
संजय कुमार सिंह
आज मेरे कई अखबारों में चाइल्ड पोर्न देखने को अपराध बना दिये जाने की खबर लीड है तो कानून के दुरुपयोग की खबर भी है। मुझे लगता है कि कोई अपने घर में कंप्यूटर पर, मोबाइल पर अकेले में कुछ भी करे, देखने करने की आजादी होनी चाहिये। वेश्यावृत्ति की इजाजत नहीं थी पर कमरे में किसी के साथ सेक्स करने पर रोक नहीं थी। चूंकि पैसे ले-देकर सेक्स करना अपराध था और सरकार वेश्यावृत्ति नहीं रोक पाई तो नियम बना दिया गया कि होटल के कमरे पति-पत्नी को ही दिये जायेंगे। नियम चाहे ऐसा न हो होटल के कमरे के लिए परिचय पत्र मांगना ऐसा ही है। व्यावहारिक तौर पर पुलिस की नालायकी की सजा नागरिकों, होटल व्यवसायियों को मिली। अब चाइल्ड पोर्न पर नये आदेश से भी यही होगा। पुलिस के अधिकार बढ़ जायेंगे और जनता को लूटना आसान हो जायेगा। सरकार को जनहित की बात करनी चाहिये तो वह अदालत से मिलकर ऐसे कानून बनवा ले रही है कि जनता का जीना ही मुश्किल हो जाये। चाइल्ड पोर्न अगर मना है तो उपलब्ध क्यों है?
उसकी उपलब्धता रोकना सरकार का काम है। वह नहीं रोक पाती है (क्योंकि उसे और उसकी एजेंसियों को पैसे मिलते हैं) तो कानून ऐसा बना दिया कि जिम्मेदारी जनता की होगी। इसमें पुलिस को जनता को लूटने का नया तरीका मिला और सरकार को नागरिकों को नियंत्रित करने और विरोधियों को परेशान करने का एक नया अधिकार भी। जो सरकार जेल में बंद नागरिक को स्ट्रॉ नहीं देकर परेशान कर चुकी है उसे घर में बंद कमरे में अकेले चाइल्ड पोर्न देखने के नाम पर परेशान करने के अधिकार मिल गया है। होगा यह कि पुलिस जिसे चाहेगी उसे फंसा देगी। बेडरूम में झांकने के अधिकार होने का दावा करेगी और उचित अनुचित तरीकों से निगरानी कर सकेगी। आदमी बदनाम होगा और सबको पता है कि अपराध साबित नहीं हो तो पुलिस का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। पोर्न देखने वाला चाइल्ड पोर्न में फंसा दिया जाये तो क्या करेगा? अभी भी पोर्न देखने वालों को ठगने-लूटने के कई मामले हैं और संबंधित खबरें मिल जायेंगी। सरकार का काम था कि वह नागरिकों को सुरक्षा दे पर पोर्न देखने वाले सुरक्षा क्या मांगेंगे और दूसरे मामलों में जो मांग रहे हैं उन्हें कौन सी मिल गई है।

सबको पता है कि अभी तक पोर्न देखना मना नहीं था फिर भी देखने वाले जानते हैं और बताते हैं कि फिल्म देखते हुए अचानक पॉप अप आ जाता है कि आपका कंप्यूटर ब्लॉक कर दिया गया है। इसमें न सिर्फ पोर्नोग्राफी बल्कि बाकी सब भी देखने का आरोप लगा होता है जैसे सब मना हो। देखने वाले को भी लगता है कि बंद कमरे में उसे यह सब करते हुए किसी ने देख लिया और स्वाभाविक तौर पर वह डर जायेगा उससे 30,000 रुपये की फाइन मांगी जाती है और उसे क्रेडिट / डेबिट कार्ड से भुगतान करने के लिए कहा जाता है। कई लोग यह भुगतान कर ठगे जा चुके हैं। सरकार को चाहिये कि वह ऐसा ठगों-लुटेरों को पकड़े तो उसे बंद कमरे में फिल्म देखने वालों की चिन्ता है क्योंकि उसे बाल अधिकारों का रक्षक बनना है। अदालतें भी सरकार के साथ हैं तो फैसला आ गया। अब जो नहीं लूटे जा सके थे वो भी लूटे जायेंगे। उसमें भी दिलचस्प यह है कि अगर आपने कोई लिंक खोला और उसमें चाइल्ड पोर्न हो तो पुलिस को सूचना देने की जिम्मेदारी आपकी है।
आप जानते हैं कि उड़ीशा के भरतपुर थाने में अपने साथ हुए हादसे की शिकायत करने गई महिला अधिवक्ता के साथ क्या हुआ। वह सेना के अधिकारी की मित्र और सेना के रिटायर अधिकारी की बेटी है और सेना के अधिकारी के साथ गई थी तब जो हुआ उसका बचाव भी किया गया है और नये बने थाने में सीसीटीवी कैमरा नहीं था उसके लिए थाने का स्टाफ तो दोषी नहीं होगा और किसी के खिलाफ कार्रवाई की खबर नहीं है। इसका कारण यह भी हो सकता है कि समाज और मीडिया ऐसा ही है पर उस समाज में जहां एफआईआर लिखाना कठिन है, नागरिकों पर लिंक की शिकायत करने की जिम्मेदारी डाली जा रही है जबकि बहुतों को इसका पता भी नहीं चलेगा। लेकिन नागरिकों के पास उपाय क्या है? आइये आपको पुलिस की मनमानी और नागरिकों का हाल बताने वाली आज की कुछ खबरें बताऊं।
सबसे दिलचस्प खबर नवोदय टाइम्स में है। डबल इंजन वाले मध्य प्रदेश के इंदौर की इस खबर का शीर्षक है, सड़क के गड्डे में हादसा, कोमा में महिला …. और केस पति पर। खबर के अनुसार, सड़क पर गड्डे के कारण स्कूटर की दुर्घटना में घायल महिला कोमा में है। पुलिस ने उसके पति के खिलाफ लापरवाही से गाड़ी चलाने का मामला दर्ज किया है। खबर के अनुसार, इस पर सवाल उठने के बाद पुलिस का कहना है कि वह नगर निगम को पत्र लिखकर पूछेगी कि संबंधित सड़क के रख-रखाव के लिए कौन सी एजेंसी जिम्मेदार है। इंदौर की पुलिस को जब तक यह पता नहीं चलता है कि वहां की किस सड़क के रख-रखाव के लिए कौन जिम्मेदार है (पूरा निगम जिम्मदार होता तो व्यवस्था ऐसी क्यों होती)। इसलिए बलि का बकरा ढूंढ़ा जायेगा जिससे सौदेबाजी करके उसे भी बचाने के उपाय किये जाएं तब तक बलि का बकरा स्कूटर चालक पति है ही। पुलिस की चली तो पति पर दहेज मांगने और नहीं देने पर दुर्घटना करके मारने की कोशिश का मामला भी चल सकता है। साबित न हो तो उसके खिलाफ कोई कार्रवाई होनी नहीं है और जो व्यवस्था है उसमें सजा तो साबित नहीं होने पर भी हो ही जाती है।
दूसरी दिलचस्प खबर द टेलीग्राफ में है। यहां चाइल्ड पोर्नोग्राफी की खबर दो कॉलम में लीड है। फ्लैग शीर्षक में बताया गया है कि गलती से चाइल्ड पोर्नोग्राफी की लिंक खुल जाये तो पुलिस को रिपोर्ट करना जरूरी है। इस खबर के साथ पांच कॉलम में राहुल गांधी के जम्मू व कश्मीर में चुनाव प्रचार की खबर है। दो कॉलम में राहुल गांधी की फोटो है और शीर्षक है, प्रधानमंत्री से काम की बात नहीं। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री अगर एक तरफा मन की बात ही करेंगे तो देश में कानून भी उन्हीं के मन की होंगे और ऐसे कई कानून बने हैं। संसद बनाये या अदालत। दिलचस्प यह भी है कि कश्मीर में चुनाव प्रचार की यह खबर किसी दूसरे अखबार में इतनी प्रमुखता से नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सिंगल कॉलम में है। शीर्षक है, राहुल गांधी ने रैलियों में कहा, जम्मू और कश्मीर को फिर से राज्य का दर्जा दिलाने के लिए प्रतिबद्ध। प्रधानमंत्री के विदेश दौरे के प्रचार और प्रशंसा के पुल आम हैं।
इसी क्रम में एक खबर पीएमओ में बैठक की है। नवोदय टाइम्स में टॉप पर दो कॉलम की खबर का शीर्षक है, “प्रदूषण घटाना है तो ईवी (इलेक्ट्रीक व्हेकिल या वाहन) अपनाना होगा”। आप जानते हैं कि प्रदूषण नियंत्रण, पर्यावरण संरक्षण के नाम पर तरह-तरह के कानून बनाये गये हैं। गाड़ियों में महंगे और शीशा रहित पेट्रोल से लेकर डीजल वाहनों और इंजन पर प्रतिबंध तथा दिल्ली में ऑड-इवन जैसे प्रयोग किये जाते रहे हैं। यह सब तब जब 15 साल से पुरानी गाड़ियों को चलने की अनुमति नहीं है (सरकारी चल रही हैं)। आम जनता के लिए यह सब बेहद महंगी मजबूरी है और इससे राहत के लिए मेट्रो का किराया नहीं बढ़ा जाता तो लगता कि सरकार भी गंभीर है। लेकिन सरकार की गंभीरत बताने वाली खबर आज ही इंडियन एक्सप्रेस में है। इसके अनुसार, प्रदूषण बोर्ड में सभी पदों का लगभग आधा खाली है, कुछ तो दशकों से। 11 राज्यों में 60 प्रतिशत से ज्यादा रिक्तियां हैं, सिक्किम में 100 प्रतिशत। यह जानकारी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को दी है।
पीएमओ कार्यालय से जारी विज्ञप्ति के अनुसार, प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ पीके मिश्रा ने दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण पर उच्चस्तरीय टास्क फोर्स की बैठक की अध्यक्षता की। इसमें दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण को रोकने और कम करने के लिए किए जा रहे विभिन्न उपायों की समीक्षा की गई। एनसीआर क्षेत्रों में ई-वाहनों को अपनाने और ईवी चार्जिंग के बुनियादी ढांचे को विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। प्रधान सचिव ने पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में धान की पराली जलाने की प्रथा को खत्म करने की प्रतिबद्धता सुनिश्चित करने के लिए कहा है। समीक्षा बैठक में दिल्ली-एनसीआर में प्रतिकूल वायु गुणवत्ता के मुद्दे से निपटने के लिए तैयारियों में सुधार के लिए विभिन्न कदम उठाने का निर्णय लिया गया। आप समझ सकते हैं कि यह सब क्यों है।
अगर प्रदूषण घटाना जरूरी है और उसके लिए मौजूदा वाहनों को देर-सबेर बदलना है तो उसमें प्रदूषण बोर्ड के पद भरे होने का अपना महत्व है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर अगर यह बताती है कि पद खाली हैं तो टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर बताती है कि देश में बेरोजगारी की दर यथाावत है। इसमें कोई कमी तो नहीं ही आई है, वृद्धि भी नहीं हुई है सो गनीमत है। हालांकि, खबर में कहा गया है कि महिलाओं के लिये बेरोजगारी की दर बढ़ी है और यह पिछले साल के 2.9 से बढ़कर इस साल 3.2 प्रतिशत हो गई है। युवाओं में बेरोजगारी की दर 10 प्रतिशत से बढ़कर 10.2 प्रतिशत हुई है। बेरोजगारी पर यह एक महत्वपूर्ण खबर है लेकिन दूसरे अखबारों में इतनी प्रमुखता से नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि देश में बेरोजगारी बढ़ने के कई कारणों में एक भिन्न कारणों से स्वरोजगार की संभावना कम होना है। इनमें शर्तें और नियम मुश्किल करना शामिल है। दूसरी ओर, लाखों शेल कंपनियों को बंद करने और एफसीआरए लाइसेंस रद्द किये जाने से गैर सरकारी संगठन भी अपने काम नहीं कर पा रहे हैं। इनमें नौकरियां कम हुई हैं और जरूरत मंदों को मिल सकने वाली सहायता भी। इनके बीच पीएम केयर्स होने से पैसे वहां जा रहे होंगे, सो अलग।
लड्डू में मिलावट के लिए घी बनाने वालों को नोटिस
आप जानते हैं कि तिरुपति मंदिर के प्रसाद में मिलावट उसे बनाने के लिए उपयोग में लाये जाने वाले घी के कारण था। घी (सबसे) सस्ता खरीदा जाता था उसमें मिलावट था और उसपर ऐसा हंगामा मचा जो एक राज्य (मणिपुर) के एक साल से भी ज्यादा समय से जलते रहने, सैकड़ों मौतें, महिलाओं के साथ अमानवीय अत्याचार और अपमान तथा सदी के सबसे बड़े घोटाले को लेकर छपी कुल खबरों और नाराजगी से बहुत ज्यादा है। भाजपा राज में ऐसे मुद्दों को हवा दिये जाने के कारण ही दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी ने एक्स पर लिखा और वह फोटो के साथ नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर है। यह खबर और फोटो सिर्फ कोलकाता के द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर नहीं है। अकेले द हिन्दू में सिंगल कॉलम में है। मुख्यमंत्री ने लिखा है, आज मैंने दिल्ली के मुख्यमंत्री की ज़िम्मेदारी सँभाली है। आज मेरे मन में वो ही व्यथा है जो भरत के मन में थी जब उनके बड़े भाई भगवान श्री राम 14 साल के वनवास पर गए थे, और भरत जी को अयोध्या का शासन सँभालना पड़ा था। जैसे भरत ने 14 साल भगवान श्री राम की खड़ाऊँ रख कर अयोध्या का शासन सम्भाला, वैसे ही मैं 4 महीने दिल्ली की सरकार चलाऊँगी…।
अमर उजाला ने पहले पन्ने पर यह भी छापा है, श्रीराम से तुलना पर भड़की भाजपा और कांग्रेस। कहने की जरूरत नहीं है कि आम आदमी पार्टी जो कर रही है वह भाजपा की राजनीति का जवाब ही है। और मकसद भड़काना भी है। मुझे लगता है कि आम आदमी पार्टी अपने मकसद में कामयाब रही है। सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा गर्माया रहा और इसमें लोग यह भूल गये कि ऐसी राजनीति और पत्रकारिता की शुरुआत (जो मुझे याद है) “इस थाने में अफसर की कुर्सी पर विराजते हैं भगवान” से हुई थी। तब बताया गया था कि, उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एक पुलिस स्टेशन ऐसा है, जहां ऑफिसर की कुर्सी पर बाबा काल भैरव विराजते हैं। अफसर बगल में कुर्सी लगाकर बैठते हैं। सालों से इस स्टेशन के निरीक्षण के लिए कोई आईएएस, आईपीएस नहीं आया। ऐसे थानों और खबरों के देश में आज हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार, एफएसएसएआई ने तिरुपति के लड्डू के लिए घी की आपूर्ति करने वाले को कारण बताओ नोटिस भेजा है।
एफएसएसएआई का काम (सरकार की तरफ से) यह सुनिश्चित करना है कि बाजार में बिकने वाले खाद्य पदार्थों का निर्माण नियमानुसार हो और उनकी गुणवत्ता व स्तर का पालन किया जाये। हम आप बाजार से जो घी खरीदते हैं वह खाने के लिए ठीक हो यह सुनिश्चित करना सरकार का काम है और यह काम करने वाला विभाग एफएसएसएआई है। अगर बाजार में खराब घी है या कोई खराब घी की आपूर्ति कर रहा है तो जिम्मेदारी एफएसएसएआई की भी है। जाहिर है, उसकी मिलीभगत हो सकती है। कार्रवाई एफएसएसएआई के खिलाफ भी होनी चाहिये कम से कम जांच करने का अधिकार तो उसे नहीं ही है और अगर वही जांच करे तो इसका मतलब हुआ कि जो जांच उसे पहले करना था वो नहीं की गई, मामला पकड़ा गया तो की जा रही है और ग्राहकों के लिए गुणवत्ता सुनिश्चित करने में जो लापरवाही हुई उसके लिए कोई कार्रवाई नहीं हुई। मिलावट अलग अपराध है उसके लिए सजा होने से बात नहीं बनेगी। आगे व्यवस्था ठीक से लागू हो उसके लिए एफएसएसएआई के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है। मंदिर ने तो एफएसएसएआई प्रमाणित सबसे सस्ते उत्पाद को खरीदा है। उसे सही उत्पाद मिलने की गारंटी थी जो पूरी नहीं हुई है।



