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आज के अखबार : नाम प्रकाशित करने के आदेश का पूरा प्रचार लेकिन ‘खबर’ या ‘जीत’ समझ में नहीं आई

अगर सुनवाई एसआईआर के तरीकों पर है तो जो दो लोग मृत घोषित किये जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए उनके मामले में किसी कार्रवाई की जरूरत नहीं है? क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिये था कि नाम दर्ज कराने के लिए दस्तावेज चाहिये तो हटाने के लिए मृत्यु प्रमाणपत्र क्यों नहीं चाहिये। क्या सभी मामलों में मृत्यु प्रमाणपत्र है और नहीं है तो क्यों माना जाये कि एसआईआर ठीक हुआ या उसका कोई लाभ हुआ या जो मतदाता सूची बनी वह पहले वाले के मुकाबले सही है या सही के ज्यादा करीब है।

संजय कुमार सिंह

बिहार में एसआईआर कराने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि एसआईआर के तहत हटाये गये 65 लाख मतदाताओं के नाम सार्वजनिक किये जायें। आज यह खबर कई अखबारों में प्रमुखता से है। अमर उजाला की खबर है, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ एसआईआर कराने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने कहा, जिन लोगों की मृत्यु हो गई, जिन्होंने पलायन किया या अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में चले गये, उनके नामों की सूची पंचायत और जिला स्तर के रिटर्निंग अधिकारियों के दफ्तर में कारणों के साथ प्रदर्शित की जाये। गौर करने वाली बात है कि खबर के अनुसार सुनवाई एसआईआर की वैधता या कानूनी जरूरत के बारे में हो रही थी और यह आदेश उसके तहत की गई कार्रवाई पर है। अगर एसआईआर अवैध या गैर जरूरी है तो उसके तहत की गई कार्रवाई का ही कोई मतलब नहीं है और चुनाव पुरानी मतदाता सूची से होगी या एसआईआर की बजाय मतदाता सूची को अद्यतन करने की जो आम कार्रवाई होती है वही होगी। खबरों के अनुसार बिहार में एसआईआर एक विशेष प्रक्रिया है, 2003 के बाद पहली बार हो रही है। रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने कहा है कि बिहार की मतदाता सूची तैयार थी और फिर अचानक सघन पुनरीक्षण का आदेश आ गया। ऐसा देश में पहले कभी नहीं हुआ है। बिहार में इससे पहले सघन पुनरीक्षण एक साल से ज्यादा समय में हुआ था। और यह काम चुनाव से ठीक पहले नहीं करके काफी पहले किया गया था।

अभी तक की खबरों से मैं यही समझ रहा था कि एसआईआर कराने के (चुनाव आयोग के) फैसले को चुनौती दी गई है क्योंकि 1) यह कानूनन वैध नहीं है 2) इसकी जरूरत नहीं है या 3) इसके लिए समय कम है। पर सुनवाई की जो खबरें आती रहीं उससे लगा कि एसआईआर के तरीकों पर सुनवाई चल रही है। इसमें चुनाव आयोग ने अपने अधिकारों की बात भी की और वह भी खबर बनी। इसमें एसआईआर कराने के चुनाव आयोग के अधिकार की बात हुई हो तो मुझे ध्यान नहीं है। मुझे जो खबरें पढ़ने की मिलीं वो ज्यादातर यही थीं कि एसआईआर के तहत चुनाव आयोग जो कर रह है वह उसका अधिकार है और उसमें हस्तक्षेप वह स्वीकार नहीं करेगा। इसमें आधार को स्वीकार करने की सलाह और चुनाव आयोग का जवाब या जिद्द शामिल है। अगर एसआईआर की जरूरत या वैधता ही मुद्दा है तो एसआईआर कैसे हो रहा है या उसमें क्या हो रहा है यह मुद्दा ही नहीं होना चाहिये था या मुद्दा है तो खबरों में बताया जाना चाहिये था कि मुद्दा क्यों है। पर मुझे वह सब दिखा नहीं और आज फुर्सत में मैंने समझने की कोशिश की तो मेरा शक सही साबित हुआ है। अगर मैं सही समझ रहा हूं तो मामला यह है कि चुनाव आयोग ने बिहार में अचानक एसआईआर कराने का फैसला किया। इसके लिए समय कम था और लोगों को उसकी जरूरत भी नहीं लगी। संभव है, लोगों को शक रहा हो और यह आरोप है ही कि एसआईआर में मनमानी की जायेगी और बड़े पैमाने पर नाम हटाये जायेंगे। इन परिस्थितियों में याचिका यही दायर होनी थी कि एसआईआर की जरूरत नहीं है या अवैध है। पर खबरों से नहीं लगा कि अदालत में मुद्दा यह है।

इसका कारण खबर थी कि अगर 15 लोग ऐसे मिल गये जो मृत बताये गये हैं तो एसआईआर को रोक दिया जायेगा। फिर खबर आई कि ऐसे लोग मिल गये हैं और इनमें दो सु्रीम कोर्ट में पेश हुए। राहुल गांधी ने इन मरे हुए लोगों के साथ चाय पीने का मौका देने के लिए चुनाव आयोग का आभार भी जताया। भले इसकी खबर कम छपी। जाहिर है चुनाव आयोग एक ऐसा विशेष सघन पुनरीक्षण चला रहा है जिसकी वैधता या आवश्यकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। खबर यह छप रही है या खबरों के जरिये यह बताया जा रहा है कि एसआईआर के तहत यह हो रहा है, वह हो रहा है, उसे चुनौती दी गई या चुनाव आयोग ने क्या कहा। खबरों में यह नहीं बताया जा रहा है कि मूल मुद्दा अलग रह गया है या सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को सशर्त एसआईआर कराने की इजाजत दी है (अगर दी है) या किसी आदेश के बगैर ऐसा होने दे रहा है तो यह खबरों में नहीं बताया गया है और अगर कभी कहीं किसी ने बताया भी हो तो वह मुद्दा नहीं है। इसी तरह चुनाव आयोग ने जब यह दावा किया वह स्वतंत्र संवैधानिक संस्थान है और तमाम जानकारी सार्वजनिक करने के लिए बाध्य नहीं है तो यह नहीं बताया गया कि उसके मुखिया की नियुक्ति के तरीके को भी चुनौती दी गई है और जब मुखिया की नियुक्ति संवैधानिक तरीके से किया जाना सुनिश्चित नहीं है तो संस्था भले संवैधानिक है, उसके काम संवैधानिक हों यह जरूरी नहीं है और उसकी समीक्षा होनी चाहिये। मुझे लगता है कि यह बात अदालत में भी कही जानी चाहिये थी और नहीं भी कही गई हो तो मीडिया का काम था कि इसकी याद दिलाता या इसका उल्लेख करता। पर वह भी इस मामले से संबंधित खबरों का खास बिन्दु नहीं रहा।

इस तरह हम देख रहे हैं कि एक संवैधानिक संस्था जिसके मुखिया की नियुक्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है वह अपने संवैधानिक होने के नाम पर मनमानी कर रहा है और इस विरोध या दावे के बावजूद कर पा रहा है कि वह जो कर रहा है उसकी जरूरत नहीं है या वह गैर कानूनी है। इसपर फैसला होने से पहले वह अपनी तय योजना को अमली जामा पहनाने में काफी हद तक कामयाब है और आज अगर हटाये गये लोगों के नाम और हटाने का काम सार्वजनिक करने के आदेश की खबर छपी है तो तथ्य यह है कि एसआईआर की वैधता को चुनौती दिये जाने के बावजूद है। यही नहीं, खबरों से यह भी पता नहीं चलता है कि प्रारूप मतदाता सूची में जब नाम हटाये जाने के कारण ही नहीं बताये गये हैं तो कैसे पता चला कि कुछ ऐसे लोग भी मृत बता दिये गये हैं जो जीवित हैं। जाहिर है, जिन लोगों के नाम हटाये जाने की बात है उनमें कुछ के कारण बताये गये होंगे और ये उन्हीं में से हैं या होंगे। जो भी हो, यह साफ है कि एसआईआर का काम ठीक से नहीं हुआ है और जिन्दा लोग भी मृत बता दिये गये हैं। ऐसे में एसआईआर को जारी रखने का कोई मतलब नहीं है और जारी रखा जा रहा है तो गलतियों की जवाबदेही तय होनी चाहिये, चुनाव आयोग से इस बारे में पूछा जाना चाहिये उसे बताना चाहिये और यह सब खबर में होना चाहिये। नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि कोर्ट में यह सब नहीं हो रहा है या मामला कुछ है कार्रवाई कुछ और हो रही है। अगर ऐसा है तो यह भी बताया जाना चाहिये। कम से कम सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए जो दो जिन्दा लोगों के बारे में पूछताछ होनी चाहिये थी और अब तक उसका जवाब होना चाहिये था या यह बताया जाना चाहिये था कि इतने गंभीर मामले में जवाब नहीं है या सवाल ही नहीं किया गया है।

आज भी अमर उजाला की खबर यही है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग बिहार की मतदाता सूची से हटाये गये 65 लाख मतदाताओं के नाम सार्वजनिक करे…आधार भी मान्य। जाहिर है, महीने भर से ज्यादा समय से चल रहे एसआईआर की वैधता पर फैसला नहीं हुआ है, फिर भी चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट की सलाह नहीं मान रहा है और आज फिर कहा गया है कि आधार भी मान्य है जबकि यह मुद्दा ही नहीं होना चाहिये था। आज की खबर है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा – वोटरों के नाम हटाने का कारण भी प्रकाशित करें। यह इस तथ्य के बावजूद है कि हटाने का कारण जिन्दा लोगों को मरा बताया गया है और इस गलती के लिए कोई कार्रवाई नहीं हुई है ना कोई जवाबदेही तय की गई है। वह भी तब जब खबरों के अनुसार पूरी तरह नई मतदाता सूची बनाने का काम पहली बार हो रहा है, नाम शामिल करने के लिए 11 दस्तावेज तय कर दिये गये हैं जिनमें आधार और पुराना मतदान पहचान पत्र नहीं है और एक से ज्यादा बार कहने के बावजूद नहीं है। दूसरी ओर, मृत बताकर हटाने के लिए एक ही दस्तावेज हो सकता है और वह मृत्यु प्रमाणपत्र है। सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए दो लोगों के बारे में पता नहीं है या खबर में नहीं है कि चुनाव आयोग से पूछा गया या नहीं कि मृत्यु प्रमाणपत्र के बिना उन्हें मृत कैसे घोषित किया गया या मृत्यु प्रमाणपत्र भी फर्जी है या आयोग को मृत्यु प्रमाणपत्र पर भी भरोसा नहीं है और वह मृत घोषित करने या मृत मानकर नाम हटाने के लिए भी मृत्यु प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं समझता है।

आइये अब देखते हैं कि आधार की वैधता पर सुनवाई से संबंधित खबरों में क्या-क्या कहा गया है। अमर उजाला के अनुसार, लोगों को जानने का हक है कि नाम क्यों हटाया गया। पर एसआईआर अगर अवैध है और इसीलिये हो रहा है कि नाम मनमाने तरीके से हटाये जा सकें तो यह फैसले से पहले या मुकदमे के बावजूद हो रहा है और अगर सुप्रीम कोर्ट ने किसी समय एसआईआर को रद्द करने का फैसला किया तो यह सब लगभग बेकार जायेगा। एक खबर है, अधिक पारदर्शिता से लोगों में विश्वास बढ़ेगा। एक और शीर्षक है, 22 लाख लोगों की मौत तो खुलासा क्यों नहीं? इस खबर से यह पता नहीं चल रहा है कि आयोग 22 लाख लोगों की मौत की बात किस आधार पर कर रहा है या ऐसी खबर कैसे छप रही है। एक-दो नहीं, और एक दो साल में नहीं, करीब 22 साल में 22 लाख लोगों की मौत की खबर या दावा क्या बिना मृत्यु प्रमाणपत्र के उचित है? अगर बिना दस्तावेज आयोग नाम शामिल नहीं कर रहा है तो बिना दस्तावेज ऐसे दावे कैसे कर सकता है और अगर दस्तावेज हैं तो यह खबर में क्यों नहीं है? नवोदय टाइम्स में भी वही खबर और शीर्षक है, “हटाए गए 65 लाख वोटरों के विवरण प्रकाशित करे चुनाव आयोग : सुप्रीम कोर्ट”। इस मुख्य शीर्षक के तहत तीन उपशीर्षक या तीन खबरें हैं। पहली तो यही कि नाम हटाने का कारण बताने का भी निर्देश। दूसरा शीर्षक है, आधार कार्ड के लिए अनुमति। इसमें यह नहीं बताया गया है कि चुनाव आयोग अब भी नहीं मानेगा तो क्या होगा या यह कि लोग आधार के साथ दावा तो कर देंगे पर चुनाव आयोग न माने और चुनाव की तारीख घोषित हो जाये तो संबंधित व्यक्ति चुनाव में शामिल नहीं हो पायेगा और अगर वह उम्मीदवार हुआ तो वैसे ही हार जायेगा। आशंका थी कि चुनाव आयोग ने एसआईआर का आयोजन इसीलिये किया है और खबर से लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और कार्रवाई की तमाम खबरों के बावजूद आम आदमी का वोट देने का अधिकार अभी पक्का नहीं है और चुनाव से पहले हो जायेगा यह सुनिश्चित नहीं है।

तीसरी खबर चुनाव आयोग का पक्ष और इस तरह उसका प्रचार है। खबर के अनुसार, आयोग के पास कुछ निर्णय लेने के लिए पर्याप्त शक्तियां हैं लेकिन तीव्र राजनीतिक विद्वेष के माहौल में काम हो रहा है जहां उसके ज्यादातर फैसलों को चुनौती दी जाती है। अगर आयोग के इन सारे दावों को मान लिया जाये तब भी तथ्य यह है कि एसआईआर के बावजूद बिहार की मतदाता सूची में वो सारी गड़बड़ियां हैं जो राहुल गांधी ने महादेवपुरा में बताई हैं। चुनाव आयोग अपने अधिकार की बात तो कर रहा है पर कर्तव्य के मामले में फिसड्डी है और इसलिए यह सवाल अभी भी मौजूं है कि एसआईआर की जरूरत है या नहीं? देशबन्धु की खबर के अनुसार विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर लगातार तीन दिनों तक सुनवाई के बाद आदेश पारित किया गया है। गौर तलब है कि इस खबर के अनुसार प्रक्रिया पर सुनवाई हो रही है। यहां एक खबर है, चुनाव आयोग की दलील काम न आई। इसके अनुसार, आयोग ने कहा कि हटाये गये नामों की सूची राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को दी गई है। यहां गौर करने वाली बात है कि चुनाव आयोग नाम लिखने या मतदाता बनाने के लिए तो नई शर्तें लागू कर रहा है लेकिन नाम काटने के मामले में पुराना तरीका अपनाना चाहता था। सुप्रीम कोर्ट ने भले कारण बताने का आदेश दिया है पर एसआईआर की वैधता और उपयोगिता संदिग्ध है। इन आरोपों के बावजूद कि इसका मकसद सत्तारूढ़ दल को लाभ पहुंचाना है।

द टेलीग्राफ में यह खबर लीड है और शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर पर से पर्दा हटाया। अखबार में  लिखा है कि यह आदेश जारी करके सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की एक और प्रमुख मांग स्वीकार कर ली है। इस खबर के अनुसार याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर की पारदर्शिता और संवैधानिकता को चुनौती दी है। हिन्दुस्तान टाइम्स में एक खास खबर है बिहार में बीएलए ने मतदाता सूची के प्रारूप में गड़बड़ी की पहली शिकायत दाखिल की। खबर के अनुसार यह भाजपा का बूथ लेवल एजंट है और 655 नामों की सूची दी है जो दो जगह हैं। आप जानते हैं कि यह पुराना तरीका है और कंप्यूटर ऐसी प्रविष्टयों को कुछ मिनट में छांट देता है और नए तरीके से नई शर्तों से लगभग जबरन बनी नई मतदाता सूची के प्रारूप में दोहरे नाम मशीन से छांटे जा सकते थे आर इनपर आपत्तियों का इंतजार किये बिना अपने आप ठीक किया जाना चाहिये था खासकर तब जब लोगों के नाम अपने स्तर पर हटा दिये गये हैं। अब दावों का इंतजार किया जा रहा है और बताया जा रहा है कि लोग दावा नहीं कर रहे हैं (इसलिये सब ठीक है)। द हिन्दू ने लिखा है कि कोर्ट ने पहली बार औपचारिक तौर पर निर्देश दिया है कि बिहार के एसआईआर में आधार का उपयोग निवास की पहचान के लिए किया जाये। टाइम्स ऑफ इंडिया में इस फैसले से संबंधित एक खबर अंदर के पन्ने पर है। इसका शीर्षक है, हम चुनाव आयोग के मतदाता सूची संशोधन के अधिकार पर रोक नहीं लगा रहे हैं: सुप्रीम कोर्ट। मुझे लगता है कि यह मांग भी नहीं थी पर सुप्रीम कोर्ट को यह स्पष्ट करना पड़ रहा है तो खबर यह भी थी जो मुझे नहीं दिखी।

इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर सबसे बड़ी और गंभीरता से छपी है। मुझे लगता है कि इसकी प्रस्तुति यह आभास देने के लिए है कि एसआईआर से संबंधित सभी शिकायतें दूर कर दी गई हैं और अदालत ने कहा है कि पारदर्शिता जरूरी है, ऐसी सूची सार्वजनिक की जाये जिसमें नाम कंप्यूटर से तलाशे जा सकें, आधार को पहचान पत्र की तरह स्वीकार किया जाये आदि आदि। पांच कॉलम की इस लीड खबर के साथ तीन कॉलम की एक खबर है, विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रशंसा की और इसे जीत कहा, भाजपा ने कहा कि कांग्रेस ऐसी चीजों पर अड़ी है जो मुद्दे नहीं हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा को चुनाव आयोग के बचाव में आने की कोई जरूरत नहीं होना चाहिये और चुनाव आयोग को इतना सक्षम होना चाहिये कि वह सरकार के सहयोग के बिना अपना काम स्वतंत्र रूप से कर सके। अभी स्थिति है कि वह विपक्ष के हमले (मांग या चुनौती भी कह सकते हैं) नहीं झेल पा रहा है और कल्पना कीजिये कि सरकार उसके खिलाफ होती तो वह क्या करता। ऐसे में आज की खबर से भले यह दिखाने की कोशिश की गई है विपक्ष जीत गया और भाजपा की राय में कांग्रेस के मुद्दे में कुछ था ही नहीं पर सच्चाई यह है कि चुनाव आयोग ने तमाम विरोध, मुकदमों के बावजूद एसआईआर को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया। आधार को निवास का सबूत मानने का आदेश अब दिया गया है और नाम हटाने को चुनौती देने पर कार्रवाई नहीं होगी तो आम मतदाता कुछ नहीं कर सकेंगे और बहुत सारे मतदाता कारण जानकर उसे दूर करने के लिए आवेदन ही नहीं कर पायेंगे और यह सब समय की कमी के कारण होगा। कुल मिलाकर इन खबरों से स्पष्ट नहीं है कि अदालत एसआईआर की वैधता पर सुनवाई कर रही है या उसकी प्रक्रिया की वैधता और सटीकता पर।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का भी अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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