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राघवेंद्र हत्याकांड : गूंजा भड़ास, मुंबई के पत्रकारों ने मुंह पर काली पट्टी बांधकर प्रशासन की बोलती बंद की

यशवंत भाई,

सहयोग के लिए आपका आभार. जिस पत्रकार की हत्या से मुंबई के मठाधीश बन बैठे पत्रकारों का दिल नहीं पसीजा, वहीं आंदोलन की ख़बर को प्रधानता देकर आपने इस आवाज़ को गली से निकाल कर दिल्ली तक पहुंचा दिया. आपके और हमारे अन्य पत्रकार भाइयों के समर्थन ने पत्रकार राघवेंद्र दूबे की आत्मा को सच्ची श्रद्धांजलि देने में मदद की है.

मुंबई में जर्नलिस्ट एक्शन कमेटी के झंडे तले मुंह पर काली पट्टी बांधकर राघवेंद्र दूबे हत्याकांड के खिलाफ मौन विरोध करते पत्रकार 

यशवंत भाई,

सहयोग के लिए आपका आभार. जिस पत्रकार की हत्या से मुंबई के मठाधीश बन बैठे पत्रकारों का दिल नहीं पसीजा, वहीं आंदोलन की ख़बर को प्रधानता देकर आपने इस आवाज़ को गली से निकाल कर दिल्ली तक पहुंचा दिया. आपके और हमारे अन्य पत्रकार भाइयों के समर्थन ने पत्रकार राघवेंद्र दूबे की आत्मा को सच्ची श्रद्धांजलि देने में मदद की है.

मुंबई में जर्नलिस्ट एक्शन कमेटी के झंडे तले मुंह पर काली पट्टी बांधकर राघवेंद्र दूबे हत्याकांड के खिलाफ मौन विरोध करते पत्रकार 

जर्नलिस्ट एक्शन कमिटी के झंडे तले पत्रकारों ने बंद जुबान से ही आंदोलन कर प्रशासनिक ढांचे को झकझोर दिया है. इसमें सबसे बड़ी बात यह हैं कि जर्नलिस्ट एक्शन कमिटी, मीरा-भाईंदर में पत्रकारों के मूक प्रदर्शन के बाद आखिरकार झुका प्रशासन और बीयर पर कारवाई के लिए महानगर पालिका के आयुक्त को आगे आना पड़ा. लेकिन मीरा भाईंदर के जर्नलिस्ट एक्शन कमिटी को इसके लिए बरसते पानी में भीगते हुए सड़क पर छह घंटे तक आंदोलन जारी रखना पड़ा. इस कमिटी के मुखिया के तौर पर भरत मिश्रा को हालांकि मनपा आयुक्त ने दो घंटे बाद ही अपने कार्यालय में बुलाने के लिए अपना अधिकारी भेजा था, लेकिन भरत मिश्रा ने पत्रकारों के साथ एक सुर में इसे खारिज कर दिया और आखिरकार प्रशासन को झुकना पड़ा और मनपा आयुक्त खुद पत्रकारों के बीच आए और अपनी तीस वर्ष की सेवा का वास्ता देते हुए कहा कि जिस बीयर बार में यह घटना हुई है वह पंद्रह दिनों में तोड़ा जाएगा. हालांकि पत्रकारों के इस आंदोलन के लिए भरत मिश्रा को काफी मशक्कत करनी पड़ी. इस आंदोलन को पहले दिन से ही मुंबई के तथाकथित बड़े पत्रकारों ने यह कहकर छोड़ दिया था कि, यह हत्या  सप्ताहिक अख़बार के एक छोटे पत्रकार की है. 

इसके अलावा आंदोलन के बीच कुछ असामाजिक तत्वों ने घुसकर पत्रकारों की शांति को भंग करने की कोशिश की, लेकिन नैसर्गिक मिजाज़ और बार माफिया के आंतक के बीच पत्रकार अपने जर्नलिस्ट एक्शन कमिटी के मुखिया भरत मिश्रा के कंधे से कंधा मिलाते हुए सब को परास्त कर दिया. पुलिस को आमतौर पर ढाई तीन सौ लोगों के आंदोलन को नियंत्रण में रखने के लिए जहां बड़ा दल लगाना पड़ता है वहीं सिर्फ दो पुलिस सिपाही इस आंदोलन के लिए लगाए गए थे और वह भी बारिश के बिगड़े मिजाज़ से अपने को बचाते हुए आस पास की दुकानों में पनाह लेकर खड़े नज़र आए.  

पत्रकारों ने अपने आंदोलन को खुद संचालित किया. मूक प्रदर्शन के बल पर पत्रकारों ने स्थानीय प्रशासन को ही नहीं बल्कि मंत्रालय में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को भी सोचने पर मजबूर कर दिया. जिस समय आंदोलन चल रहा था उसी बीच मंत्रालय में हुई बैठक में मुख्यमंत्री ने पत्रकार हमला विरोधी कानून को शिघ्र लाने का फैसला किया, इसके लिए मुख्यमंत्री ने संबंधित विभाग को एक महीने में मसौदा तैयार करने का समय दिया है. जबकि ठाणे जिलाधिकारी, पुलिस अधिक्षक हरकत में आते हुए मीरा-भाईंदर के बीयर बारों में छापा कारवाई शुरू कर दी. जिसमें पुलिस सूत्रों की मानें तो कई बार मालिक सामान्य खाने वाले रेस्टारण्ट के लाईसेन्स पर डांस बार चला रहे हैं. इसके अलावा अब मीरा-भाईंदर के सभी बारों पर नियंत्रण रखने के लिए हर बार के लिए एक पुलिस अधिकारी और जिलाधिकारी कार्यालय का एक अधिकारी नियुक्त किया जाएगा.  

इस आंदोलन की ख़बर को पहले ही दिन प्राथमिकता से उजागर करने के बाद मुझे विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष करके विजय प्राप्त करने का हौसला मिला. यह प्रेस रिलीज़ जर्नलिस्ट एक्शन कमिटी के द्वारा जारी की गई है, यह उनका बड़प्पन है कि उन्होंने इस आंदोलन की अगुवाई का मौका दिया. मैं कोई आंदोलनकारी नहीं हूं, आम चैनल के रिपोर्टर की तरह एक राष्ट्रीय चैनल का वरिष्ठ संवाददाता हूं. जिस दिन यह घटना घटी, मीरा रोड में ही रहने के कारण उत्सुकतावश में पुलिस स्टेशन पहुंच गया. वहां का माहौल देखकर मैं समझ गया कि उस छोटे समाचार पत्र के संपादक की जघन्य हत्या पर स्थानीय पुलिस प्रशासन और कुछ पत्रकार यह कहकर लीपापोती कर रहे थे कि मारा गया पत्रकार राघवेंद्र पीत पत्रकार था. 

मैंने इस पूरे मामले में सिर्फ यह सोचकर दखल दी कि जब आंतकवादी का मानवाधिकार हो सकता है तो फिर इस पत्रकार का मानवाधिकार क्यों नहीं. पीत पत्रकार कहकर क्या पुलिस और बार माफिया को यह अधिकार मिलता है कि वह बर्बरता से एक इंन्सान की हत्या कर दे. क्या यह बर्बरता की पराकाष्ठा नहीं है कि पत्रकार राघवेंद्र दूबे को पुलिस ने बुलाया था और वहां से निकलते ही इसकी हत्या की गई। ये सोचते ही एक गहरे आक्रोश ने एक आवाज़ को जन्म दिया जिसमें देखते देखते करीब चार सौ छोटे-बड़े पत्रकार जुड़ गए और सरकार को झुकना पड़ा।

मुंबई के जुझारू पत्रकार भरत मिश्रा से संपर्क : [email protected]

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1 Comment

1 Comment

  1. Karuna Shankar

    July 24, 2015 at 3:07 pm

    Is Andolan ki Goonj itni thi ki bagair bole patrakaaron ki bhadas ne Sarkaar ko Maharastra Patrakar Hamla virodhi kanoon laane par vivash kar diya. Yah kanoon pichhle kai varshon se pralambit hai.

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