हिन्दी पत्रकारिता का बेड़ा गर्क करने वालों को हिन्दी पत्रकारिता दिवस की शुभकामनाएं!

निमिष कुमार-

इन तमाम महानुभावों को भी हिन्दी पत्रकारिता दिवस की शुभकामनाएं-

1) जो मालिकों को धंधे का गणित समझाकर संपादक बन गए।

2) जो किसी नेता से फोन करवाकर बड़े संस्थानों के बड़े पदों पर विराजमान है,

3) जो बिना नेता के फोन के आपको नौकरी नहीं देने के 1000 हजार बहानें गिना देते हैं,

4) जो संपादकों, अपने बॉस की चमचागिरी से लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे हैं, लेकिन हाल ये है कि किसी भी विषय पर टीवी पर बोलने या लिखने को कह दें, तो……

5) जो पत्रकारिता में मजबूरी में आए, और अब पूरे वक्त पैसा नहीं मिलता, पैसा नहीं मिलता की रट लगाए रहते हैं,

6) जो हिन्दी में अंग्रेजीदां, मॉडर्न लड़कियों को रिपोर्टिंग और एंकरिंग देते हैं, और हिन्दी पट्टी के लड़कों को दुत्कार देते हैं,

7) जो डिजिटल जर्नलिस्म का मतलब ये समझते हैं कि इसके लिए कोई यो-यो टाइप लड़का या लड़की ही संपादक बन सकता है,

8) जिन्हें हमेशा इस बात का दुख रहता है कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती, वरना….

ऐसे तमाम महानुभावों, जिन्होंने हमारी हिन्दी पत्रकारिता का बेड़ा गर्क कर दिया, को Hindi Journalism Day हिन्दी पत्रकारिता दिवस की शुभकामनाएं।


ममता मल्हार-

जो हिंदी पत्रकार अब तक खांटी हैं, जो बिके नहीं हैं, जो झुके नहीं हैं, जो आज भी खुलेआम सच को सच गलत को गलत कहने की हिम्मत रखते हैं, जो पार्टी पत्रकार या एजेंडवादी नहीं बने हैं, उन सबको हिंदी पत्रकारिता दिवस की बधाई।

बाकी ये आलेखों में बड़ी-बड़ी बातें करना बंद करो यार! कुछ नहीं है तुम लोगों के बस का, सिवाय खराब ट्रेंड सेट करने के, नई पीढ़ी के रास्ते बंद करने के और अपने मुंह से अपनी तारीफ करने के।
झुकने को कहा जाए तो लोट जाते हैं।

हिंदी पत्रकारों के क्या हाल हैं यह बार-बार क्या ही बखान किया जाए। जो सिर्फ पत्रकारिता कर रहे हैं उनको जीते जी जीना मुश्किल होता है और मरने पे उनको चार कंधे और कई बार तो अंतिम संस्कार के इंतजामात के भी लाले पड़ जाते हैं। अपने आकाओं की ड्योढ़ी चूमते-चूमते ज़्यादातर उनके जैसे बस गाल बजाने में ट्रेंड हो गए हैं। एक बार फिर से बधाई।


शम्भूनाथ शुक्ला-

पत्रकारिता दिवस! कभी 30 मई तो कभी 31 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाते हैं। इस दिन कलकत्ता से 1826 में उद्दंत मार्तंड नाम का एक हिंदी साप्ताहिक प्रकाशित होना शुरू हुआ था। इस तरह वह हिंदी का पहला अख़बार माना जाता है। कानपुर के निकट के उन्नाव ज़िले के मूल निवासी जुगुल किशोर सुकुल में पता नहीं कैसे यह प्रेरणा हुई कि हिंदी का अख़बार निकाला जाए! क्योंकि न तो उनके पास पैसा था न वे साहित्य मर्मज्ञ थे न कोई कवि या कौतुक प्रेमी।

ख़ैर उन्होंने अख़बार निकाला और धन की कमी से अखबार बंद भी हो गया। कलकत्ता के विक्टोरिया मेमोरियल में इस अख़बार की एक प्रति रखी हुई है। लेकिन आज जब कुछ लोग हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाते हैं, तो मुझे लगता है कि अधिकांश लोग तो पत्रकारिता को समझते ही नहीं हैं। अगर ऐसा होता तो क्यों अधिकांश लोग पत्रकार को पत्तलकार बोलते। क्यों पत्रकार एक राज्यसभा सीट के लिए या अपनी धन लिप्सा के लिए पत्रकारिता के अपने दायित्त्वों से पीछे हटते। क्यों वे घोड़ा मंडी में बिकते।

इस संदर्भ में मुझे 1953 के एक अख़बार जनसत्ता की याद आती है, जिसे इंडियन एक्सप्रेस समूह के रामनाथ गोयनका ने निकाला था और इतने साधन संपन्न होने के बाद भी वह अख़बार चल नहीं सका। मालिकों ने उसे बंद कर दिया। इस अख़बार के बंद होने पर संपादक इंद्र विद्यावाचस्पति ने 15 अगस्त 1954 को एक लेख लिखा था-
“Hindi journalism today presents the alarming prospect of the
rising sun being sought to be blacked out by encircling clow
With the entry of capitalists in the field of journalism
the editor is no longer his own master. He is now the pai
agent of one who thought primarily in terms of profit angr
The editor’s pen is now in bondage.”

इसी से हिंदी पत्रकारिता के पतन की वज़ह पता चलती है। जब पैसों का खेल शुरू होगा तो कैसे हिंदी पत्रकारिता और पत्रकार को बचाया जा सकेगा?



 

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