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दिल्ली

अरविंद केजरीवाल से मिलने से पहले कुमार विश्वास क्या थे?

आदित्य कुमार गिरि-

कुमार विश्वास को कितने ही वीडियोज़ में सुन चुका कि मैंने आमआदमी पार्टी बनाई, मैंने अपना करियर छोड़ा, मैं ही था तो पार्टी बनी, मैं मैं मैं मैं….

जबकि सच्चाई यह है कि अरविंद केजरीवाल से मिलने से पहले यह लबार पांच कवियों के मेहनताने सहित पण्डाल आदि सबका ख़र्च मिलाकर दस हज़ार रुपयों में तुकबन्दी करता था। यानी एक कवि सम्मेलन से यह आदमी कोई हज़ार या सात आठ सौ कमाता होगा।

अरविंद केजरीवाल के मिलने के पहले कुमार विश्वास एकदम चापलूस शैली में स्टेज रंगते। उनके अन्ना आंदोलन के पहले के वीडियोज़ देखिए। मंचों पर बुलाने वालों की शान में कसीदे कसने वाला यह एक औसत चापलूस आदमी था। अरविंद से जुड़ने के बाद उनसे चापलूसी गयी और एक खिलंदड़ापन आया। आज जो चटकारे वाली टोन या क्रांति टाइप आवाज़ है वह अरविंद और प्रकारांतर से एक जनआंदोलन से जुड़ने के कारण आई है।

जन आंदोलनों से दृष्टि मिलती है हालांकि अरविंद और कुमार दोनों ने उस आंदोलन को बर्बाद कर दिया। आज अरविंद ख़ुद एक साम्प्रदयिक और अवसरवादी राजनेता बन चुके हैं या कहना चाहिए पहले से ही थे। आंदोलन का इस्तेमाल कर एक खास किस्म का पोलिटिकल करियर बनाना ही उनका उद्देश्य रहा मानो।

फिर भी अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी, नरेंद्र मोदी से ज़्यादा टैलेंटेड हैं। यह इसलिए क्योंकि नरेन्द्र मोदी के पास आरएसएस और हिंदुत्त्व के कारण हिंदुओं की भीड़ है, उन्हें करना कुछ नहीं है बस हिंदुत्त्व के कारण कारवां बढ़ता जा रहा है जबकि एकदम सड़क से उठकर अरविंद ने एक पूरी पार्टी खड़ी कर ली, जमी हुई कांग्रेस को बिना किसी विचारधारा के ख़तम कर दिया और नरेंद्र मोदी और हिंदुत्त्व की आंधी में भी दिल्ली के क़िले को हिलने तक न दिया।

ठीक ऐसे ही जिसके राज में सूर्य अस्त नहीं होता था वैसी पार्टी के धाकड़ नेताओं की उपस्थिति में ममता बनर्जी ने न सिर्फ ख़ुद को स्थापित किया बल्कि 34 साला सी.पी.एम. को ख़तम भी कर दिया।

राजनीति और विचारधारा की जिन्हें समझ है वे जानते हैं कि अरविंद और ममता का क्या महत्व है। भले उनके पास कोई विचारधारा नहीं है लेकिन मध्यवर्ग को उनसे बढिया कोई नहीं पकड़ता। बिना हिंदुत्त्व या किसी धार्मिक क्राउड के वे बार बार सफल हो रहे हैं।

कुमार विश्वास जैसे दक्षिणपंथी लबार के बयान को इतना महत्व देना इस युग के नॉनसेंस माइंड सेट को रिफ्लेक्ट करता है। कुमार विश्वास, सुरेश चौहाण, सुधीर चौधरी, नरेंद्र मोदी इस युग की आवाज़ हैं। यह युग ऐसे ही सेन्सलेस नायकों का युग है। अरविंद भी सेन्सलेस हैं, राजनीति को सारे नॉनसेंसों ने कूड़ा बना दिया है।भारत का वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य बुद्धिहीनता का अड्डा बन चुका है।

इस कठिन समय को प्रगतिशील माइंडसेट से ही ख़तम किया जा सकता है। देर होगी लेकिन कीचड़ को पानी से ही साफ किया जा सकता है।

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1 Comment

1 Comment

  1. Mukesh Kumar

    February 25, 2022 at 5:41 am

    Apki baate sahi hai,par loktantra aisa hi hai,andher nagri chaupat raja take ser chandi take ser khaja apwad modi,Jai jind

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