नई दिल्ली: इंडियन एक्सप्रेस ने गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, जिसमें कोर्ट ने समाचार पत्र द्वारा प्रकाशित माफीनामे को खारिज करते हुए एक नया माफीनामा प्रकाशित करने का निर्देश दिया था। यह मामला कथित तौर पर कोर्ट कार्यवाही की “झूठी और विकृत रिपोर्टिंग” से जुड़ा है।
गुजरात हाईकोर्ट ने 13 अगस्त 2024 को इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया और दिव्य भास्कर के क्षेत्रीय संपादकों को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा था कि अल्पसंख्यक सहायता प्राप्त संस्थानों के अधिकारों से जुड़ी सुनवाई की रिपोर्टिंग में गलत तथ्य क्यों प्रकाशित किए गए।
तीनों समाचार पत्रों ने बाद में कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर माफ़ी मांगी थी, लेकिन हाईकोर्ट इस पर असंतुष्ट रहा। इसके बाद 22 अगस्त 2024 को मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल की अध्यक्षता वाली पीठ ने आदेश दिया कि अखबारों को स्पष्ट और प्रमुख रूप से माफीनामा प्रकाशित करना होगा, जिसमें यह साफ तौर पर दर्शाया जाए कि रिपोर्टर और संपादक की रिपोर्टिंग गलत थी।
हालांकि, 23 अगस्त को प्रकाशित माफीनामे को कोर्ट ने “बहुत छोटा” बताते हुए नकार दिया। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने सवाल किया—“आपने यह माफीनामा बोल्ड अक्षरों में क्यों नहीं छापा?”
अब इंडियन एक्सप्रेस ने इस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। सोमवार को जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने इंडियन एक्सप्रेस की याचिका को टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रकाशक बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड की याचिका के साथ जोड़ते हुए एक साथ सुनवाई करने का निर्णय लिया है।
सुप्रीम कोर्ट पहले ही सितंबर 2024 में टाइम्स ऑफ इंडिया की याचिका पर सुनवाई करते हुए गुजरात हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा चुका है। कोर्ट ने कहा था, “आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक रहेगी, लेकिन संबंधित रिट याचिकाएं कानून के अनुसार आगे बढ़ेंगी।”
यह मामला प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की गरिमा और रिपोर्टिंग की शुद्धता से जुड़े अहम सवाल उठाता है। अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या निर्णय देता है।



