जीवन भर धार्मिक आडंबरों के खिलाफ बोलने वाले निदा फाजली को मरने के बाद मुसलमानों ने बुरी तरह घेर लिया

सारा घर ले गया घर छोड़ के जानेवाला

-रासबिहारी पाण्डेय-

इस छोटे से जीवन में जिन बड़े कवि शायरों के साथ कुछ खुशनुमा शामें गुजरी हैं और कवि सम्मेलन मुशायरों में शिरकत करने का मौका मिला है ,उनमें एक नाम निदा फ़ाज़ली का भी है.पिछले 8 फरवरी को जब निदा फ़ाज़ली नहीं रहे तो वे सारी यादें एकबारगी चलचित्र की तरह आँखों के सामने घूम गयीं .उनके इंतकाल के बाद उन्हें सुपुर्दे खाक किये जाने तक छह सात घंटे उनके घर और उनके घर से चंद कदम दूर यारी रोड स्थित कब्रिस्तान और मस्जिद में गुजारने के दौरान कुछ उन दोस्तों के साथ भी अरसे बाद मिलने का मौका मिला जो अब या तो किसी की मैयत में मिलते हैं या किसी मुशायरे में . मुंबई की एक खुली सच्चाई यह भी है कि लोग अपनी जरूरतों से कुछ इस तरह बावस्ता हैं कि जिसे दिल से चाहते हैं उसे ज्यादे वक्त नहीं दे पाते, जिसे दिमाग से चाहते हैं उसे ज्यादे वक्त देना पड़ता है.

उस दिन निदा की अर्थी के साथ इस दौर का कोई बड़ा लीडर ,एक्टर या म्युजिक डायरेक्टर नहीं था….थे तो कलम से जुड़े नये पुराने पचीसों कवि लेखक और शायर जो उन्हें अंतिम विदाई दे रहे थे ….एक शायर जो सही अर्थों में शायरे वतन था ,उसके साथ जमाने का यह सुलूक देखकर दिल को लहू लुहान होना ही था. निदा जीवन भर धार्मिक आडंबरों के खिलाफ लिखते बोलते रहे लेकिन मरने के बाद उन्हें मुसलमान दोस्तों ने वैसे ही घेर लिया जैसे रवीन्द्र जैन के मरने के बाद जैन धर्मावलंबियों ने घेर लिया था.निदा को घर से एंबुलेंस में कब्रिस्तान लाने के बाद नहला धुलाकर कफन में लपेटकर ,इत्र छिड़ककर पास के मस्जिद में लाया गया. रात की नमाज के शुरू होने और उसके खत्म होने का काफी देर तक इंतजार किया गया …..उसके बाद ही सुपर्दे खाक किया गया. इस मोहब्बत की दाद तो देनी ही होगी ,वर्ना “अल्ला तेरे एक को इतना बड़ा मकान या घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें ,किसी रोते हुये बच्चे को हंसाया जाये” लिखनेवाले निदा के लिए मुल्लों ने बस फतवा भर जारी नहीं किया था ….जितना हो सकता था लानतें मलामतें तो भेजी ही थीं.

पिछले बरस मुंबई के एक उपनगर भायंदर में उनका एकल काव्यपाठ और वरिष्ठ शायर सिब्बन बैजी की पुस्तक का लोकार्पण कार्यक्रम साथ साथ रखा गया था. कार्यक्रम के पश्चात धीरेन्द्र अस्थाना, पूरन पंकज, हरि मृदुल, आलोक भट्टाचार्य … हम छह सात लोग डिनर के लिये बैठे. निदा दुनिया जहान की ढ़ेर सारी बातें करते रहे. उन्होंने उस दिन यह बात फिर दुहरायी जो वे अपनी किसी किताब में बहुत पहले लिख चुके हैं –मेहनत सब करते हैं ,कोशिश सब करते हैं मगर उन लाखों करोड़ों में कोई एक लता मंगेशकर होता है, कोई एक जगजीत सिंह होता है, कोई एक अमिताभ बच्चन होता है……कुदरत का यह कोई बड़ा रहस्य है ,जो समझ से परे है .मैंने उसमें उनकी एक और बात जोड़ी कि आपने कहीं यह भी लिखा है कि रचना किसी चमत्कार की तरह होती है जो पूरी तरह रचनाकार के बस में नहीं होती ,वर्ना वही रचनाकार जानबूझकर अगली बार दूसरे दर्जे की रचना नहीं करता. वे बोले – हां दोनों मिली जुली बातें हैं . थोड़ी देर बाद मैंने आलोक भट्टाचार्य के कान में धीरे से कहा कि दो घंटे हो गये निदा ने अपना तकिया कलाम ‘फाड़ दो’ नहीं कहा तो वे जोर से हँसे और मेरे मना करने के बावजूद उनसे पूछ बैठे –पांडे जी की जिज्ञासा शांत कीजिए. दो घंटे गुजर गये आपने अपना तकिया कलाम नहीं दुहराया. आमतौर पर मुस्कुराते रहने वाले निदा ने उस दिन संजीदा होकर कहा था कि वो तो मैं दूसरों के लिए बोलता हूं . उस दिन उनके ऊपर अनुष्का पत्रिका का एक अंक निकालने की भी बात तय हुई थी …लेकिन यह योजना कार्यान्वित न हो सकी, जिसका मुझे आजीवन अफसोस रहेगा.

बहुत नाज नखरे और पैसे लेकर कार्यक्रमों में जानेवाले निदा ने अपना एहसानमंद होने का एक मौका मुझे दिया था .वे सन 2003 में मेरे कविता संग्रह “सीप के मोती” के लोकार्पण के लिए जुहू के नवजीवन हॉल में अपने खर्चे से ऑटो लेकर पधारे ,पुस्तक पर बोले और अपनी  ग़ज़लें भी सुनाईं .साथ ही कार्यक्रम के बाद आलोक भट्टाचार्य,सिब्बन बैजी और मुकेश गौतम को अपने घर ले जाकर सुरापान भी कराया. उस दिन बड़े चुटीले अंदाज में उन्होंने कहा था -मुगलों के जमाने में बिहारी थे ,अटलबिहारी के जमाने में रासबिहारी हैं .इस दौर में हर दोहे पर अशर्फी मिलने से तो रही …क्योंकि फिलहाल शब्दों की कीमत सबसे कम रह गई है . हर रचनाकार दुनिया को खुश और हरा भरा रखने की कोशिश में काम करता है,इस लिहाज से अदब की दुनिया में एक और कवि का एहतराम होना ही चाहिए.

पिछले दस सालों से निदा से लोगों को एक खास शिकायत थी कि वे कार्यक्रमों में स्वीकृति देकर भी नहीं पहुँचते हैं ,जिससे लोगों को ज़िल्लत उठानी पड़ती है.स्वीकृति का मतलब होता था उनके द्वारा बतायी गयी रकम. इस बारे में खुली जुबान लोगों को यह कहना था कि उसके दो तीन कारण होते हैं या तो बतायी गयी रकम से भी ज्यादे रकम कहीं और मिल जाती थी या उस कार्यक्रम में किसी ऐसे शख्स का नाम जिसे वे नापसंद करते हों या फेहरिस्त में उनका नाम उनसे किसी जूनियर शायर के नाम के बाद आना .वजहें बाद में मालूम होती थीं. ये उनकी निजी बातें थीं ,लेकिन इससे उनके बहुत सारे चाहनेवालों को निराश लौटना पड़ता था ,लेकिन वे जहाँ जाते थे कार्यक्रम को एक खास गरिमा अपने आप मिल जाती थी. बड़े कवि सम्मेलन मुशायरों में अक्सर नेताओं और प्रमुख अतिथियों के लिए चलता हुआ कवि सम्मेलन रोक दिया जाता है लेकिन निदा ने अपने कविता पाठ के दौरान कभी ऐसा नहीं होने दिया .मैंने कई बार आयोजकों को मंच से उन्हें डाँटते और यह कहते हुए देखा कि शायर जब माइक पर होता है तब महफिल में उससे बड़ा और कोई नहीं होता ,शायर अपना कलाम सुना ले, उसके बाद किसी की आवभगत कीजिए. निदा के अलावा मैंने ऐसा करते हुए किसी को नहीं देखा .फिलहाल मंच के कवियों में हरिओम पंवार,सुरेन्द्र शर्मा और अरुण जेमिनी में वह तेवर थोड़ा है….वर्ना तो अधिकतर कवि शायर आयोजकों के सामने मेमने बने रहते हैं कि कहीं नाराज हो गया तो अगली बार नहीं बुलाएगा.

जगजीत सिंह ने निदा की कई अन्य ग़ज़लों के साथ ”अब खुशी है न कोई दर्द रुलानेवाला, हमने अपना लिया हर रंग जमानेवाला, उसको रुखसत तो किया था मगर मालूम न था, सारा घर ले गया घर छोड़ के जानेवाला” को अपनी आवाज देकर उसे अमर कर दिया है.जब तक दुनिया रहेगी अपने हर चाहनेवाले के लिये लोग इसे गुनगुनाते रहेंगे .यह ग़ज़ल निदा ने जगजीत सिंह के बेटे की मौत के बाद लिखी थी जिसे कम्पोज करते हुये जगजीत सिंह खुद भी रो पड़े थे .निदा जैसे शायर का हमारे समाज में बने रहना बड़ा ज़रूरी था जो खुलेआम यह कहता था –कोई हिंदू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है,सबने इंसान न बनने कसम खायी है. काश ऐसा हो पाता!

लेखक Rasbihari pandey से संपर्क anushkamagazine@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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