महिलाओं के मुद्दे पर मीडिया सनसनी न फैलाए – शंकर शरण

भोपाल : वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक शंकर शरण ने कहा कि महिलाओं के मुद्दों पर मीडिया को जिम्मेदारी एवं जवाबदेहीपूर्ण रवैया अपनाने की आवश्यकता है। महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के जो समाचार आज मीडिया में आ रहे हैं, वे सनसनी ज्यादा पैदा करते हैं। मीडिया को चाहिए कि वह सनसनी फैलाने के स्थान पर समाज में मूल्यों की स्थापना में सहयोग दे।

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर संविमर्श 

रविवार को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सभागार में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित संविमर्श में उन्होंने कहा कि विश्व के अन्य देशों की तुलना में भारत में टेलीविजन की भूमिका अलग है। हमारे यहाँ समाज की भाषा बुद्धिजीवी वर्ग एवं नीति निर्माताओं की भाषा नहीं है। ऐसे में टेलीविजन ही समाज को संवाद का एक माध्यम उपलब्ध कराता है, जहाँ लोग अपनी बात कह सकते हैं। आज विभिन्न विषयों पर निष्कर्ष उपलब्ध कराने में एवं मत बनाने में मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। आज मीडिया हमें अपने अधिकारों के प्रति तो सजग दिखता है परंतु वह अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं है। भारतीय मीडिया से परिपक्व व्यवहार की अपेक्षा है। भाषा के प्रति भी मीडिया को अपना गैर जवाबदेहीपूर्ण रवैया बदलना होगा। महिला केन्द्रित मुद्दों पर सनसनी फैलाने के स्थान पर जवाबदेहीपूर्ण कदम उठाने चाहिए। मीडिया को चाहिए कि वह समाज में मूल्यों की स्थापना में अपनी भूमिका का निर्वहन करे।  

प्रो. कुसुमलता केडिया ने कहा कि मीडिया महिलाओं के मुद्दे पर संवेदनशील नहीं है। पत्रकारों को एंग्लो सेक्शन लॉ जानना चाहिए। मीडिया के लोगों को महिलाओं के सम्बन्ध में बने कानूनों के पीछे की हकीकत को जानना जरूरी है। आज महिला सशक्तीकरण के नाम पर समाज ने एक ढकोसला खड़ा किया है, जिसे रोका जाना चाहिए। भारतीय समाज में स्त्रियों के सम्मान के पीछे जो प्राचीन परम्परा रही है, उसे जाने बिना हम पश्चिमी अलाप के आधार पर स्त्री विमर्श की बात कर रहे हैं, इसे बंद किया जाना चाहिए। 

कैलाशचंद पंत ने कहा कि मीडिया को ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए जिसमें महिलाओं के अधिकारों के साथ-साथ उन्हें हर क्षेत्र में उचित सम्मान मिले। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि आज मष्तिष्क के प्रदूषण की समाप्ति का दौर है। ऐसेमें सोच में स्वतंत्रता होनी चाहिए। सोच की स्वतंत्रता ही महिलाओं को समाज में उचित स्थान दिला सकती है। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागाध्यक्ष संजय द्विवेदी, डॉ. पी. शशिकला, डॉ. अविनाश बाजपेयी, डॉ. पवित्र श्रीवास्तव, डॉ. अनुराग सीठा, वरिष्ठ मीडियाकर्मी बृजेश राजपूत, रामभवन सिंह कुशवाह, गिरीश उपाध्याय आदि की उपस्थित उल्लेखनीय रही।



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