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एक करोड़ रुपये न दे पाने के कारण जिला जज का प्रमोशन हाईकोर्ट जज के लिए नहीं हो सका!

Amitabh Thakur : हाई कोर्ट जज नहीं बने एक सज्जन की गाथा… भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर एम लोढ़ा द्वारा कई बार कोलेजियम व्यवस्था की जबरदस्त वकालत की गयी थी. बहुधा न्यायपालिका के चोटी के लोगों द्वारा ऐसी बातें कही जाती हैं कि यदि न्यायपालिका की नियुक्ति में बाहरी हस्तक्षेप शुरू कर दिया गया तो बड़ा नुकसान हो जाएगा और न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जायेगी. हम सब इस बात से सहमत हैं कि जजों के बारे में सबसे बेहतर जानने वाले जज ही होंगे और इस बात से भी मेरी सहमति है कि जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में जजों की भी भूमिका होनी चाहिए. लेकिन साथ ही इस बात से मैं व्यक्तिगत रूप से गहरी नाइत्तेफाकी रखता हूँ कि यह नियुक्ति प्रक्रिया ढकी-छिपी हो जैसा मौजूदा समय में देखने को मिलता है.

Amitabh Thakur : हाई कोर्ट जज नहीं बने एक सज्जन की गाथा… भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर एम लोढ़ा द्वारा कई बार कोलेजियम व्यवस्था की जबरदस्त वकालत की गयी थी. बहुधा न्यायपालिका के चोटी के लोगों द्वारा ऐसी बातें कही जाती हैं कि यदि न्यायपालिका की नियुक्ति में बाहरी हस्तक्षेप शुरू कर दिया गया तो बड़ा नुकसान हो जाएगा और न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जायेगी. हम सब इस बात से सहमत हैं कि जजों के बारे में सबसे बेहतर जानने वाले जज ही होंगे और इस बात से भी मेरी सहमति है कि जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में जजों की भी भूमिका होनी चाहिए. लेकिन साथ ही इस बात से मैं व्यक्तिगत रूप से गहरी नाइत्तेफाकी रखता हूँ कि यह नियुक्ति प्रक्रिया ढकी-छिपी हो जैसा मौजूदा समय में देखने को मिलता है.

कोलेजियम व्यवस्था के मौजूदा अपारदर्शी ढंग के खतरों को दर्शाने के लिए मैं सुरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, तत्कालीन जिला जज, भदोही का एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहूँगा जिनसे हाई कोर्ट में प्रोन्नति हेतु कोलेजियम के एक सदस्य द्वारा कथित रूप से एक करोड़ रुपये मांगे गए थे. यह घटना अक्टूबर 2011 से फ़रवरी 2012 के दौरान की थी, जब मैं जिला जज साहब के सगे छोटे भाई प्रमोद श्रीवास्तव के साथ रूल्स एवं मैनुअल्स कार्यालय लखनऊ में तैनात था. मुझे आज भी अच्छी तरह याद है कि कैसे पहले दिन प्रमोद श्रीवास्तव ने बल्लियों उछलते हुए मुझे बताया था कि उनके भाईसाहब आये हैं, कोलेजियम के सदस्य महोदय से बात हुई है, पैसा जमा किया जा रहा है, वे भाईसाहब के साथ पैसा लेने जा रहे हैं आदि. मुझे यह भी याद है कि कैसे अगले दिन प्रमोद श्रीवास्तव काफी मायूस दिख रहे थे कि पैसे की मांग बहुत अधिक हो गयी है, भैया उतना पैसा नहीं दे पायेंगे और लगता है भैया का पैसे के अभाव में हाई कोर्ट में प्रमोशन नहीं हो पायेगा आदि.

श्री श्रीवास्तव अब अवकाशप्राप्त हो चुके हैं और यह सच्चाई है कि वे कभी हाई कोर्ट जज नहीं बन सके थे. मैं नहीं जानता कि उनका हाई कोर्ट में प्रोमोशन क्यों नहीं हुआ था, क्या वास्तव में उनका प्रोमोशन होने वाला था या नहीं, उनसे पैसे मांगने वाला व्यक्ति कौन था आदि पर इतना अवश्य जानता हूँ कि जितनी बाद मैंने यहाँ कही है उसमे शत-प्रतिशत सच्चाई है और मैं इन्हें किसी भी जगह सशपथ कहने को तैयार हूँ. मैंने आज इन तथ्यों को प्रस्तुत करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश से इन्हें सत्यापित कराये जाने और न्यायिक नियुक्ति प्रणाली में पर्याप्त पारदर्शिता लाने की प्रार्थना की है ताकि भविष्य में ऐसे किसी कथित दुरुपयोग की सम्भावना समाप्त हो जाये क्योंकि यह स्वाभाविक है कि जहां अपारदर्शिता होगी वहां उसके दुरुपयोग की भी पूरी संभावनाएं होंगी. फिर औरों की तुलना में किसी एक व्यक्ति को जज लायक क्यों चुना गया है, इसे बताने में दिक्कत क्या है, यह मैं नहीं समझ पाता?
   
वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के फेसबुक वॉल से.

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