लॉकडाउन के शिकार मीडियाकर्मियों की आवाज़ कौन उठायेगा?

भारत के कनाडाई नागरिक अक्षय कुमार ने जब 25 करोड़ दान देने का एलान किया तो तुमने उन्हें सदी का सबसे बड़ा दानदाता घोषित किया।

सिल्वर स्क्रीन के दबंग और बॉक्स ऑफिस के सुल्तान सलमान खान ने जब फिल्मनगरी के दिहाड़ी मजदूरों का पेट भरने की घोषणा की तो तुम्हारे शब्दों में सलमान से बड़ा कोई दलायु, कृपालु नहीं था।

और जब कsssकsssकsss किंग यानी शाहरुख खान ने अपने ऑफिस को 14 दिनों के एकांतवासियों के लिए क्वारंटिन भवन बना दिया…तो तुम्हारे शब्दों में उसकी महिमा और भी शोभायमान हो गई।

अमिताभ बच्चन की वीआर फैमिली के सदस्य बनने में भी तुम्हीं सबसे आगे थे।

उद्योगपतियों की दानराशियों के आकर्षक ग्राफिक्स से लेकर, उनके ट्विट, वीडियो संदेश के बॉक्स आइटम बनाने में अपनी कल्पनाशीलता और ऊर्जा का उपयोग करने में तुमने ही सबसे अधिक पसीने बहाये।

इसके बावजूद तुम बेगाने की शादी के अब्दुल्ला दीवाने नहीं थे।

क्योंकि तुम्हारी ड्यूटी थी, जैसेकि सीमा पर सैनिक, अस्पताल में डॉक्टर, चौराहे पर खाकीवर्दी या कि घर घर सिलेंडर और हरी सब्जियां पहुंचाने वालों ने रोजमर्रा की जिंदगी और ज़िद नहीं छोड़ी थी।

इतना ही नहीं, अपने-अपने गांव, घर जाने के उतावले हुए सड़कों पर पैदल रेंगने वाले दिहाड़ी मिल्खा सिंहों के हुजूम को भी तुमने सदी का सबसे ‘रिच विजुअल’ समझा और उसे कभी लाइव काटा तो कभी म्यूजिक के साथ मोंटाज में सजाया तो कभी उस पर राष्ट्रीय बहसें कर लीं और तब तक लूप में चकरघिन्नी की तकह घुमाते रहे जब तक कि उसके बारे में सत्ताधारियों के अनमोल वचन नहीं आ गए।

यकीन मानिये उतने पर भी तुम बेगाने की शादी में अब्दुल्ला दीवाने नहीं थे।

क्योंकि तुम्हारी कलम को खून के आंसू बहाने की लत है। तुम्हारे कलेजे को चट्टानी काया बनने का बड़ा शौक है। तुम्हारी फितरत को संवेदना से एकतरफा मोहब्बत करने की आदत है।

याद करो तुमने ही चलाया न इस वक्त की सबसे बड़ी खबर है–प्रधानमंत्री ने कारोबारी जगत के स्वामियों से अपील की है कि कोरोना संकट को देखते हुए किसी कर्मचारी की सैलरी ना काटे। तुमने ही इस बयान को सत्तर साल का सबसे संवेदनशील बयान बताया था न! स्क्रीन पर दनादन चलाया था न! और तो और जब प्रधानमंत्री ने कहा कि लॉकडाउन के चलते किसी भी कर्मचारी की नौकरी ना जाये तो तुमने ही इसे सदी का सबसे मसीहाई स्टेटमेंट कहा था न! और सबके सब लट्टू हो गये थे। उत्साह इतना कि नौ मिनट के बदले नब्बे मिनट तक दीया जलाते रहे। जोश इतना कि ताली, थाली तो क्या बंदूक, पिस्तौल सब चलाने लगे। उन्होंने कहा लोग अपने अपने घरों में रहे लेकिन खून इतना खौला कि गली में जुलूस निकालने लगे। इन सब तस्वीरों को खूब चलाया न तुमने। यह दर्शाया न कि प्रधानमंत्री के एक आह्वान पर इस देश की जनता को भी हनुमान जैसी भूली बिसरी ताकत याद आने लगती है। लेकिन क्या कभी फॉलोअप किया कि प्रधानमंत्री के सैलरी और नौकरी वाले बयान और अपील का किस-किस बिजनेस घराने ने पालन किया?

क्या कभी इस मुद्दे पर बहस कराई कि जब प्रधानमंत्री समाज में सभी को मिलकर रहने की अपील करते हैं तो लोगों पर उसका असर क्यों नहीं होता है? क्यों तमाशा वाले बयान को भक्त जल्दी लपक लेते है और उनके सामाजिक सन्देश को गोलगप्पे की तरह उड़ा देते हैं। क्या कभी इस मुद्दे पर मेहमानों से बयानबाजी करवाई कि ताली, थाली के बदले बंदूक क्यों चलाई गई? क्या कभी इस सवाल की प्लेट को स्क्रीन पर फायर किया कि सरकार और रिजर्व बैंक के राहत एलान के बावजूद उद्योग, कारखाने के मालिक अपने-अपने कर्मचारियों की सुध क्यों नहीं ले रहे? क्यों कर्मचारियों की नौकरियां जा रही हैं? क्यों मालिक कर्मचारियों की छंटनी कर रहे हैं?

मैं जानता हूं इन सवालों को आप नहीं उठायेंगे। आप यह भी नहीं पूछेंगे कि जिस वक्त प्रधानसेवक लिट्टी चोखा खा रहे थे और और जब देश ट्रंपमय हो रहा था तब उसकी तस्वीर न्यूज मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में अवतारी पुरुष की तरह छाई हुई थी उस वक्त कोरोना किस किस देश में कितनी दहशत मचा रहा था और अपने देश में उससे बचाव के लिए क्या-क्या किया जा रहा था? आप कम से कम यह भी नहीं लिखेंगे कि होली से पहले ही देश में एक दिन का जनता कर्फ्यू क्यों नहीं लग जाना चाहिये था? और तो और यह कि जनता कर्फ्यू के एक दिन बाद ही संपूर्ण लॉकडाउन क्यों हो गया…? जब लॉकडाउन करना ही था तो जनता कर्फ्यू क्यों? आप के पास यह सवाल भी नहीं होगा कि ताली, थाली बचाने और दीया जलाने से देश को क्या मिला? जबकि आप इस तरह के सवालों पर पहले खूब बहसें करते रहे हैं। पीएम की अपीलों के बाद सिवाय अनुशासनहीनता की तस्वीरों और लाखों लाख की संख्या में वीडियो के आदान प्रदान के कारण इंटरनेट की फिजूल डेटाखर्ची के सिवा और क्या मिला? इन आयोजनों में दिखी अनुशासनहीनता की तस्वीरों को आप किस पंथ या संप्रदाय से जोड़ेंगे? मैं समझता हूं आप ये सब नहीं पूछेंगे क्योंकि जेनुइन सवाल को इन दिनों सरकार विरोधी माना जाता है। और सरकार विरोधी छवि होने पर दर्शक और पाठक कम होते हैं और विज्ञापन गिरने का खतरा बढ़ता है।

खैर छोड़िये…ये सवाल बहुतों के लिए शायद छोटा मुंह बड़ी बात हो।

लेकिन चलिये अपने बारे में या अपने हित को लेकर खुद से ही कुछ सवाल पूछ लीजिये।

मीडिया जगत पढ़ा लिखा तबका है इसलिये यहां ‘दिहाड़ी मजदूर’ शब्द का इस्तेमाल शायद बहुत लोगों को अच्छा न लगे, उनके लिए चलिये ‘ठेका कर्मचारी’ कह लेते हैं। कोरोना के बाद हजारों की संख्या में पत्रकार बंधु घर से काम कर रहे हैं। लेकिन जो बेरोजगार हैं, किसी संस्थान से संबद्ध नहीं हैं…फ्रीलांस से घर चला रहे थे, क्या फिल्म इंडस्ट्री की तरह किसी संगठन या नामचीन हस्ती ने उनकी मदद के लिए एलान किया? जिस सरकार की योजनाओं और बयानों पर जान न्योछावर करते रहे, सोशल मीडिया पर दिखाने के लिए प्रचार प्रसार करते रहे, उस सरकार की तरफ से किसी योजना या पैकेज का ऐलान हुआ? कितने बेरोजगार या फ्रीलांस पत्रकारों को मदद मिली? है कोई आंकड़ा? शायद नहीं। अपने रिसर्च विभाग को इस काम में लगाइए। जब तक कोई आंकड़ा निकले तब तक यह विचार कर लीजिए कि इस खबर को चलायेगा या छापेगा कौन? सोशल मीडिया पर भी लिखेंगे तो लोग आप ही को हिकारत की नज़रों से देखेंगे और दया भावना में कहेंगे – कितना ‘गिरा’ हुआ है? बहुत से लोग इसे सरकार को बदनाम करने की साजिश भी करार देंगे और कन्नी काट लेंगे। लेकिन जो ‘उठे’ हुये हैं…चलिये उन्हीं के बारे में बात कर लेते हैं। मीडिया ने ही प्रधानमंत्री के उस बयान को प्रमुखता से चलाया न कि उन्होंने कारोबारी जगत से कहा है कि किसी की नौकरी न जाये! लेकिन अब कोरोना और ल़ॉकडाउन के चलते कई मीडिया हाउसों में छंटनी और बंदी शुरू हो गई, उसके बारे में क्या किसी ने सोचा या सवाल उठाया…? हर दूसरे तीसरे दिन सुनने को मिलता है फलां मीडिया संस्थान में इतने फीसदी स्टाफ कम किये जा रहे हैं या कर दिये गये। इसको लेकर किसी ने प्रधानमंत्री से कहा? शायद इसकी इसलिए जरूरत नहीं क्योंकि मेंढ़क खुद को बड़े बुद्धिमान समझते हैं और उन्हें तराजू पर एकजुट रखा नहीं जा सकता।

-एक मीडियाकर्मी



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Comments on “लॉकडाउन के शिकार मीडियाकर्मियों की आवाज़ कौन उठायेगा?

  • एक साथी says:

    सही कहा साथी। किसी मे अपने लिए लड़ने या मांगने की हिम्मत नही है। कुछ लोग घर से काम कर रहे है लेकिन ऐसा विभाग भी है जो बिना दफ़्तर जाए काम नहीं कर सकता। वो दफ्तर नही जा पाता तो प्रधानमंत्री के आदेश की मौजूदा हालात में उसे हाजिर माना जाए को दरकिनार कर कुछ हाउस छुट्टी लगवा रहे है। विडम्बना है कि दूसरों के साथ अन्याय पर तहलका मचाने वाले मीडिया कर्मी इतने असहाय है।

    Reply
  • anuchauhan says:

    bilkul shi….media se jude har chhite aadmi ka bura haal . sake hak ki aawaj uthane walo ki khud ki awaj par pehra hai…. sharmnak

    Reply
  • याज्ञवल्क्य says:

    मध्यप्रदेश के एक समाचारपत्र —’शुभ चौपाल’Subhchoupal— द्वारा प्रधानमंत्री जी से असंगठित क्षेत्र के पत्रकारों के प्रति संवेदनशीलता दिखाने हेतु अनुरोध किया गया है. मूल पत्र इस प्रकार है—
    —————————————————
    माननीय प्रधानमंत्री जी,
    भारत सरकार
    विषय- पूर्णबंदी से प्रभावित असंगठित क्षेत्र के लाखों पत्रकारों के प्रति संवेदनशीलता का अनुरोध।
    मान्यवर,
    कोरोना विषाणु की विश्वव्यापी विभीषिका में देश के लोगों को सुरक्षित रखने के आपके प्रयास अभिनन्दनीय हैं और आपके एक- एक शब्द पर सामान्यत: संपूर्ण राष्ट्र अनुकरण कर रहा है। इस कोरोना विषाणु के संक्रमण को रोकने के लिए पूर्णबंदी के अनिवार्य कदम को भी प्रत्येक उत्तरदायी नागरिक ने सहजता से स्वीकार किया है। देश के नागरिकों के लिए सरकार और राज्य सरकारों द्वारा उपलब्ध कराई गई आवश्यक सुविधाओं ने इस कठिन समय को घर पर बिताने को अपेक्षाकृत सरल बनाया है।
    ऐसे समय में हम आपका ध्यान उन पत्रकारों की ओर ध्यान दिलाना चाहते हैं, जिनकी बहुत बड़ी संख्या है और जो कस्बों तथा गांवों में पत्रकारिता की पुनीत भावना के अनुरूप बिना किसी सरकारी सहयोग के संकटपूर्ण स्थितियों में समर्पित भाव से कार्य करते रहते हैं। देश में दो श्रेणी के पत्रकार कार्यरत हैं। एक श्रेणी में वे हैं, जो किसी मीडिया समूह में वेतनभोगी के रूप में कार्यरत हैं और इन्हे अधिमान्यता सहित सभी शासकीय सुविधाएं मिलती हैं।
    दूसरी श्रेणी के पत्रकारों को असंगठित क्षेत्र के पत्रकार इसलिए कहा जा सकता है कि ये किसी मीडिया समूह के नियमित कर्मचारी नहीं होते और सामान्यत: अधिमान्यता से भी वंचित रहते हैं। इस श्रेणी को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। एक भाग उन पत्रकारों का है, जो कस्बों और गांवों में किसी मीडिया समूह के लिए कार्य तो करते हैं, लेकिन समूह उन्हे अपना नियमित कर्मचारी नहीं मानता। कई कारणो से इनके संस्थान भी बदलते रहते हैं और इन्हे अधिमान्यता नहीं मिल पाती। दूसरा भाग उन पत्रकारों का है, जो स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता कर रहे होते हैं। ये या तो स्वयं का साप्ताहिक, पाक्षिक अथवा अन्य अवधि का समाचारपत्र निकाल रहे होते हैं, या फिर अपनी वेबसाइट- ब्लॉग के माध्यम से सक्रिय रहते हैं। संसाधनो के अभाव में ये भी औपचारिकता पूरी न कर पाने के कारण अधिमान्यता और सरकारी विज्ञापनो से वंचित रहते हैं। वास्तव में दूसरी श्रेणी के पत्रकार बिना सरकारी सहायता के सर्वाधिक कठिन स्थितियों में सर्वाधिक खतरे उठाते हुए व्यावसायिकता से परे पत्रकारिता को मिशन की तरह जी रहे होते हैं।
    अनुरोध यह है कि इस दूसरी श्रेणी के असंगठित पत्रकारों को भी इस कठिन समय में आपकी सहृदयता की आवश्यकता है। इसके लिए दस वर्ष अथवा अन्य किसी समयावधि में किसी भी रूप में कहीं भी निरन्तर सक्रिय रहे पत्रकारों को पात्र माना जा सकता है।
    हमे विश्वास है कि माननीय प्रधानमंत्री जी इस पत्र में उल्लिखित बातों का समुचित परीक्षण कराते हुए अपनी संवेदनशीलता दिखाते हुए समुचित कदम उठाएंगे।
    दिनांक— 20 अप्रेल 2020.
    कोरोना से जंग में पूरी तरह संग.
    सादर!

    -शुभ चौपाल-
    पत्रकार साथियों की ओर से
    subhchoupal@gmail.com

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