NBSA की लताड़ पर टीवी न्यूज चैनलों की माफी क्या घड़ियाली आंसू साबित होंगे?

-संजय कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

बिहार चुनावों के बीच बीते दिनों टीवी न्यूज मीडिया से जुड़ी दो-तीन खबरें बहुत चौंकानेवाली रहीं हैं। एक तो बड़े टीआरपी रैकेट का खुलासा हुआ है। दूसरे, रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के संपादकीय विभाग में कार्यरत कई पत्रकारों पर मुंबई पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। और तीसरा, सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी मामले में गलत रिपोर्टिंग और गलत हेडिंग चलाने के लिए न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी (NBSA) की लताड़ पर आजतक, जी न्यूज, न्यूज 24 और इंडिया टीवी ने सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी है। तो क्या इस माफी से न्यूज चैनलों में न्यूज के नाम पर जो कुछ परोसा जा रहा है वो बदल जाएंगे?

ये चैनल अपनी विश्वसनीयता के लिए एनबीएसए की गाइडलाइंस का पालन करने की कसमें खाते हैं। इसे प्रचारित और प्रसारित भी करते हैं। अब इन्होंने अपने-अपने चैनलों पर प्राइम टाइम में सुशांत की मौत के बाद परोसी गई खबरों को रिपोर्टिंग की ‘तय गाइडलाइन का उल्लंघन’ बताया है। मगर बड़ा सवाल ये है कि क्या इस माफी के बाद ये चैनल सुधर जाएंगे? क्या ये माफी इन चैनलों के घड़ियाली आंसू साबित नहीं होंगे? आपको बता दें कि रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क ने न्यूज की निगरानी वाली इस संस्था से खुद को अलग रखा है।

दरअसल सुशांत सिंह राजपूत मामले में न्यूज चैनलों के सामने माफी मांगने की नौबत क्यों आन पड़ी? इसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे लौटना होगा। भारत में प्राइवेट न्यूज मीडिया की शुरूआत 1996-97 के आसपास मानी जा सकती है। जब जी न्यूज, टीवीआई, स्टार न्यूज जैसे प्लेयरों ने खालिस न्यूज के बिजनेस में कदम रखा। तब दूरदर्शन न्यूज का बोलबाला था लेकिन उस दौर में भी न्यूज का सबसे लोकप्रिय बुलेटिन ‘आजतक’ ही था। इस आधे घंटे के न्यूज बुलेटिन को वरिष्ठ पत्रकार एसपी सिंह अपने ठेठ देशी अंदाज में रोजाना दूरदर्शन पर लेकर आते थे।

हालांकि उस दौर में विनोद दुआ साहब का ‘परख’ भी खासा पॉपुलर न्यूज शो हुआ करता था। कालचक्र जैसे कई दूसरे न्यूज वीडियो मैगजीन भी थे। इन सब पर गौर फरमाएंगे तो उनमें एक बुनियादी उसूल नजर आता था। और वो था आम जनता का विमर्श, उनकी दुख-तकलीफें और सत्ताधारी दल को हर समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराने का साहस। रिपोर्टर देश के दूर-दराज के इलाकों में धूल फांकते हुए रिपोर्टिंग करते थे और ऐसा करते हुए फख्र महसूस करते थे। तब मीडिया का काम सत्ताधारी दलों की चापलूसी और चाटुकारिता नहीं हुआ करती थी।

आज उस दौर के कई पत्रकार और संपादक या तो हाशिए पर हैं या फिर रिटायर हो चुके हैं। तब टीवी और खासकर अखबारों में हनक रखने वाले संपादक हुआ करते थे। चारण-भाटों की तरह सत्ता की चाकरी करने वाले आज के संपादकों की तरह नहीं होते थे जो मालिकों के आगे भीगी बिल्ली बने रहते हैं। यही वजह रही कि जवानी में तमाम अवसरों को छोड़कर जन आंदोलनों में भागीदारी करने वाले और जनता की लामबंदी में यकीन रखनेवाले धारदार राजनीतिक विचारों से लैस कई युवा पत्रकारिता में आए और बीते दो दशकों में उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी है।

पत्रकारिता का ये वही दौर था जब गांधीजी के सत्य और अहिंसा के प्रयोग से खुंदक रखने वाले संघियों ने झूठ और अफवाहबाजी के प्रयोग शुरू किए। इसी कड़ी में गणेश जी के दूध पीने की अफवाह फैलाई गई। बिना किसी इंटनेट, व्हाट्सएप, मैसेजिंग सर्विस के ही देखते-देखते पूरे देश के मंदिरों में गणेशजी की मूर्ति को कटोरी और चम्मच से दूध पिलाई जाने लगी। देश में शायद ये पहला मौका था जब झूठ और अफवाह को तेजी से फैलाने के प्रयोग किए गए। तब कई पत्रकारों और वैज्ञानिकों ने फुर्ती से इसे गलत ठहराया।

आपको याद दिला दें कि दूरदर्शन पर ‘आजतक’ के आधे घंटे की न्यूज बुलेटिन में वैज्ञानिक गौहर रजा साहब ने गणेशजी के दूध पीने के झूठ की हवा निकाल दी।

कल्पना कीजिए, आज ताली-थाली पीटने के दौर में ये हुआ होता तो दूरदर्शन पर बैठकर किसी मुसलमान के लिए ये कह पाना मुमकिन होता। उसकी ये कहने की हिम्मत होती कि गणेशजी का दूध पीना महज अफवाहबाजी है और ये एक शुद्ध वैज्ञानिक सिद्धांत से ज्यादा कुछ नहीं है। जिसे सातवीं क्लास का बच्चा भी समझ सकता है। शायद मोदी मीडिया और गोदी मीडिया के भगवाधारी एंकर और एंकरिया, उनका एक-एक बाल नोंच डालते और देश में बवाल मच जाता। लेकिन तब ऐसा कुछ नहीं हुआ। लोगों ने उनकी बातें गौर से सुनीं और आगे चलकर संघियों का खूब मजाक बनाया गया।

लेकिन आज टीवी में लम्पटई, मजमाफरोशी और अफवाहबाजी का दौर है। जिसकी बुनियाद है मुसलमानो के खिलाफ घृणा और मूलमंत्र है सत्ता की चाकरी। तभी तो संबित पात्रा जैसा संघी गुंडा एक बिहारी एंकर अंजना ओम कश्यप के शो में मुंगेर गोलीकांड के बहाने बिहार में सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने का खेल खेलता है। खुलेआम छत्तीसगढ़ के एक पुलिस इंस्पेक्टर का नाम बार बार लेकर सांप्रदायिकता फैलाने की कोशिश करता है। लेकिन अंजना ओम कश्यप ना तो उसे रोकती है, ना ही टोकती है। बल्कि डिबेट की शुरूआत में 7-8 मिनट तक उसे मुसलमानों के खिलाफ एक विमर्श परोसने का मौका देती है और पूरे समय डिबेट में संतुलन बनाने का नाटक करती रहती है।

दरअसल उसकी खुद की जातिवादी और सांप्रदायिक सोच उसे ऐसा करने को विवश करती रहती है। इस मोहतरमा को गलतफहमी है कि उसकी इस चालबाजी और चालाकी को दर्शक नहीं समझते। इनके जैसे ही आजतक के दूसरे नौनिहाल एंकरों की कारस्तानियों की वजह से ही एक दशक पहले तक सबसे विश्वसनीय चैनल ‘आजतक’ को आज सार्वजनिक रूप से अपने पापों का प्रायश्चित करना पड़ रहा है। गलत खबर चलाने के लिए माफी मांगनी पड़ रही है। लेकिन शर्म है कि इऩको मगर आती नहीं।

मेरी अंजना से कोई खुंदक नहीं है और ना ही मैं व्यक्तिगत तौर पर उन्हें जानता हूं। अगर हमारी बात उन्हें बुरी लगी हो तो मैं सार्वजनिक तौर पर उनसे माफी भी मांगता हूं। क्योंकि पत्रकारों और पत्रकारिता के लिए ये दौर आत्मचिंतन का है। वर्ना देश का टीआरपी रैकेटबाज राष्ट्रवादी चिकना लौंडा अर्नब गोस्वामी पैंट खोलकर बाजार खड़ा है और कह रहा है, उखाड़ लो जो उखाड़ना है। सत्ता की घुड़सवारी कर रहा ये चिकना लौंडा भले ही आज मुंबई पुलिस की वजह से थोड़ा परेशान नजर आ रहा हो, लेकिन आप इसका कुछ बिगाड़ नहीं सकते। इस फेहरिस्त में और भी नाम हो सकते हैं, जिनका उल्लेख मैं जरूरी नहीं समझता।

बहरहाल देश के चार बड़े और प्रतिष्ठित न्यूज चैनलों का न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी (NBSA) के दिशा निर्देशों का पालन करना फिर से एक नई उम्मीद जगाता है। जरा सोचिए, जब इन चैनलों के मैनेजमेंट ने गलती अपने ही चैनल पर दिखाने का फैसला लिया होगा तो इऩके संपादकों, एंकरों और रिपोर्टरों और डेस्क पर झूठी खबरें तैयार करने वाले पत्रकारों पर क्या गुजरी होगी। पत्रकारिता में बड़े जोश से करियर बनाने आए नौजवानों क्या सोच रहे होंगे? क्या उन्हें अपनी गलती का अहसास सही में हुआ होगा या ये बस महज खानापूरी ही साबित होगा?

और आखिर में देश में टीवी न्यूज के नामी गिरामी संपादकों से पूछना चाहता हूं, सरजी आप अपने किन-किन गुनाहों के लिए माफी मांगेंगे? आप नोटबंदी, जीएसटी के बाद देश की चौपट अर्थव्यवस्था, भीषण बेरोजगारी के बाद भी ‘मोदी नाम केवलम’ के लिए माफी मांगेंगे? देश में कोरोना फैलाने के लिए तबलीगी जमात को कसूरवार ठहराने के लिए माफी मांगेंगे? पालघर में साधुओं की हत्या के लिए सोनिया गांधी को जिम्मेदार ठहराने के लिए माफी मांगेंगे? आप सीएए-एनआरसी के खिलाफ आंदोलनरत छात्रों पर लाठी चार्ज को सही ठहराने के लिए माफी मांगेंगे या फिर हाथरस की बेटी को इंसाफ दिलाने की जगह आरोपियों के पक्ष में खड़ा होने के लिए माफी मांगेंगे? आपने तो कोरोना भगाने के लिए मोदीजी के कहने पर अनपढ़-गंवारों की तरह मोमबत्ती जलाकर और ताली-थाली पीटकर अपने संपादक होने की काबिलियत पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं! माफ कीजिएगा, ‘जब पत्रकरिता का इतिहास लिखा जाएगा तो टीवी न्यूज के इस दौर को सबसे काले दौर के रूप में ही याद किया जाएगा।‘

लेखक परिचय: संजय कुमार बीते 30 साल से कई अखबार, पत्र-पत्रिकाओं और टीवी न्यूज चैनल से जुड़े रहे हैं। फिलहाल स्वराज एक्सप्रेस न्यूज चैनल के कार्यकारी संपादक हैं।

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