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आज के अखबार : टेलीग्राफ ने लिखा है, ग्रेट डिसरप्टर रिटर्न्स पर अबकी बार ट्रम्प ने कर दिया काम, नहीं है!

संजय कुमार सिंह

आज मेरे ज्यादातर अखबारों की लीड ट्रम्प के सत्ता में लौटने और उनके नये आदेशों से संबंधित खबर लीड है। अमर उजाला, दि एशियन एज अपवाद है। अमर उजाला में 14 नक्सलियों को ढेर कर दिये जाने की खबर लीड है तो दि एशियन एज में दिल्ली विधानसभा चुनाव की खबर लीड है। आप जानते हैं कि हरियाणा, महाराष्ट्र की तरह भाजपा भले दिल्ली विधानसभा चुनाव भी जीत जाये पास प्रचार करने या जनता को बताने के लिए कुछ दमदार नहीं है। इसलिए दिल्ली के अखबारों से नहीं लगता है कि दिल्ली में चुनाव है और यह भाजपा को ही प्रचार देने तथा दूसरे दलों की उपेक्षा की सामान्य पत्रकारिता के क्रम में भी हो सकता है। ऐसे मामलों में पक्के तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल है लेकिन जो खबरें हैं उनसे ऐसा ही लगता है। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, भाजपा ने युवाओं के लिए और चारा फेंका; आप ने कहा वह मुफ्त शिक्षा खत्म कर देगी। वैसे इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, भगवा पार्टी छात्रों को सहायता देगी, ऑटो-टैक्सी चालकों को निशाना बनाया। इसके साथ प्रधान मंत्री की रैलियों की योजना है तो राहुल गांधी की रैली की भी खबर है। लीड के साथ प्रधानमंत्री की रैलियों की खबर एक कॉलम में है लेकिन राहुल गांधी की खबर फोटो के साथ तीन कॉलम में लीड के नीचे है, राहुल गांधी कांग्रेस के चुनाव अभियान का नेतृत्व करेंगे, आज से तीन रैलियों को संबोधित करेंगे।

हिन्दुस्तान टाइम्स में अधपन्ने पर दो कॉलम में और द हिन्दू में आज संक्षेप की खबरों में टॉप पर सिंगल कॉलम की खबर है, भाजपा ने दिल्ली में मुफ्त शिक्षा का वादा किया। हिन्दुस्तान टाइम्स ने आम आदमी पार्टी की खबर के साथ इसे संतुलित करते हुए लगाया है। आप ने कहा है कि वह काम करना चाहती है, भाजपा टकराव चाहती है। भाजपा की खबर का शीर्षक है, भाजपा के नये वादों में स्नातकोत्तर तक शिक्षा मुफ्त। भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करती है और किसी देश में सत्ता मिलने पर पीजी तक की शिक्षा मुफ्त हो इससे बेहतर क्या हो सकता है। पर भाजपा ने यह घोषणा लोकसभा चुनाव के समय नहीं की क्योंकि तब इससे वोट नहीं मिलना था अब आम आदमी पार्टी से मुकाबले के लिए जरूरी है। लेकिन भाजपा ने सत्ता में आने के बाद देश में शिक्षा का क्या हाल किया है और डबल इंजन वाले राज्यों में क्या हुआ है यह सबको पता है उसके बावजूद यह घोषणा और पहले पन्ने की खबर बहुत कुछ कहती है।

आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी आम आदमी पार्टी की मुफ्त चुनावी पेशकशों को रेवड़ी कहते रहे हैं और खुद क्या करते रहे हैं। एक वीडियो में रमेश विधूड़ी से पूछा गया कि आप दे तो रेवड़ी और भाजपा दे तो ठीक? विधूड़ी का कहना था कि आम आदमी पार्टी जो देती है, सबको देती है इसलिए वह रेवड़ी है। हम जरूरतमंदों को देते हैं इसलिए वह रेवड़ी नहीं है। उन्होंने उदाहरण दिया कि सभी महिलाओं के लिए बस किराया माफ कर दिया गया है जबकि जो दे सकती हैं उन्हें बुरा लगता है। हम महिलाओं को आर्थिक सहायता देते हैं तो उन्हें ही देते हैं जिन्हें जरूरत है। ऐसे में दिल्ली के बच्चों को मुफ्त शिक्षा की जरूरत है जहां के लोग सबसे ज्यादा आयकर देते हैं पर मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था वहां नहीं है जहां जरूरत है। वैसे भी, मुफ्त शिक्षा की घोषणा कर दी गई हो तो भी स्कूल होने चाहिये, उसका भवन, उसमें कमरे, अन्य आवश्यक फर्नीचर, शिक्षक आदि भी होने चाहिये। पर ज्यादातर राज्यों में शिक्षा तो फ्री है पर स्कूल किसी लायक नहीं है। आम आदमी पार्टी ने इस क्षेत्र में काम किया है जो स्कूलों के बाहर से भी दिखता है। इसलिए दिल्ली में भाजपा मुफ्त शिक्षा देने की बात तो कर रही है लेकिन जहां सत्ता में है वहां वैसा काम नहीं किया है जैसा दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने किया है।

मेरी दिलचस्पी राजनीति में नहीं, खबर में है और मैं देख रहा हूं कि पत्रकार मौका चूक रहे हैं और  इसका कारण भाजपा की आलोचना से बचना न भी हो तो यह हो सकता है कि इससे उसे फायदा नहीं होना है। वरना चुनाव के समय दिल्ली के अखबारों में ऐसी खबरें हो सकती थीं। जो खबरें हैं उनसे भी इसकी पुष्टि होती है। उदाहरण के लिए, एक का शीर्षक है, पीएम मोदी पांच फरवरी को लगायेंगे आस्था की डुबकी। उपशीर्षक है, धर्म संसद के दिन 27 जनवरी को महाकुंभ जायेंगे शाह (अमर उजाला)।  कहने की जरूरत नहीं है कि पांच को जब दिल्ली में मतदान हो रहा होगा तो टेलीविजन पर प्रधानमंत्री के आस्था की डुबकी की ‘खबर’ चल रही होगी और निश्चित रूप से यह उन लोगों को प्रभावित करेगी जिनकी आस्था प्रधानमंत्री जैसी है और अपनी मध्यमवर्गीय जिन्दगी में वे यह डुबकी लगाने का समय नहीं निकाल पाये या खर्चा नहीं जुटा पाये। जहां तक खबर की बात है, दि एशियन एज में यह तीन कॉलम की खबर है। मुख्य शीर्षक है, प्रधानमंत्री, अमित शाह, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति महाकुम्भ में डुबकी लगायेंगे। उपशीर्षक है, मोदी 5 को जायेंगे, 10 को अमित शाह और 27 जनवरी को अमित शाह। खबर से लग रहा है कि यह एक साथ तय किया गया कार्यक्रम है। इसमें प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के डुबकी लगाने की खबर तो है पर राष्ट्रपति के डुबकी लगाने की खबर (उपशीर्षक के रूप में) सिर्फ दि एशियन एज में है। 

इसमें प्रधानमंत्री की डुबकी लगाने की तारीख 5 फरवरी होना खास है और मतदान के दिन इस खबर को दिखाया जाना भले सामान्य होगा लेकिन उसके पीछे की राजनीति को समझना अब मुश्किल नहीं है। इसका एक खबर होना इसका भिन्न तरीकों से महिमामंडन किया जा सकेगा जो वोट दिलाने के काम आयेगा। प्रधानमंत्री को यह सब करना ही था तो चुपचाप कर सकते थे। वे प्रचारित करना चाह रहे थे तो मीडिया को नहीं करना चाहिये था (तब विज्ञापन मिलता) पर मीडिया बिछा हुआ है और सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी उसका फायदा उठा रही है। मोदी के ही बनाये चुनाव आयोग से लेवल प्लेइंग फील्ड की क्या उम्मीद करना और यह चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट के रहते बना है। इसलिए जो हो रहा है उसे समझना मुश्किल नहीं है। क्योंकि नया भी नहीं है। हर बार चुनाव, मतदान की तारीखें इसी लिहाज से तय की जाती हैं और यह भी दिखाई दे रहा है। पर वह सब अलग मुद्दा है। मेरा मुद्दा है कि अखबार वाले क्यों नहीं समझ रहे हैं या क्यों बिछे हुए हैं। 

आज इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स में एक खबर है, दिल्ली कोर्ट ने आर्ट गैलरी से एमएफ हुसैन की पेंटिंग जब्त करने का आदेश दिया। वैसे तो यह अदालत का आदेश है और इसीलिए खबर भी लेकिन इसका समय देखिये और कार्रवाई। खबर के अनुसार एक अधिवक्ता की शिकायत पर इसे हटाने का आदेश दिया गया है जिन्होंने इसे ऑफेंसिव (आपत्तिजनक) कहा था। आर्ट गैलरी में रखी कलात्मक चीज आम आदमी के लिए नहीं है और ऐसी भी नहीं कि आते-जाते नजर पड़ गई। यह कला के पारखियों के लिए होगी और कोई जरूरी नहीं है कि जज और इस मामले में फैसले को प्रभावित करने वाले तमाम लोग कला के पारखी हों। फिर भी यह फैसला हुआ है तो खबर है और यह खबर आज है तो संयोग हो सकता है। मुद्दा यह है कि मौका था तो पूरी बात क्यों नहीं बताई जाये। कहने की जरूरत नहीं है कि इस खबर का संदेश है कि एक आपत्तिजनक कला दिल्ली आर्ट गैलरी में प्रदर्शित थी जो किसी देखने वाले को आपत्तिजनक लगी और चुनाव के मौके पर अदालती आदेश से जब्त हो गई। यह आदेश कुछ दिन पहले होता तो जनता को याद नहीं रहता या मतदान के बाद होता जो मुद्दा नही बनता। अभी बन सकता है। जहां तक आपत्तिजनक होने और लगने की बात है, संभव है अभी वहां गये खास लोगों में बहुतों को नहीं लगी होगी और लगी भी हो तो शिकायत करने लायक नहीं लगी या शिकायत नहीं की गई। एमएफ हुसैन और उनकी पेंटिंग का मामला सबको मालूम है और मैं सिर्फ यह याद दिलाना चाहता हूं कि उन्होंने कहा था (अब वे नहीं रहे) कि उनकी पेटिंग हिन्दू देवी देवताओं की है ऐसा वे नहीं कहते और एतराज के जो मुद्दे हैं वे लोगों के अपने हैं। अब जब हुसैन रहे नहीं और उनकी कृतियां अनमोल हो गई हैं तब उसपर किसी की शिकायत और उसे जब्त करने का आदेश कला के प्रति समाज का नजरिया बताता है। मुझे लगता है कि यह अब संकीर्ण हो रहा है और इस मामले में खबर यह भी थी। जो शायद पहले पन्ने पर नहीं छपे, पढ़ने को नहीं मिले।

इन खबरों के बीच आज के अखबारों सबसे बड़ी खबर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के नये कार्यकाल के पहले दिन की है। सब ने उनके ढेरों फैसलों का हवाला दिया है लेकिन भारत के संदर्भ में फैसलों का विवरण नहीं है। उदाहरण के लिए इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, ट्रम्प जन्मजात नागरिकता का अधिकार खत्म करेंगे, अमेरिका में भारतीयों को प्रभावित करेगा; 18 राज्यों ने मुकदमा किया। एक और खबर का शीर्षक है, पहले आदेशों में अमेरिका विश्व स्वास्थ्य संगठन से अलग हुआ, भारत में जमीनी कार्य प्रभावित हो सकता है। तीसरी खबर का शीर्षक है बगैर दस्तावेज वाले 20,000 से ज्यादा भारतीयों पर वापस भेजे जाने की तलवार। स्पष्ट है कि ये खबरें भारत को प्रभावित करने वाली हैं इसलिए आज यहां विस्तार से होनी चाहिये थीं। दिल्ली चुनाव के कारण पहले पन्ने पर नहीं होतीं तो अंदर होतीं। आज मैंने दिल्ली चुनाव की खबरों की चर्चा पहले कर ली और अब जाहिर है कि अमेरिका की खबर भी वैसे नहीं दी गई है जैसे दी जानी चाहिये थी। यही नहीं आज की खबर का शीर्षक हो सकता था, अबकी बार ट्रम्प ने कर दिया काम।

यह या ऐसा कोई शीर्षक आज मेरे किसी अखबार में नहीं है। आइये देख लूं 1) हिन्दुस्तान टाइम्स – “एच-1बी धारकों के बच्चों को जन्म से नागरिकता नहीं मिलेगी : ट्रम्प का आदेश”। 2) टाइम्स ऑफ इंडिया – ट्रम्प के जमाने की शुरुआत होते ही वैश्विक गर्मी (ग्लोबल वार्मिंग) 3) द हिन्दू – ट्रम्प ने जन्म से मिलने वाली अमेरिकी नागरिकता खत्म करने की घोषणा की। 4) द टेलीग्राफद ग्रेट डिसरप्टर रिटर्न्स (इस पर आगे)। 5) नवोदय टाइम्स – ट्रम्प रोकेंगे पाक की सहायता। 6) अमेरिका डब्ल्यूएचओ से भी हटा, चीन को तवज्जो देने का आरोप। 7) दि एशियन एज – पहला दिन : ट्रम्प ने 6 जनवरी के 1500 से ज्यादा दंगाइयों को आम माफी दी। 8) इंडियन एक्सप्रेस – शीर्षक की चर्चा पहले कर चुका हूं। स्पष्ट है कि ट्रम्प ने जो किया उसमें भारत का हित कम और अहित ज्यादा है। कुछ ही अखबारों ने इसे साफ लिखा है। भारत के लिए क्या अच्छा क्या बुरा जैसा कुछ मुझे नहीं दिखा। नौवें अखबार नवभारत टाइम्स में फैसलों का भारतीयों पर असर शीर्षक के तहत चार खबरें बताई गई हैं। इसके अलावा, यहां प्रमुखता से बताया गया है कि ट्रम्प के खौफ से बिखरे शेयर बाजार। 

आइये, अब डिसरप्टर को समझ लें। वैसे तो डिसरप्टर का अर्थ नकारात्मक है और विध्वसंकारी कहा जा सकता है। डिसरप्ट की हिन्दी अस्थिर करना भी है लेकिन आर बालाशंकर की एक किताब है, नरेन्द्र मोदी – द क्रिएटिव डिसरप्टर ऑफ इंडिया द मेकर ऑफ न्यू इंडिया। इस पुस्तक का अनुवाद मैंने किया है। हिन्दी में इसका नाम है, राष्ट्र साधक नरेन्द्र मोदी आधुनिक भारत के शिल्पकार। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले आई इस किताब के नाम की यह हिन्दी मेरी नहीं है। मुझे बेलिनी कैपिटल में प्रबंध भागीदार आर्नी बेलिनी का एक लेख मिला, बाधा / व्यवधान उत्पन्न करने वाला व्यक्ति (डिसरप्टर) होने का क्या अर्थ है? इसमें उन्होंने कहा है, डिसरप्टर वह व्यक्ति होता है जो लहरें पैदा करने से नहीं डरता, वह व्यक्ति जो चीजों को बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास करता रहता है, बिना इस बात की चिंता किए कि चीजें हमेशा कैसे की जाती रही हैं। एक सच्चे डिसरप्टर के लिए, आईटी की दुनिया सीमाओं को चुनौती देने, अपेक्षाओं को तोड़ने और हर मोड़ पर अपने पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार करने के लिए काम करने का अवसर है। नरेंद्र मोदी के संदर्भ में यह पहले विरोध और बाद में समर्थन हो सकता है और यह आधार, जीएसटी से लेकर तमाम मामलों में है। यही नहीं, नोटबंदी जिस तरह से की गई और उसका जो असर हुआ वह विध्वंसकारी ही है। इससे तमाम उद्योग व्यवसाय चौपट हो गये लेकिन यह मुद्दा ही नहीं बना। ना खाउंगा ना खाने दूंगा के बावजूद प्रधानमंत्री रहते हुए वे विधानसभा चुनावों में जी-जान लगाकर काम करते हैं। सरकारी सुविधाओं से भाजपा का प्रचार करते हैं और जो सरकारें बनी हैं उनमें से एक राजस्थान सरकार के एक तबादला आदेश की कॉपी कल सोशल मीडिया में घूम रही थी जिसमें जिले से बाहर कहीं, दूर तबादला किया गया है। आप समझ सकते हैं कि क्या हुआ होग और ना खाउंगा ना खाने दूंगा का कितना प्रभाव है। टीवी, अखबारों की खबरों से यह सब दिखता है क्या?    

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