आईएएस अफसर जावेद उस्मानी के 22 लाख रुपये माफ किए जाने का विरोध

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने पूर्व मुख्य सचिव जावेद उस्मानी द्वारा स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति हेतु पूर्व में अध्ययन अवकाश के लिए भरे गए बांड के 22 लाख रुपए माफ कराने के प्रयासों का कड़ा विरोध किया है. सचिव, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग, भारत सरकार को भेजे प्रत्यावेदन में उन्होंने कहा है कि श्री उस्मानी एक बहुत ही सफल आईएएस अफसर रहे जो लगातार अपने कैरियर को संवारने में लगे रहे और उनका अपने कैरियर के अलावा कोई भी विशिष्ट सामाजिक सारोकार नहीं रहा. उन्हें विदेश में वर्ल्ड बैंक सहित कई नियुक्तियां मिलीं जिसमे वेतन के अलावा बाहरी करेंसी में भारी भत्ते मिलते हैं.

डॉ ठाकुर ने कहा कि कोयला घोटाले में उनकी भूमिका की जांच अभी ख़त्म नहीं हुई है. उनके मुख्य सूचना आयुक्त पद पर नियुक्ति कहीं से भी लोकहित से नहीं जुड़ा है बल्कि उन्होंने इसे अपने कैरियर के हिसाब से चुना है. ऐसे में एक सुदृढ़ ताकतवर आदमी के निजी हित के लिए सार्वजनिक कोष से 22 लाख रुपए माफ़ करना किसी भी प्रकार से उचित नहीं होगा.

सेवा में,
सचिव,
डीओपीटी,
भारत सरकार,
नयी दिल्ली

विषय- श्री जावेद उस्मानी, आईएएस के 22 लाख रुपये माफ़ी विषयक  

महोदय,
समाचारपत्रों से यह बात संज्ञान में आई है कि उत्तर प्रदेश कैडर के 1978 बैच के वरिष्ठ आईएएस अफसर श्री जावेद उस्मानी, जिनकी नियुक्ति मुख्य सूचना आयुक्त उत्तर प्रदेश के पद पर हुई है, ने डीओपीटी विभाग, कार्मिक मंत्रालय, भारत सरकार को पत्र लिख कर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के लिए पूर्व में अध्ययन अवकाश के लिए उनके द्वारा भरे गए बांड के 22 लाख रुपए माफ करने के लिए केंद्र सरकार से अपील की है.

हम अवगत हैं कि आईएएस अफसर अखिल भारतीय सेवा (मृत्यु सह सेवानिवृत्ति) नियमावली, 1958 के नियम 16(2) के अनुसार स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेते हैं. इस सेवानिवृत्ति के पूर्व यह आवश्यक होता है कि राज्य तथा केंद्र सरकार और इसकी विभिन्न ईकाई के स्तर पर जो भी कर्ज आदि लंबित हों उन्हें पूरा कर दिया जाए.

अखिल भारतीय सेवा (अवकाश) नियमावली 1960 के नियम 9 Resignation or retirement after study leave or non-completion of the course of study के उपनियम 1 के अनुसार “Every member of the Service, who has been granted study leave or extension of such leave shall be required to execute a bond as given in Appendix A or Appendix AI, as the case may be, annexed to these regulations before the study leave or extension of such leave granted to him commences.” इसी नियम के उपनियम 2 के अनुसार “If a member of the Service resigns or retires from Service without returning to duty after a period of study leave or within a period of three years after such return to duty or fails to complete the course of study and is thus unable to furnish the certificates referred to in Appendix ‘B’ to these regulations he shall be required to refund.- (i) the actual amount of leave salary, study allowance, cost of fees, travelling and other expenses, if any, drawn by him for the period of study leave, together with interest thereon, at Government rates for the time being in force on Government loans from the date of demand before his resignation is accepted or permission to retire is granted”
इस नियम के उपनियम 4 के अनुसार Notwithstanding anything contained in the foregoing sub-regulations, the Government may, if it is necessary or expedient so to do, either in public interest or having regard to the peculiar circumstances of the case or class of cases, by order, waive or reduce the amount required to be refunded under sub-regulation (2) by the member of the Service concerned or class of members of the Service.

अध्ययन अवकाश नियमावली के साथ संलग्न अपेंडिक्स ए के अनुसार “NOW THE CONDITION OF THE ABOVE WRITTEN OBLIGATION is that in the event of the above bounden……………….…resigning or retiring from service without returning to duty after expiry or termination of the period of study leave so extended or at any time within a period of three years after his return to duty, he shall forthwith pay to the Government or as may be directed by the Government on demand the said sum of Rs………………..(Rupees…………………………) together with interest thereon from the date of demand “

श्री उस्मानी दिनांक 01/11/2010 से 22/03/2012 तक अध्ययन अवकाश पर थे. इस प्रकार उन्हें तीन साल अर्थात 22/03/2015 पूर्व सेवानिवृत्त होने की दशा में अखिल भारतीय सेवा (अवकाश) नियमावली 1960 के नियम 9 के अनुसार इस अध्ययन अवकाश के दौरान प्राप्त किये गए सम्पूर्ण वेतन-भत्तों को वापस करना पड़ेगा.

अब श्री जावेद उस्मानी इस वेतन-भत्तों आदि को नियम  9 के उपनियम 4 के अनुसार माफ़ कराना चाहते हैं. यह भी सही है कि भारत सरकार को जनहित में या किसी प्रकरण की सम्पूर्णता को देखते हुए इस धनराशि को माफ़ करने या कम करने का अधिकार है.

किन्तु श्री उस्मानी का मामला किसी भी प्रकार से ऐसा नहीं है जिसमे नियम 9(4) के तहत उनके वेतन-भत्तों आदि के 22 लाख रुपये माफ़ किये जाएँ. इसके कई कारण हैं-

1. श्री उस्मानी अपने पूरे कैरियर में लगातार अपने व्यक्तिगत कैरियर को संवारने में लगे अधिकारी रहे

2. उनका अपने कैरियर के अलावा कोई भी विशिष्ट सामाजिक सारोकार नहीं रहा

3. वे अपने कैरियर-आधारित दृष्टिकोण के कारण अपने कैरियर में काफी सफल रहे और कई मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के साथ एक सफल अधिकारी के रूप में सम्बद्ध रहे

4. इस दौरान उन पर ख़ास कर कोयला घोटाले में प्रधानमंत्री के विशेष सचिव के रूप में गंभीर आरोप लगे जिस पर अभी तक जान्च प्रचलित है

5. कोयला घोटाले में पूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह से भी पूछताछ के आदेश कोर्ट ने दिए हैं, ऐसे में अभी श्री उस्मानी की भूमिका निश्चित रूप से संदेहों के घेरे में मानी जायेगी

6. श्री उस्मानी की बहुत उम्दा मानी जाने वाली पोस्टों पर लम्बी-लम्बी तैनाती रही जिसमे प्रधानमंत्री कार्यालय में 01/07/1996 से 11/06/2001 के पांच वर्ष और 12/07/2004 से 29/10/2007 के करीब तीन साल शामिल हैं

7. श्री उस्मानी एक से अधिक बार विदेशों में भारी भत्ते वाले पदों पर नियुक्त रहे हैं जिसमे 11/06/2001 से 03/02/2004 के विदेश मंत्रालय में वित्तीय मामलों का विदेशों में मिला दायित्व शामिल है. इसके अलावा वे वर्ल्ड बैंक के बहुत ही अच्छा माने जाने वाले पद पर 01/11/2007 से 31/10/2010 करीब तीन साल नियुक्त रहे जिसमे वेतन के अतिरिक्त बाहरी करेंसी में भारी भत्ते मिलते हैं

8. इसके बाद श्री उस्मानी 09/09/2012 से 02/06/2014 तक उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव रहे

उपरोक्त सभी तथ्य यह स्पष्ट कर देते हैं कि श्री जावेद उस्मानी अपने कैरियर में एक बहुत ही अधिक सफल अधिकारी रहे जो कई बार विदेशों में भी विशेष भत्ते वाले पदों पर तैनात रह चुके हैं. स्पष्ट है कि ऐसे में यह कत्तई नहीं माना जा सकता कि श्री उस्मानी को किसी भी प्रकार की कोई भी वित्तीय समस्या होगी.

जहां तक जनहित का प्रश्न है, जैसा मैंने ऊपर निवेदन किया, श्री उस्मानी लगातार कैरियर आधारित रहे और ऐसे में मुख्य सूचना आयुक्त का पद भी उन्होंने तभी चाहा जब उन्हें मुख्य सचिव पद से हटा दिया गया था. उनकी कभी जीवन भर किसी पारदर्शिता के कार्यों में कोई भी शिरकत या भूमिका नहीं रही. इसके विपरीत संवेदनशील और पावरफुल स्थानों पर तैनाती के कारण वे अनवरत गोपनीयता के साथ कार्य करने का ही काम करते रहे जिसमे मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री आदि के सभी संवेदनशील और गोपनीय आदेशों का क्रियान्वयन उनके द्वारा चुपके से प्रशासनिक मशीनरी द्वारा करवाया जाता रहा. ऐसे में उन्होंने पारदर्शिता के लिए कार्यरत मुख्य सूचना आयुक्त का पद भी मात्र अपने कैरियर के लिहाज से चुना. इसमें किसी भी प्रकार की लोक कल्याण अथवा लोकहित की भावना कहीं से नहीं.

जाहिर है ऐसे मामले में श्री उस्मानी को भारत के राजकोष से बाईस लाख रुपये माफ़ किया जाना किसी भी प्रकार से उचित नहीं माना जाएगा और पूरी तरह से सार्वजनिक कोष का एक निजी व्यक्ति के हित में उपयोग होगा. अतः मैं आपसे निवेदन करुँगी कि श्री जावेद उस्मानी के मामले में उनके द्वारा अपने ऊपर के 22 लाख रुपये अध्ययन अवकाश के भत्ते आदि से जुड़े बांड की जो धनराशि है, उसे किसी भी स्थिति में माफ़ नहीं करें क्योंकि यह सीधे-सीधे एक सफल और आर्थिक रूप से सुदृढ़ आईएएस अफसर के लिए जनता के पैसे को लूटाने जैसा होगा और इससे किसी भी प्रकार का जनहित सिद्ध नहीं होगा. 

भवदीय
डॉ नूतन ठाकुर
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
#94155-34525



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