट-कचहरियों में हिन्दी में बहस करना गुनाह माना जाता था, उन वकीलों को हेय दृष्टि से देखा जाता था। बोल-बाला था तो अंग्रेजी का। जज को ‘श्रीमान’ कहने वाले कम और ‘मी लार्ड’ कहने वाले अधिक। धोती-कुरता जैसे भारतीय परिधान धारण कर कोर्ट में उपस्थित होने वालों की संख्या कम और हाय-हल्लो कहने वाले पैंट, शर्ट, टाई और हैटधारियों की संख्या अधिक। ऐसी बात नहीं कि तब हिन्दी के प्रचार की गति मंद थी। दरअसल उस वक्त प्रचारक ही कम थे। नवजागरण और हिन्दी की यत्र-तत्र सर्वत्र मजबूती के साथ स्थापित करने का बीड़ा यदि किसी ने उठाया तो वह था बिहार का प्रथम हिन्दी पत्र ‘बिहार बन्धु’।

प्रखर राष्ट्रीय स्वर वाले बिहार बन्धु का प्रकाशन 1872-73 के बीच कोलकाता से हुआ था। उस वक्त झारखंड सहित बिहार का वर्तमान भाग बंगाल में ही शामिल था। तब कोलकाता न केवल बिहार बल्कि देश की राजधानी थी। जाहिर है सभी प्रकार की गतिविधियों की केन्द्र वह रही होगी। कचहरियों में देवनागरी लिपि में हिन्दी के प्रयोग के लिए ‘बिहार बंधु’ को सदैव याद किया जोयगा। 01 जनवरी 1881 तक उर्दू बिहार की कचहरियों की भाषा थी। जाहिर है कि सरकारी संरक्षण के अभाव में हिन्दी की प्रचार की गति मंद रही। ‘19वीं शताब्दी में पटना’ में इतिहासविद् डा0 सुरेन्द्र गोपाल ने लिखा है- उन्नीसवीं शताब्दी के उतरार्द्ध में हिन्दी के प्रचार की गति तेज हो गयी थी। इस प्रगति में दो घटनाओं ने महत्वपूर्ण योगदान किया। एक था 1874 में ‘बिहार बन्धु’ का पटना से प्रकाशन और दूसरा था सन् 1875 में इन्सपेक्टर्स ऑफ स्कूल के रूप में भूदेव मुखर्जी का शुभागमन।

‘बन्धु’ ने बिहार की कचहरियों में देवनागरी लिपि में हिन्दी को प्रतिष्ठित करने के लिए जोरदार आन्दोलन किया। ‘बन्धु’ अपने इस प्रयास में सफल हुआ और सन् 1881 में हिन्दी बिहार की कचहरियों की भाषा घोषित कर दी गयी। देश के अन्य किसी प्रांत में हिन्दी को तब तक यह स्थान नहीं मिला था। इसी प्रकार ”हिन्दी साहित्य और बिहार“ के खंड दो की भूमिका में आचार्य शिवपूजन सहाय ने लिखा है- बिहार के पुर्नजागरण में ‘बिहार बन्धु’ तथा भूदेव मुखर्जी के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। श्री मुखर्जी यद्यपि बंगाली थे परन्तु उन्होंने हिन्दी भाषा के महत्व को समझा था। कलकत्ता विश्वविद्यालय से इन्ट्रेंस में अध्ययन के विषयों में हिन्दी को उन्हीं के कठिन परिश्रम से शामिल किया गया। उस समय बिहार की शिक्षण संस्थाओं का नियंत्रण कलकत्ता विश्वविद्यालय ही करता था।  साथ ही भूदेव मुखर्जी ने हिन्दी में पाठ्य पुस्तकें तैयार करायीं और उनका प्रकाशन भी कराया। गजेटियर ऑफ बिहार के श्री एन0 कुमार के संपादकत्व में प्रकाषित पुस्तक ”जर्नलिज्म इन बिहार“ में पेज चार पर लिखा है– श्री मदनमोहन भट्ठ ने बिहारवासियों में नागरिक चेतना पैदा करने तथा बिहार की कचहरियों में देवनागरी लिपि में हिन्दी को प्रतिष्ठित करने के उद्देश्य से सन् 1872 में बिहारियों के मुख पत्र के रूप में ‘बिहार बन्धु’ का प्रकाशन किया। बिहारवासियों के हितों की रक्षा करने के साथ ही इसका मूल स्तर राष्ट्रीय रहा और देष का शायद ही कोई भाग हो जहां ‘बिहार बन्धु’ नहीं जाता हो। पत्र की निर्भीकता का द्योतक उसके शीर्ष पर छपने वाला संस्कृत का वाक्य था- ‘सत्येव नास्ति भयं क्वाचित’ और अपने इसी सिद्धान्त के मुताबिक ‘बन्धु’ विदेशी शासकों तथा अन्यायियों से बराबर लड़ता रहा, जूझता रहा।

बिहार बन्धु: 27वीं दिसम्बर, 1883, जिल्द 11 नंबर 49

”शुरू-शुरू में बिहार में हिन्दी जारी होने का कारण अगर सच और वाजिब पूछो तो बिहार बन्धु है। जिस वक्त बिहार बन्धु की पैदाइश हुई उस वक्त गोया हिन्दी नेव दी गयी। इस हिन्दी के लिए बड़ी कोशिशें हुई और बहुत कुछ करने के बाद आज दीवानी, पुलिस और कचहरियों में हिन्दी की सूरत देखने को आती है। दस बरस पहले एक सम्मन को पढ़ने के लिए देहात में लोगों को हैरान होना पड़ता था। यह वह हिन्दी है जिसके चाहने वाले और कदरदान विलायत तक हैं। हिन्दी यहां की दीवानी, माल और पुलिस की कचहरियों में पूरी तरह से जारी हो गयी और विलायत के सिविल सर्विस के इम्तिहान में रखी गयी है। तब अगर आप दूसरे ऐसी कोशिश करें कि हिन्दी को उड़ा-पड़ा दें तो किसी के लिए कुछ नहीं होने वाला है।”

लेखक ज्ञानवर्धन मिश्र बिहार के वरिष्ठ पत्रकार और “आज” के प्रभारी संपादक रहे हैं. इसके आलावा श्री मिश्र  “पाटलिपुत्र  टाइम्स” (पटना), “हिंदुस्तान” (धनबाद) एडिटोरियल हेड और “सन्मार्ग”  (रांची) के संपादक रह चुके हैं. Gyanvardhan Mishra से संपर्क gyanvardhan.mishra@rediffmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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हिन्दी वर्णमाला संग मानव श्रृंखला बनाकर ली शपथ

विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर हिन्दी वर्णमाला के साथ मानव श्रृंखला बनाते जनसंचार विभाग के विद्यार्थी।

: हिन्दी और हम विषयक परिचर्चा का आयोजन : जौनपुर। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग में हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी और हम विषयक परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा के बाद विभाग के विद्यार्थियों ने हिन्दी के उत्थान के लिए मुख्य द्वार पर हिन्दी वर्णमाला के साथ मानव श्रृंखला बनाकर शपथ ली।

परिचर्चा में छात्र अंकित जायसवाल ने इंटरनेट के माध्यम से लोकप्रिय हो रही हिन्दी पर अपनी बात रखी वहीं छात्रा शायली मौर्या ने कविता के माध्यम से कहा कि क्या करें हम अंग्रेजों से अपेक्षा, जब हम खुद ही भूल जा रहे है अपनी मातृभाषा… हिन्दी के दर्द को बयां किया। छात्र धर्मपाल यादव ने कहा कि अनुवाद के कारण हमें आज अन्य भाषा के साहित्य एवं ज्ञान हिन्दी में उपलब्ध हो पा रहा है। इसलिए दूसरी भाषा का ज्ञान बुरा नहीं है बल्कि अपनी भाषा से दूरी बुरी है। संचालन छात्र गौरव सिंह एवं धन्यवाद ज्ञापन मनीष श्रीवास्तव ने किया। परिचर्चा में विभाग के नरेंद्र गौतम, श्रेष्ठा सिंह, सौम्या श्रीवास्तव, राहुल शुक्ला, संजीव कुमार, एहसान हाशमी ने अपनी बात रखी। इस अवसर पर डा. मनोज मिश्र, डा. दिग्विजय सिंह राठौर, डा. अवध बिहारी सिंह, डा. सुनील कुमार, पंकज सिंह मौजूद रहे।

डा. मनोज मिश्र
मीडिया प्रभारी
प्रेस-विज्ञप्ति

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सुषमा और नरेंद्र मोदी के मुंह से नौकरशाहों ने ऐसी बात कहलवा दी, जो कोई महामूर्ख ही कह सकता है

भोपाल में हुए 10 वें विश्व हिंदी सम्मेलन से बहुत आशाएं थीं. विदेशों में होनेवाले विश्व हिंदी सम्मेलनों से इतनी आशा कभी नहीं रहती थी, क्योंकि सबको पता रहता है कि वे तो सैर-सपाटा सम्मेलन ही होते हैं. हिंदीवालों को विदेशों में कौन पूछता है? वे हिंदी के नाम पर मुफ्त में सैर-सपाटा कर आते हैं. लेकिन इस बार लगभग तीस साल बाद यह सम्मेलन भारत में हुआ. भारत में होने के बावजूद इसे विदेश मंत्रालय ने क्यों आयोजित किया? विदेश मंत्रालय का हिंदी से क्या लेना-देना? विदेश मंत्रालय तो अंग्रेजी की गुलामी का सबसे बड़ा गढ़ है. हमारी विदेश नीति कई बार सिर्फ अंग्रेजी के कारण ही गच्चा खा जाती है.

यदि सचमुच सुषमा स्वराज ने इसे आयोजित किया होता तो शायद वह इसे काफी बेहतर तरीके से आयोजित करतीं. वे तो स्वयं हिंदी की प्रबल समर्थक रही हैं. मुझे अब से 40-45 साल पहले वे ही हिंदी कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बनाकर ले जाया करती थीं लेकिन इस बार विदेश मंत्री होने के बावजूद मुझे लगता है कि सम्मेलन की लगाम नौकरशाहों के हाथ में चली गई. जिस सरकार को ही नौकरशाह चला रहे हैं, उसके किसी छोटे-मोटे सम्मेलन को भला वे क्यों नहीं चलाएंगे? यदि नौकरशाहों ने मुझे, नामवरसिंहजी और अशोक वाजपेयी जैसों को नहीं बुलाया तो इसमें बेचारी सुषमा क्या करे? मुझे खुशी है कि हमारे नौकरशाहों के नौकरों ने मुझे भी साहित्यकारों की श्रेणी में रख दिया है।

लेकिन सुषमा और नरेंद्र मोदी के मुंह से नौकरशाहों ने ऐसी बात कहलवा दी, जो कोई महामूर्ख ही कह सकता है. दोनों ने कह दिया कि साहित्यकारों का हिंदी से क्या लेना-देना? हमने तो सिर्फ हिंदी-सेवियों को बुलाया है. किसी भी भाषा का परम उत्कर्ष उसके साहित्य में ही होता है. साहित्य से विरत होकर कौनसी भाषा महान बनी है? इस तथ्य के विरुद्ध साहित्य और भाषा के बारे में इतनी मूर्खतापूर्ण बात कहनेवाले नेताओं को कान पकड़कर मंच से नीचे उतार दिया जाना चाहिए था लेकिन बेचारे ‘हिंदीसेवी’ या ‘नेतासेवियों’ में इतनी हिम्मत कहां?

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर इस सम्मेलन से आशा थी कि अबकी बार सचमुच यह कुछ ठोस काम करेगा लेकिन मोदी की मजबूरी है. वह हर गंभीरतम काम को भी नौटंकी में बदल देते हैं. एक बेसिरपैर का भाषण जमाकर वह चलते बने. कोई प्रेरणा नहीं, कोई संदेश नहीं, कोई नई जानकारी नहीं, कोई विश्लेषण नहीं. सिर्फ एक फूहड़ भविष्यवाणी. दुनिया में सिर्फ अंग्रेजी, चीनी और हिंदी ही बचेंगी, शेष सब भाषाएं खत्म होंगी. किसने यह पट्टी पढ़ा दी, नेताजी को? मुख्य मेजबान मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने कोई उटपटांग बात नहीं कही, यह बड़े संतोष का विषय है. इस सम्मेलन ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जड़ें खोदकर रख दी हैं. इस तीन दिन के सम्मेलन ने भाजपा और संघ जैसे राष्ट्रवादी संगठनों के इतने दुश्मन खड़े कर दिए हैं, जितने मोदी ने सवा साल में पैदा नहीं किए. साहित्यकारों और पत्रकारों का जैसा अपमान इस सरकार ने किया है, उसके नतीजे वह अब भुगतेगी.

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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आखिर कब ख़त्म होगा हिन्दी का वनवास… अनुवादकों और चुटियाछापों ने किया हिन्दी का कबाड़ा

भोपाल में हो रहा विश्व हिन्दी सम्मेलन देश के हृदयस्थल–मध्य प्रदेश, विशेषतः राजधानी भोपाल के लिए अत्यन्त गौरव का विषय है। इस आयोजन ने एक बार फिर, हिन्दी-प्रेमियों की विश्व-बिरादरी के समक्ष हिन्दी की दिशा और दशा के बारे में विचार-मंथन करने का एक और अवसर प्रदान किया है। यह आयोजन भी, पूर्ववर्ती आयोजनों की तरह, एक व्यर्थ की कवायद बन कर न रह जाये, इसके लिए ज़रूरी है कि इसमें शामिल हो रहे महानुभाव हिन्दी के सही स्वरूप, इसके समुचित विकास और इसके प्रचार-प्रसार के मार्ग में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए कुछ सार्थक और ठोस कदम उठायें।

यहाँ, यह उल्लेख अप्रासंगिक न होगा कि हिन्दी को राजभाषा बनाने के लिए सम्विधान-सभा में प्रस्तुत एक प्रस्ताव को सन 1950 में लागू किया गया था। इसमें प्रावधान था कि हिन्दी 15 वर्षों में अँगरेज़ी की जगह ले लेगी। लेकिन सम्विधान की धारा 348 में ऐसे कई हिन्दी-विरोधी संशोधन होते चले गये, जिनके कारण हिन्दी आज भी वनवास काटने को विवश है। सवाल है कि जब भगवान राम के वनवास, और पाण्डवों के अज्ञातवास की एक निश्चित अवधि थी, तो हिन्दी का वनवास कब ख़त्म होगा आखिर?

जब योग को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने के लिए 177 देशों का समर्थन आसानी से हासिल हो गया, तो हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय भाषा का सम्मान दिलाने के लिए कारगर पहल अवश्य की जानी चाहिए। लेकिन इससे पहले, हिन्दी को उसके अपने घर, यानि भारत में तो समुचित मान-सम्मान मिले! उसे राष्ट्रभाषा का सम्वैधानिक दर्जा किसी भी कीमत पर मिलना ही चाहिए। 

हिन्दी का सबसे ज़्यादा नुकसान उसे संस्कृतनिष्ठ बनाये रखने पर अड़े रहने वाले चुटियाछाप हिन्दी-प्रेमियों तथा अनुवादकों ने किया है। हिन्दी को पण्डिताऊ जकड़न से मुक्त करके उसे आमफ़हम तो बनाया जाना ही चाहिए, और तर्कसंगत तरीके से उसका शब्द-आधार भी बढ़ाया जाना चाहिए, लेकिन उसकी शुद्धता की अनदेखी भी हरगिज़ नहीं की जानी चाहिए। कोई भी भाषा, अन्य भाषाओं के बहु-प्रचलित शब्दों को खुद में समाहित करके ही जीवन्त और सामर्थ्यवान बनी रह सकती है। अगर हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाये रखने के हिमायती लोग, हिन्दी में से, अन्य भाषाओं से आये बहु-प्रचलित शब्दों को चुन-चुन कर निकाल बाहर करेंगे, तो वे उसे एक ऐसी हिन्दी बना देंगे, जिसकी सम्प्रेषण-क्षमता बहुत कमज़ोर होगी।

हिन्दी की एक बड़ी समस्या है, इसकी वर्तनियों के मानकीकरण की। हिन्दी वालों का एक वर्ग ऐसा भी है, जो अपनी भाषा-सम्बन्धी अधकचरी जानकारी को छिपाने के लिए हिन्दी को ज़्यादा से ज़्यादा सरल और आमफ़हम बनाने के नाम पर, ग़लत-सलत शब्दों को अन्धाधुन्ध थोपने पर आमादा है। जिसे ख़ुद के तनिक भी बौध्दिक होने का गुमान होता है, या जो गद्य या पद्य की दो-चार पंक्तियाँ लिखनी सीख लेता है, वही मनमानी वर्तनियाँ गढ़नी शुरू कर देता है। ऐसा कोई भी ‘ज्ञानी’ अँगरेज़ी शब्दों से छेड़छाड़ की हिमाक़त क्यों नहीं कर पाता? हिन्दी ने दूसरी भाषाओं के जिन शब्दों को बहुत अच्छी तरह से आत्मसात कर लिया है, उनके लिए नये-नये और मूल शब्द की तुलना में कहीं ज़्यादा क्लिष्ट शब्द गढ़ने की सनक क्यों?

ऐसे लोग भूल जाते हैं कि बोली एक पगडण्डी की तरह होती है और भाषा किसी राजमार्ग की तरह। पगडण्डी पर चलने वालों को बहुत-सी ‘लिबर्टी’ सहज ही मिल जाती है, जबकि राजमार्ग पर तनिक-सी लापरवाही भी जानलेवा साबित हो सकती है। काव्य में तो शब्दों के मानक स्वरूप से हटने की गुंजाइश होती है, लेकिन गद्य में हरगिज़ नहीं होती । कई ऐसे शब्द हैं, जिनकी वर्तनी में, नासमझी में की गयी मामूली-सी ग़लती भी अर्थ का अनर्थ कर डालती है। जैसे, ज़लील-जलील, कार्रवाई-कार्यवाही आदि। 

यह कितना शर्मनाक है कि हिन्दी के ऐसे सैकड़ों शब्द हैं, जिनमें से प्रत्येक के लिए अनेक वर्तनियाँ हैं। समझ में नहीं आता कि जब देश के सभी हिस्सों में अँगरेज़ी शब्दों की वर्तनियाँ एक समान हैं, भारतीय दण्ड संहिता, दण्ड-प्रक्रिया संहिता एक समान हैं, और ट्रैफिक सिग्नल एक समान हैं, तो फिर हिन्दी शब्दों की वर्तनियाँ एक समान क्यों नहीं हैं? हमारी मातृभाषा–‘हिन्दी’ की बेचारगी ‘ग़रीब की जोरू सबकी भाभी’ जैसी क्यों है? हमें यह तथ्य कभी नहीं भूलना चाहिए कि जो क़ौमें अपनी भाषा नहीं बचा पातीं, वे एक दिन दफ़्न हो जाया करती हैं। अज्ञानतावश, अनावश्यक और ग़लत शब्द गढ़ने से भाषा विकृत होती है। शब्दों और वाक्यों के बुध्दिहीन, अनावश्यक व आडम्बरपूर्ण प्रयोगों से भाषा कमज़ोर होती है। भाषा कमज़ोर होने से प्रकारान्तर में क़ौम कमज़ोर होती है, और क़ौम के कमज़ोर होने से अन्ततः देश कमज़ोर होता है। मीडिया, ख़ासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ज़्यादातर लोग आजकल यही कर रहे हैं।

हिन्दी एक अत्यन्त सम्पन्न और वैज्ञानिक भाषा है। अनुवादकों ने अपनी अज्ञानता और कूढ़मगज़ी के कारण ज़्यादातर अँगरेज़ी शब्दों के लिए अनावश्यक तथा अवैज्ञानिक शब्द गढ़ डाले, जबकि हिन्दी में पहले से ही तमाम अच्छे शब्द मौज़ूद हैं। इससे भाषा के मूल स्वरूप को चोट पहुँची और उसकी सम्प्रेषण-क्षमता कमज़ोर हुई। इसी का एक उदाहरण है—मन्त्रियों को हिन्दी में दिलायी जाने वाली पद एवम् गोपनीयता की शपथ। जिस तरह, दूल्हा-दुल्हन फेरों के समय पण्डित के श्लोकों को केवल सुनते हैं, उनका अर्थ तनिक भी नहीं समझ पाते, उसी तरह मूलतः अँगरेज़ी में लिखे गये, तथा हिन्दी में अनूदित इस शपथ-पत्र की वाक्य–रचना इतनी जटिल व दुरूह है, और इसमें प्रयुक्त शब्द इतने क्लिष्ट हैं कि शपथ लेने वाले ज़्यादातर महानुभावों को यह पता नहीं होता कि वे जिन शब्दों का उच्चारण बमुश्किल कर पा रहे हैं, उनका मतलब क्या है? अगर हम उनमें से ज़्यादातर की नीयत के खोट को नज़रन्दाज कर भी दें, तो भी सवाल उठता है कि उन्हें जिन शब्दों का अर्थ ही मालूम नहीं है, उन पर वे अमल क्या करेंगे? शपथ-पत्र की वाक्य-रचना भी अँगरेज़ी वाक्य-रचना की बेहद भद्दी नक़ल है। यानि, ‘हम माखी पै माखी मारा, हमने नहिं कछु सोच विचारा’। महान सम्पादक स्व. राजेन्द्र माथुर ने हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप, शपथ-पत्र का एक प्रारूप अपने एक आलेख में प्रस्तुत किया था, जो अत्यन्त सरल और बोधगम्य था।

बेहद अफ़सोस की बात है कि हिन्दी के विकास के नाम पर सैकड़ों करोड़ रुपये फूँके जाने के बावज़ूद हम आज तक सरकारी कामकाज के लिए एक ऐसी शब्दावली भी नहीं बना पाये हैं, जिसे सभी राज्यों में समान रूप से लागू कर सकें। ज़रा गौर कीजिए। कार्यपालिका में राज्य का सर्वोच्च अधिकारी होता है – मुख्य सचिव, और केन्द्र में कैबिनेट सचिव। इसी तरह, हर ज़िले का भी एक प्रभारी अधिकारी होता है। लेकिन, उसे कहीं कलेक्टर, कहीं डिप्टी कमिश्नर, कहीं डीएम, कहीं ज़िलाधिकारी, तो कहीं ज़िला समाहर्ता कहा जाता है। कितना अफ़सोसनाक मजाक है कि एक जैसे दायित्व वाले अधिकारियों के पाँच अलग-अलग नाम हैं! जब प्रधानमन्त्री,  मुख्यमन्त्री और अनेक बहुत से पदों के लिए एक-एक पदनाम हैं, तो अन्य पदों ने क्या बिगाड़ा है? सवाल है कि जब देश एक है, तो प्रशासनिक शब्दावली (विशेषतः हिन्दी) में एकरूपता क्यों नहीं है? ऐसे सैकड़ों प्रशासनिक शब्द हैं, जिनमें एकरूपता नहीं है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो स्थिति अत्यन्त हास्यास्पद है। ‘कलेक्टर’ तो एक उदाहरण मात्र है।

जब हम प्रशासनिक शब्दों में एकरूपता लाने की बात करते हैं तो हमें उनके लिए पहले से ही बाकायदा स्थापित अँगरेज़ी शब्दों को आधार मानकर काम करना चाहिए। जैसे, ज़्यादातर राज्यों में प्रशासन चलाने के लिए ‘डिवीज़नल कमिशनरों’ (सम्भागीय अथवा मण्डल आयुक्तों) की व्यवस्था है। और, एक मण्डल या सम्भाग में कुछ ज़िले होते हैं। इस तरह से, ज़िले के प्रभारी अधिकारी को अँगरेज़ी में ‘डिप्टी कमिशनर’ और हिन्दी में ‘उपायुक्त’ कहना ज़्यादा तार्किक है; जैसाकि दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर आदि राज्यों में है। देश की प्रशासनिक शब्दावली में फैली अराजकता एक तरह से कलंक है, और इसे ख़त्म किया जाना चाहिए।

प्रशासनिक शब्दावली के मामले में सर्वाधिक अराजकता मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में देखने को मिलेगी। इसकी एक बानगी के लिए दो–चार उदाहरण ही पर्याप्त होंगे। इन प्रदेशों में   ‘सब इंजीनिअर’ को ‘उप यन्त्री’, ‘असिस्टेंट इंजीनिअर’ को ‘सहायक यन्त्री’, ‘एग्ज़ीक्यूटिव इंजीनिअर’ को ‘कार्यपालन यन्त्री’ और ‘सुपरिंटेंडिंग इंजीनिअर’ को ‘अधीक्षण यन्त्री’ कहा जाता है। लेकिन जैसे ही वह ‘अधीक्षण यन्त्री’ तरक्की पाता है तो ‘मुख्य अभियन्ता’ बन जाता है। सवाल है कि ‘इंजीनिअर’ अचानक ‘यन्त्री’ से ‘अभियन्ता’ क्यों और कैसे बन गया? ज्ञात रहे कि ‘यन्त्री’ का तात्पर्य यन्त्रों अथवा औजारों से काम करने वाले व्यक्ति से है, जिसे अँगरेज़ी में ‘आर्टीसन’ कहा जाता है, जबकि ‘इंजीनिअर’ के लिए मानक अँगरेज़ी शब्द है – ‘अभियन्ता’। ‘इंजीनिअर’ शब्द के लिए ‘यन्त्री’ शब्द का प्रयोग पूर्णतः ग़लत है।

इसी तरह, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में ‘डाइरेक्टर’ शब्द के लिए ‘संचालक’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। ‘असिस्टेंट डाइरेक्टर’ के लिए ‘सहायक संचालक’, डिप्टी डाइरेक्टर’ के लिए ‘उप संचालक’, ‘जॉइंट डाइरेक्टर’ के लिए ‘संयुक्त संचालक’, और ‘ऐडिशनल डाइरेक्टर’ के लिए ‘अतिरिक्त संचालक’ का प्रचलन है। लेकिन, जैसे ही कोई सज्जन ‘डाइरेक्टर जनरल’ बनते हैं, वह हिन्दी में ‘महा संचालक’ की बजाय ‘महा निदेशक’ बन जाते हैं। सवाल है कि ‘महा’ जुड़ते ही ‘संचालक’ को ‘निदेशक’ क्यों कहा जाने लगा? एक ही अँगरेज़ी शब्द के लिए दो हिन्दी शब्द क्यों?

अँगरेज़ी के ‘म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन’ का मानक हिन्दी अनुवाद है – ‘नगर निगम’, लेकिन इन दोनों राज्यों में लिखा जाता है – ‘नगर पालिक निगम’। यह बात समझ से परे है कि ‘पालिक’ शब्द की ज़रूरत क्यों और कैसे पड़ गयी? हिन्दी में तो ‘पालिक’ नाम का कोई शब्द ही नहीं है। किसी लाल बुझक्कड़ ने कैसे गढ़ा होगा यह ‘पालिक’ शब्द, इसकी चर्चा फिर कभी।

इसी तरह, इन दोनों प्रदेशों में अँगरेज़ी पदनाम ‘एसडीओ’ अथवा ‘सब डिवीज़नल ऑफिसर’ के लिए हिन्दी पदनाम – ‘अनुविभागीय अधिकारी’ इस्तेमाल किया जाता है। सवाल फिर वही है कि जब इन दोनों प्रदेशों में ‘डिवीज़न’ के लिए हिन्दी शब्द ‘सम्भाग’ और ‘सब’ के लिए ‘उप’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है तो ‘सब डिवीज़नल’ के लिए ‘उप सम्भागीय’ लिखने-बोलने में क्या और कैसी दिक्कत है? मालूम होना चाहिए कि हिन्दी में ‘अनुविभागीय’ नाम का कोई शब्द ही नहीं है। दोनों प्रदेशों की प्रशासनिक शब्दावली में इसी तरह की दर्जनों विसंगतियाँ हैं, जिन्हें फ़ौरन दूर किये जाने की ज़रूरत है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में फ़ाइल ‘मँगवायी’ नहीं जाती, ‘बुलाई’ जाती है। क्या फ़ाइल कोई जीवित प्राणी है, जिसे बुलाया जाये? इसी तरह, चोर ‘पकड़े’ नहीं जाते, ‘पकड़ाये’ जाते हैं, और किसी भी वस्तु की ‘ख़रीद’ नहीं होती, ‘खरीदी’ होती है। इन सब ग़लतियों को दुरुस्त करने के लिए मेहनत करने की ज़रूरत नहीं है; मामूली-सा प्रयास ही काफी है।

हिन्दी पर क्षेत्रीयता का असर पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन यह असर एक सीमा तक ही होना चाहिए। जैसे, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के निवासियों की हिन्दी में वचन-दोष और लिंग-दोष बहुत ज़्यादा होते हैं। इसी कारण ‘रोड’, ‘कोर्ट’, ‘सम्पादकीय’ और ‘ट्रक’ जैसे पुल्लिंग शब्द स्त्रीलिंग बना दिये गये हैं। पुल्लिंग से स्त्रीलिंग, और स्त्रीलिंग से पुल्लिंग बना दिये शब्दों की संख्या सैकड़ों में है। विकट समस्या यह है कि लिंग-दोष और वचन-दोष की यह अराजक आँधी रुके तो रुके कैसे? हरियाणा और पंजाब के लोग ‘मुझे’  की जगह ‘मेरे को’ या ‘मैंने’ का प्रयोग अकसर करते हैं। इन दोनों राज्यों में हिन्दी का बड़े से बड़ा विद्वान भी यही कहता मिलेगा — ‘मैंने ये काम नहीं करना’ या ‘मेरे को ये काम नहीं करना’। ‘महाराष्ट्र के लोग अँगरेज़ी के ‘V’ को ‘व्ही’ और ‘I’ को ‘आइ’ की जगह ‘आय’ लिखते हैं। महाराष्ट्र के ‘व्ही’ और ‘आय’ की बीमारी मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी फैली हुई है। इन दिनों मीडिया में ऐसे लोगों के संख्या तेज़ी से बढ़ रही है, जो जाने-अनजाने में बोली को भाषा बनाने पर आमादा हैं। जिस प्रदेश में ऐसे लोगों की संख्या जितनी ज़्यादा होती है, उस प्रदेश में ग़लतियां भी उतनी ही ज़्यादा होती हैं।  

कुल मिलाकर देखें, तो हिन्दी की दुर्दशा करने में कोई भी पीछे नहीं है – न मीडिया, न सरकार, और न ही बड़ी ग़ैर सरकारी कम्पनियाँ। ये तीनों तमाम चीज़ों पर करोड़ों-अरबों रुपये खर्च करते हैं, लेकिन इन्हें हिन्दी की परवाह रत्ती भर भी नहीं। इनकी यह लापरवाही लेखन से जुड़े इनके रोज़मर्रा के कार्य-व्यवहार को देखकर सहज ही समझ में आ जाती है। इसका एक ताज़ातरीन उदाहरण देखिए: दसवें विश्व हिन्दी सम्मलेन के अवसर पर सभी अख़बारों में प्रकाशित एक पूरे पेज के विज्ञापन में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान के जो सन्देश दिये गये हैं, उन्हीं में भाषा की कई ग़लतियाँ हैं। जाहिर है कि न तो मोदी ने, और न ही शिवराज सिंह ने अपने ये सन्देश ख़ुद लिखे नहीं होंगे। किसी तथाकथित ‘हिन्दी-विद्वान्’ ने ही तो लिखे होंगे न। बस, यहीं से शुरू होती है हिन्दी की व्यथा–कथा।

लेखक एलएन शीतल वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों नव भारत, भोपाल में बतौर समूह संपादक कार्यरत हैं. उनसे संपर्क lnshital@rediffmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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हिंदी सम्मेलन और भोपाल के अखबारों का मोदीकरण शर्मनाक है : ओम थानवी

Om Thanvi : भोपाल पहुँच कर देखा – हवाई अड्डे से शहर तक चप्पे-चप्पे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तसवीरों वाले विशाल पोस्टर लगे हैं, खम्भों पर भी मोदीजी के पोस्टर हैं। इनकी तादाद सैकड़ों में होगी। यह विश्व हिंदी सम्मलेन हो रहा है या भाजपा का कोई अधिवेशन? अधिकांश पोस्टर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ओर से हैं – शहर में मोदीजी के स्वागत वाले। अनेक में चौहान की अपनी छवि भी अंकित है।

आयोजन की धुरी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज एक भी पोस्टर में मौजूद नहीं हैं। उनका स्वागत क्यों नहीं? दरअसल स्वागत होना चाहिए संभागी हिंदी सेवियों का, जिनमें अनेक विदेश से भी आए हैं। उनके सम्मान की इबारत ही दुर्लभ है, कम से कम अभी जो शृंखला नमूदार हुई उनमें तो। खम्भों पर तुलसी, कबीर, प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी आदि अनेकानेक विभूतियों के पोस्टर जरूर हैं, लेकिन एक भी विभूति का पोस्टर नरेंद्र मोदी के कद का नहीं है। हिंदी सम्मलेन के नाम पर हिंदी की विभूतियों का इससे बड़ा अपमान क्या होगा? मैं खुले दिमाग से सम्मलेन में आया हूँ, पर राज्य सरकार द्वारा हिंदी सम्मेलन का यह मोदीकरण शर्मनाक है।

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वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने बहुत मार्के की बात कही कि लेखकों की बात करते वक्त उनके खाने-पीने की बात करना लेखकों के प्रति संघ-भाजपा के रवैये का पता देता है। जनरल वीके सिंह की टिप्पणी के संदर्भ में उन्होंने यहाँ (भोपाल में) कहा कि लेखकों के मामले में उनका लेखन-कौशल और विचार महत्त्व रखते हैं – जैसे सैनिकों की बात करते वक्त हम उनके शौर्य और साहस की बात करते हैं, उन्हें कैंटीन से मिलने वाली रियायती शराब या छावनियों के जश्नों की नहीं। बिलकुल दुरुस्त।

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बिहार चुनाव मोदीजी के दिलो-दिमाग पर इस कदर हावी है कि हिंदी सम्मेलन की तकरीर में भी बिहार की गरीबी का जिक्र ले आए; पहली दफा किसी प्रधानमंत्री के मुंह से किसी बहाने फणीश्वर नाथ रेणु का नाम सुनने को मिला!

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“गुजरात में लोग झगड़े में हिंदी भाषा का प्रयोग करते हैं, गुजराती में तूतू-मैंमैं का वह मजा नहीं आता जो हिंदी में आता है!” – हिंदी सम्मलेन में प्रधानमंत्री के श्रीमुख से टीवी पर आपने भी सुना, हमने भी!

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भोपाल के अखबार (दिल्ली के मालूम नहीं) भी शिवराज सिंह चौहान ने मोदी-स्तुति से भर दिए हैं – और तो और, हिंदी की रेलमपेल के बीच ओआरओपी की मांग पूरी करने के लिए भी धन्यवाद मढ़वा दिया है: “वादा पूरा, सम्मान पूरा”! व्यापम की दाढ़ी का तिनका बहुत बाहर तक निकला दिखाई दे रहा है, शिवराजजी!

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टीवी पर देखा शिवराज सिंह ने वाकई मजा कर दिया, बोले – एक महात्मा गांधी हिंदी के लिए गुजरात से मध्य प्रदेश आए थे, दूसरे नरेंद्र मोदी हिंदी के लिए यहाँ आए हैं हैं, वे भी गुजरात से हैं … गुजरात से मध्य प्रदेश का गहरा संबंध है!

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.


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परम आदरणीय जनरल वीके सिंहजी, आप आचमनकर्ता हिन्दी प्रेमियों को आखिर बुलाते ही क्यों हैं?

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परम आदरणीय जनरल वीके सिंहजी, आप आचमनकर्ता हिन्दी प्रेमियों को आखिर बुलाते ही क्यों हैं?

Vineet Kumar : नवरात्र के दौरान विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित करवाने के संदर्भ में;

परम आदरणीय जनरल वी.के.सिंहजी
जय हिन्दी
जय भारत

विदेश राज्यमंत्री जनरल वी.के.सिंह साहब, आपने दुरुस्त ही फरमाया है कि विश्व हिन्दी सम्मेलन में लोग शराब पीने जाते हैं. हजूर, राष्ट्र और सरकार का अपमान न हो तो बस इतना कहना चाहूंगा कि आप आचमनकर्ता हिन्दी प्रेमियों (जो आपके हिसाब से शराबी लेखक हैं) को आखिर बुलाते ही क्यों हैं? जब मेरे पास दर्जनभर से ज्यादा ऐसे लेखकों की सूची है जो शराब क्या, बोतल की ठेंपी तक को हाथ नहीं लगाते तो आपके पास तो खतियान होगी जिसमे लेखक के पूर्वजों के भी ट्रैक रिकार्ड होंगे..उन्हें ही बुलाएं.

नैतिक-अनैतिक, सहमति-असहमति की बहस में पड़े बिना हजूर, एक राय और देना चाहूंगा..आपलोग विश्व हिन्दी सम्मेलन नवरात्र में आखिर क्यों नहीं करवाते? मेरा आत्मविश्वास कहता है कि मातारानी के प्रकोप से शराब तो शराब, प्याज-लहसन तक हाथ नहीं लगाएगा और गर सिकुलर टाइप के लेखक ने लगा भी दिया तो उन्हें हिन्दीद्रोही करार देना कौन सी मुश्किल बात है..आपने इधर हिन्दीद्रोही घोषित किया नहीं कि फेसबुक पर हिन्दीप्रेमी उन्हें अपने आप राष्ट्रदोही घोषित कर देंगे…और वैसे भी हिन्दी में मुसलमान, इसाई या दूसरे धर्म-संप्रदाय के लोग हैं ही कितने की उनकी अतिरिक्त चिंता या व्यवस्था की जाए.

हजूर, एक बात और..आपने तो सिर्फ मदिरापान का जिक्र किया..कुछ लोग तो राष्ट्रीय संस्कृति एवं परंपरा को ढाहने का काम करते आए हैं. ऐसे-ऐसे हिन्दीप्रेमी विश्व हिन्दी सम्मेलन में बुलाए जाते रहे हैं जो कि जोहन्सबर्ग जाकर हिन्दी परिचर्चा के बजाय शेर-शेरनी के संभोग की तस्वीर खैंचकर फेसबुक पर परोसते रहे. अब आप ही बताइए, हमारी संस्कृति तो इतनी उदार और पर्दानशीं रही है कि सांप-सांपिन को भी तालकि-भेलकि करते दिख जाए तो टोकरी ढंक देते हैं. ऐसे में वन्य-प्राणियों की निजता का हनन कहां तक उचित है ?..और क्या उनकी आंखें वन्य-प्राणियों की निजी पलों के अवलोकन तक सीमित रह जाती होंगी ?

मुझमे तो इतना नैतिक साहस नहीं है कि ये सवाल करुं कि आखिर हिन्दी लेखकों की ऐसी हालत करी किसने है कि शराब के लिए विश्व हिन्दी सम्मेलन का इंतजार करना पड़ता है. क्या पता ऐसी हालत में होते कि कभी भी इच्छानुसार घर बैठकर पी पाते तो आपको ऐसी टिप्पणी करके हिन्दी लेखकों का सामूहिक सम्मान करने की नौबत न आती..वैसे जो घर बैठकर पीते हैं, उन्हें लो प्रोफाइल का माना जाता है लेकिन हिन्दी लेखक के तो पब्लिक प्लेस में पीकर भी प्रोफाइल के परखच्चे उड़ गए.

हजुर, हमारे कुछ हिन्दीसेवी मित्र विश्व हिन्दी सम्मेलन जाने से वंचित रह जाते हैं, वो मलेटरी के अपने दोस्तों की मदद से कैंटीन की राह लेते हैं. देश की सेना जिस भारतमाता की रक्षा करती है, वही सेना हम हिन्दीसेवी मित्रों की इस तलब का संरक्षण करती है..हम आपकी इस समझ और क्षमता के आगे नतमस्तक हूं हजूर कि लोककथाओं की तरह प्रचलित ये बात कि सेना में शरीर में गर्मी पैदा करने के लिए शराब दी जाती है लेकिन आपने नैतिक आग्रह के आगे शरीर की जरुरत को नजरअंदाज किया. हिन्दीसेवी इसमे फिसल गए. वावजूद इसके इनकी इस चूक को वैष्णव की फिसलन मानकर इस सिरे से विचार नहीं किया जा सकता कि मदिरा सेवन की बात को शामिल करके दरअसल हिन्दीसेवियों को हजूर की तरफ से बौना करने का काम किया गया है. हम जैसे कीबोर्डिए हजूर की इस प्रतिभा के शुरु से कायल रहे हैं कि प्रतीक-बिंब विधान योजना में प्रयोगवादी कवियों को भी बाजरे की जूस पिला देते हैं. जूट पत्रकारिता के मुहावरे से आगे प्रेसटीट्यूट रुपक गढ़ लाते हैं.

लेकिन रुपक और बिंब विधान ही प्रतिभा है तो मदिरा के सवाल को पीछे नहीं किया जा सकता..फिर भी आपको लगे तो..

हजूर, अब आखिरी बात. आप जिन हिन्दीसेवियों को विश्व हिन्दी सम्मेलन में बुलाते हैं, उनके साहित्यिक योगदान पर गौर करने( वैसे भी गौर किया कब गया है) से पहले कडकडडूमा, तीस हजारी या ऐसे ही किसी कोर्ट से एफिडेविड बनवाकर लाना अनिवार्य कर दिया जाए जिसमे ये स्पष्ट लिखा हो कि फलां लेखक शराब पीता क्या, छूता तक नहीं है.. रचना करते वक्त भी इसने कभी मदिरा को हाथ तक नहीं लगाया. इनकी लाइब्रेरी में मधुशाला की प्रति या हालावाद पर कोई पुस्तक नहीं है. उसके बाद साहित्य अकादमी एनओसी जारी करे, वही यहां जाने योग्य माना जाए.

इतनी दलील बस इसलिए हजूर कि हम इस योग्यता के रहते भी वंचित रह गए, हमे बुलाइए, हम बस चखना के दम पर सम्मेलन की शोभा बढ़ाएंगे, राष्ट्र निर्माण के सपने को शिरकत करके चमका देंगे.

आपका
चखनालंबी हिन्दी सेवी
विनीत कुमार

इन्द्रप्रस्थ
09.09.2015

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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हिन्दी के आयोजनों को चश्मा उतार कर देखें

मध्य प्रदेश भारत का ह्दयप्रदेश है और हिन्दी के एक बड़ी पट्टी वाले प्रदेश के रूप में हमारी पहचान है। हिन्दी हमारे प्रदेश की पहचान है और लगातार निर्विकार भाव से हिन्दी में कार्य व्यवहार की गूंज का ही परिणाम है कि चालीस साल बाद हिन्दी के विश्वस्तरीय आयोजन को लेकर जब भारत का चयन किया गया तो इस आयोजन के लिए मध्यप्रदेश को दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन की मेजबानी सौंपी गई। गंगा-जमुनी संस्कृति वाले भोपाल में हिन्दी का यह आयोजन न केवल भोपाल के लिए अपितु समूचे हिन्दी समाज के लिए गौरव की बात है।

भोपाल में हो रहा यह आयोजन हिन्दी को विश्व मंच पर स्थापित करने में मील का पत्थर साबित होगा, यह हिन्दी समाज का विश्वास है। मध्यप्रदेश, देश का ह्दयप्रदेश होने के नाते बहुभाषी और विविध संस्कृति वाला प्रदेश है। विभिन्न भाषा-बोली के लोग मध्यप्रदेश में निवास करते हैं किन्तु इन सबकी सम्पर्क भाषा हिन्दी है। अहिन्दी प्रदेशों से यहां रोजगार के लिए आने वाले लोग भी हिन्दी सीख कर गौरव का अनुभव करते हैं। यह छोटा सा तथ्य इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजन के लिए सर्वथा उपयुक्त निर्णय है।

बहुतेरे ऐसे लोग भी हैं जिनके मन में इस बात की शंका है कि आखिरकार इस आयोजन का परिणाम क्या होगा या इनमें से कुछ इस संदेह से घिरे हुए हैं कि ऐसे आयोजनों का परिणाम शून्य होता है। ऐसे लोगों की शंका और संदेह बेबुनियाद है क्योंकि प्रयास का दूसरा पहुल संभावना होती है। विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया जाना एक प्रयास है और हिन्दी का भविष्य इसकी संभावना है। 1975 में पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन नागपुर में हुआ था। इसके बाद यह चौथा अवसर है जब हिन्दी का विश्व समागम भोपाल में होने जा रहा है। हिन्दी को विश्व मंच पर स्थापित करने की इस कोशिश का परिणाम आप जब दुनिया के नक्शे में देखेंगे तो सहज ही अनुमान हो जाएगा कि ऐसे आयोजन परिणाम शून्य होने के बजाय परिणाममूलक रहे हैं। दुनिया के अधिसंख्य विश्वविद्यालयों में हिन्दी का विशेष रूप से पठन-पाठन हो रहा है। विश्व के 150 से 180 देशों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी की उपस्थिति इसका प्रमाण है। अमेरिका के राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा स्वयं कहते हैं कि-‘हिन्दी विश्व की भाषा बनने जा रही है और हिन्दी को जानना सबके लिए आवश्यक है।’ क्या यह तथ्य हिन्दी के विश्व आयोजनों को सार्थकता प्रदान नहीं करता है?

वास्तव में भारतीय समाज के लिए हिन्दी मात्र एक भाषा नहीं है। हिन्दी भारतीय समाज की अस्मिता है, उसकी पहचान है। हिन्दी हमारी धडक़न है। हिन्दी अपने जन्म से लेकर हमारे साथ चल रही है, पल रही है और बढ़ रही है। ऐसे में हिन्दी को लेकर जो चिंता व्यक्त की जाती रही है, वह कई बार बेमानी सी लगती है क्योंकि जिस भाषा में भारत के करोड़ों लोगों का जीवन निहित है, जिस भाषा से उनकी पहचान है, उस भाषा को लेकर चिंता महज एक दिखावा है। इस संबंध में भूतपूर्व सांसद एवं सुविख्यात कवि श्री बालकवि बैरागी लिखते हैं कि-‘गैर हिन्दी भाषी लोग जैसी हिन्दी लिख या बोल रहे हैं, उन्हें वैसा करने दो। उनका उपहास मत करो। उन्हें प्रोत्साहित करो। अपने हकलाते तुतलाते बच्चों के प्रति जो ममत्व और वात्सल्य आप में उमड़ता है, उस भाव से उनकी बलाइयां लो। यह भाव हमारे अभियान के आधार में रहे। यह हिन्दी की शास्त्रीयता और शुद्धता का समय नहीं है। वह जैसा रूपाकार ले रही है, लेने दो।’

पिछले दो-तीन दशकों की विवेचना करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि हिन्दी घर-घर की भाषा बन गई। विश्व बाजार की नजर भारत के बड़े हिन्दी समाज पर है। मुठ्ठी भर अंग्रेजी के  मोहपाश में बंधे समाज से बाहर निकल कर हिन्दी समाज की भाषा-बोली में आना भारतीय बाजार की विवशता है। देश में प्रकाशनों की बात करें तो अनेक बड़े प्रकाशनों को हिन्दी की धरती पर आना पड़ा है। अंग्रेजी के संस्करणों का उन्होंने त्याग कर दिया है अथवा हिन्दी के साथ-साथ अंगे्रजी के प्रकाशन के लिए मजबूर हैं। इस मजबूरी में खास बात यह है कि कल तक हिन्दी का प्रकाशन अनुदित सामग्री पर निर्भर था किन्तु आज हिन्दी में मौलिक सामग्री का प्रकाशन हो रहा है। यहां तक कि हिन्दी की पठनीय सामग्री को अनुवाद कर अंग्रेजी में प्रकाशित किया जा रहा है। क्या इस तथ्य को भी नजरअंदाज कर दें? शायद ऐसा करना संभव नहीं होगा।

मध्यप्रदेश की धरा अपने हिन्दी सेवकों से गौरवांवित होती रही है। हिन्दी सेवकों की यह श्रृंखला विशाल है। पराधीन भारत से लेकर वर्तमान समय तक, हर कालखंड में हिन्दी के गुणी सेवकों ने मध्यप्रदेश का गौरव बढ़ाया है। हिन्दी का यह गौरव बहुमुखी है। हिन्दी केवल अध्ययन, अध्यापन तक नहीं है और न ही साहित्य रचनाकर्म तक अपनी सीमारेखा खींच रखी है अपितु संगीत, कला, रंगमंच, सिनेमा और लोकजीवन में भी हिन्दी का विशिष्ट प्रभाव देखने को मिलता है। इस संबंध में सुविख्यात आलोचक डॉ. विजयबहादुर सिंह कहते हैं-‘ हिन्दी भी एक बड़े राष्ट्रीय जीवन की, एक अति प्राचीन देश की, बहुमान्य, बहुजन-संवेदी भाषा है। विश्व कोई एकल भाषा परिवार तो है नहीं। फिर हिन्दी और वृहत्तर अर्थों में हिन्दुस्तानी एक देश और समाज से मुक्ति संघर्ष, आत्माभिमान, परम्परा संवेदी, रूढि़-प्रतिरोधी, स्वातंत्र्यकामी चेतना की भाषा है। वह हमारे यथार्थ जीवन की, जमीन की बोलचाल तो है ही, हमारे सपनों की भी भाषा है।’

इस तरह यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हिन्दी के इस विश्व आयोजन को चश्मा लगाकर देखने के बजाय खुले और बड़े मन से देखे जाने की जरूरत है क्योंकि हिन्दी खुले मन की भाषा है। हिन्दी हमारी अस्मिता है, हमारी पहचान है। आलोचना करने के लिए बेबुनियाद आलोचना करने वालों से श्री बैरागी कहते हैं-‘खीजने, झल्लाने या किसी को कोसने से हम हिन्दी के निश्च्छल चरित्र को कोई नया आयाम नहीं दे पाएंगे। हम खुद पहले हिन्दी के हो जाएं और हिन्दी में हो जाएं। हिन्दी में सोचें और हिन्दी पर अवश्य सोचें। हिन्दी के संदर्भ में यह युग और यह शताब्दी चिंता की नहीं है। यह हमारी चेतना का युग है। आत्म मंथन और पूर्ण समर्पण का युग है। आपके हमारे बच्चे आज जिन खिलौने से खेल रहे हैं उनमें हिन्दी है या नहीं, इस पर नजर रखिए। जिस भ्रम को आप पाल रहे हैं, उसमें कहीं ऐसा तो नहीं है कि आप और हम अंतर्राष्ट्रीय बनने की जुगाड़ में राष्ट्रीय भी नहीं रहें। राष्ट्रीयता हमारी भाषा है और यही हमारा भारत है।’ अस्तु, भोपाल मेंं हो रहे दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन, हिन्दी को विश्व मंच पर स्थापित करने में मील का पत्थर साबित होगा, यह निश्चय है।

लेखक मनोज कुमार भोपाल से प्रकाशित मासिक शोध पत्रिका “समागम” के संपादक है. संपर्क: 09300469918

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आईएएनएस हिंदी को चाहिए उपसंपादक

दिल्ली : IANS को एक उपसंपादक की आवश्यकता है। प्रेषित विज्ञप्तिन में बताया गया है कि आवेदन भेजते समय कवर लेटर में अपनी रुचि के विषय मसलन, राजनीति, खेल, वाणिज्य, विज्ञान, स्वास्थ्य, मनोरंजन, अंतर्राष्ट्रीय मामले आदि का उल्लेख अवश्य करें। वर्तमान सीटीसी एवं अपेक्षित सीटीसी अवश्य लिखें।  

खेल, वाणिज्य, विज्ञान-स्वास्थ्य-प्रौद्योगिकी एवं अंतर्राष्ट्रीय मामलों में रुचि रखने वालों को प्राथमिकता दी जाएगी। चुने गए अभ्यर्थियों को लिखित टेस्ट के लिए आमंत्रित किया जाएगा। केवल चयनित आवेदकों को ही ईमेल से सूचना दी जाएगी। 

अनिवार्य योग्यता–अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद में दक्षता। हिंदी टाइपिंग स्पीड- कम से कम 50 शब्द प्रति मिनट। 

 बायोडाटा hindiservice@gmail.com पर 27 जुलाई 2015 तक ईमेल मेल करें। 

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बदल रही है हिन्दी की दुनिया

हिन्दी और पत्रकारों के बीच लोकप्रिय साइट भड़ास4मीडिया (Bhadas4Media) पर ‘जिन्दगी’ का विज्ञापन अमैजन की ओर से। हिन्दी के दिन बदलेंगे? सरकारी खरीद के भरोसे रहने वाले हिन्दी के प्रकाशकों ने हिन्दी के लेखकों को खूब छकाया है। किताबें बिकती नहीं हैं, खरीदार कहां हैं – का रोना रोने वाले प्रकाशकों के रहते हुए मुमकिन है कि हिन्दी के लेखक भविष्य में खुद ही प्रकाशक भी बन जाएं। या लेखक और रचना को पहचानने वाले नए प्रकाशक सामने आएं और लेखक पाठकों तक आसानी से पहुंच सकें। भड़ास4मीडिया चलाने वाले यशवंत सिंह नेट पर लिखकर पैसा कमाने के तरीके बताने के लिए अलग आयोजन कर चुके हैं और चाहते हैं कि हिन्दी वाले कुछ अलग और नया करें। आत्म निर्भर हों। इसपर फिर कभी। 

हालांकि, हिन्दी की दुनिया नेट पर भी अजीब है। कल मैंने ‘काशी का अस्सी’ खरीदने के लिए वेबसाइट टटोलना शुरू किया तो हिन्दी वाले (प्रकाशक आदि) इसे 250 रुपए से लेकर 13 अमेरिकी डॉलर तक में बेच रहे थे पर आखिरकार मुझे फ्लिपकार्ट पर सिर्फ 98 रुपए में मिल गया। इससे लग रहा है कि हिन्दी के लेखक और पाठक दोनों के अच्छे दिन आने वाले हैं। पाठक को 98 रुपए में 250 रुपए की किताब मिली और लेखक को 98 रुपए पर ही सही, रायल्टी तो मिलेगी! ‘जिन्दगी’ के बारे में जो लोग नहीं जानते उन्हें बता दूं, यह पत्रकार और मित्र संजय सिन्हा की तीसरी पुस्तक है। पहली पुस्तक 6.1 रिक्टर स्केल एक विदेशी प्रकाशक लिट्रेट वर्ल्ड ने छापी थी जो बाद में बंद हो गई। इस तरह, यह लिट्रेट वर्ल्ड की पहली और आखिरी पुस्तक रही। तमाम कारणों, प्रेरणाओं या मजबूरियों के बाद संजय सिन्हा ने नवंबर 2013 में फेसबुक पर नियमित लिखना शुरू किया और ‘रिश्तों’ पर रोज कुछ ना कुछ लिख रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने इमरजेंसी की याद पर भी कई दिनों तक लिखा। 

फेसबुक पर लिखे उनके इन्ही विचारों, कहानियों का संकलन पहले ‘रिश्ते’ और अब ‘जिन्दगी’ (प्रभात प्रकाशन) के नाम से आया है। ‘रिश्ते’ को इस साल का सुप्रतिष्ठित सावित्र त्रिपाठी स्मृति सम्मान मिला है। और जैसा कि चयन समिति के अध्यक्ष और अग्रणी साहित्यकार, प्रो काशीनाथ सिंह ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा, “सावित्री त्रिपाठी स्मृति सम्मान के लिए संजय सिन्हा की पुस्तक ‘रिश्ते’ को चुनने से पहले उन्हें कई बार सोचना पड़ा, क्योंकि ‘रिश्ते’ परंपरागत तरीके से लिखा कोई उपन्यास, कोई कथा या कोई कहानी नहीं है। न तो वो डायरी का कोई अंश है, न यादों का कोई संग्रह। पर जो है, शानदार है और उसे पढ़ कर, उन्हें और पूरी चयन समिति को लगा कि इसबार कुछ ‘अलग’ को चुनने का साहस किया जाए। और बस चुन लिया गया ‘रिश्ते’ को।” जबकि पुरानी स्थितियों में या शर्तों के आधार पर यह पुस्तक प्रकाशित ही नहीं होती (क्योंकि सरकारी खरीद के दायरे में नहीं आती है) और जहां तक अपनी कृति के बारे में लेखक के विचार का सवाल है, संजय सिन्हा ने कहा कि ये किताब मैंने नहीं लिखी है, न ये किताब मेरी है। ये किताब मेरे फेसबुक परिजनों की है। इसलिए इस सम्मान के हकदार आप सभी (फेसबुक के पाठक जिन्हें वह परिजन कहता है) हैं। 

हिन्दी में लेखक और प्रकाशक का संबंध ऐसा है कि एक मशहूर प्रकाशक जो मुझे पिछले 20 साल से ज्यादा समय से जानते हैं, से मैंने पूछा कि मैंने एक किताब लिखी है आप देखना चाहेंगे। उन्होंने कहा अभी नहीं। कब तक? छह महीने बाद। वो छह महीने निकले कई महीने हो गए। उन्होंने तो नहीं ही पूछा – अपना भी मिजाज ऐसा नहीं है कि मैं उन्हें फिर फोन करूं।

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शीघ्र आ रहा लोकप्रिय हिंदी पत्रिका ‘पहल’ का सेंचुरी अंक

हिंदी जगत की अनिवार्य पत्रिका के रूप में मान्‍य ‘पहल’ का 100वां अंक शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रहा है। जबलपुर जैसे मध्‍यम शहर से पहल जैसी अंतरराष्‍ट्रीय पत्रिका का प्रकाशन वर्ष 1973 में शुरू हुआ और इसने विश्‍व स्‍तर को प्राप्‍त किया। ‘पहल’ के जरिए इसके संपादक ज्ञानरंजन ने लगातार जड़ता तोड़ने के काम किया। इसलिए पिछले 42 वर्षों से ‘पहल’ गंभीर लेखन व विचारों से जुड़ी पत्रिकाओं के बीच शीर्ष स्‍थान पर है और नए संपादकों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाती जा रही है। 

‘पहल’ का घोषित उद्देश्‍य है-भारतीय उपमहाद्वीप के वैज्ञानिक विकास के लिए प्रगतिशील रचनाओं को स्‍थान देना। पहल के 42 वर्ष के प्रकाशनकाल में दो बार इसका प्रकाशन बाधित हुआ है। पहला दौर आपातकाल का दौर था जिसमें हर तरह की स्वतंत्र सोच और अभिव्यक्ति पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था।  किन्तु उस दौर में भी ‘पहल’ का प्रकाशन सिर्फ अनियमित हुआ था, बंद नहीं हुआ था। दूसरा दौर हाल फिलहाल का है जब लगभग पांच वर्ष पूर्व अचानक आई इसके बंद होने की खबर से समूचे साहित्य जगत में एक तरह का सन्नाटा पसर गया। पाठकों में मायूसी छा गई।

हिंदी साहित्‍य के आठवें दशक के जितने भी महत्‍वपूर्ण लेखक हैं, वे पहल के गलियारे से ही आए हैं। इनमें राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, वीरेन्‍द्र डंगवाल, लीलाधरजगूड़ी, ज्ञानेन्‍द्रपति, आलोक धन्‍वा जैसे साहित्‍यकार महत्‍वपूर्ण हैं। रचनाओं के अलावा आलोचना के क्षेत्र में भी अनेक नए नाम पहले पहल ‘पहल’ से ही उभरे। ज्ञानरंजन ने अपने मनपसंद और विचारधारा पसंद लेखें व कृतियों पर अनेक युवा आलोचकों को गंभीरता, विशद अध्‍ययन और जिम्‍मेदारी से लिखने के लिए प्रेरित किया। चार दशक से अधिक के सफर में पहल में हिंदी, भारतीय भाषाओं और विश्‍व साहित्‍य के लगभग 50 हजार से अधिक पृष्‍ठ प्रकाशित हुए हैं। 

जर्मन,रूसी, चीनी, अंग्रेजी, फ्रेंच, और स्‍पेनिश भाषाओं का श्रेष्‍ठतम साहित्‍य पहल में ही उपलब्‍ध है। पहल के फासिज्म विरोधी अंक, मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र : वाल्टर बेंजामिन, समकालीन कवितांक, पाकिस्तान में उर्दू कलम, कहानी अंक, चीन का समकालीन साहित्य, बांग्लादेश के व अफ़्रीकी साहित्य पर केन्द्रित अंक इतिहास अंक, पंजाबी, मराठी, उर्दू, कश्‍मीरी साहित्‍य के प्रतिनिधि विशेषांक साहित्‍य प्रेमियों को आज तक याद हैं और लोग इन्‍हें आज भी खोजते हैं। शीर्ष आलोचक रामविलास शर्मा से ले कर आज की बिल्‍कुल युवा पीढ़ी का कोई भी ऐसा महत्‍वपूर्ण लेखक या कवि नहीं है, जो पहल में नहीं छपा। इसका प्रसार देश-देशांतर तक है। पूरे देश में पहल से एक बड़ा परिवार बन गया है। जर्मनी के  तियुबिनजेन विश्वविद्यालय ने पहल को डिजीटाइज किया है। पहल डिजीटाइज होने वाली हिंदी की पहली साहित्यिक पत्रिका है।

पंकज स्वामी से संपर्क : 9425188742

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हिंदी न्यूज चैनलों की दुर्गति देख शर्म या हंसी नहीं, गुस्सा आता है

बुरा मत मानिएगा लेकिन भारत में हिन्दी न्यूज चैनलों की दुर्गति देखकर शर्म या हंसी नहीं आती, अब गुस्सा आता है. लगता है कि -पत्रकार- का पत्र कहीं दूर छूट गया है, सिर्फ -कार- ही बची है. कोई चैनल बेशर्मी से भारत में गर्मी के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहरता है (कम पढ़े-लिखे लोगों के मन में पाकिस्तान के खिलाफ भावनाएं भड़काने के लिए वे भड़काऊ हेडिंग चलाते हैं) तो किसी चैनल का मालिक मोदी सरकार के एक साल पूरे होने के कार्यक्रम में अपने एडिटर-इन-चीफ के साथ खुद मंच पर विराजमान हो जाता है, भाषण देता है और फिर मंच पर विराजमान केंद्रीय मंत्रियों से गुफ्तगू के लिए लालायित अपने सम्पादक से मंच से ही कहता है कि (पढ़िए हड़काता है) –आप सरकार को नम्बर देते रहिए, लेकिन ख्याल रखिएगा. मैं मानता हूं कि एक साल का समय काफी नहीं होता किसी सरकार के काम को आंकने के लिए. और चैनल का सम्पादक “सर-सर” कहता हुआ चैनल मालिक की सार्वजनिक जी-हुजूरी करता रहता है.

एक हिन्दी का विश्वसनीय-गंभीर चैनल है, लेकिन वह घोर कांग्रेसी बन गया है. यानी बात-बात में मोदी सरकार के कामकाज पर बाल की खाल निकालता है. इस चैनल की नजर में मोदी सरकार का हर काम नौटंकी है लेकिन कांग्रेस राज में यही चैनल उस तरीके से कांग्रेसी मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा नहीं करता था, जैसा अब कर रहा है.

एक और चैनल है, जो लगता है कि मोदी सरकार का मुखपत्र बन गया है. जब देखो, मोदी वंदना. इस चैनल की चले तो वह घोषित कर दे कि नरेंद्र मोदी, अकबर-अशोक-सिकंदर से भी महान चक्रवर्ती पीएम हैं. दूसरी ओर एक चैनल के मालिक सह सम्पादक जब प्राइम टाइम में अपना शो लेकर आते हैं तो खबर देने के साथ-साथ व्यू भी देते हैं. पब्लिक को बताते हैं कि खबर के पीछे की खबर क्या है यानी एक तरह से एडिटोरियल टाइप का वक्तव्य देते हैं. और जाहिर है कि उनका व्यू मोदी सरकार के पक्ष में होता है. देश में विपक्ष की सारी कवायद और सारे स्वर उनकी नजर में नौटंकी है. हांलांकि स्क्रीन पर वे बहुत ही निष्पक्ष पत्रकार बनने की कोशिश करते हैं लेकिन उनकी खबरों के एंगल और उनके प्रवचन से पब्लिक ताड़ ही जाती है कि भाई साहब कर क्या रहे हैं.

हिन्दी न्यूज चैनलों की कूपमंडूकता और छिछलापन तब और स्पष्ट होकर उभरा, जब रामदेव के पुत्रबीजक नामक दवा पर छिड़े विवाद पे सब भूखे भेड़ियों की तरह पिल पड़े. रात को प्राइम टाइम पर हर हिन्दी न्यूज चैनल बाबा रामदेव और दवा पर संसद में सवाल उठाने वाले केसी त्यागी को लाइव स्क्रीन पर भिड़ाने में जुट गए. एक चैनल के तो मैनेजिंग एडिटर ही एंकर बनकर इस -मुर्गा लड़ाई- का आनंद लेते दिखे. पूरी बहस में मु्द्दे की बात कुछ नहीं थी, बस तमाशा था.

इसी तरह एक बड़े दूसरे चैनल की -तेजतर्रार- महिला एंकर जब रामदेव और त्यागी की -मुर्गालड़ाई- में स्क्रीन पर दिखीं तो कोशिश करने लगीं कि रामदेव स्क्रीन पर ही लाइव ये घोषणा कर दें कि वे अपनी दवा का नाम बदलेंगे. एंकर बड़े जोशोखरोश के साथ रामदेव से बालहठ करने लगीं कि दवा का नाम बदलिए ना ! और तब तंग आकर रामदेव ने कहा कि ठीक है, हम विचार करेंगे. रामदेव का इतना कहना था कि चैनल ब्रेकिंग पर ब्रेकिंग ठोंकने लगा कि रामदेव अपनी दवा का नाम बदलेंगे !

जब देश में पुत्रबीजक औषधि को लेकर हाहाकार मचा हो, संसद में चर्चा और बहस हो रही हो तो सेठजी का चैनल कैसे पीछे रहता. हालांकि रामदेव और त्यागी इनके हाथ देर से लगे लेकिन इस चैनल का एंकर और मैनेजिंग एडिटर भी बड़ी बेशर्मी से इस -मुर्गालड़ाई- का अम्पायर बनकर प्रकट हुआ. बेशर्मी इन लोगों ने अभी तक घोलकर पी नहीं थी, सो चैनल के वॉटम बैंड पर त्वरित फ्लैश चलने लगा–एक्सक्लूसिव. यानी रामदेव और त्यागी की जिस बहस को शाम से दर्शक हर दूसरे चैनल पर देख-देखकर बाल नोच रहे थे. हिमान नवरत्न वाला ठंडा-ठंडा तेल लगाने को बाध्य हो गए थे, उन्ही दोनों की बहस को ये साहब अपने चैनल पर एक्सक्लूसिव बता रहे थे.

कहने का मतलब ये है कि देश के हिंदी न्यूज चैनलों में घोर अराजकता का माहौल है. सब कुछ भेड़ियाधंसान है, भेड़चाल है. पता नहीं क्यों, हर चैनल का सम्पादक हिन्दी के दर्शक को इतना मूर्ख और पिछड़ा क्यों समझता है? न्यूज के नाम पर तमाशा तो है ही, हर चैनल ने केंद्र सरकार के पक्ष में या विपक्ष में अपनी लाइन तय कर दी है. और ये लाइन स्क्रीन पर साफ दिखती है. हर चैनल पर उसके मालिक के हितों की छाया स्पष्ट रूप से झलकती है.

यह अभूतपूर्व है. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. हिन्दी टीवी न्यूज का मीडिया स्पष्ट रूप से दो धड़ों में बंट गया है. एक बीजेपी के साथ है और दूसरा बीजेपी के खिलाफ यानी विपक्ष के साथ. एकाध चैनल हैं जो दोनों नाव पर सवारी को कोशिश करते नजर आते हैं लेकिन समय-समय पर वो भी एक्सपोज होते रहते हैं. कहने का मतलब ये कि उनके मालिक कन्फ्यूज्ड हैं. रातभर पहले तक वो मोदी चालीसा बजा रहे होते हैं और अगले ही दिन वो राहुल की ट्रेन यात्रा तो देश की सबसे बड़ी खबर के रूप में पेश कर देते हैं. घंटा-दो घंटा इस पर खेलते हैं और फिर -पुराने -एजेंडे पर वापस आ जाते हैं. ऐसे कई उदाहरण में गिना सकता हूँ.

लेकिन कांग्रेस-विपक्ष और बीजेपी को साधने की कोशिश में लगे इन न्यूज चैनलों के फोकस से देश के असली सरोकार गायब है. किसान चैनल सरकार ने तो कल शुरु कर दिया लेकिन किसान की स्टीरो, उनकी वेदनाएं न्यूज चैनलों की खबर का हिस्सा नहीं होतीं. FDI पर मोदी सरकार के यूटर्न का किसी भी चैनल ने विश्लेषण नहीं किया. जिस विषय से देश के करोड़ों कारोबारियों की रोजी-रोटी जुड़ी हो, उसे सबने डाउन प्ले किया. क्यों किया, पता नहीं! लेकिन सबको पता है कि क्यों किया होगा. पूरे देश मे इतना कुछ हो रहा है, इतने सारे सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक-भौगोलिक मुद्दे हैं लेकिन वो हिन्दी न्यूज चैनलों की प्रोग्रामिंग और न्यूज लिस्ट का हिस्सा नहीं हैं. ले-देकर पूरी बात सरकार और विपक्ष (विपक्ष में भी सिर्फ राहुल गांधी, बाकी सब दल तो गायब हैं) पर आ जाती है और फिर रात के प्राइम टाइम में इस पर एक बहस करा दी जाती है. एंकर चिल्लाता है, सारे नेता चिल्लाते हैं और फिर प्रोग्राम खत्म होते ही एक-दूसरे से हाथ मिलाते हुए, थैंक यू बोलते हुए सब घर चले जाते हैं. आज का शो कम्प्लीट हुआ. कल फिर एक नया विषय, नई बहस. लेकिन दर्शकों के लिए उसमें कुछ नया नहीं होता.

मुझे लगता है कि ये सब कुछ इतनी जल्दी खत्म नहीं होने वाला. केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद मीडिया की कार्यशैली और उसका अंदाज अभूतपूर्व तरीके से बदला है. खेमाबंदी हुई है और ये नेताओं को सूट करता है. इमरेजेंसी के बाद डरी-सहमी कांग्रेस ने भी इस नए प्रकरण से बहुत कुछ सीखा है. सो 5 साल बाद अगर सरकार बदली यानी कांग्रेस सत्ता में आई तो वो भी मीडिया को हैंडल करने के इस मॉडल को जरूर अपनाएगी. बल्कि यूं कहें कि उसे और कसेगी. आखिर सत्ता को तो हमेशा ही ये सूट करता है कि मीडिया उसके इशारे पर नाचे. फिलहाल तो मदारी का नाच जारी है.

वरिष्ठ पत्रकार नदीम एस अख्तर के एफबी वाल से

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हिंदी संस्थान : त्रैवार्षिक हिंदीसेवी अवार्ड घोषित, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को राहुल सांकृत्यायन अवार्ड

आगरा : केंद्रीय हिंदी संस्थान के हिंदी सेवी सम्मानों के नामों का ऐलान हो चुका है। केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा 3 वर्ष के हिंदी सेवी अवार्ड से सम्मानित होने वालों व्यक्तियों के नामों की घोषणा की है। यह पुरस्कार वर्ष 2012, 2013 तथा 2014 के लिए चयन हुए हिंदी सेवियों की लिस्ट में केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष डॉ. कमलकिशोर गोयनका की अध्यक्षता में संस्थान के डायरेक्टर प्रो. मोहन ने पेश किया है।

इनमें साहित्य एकेडमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को 2013 के राहुल सांकृत्यायन अवार्ड और राजीव कटारा को इसी वर्ष के गणेश शंकर विद्यार्थी अवार्ड के लिए चयन किया गया है। प्रो. मोहन ने बताया है कि सभी को राष्ट्रपति भवन में एक कार्यक्रम में राष्ट्रपति के हाथों यह अवार्ड दिया जायेगा।

उन्होंने यह भी बताया है कि, हिंदी राष्ट्रीय एकता-समन्वय की अहम कड़ी है। राजभाषा, राष्ट्रभाषा, संपर्कभाषा के रूप में कई भारतीय भाषाओं में आपसी संवाद को बढ़ावा देते हुए भारत की समावेशी संस्कृति के विकास की जिम्मेदारी संस्थान को ही रही है।

हिंदी सेवी सम्मान स्कीम में सात अवार्ड श्रेणियों के अन्तर्गत कई क्षेत्रों में हिंदी के लिए उल्लेख काम करने वाले 14 विद्वानों को हर साल नवाजा जायेगा। अवार्ड के लिए चुने गए साहित्यकारों-विद्वानों में, महेश दर्पण, डॉ. सुषम बेदी (2012); बालेंदु शर्मा दाधीच (2013); नरेंद्र कोहली, प्रो. श्योराज सिंह बेचैन, डॉ, सुरेश  गौतम, बलदेव वंशी और सुधा ओम ढींगरा (2014) भी इनमें शामिल हैं।   

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हिंदी पत्रकारिता में दलित चिंतकों की मजबूत हिस्सेदारी : अरविंद मोहन

नई दिल्ली : वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता में दलित चिंतकों की हिस्सेदारी इतनी मजबूत हो गई है कि यदि उनके सामाजिक-साहित्यिक मुद्दों को केन्द्र में नहीं रखा गया तो यह पत्रकारिता के पेशे से बेईमानी और इसकी व्यवसायिकता की हानि होगी। प्रो. राजकुमार ने कहा कि शिक्षा ही प्रतिरोध की शक्ति देती है। 

‘दलित समाज के आधारभूत प्रश्न : विशेष संदर्भ- साहित्य, शिक्षा और संस्कृति’ विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय के उत्तरी परिसर में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी  का आयोजन ‘भारतीय विज्ञान अनुसंधान परिसद, दिल्ली’ के सौजन्य से किया गया। कार्यक्रम का संयोजन साहित्यकार प्रो. श्योराज सिंह बेचैन द्वारा किया गया। संगोष्ठी के प्रथम दिवस (30 मार्च 2015) के उदघाटन सत्र के मुख्य अतिथि प्रो. विष्णु सर्वदे, विशिष्ठ अतिथि प्रो. अच्युतन थे एवं इस सत्र की अध्यक्षता अरविंद मोहन ने की। 

प्रो. विष्णु सर्वदे ने कहा कि दलित साहित्य में भारतीय समाज की वास्तविक संस्कृति का चित्रण मिलता है। इस क्रम में उन्होंने दलित साहित्य के संदर्भों से अपनी बात की पुष्टि की। प्रो. अच्युतन ने कहा कि सांस्कृतिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए आज दलित साहित्य की ऊंचाई का प्रमाणिक अध्ययन होना चाहिए। साथ ही आने वाले कार्पोरेट जगत में उनका क्या स्थान होगा, इस पर विचार की आवश्कता है। कार्यक्रम के प्रथम सत्र का विषय ‘दलित साहित्य एवं शिक्षा के अन्तःसंबंध’ था। इस सत्र की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के अंगेजी विभाग के प्रो. तपन बासू ने किया। सत्र के प्रथम वक्ता बलवीर माधोपुरी ने दलित आत्मकथाओं के माध्यम से वर्तमान में भी गांवों में दलित समाज की दयनीय स्थिति पर चिंता व्यक्त की और दलित साहित्य में आक्रोश उसी समाज के अमानवीय व्यवहार की उपज बताया। प्रो. राजकुमार ने कहा कि शिक्षा के प्रसार से ही दलित साहित्य का आगाज हुआ। 

सूरजपाल चौहान ने साहित्य के सौंदर्यशास्त्र पर बात रखते हुए मुख्यधारा के सौन्दर्यशात्र को अश्लील एवं प्रदूषणयुक्त बताया। उन्होंने कुमारसंभव और गीत गोविंद के माध्यम से उदाहरण देते हुए उनमें व्याप्त अश्लीलताओं को उजागर किया और बताया कि उनके यहां स्त्री भोग की वस्तु है। पूरे सवर्ण साहित्य में स्त्री एक वस्तु है और उनके साहित्यकारों की दृष्टि में स्त्री के देह जांघ, स्तन, नितंब इत्यादि ही रहता है। उनके यहां फटे, मैले कपड़े वाली काली कलूटी स्त्री एवं उसका संघर्ष नहीं दिखता। उन्होंने बताया कि दलित साहित्य ने साहित्य में व्याप्त अश्लीलता एवं भ्रष्टाचार को दूर किया है। प्रो. शत्रुघ्न कुमार ने कहा कि दलित साहित्य को इस रूप में लेना होगा कि वह पूरे समाज में बदलाव का आह्वान करता है।

दूसरे सत्र में ‘दलित साहित्य में सांस्कृतिक निर्माण की प्रक्रिया’ विषय पर गंभीर चर्चा हुई। इसकी अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. हरिमोहन शर्मा ने की। डा. रामचंद्र ने कहा कि दलित साहित्य अपने भीतर कई विमर्शों को समेटता है। दलित साहित्य में केवल दलित समाज ही नहीं बल्कि पूरा भारतीय समाज प्रतिबिंबित होता है। सांस्कृतिक रूपान्तरण की प्रक्रिया दलित साहित्य से ही शुरू होती है। इस संदर्भ में उन्होंने प्रो.श्योराज सिंह बेचैन की लंबी कहानी ‘रावण’ एवं दिवंगत दलित लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी ‘सलाम’ से सांस्कृतिक रूपान्तरण को स्पष्ट किया। डा. टेकचंद ने साहित्य में सांस्कृतिक निर्माण की प्रक्रिया में लैंगिक एवं भाषिक भेदभाव को स्पष्ट किया। उन्होंने इसकी प्रयोगशाला परिवार नामक संस्था को बताया जहां से संतान को स्त्री-पुरुष और दलित-द्विज का पाठ पढ़ाया जाता है। डा. अश्विनी कुमार ने ‘दलित साहित्य में मिथक और यथार्थ’ विषय पर वक्तव्य दिया और मुख्यधारा के साहित्य से इसकी भिन्नता को रेखांकित किया। 

प्रो. देवशंकर नवीन ने मिथिलांचल एवं वहां के सांस्कृतिक तत्वों का विश्लेषण करते हुए कहा कि हमारी संस्कृति में हमारे पूर्वजों ने रीति-रिवाजों, परंपराओं, और त्योहारों के माध्यम से जो सामाजिक सौहार्द का संदेश दिया है, उसे समझने और साधने के स्तर तक पहुंचने की जरूरत है। प्रो. अजमेर सिंह काजल ने दलित समाज की शिक्षा में ज्योतिबा फूले, डा. अम्बेडकर, ईसाई मिशनरियों एवं अंग्रेजों के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हमें जिन लोकतांत्रिक मूल्यों को स्वीकारा जाना चाहिए, वह दलित साहित्य में मौजूद हैं। प्रो. हरिमोहन शर्मा ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि दलित साहित्य का सबसे बड़ा अवदान यह है कि वह हमारी संकुचित होती सांस्कृतिक व्यवस्था को विस्तृत करता है।

संगोष्ठी के पहले दिन के अंतिम सत्र में ‘संत साहित्य एवं उसके सामाजिक योगदान’ पर चर्चा हुई। इस सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ दलित साहित्यकार-पत्रकार डा. सोहनपाल सुमनाक्षर ने की। कबीरपंथी संत एवं विचारक सनातदास ने कबीर की समाजदृष्टि के माध्यम से उनके सामाजिक सरोकारों का जिक्र करते हुए कहा कि कबीर साहब को प्राध्यापकीय आलोचना ने छद्म रचा और उनका ब्राह्मणीकरण, वैष्णवीकरण और हिंदूकरण किया गया। कबीर साहब को उनके काव्य में प्रक्षिप्त रचकर एवं उनके जीवन में किंवदंतियों को घुसाकर वर्चस्वशाली हिंदी आलोचना ने उनके विचारों को नरम किया और अपने फायदे के लिए उपयोग किया। इस पर उन्होंने चिंता भी व्यक्त की। डा. मनोज कुमार ने रविदास के सामाजिक एवं साहित्यिक अवदान पर प्रकाश डाला। डा. सोहनपाल सुमनाक्षर ने अपने वकतव्य में कबीर के बरक्स रविदास पर हिंदी आलोचना में कम चर्चा पर चिंता व्यक्त की। इन्होंने दलित साहित्य को समाज का वास्तविक दर्पण बताया। दलित साहित्य की समृद्ध लोक सुधारक संत परंपरा को रेखांकित किया। इस अवसर पर इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लेखकों, शिक्षकों एवं शोध छात्रों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम के अंत में इस संगोष्ठी के संयोजक प्रो. श्योराज सिंह ने अतिथियों एवं श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन किया। 

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इंद्रजीत गुप्ता ने लांच किया डिजिटल कंटेंट प्लेटफार्म ‘फाउंडिंग फ्यूल’

मुंबई: ‘फोर्ब्स इंडिया’ के पूर्व संपादक इंद्रजीत गुप्ता ने पियर्सन के ऑनलाइन शिक्षण उपक्रम ट्यूटर विस्टा के पूर्व प्रमुख सीएस स्वामीनाथन के साथ एक डिजिटल कंटेंट प्लेटफार्म फाउंडिंग फ्यूल लॉन्च किया है़। फाउंडिंग फ्यूल सोल्यूशन अत्याधुनिक डिजिटल उपकरणों का उपयोग करेगा और प्रोडक्ट्स के लिए बाज़ार मुहैया कराएगा। अंग्रेज़ी अखबार मिंट और डिजिटल टीवी नेटवर्क पिंग के साथ कंटेंट संबंधी समझौतों पर इसका हस्ताक्षर हो चुका है।

बताया गया है कि अखबार में उद्यम साहसिकता पर दो पन्नों का विशेष कंटेंट हर हफ्ते छापा जाएगा। इसके अलावा, कंपनी पिंग नेटवर्क के सहयोग से, यूट्यूब और डेली मोशन पर प्रसारित किए जा सकने वाले गुणवत्ता वाले कंटेंट का निर्माण करेगी। बिज़नेस रणनीतिकार राजेश श्रीवास्तव एक साप्ताहिक शो ‘द न्यू रूल्स ऑफ बिज़नेस’ की मेजबानी onfoundingfuel.com पर करेंगे। चलते- फिरते सुननेवाले श्रोता के लिए डिजाइन किए गए कई ऑडियो और वीडियो में यह पहली पेशकश है। 

वेबसाइट फिलहाल बीटा संस्करण में उपलब्ध है। अगले चरण में, फाउंडिंग फ्यूल एक मोबाइल एप्लिकेशन, डिजिटल लर्निंग सोल्यूशंस के लिए एक एकीकृत स्यूट का निर्माण करना, इंवेंट्स और सम्मेलनों का आयोजन, मेंटरिंग सेवाएं देने का काम और उद्यमशीलता के प्रोडक्ट्स और सेवाओं के लिए एक चयनित बाज़ार बनाएगा। फाउंडिंग फ्यूल का विश्लेषिकी इंजन सिलिकॉन वैली की फर्म विजरॉकेट द्वारा बनाया गया है। 

स्वामीनाथन का कहना है कि विशेष डिजिटल मीडिया के पास प्रॉपर्टीज़ विकसित करने और बड़े दर्शकों के लिए मौके हैं। इसके अलावा फाउंडिंग फ्यूल सीखने का पहलू जोड़कर दर्शकों के लिए अधिक बेहतर अनुभव की पेशकश करेगा। 

फाउंडिंग फ्यूल की सलाहकार काउंसिल में प्रमुख कॉर्पोरेट नागरिक शामिल हैं जैसे मैक्स ग्रुप के चेयरमैन अनलजीत सिंह, बीसीजी इंडिया के पूर्व चैयरमैन और योजना आयोग के सदस्य अरुण माइरा, पेप्सिको इंडिया के चेयरमैन और सीईओ डी शिवकुमार, मैरिको के चेयरमैन हर्ष मरीवाला, नैस्कॉम के पूर्व चेयरमैन किरण कार्णिक, बाज़ार रणनीति विशेषज्ञ रमा बीजापुरकर, नौकरी.कॉम (Naukri.com) के संस्थापक व उप-चेयरमैन संजीव भिखचंदानी और स्टार टीवी इंडिया के सीईओ उदय शंकर।

(सूचना ‘हींदी टेलिविजन’ से साभार)

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अंग्रेजी में आरटीआई नियमावली के ड्राफ्ट पर आपत्ति

लखनऊ : सामाजिक कार्यर्ता डॉ. नूतन ठाकुर ने आरटीआई कार्यकर्ताओं महेन्द्र अग्रवाल, देवेन्द्र दीक्षित, सलीम बेग, अनुपम पाण्डेय के साथ मुख्य सूचना आयुक्त जावेद उस्मानी को आरटीआई नियमावली, 2015 और उसके संलग्नकों के ड्राफ्ट मात्र अंग्रेजी भाषा में होने के सम्बन्ध में अपनी प्राथमिक आपत्ति प्रस्तुत की है. 

उन्होंने कहा है कि उत्तर प्रदेश राज्य भाषा अधिनियम, 1951 के अधीन निर्गत अधिसूचना दिनांक 30 अक्टूबर, 1952 में सभी शासकीय कार्यों में देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी भाषा का प्रयोग अनिवार्य किया गया है और पूर्व मुख्य सचिव राज कुमार भार्गव द्वारा निर्गत शासनादेश दिनांक 26 मार्च 1990 में समस्त सरकारी कामकाज में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग पूर्णतया बंद करने के आदेश दिए गए थे.

उन्होंने कहा है कि मात्र अंग्रेजी में नियमावली का आलेख प्रस्तुत कर सुझाव माँगना प्रदेश की भाषा नीति के उल्लंघन के साथ ही प्रदेश के उत्तर प्रदेश में बहुसंख्यक हिंदी भाषी आरटीआई कार्यकताओं एवं जन सामान्य के साथ खिलवाड़ है. अतः हिंदी में नियमावली का आलेख प्रस्तुत करने के साथ सुझाव के लिए एक माह का समय देने और उस संबंध में समाचारपत्रों में पर्याप्त प्रचार-प्रसार कराने का अनुरोध किया गया है.

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भाजपा शासित गोवा में हिंदी में बात करने पर पिटे पत्रकार ने सुबूत के तौर पर घटना की रिकार्डिंग पेश की

यह राष्ट्रीय शर्म की खबर है. जो भाजपा हिंदी भाषा को लेकर जाने क्या क्या दावे करती फिरती है, उसी के राज में हिंदी भाषा में बात करने पर एक पत्रकार पीट दिया गया. जी हां. वाकया पणजी का है. गोवा में यह शर्मनाक वाकया पत्रकार मुकेश कुमार के साथ हुआ. गोवा के एक स्थानीय चैनल में काम करने वाले मुकेश कुमार को राजभाषा हिंदी में बात करना महंगा पड़ गया. हिंदी में बात करने पर गोवा पुलिस ने उनके साथ मारपीट की.

मुकेश कुमार ने अपने साथ हुई इस घटना की रिकॉर्डिंग भी की है. पीड़ित पत्रकार का आरोप है कि इंस्पेक्टर पीके वस्त और सब-इंस्पेक्टर विक्रम नाइक ने हिंदी में बात करने की वजह से उन्हें मारा. मुकेश ने बताया कि शनिवार रात को वह शहर के माला इलाके में मोबाइल पर अपनी पत्नी से हिंदी में बात कर रहे थे. इतने में 4-5 लोग वहां आकर उनके साथ धक्का-मुक्की करने लगे. इस पर उन्होंने पुलिस को फोन किया. मुकेश के मुताबिक पुलिस आरोपियों के साथ उन्हें भी थाने ले आई.

उन्होंने बताया कि पुलिस आरोपियों से बेहद नरमी से बात कर रही थी जबकि उन्हें प्रताड़ित कर रही थी. उन्होंने बताया कि बातचीत के दौरान ही इंस्पेक्टर ने उन्हें थप्पड़ मार दिया. मुकेश का आरोप है कि इस बारे में शिकायत करने के बावजूद पुलिस ने एफआइआर दर्ज नहीं की, जबकि उन्होंने सुबूत के तौर पर विडियो रिकॉर्डिंग भी पुलिस को मुहैया करा दी है. पणजी पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर राजेंद्र प्रभुदेसाई ने शिकायत मिलने की बात कबूली है. उन्होंने बताया कि आगे की कार्रवाई के लिए शिकायत नॉर्दन गोवा के एसपी के पास भेजी गई है.

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फेसबुक, हिंदी भाषा और पंकज सिंह का दुख

Pankaj Singh : भाषा के बारे में लापरवाह सा नज़रिया फ़ेसबुक के बहुत सारे मित्रों में आम है। उनमें यश:प्रार्थी कवि-लेखकों से लेकर बढ़ती उम्र के स्वनामधन्य भी शामिल हैं। हर सुबह मेरे लिए ‘मित्रों’ की भाषिक भूलें दुख और सन्ताप का कारण बनती हैं। इन ‘मित्रों’ के प्रति मेरे मन में अपनत्व और शुभकामना है, इसलिए कई लोगों से मैं भूल सुधार का आग्रह करता रहता हूँ। शायद इसलिए भी कि उनकी प्रतिष्ठा-अप्रतिष्ठा को मैं अपनी छवि से जोड़कर देखने का आदी हूँ।

मुझे बेहद आश्चर्य और अफ़सोस तब होता है जब ‘की’ और ‘कि’ के प्रयोग में विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक और लेखक मित्र तक अक्सर असावधान दिखते हैं। आज सुबह ही दिखा कि एक बन्धु ने ‘दृष्टी’ लिखा है! ओम थानवी ने इन दिनों कुछ टोक-टाक शुरू की है। मेरी राय में पढ़े-लिखों की यह एक बुनियादी पहचान होती है कि वे कम से कम एक भाषा सही ढंग से लिखना और बोलना जानते हैं। अध्यापन और लेखन के लिए तो यह अनिवार्य शर्त है ही। अगर आप के भाव और विचार शुद्ध और सुन्दर भाषा में प्रकट नहीं होते तो वे गम्भीरता से ग्रहण नहीं किये जाते। यह एक नियम सरीखा है। (कई पुराने-नये परिचितों और मित्रों ने न सुधरने की क़सम सी खायी हुई है। यह पोस्ट उनके लिए नहीं है। मसलन, Chanchal Bhu का क्या करूँ…’कि वो काफ़िर ख़ुदा को भी न सौंपा जाये है मुझसे… ‘)

कवि और पत्रकार पंकज सिंह के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

    Yashwant Singh सर माफ करिएगा. ये भी एक तरह का कट्टरपंथ है जो एलीट सोसाइटी बनाए रखना चाहता है. भाषाएं गड्मड्ड हा जाएं तो एक ग्लोबल भाषा बनेगी. क्या दिक्कत है इसमें. मैं कभी ज़िद रखता था इन सबको लेकर पर अब नहीं. सबको एक्सप्रेस करने दीजिए, बोलने दीजिए, फरमाने दीजिए… ये नया दौर भी एक नए तरह का बदलाव ला रहा है जो भाषा के शुद्धतावादियों समेत नस्ल, जाति, धर्म, राष्ट्र, प्रांत के शुद्धतावादियों को नहीं भाएगा. पर आपको जानता हूं. आप इनमें कतई नहीं हैं. सो, सौ फूलों को खिलने दीजिए. हो सकता है कुछ ऐसे फूल खिलें जो कई रंगों को मिलाकर बने हों और ऐसा फूल पहले न खिला हो.

    Urmilesh Urmil भाषायी शुद्धतावाद की अपेक्षा FB जैसे मंचों से नहीं होनी चाहिए। लोगों को बोलने और लिखने दें। भाषा और व्याकरण की चारदीवारी FB पर कहां चलेगी? हां, सोशल मीडिया में शालीनता बनी रहनी चाहिए। बहुत सारे लोग यहां भी सडक-छाप हो जाते हैं, वह दुखद है।
    
    Ajay K. Mehra पंकज भाई, चोट आज कल हर भाषा पर है। sms भाषा ने तो अंग्रेजी की भी ऐसी तैसी कर दी है। पिछले दो दशकों में हिंदी के अध्यापन में वर्तनी को दरकिनार कर दिया गया है। इसका असर तो आएगा ही। hybrid भाषा के प्रयोग का भी असर दिखता है। भाषा की शुद्धता और उसके व्यक्तित्व पर विद्यालय स्तर से ही बल देना आवश्यक है।
   
    Pramod Beria पहले ही कह दूँ कि यह क्षेत्र मेरी ज़िद्द की फ़सल है ,न तो भाषा में ,न ही साहित्य में कोई पारंगत अवस्थान है । आपने एकाध बार मेरी ग़लतियों को सुधारा है ,जिसका मैं शुक्रगुज़ार हूँ । आपको जब फ़ेश बुक पर ग़लतियाँ इतनी अखरती है तो सोचिए हमारे जैसे लोगों की क्या हालत होती है ,जब वे महसूस करते हुए भी अपनी कमतर पकड़ की वजह से चुप रहते हैं । ग़लतियाँ भी ग़ज़ब- ग़ज़ब होती है ,जिन्हें छपाई की भूल नहीं माना जा सकता है । २७ दिसंबर को ग़ालिब से दोस्ती करने की होड़ थी और ग़लत- सलत शब्दों और व्याकरण में ग़ालिब की धज्जियाँ उड़ा दी । मैंने कहा है कि मैंने अपनी कोशिशों से सीखी है जैसे बंगला सिनेमा के पोस्टर देख- देख कर सीखी ,उर्दू ग़ालिब को पढ़ते हुए और मेंहदी हसन ,ग़ुलाम अली और सहगल की गायी ग़ज़लें सुनते हुए शब्दकोश में अर्थ खोजते हुए ।
    अब तश्किरा- ए- दौर में तो ए ठीक है लेकिन ग़ालिब- ए – ख़याल के बदले शायद गालिबे होना चाहिए !
    यह याद रहे कि मो सम कौन कुटिल खल कामी !
   
    Anil Janvijay नये या नए? आयी या खाई? जाये या जाए? यशःप्रार्थी या यशप्रार्थी? हिंदी या हिन्दी ? वर्तनी की ग़लतियों पर भी बात की जाए। ओम थानवी तो खण्ड पीठ में पीठ को पुल्लिंग बताते हैं। आपका क्या कहना है?
 
    Avinash Mishra आप ‘है’ और पूर्ण-विराम के बीच में अतिरिक्त स्पेस दे रहे हैं, इसे दुरुस्त करें
 
    Kalbe Kabir फ़ेस-बुक को एक सम्पादक की ज़रूरत है, Pankaj Singh जी !
  
    Avinash Mishra Kalbe Kabir : ‘फेसबुक’ में नुक्ता और – नहीं आता है।
   
    Kalbe Kabir नहीं आता वो आ जाये तो क्या बात, Avinash Mishra !
    
    Pramod Beria नुक़्ता चीं है गमे दिल………… बात बनाए न बने
    
    Kalbe Kabir दुनिया का हर वाक्य अशुद्ध है !  वर्तनी और विचार दोनों दृष्टि से ! मैं एक शुद्ध वाक्य लिखना चाहता हूं, Pankaj Singh जी और Avinash Mishra जी !
    
    Hammad Farooqui ye English meing vakya-sentence-correct/incorrect hota he to Hindi/ Sanskrit ki mansikta he ki vakya ko ‘shudhdh/ashudhdh-pure/impure’commodity ki terreh burat-ti he….Hindi mein vakya- sahee / ghalat kyon nahee ho sukta..ye shudhdhtawadi mansikta ka parichay to naheen he..
    
    Kalbe Kabir और इस बहस और इस रात की अंतिम बात : सही भाषा से सही विचार नहीं आते, सही विचार से भाषा सही होती है !
    
    Pankaj Singh Pramod Beria नुक़्ताचीं है ग़मे दिल उसको सुनाये न बने… क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने…. (प्रमोद जी, दकनी, रेख़्ता और हिन्दवी से शुरू करके हमारी भाषा ने अबतक जो यात्रा तय की है उसमें इसने निरन्तर नये सामर्थ्य,नयी समृद्धियाँ और नयी भाव दीप्तियाँ हासिल की हैं। अपनी इस भाषा में सर्जनात्मक होने का आनन्द हम अगर नहीं ले सकते, नयी वैचारिकता, नयी सूचनाओं व तथ्यों से इसे सम्पन्नतर बनाकर हम इसका बेहतर उपयोग नहीं कर सकते, तो फ़ेसबुक जैसे माध्यम सतही क्रीड़ा-कौतुक में सिमटकर रह जायेंगे। वैसे, अच्छी बात यह है कि अहम्मन्य और हठी लोगों को ‘ब्लाक’ करके एक सार्थक संसार बनाया जा सकता है। मैं ठण्डे विवेक से इस तरह के निर्णय लेता रहा हूँ।)
 
    Pankaj Singh …सकता है। मैं ठण्डे विवेक का इस्तेमाल करके इस तरह के लोगों से मुक्ति पाता रहता हूँ । )
 
    Shashi Bhooshan Dwivedi मुझे तो आपने जब डांटा (इशारे में ही सही) तो मैने तुरंत ठीक कर लिया (अभिजात और आभिजात्य वाला मामला) फिर कोई ग़लती हो तो माफ़ कर दीजिए ये quillapd की दिक्कत है.
 
    Jitendra Ray किसी भी व्यक्ति को चाहिए कि उसकी भाषा सरल, सुलभ एवं सर्वग्राही हो ताकि उनकी भाषा आम जनमानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ सके।
  
    Jitendra Raghuvanshi यह लापरवाही महामारी बन चुकी है…दरअसल, कोई टोकता नहीं है.
   
    अमलदार नीहार अनवधानता में की गयी त्रुटि तो क्षम्य है, किन्तु जब त्रुटि का स्वीकार भी न हो तो यह विषाद का विषय है । एक बार लिखने के बाद देख लेना चाहिए, क्योंकि यह यंत्र कई विकल्प देता है । कई बार लिखने की त्वरा में भी त्रुटि सम्भाव्य है ।

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स्मृति शेष : अंग्रेजी भाषा की मोहताज रही सिने पत्रकारिता को श्रीराम ताम्रकर ने हिंदी के जरिए नयी उड़ान दी

वरिष्ठ फिल्म समीक्षक श्रीराम ताम्रकर पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे.  ताम्रकर की अंतिम इच्छानुसार उनके नेत्रदान कर दिए गए ताकि उनकी आंखें फिल्म देखती रहे. 9 नवंबर 1938 को जन्मे ताम्रकर की कलम से लगभग 50 किताबें निकलीं. उन्होंने हिन्दी फिल्मों के ज्ञान कोश की पाण्डुलिपि कुछ ही दिन पहले तैयार की थी. वह अपनी इस महत्वाकांक्षी पुस्तक पर कई वर्षों से काम कर रहे थे. ताम्रकर ने गुजरे 50 वर्षों में अलग-अलग अखबारों और पत्रिकाओं में फिल्मी विषयों पर लगातार स्तंभ लेखन और संपादन किया. वह इंदौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में पिछले दो दशक से सिनेमा विषय पढ़ा रहे थे. ताम्रकर अपने प्रशंसकों के बीच ‘फिल्म जगत के इनसाइक्लोपीडिया’ के रूप में मशहूर थे. उन्हें मुंबई की दादा साहेब फालके अकादमी का ‘वरिष्ठ फिल्म पत्रकार सम्मान’ (2010) और मध्यप्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग की ओर से ‘सर्वश्रेष्ठ फिल्म आलोचक’ सम्मान (1992) समेत कई अलंकरणों से नवाजा गया था. ताम्रकर प्रदेश के आदिम जनजाति प्रथम अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के जूरी तथा लता मंगेशकर अलंकरण समिति के बरसों तक सदस्य भी रहे हैं. अंतिम संस्कार जूनी इंदौर मुक्तिधाम पर उनका किया गया, जहां वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा, प्रभु जोशी, तपन भट्‍टाचार्य, सरोज कुमार, कृष्ण कुमार अष्ठाना तथा वेबदुनिया डॉट कॉम के संपादक जयदीप कर्णिक समेत कई गणमान्य नागरिकों व फिल्म समीक्षकों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी.

जाने माने फिल्म विश्लेषक श्रीराम ताम्रकर खामोश हो गए। हिंदी सिने पत्रकारिता की दुनिया में श्रीराम ताम्रकर का नाम उसी आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है जैसे अदाकारी की दुनिया में दिलीप कुमार का लिया जाता है. फर्क इतना ही है कि दिलीप कुमार आज सक्रिय नहीं हैं और गुज़रे दौर की यादों के सहारे ज़िन्दगी की पहेली को सुलझाने में जुटे हैं. पर श्रीराम ताम्रकर अपनी आखिरी सांस तक सक्रिय रहे. 76 साल की उम्र में भी उनकी कलम उसी पुरानी रफ़्तार से चलती रही. वे सिनेमा को जीते थे, सिनेमा को ही ओढ़ते थे, सिनेमा को बिछाते थे, सिनेमा में ही सांस लेते थे. दूसरों के लिए भले ही यह सिर्फ एक मुहावरा हो पर ताम्रकरजी के लिए यह ज़िन्दगी की सच्चाई थी.

सन नब्बे के आसपास दिल्ली के सीरी फोर्ट परिसर में अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के दौरान उनसे पहली मुलाक़ात हुई. नाम तो खूब सुन रखा था उनका, पर मुलाक़ात का यह पहला मौका था।  एकदम सहज और सरल. खुशमिज़ाज। बेहद आत्मीयता से मिले, सहज भाव से कहने लगे कि तुम्हारा लिखा पढता रहता हूँ. अच्छा लिख रहे हो. मैं तो स्तब्ध था। सोचा भी न था कि एक स्थापित और प्रतिष्ठित लेखक मेरे लेखन के बारे में इतने सरल भाव से यूं टिप्पणी करेगा.

बाद में जब भी उनसे मिलना हुआ तो हमेशा पितृवत स्नेह ही उनसे पाया। बेहद अपनेपन के साथ वे रास्ता बताते रहे और मेरे जैसे अनगिनत लोग ऐसे होंगे जिन्होंने उनके बताये रास्ते पर चलते हुए एक छोटा मोटा मुक़ाम हासिल कर लिया। पर ताम्रकरजी खुद हमेशा एक संत की मानिंद सरल और आडम्बरहीन जीवन जीते रहे. मैं तो पहले ही उनके लेखन का कायल था. नई दुनिया प्रकाशन के बैनर तले उन्होंने फिल्म विशेषांक निकालने की एक अनूठी परंपरा शुरू की थी. पहला विशेषांक 1988 में आया था. यह वो दौर था जब भारतीय सिनेमा प्लेटिनम जुबली मना रहा था. नई दुनिया के इस विशेषांक में सिनेमा का 75 साल का इतिहास संजोया गया था. हिंदी सिनेमा के बारे मे प्रामाणिक और गूढ़ जानकारी और वो भी हिंदी मे. गागर में सागर वाली कहावत बचपन से बीसियों बार सुनी थी पर उसे सच होते पहली बार देखा।

फिर तो हर साल नई दुनिया इसी तरह के विशेषांक प्रकाशित करता रहा. हर विशेषांक में सिनेमा के तमाम पहलुओं की पूरी जानकारी। हर विशेषांक एक से बढ़ कर एक. अब तक अंग्रेजी भाषा की मोहताज़ रही सिने पत्रकारिता ने पहली बार हिंदी भाषा के ज़रिये एक नयी उड़ान भरी. और यह मुमकिन हुआ श्रीराम ताम्रकर जैसे प्रतिबद्ध, ईमानदार और सच्चे फिल्म समीक्षक की बदौलत। यह कमाल था श्रीराम ताम्रकर का।  सिने पत्रकारिता में जब भी किसी नए बदलाव की आहट सुनायी दी, तो यह निश्चित था कि उस आहट को एक बड़ी गूँज में बदलने का काम यकीनन श्रीराम ताम्रकर ही करेंगे. और सबसे बड़ी बात यह कि ताम्रकरजी यह कमाल बस चुपचाप, ख़ामोशी के साथ करते रहे. इस बात से बिलकुल बेखबर कि अपनी लेखनी के सहारे वे नया इतिहास रचते जा रहे हैं. 

उनकी उपलब्धियों का ज़िक्र कहाँ तक करें. शायद यह ज़िक्र करना मौज़ूं होगा कि ज़िन्दगी के आखिरी पड़ाव में भी वे हिंदी सिनेमा का इनसाइक्लोपीडिया तैयार करने में जुटे थे और यह महती काम उन्होंने करीब-करीब पूरा भी कर लिया था।  सौ साल का सिनेमा और उसे एक किताब में समेटना — दूसरे लोगों के लिए यह काम भले ही मुश्किल होगा लेकिन ताम्रकरजी बेहद निश्चिन्त भाव से इस काम को पूरा करने में लगातार जुटे रहे। हो सकता है कि इनसाइक्लोपीडिया तैयार करने में वे कुछ इस हद तक डूब गए कि अपने गिरती सेहत को भी वे नज़रअंदाज़ करते रहे और आखिरकार मौत ने एक झपट्टा मारकर उन्हें हमसे छीन लिया। 

उनके मित्र प्रभु जोशी ने नई दुनिया में ठीक ही लिखा है कि श्रीराम ताम्रकर ने सिने पत्रकारिता से यदि कुछ कमाया तो वह है अपने पाठकों का प्रेम। वही उनकी पूंजी भी रही। यदि यही काम वे मुंबई में रहकर कर रहे होते तो धनाढ्य पत्रकारों की कतार में होते। लेकिन, यह उनकी फितरत में ही नहीं था। दानी की तरह देना ही देना उन्हें याद था।

 

लेखक श्याम माथुर जयपुर में वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क +91 9414305012 या  0141-2790088 के जरिए किया जा सकता है.

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