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उत्तर प्रदेश

लोकायुक्त जस्टिस संजय मिश्रा और उप लोकायुक्त शंभू सिंह यादव के खिलाफ एसएलपी दाखिल

लखनऊ- आजाद अधिकार सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमिताभ ठाकुर ने यूपी के लोकायुक्त और एक उप लोकायुक्त के निर्धारित अवधि से अधिक अवधि तक अपने पद पर बने रहने के संबंध में इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनऊ बेंच के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी याचिका दायर किया है.

अपनी याचिका में उन्होंने कहा है कि जिस समय इन लोकायुक्त और उपयोग आयुक्त की नियुक्ति की गई थी, उस समय उत्तर प्रदेश लोकायुक्त तथा उप लोकायुक्त एक्ट की धारा 5 के अनुसार लोकायुक्त तथा उप लोकायुक्त का कार्यकाल 8 वर्ष का था.

वर्तमान समय में यूपी के लोकायुक्त जस्टिस संजय मिश्रा पिछले 9.5 वर्षों से इस पद पर हैं और उप लोकायुक्त शंभू सिंह यादव भी 9 वर्ष से पद पर हैं.

अमिताभ ठाकुर ने इन्हें उत्तर प्रदेश लोकायुक्त एक्ट के विपरीत बताते हुए हाईकोर्ट मैं याचिका किया था जिसे हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया.

अब अमिताभ ठाकुर ने हाई कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर लोकायुक्त और एक उप लोकायुक्त को समय अवधि पूर्ण होने के कारण पद से हटाए जाने की प्रार्थना की है.


क्या होता है एसएलपी?

एसएलपी (SLP) का मतलब है – Special Leave Petition (विशेष अनुमति याचिका)।

आसान भाषा में समझिए:

यह भारतीय संविधान की धारा 136 के तहत दी गई एक विशेष व्यवस्था है।

अगर किसी व्यक्ति/संस्था को लगता है कि हाईकोर्ट, ट्रिब्यूनल या किसी अन्य न्यायिक निकाय का फैसला गलत या न्याय के विरुद्ध है, तो वह सीधे सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े पर एसएलपी दाख़िल कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट हर एसएलपी पर सुनवाई के लिए बाध्य नहीं है। कोर्ट चाहे तो अनुमति दे, चाहे तो खारिज कर दे।

यानी एसएलपी एक तरह से “दरवाज़ा खटखटाने का अधिकार” है, न कि अपील का स्वचालित हक़।

जब सुप्रीम कोर्ट यह अनुमति दे देता है, तो एसएलपी “Appeal” (अपील) में बदल जाती है।

क्या आप चाहेंगे कि मैं आपको एक उदाहरण केस के ज़रिए SLP को समझाऊँ ताकि यह और स्पष्ट हो जाए?

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