जागरण की खबर : इसे कहते हैं अनपढ़ पटवारी और बस्ता भारी

दोस्तो, रविवार सुबह ही जब दैनिक जागरण के रेवाड़ी संस्करण के पेज नंबर 3 पर इंसुलेटर फटने से छह घंटे गुल रही बिजली शीर्षक समाचार पढ़ा, तो वास्तव में लगा कि आज पत्रकारिता विषम दौर से गुजर रही है। जिन लोगों को खबर का बेसिक ज्ञान नहीं है, वे लोगों को ज्ञान बांटने का काम कर रहे हैं।

 

पहले आपको बता दूं कि देश तो क्या संसार में कहीं भी 33 हजार केवी की कोई लाइन ही नहीं है। जहां तक मेरी और बिजली विशेषज्ञों की जानकारी है, पूरे विश्व में 800 केवीए से बड़ी बिजली लाइन है ही नहीं। इसके बावजूद दैनिक जागरण इस खबर में 33 हजार केवी की लाइन दिखा रहा है। खबर रिपोर्टर ने लिखी होगी, स्वाभाविक है, ब्यूरो चीफ ने पढ़ा होगा, यह भी स्वाभाविक है। इसके बाद डेस्क पर भी पढ़ी गई होगी, यह भी सतत प्रक्रिया है। 

इसके बावजूद किसी ने यह नहीं सोचा कि महज 33 केवी क्षमता की लाइन को हजार गुणा ज्यादा आखिर कैसे दिखा दिया। यह पत्रकारिता है, यहां सस्ते के चक्कर में झोला छाप लोगों को भी वैद्य बना दिया जाता है। खैर, जैसा भी हो, जो चल रहा है, वही सही है। अनपढ़ पटवारी और बस्ता भारी की कहावत यहां पूरी तरह खरी उतरती है। रिपोर्टर तो बेचारा गलती कर सकता है, परंतु उसका बॉस, डेस्क और संपादक क्या कर रहे हैं, कृपया अपने गिरेबां में झांककर तो देख लें। 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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