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आज के अखबार : नहीं बताते कि रतन टाटा का अंतिम संस्कार ‘पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया’

संजय कुमार सिंह

मेरे आठ अखबारों में सिर्फ दि एशियन एज ने पहले पन्ने पर पर छपी खबर के उपशीर्षक में लिखा है, पूरे राजकीय सम्मान, पारसी रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया। नवोदय टाइम्स ने इस खबर को अपने दोनों पहले पन्नों पर नहीं, बल्कि दोनों के बीच के ‘तीसरे’ पन्ने पर छापा है। यहां मुख्य शीर्षक है, तिरंगे में विदा हुए भारत के रतन। उपशीर्षक है, मुंबई में पूरे राजकीय सम्मान के साथ हुआ रतन टाटा का अंतिम संस्कार। इंडियन एक्सप्रेस में छह कॉलम की फोटो का शीर्षक है, अ नेशन बिड्स फेयरवेल (एक राष्ट्र ने विदाई दी)। अमर उजाला का शीर्षक है, अब अनंत में रोशन रहेंगे रतन। उपशीर्षक है, राजकीय सम्मान से अंतिम विदाई, महाराष्ट्र सरकार ने की भारत रत्न देने की सिफारिश। इसे नवोदय टाइम्स के शीर्षक के साथ जोड़कर देखिये तो लगता है कि उन्हें भारत रत्न माना ही जाता था और लोगों ने दुनिया का रतन भी कहा है। ऐसे में रतन टाटा को मृत्यु के बाद राजकीय सम्मान देने की खबर को अखबारों ने महत्व नहीं दिया। उन्हीं अखबारों ने जो सरकार के काम को हमेशा बढ़ा-चढ़ाकर बताता है। मुझे इसमें राजनीति नजर आ रही है। खासकर महाराष्ट्र सरकार की भारत रत्न देने की मांग के कारण।

रतन टाटा इतने महान से थे कि उनका निधन और फिर अंतिम संस्कार ही खबर है। राजकीय सम्मान दूसरी लाइन की खबर होकर रह गया। मुझे लगता है कि इसका कारण है और इसपर विचार होना चाहिये। विचार मीडिया करता है पर मीडिया में अब होता नहीं है। संभव है उसके लिए राजकीय सम्मान मुद्दा ही न हो। मुझे याद है 2016 के दादरी कांड में जिस अखलाक की हत्या कर दी गई थी उसके हत्यारों को ग्रामीणों ने शहीद करार दिया था। उसके शव पर तिरंगा रखकर एक करोड़ रुपये का मुआवजा देने की मांग की गई थी। तब की खबरों के अनुसार, गांव के हजारों लोग अखलाक हत्याकांड में नामजद सभी 17 लोगों को तुरंत रिहा करने की मांग पर धरने पर बैठे थे। इसी कांड में नामजद 22 वर्षीय रविन सिसोदिया की मौत किडनी और श्वसन तंत्र फेल हो जाने से हो गई थी। बीमारी के बाद पहले उसे नोएडा के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। बाद में तबीयत ज्यादा बिगड़ने पर दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश (एलएनजेपी) अस्पताल में ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई। गांववालों का आरोप है कि रविन और उसके साथ तीन अन्य आरोपियों की जेल में  पिटाई की गई है। इसके बाद रविन को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उसकी मौत हो गई। सच्चाई चाहे जो हो, बाद में मामला ठंडा पड़ गया और अगर यह मामला तिरंगे के अपमान से जुड़ा था तो वह मुद्दा ही नहीं बना।

अब जब रतन टाटा को राजकीय सम्मान दिया गया तो यह भी मुद्दा नहीं बना। यह तथ्य है। आप इसे मीडिया की ताकत या दशा के रूप में जैसे चाहें वैसे देख सकते हैं। वरना राजकीय सम्मान का मतलब यह होता कि खबर वैसे लिखी जाती जैसे हिन्दी के कई अखबारों में लिखी गई है। लाइव हिन्दुस्तान डॉट कॉम के अनुसार, रतन टाटा का पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार। प्रभात खबर डॉट कॉम के अनुसार, एक युग का अंत, राजकीय सम्मान के साथ हुआ अंतिम संस्कार, पंचतत्व में विलीन हुए रतन टाटा। भास्कर डॉट कॉम के अनुसार शीर्षक है, राजकीय सम्मान के साथ रतन टाटा का अंतिम संस्कार। अंग्रेजी अखबारों में यह शीर्षक आज द स्टेट्समैन में है। हिन्दी में यह शीर्षक कुछ इस तरह होगा, “भारत के प्रिय ‘रतन’ का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ”। मुझे लगता है कि यह सब रतन टाटा के नाम पर राजनीति का नतीजा है और शर्मनाक है। वरना कोई कारण नहीं है कि एक साल में पांच भारत रत्न देकर राजनीतिक उत्तराधिकारियों का दिल जीतने की कार्रवाई करने वाली सरकार रतन टाटा को जीते जी भारत रत्न नहीं देती है और उनके निधन के बाद महाराष्ट्र सरकार केंद्र सरकार से यह मांग सार्वजनिक तौर पर करे और वह भी अखबारों में छपे। मुझे लगता है कि बिना मांग इसकी घोषणा वैसे भी की जा सकती थी।

रतन टाटा के नाम पर राजनीति और उसके फायदे की संभावना का पता इस बात से भी चलता है कि भारत में जब निजी विमान सेवाओं को अनुमति देने के लिए लाइसेंस की प्रक्रिया चल रही थी तब मैं जनसत्ता में नौकरी कर रहा था। जो नहीं जानते हैं उन्हें बता दूं एयर इंडिया टाटा समूह का ही स्थापित किया हुआ था जिसका सरकार ने अधिग्रहण कर लिया। बाद में टाटा समूह एक विमानन कंपनी शुरू करना चाहता था। जब इसके लिए लाइसेंस मांगे गये तो टाटा समूह भी शामिल था। बाद में इस दौड़ से अलग होते हुए रतन टाटा ने कहा था और चूंकि तब मैं जनसत्ता में था और उनके कहे का हिन्दी अनुवाद किया था इसलिए मुझे याद है, “हम इस दौड़ से अलग हो रहे हैं क्योंकि सरकार (उस समय की) हमसे जो अपेक्षा कर रही है वह हम नहीं करते हैं”। इस खरी-खरी के बाद सरकार का जो होना था सो हुआ और बहुत बाद में विस्तारा एयरलाइंस के जरिये टाटा ने इस क्षेत्र में कदम रखा। बाद में एयर इंडिया उसे मिल गया और विस्तारा का विलय उसी में हो रहा है। यह सब ऐसे ही नहीं हुआ होगा और इसमें कई बातें होंगी जो सुनने में नहीं आईं और इलेक्टोरल बांड वाली सरकार के जमाने में उसे समझना मुश्किल नहीं है। लेकिन झोला उठाकर चल दूंगा के बाद ना खाउंगा ना खाने दूंगा की आज की राजनीति में रेखांकित करने लायक तो है ही।

राजनीतिज्ञों के लिए रतन टाटा कितने मुश्किल या अलग थे इसका पता द टेलीग्राफ की आज की एक खबर से भी लगता है। यहां यह बता दूं कि द टेलीग्राफ में रतन टाटा को राजकीय सम्मान दिये जाने की खबर अलग से तीन कॉलम में छपी है। इस खबर के अनुसार, गुजरात सरकार ने गुरुवार को एक दिन के राजकीय शोक की घोषणा की थी। द टेलीग्राफ की जिस खबर की चर्चा मैं कर रहा था उसका शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, एक विदाई जिसने बंगाल को डस लिया। इससे जुड़ी कहानी यह है कि बुद्धदेव भट्टाचार्य जब मुख्यमंत्री थे तो टाटा ने अपनी नैनो कार बनाने के लिए पश्चिम बंगाल के सिंगुर में जमीन ली थी और प्लांट बनाने का काम शुरू किया था। ममता बनर्जी ने इसे मुद्दा बनाया और आंदोलन किया। नतीजतन टाटा ने सिंगुर में कार बनाने का प्लान रद्द कर दिया। इधर ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनी रहीं। दो महीने पहले बुद्धदेव भट्टाचार्य का निधन हो गया और संबित साहा ने लिखा है, 16 साल बाद भी भारत के कॉरपोरेट क्षेत्र में यह चर्चा बनी रही है, अगर रतन टाटा नहीं कर पाये तो कौन कर सकेगा। इस खबर के अनुसार ममता बनर्जी ने निवेशकों को बंगाल की अच्छाई बताने की कोशिश की पर अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली।  

राजनीति से टाटा समूह की परेशानी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जमशेदपुर में टाटा के कई प्लांट हैं, पटना राजधानी थी और इस अनुसार व्यवस्था थी। बाद में झारखंड अलग हो गया, सारी व्यवस्था रखी रह गई और उसके सदुपयोग के लिए टाटा ने बिहार में कुछ नया नहीं किया। अभी तक। भाजपा राज में जमशेदपुर के विधायक मुख्यमंत्री रहे और उनपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। इतने कि उन्हें उन्हीं के क्षेत्र में भाजपा के ही बागी सरयू राय ने हरा दिया और हारने पर भी उनके खिलाफ कार्रवाई तो दूर उन्हें उड़ीशा का राज्यपाल बना दिया गया। टाटा समूह या रतन टाटा ने कभी कहा नहीं पर यह सब उनके लिए आसान नहीं रहा होगा। और मैं इंतजार कर रहा था कि एक बार उनसे इन विषयों पर बात जरूर करूंगा। पर अब वो बात हो नहीं पायेगी और जो हो रहा है उसमें मुझे राजनीति नजर आ रही है। बेशक, मैं पूरी तरह गलत हो सकता हूं।

ऐसी राजनीति और हरियाणा के चौकाने वाले चुनाव नतीजों के बाद आज अमर उजाला में पहले पन्ने पर एक खबर छपी है जिसका शीर्षक है, सियासत में नहीं मिला मेवा तो बंद कर दी समाजसेवा। हरियाणा विधानसभा चुनाव के बाद ऐसे कई नेता सामने आए हैं, जिन्होंने चुनाव हारने के बाद समाजसेवा से किनारा कर लिया है। लाडवा से सीएम नायब सैनी के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले संदीप गर्ग ने हारते ही आम लोगों को पांच रुपये में भरपेट खाना खिलाने वाली रसोई बंद कर दी है। हरियाणा जनसेवक पार्टी प्रमुख व महम से पूर्व विधायक बलराज कुंडू ने महम हलके की छात्राओं को रोहतक तक निशुल्क बस सुविधा देने में असमर्थता जताई है। लाडवा में संदीप गर्ग चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद क्षेत्र में सक्रिय नहीं दिखाई दे रहे हैं। उन्हें इस चुनाव में महज 2262 वोट मिले हैं। संदीप गर्ग ने अप्रैल 2022 में लाडवा के पुराने डाकखाने के पास रसोई खोली थी। बाद में लाडवा शहर के बाद हलके के गांव डीग, बाबैन, मथाना, उमरी के अलावा रादौर व शाहाबाद में भी यह रसोई खोली गई। चुनाव परिणाम आने के अगले दिन तक ये रसोई चल रही थी, लेकिन अब इन्हें बंद कर दिया गया है। लाडवा की रसोई में प्रतिदिन करीब 300 लोग खाना खाते थे। इस संबंध में संदीप गर्ग से संपर्क करने का प्रयास किया गया मगर उन्होंने फोन नहीं उठाया। खबर दिलचस्प है और पढ़ने लायक है। मेरी चिन्ता यह है कि अगर ये नतीजे ईवीएम की गड़बड़ी के कारण आये होंगे तो जनता का क्या दोष पर वह काम करने वालों की सेवाओं से तो वंचित हो ही गई। कुल मिलाकर देश की राजनीति ही नहीं पत्रकारिता भी बहुत बदल गई है।

सीएए के लाभार्थियों का पता नहीं

जहां तक सरकार के काम की बात है – इसका पता आज द हिन्दू में छपी एक खबर से चलता है। इस खबर के अनुसार केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा है कि सीएए के लाभार्थियों से संबंधित सूचना आसानी से उपलब्ध नहीं है। ऐसा ही जवाब सेबी प्रमुख माधवी पुरी बुच से संबंधित एक आरटीआई के जवाब में आया था। खबर के अनुसार सीएए के मामले में एक अन्य आरटीआई के जवाब में मंत्रालय ने कहा था कि उसके पास सीएए के तहत प्राप्त आवेदनों को रखने का प्रावधान नहीं है। एक सरकारी विभाग में संबंधित आवेदनों को रखने का प्रावधान नहीं है लेकिन अगर कोई एनजीओ चंदा लेकर काम करता है तो उसे चंदा देने वालों का पूरा विवरण रखना है। दिलचस्प यह है कि सीएए से संबंधित कानून में ही प्राप्त आवेदनों को संभाल कर रखने का प्रावधान नहीं है। इसलिए नहीं रखा जा रहा है। आप समझ सकते हैं कि सरकारी विभागों के बाबुओं के लिए काम कितना आसान है और स्वयं कमाकर खाने वालों को अपने ग्राहकों से जीएसटी वसूल करके सरकारी खाते में जमा करने की जिम्मेदारी थोप दी गई है और गलत न करने की जवाबदेही भी। ऐसे में रोजगार के मौके कैसे बनेंगे इसपर चर्चा नहीं होनी चाहिये? पर चर्चा हो रही है कि जलेबी के कारखाने पर ताकि कुछ करना नहीं पड़े। सरकार बाबू लोग सरकारी नियमों के तहत सुरक्षित हैं उनके खिलाफ विभागीय अनुमति के बिना मुकदमा नहीं चल सकता है।

पराली, प्रदूषण और पर्यावरण

हिन्दुस्तान टाइम्स के पहले पन्ने पर विज्ञापन के अलावा कुल तीन खबरें हैं। इनमें एक रतन टाटा के अंतिम विदाई की और बाकी दो प्रधानमंत्री के प्रचार की। आज रतन टाटा के अंतिम संस्कार की खबर के साथ यह भी बताया है कि यह वर्ली श्मसान घाट पर पारसी रीति रिवाज से हुआ और शव का अंतिम संस्कार विद्युत शवदाहगृह में हुआ। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार पुरानी गाड़ियों के धुंए से सर्दियों में प्रदूषण बढ़ रहा है और सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दी गई है कि खेतों में पराली जलाने से होने वाला धुआँ 20121 के मुकाबले आधा रह गया है। मुझे लगता है कि शवों को बिजली से जलाया जाये और ऐसा नियम बन जाये या लोगों को इसके लिए प्रेरित किया जाये तो यह भी पर्यावरण के लिए फायदेमंद हो सकता है। आज इसके लिए मौका था। पर ऐसी कोई खबर दिखी नहीं।

कोकीन फिर जब्त हुआ

आज के अखबारों में 2.4 करोड़ की कोकीन जब्त होने की खबर है। सरकार, दिल्ली पुलिस और मीडिया की तरफ से इस मामले में कोई खास नहीं है। पहली बार कोकीन पकड़े जाने पर राहुल गांधी ने एक बंदरगाह पर कोकीन पकड़े जाने का मामला उठाया था तो एंकर पत्रकार रजत शर्मा ने एक्स पर लिखा था, “दिल्ली में 5600 करोड़ की ड्रग्स का पकड़ा जाना, एक गंभीर मुद्दा है। इसके सप्लायर का कांग्रेस से कनेक्शन मिलना और भी गंभीर बात है। ये सही है किसी के साथ तस्वीरें होना नेताओं के संबंध होने का सबूत नहीं होता, पर हैरानी की बात ये है राहुल गांधी ने आज हरियाणा में ड्रग्स का ज़िक्र तो किया पर अडानी के पोर्ट पर कई साल पहले पकड़ी गई ड्रग्स को लेकर। कल रात (2 अक्तूबर) दिल्ली में बरामद हुई 500 किलो कोकेन को वो गोल कर गए।  अगर मसला उठाया ही था तो ताज़ा इश्यू की बात भी करते। कांग्रेस और सप्लायर के रिश्ते पर भी सफाई देते”। रजत शर्मा ने राहुल गांधी को तो शांत कर ही दिया अब खुद भी शांत हो गये हैं। पुलिस भी कुछ बता नहीं रही है।

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