
अरविन्द केजरीवाल को जमानत पर छोड़ा जाना सरकार या भाजपा समर्थक मीडिया से संभल नहीं रहा है। कल मैंने लिखा था कि उनके रिहा होने से ज्यादा महत्वपूर्ण था तानाशाही खत्म करने में सहयोग मांगना और मोदीराज को तानाशाही कहना। पर खबर रिहाई की थी। व्हाट्सऐप्प पर यह प्रचार था कि केजरीवाल को रिहा करने वाले भाजपा के खिलाफ अभियान में शामिल हो गये हैं। वैसे, कल एक वीडियो भी आया जिसमें कहा गया है कि केजरीवाल को जमानत नहीं मिली है और जो मिला है वह परोल है हालांकि इसी वीडियो में उसी सज्जन ने कहा है कि परोल सजायाफ्ता अभियुक्त को मिलता है और यह परोल भी नहीं है। हालांकि, इससे भक्तों का गुस्सा कुछ कम हुआ होगा क्योंकि इसमें कहा गया है कि उन्हें कैदी की तरह फिर समर्पण करना होगा। जो भी हो, रिहाई सरकार समर्थकों के लिए कितनी महत्वपूर्ण है इससे समझा जा सकता है। ऐसे में आज हालत यह है कि कई अखबार उनके आरोप को ठीक से छाप नहीं पाये हैं या उन्होंने जो कहा है उस हल्का कर दिया है। आइये देखते हैं कैसे? उल्लेखनीय है कि 2024 के चुनाव के लिए चौथे चरण का मतदान कल, 13 मई को है। कल चुनाव प्रचार का अंतिम दिन था और आज की खबरें उस लिहाज से भी महत्वपूर्ण हैं।
संजय कुमार सिंह
अरविन्द केजरीवाल को रिहा किये जाने के बाद उनका पहला भाषण बड़ी खबर थी। कल मैंने लिखा था कि ज्यादातर अखबारों ने कल रिहाई को ही बड़ी खबर माना था और उसे ही प्रमुखता दी थी। आज मुझे लगता है कि केजरीवाल ने जो कहा उसे ठीक से प्रस्तुत नहीं किया गया है। केजरीवाल ने साफ कहा है कि नरेन्द्र मोदी तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं, भाजपा के तमाम दिग्गज नेताओं की राजनीति चौपट कर दी अगर जीत गये तो अगला नंबर योगी आदित्यनाथ का है और अभी नरेन्द्र मोदी को वोट देने का मतलब अमित शाह को वोट देना होगा। उन्होंने साफ कहा कि नरेन्द्र मोदी 17 सितंबर को 75 साल के हो जायेंगे और अपने ही बनाये नियम के अनुसार उसके बाद पद पर नहीं रहेंगे और तब अमित शाह प्रधानमंत्री हो जायेंगे। ज्यादातर अखबारों की खबरों से यह संदेश नहीं निकलता है और इस पर अमितशाह के जवाब से भले केजरीवाल को गलत साबित करने की कोशिश और उसका प्रचार किया गया है पर असल में बात सही ही साबित हुई है। अमर उजाला की खबर में संपादकीय पूर्वग्रह साफ नजर आता है। अमर उजाला का संपादकीय पूर्वग्रह कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को चुनाव आयोग के पत्र की खबर में भी कल नजर आ रहा था। तब मैंने उसकी चर्चा नहीं की थी आज उसकी भी करनी पड़ेगी। अरविन्द केजरीवाल ने क्या कहा और क्या छपा है उस पर आने से पहले चुनाव आयोग के पत्र की चर्चा कर लेता हूं।
अमर उजाला में यह खबर कल पहले पन्ने पर चार कॉलम में थी। वैसे तो, इस खबर को जगह चार कॉलम के बराबर दी गई है पर खबर छपी तीन कॉलम में है। शीर्षक है, “खरगे को नसीहत – चुनाव आयोग को लेकर भ्रम न फैलाएं”। उपशीर्षक है, “चुनाव आयोग ने कहा, कांग्रेस अध्यक्ष ने चुनाव प्रक्रिया में बाधा डालने के लिए आंकड़ों पर उठाया सवाल”। चुनाव आयोग, उसके सदस्यों की नियुक्ति और संबंधित प्रक्रिया आदि आप जानते हैं। संपादकों को तो जानना ही चाहिये। ऐसे में प्रधानमंत्री के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने वाले चुनाव आयोग को खरगे को नसीहत देने का कोई हक नहीं है और नसीहत जो है वह सामने है। इसलिए यह ऐसी खबर नहीं थी जैसे अमर उजाला ने कल छापी थी। पर बात इतनी ही होती तो मैंने कल इसकी चर्चा नहीं की थी। दिलचस्प यह है कि आज चुनाव आयोग को खरगे का जवाब खबर है। और वह आज अमर उजाला में पहले पन्ने पर नहीं है। चार कॉलम में तानने की तो बात ही छोड़िये। कहने की जरूरत नहीं है कि नरेन्द्र मोदी तानाशाही की ओर बढ़ रहे हैं। मीडिया के बड़े हिस्से के साथ संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा कर लिया है। ऐसे में अखबारों को जनहित और देशहित का काम करना चाहिये पर वे प्रचारक की भूमिका निभाते लग रहे हैं।

आइए अब अमर उजाला में केजरीवाल के भाषण की प्रस्तुति देख लें। फ्लैग शीर्षक है, “केजरीवाल का सियासी शिगूफा, भाजपा का पलटवार”। इसके तहत दो शीर्षक है। चुनाव की घोषणा के बाद गिरफ्तार कर लिये गये और 50 दिन बाद, दिल्ली चुनाव से पहले, जेल से रिहा किये गये अरविन्द केजरीवाल का बयान, “मोदी अगले साल होंगे रिटायर, शाह के लिए मांग रहे वोट : केजरीवाल” पहला शीर्षक है। इसके साथ दूसरी खबर, इस पर अमित शाह की प्रतिक्रिया है। कायदे से यह प्रतिक्रिया उनकी होनी चाहिये थी जिनका नाम केजरीवाल ने लिया था और कहा था कि अपने बाद इन लोगों की संभावना खत्म करके मोदी अमित शाह के लिए वोट मांग रहे हैं या उन्हें दिया गया वोट असल में अमित शाह को प्रधानमंत्री बनायेगा। अरविन्द केजरीवाल ने यह बात साफ-साफ कही है पर कई अखबारों की खबरों से यह संदेश नहीं जा रहा है और अमित शाह के बयान को बराबार में छाप कर तो आरोप की ही हवा निकालने की कोशिश की गई है जबकि उससे आरोप की पुष्टि हो रही है। शीर्षक है, मोदी 2029 में भी नेतृत्व करेंगे, केजरीवाल दो जून को फिर जेल में होंगे : शाह। यहां यह बताना जरूरी है कि अगले साल सितंबर में मोदी 75 साल के हो जायेंगे। और 75 साल में रिटायर होने का नियम उन्हीं का बनाया हुआ है। उम्र का असर अभी ही उनके भाषणों में दिखने लगा है और कल ही उन्होंने जिलों की राजधानी की बात की। यह कोई पहला उदाहरण नहीं है। 2029 तक क्या होगा अनुमान लगाना भी मुश्किल है उसमें अमित शाह का यह बयान मुझे इतना महत्वपूर्ण नहीं लगता है।
नवोदय टाइम्स में भी दोनों खबरें एक साथ छपी हैं पर यहां शीर्षक में शिगूफा नहीं है। यहां शीर्षक में यह भी नहीं है कि केजरीवाल दो जून को फिर जेल में रहेंगे। ठीक है कि आदेश ऐसा ही है। पर मामला यह है कि केजरीवाल ने अपनी गिरफ्तारी को (पीएमएलए के तहत) चुनौती दी है और चूंकि उसपर सुनवाई पूरी नहीं हुई है, चुनाव में उनका स्वतंत्र होना जरूरी समझा गया इसलिए विशेष स्थितियों में उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने छोड़ा है। कल मैंने लिखा है कि किसी और संवैधानिक एजेंसी (जैसे चुनाव आयोग) ने इसे समझा होता और चुनाव प्रचार के लिए ऐसे ही छोड़ा होता तो यह काम सुप्रीम कोर्ट को नहीं करना पड़ता। तब संवैधानिक संस्थाओं पर सरकार के नियंत्रण की शंका तो नहीं ही होती सुप्रीम कोर्ट को बदनाम करने का मौका भी नहीं मिलता। लेकिन वह सब अलग बात है। अभी मुद्दा यह है कि एक मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी पर अभी तक फैसला नहीं हो पाया है तो आम आदमी को न्याय मिलने में कितनी देर होती होगी और अगर दो जून से पहले गिरफ्तारी पर फैसला हो गया तो संभव है कि केजरीवाल को जेल नहीं जाना पड़े। उन्हें वहां कोई चार्ज तो हैंडओवर करना नहीं है। फिर भी अमित शाह ने कहा है तो शिगूफा यह है, केजरीवाल ने जो कहा वह तो सबको पता है और तथ्य है जिसे अमर उजाला ने खुद तो नहीं ही कहा केजरीवाल के कहने पर शिगूफा करार दिया।
इंडियन एक्सप्रेस ने केजरीवाल के बयान की इस खबर को पांच कॉलम में छापा है। फ्लैग शीर्षक और इंट्रो के साथ दो लाइन का मुख्य शीर्षक है। साथ छपी खबर बता रही है कि केजरीवाल का जवाब भाजपा के बड़े नेताओं ने दिया है और इनमें निर्मला सीतारमन, जेपी नड्डा और योगी आदित्यनाश शामिल हैं। अरविन्द केजरीवाल का बयान या आरोप अगर मुख्य खबर है तो भाजपा का जवाब उसके साथ है और यह एक लाइन के फ्लैग शीर्षक, तीन लाइन के शीर्षक और दो लाइन के उपशीर्षक के साथ दो कॉलम में छपा है। इंडियन एक्सप्रेस में इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, “अंतरिम जमानत पर रिहा होने के एक दिन बाद , 75 साल पर रिटायर होने के प्रधानमंत्री के नियम का उल्लेख किया” (और कहा, मुख्य शीर्षक है) “अगर आप भाजपा को वोट देंगे तो आप (प्रधानमंत्री के रूप में) अमित शाह को वोट दे रहे हैं, मोदी को नहीं : केजरीवाल”। इंट्रो है, “प्रधानमंत्री एक देश, एक नेता के मिशन पर है, विपक्षी नेता गिरफ्तार होंगे, भाजपा वाले हाशिये पर कर दिये जायेंगे”।
भाजपा का जवाब या प्रतिक्रिया दो कॉलम में है। फ्लैग शीर्षक है, “निर्मला, नड्डा, योगी ने भी पलटवार किया”। मुख्य शीर्षक है, “भाजपा के टॉप ब्रास का काउंटर :मोदी तीसरा कार्यकाल खत्म करेंगे, नेता बने रहेंगे।” उपशीर्षक है, “अमित शाह ने कहा, उम्र की कोई सीमा नहीं; विपक्ष घबराहट में, मकसद भ्रम फैलाना है : नड्डा।” मुझे लगता है कि भाजपा नेताओं की राय में अगर 2014 में आडवाणी को साइडलाइन करना सही था और अभी 75 के बाद भी (उम्र का असर दिखने लगा है तब भी) कुर्सी पर बने रहना सही है तो यह देश हित में नहीं है और तानाशाही व्यवस्था का समर्थन है। इसमें, 2014 में आडवाणी को साइडलाइन कर देना और अब भारत रत्न देना शामिल है। ऐसे में केजरीवाल ने जो कहा है वह निराधार नहीं है और उसका खंडन कर देने भर से उनके आरोप की पुष्टि ही हो रही है।

दे टेलीग्राफ ने इस खबर को और अच्छी तरह से प्रस्तुत किया है। खबर लिखने का अंदाज भी बेहतर है। शीर्षक है, आम आदमी पार्टी के नेता ने भाजपा नेताओं में मतभेद पर खेल किया। मुख्य शीर्षक है, केजरी की पीएम गूगली और अमित शाह की प्रतिक्रिया का शीर्षक है, गलत मुद्दे को लपक लिया अमित शाह ने। मैं इसे निष्पक्षता के साथ लिखी खबर कहूं तो आप कह सकते हैं कि द टेलीग्राफ सरकार विरोधी रहा है और इस कारण प्रचारकों की परिभाषा के अनुसार कांग्रेसी या आपिया है। पर मेरी चिन्ता वह सब नहीं है। मैंने कल भाषण सुनने के बाद जो महसूस किया और मुझे खबर लिखनी होती तो मैं जो लिखता उसके सबसे करीब यही खबर है। लोग मुझे केजरीवाल का प्रशंसक कहते ही हैं। वैसे प्रशंसक होने और परोल तथा पेरोल पर होने में फर्क है। हालांकि, वह अंग्रेजी ज्ञान का विषय है, राजनीतिक ज्ञान का नहीं।
टाइम्स ऑफ इंडिया में आज छपी खबर के अनुसार खरगे ने चुनाव आयोग से पूछा है भाजपा नेताओं पर उनकी टिप्पणियों के लिए कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है। मुझे लगता है कि अखबारों का काम निष्पक्ष होना नहीं हो तो भी विपक्ष का साथ देने का है, सरकार का नहीं। संभव है अखबार को सरकार अच्छी लगती हो और उसका काम (विज्ञापन पर पैसे लुटाना समेत) पसंद हो लेकिन उसका काम जनता को जागरूक करना है ताकि वे स्वतंत्र और निष्पक्ष फैसले ले सकें। भारत में हिन्दी भाषी जब कम जागरूक, ज्यादा गरीब और कम पढ़े-लिखे हैं तब हिन्दी अखबारों और संपादकों की यह जिम्मेदारी बढ़ जाती है। ऐसे में कल चुनाव आयोग की खबर नहीं भी छपी होती तो आज खरगे की खबर छपनी चाहिये थी, छप सकती है। पर हो उल्टा रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार खरगे ने यह भी कहा है कि उनका पत्र भले खुला या सार्वजनिक था पर इंडिया समूह के साझेदारों के लिए था न कि चुनाव आयोग को संबोधित था। फिर चुनाव आयोग ने उनके इस खुले पत्र पर प्रतिक्रिया की जबकि कई अन्य शिकायतों को नजरअंदाज किया है जो उसे सीधे दिये गये हैं। खरगे ने जो पत्र लिखा था उसे नागरिकों को बताना अखबारों का काम था। यही नहीं, चुनाव आयोग से सवाल करना और उसका जवाब जनता तक पहुंचाना भी अखबारों का काम था। बेशक, जवाब यह हो सकता है कि उनने जवाब नहीं दिया या मिलने का समय ही नहीं दिया। पर अखबारों की सक्रियता का तो पता चलता। अब अखबारों का काम विज्ञप्ति छापना नहीं है। वह सोशल मीडिया पर बहुत पहले आ जाता है। कहने की जरूरत नहीं है कि मीडिया समय के साथ नहीं चलेगा तो नष्ट हो जायेगा और उसके साथ भी ढेरों रोजगार खत्म हो जायेंगे। पर वह बाद की समस्या है।
अब अरविन्द केजरीवाल के कल के भाषण पर आता हूं। वैसे तो उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस बुलाई थी पर मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा और आज खबर में भी जिक्र है, ‘इतने लोग हैं कि रैली हो गई है’ और नारे तो लग ही रहे थे। जो भी हो, उनका कहा सार्वजनिक है और मैंने भी सुना है इसलिए कह सकता हूं कि उसकी रिपोर्टिंग में अखबारों का पूर्वग्रह दिखता है। वैसे यह सामान्य है और इससे बचना मुश्किल है पर कोशिश तो होनी ही चाहिये और रिपोर्टर / संपादक के पूर्वग्रह का प्रदर्शन खुला हो तो चले पर अश्लील नहीं होना चाहिये। अश्लील तब होता है जब आप लगातार करते हैं हमेशा करते हैं। उदाहरण के लिए आज नवोदय टाइम्स और अमर उजाला की प्रस्तुति की चर्चा कर चुका हूं। इंडियन एक्सप्रेस और द टेलीग्राफ की बात भी हो गई। मुझे लगता है कि दोनों श्रेष्ठ रिपोर्टिंग या प्रस्तुति कही जा सकती है। संभव है इसका कारण रिपोर्टर की योग्यता हो।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने आज पहले पन्ने पर प्रधानमंत्री का इंटरव्यू छापा है और अरविन्द केजरीवाल की खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर है। यहां इसका शीर्षक है, “प्रधानमंत्री आम आदमी पार्टी को कुचलने का प्रयास कर रहे हैं क्योंकि इसका भविष्य मजबूत है : केजरीवाल”। यह भी भाषण की खास बात थी और भाषण की खबर का यह शीर्षक सिर्फ हिन्दुस्तान टाइम्स में है। ज्यादातर अखबारों ने अमित शाह को प्रधानमंत्री बनाने के दावे को प्रमुखता दी है और दिलचस्प यह है कि जवाब भी अमित शाह का ही है। भाजपा ने पार्टी स्तर पर या भाजपा के किसी दूसरे बड़े नेता का जवाब नहीं है। इसमें इंडियन एक्सप्रेस अपवाद है। दिलचस्प यह है कि शीर्षक में मुख्य बात नहीं होने के बावजूद हिन्दुस्तान टाइम्स ने अमितशाह ने खंडन को मूल खबर के साथ जवाब के रूप में छापा है। इसका शीर्षक है, “(नरेन्द्र) मोदी 2029 तक देश का नेतृत्व करेंगे : (अमित) शाह”।
द हिन्दू में इस खबर का शीर्षक है, “क्या मोदी अपना नियम मानेंगे, 75 की उम्र में रिटायर हो जायेंगे, केजरीवाल ने पूछा”। उपशीर्षक है, दिल्ली के मुख्यमंत्री ने भाजपा नेताओं के 75 पार करने पर रिटायर करने के 2014 से चले आ रहे ‘नियम’ का हवाला दिया और कहा कि मोदी के लिए वोट देने का मतलब होगा अमित शाह को अगला प्रधानमंत्री बनाना। अपने भाषण में उन्होंने भाजपा के तमाम बड़े नेताओं का नाम लेकर कहा कि नरेन्द्र मोदी ने उनकी राजनीति खराब कर दी है और हाल में शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जबकि उनके नेतृत्व में राज्य में भाजपा को कामयाबी मिली थी और सरकार बनी थी। आप जानते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा हार गई थी और बाद में विधायक खरीद कर तथा ज्योतिरादित्य सिंधिया से दल बदल करवाकर राज्य में भाजपा की सरकार बनी थी और तब शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने थे। इस बार उनके नेतृत्व में चुनाव हुआ भाजपा जीत गई तो मुख्यमंत्री कोई और बन गया। केजरीवाल ने यह भी कहा था कि अगर भाजपा जीत गई तो अगला नंबर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ का है। दिलचस्प यह है कि केजरीवाल के इस आरोप का जवाब भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा या आरएसएस ने दूसरे किसी वरिष्ठ नेता ने नहीं दिया है जिनका नाम केजरीवाल ने लिया। जवाब अमित शाह ने दिया है जिन्हें केजरीवाल ने मोदी को वोट देने का लाभार्थी बताया है।


