सुप्रीम कोर्ट ने भी माना, पुदुचेरी सरकार और एलजी किरण बेदी के बीच कुछ बवाल है!

उच्चतम न्यायालय भी यह महसूस कर रहा है कि पुदुचेरी सरकार और वहां की उप राजयपाल किरण बेदी के बीच खींचतान चल रही है। उच्चतम न्यायालय के जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस सूर्य कांत की अवकाश पीठ ने कहा कि पुदुचेरी सरकार और राज्यपाल अपनी रस्साकसी अलग रखें। पीठ ने साफ किया है कि पुदुचेरी कैबिनेट के वित्तीय मामलों को प्रभावित करने वाले फैसलों को लागू नहीं किया जा सकता। पीठ ने शुक्रवार को कहा कि वित्तीय मामलों पर असर डालने वाले 7 जून के कैबिनेट के फैसलों पर रोक लगाने का उच्चतम न्यायालय का फैसला फिलहाल जारी रहेगा। पीठ अब सभी मुद्दों पर 10 जुलाई को सुनवाई करेगी।

शुक्रवार को सुनवाई के दौरान पुदुचेरी के वकील कपिल सिब्बल ने अवकाश पीठ के समक्ष कहा कि पिछली बार उच्चतम न्यायालय ने वित्तीय मामलों पर फैसला लागू करने पर रोक लगाया था । 7 जून को कैबिनेट ने 3फैसले लिए हैं जिनमें सभी को मुफ्त चावल योजना भी है, जो पिछले 10 साल से चल रही है। इसके अलावा एक विभाग का नाम बदलना है, जबकि तीसरा फैसला एक बीमार इकाई को नीलाम करने को लेकर है। पुदुचेरी सरकार ने मांग की कि गरीबों को 20 किलो चावल के वितरण को जारी रखने के लिए कैबिनेट के फैसले को जारी रखने की अनुमति दी जाए।लेकिन केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध किया और कहा कि इस फैसले का भारी वित्तीय प्रभाव पड़ेगा। इसके बड़े वित्तीय निहितार्थ होंगे और नियमों के विपरीत होंगे क्योंकि मुफ्त चावल सिर्फ बीपीएल कार्ड धारकों को दिए जा रहे हैं, सभी को नहीं।

गौरतलब है कि 4 जून को उच्चतम न्यायालय ने पुदुचेरी सरकार सरकार को यह निर्देश दिया था कि वो 7 जून को कैबिनेट की बैठक तो कर सकती है, लेकिन इस दौरान सुनवाई की अगली तारीख तक वित्त व भूमि ट्रांसफर संबंधी फैसलों को लागू नहीं कर सकती है। अदालत ने एलजी और मुख्यमंत्री को जारी किए थे नोटिस जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस एम. आर. शाह की अवकाश पीठ ने केंद्र सरकार और पुदुचेरी की उप राज्यपाल किरण बेदी की याचिका पर केंद्र शासित प्रदेश के मुख्यमंत्री वी. नारायणसामी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। सुनवाई के दौरान केंद्र और एलजी की ओर से कहा गया कि सरकार ने 7 जून की कैबिनेट बैठक का एजेंडा तय कर दिया है। लिहाजा इस बैठक पर रोक लगाई जाए। वहीं सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल व अन्य ने इसका विरोध किया था।

दरअसल पुदुचेरी की उप राज्यपाल किरण बेदी “प्रशासनिक अराजकता” का आरोप लगाते हुए उच्चतम न्यायालय पहुंची हैं और उन्होंने मुख्यमंत्री वी. नारायणसामी को वित्त, सेवाओं से संबंधित किसी भी मुख्य कार्यकारी आदेश को तब तक पारित करने से रोकने की मांग की है जब तक कि उच्चतम न्यायालय पुदुचेरी सरकार और उप राज्यपाल के बीच अधिकारों का फैसला ना कर दे। किरण बेदी की अर्जी में यह कहा गया है कि पुदुचेरी में प्रशासनिक अराजकता का माहौल है और अफसरों को समझ नहीं आ रहा है कि वो कोर्ट के आदेशों पर अमल करें या नहीं। उन्हें अवमानना कार्रवाई की धमकी दी जा रही है। वर्तमान में पुदुचेरी में कांग्रेस का शासन है जबकि बेदी की केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासक के तौर पर एनडीए सरकार ने नियुक्ति की है।

उच्चतम न्यायालय ने 11 मई को मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर नोटिस जारी किया था जिसमें कहा गया है कि पुदुचेरी के उप राज्यपाल को निर्वाचित सरकार के दैनिक मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। ये नोटिस पुदुचेरी की उप राज्यपाल किरण बेदी द्वारा दायर विशेष अवकाश याचिका पर जारी किया गया था। 30अप्रैल का मद्रास उच्च न्यायालय ने निर्णायक फैसला देते हुए कहा था कि प्रशासक उन मामलों में मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से बंधे हैं, जहां विधान सभा, केंद्र शासित प्रदेशों के अधिनियम, 1962 की धारा 44 के तहत कानून बनाने के लिए सक्षम है। पुदुचेरी के विधायक के. लक्ष्मीनारायणन द्वारा दायर याचिका पर उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था।फैसले में कहा गया था कि प्रशासक सरकार के दिन-प्रतिदिन के मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। मंत्रिपरिषद और मुख्यमंत्री द्वारा लिया गया निर्णय सचिवों और अन्य अधिकारियों के लिए बाध्यकारी है।उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि प्रशासक के पास इस मुद्दे को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक सिद्धांतों और संसदीय कानूनों को नकारने वाले प्रशासन को चलाने का कोई कोई विशेष अधिकार नहीं है। यह याचिका 4 जुलाई, 2018 के उच्चतम न्यायालय के संविधान पीठ के फैसले के मद्देनजर दायर की गई थी, जिसमें प्रशासन के मामलों में उप राज्यपाल पर दिल्ली की चुनी हुई सरकार की प्रमुखता को बरकरार रखा गया था।कोर्ट की इस हिदायत के बाद उपराज्यपाल किरण बेदी इस केंद्रशासित प्रदेश की सरकार से किसी भी फाइल के बारे में नहीं पूछ सकती हैं। इसके साथ ही वह न तो सरकार को कोई आदेश दे सकती है और न ही सरकार की तरफ कोई आदेश जारी कर सकेंगी। अपने अधिकारों की बहाली के लिए उनके पास उच्चतम न्यायालय का ही सहारा है।

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट.

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