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सुख-दुख

प्यारे इरफान की आवाज ‘अबे कहां हो’, और विधि की संजीदगी.. दोनों यादों में ही रहेंगे!

नवीन पांडेय-

‘अबे मुझे कोई बड़े अखबार में नौकरी नहीं देगा’। ‘तुम ठहरे ब्राह्मण’। ‘ऊपर से स्मार्ट भी हो’। मैं कहता था।

अबे, ऐसा नहीं है। तुम एक दिन जरूर किसी बड़े अखबार में नौकरी करोगे। मुस्कुराता था। सिगरेट की एक कश लगाता था और धुंआ आसमान की ओर उछालकर कहता था. भाई तुम जैसे सब नहीं हैं. जाति-धर्म भी अहमियत रखती हैं. इस पर संजीदा संवाद खूब तब हम दोस्तों की होती थी.

यह बात तकरीबन 1999-2000 के बीच की है जब नवसिखिये पत्रकारों या यूं कहिये स्ट्रिंगरों को एक बीट लखनऊ विधानसभा के सामने धरना-प्रदर्शन कवर करने के लिए मिलती थी, वहीं सभी अखबारों के साथी जो हम स्ट्रिंगर मिलते थे, वहीं यह संवाद अक्सर करता था मेरा दोस्त ‘इरफान’ जो कल हमसे जुदा हो गया।

मित्र गोविंद कश्यप का कल रात फोन आया। लेकिन मैं एक विवाह समारोह में था, बदकिस्मती से फोन रिसीव नहीं हो पाया। देर रात हो गई थी। आकर सो गया। सुबह उठा। देखा तो दिमाग सन्न रह गया। मनहूस खबर व्हाट्सअप पर गिरी हुई थी। इरफान का इंतकाल हो गया।

विश्वास ही नहीं हुआ। दोबारा पढ़ा। फिर गोविंद को फोन लगाया। गोविंद ने बताया ब्रेन हेमरेज हो गया था। वेंटीलेटर पर था। जिससे उसकी मौत हो गई। दुख के साथ ही पुराने दिनों की याद यकायक ताजी हो गई। इरफान का वह बेबाक बातचीत। लिट्‌टी-चोखा-भात-दाल साथ खाना। साथ में कई और साथी जैसे विवेक त्रिपाठी, गोविंद, इरफान, सुनील शुक्ला, मैं और बहुत सारे साथी खूब मस्ती करते थे। धरना-स्थल से ही खबरें चुरा लाते थे। क्या आनंद था।

अखबार से बहुत पैसा नहीं मिलता था। लेकिन आनंद और उमंग लिखने का गजब का था। मित्रता गजब की थी। लेकिन वक्त ने ये क्या सुनाया।

जब मैं लखनऊ से उत्तराखंड की ओर आया और लंबे समय तक इरफान आदि से बात नहीं हो पाती थी तो इरफान का फोन आता था। ‘अबे तुम कहां हो, याद भी नहीं करते’। एकदमें पहाड़ी हो गये हो’। लखनऊ भूल गये। फिर बात होती।

मैं वही बार-बार पूछता क्या चल रहा है। किसी बड़े अखबार में ट्राय करो। मैंने उसे कई बार कहा, तुम इधर आ जाओ, बात कर लेता हूं। इधर तुम्हारा बढ़िया हो जाएगा, लेकिन परिवार की जिम्मेदारियों का अहसास करते हुए मुस्कुराते हुए हंसते हुए कहता, भाई यहीं पर जो होगा सो होगा।

बहरहाल, अमर उजाला में नौकरी मिली लेकिन उसकी काबिलियत उससे कहीं अधिक की थी। फिर अपने छोटे भाई के लिए शायद मुझे याद है कपड़े की एक दुकान या फैक्ट्री भी लखनऊ में उसने लगाई। ताकि वह सेटल हो जाए, लेकिन वह बहुत नहीं चला। आर्थिक चोट भी लगी उसे।

हम सब साथियों को दिखाने भी उत्साह से लखनऊ में ले गया था। बेहद उत्साही और एनरजेटिक था हमारा इरफान। मुस्कान चेहरे पर रहती थी। क्लीन सेव रहता था। चश्मा आंखों पर चढ़ा रहता था। पतला-दुबला तब जैसा था अब भी वैसा ही था।

आज सेल्फी का जमाना है, आज हमारे पास उस दोस्त की दोस्तों के साथ एक तस्वीर भी नहीं है कि उन यादों को पोस्ट कर सकूं। मन बोझिल है। दुखी है। सामान्य तौर पर इतनी लंबी पोस्ट लिखता नहीं हूं। पर मन कर रहा है बस लिखता ही जाऊं।

एक याद हो तब ना, हजारों यादें हैं। अब इरफान ही क्या ईश्वर ने तो एक दिन पहले ही विधि सिंह को भी हमसे छीन लिया। विधि भी हमारे मित्र रहे। संजीदा थे वे। एलबीएस लखनऊ में हम सबने एक साथ लखनऊ में पत्रकारिता की कॉफी हाऊस के पास पढ़ाई की।

अब ईश्वर इस तरह से यदि हमारे साथियों के साथ जुल्म करेगा तो यह मैं अन्याय नहीं क्रूरता समझूंगा। इरफान प्यारे अब तेरी ये आवाज अबे कहां हो, विधि तुम्हारा संजीदा होना, दोनों यादों में ही रहेगा।

इरफान के निधन की खबर…

विधि सिंह का जाना…

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