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सुख-दुख

शोषितों के लिये जीवन भर लड़ने वाले वरिष्ठ पत्रकार की मौत के समय कोई करीब न था

पाली (हरदोई) कस्बा निवासी वरिष्ठ पत्रकार जय प्रकाश मिश्रा (जे.पी.) का मंगलवार भोर में निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। जे.पी. मिश्रा पाली नगर सहित क्षेत्र की ऐसी शख्सियत थे जिनकी कलम हमेशा निष्पक्षता और निर्भीकता से गरीब, निर्बल, असहाय , शोषित के पक्ष में खडी दिखी। उनके निष्पक्ष और तथ्यपरक लेख से प्रशासन की नींद हराम रहती थी। हरदोई जनपद के कस्बा पाली के जमीदार रहे भोला सर्राफ के पौत्र जे.पी. मिश्रा ने धन दौलत को कभी तरजीह नहीं दी।

पूरा जीवन समाज हित में समर्पित रहे। दैनिक नवजीवन से पत्रकारिता की शुरुआत की तब कस्बे में मात्र यही समाचार पत्र आता था, वह भी दोपहर के बाद। कई वर्षों तक नवजीवन में लिखने के बाद दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र के माध्यम से अपनी कलम का लोहा शासन प्रशासन सहित पाली के मठाधीशों को मनवाया। निष्पक्ष और निर्भीक जेपी मिश्रा हमेशा सच के पाले में खड़े दिखे।

गलत करने वाला प्रशासनिक अधिकारी रहा हो या स्वयं उनके पिता जी, उन्होंने हर पटल पर गलत का विरोध किया। जे.पी. मिश्रा एक निडर पत्रकार के रुप में जाने गये। पत्नी की मौत के बाद जे.पी. मिश्रा ने दैनिक जागरण समाचार पत्र को अलविदा कह दिया पर उनकी कलम हमेशा ही शोषितों के लिये काम करती रही और शोषकों के लिये आग उगलती रही।

उनके लिखे हुऐ प्रार्थना पत्र का मजमून देखकर अधिकारियों को पसीना आ जाता था। उनका लिखा हुआ पत्र लेकर गये व्यक्ति से अधिकारी एक बार पूछता जरूर था कि यह पत्र किसने लिखा। वह कानून के अच्छे जानकार थे। उनके द्वारा किये गये पत्राचार में कानूनी निपुणता होती थी।

एक माह पूर्व उच्चाधिकारियों को डाक से पत्र प्रेषित कर अपने पिता, भाई, बहन, भांजे, पुत्र पर silent murder का आरोप लगाते हुए कहा था कि उक्त परिजन संपत्ति के लालच में उनको भोजन और इलाज नहीं दे रहे हैं जिससे वह मौत के करीब पहुँच गये हैं। उन्हें कुछ होता है तो पूर्ण दायित्व परिजनों का होगा।

मामले की जांच पाली थाना पुलिस और स्वास्थ्य विभाग ने की तो शिकायत सही पाये जाने पर उन्हें इलाज के लिऐ जिला अस्पताल भर्ती कराया गया। औपचारिक इलाज देकर कुछ दिन बाद उन्हें पुनः घर भेज दिया गया। वह मोहल्ला खारा कुंआ स्थित खंडहर हो चुके पैतृक मकान में अकेले रहेते थे।

वह अपने आप रुखा सूखा खाना स्वयं बनाकर खाते थे। जब न बना पाते तब किसी को नहीं बताते। जब उनके मददगारों को पता चल जाता तो वह खाना दे आते। उनका परिवार मोहल्ला पटियानीम में आधुनिक सुविधाओं में मौज की जिंदगी जी रहा है जबकि वह भोजन और इलाज के अभाव में तड़प तड़प कर दूर चले गये। जब उनका निधन हुआ तब उनके पास कोई नहीं था जबकि वह जीवन भर दूसरों के साथ खड़े दिखते थे।

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