अटलजी के निधन के बाद जी मीडिया के आफिस में कैसा था माहौल, पढ़ें

Paramendra Mohan : अटल जी के निधन के बाद हमारे संस्थान ज़ी मीडिया में एक मिनट का मौन रखा गया था। चैनल की इमारत में घुसते ही ग्राउंड फ्लोर पर अटल जी की तस्वीर रखी थी, गुलाब के फूल रखे गए थे और हर मीडियाकर्मी उन्हें पुष्पांजलि अर्पित कर नमन कर रहा था। मेरा अटल जी के प्रति हमेशा से एक खास लगाव रहा है, इसलिए मैं करीब 10 मिनट तक वहीं रुककर उनकी स्वाभाविक मुस्कान वाली तस्वीर देखता रहा था। यकीन मानिए, हर चेहरे पर मैंने किसी अपने को खो देने वाले भाव देखे। Continue reading

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गुनगुनी धूप और वो सभा! फिर न कभी वैसे सुनने वाले आए और न उन-सा बोलने वाला…

श्रीगंगानगर। डेट और दिन तो याद नहीं, लेकिन ये पक्का याद है कि सर्दी का मौसम था। दोपहर पूरी तरह ढली नहीं थी। सर्दी तो थी, लेकिन खिली हुई धूप ने पाने शहर के नेहरू पार्क को और अधिक निखार दिया था। घास ऐसे लग रही थी जैसे कोई कालीन बिछा हो। लगभग 5 बजे के आस पास का समय होगा। मंच पर बीजेपी के नेता भाषण दे रहे थे। शायद हरियाणा के प्रो राम बिलास शर्मा और प्रो गणेश लाल मेँ से कोई एक था। प्रो शर्मा अब हरियाणा सरकार मेँ मंत्री हैं और प्रो गणेश लाल उड़ीसा के राज्यपाल। यह 1993 के विधानसभा चुनाव की बात है। Continue reading

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देश में रफी साहब का आखिरी कंसर्ट हुआ था राजहरा में

छत्तीसगढ़ी फिल्मों और भिलाई से भी जुड़ी कुछ बातें और यादें उस कंसर्ट की

भिलाई। सुर सम्राट मुहम्मद रफी साहब के गुजरने के 38 साल बाद भी उनके दीवानों की कभी कोई कमी नहीं रही। रफी साहब का छत्तीसगढ़ से आत्मीयता का नाता रहा है। जहां शुरूआती दौर की छत्तीसगढ़ी फिल्मों ‘कहि देबे संदेस’ और ‘घर द्वार’ के गीतों को उन्होंने अपनी आवाज दी। वहीं अब तक की ज्ञात जानकारी के मुताबिक देश के भीतर आखिरी सार्वजनिक कार्यक्रम रफी साहब ने भिलाई स्टील प्लांट (बीएसपी) की लौह अयस्क खदान नगरी दल्ली राजहरा में 26 अप्रैल 1980 को दिया था। दल्ली राजहरा के बाद उनका आखिरी स्टेज परफार्मेंस भारत के बाहर श्रीलंका में 18 मई 1980 को हुआ था और इसके बाद रमजान का महीना लग चुका था। जिसमें रफी साहब स्टेज प्रोग्राम नहीं देते थे। और रमजान के महीने में ही रफी साहब ने 31 जुलाई 1980 को आखिरी सांस ली थी।

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लेफ्टिस्ट से लेकर राइटिस्ट तक, हर कोई दे रहा राज किशोर को श्रद्धांजलि

वरिष्‍ठ पत्रकार Raj Kishore नहीं रहे। मैं उनके लिखे का प्रशंसक था। आम बोलचाल की भाषा में सरलता-सहजता से वे जिस तरह गंभीर बात लिख जाते थे, वह उन्‍हें विशिष्‍ट बनाता था। हिंदी के अनेक समाचार-पत्रों में उनके स्‍तंभ थे। दैनिक जागरण, जनसत्ता, अमर उजाला आदि में उनके नियमित लेख छपते थे। मैं बड़े ही चाव से पढ़ता था। कारण कि वे गांधी और लोहिया के विचारों के आलोक में लेखन करते थे और मैं भी इन दोनों महापुरुषों के विचार से अनुप्राणित होता हूं। वे साम्‍यवाद के आलोचक थे। Continue reading

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श्रीनिवास तिवारी रीवा से लेकर भोपाल दिल्ली तक यथार्थ से ज्यादा किवंदंती के जरिए जाने गए

Jayram Shukla : एक आम आदमी का जननायक बन जाना… श्रीनिवास तिवारी रीवा से लेकर भोपाल दिल्ली तक यथार्थ से ज्यादा किवंदंती के जरिए जाने गए। दंतकथाएं और किवंदंतियां ही साधारण आदमी को लोकनायक बनाती हैं। विंध्य के छोटे दायरे में ही सही तिवारीजी लोकनायक बनकर उभरे और रहे। मैंने अबतक दूसरे ऐसे किसी नेता को नहीं जाना जिनको लेकर इतने नारे,गीत-कविताएं गढ़ी गईं हों। सच्चे-झूठे किस्से चौपालों और चौगड्डों पर चले हों। उनकी अंतिमयात्रा में उमड़ा जनसैलाब इन सब बातों की तस्दीक करता है।

राजनीति उनके रगों में थी या यूँ कहें कि उनका राजनीति जुडाव जल व मीन की भांति रहा। वे अच्छे से जानते थे कि इसे कैसे प्रवहमान बनाए रखा जाए। वे जितने चुनाव जीते लगभग उतने ही हारे लेकिन उन्होंने खुद को हारजीत के ऊपर बनाए रखा। कविवर सुमन की ये कविता- क्या हार में क्या जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं, संघर्ष पथपर जो मिले यह भी सही वह भी सही..अटल बिहारी वाजपेयी की जुबान से निकलने के पहले उनकी जुबान से सन् 1985 में तब निकली थी जब अर्जुन सिंह ने उनकी टिकट काट दी थी और अमहिया में 20 से 25 हजार समर्थकों की भीड़ उनपर यह दवाब बनाने के लिए डटी थी कि वे कांग्रेस से बगावत करके न सिर्फ लड़ें अपितु विंध्य की सभी सीटों से अपने उम्मीदवार खड़ा करके कांग्रेस को सबक सिखाएं। उन्होंने समर्थकों को यह कहते हुए धैर्य रखने को कहा कि कांग्रेस का मतलब अकेले अर्जुन सिंह थोड़ी न है और भी बहुतकुछ है। देखते जाइए..। और फिर 85 में अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के दूसरे दिन जब राजीव गांधी ने उनसे इस्तीफा लेकर पंजाब का राज्यपाल बनाया तब उनके समर्थकों को तिवारी जी के कहे का मतलब समझ में आया और यह वाकया भी दंतकथाओं में चला गया।

अर्जुन सिंह के इस्तीफा लिए जाने के पीछे तिवारीजी की कोई भूमिका रही हो या न रही हो पर किसी घटनाक्रम को राजनीति में अपने हिसाब से कैसे मोड़ा जा सकता है तिवारीजी से बेहतर कोई नहीं जानता। यद्यपि प्रचंड विरोध के बाद भी अर्जुन सिंह से उनके संवाद निरंतर कायम रहे। तिवारीजी कहा करते थे प्रतिद्वन्द्विता में संवादहीनता स्थायी दुश्मन बना देती है और राजनीति में न कोई दोस्त होता और न दुश्मन। समय के साथ भूमिका बदलती रहती है। आगे दिग्विजय सिंह के साथ यही हुआ भी। 1993 में तिवारीजी श्यामाचरण शुक्ल को मुख्यमंत्री बनाने की मुहिम के अगुआ थे लेकिन बन गए दिग्विजय सिंह और बाद में प्रदेश ने दिग्विजय सिंह तिवारीजी की युति को भी देखा और दोस्ती को भी।

तिवारीजी को आमतौर पर समाजवादी नेता के तौर पर देखा जाता था। 72 में कांग्रेस में आने के बाद गाँधीवादी भी हो गए ऐसा लोग मानते हैं। हकीकत तो यह है कि तिवारीजी न समाजवादी थे न गाँधीवादी। वे यथार्थवादी थे, वे अपने वाद के खुद प्रवर्तक थे उनके आदर्श का खुद का अपना पैमाना था। कभी भी किसी भी इंटरव्यू में न तो उन्होंने लोहियाजी अपना आदर्श माना और न ही गाँधीजी को। वे अपने आदर्श की खोज जनता के सैलाब में करते थे। उनका आदर्श कोई व्यक्ति नहीं बल्कि भाव था और वह भाव था जनता-जनार्दन। जनता जनार्दन कहने वाले तो आज भी बहुतेरे हैं पर उसे वाकय जनार्दन मानने वाले वे विरले नेता थे। हाँ वे अपने नेता के रूप में जिंदगी में सिर्फ दो लोगों को स्वीकार किया एक जगदीश जोशी जिनकी बदौलत वे सोशसलिस्टी हुए, दूसरी इंदिरा गांधी जिनके भरोसे वे काँग्रेस में शामिल हुए।

काँग्रेस में रहते हुए भी सभी समाजवादी उन्हें अपनी बिरादरी का मानते रहे लेकिन ये बात बहुत कम लोगों को ही मालुम होगी कि उनकी डाक्टर लोहिया से कभी नहीं पटी। वजह तिवारीजी इतने दुस्साहसी थे कि लोहिया को भी तड़ से जवाब देने से नहीं चूकते थे। दो घटनाएं मुझसे साझा की थी, पहली सन् 52 के पहले आम चुनाव की थी। लोकसभा के चुनाव में सीधी संसदीय क्षेत्र से भगवानदत्त शास्त्री को सोशलिस्ट पार्टी से उतारा गया था। शास्त्री जी को सिंबल मिला उन्होंने पर्चा भी दाखिल कर दिया। इसी बीच लोहियाजी को क्या सूझी वे कानपुर के एक उद्योगपति सेठ रामरतन को लेके आ गए, कहा सीधी से सोपा की टिकट पर अब ये लड़ेगे। लोहिया के फैसले को चुनौती देना उन दिनों सोशलिस्टों के लिए भगवान को चुनौती देना था। साथियों की रोकटोक के बाद भी तिवारीजी ने कहा हम डाक्टर साहब का फैसला नहीं मानेंगे। ये क्या बात हुई दिनभर सेठ साहूकारों,जमीदारों के खिलाफ बोलों और रात को सेठों से समझौता..नहीं होगा ऐसा।

तय हुआ कि शास्त्रीजी पर्चा वापस लें और रामरतन सोपा के उम्मीदवार बनें। सहज शास्त्री तो तैयार बैठे थे। पर जिस दिन परचा खींचने की बात आई तिवारी सीधी पहुँचे एक सायकिल जुगाड़ी, किसी बहाने शास्त्रीजी को सायकिल के डंडे में बैठाया और उन्हें लेकर जंगल भाग गए। जब पर्चा खींचने की मियाद खत्म हुई तभी लेकर लौटे।

कल्पना कर सकते हैं कि लोहियाजी का गुस्सा कैसे रहा होगा पर राजनीति में करियर बनाने के दिनों में तिवारीजी के ये तेवर थे। किसी ने पूछा- ऐसा क्यों किया? तिवारीजी ने जवाब दिया चुनाव जनता जिताती है, लोहिया नहीं। खैर लोकसभा के पहले आमचुनाव में सीधी लोकसभा सीट से भगवानदत्त शास्त्री जीते लोहियाजी के सेठ रामरतन नहीं। जबकि लोहियाजी ने भी सभाएं कीं थीं व शास्त्री से रामरतन को वोट देकर विजयी बनाने की अपील भी करवाई।

दूसरा वाकया था जब मध्यप्रदेश का गठन हुआ तो विधानसभा में सोपा विधायक दल का नेता कौन हो? लोहियाजी का विचार था कि पिछड़े वर्ग से आने वाले बृजलाल वर्मा हमारे दल के नेता बनें। तिवारी यद्यपि 56 का चुनाव हार चुके थे फिर भी उन्होंने लोहियाजी से खुले मुँह कहा नेता तो जगदीश जोशी होंगे हम जाति के सवाल पर योग्यता को बलि नहीं चढ़ने देंगे। डाक्टर लोहिया तुनुककर चले गए इधर जोशीजी को ही सोपा विधायक दल का नेता चुना गया। लोहियाजी इतने खफा हुए कि तिवारीजी को सभी समितियों से निकाल बाहर किया पर तिवारी तो तिवारी ही थे, दुस्साहसी, निश्चय के पक्के दृढ़ चट्टान की भांति अड़े रहने वाले।

राजनीतिक प्रतिबद्धता कोई तिवारीजी से सीखे। जहाँ रहो आखिरी साँस तक उसी को जियो और यदि त्याग दिया तो- तजौ चौथि के चंद की नाईं। विंध्यप्रदेश की विधानसभा में जमीदारी उन्मूलन, आँफिस आफ प्राफिट तथा विलीनीकरण के खिलाफ उनके ऐतिहासिक भाषण हुए। बीबीसी तक ने उन भाषणों को कवर किया था ऐसा जोशीजी बताते थे। तिवारीजी के भाषणों में पंडित शंभूनाथ शुक्ल नहीं बल्कि पं जवाहरलाल नेहरू निशाने पर रहते थे। यहाँ तक कि लोहिया एक बार इस बात से नाराज भी हो गए थे कि अपना स्तर देख के विरोध भी करना चाहिए। नेहरू पर तो लोहिया ही अँगुली उठा सकता है तिवारी को कहो कि वह अपने मुख्यमंत्री तक सीमित रहा करें। पर तिवारी कहाँ किसी की सुना करते थे। उस पचीस साल की उमर में तिवारी जी को ‘मेयो की पार्लियामेंट्री प्रैक्टिस’ रटी थी। आफिस आँफ प्राफिट वाली बहस में उनका भाषण लाजवाब था। आगे चलकर नजीर भी बना। कुछ साल पहले जब सोनिया गाँधी, जया बच्चन व अन्य नेताओं पर ये सवाल पार्लियामेंट में खड़ा हुआ तो विंध्यप्रदेश की ये बहस वहाँ नजीर के तौरपर पेश की गई।

तिवारीजी सन् 72 में चंदौली सम्मेलन में जगदीशचंद्र जोशी के कहने पर काँग्रेस में शामिल हुए। तब वे मनगँवा से विधायक थे। इसके बाद वो कांग्रेस में साँस लेने लगे। उन्होंने बताया था कि जब वे काँग्रेसी बनके रीवा लौटे तो साथियों से कह दिया कि सोशलिस्ट पार्टी को वे गंगा में बहा आए हैं अब कांग्रेस में जीना और यहीं मरना। तिवारीजी कितने प्रतिबद्ध काँग्रेसी बन गए थे इससे अनूठा उदाहरण राजनीति के इतिहास में कुछ हो ही नहीं सकता जो उन्होंने विधानसभा में अपने भाषण में दिया। सन् 74 में जयप्रकाश नारायण का आंदोलन चरम पर था तिवारीजी ने मध्यप्रदेश की विधानसभा में काँग्रेस की ओर से भाषण देते हुए यहाँ तक कह डाला- जयप्रकाश नारायण ने सेना और पुलिस को विद्रोह के लिए आह्वान किया है, यह सरासर राष्ट्रद्रोह है उन्हें तत्काल गिरफ्तार कर जेल में डाल देना चाहिए..। ये शब्द उन तिवारीजी के थे जो सोशलिस्ट में रहते हुए डाक्टर लोहिया से ज्यादा जयप्रकाश को मानते थे। उन्हीं जयप्रकाश ने 1950 में रीवा में हिंद किसान पंचायत के सम्मेलन में.. जोशी-जमुना-श्रीनिवास का नारा दिया था।

तिवारीजी के लिए राजनीति के अपने नियम थे। वे जुनूनी थे राजनीति में रिश्ते और दिल निकाल कर ताक पर रख देते थे। 75 में इमरजेंसी लगी। उनके पुराने समाजवादी साथी जेल में बंद कर दिए गए जोशीजी जो कि अब काँग्रेस में उनके नेता थे, जब कभी जेल में बंद पुराने समाजवादी साथियों के प्रति सहानुभूति दर्शाते तो तिवारीजी कहते कि हमारी पार्टी(काँग्रेस) और नेता (इंदिरा गांधी) के विरोधी हैं इन लोगों को जेल में ही सड़ना चाहिए। कवि ह्रदय जोशीजी ने अंततः कांग्रेस छोड़ने का मन बना लिया। तिवारीजी और अच्युतानंदजी को बुलाकर कहा चलो अब जनतापार्टी में लौट चलते हैं तिवारी जी ने जवाब दिया-खसम किया बुरा किया,करके छोड़ दिया और बुरा किया। तब तो हम सोपा छोड़ना ही नहीं चाहते थे आपने छुड़वा दी, अब जहाँ हूँ वहीं रहूँगा आपको जाना हो जाइए। तबके इंदिरा गांधी के अत्यंत नजदीक,परमविश्वासी जोशीजी जनता पार्टी में चले गए। तिवारीजी ने एक सभा में संभवतः जोशीजी की शोकसभा में कहा था -जोशी जी तब काँग्रेस नहीं छोड़े होते तो वे 1980 में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते। कुछ समय तक इंदिराजी के यहाँ जोशीजी की वही हैसियत थी जो आज सोनिया गाँधी के यहाँ अहमद पटेल की है।

तिवारीजी राजनीति में बड़ी लकीर खींचने की बजाय उस लकीर को मिटाकर अपनी खींचने पर यकीन करते थे। अल्पकाल के लिए मंत्री और दस वर्ष तक विधानसभाध्यक्ष रहते हुए यही किया। अस्सी की शुरुआत में उनकी अर्जुनसिंह से गाढ़ी छनती थी। वजह 77 में नेताप्रतिपक्ष बनाने में तिवारीजी ने अर्जुनसिंह के लाए लाँबिंग की थी। तेजलाल टेंभरे इस पद के बड़े दावेदार थे। समाजवादी पृष्टभूमि होने के नाते वे मानकर चल रहे थे कि तिवारीजी और उनका गुट सपोर्ट करेगा पर तिवरीजी ने कृष्णपाल सिंह व अन्य को अर्जनसिंह के लिए तैयार किया। 80 में मुख्यमंत्री बनने के बाद हाल यह था कि अर्जुनसिंह तिवारीजी के बँगले में रायमशवरा करने जाते थे। तिवारीजी की कई टिप्स उनके काम भी आई। जैसे अर्जुन सिंह मुख्यसचिव को बरखाश्त करने का साहस ही नहीं जुटा पा रहे थे। तिवारीजी ने अर्जुन सिंह से कहा का ये पुण्यकाम कल करना चाहते हैं तो आज अभी करें तभी प्रदेश चला पाएंगे। फिर जो हुआ प्रदेश जानता है। समस्त नियमों को शिथिल करते हुए की भाषा तिवारीजी ने ही दी।

तिवारीजी की तार्किकता का कोई जवाब नहीं। एक बार उन्होंने शिक्षा विभाग की फाईल में टीप लिख दी। हंगामा मच गया। कैबिनेट में तिवारीजी ने कहा कि मैंने मंत्री पद की शपथ ली है विभाग की नहीं। हर फैसले की जब सामूहिक जिम्मेदारी होती है तो मेरे विभाग में भी शिक्षामंत्री का उतना ही अधाकार है जितना मेरा उनके विभाग में। विभाग वितरण तो एक व्यवस्था है। कैबिनेट में मुख्यमंत्री की हैसियत को लेकर फर्सट एमंग इक्वल का सवाल उन्होंने तभी उठा दिया था जो आज सुप्रीम कोर्ट के जज लोग उठा रहे हैं। स्वास्थ्यमंत्री पद से उनका इस्तीफा नितांत वैयक्तिक व पारिवारिक कारणों से हुआ था। अर्जुनसिंह के मुख्यमंत्री रहते तिवारी की दहशत का आलम यह था का काँग्रेस में रहते हुए ही सहकारिता मंत्री राजेन्द्रजैन का ऐसा मसला उठा दिया कि लगा कि सरकार ही गिर जाएगी। उनके हरावल दस्ते में मोतीलाल वोरा,केपी सिंह,शिवकुमार श्रीवास्तव,हजारीलाल रघुवंशी जैसे दिग्गज हुआ करते थे। 85 में इन सबकी टिकट कटी।

विधानसभाध्यक्ष रहते हुए उन्होंने देश को बताया कि स्पीकर क्या होता है। उनका फार्मूला था मोटी चमड़ी खुली जुबान। स्पीकर रहते हुए उन्होंने सबसे ज्यादा संरक्षण विपक्ष के विधायकों दिया। वे जिग्यासु विधायकों के सच्चे मायनों में गुरू थे। भाजपा की दूसरी लाईन के जो नेता आज मप्र,छग में राज कर रहे हैं प्रायः संसदीयग्यान के मामले में तिवारीजी के ही तरासे हुए हैं चाहे वे नरोत्तम मिश्र हों या छग के ब्रजमोहन अग्रवाल। विधानसभा में उन्होंने कई प्रतिमान गढ़े, और संसदीय इतिहास को अविस्मरणीय बनाया। तिवारीजी को महज एक लेख में नहीं समेटा जा सकता वे जिंदगीभर एक खुली किताब रहे वक्त ने उसपर मोटी जिल्द चढ़ाकर सदा के लिए बंद कर दिया। उनकी स्मृतियों को नमन! बस आज इतना ही..बाकी फिर कभी।

वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल की एफबी वॉल से.

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छह माह से संपादकीय कामकाज से दूर रहने की लाचारी ने शेखर त्रिपाठी को तोड़ दिया था

Upendranath Pandey : शेखर भाई, तुमने यह अच्छा नहीं किया! आखिर तुमने फेसबुक फेस न करने की मेरी कसम तुड़वा दी। इसी छह मार्च को इसी जगह मुझे भाई संतोष तिवारी के जाने का दर्द बयां करना पड़ा, आज तुम इस जहां से चले गए। जाते समय तुमने यह भी नहीं सोचा कि हम मम्मी को कैसे फेस कर पाएंगे, जिनके हार्ट तुम्हीं थे। उनके हार्ट को कैसे बचाएं, क्या करें। गुड़िया भाभी अभी कल रात यशोदा अस्पताल से मेरे लौटते समय डबडबाई आंखों से मुझसे हाल पूछ रही थीं, जब मैं तुम्हें पुकार कर आईसीयू से लौटा था। अगर तुम्हें जाना था तो कंधा उचका कर और गर्दन हिलाकर मुझे संकेत क्यों किया कि फिक्र न करो।

स्व. शेखर त्रिपाठी

तुमने अपना वादा तोड़ दिया, आपरेशन थियेटर जाते समय मुझसे कहा था-फिक्र न करो यार, अभी दस मिनट में लौटता हूं, और लौटकर हमें अपने अंदाज में प्यार से गले लगाने की जगह स्वर्ग पहुंच गए, ईश्वर से इंटरव्यू करने। कहते हैं ईश्वर अच्छे लोगों को जल्दी अपने पास बुला लेता है। ईश्वर तेरी यह कौन सी नीति है। हमें वापस कर दे हमारा शेखर, अच्छा न सही–हम उसे बुरा बनाकर भी अपने पास रोक लेंगे। हमें गाली भी दे और मारे भी तो भी गम नहीं, पर उसे इस तरह स्वर्गलोक क्यों ले गए।

बीते शुक्रवार से फौलाद बने शिवम और मुझसे अभी फोन पर रो-रोकर पुकार कर रहे मासूम प्रखर का तो चेहरा देखते भगवन। …और …साइं बाबा, आपसे तो यह उम्मीद बिलकुल नहीं थी। शेखर के शनिवार की सुबर आपरेशन कक्ष में जाने के बाद से आपरेशन पूरा होने तक गुड़िया भाभी तुम्हारे चरणों में बैठी प्रार्थना ही करती रहीं। मैं तो उन्हें और उनके आंसू देख देख कर घबड़ाहट मे हास्पिटल टेंपल से गीता उठाकर पडने लगा था, साईं बाबा तुम क्या कर रहे थे जो भाभी की पुकार नहीं सुन पाए। मम्मी के चेहरे का दर्द नहीं पढ़ पाए।
अब तुम लापरवाही नहीं कर सकते बाबा, मम्मी भाभी शिवम प्रखर सब तुम्हारे हवाले। हे ईश्वर, एक वर्ष के भीतर दो दो मित्रों की विदाई,.. कैसे झेलेंगे हम। यह तो जिंदगी भर का दर्द दे दिया आपने।

(शेखर त्रिपाठी, दैनिक जागरण के इंटरनेट एडीटर थे, और दैनिक जागरण लखनऊ के संपादक, दैनिक हिंदुस्तान वाराणसी के संपादक, आजतक एडीटोरियल टीम के सदस्य रहे। फाइटर इतने जबरदस्त कि कभी हार नहीं मानी, कभी गलत बातों से समझौता नहीं किया। किंतु जागरण डॉट कॉम के संपादक रूप में दायित्व निभाते संस्थान हित में वह दोष अपने ऊपर ले लिया जिसके लिए वे जिम्मेदार ही नहीं थे। चुनाव सर्वेक्षण प्रकाशन के केस में एक रात की गिरफ्तारी और फिर हाईकोर्ट में पेंडिंग केस के कारण बीते छह महीने से संपादकीय कारोबार से दूर रहने की लाचारी ने उन्हें तोड़ दिया। गाजियाबाद के कौशांबी मेट्रो स्टेशन के निकट यशोदा हास्पिटल में उन्होने अंतिम सांस ली)

वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र पांडेय की एफबी वॉल से.

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दैनिक जागरण लखनऊ, गोरा सांप और शेखर त्रिपाठी के दिन

Raghvendra Dubey  : शेखर! आप बहुत याद आएंगे… बहुत बाद में आत्मीय रिश्ते बने भी तो सेतु स्व. मनोज कुमार श्रीवास्तव थे। वही मनोज , अमर उजाला के विशेष संवाददाता। शेखर, दैनिक जागरण लखनऊ में, संभवतः 1995 तक मेरे समाचार संपादक थे। कार्यरूप में, कागज पर नहीं। पद उन दिनों स्थानीय संपादक विनोद शुक्ल के तात्कालिक तरंगित और भभकते मूड पर निर्भर था। कभी-कभी तो एक ही दिन, सुबह की 11 बजे वाली रिपोर्टर मीटिंग में किसी का पद कुछ और जिमखाना क्लब से शाम को लौट कर वह (विनोद शुक्ल) कुछ कर देते थे।

बहरहाल शेखर अधिकांश समय समाचार संपादक ही थे। लेकिन लिखन्त-पढन्त में यानी विधिवत नहीं। जागरण में तब दो ग्रुप थे। वैसे तो कई। किसी गुंडा और तानाशाह व्यक्तित्व के तले यह बहुत स्वाभाविक था।

रामेश्वर पांडेय काका समेत कुछ जो खुद को प्रगतिशील पढ़ा-लिखा, पारदर्शी और साफ-सुथरा मानते थे या दिखते थे, शेखर के साथ थे। एक दूसरा ग्रुप था जिसका संचालन एक ‘गोरा सांप’ करता था। उसे ‘गोरा सांप’ की खास संज्ञा आगरा में ही

किसी ने क्यों दी, यह बात भी शेखर ने ही किसी दिन विस्तृत ढंग से बताई। मैं लखनऊ नया-नया आया था। जागरण की इस गुटबन्दी से परिचित नहीं था। ‘गोरे सांप’ से ही जुड़ गया। लिहाजा शेखर मुझे पसंद नहीं करते थे। उनसे जुड़े लोग भी। अयोध्या मामले पर मैने एक रपट लिखी थी। दादा एसके त्रिपाठी ने वह खबर शेखर को बढ़ा दी।

शेखर के ही एक मित्र, जिन्होंने कल्याण सिंह (तात्कालिक मुख्यमंन्त्री) से कह कर उन्हें सरकारी आवास दिलाया था, शेखर से कहा — ‘ ….अरे यह फलां का आदमी है, आप इसकी रपट को अच्छा डिस्प्ले क्यों देते हो? इस रपट को अंदर के पेज पर डालिये।’

शेखर ने चिढ़ कर कहा था — ‘… स्साले .. ऐसी ही तुम लिखो या कोई दूसरी दो …। यह कॉपी एंकर डिजर्व करती है, वहीं जायेगी। भले मेरे मुखालिफ गोल के आदमी ने लिखी हो।’

शेखर से दूसरी मुलाकात राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर में हुई। कुमार हर्ष और दीप्तभानु डे को याद हो शायद। मैं गोरखपुर से आजमगढ़ दंगा कवर करने भेजा गया था। यह शेखर का ही प्लान था। वह रिपोर्ट पढ़कर, शेखर, पूरे न्यूज रूम में घूम-घूम कर उसकी लाइनें दुहराते रहे। रिपोर्ट में एक लाइन थी — ‘ …. ख़ौफ़ पसलियों की संधि में घुस गया था …। ‘ उन्होंने मेरे सिर पर पीछे से हाथ मारते कहा था — ‘…और स्साले यह रिपोर्ट मेरी …. में घुस गयी है ।’

शेखर जी आपका वह ईमानदार पत्रकारीय, थोड़ा रूमानी और खिलंदड़ व्यक्तित्व तो मेरी यादों में कहीं गहरे तक धंसा है । कभी नहीं भूलोगे आप। एक तड़प सी भीतर उठी है तो इसलिए कि आपके बारे में और बता सकूं लोगों को, सूफियों की भाषा नहीं है मेरे पास। मीडिया इंडस्ट्री में लगातार चलते रहने वाले आपसी छाया युद्धों के बीच, आप बहुत अपने लगते थे। आप के साथ भी साजिशें हुईं। बहुत कम लोग होते हैं आप की तरह। नहीं , कभी नहीं और मेरी अपनी सांस तक, मुझे तो नहीं भूलेंगे शेखर। शशांक शेखर त्रिपाठी।

वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे की एफबी वॉल से.

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संस्मरण – देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ जी : अभी मन भरा नहीं…

अवनीश सिंह चौहान

सुविख्यात साहित्यकार श्रद्देय देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ जी (गाज़ियाबाद) से कई बार फोन पर बात होती— कभी अंग्रेजी में, कभी हिन्दी में, कभी ब्रज भाषा में। बात-बात में वह कहते कि ब्रज भाषा में भी मुझसे बतियाया करो, अच्छा लगता है, आगरा से हूँ न इसलिए। उनसे अपनी बोली-बानी में बतियाना बहुत अच्छा लगता। बहुभाषी विद्वान, आचार्य इन्द्र जी भी खूब रस लेते, ठहाके लगाते, आशीष देते, और बड़े प्यार से पूछते— कब आओगे? हर बार बस एक ही जवाब— अवश्य आऊँगा, आपके दर्शन करने। बरसों बीत गए। कभी जाना ही नहीं हो पाया, पर बात होती रही।

इधर पिछले दो-तीन वर्ष से मेरे प्रिय मित्र रमाकांत जी (रायबरेली, उ.प्र.) का आग्रह रहा कि कैसे भी हो इन्द्र जी से मिलना है। उन्हें करीब से देखना है, जानना-समझना है। पिछली बार जब वह मेरे पास दिल्ली आये, तब भी सोचा कि मिल लिया जाय। किन्तु, पता चला कि वह बहुत अस्वस्थ हैं, सो मिलना नहीं हो सका। एक कारण और भी। मेरे अग्रज गीतकार जगदीश पंकज जी जब भी मुरादाबाद आते, मुझसे सम्पर्क अवश्य करते। उनसे मुरादाबाद में कई बार मिलना हुआ, उठना-बैठना हुआ। फोन से भी संवाद चलता रहा। उन्होंने भी कई बार घर (साहिबाबाद) आने के लिए आमंत्रित किया। प्रेमयुक्त आमंत्रण। सोचा जाना ही होगा। जब इच्छा प्रबल हो और संकल्प पवित्र, तब सब अच्छा ही होता है। 30 अक्टूबर 2017, दिन रविवार को भी यही हुआ।

सुखद संयोग, कई वर्ष बाद ही सही, कि रायबरेली से प्रिय साहित्यकार रमाकान्त जी का शनिवार को दिल्ली आना हुआ; कारण— हंस पत्रिका द्वारा आयोजित ‘राजेन्द्र यादव स्मृति समारोह’ में सहभागिता करना। बात हुई कि हम दोनों कार्यक्रम स्थल (त्रिवेणी कला संगम, तानसेन मार्ग, मंडी हाउस, नई दिल्ली) पर मिलेंगे। मिले भी। कार्यक्रम के उपरांत मैं उन्हें अपने फ्लैट पर ले आया। विचार हुआ कि कल श्रद्धेय इन्द्र जी का दर्शन कर लिया जाय और इसी बहाने गाज़ियाबाद के अन्य साहित्यकार मित्रों से भी मुलाकात हो जाएगी। सुबह-सुबह (रविवार को) जगदीश पंकज जी से फोन पर संपर्क किया, मिलने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने सहर्ष अपनी स्वीकृति दी और साधिकार कहा कि दोपहर का भोजन साथ-साथ करना है।

फिर क्या था हम जा पहुंचे उनके घर। सेक्टर-दो, राजेंद्रनगर। समय- लगभग 12 बजे, दोपहर। स्वागत-सत्कार हुआ। मन गदगद। अग्रज गीतकार संजय शुक्ल जी भी आ गए। हम सभी लगे बतियाने। देश-दुनिया की बातें— जाति, धर्म, राजनीति, साहित्य पर मंथन; यारी-दोस्ती, संपादक, सम्पादकीय की चर्चा; दिल्ली, लखनऊ, इलाहबाद, पटना, भोपाल, कानपुर पर गपशप। बीच-बीच में कहकहे। सब कुछ आनंदमय। वार्ता के दौरान दो-तीन बार पंकज जी का फोन घनघनाया। वरिष्ठ गीतकार कृष्ण भारतीय जी एवं साहित्यकार गीता पंडित जी के फोन थे। पंकज जी ने उन्हें अवगत कराया कि रमाकांत और अवनीश उनके यहाँ पधारे हैं। नमस्कार विनिमय हुआ। पंकज जी ने भारतीय जी से बात भी करवायी। पता चला कि भारतीय जी की सहधर्मिणी का निधन हो गया, सुनकर बड़ा कष्ट हुआ, हमने सुख-दुःख बाँटे। रमाकांत जी ने भी उन्हें सांत्वना दी। रमाकांत जी ने फोन पंकज जी को दे दिया। भारतीय जी ने पंकज जी से आग्रह किया कि उनकी पुस्तक हमें दे दी जाय। भारतीय जी की ओर से शुभकामनाएं लिखकर पंकज जी ने उनका सद्यः प्रकाशित गीत संग्रह ‘हैं जटायु से अपाहिज हम’ मुझे और रमाकांत जी को सप्रेम भैंट किया; संजय शुक्ल जी ने भी अपना गीत संग्रह ‘फटे पाँवोँ में महावर’ उपहारस्वरुप प्रदान किया। पंकज जी से न रहा गया, बोले कि एक फोटो हो जाय। सहयोग और सहभागिता के लिए उन्होंने अपनी धर्मपत्नी जी को बुलाया और दोनों सदगृहस्थों ने बड़ी आत्मीयता से हम सबका फोटो खींचा।

तीन बजने वाले थे। बिना देर किये  देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ जी के यहाँ पहुंचना था, क्योंकि उन्हें विद्वान लेखक ब्रजकिशोर वर्मा ‘शैदी’ जी की ‘नौ पुस्तकों’ के लोकार्पण समारोह में 4 बजे जाना था। सो निकल पड़े। ई-रिक्शा से। 5-7 मिनट में पहुँच गए, उनके घर। विवेकानंद नगर। दर्शन किये। अभिभूत, स्पंदित। लगभग 84 वर्षीय युवा इंद्र जी। गज़ब मुस्कान, खिलखिलाहट, जीवंतता- ऐसी कि मन मोह ले। उनकी दो-तीन बातें तो अब भी मेरे मन में हिलोरे मार रही हैं। वह बोले, ‘मुझे ठीक से कुर्ता पहना दो, सजा दो, फोटो जो खिंचवानी है’; ‘क्यों हनुमान (जगदीश पंकज जी), स्वर्गवाहिनी का इंतज़ाम हुआ कि नहीं?’ (कार्यक्रम में जाने के लिए कैब बुकिंग के सन्दर्भ में); ‘अवनीश, फिर आना, अभी मन भरा नहीं।’ बड़े भाग हमारे जो उनसे मिलना हुआ। वह भी मिले तो ऐसे जैसे वर्षों से मिलना-जुलना रहा हो हमारा। क्या कहने! समय कम था, फिर भी, हमारी मुलाकात सार्थक और आनंदमय रही। ​जय-जय।

अवनीश सिंह चौहान
प्रेम नगर, लाइन पार, मझोला
मुरादाबाद (उ.प्र.)-244001
9456011560
Managing Editor : Creation and Criticism
संपादक : पूर्वाभास

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यह संजय, शराब और शेरो शायरी का दौर था…. कह सकते हैं डिप्रेसन की इंतिहा थी…

स्वर्गीय संजय त्रिपाठी


होते हैं कुछ लोग जो सिर्फ़ संघर्ष के लिए ही पैदा होते हैं। हमारे छोटे भाई और फ़ोटोग्राफ़र मित्र संजय त्रिपाठी ऐसे ही लोगों में शुमार रहे हैं। आज जब संजय त्रिपाठी के विदा हो जाने की ख़बर सुनी तो दिल धक से रह गया। फ़रवरी, 1985 से हमारा उन का साथ था। 32 साल पुराना साथ आज सहसा टूट गया। लखनऊ में वह पहले मेरे ऐसे दोस्त बने जिन से आत्मीयता बनी। दुःख सुख का साथ बना। बिना किसी टकराव और अलगाव के कायम रहा। बिना कुछ कहे-सुने भी हम एक दूसरे को समझ लेते थे। साथ खबरें करते थे, घूमते थे, सिनेमा देखते थे। खुद्दारी रास आई सो दलाली, फोर्जरी, चापलूसी, चमचई न मुझे कभी भाई न संजय को जबकि पत्रकारिता में यह आम बात हो चली है। बिना इस के अब गुज़ारा नहीं है।

जो जितना बड़ा दलाल, उतना बड़ा पत्रकार। हम यह नहीं कर सके सो हम ने तो इस की भारी क़ीमत चुकाई है, चुका रहा हूं। कहां होना था और आज कहीं का नहीं रह गया हूं। एक से एक कौवे दलाली, चापलूसी कर के भाग्य विधाता बन गए और हम इन कौवों की बीट देखते-देखते खत्म हो गए। संजय त्रिपाठी भी इस मामले मेरे हमराही थे। वह इस बेरंग जिंदगी को विदा कह गए, मैं जाने क्यों शेष रह गया हूं। वह कोई तीन साल मुझ से छोटे थे। जब मेरे घर आते तो मेरे पैर छूते मेरे बड़े होने के नाते। बाद में मैं ने बहुत मना किया कि हम दोस्त हैं तो वह किसी तरह माने।

जनसत्ता, दिल्ली से स्वतंत्र भारत, लखनऊ में जब मैं रिपोर्टर हो कर आया था तब संजय वहां पहले ही से फ़ोटोग्राफ़र थे। हम भी तब मुटाए नहीं थे लेकिन संजय त्रिपाठी ख़ूब दुबले-पतले थे। सींक सलाई जैसे। उन के चेहरे पर मासूमियत कुलांचे मारती थी, उत्साह जैसे हिलोरें मारता था। संकोच की चादर जैसे उन के पूरी देह पर लिपटी रहती थी। खुद्दारी की खनक उन के हर भाव से मिलती रहती थी। वह साईकिल से चलते थे। गले में कैमरा लटकाए, कैमरा संभालते, साईकिल चलाते उन को देखना मुश्किल में डालता था। लेकिन वह मुश्किल में नहीं रहते थे। पान कूंचते हुए वह अपनी सारी मुश्किलें जैसे साईकिल के टायर से कुचलते चलते थे। स्वतंत्र भारत था तो उस समय लखनऊ का सब से बड़ा अखबार, सवा लाख रोज छपता था लेकिन संजय त्रिपाठी का शोषण तब यह अख़बार बहुत करता था। उस समय सब को पालेकर अवार्ड के हिसाब से तनख्वाह मिलती थी, ठीक ठाक मिलती थी लेकिन संजय त्रिपाठी को प्रति फ़ोटो पांच रुपए मिलते थे। वह भी प्रकाशित फ़ोटो पर।

वह फ़ोटो चाहे जितनी खींचें पर पैसे छपी फ़ोटो पर ही मिलती थी। और कई बार फ़ोटो सेलेक्ट हो कर भी नहीं छपती थी। कभी अचानक विज्ञापन आ जाने के कारण जगह की कमी के चलते। तो कभी किसी फ्रस्ट्रेटेड डेस्क के साथी की मनबढ़ई और सनक के चलते। खैर जैसे-तैसे संजय त्रिपाठी फोटोग्राफरी क्या चाकरी करते रहे थे। इस उम्मीद में कि कभी तो नौकरी पक्की होगी और कि उन्हें भी पालेकर अवार्ड वाली तनख्वाह मिलेगी। वह भी सम्मानजनक जीवन जिएंगे। लेकिन उन दिनों स्वतंत्र भारत में एक विशेष प्रतिनिधि थे शिव सिंह सरोज। निहायत ही मूर्ख, दुष्ट और धूर्त प्रवृत्ति के थे लेकिन चूंकि दलाल टाईप के पत्रकार थे सो उन की अख़बार और अख़बार से बाहर भी ख़ूब चलती थी। संजय को वह भरपूर परेशान और अपमानित करते। नित नए ढंग से। उन को चढ़ाई करने के लिए अपना फ्रस्ट्रेशन निकालने के लिए रोज कोई शिकार चाहिए होता था। संजय त्रिपाठी से कमज़ोर शिकार कोई और नहीं मिलता था।

संजय त्रिपाठी और शिव सिंह सरोज जब कि एक ही क्षेत्र के रहने वाले थे। बाराबंकी के हैदरगढ़ के। बल्कि संजय त्रिपाठी के पिता श्री रामकिशोर त्रिपाठी साठ के दशक में हैदरगढ़ से विधायक रहे थे। लेकिन वह गांधीवादी थे सो पैसा नहीं बनाया, बेईमानी नहीं की। वह  पराग दुग्ध संघ के अध्यक्ष थे। चाहते तो संजय को कहीं अच्छी नौकरी दे सकते थे, किसी जगह सिफ़ारिश कर सकते थे। संजय ने ऐसा कई बार चाहा भी लेकिन पिता ने सख्ती से हर बार इंकार किया। संजय मन मसोस कर रह जाते थे। संजय के पिता जी एक समय भूदान आंदोलन में सक्रिय रहे थे। उत्तर प्रदेश में तमाम भूमिहीनों को भूमि के पट्टे दिए। लेकिन अपने किसी परिजन को एक इंच भूमि नहीं दी। अपने बच्चों को तो खैर क्या देते। आवश्यक वस्तु निगम के भी एक समय प्रशासक रहे। लेकिन उस भ्रष्ट विभाग में भी एक पैसा भी संजय के पिता ने न तो छुआ, न किसी को छूने दिया।

ऐसे ईमानदार पिता के पुत्र संजय त्रिपाठी पांच रुपए प्रति फ़ोटो पर गुज़ारा कर रहे थे। रोज जीते थे, रोज मरते थे। किसी-किसी दिन एक भी फ़ोटो नहीं छपती। वह उदास हो जाते। शिव सिंह सरोज को बर्दाश्त करना उन के लिए दिन पर दिन भारी होता जा रहा था। नौकरों को भी कोई क्या डांटेगा जिस तरह शिव सिंह सरोज उन्हें डांटते, जलील करते। पर संजय करते भी तो क्या करते। उन के पास कोई विकल्प नहीं था। मैं देख रहा था, संजय दब्बू बनते जा रहे थे।  उन की मासूमियत उन से मिस हो रही थी। खैर थोड़े दिन में वह संपादक वीरेंद्र सिंह की कृपा से दैनिक वेतन भोगी फ़ोटोग्राफ़र बन गए। अब थोड़ा ही सही, कम से कम एक निश्चित पैसा प्रति माह उन्हें मिलने लगा था। दबे-दबे से रहने वाले संजय अब फिर से हंसने लगे थे। उभरने लगे। संजय त्रिपाठी की खिंची फ़ोटो में भी निखार आने लगा।

वह जो कहते हैं बाईलाईन, वह भी कभी-कभार संजय त्रिपाठी को फ़ोटो पर मिलने लगी। लेकिन कनवेंस अलाऊंस उन्हें नहीं मिलता था। जो उन दिनों डेढ़ सौ रुपए होता था। क्या तो उन के पास अपना कनवेंस नहीं था। हालां कि वह बहुत गुरुर के साथ कहते कि, ‘ है तो साईकिल मेरे पास! ‘ लोग हंस पड़ते। बहुत लड़े वह इस के लिए। कुछ संघर्ष के बाद उन्हें कनवेंस अलाऊंस भी मिलने लगा। और यह देखिए कि शिव सिंह सरोज के तमाम विरोध के बावजूद संपादक वीरेंद्र सिंह ने संजय त्रिपाठी को स्टाफ़ फ़ोटोग्राफ़र का नियुक्ति पत्र थमा दिया। अब संजय ने लोन ले कर एक मोपेड भी ख़रीद लिया। जिसे उन के साथी फ़ोटोग्राफ़र संजय की बकरी कहते। अभी तक शिव सिंह सरोज के अपमान सहते आ रहे संजय अब थोड़ा दब कर ही सही उन से प्रतिवाद करने लगे थे। लेकिन स्वतंत्र भारत में एक क्राईम रिपोर्टर थे आर डी शुक्ल जो वीरेंद्र सिंह के बड़े मुंहलगे थे, वह भी सताने लगे। लेकिन संजय मेरे साथ बहुत कंफर्ट फील करते।

बहुत से एसाइनमेंट हमारे साथ किए संजय ने। जब साईकिल से चलते थे तब वह हमारे साथ जब चलते तो अपनी साईकिल आफिस में छोड़ कर मेरी स्कूटर पर आ जाते। पीछे बैठे-बैठे ही वह फ़ोटो खींच लेते। ऐसी बहुत सी घटनाएं और यादें हैं। लेकिन कुछ दृश्य भुलाए नहीं भूलते। जैसे एक बार एक प्रदर्शन के समय विधान सभा के सामने लाठी चार्ज हो गया था। संजय बोले, थोड़ा रिश्क लीजिए तो हम बढ़िया फ़ोटो बना लें। हामी भरते ही वह रायल होटल की तरफ से हमारे स्कूटर पर पीछे की सीट पर पीछे मुंह कर के बैठे। बोले, बस खरामा-खरामा चलते चलिए। चौराहे पर आते ही पुलिस ने रोका लेकिन हम झांसा दे कर प्रेस-प्रेस कहते निकल लिए। बीच लाठी चार्ज में हमारी स्कूटर निकली। और संजय का कैमरा चमकने लगा। अचानक ठीक विधान सभा के सामने के आते ही पुलिस की चपेट में हम आ गए।

संजय घबराए और बोले, फुल स्पीड में भाग लीजिए, नहीं पिट जाएंगे। हम कितना भागते। पुलिस की एक लाठी संजय के कैमरे पर आती-आती कि संजय ने कैमरे पर झुक कर अपना सिर लगा दिया। कैमरा बच गया, संजय का सिर फूट गया। चोट गहरी नहीं थी पर थी।  स्कूटर सरपट भगा कर सिविल हास्पिटल आया। संजय को पट्टी वगैरह करवाई। लेकिन संजय को सिर पर चोट की परवाह नहीं थी। ख़ुश थे वह कि कैमरा बच गया और फ़ोटो अच्छी मिल गई थी। इस के पहले एक बार किसी प्रदर्शन में संजय का कैमरा टूट गया था। पांच हज़ार का उन का नुकसान हुआ था तब के दिनों। दफ़्तर से कोई सहयोग नहीं मिला था। वीरेंद्र सिंह ने बाद में मुझे डांटा। कहा कि, वह तो फ़ोटोग्राफ़र है, बैल है, बुद्धि नहीं है पर आप तो रिपोर्टर हैं, तिस पर लेखक भी, अकल से काम लेना था।  कहीं जान पर बन आती तो? एक लाठी चार्ज में एक नेता अक्षयवर मल की ऐसे ही किसी पुलिस लाठी चार्ज में सिर में चोट लगने से उन्हीं दिनों मौत हो चुकी थी। लेकिन दूसरे दिन संजय हीरो थे। अख़बार में आठ कालम की संजय की खींची फ़ोटो संजय की बाईलाईन के साथ छपी थी। ऐसी फ़ोटो किसी और अख़बार के पास नहीं थी। सभी अख़बार पिट गए थे।

एक बार लखनऊ महोत्सव के कवि सम्मेलन में शिव सिंह सरोज ने अपना सम्मान आयोजित करवाया। सम्मान समारोह की गरिमा बनाने के लिए अमृतलाल नागर सहित कुछ और लोगों को भी सम्मान सूची में रखवा लिया। तब के मुख्य मंत्री नारायण दत्त तिवारी को सम्मानित करना था। ठाकुर प्रसाद सिंह कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे। वह सम्मान के समय शिव सिंह सरोज का नाम भूल गए और कवि सम्मेलन शुरू कर दिया। शिव सिंह सरोज संजय को ख़ास ताकीद कर के ले गए थे समारोह में कि मेरे सम्मान की बढ़िया फ़ोटो खींचना। पर जब सम्मान समारोह खत्म हो गया, शिव सिंह सरोज का नाम नहीं पुकारा गया तो कवि सम्मेलन शुरू होते ही संजय पेशाब करने पंडाल से बाहर चले गए। लेकिन एक कवि के कविता पाठ के बाद सरोज ने संचालक को याद दिलाया कि उन के सम्मान का क्या हुआ? तो उन्हों ने कवि सम्मेलन रोक कर शिव सिंह सरोज का सम्मान भी करवा दिया। फिर जल्दी ही शिव सिंह सरोज को कविता पाठ के लिए भी बुला लिया।

शिव सिंह सरोज का डबल अपमान हो गया। एक तो क्रम से सम्मान नहीं हुआ दूसरे उन की वरिष्ठता का ख्याल नहीं रखते हुए नए कवियों के साथ पहले ही कविता पाठ करने के लिए बुला लिए गए। गुस्से में आग बबूला वह कविता पाठ करने आए। आग्नेय नेत्रों से ठाकुर प्रसाद सिंह को देखते हुए उन्हों ने बेलीगारद शीर्षक लंबी कविता पढ़नी शुरु की और हूट होने लगे। इतना कि वीर रस की यह कविता करुण रस में तब्दील हो गई। लेकिन लाख हूटिंग के शिव सिंह सरोज ने पूरी कविता पढ़ी। सम्मान में मिली कंधे से गिर गई शाल पीछे मुड़ कर उठाई, कंधे पर रखी और अपनी जगह ऐसे आ कर बैठे सीना तान कर कि हल्दीघाटी जीत कर लौटे हों। लेकिन असली हल्दीघाटी तो दूसरे दिन की रिपोर्टिंग मीटिंग में शेष थी। उन्हों ने संजय से अपने सम्मान समारोह की फ़ोटो मांगी। तो संजय बिदक कर पूछ बैठे कि, ‘आप का सम्मान हुआ भी था?’ और उन्होंने जैसे जोड़ा, ‘हां आप के बेलीगारद कविता पाठ की फ़ोटो ज़रूर खींची है!’; कह कर उन के काव्य पाठ की फ़ोटो सामने रख दी।

शिव सिंह सरोज ऐसे फटे गोया आसमान फट गया हो। फ़ोटो फेकते हुए बोले, ‘बेलीगारद! भाग जाओ यहां से।’ मुख्य मंत्री ने हमको सम्मानित किया, पूरी दुनिया ने देखा और ई बेलीगारद देखि रहे थे!’ संजय उठ कर मीटिंग से बाहर चले गए। फिर घर चले गए। शिव सिंह सरोज ने संजय को बर्खास्त करने के लिए लिख दिया। वीरेंद्र सिंह ने टालते हुए कहा, यह बर्खास्तगी का विषय नहीं है। लेकिन संजय की तबीयत ख़राब हो गई। डिप्रेसन में चले गए। हफ़्ते भर बाद लौटे। संजय की जिंदगी फिर रफ़्तार पर आ गई। लेकिन अकसर बुदबुदाते हुए कहते यह बुड्ढा मेरी नौकरी खा जाएगा किसी दिन। शिव सिंह सरोज के इस बेलीगारद प्रसंग का सविस्तार वर्णन मैं ने अपने उपन्यास अपने-अपने युद्ध में किया है। हुआ यह भी कि मैं संजय को जब-तब बेलीगारद कह कर भी बुलाने लगा। वह कभी मुस्कुरा पड़ता तो कभी ताव खा जाता।

उन दिनों मैं दारुलशफा में रहता था तो मेरे घर अकसर आते संजय। दफ़्तर का दुखड़ा रोते। घर में भी कम दिक्कत नहीं थी। एक दिन वह बहुत ख़ुश होते हुए बोले, मालूम है पांडेय जी, इस दारुलशफा में मैं भी रहा हूं काफी समय। बचपन गुज़रा है मेरा यहां। पूछा कैसे? तो हलके से मुस्कुराते हुए बताया कि पिता जी एम एल थे न! फिर चुप हो गए।

पिता ईमानदारी का बरगद थे पर एक सौतेली माता भी थीं। उन का सौतेलापन भी कम नहीं था। संजय भीतर-बाहर दोनों तरफ टूट रहे थे। संयोग देखिए कि वीरेंद्र सिंह ने स्वतंत्र भारत से इस्तीफ़ा दे दिया तो शिव सिंह सरोज कार्यकारी संपादक बना दिए गए। कुछ दिनों के लिए ही सही। सरोज से मेरी भी नहीं निभती थी। संजय की तो खैर क्या कहूं। वह सरोज को का वा स बोलता। खैर सरोज के बाद पत्रकारिता में एक और दलाली के चैंपियन राजनाथ सिंह सूर्य संपादक की कुर्सी पर शोभायमान हो गए। मेरे लिए और मुश्किल हो गई। स्वतंत्र भारत से छुट्टी हुई और नवभारत टाइम्स आ गया। जल्दी ही राष्ट्रीय सहारा शुरू हुआ तो संजय त्रिपाठी भी स्वतंत्र भारत छोड़ राष्ट्रीय सहारा आ गए।

अब हम उन को संजय के बजाय मज़ा लेते हुए कहते, का हो , बेलीगारद!  राष्ट्रीय सहारा में आ कर संजय की जिंदगी जैसे पटरी पर आ गई। अब वह ख़ुश और मस्त दिखने लगे। लेकिन जल्दी ही वह फिर पटरी से उतर गए। रणविजय सिंह नाम का एक मूर्ख संपादक बन गया। जो पत्रकारिता का क ख ग भी नहीं जानता था। यह रणविजय सिंह शिव सिंह सरोज से भी ज़्यादा मूर्ख और धूर्त निकला। संजय से भी जूनियर था, मुझ से भी। वह संजय जैसे खुद्दार आदमी को निरंतर अपमानित करने लगा। संजय गालियां देते हुए कहता कि यार यह साला किस्मत का पट्टा लिखवा कर लाया है। अल्ला मेहरबान तो गधा पहलवान। फिर जैसे टूटते हुए कहता हम जैसों की किस्मत भगवान ने गधे के लिंग से लिखी है। रणविजय को पेट भर गरियाता और कहता साले को कुछ आता-जाता नहीं लेकिन दिन-ब-दिन मज़बूत हुआ जाता है पैर छू-छू कर। तंत्र-मंत्र कर के। बाद के दिनों में हम भी राष्ट्रीय सहारा पहुंचे। संजय और हम फिर साथ हो गए।

रणविजय सिंह जैसे साक्षर, दलाल और धूर्त से मेरी भी कभी नहीं निभी। अजब अहमक था यह आदमी। बीच मैच में फ़ोटोग्राफ़र से मैन आफ़ द मैच की फ़ोटो मांगता। फ़ोटोग्राफ़र कहता कि अरे मैच खत्म होगा तब तो मैन आफ़ द मैच होगा। वह कहता टेक्निकल्टी मत समझाओ मुझे। मुझे तो बस फ़ोटो चाहिए। एक से एक मूर्खताएं करता रहता वह। समझ से पूरी तरह पैदल। निर्मल वर्मा का निधन हुआ तो तब के दिनों दिल्ली में फ़ीचर देख रहे मित्र से मैं ने फ़ोन कर कहा कि निर्मल जी पर एक विशेष पेज निकलना चाहिए। मेरे पास उन के एक इंटरव्यू सहित कुछ सामग्री है, कहिए तो भेज दूं। वह बोले, पहले संपादक से बात कर लूं फिर बताता हूं।थोड़ी देर में उन का फ़ोन आया। कहने लगे कुछ मत भेजिए। मैं ने कारण पूछा तो वह बताने लगे कि संपादक ने पूछा कि क्या बहुत बड़ा कलाकार था? मैं ने कहा, नहीं लेखक थे। तो मुंह बिचका कर कहने लगा फिर रहने दीजिए।

ऐसी मूर्खताओं के उस के अनेक किस्स्से हैं। लेकिन संजय सही कहता था, अल्ला मेहरबान तो गधा पहलवान। रणविजय तो समूह संपादक हो गया। और यह देखिए कि औरतबाजी, दलाली  करते-करते, ट्रांसफर, पोस्टिंग करते-करवाते सांसद निधि बरसने लगी उस पर, विधायक निधि बरसने लगी उस पर। लाखों, करोड़ों में। वह मैनेजमेंट कालेज खोल बैठा , इंजीनियरिंग कालेज भी। बारात घर भी। कई-कई घर और फार्म हाऊस। इधर संजय नींद की दवा खाने लगा। डिप्रेसन में जाने लगा। बच्चे बड़े हो रहे थे जिम्मेदारियां बढ़ रही थीं। तनाव उस से ज़्यादा। शराब तनाव से भी ज़्यादा। लाठियां खा कर भी फ़ोटो खींचने वाला संजय, कैमरे बचाने में सिर फोड़वा लेने वाला संजय अब एसाइनमेंट से भागने लगा। कभी मासूम सा दिखने वाला संजय अब अड़ने, लड़ने और झगड़ने वाला हो चला था। शिव सिंह सरोज से बड़ा सिरदर्द रणविजय सिंह हो गया संजय के लिए। लेकिन वह जैसे तैसे निभाता रहा। फ़ोटो खींचने में फ़ोटोग्राफ़र अकसर पिटते रहते हैं। कभी पुलिस पीटती है तो कभी गुंडे, कभी भ्रष्ट अफ़सर।

संजय राष्ट्रीय सहारा की नौकरी में भी कई बार पिटा। लेकिन वापस दफ़्तर आ कर भी जलील हुआ तो टूट-टूट गया। परिवार बिखरने लगा। अब यह देखिए कि एक दिन पता चला कि संजय ने आत्महत्या की कोशिश की। ढेर सारी नींद की दवा खा ली थी। परिवारीजनों ने अस्पताल ले जा कर किसी तरह बचा लिया। जल्दी ही संजय ने दूसरी बार आत्म हत्या की कोशिश की। फिर घर वालों ने बचा लिया। पहली बार मैं ने समझाया था, सांत्वना दी थी। दूसरी बार डांटा। कि यह बार-बार की क्या बेवकूफी है। वह लिपट कर रोने लगा। कहने लगा आप बड़े भाई हैं, आप को डांटने का हक़ है! पर मेरी लाचारी समझिए। बच्चों का वास्ता दिया, बेटी का वास्ता दिया। पर एक बहादुर आदमी हर बात पर रोता रहा। अंततः उस ने वायदा किया कि अब यह गलती नहीं करेगा। लेकिन उस की जिंदगी पटरी से उतर गई थी। डिप्रेशन उस का बड़ा भाई बन गया था। अब वह जिस तिस से लड़ पड़ता। इसी बीच वह मुनव्वर राना से उस की मुलाकात हो गई। अब वह उन की शायरी का मुरीद हो गया। बात-बात में वह मुनव्वर राना के शेर कोट करता रहता। अब वह गजलों का शौक़ीन हो चला था। अकसर रात को फ़ोन करता। कहता सो न रहे हों तो बड़े भाई कुछ शेर सुनाऊं। फिर एक से एक शेर सुनाता। कई बार वह यह काम सुबह-सुबह भी करता। फ़ोन करता और कहता, अरे, कब तक सोते रहेंगे, शेर सुनिए। अब वह जब घर आता तो ग़ज़लों की कोई सी डी लिए। कभी पेन ड्राइव लिए हुए।कहता इसे सुनिए।

अब यह संजय,  शराब और शेरो शायरी का दौर था। कह सकते हैं उस के डिप्रेसन की इंतिहा थी।

पिछले दिनों हम दोनों बेटी की शादी खोजने में लगे थे। संजय की बेटी की शादी तय हुई तो वह कार्ड ले कर आया। शादी के दिन ही दिल्ली में मेरा एक कार्यक्रम था। बताया तो कहने लगा कुछ नहीं आना है। अपनी बेटी की शादी में नहीं आएंगे तो कब आएंगे? मैं ने टिकट कैंसिल किया। गया भी शादी में। बेटी की शादी संजय ने ख़ूब धूमधाम से की। इस के पहले संजय के एक छोटे भाई की शादी में अंबेडकर नगर के एक गांव में बारात गई थी। तब संजय का और ही रुप देखने को मिला था। बहुत सी रिपोर्टिंग यात्राओं में भी संजय का साथ रहा है। पर उस के रंग में फर्क नहीं आता था। उस की शेरो शायरी का रंग और ज़िम्मेदारी का रंग कैसे तो सुर्खरू थे। बेटी की शादी कर के वह बहुत निश्चिंत हो गया था। बिलकुल मस्त और मगन। मुझे बेटी के विवाह के लिए परेशान देखता तो कहता कि बेटियां अपना भाग्य ले कर आती हैं सो घबराओ नहीं यार! हो जाएगी बिटिया की शादी भी! वह बेटी की एक से एक फ़ोटो सेशन करता और कहता यह फ़ोटो भेज कर देखिए। अब की तो बात बन जाएगी। जब मेरी बेटी की शादी हुई तो वह आया और ख़ूब ख़ुश। 

ऐसे ही एक दिन मिला तो कहने लगा मालिनी अवस्थी से कभी बात होती है। मैं ने कहा हां, होती है कभी-कभार। मैं ने पूछा कि क्यों क्या हुआ? कहने लगा कि यार अब हमें वह पहचानती ही नहीं। फिर याद दिलाते हुए कहा कि याद है मालिनी अवस्थी के बलरामपुर अस्पताल वाले घर में आप के साथ गया था। आप ने इंटरव्यू किया था, हम ने फ़ोटो खींची थी। वह घर में स्कर्ट पहने बैठी थीं, उन की स्कर्ट में फ़ोटो। स्वतंत्र भारत में छपी थी बड़ी सी। किसी अख़बार में मेरी खींची फ़ोटो ही पहली बार उन की छपी थी, उन्हें याद तो दिलाइए। कि उन को स्टार बनाने में मेरा भी हाथ है। पहचान लिया करें मुझे भी तो अच्छा लगेगा। हम ने कहा, ठीक है। लेकिन मालिनी अवस्थी से यह कभी कह नहीं पाया।

क्या कहता भला। यह भी कोई कहने की बात होती है। रिपोर्टिंग और फ़ोटोग्राफ़ी में ऐसे तमाम मुकाम आते-जाते रहते हैं। बहुत से लोग कंधे पर सिर रख कर निकल गए। जब ज़रुरत हुई सुबह-शाम सलाम किया। ज़रूरत खत्म, पहचान खत्म। कौन किस को याद करता है। लेकिन संजय अकसर याद दिलाता और कहता कि कहा नहीं मालिनी अवस्थी से क्या। मैं हर बार कहता हूं, कह कर टाल जाता। फिर बहुत दिन हो गए इस बात को उस ने यह कहना बंद कर दिया। पर एक दिन फ़ेसबुक पर संजय की वाल पर देखा कि वह मालिनी अवस्थी के साथ एक फ़ोटो में मुस्कुरता हुआ खड़ा था। लेकिन मैं ने उस से कुछ कहा नहीं। जाने कितनी सांस और फांस है संजय के साथ हमारी। जाने कितने लोगों के इंटरव्यू, सेमिनारों, नाटकों, राजनीतिक कार्यक्रमों, धरना, प्रदर्शन, आंदोलन आदि-इत्यादि में उस के साथ की अनेक यादें जैसे दफ़न हैं हमारे सीने में।

कुछ समय पहले इस राष्ट्रीय सहारा की नौकरी से भी इस्तीफ़ा दे दिया था संजय ने। सो जिंदगी जो थोड़ी बहुत पटरी पर थी बिलकुल पटरी से उतर गई थी। आर्थिक समस्याएं जब नौकरी करते हुए नहीं खत्म हुईं तो बिना नौकरी के कैसे खत्म होतीं। उसे अपना फाइनल हिसाब मिलने का इंतज़ार था कि ख़ुद फाइनल हो गया। संजय का एक छोटा भाई विनोद त्रिपाठी भी टाइम्स आफ़ इंडिया में फ़ोटोग्राफ़र था। कुछ साल पहले विनोद भी विदा हो गया था। अब संजय अपने गांव की बात करता रहता था। लेकिन गांव में भी कौन सी जमींदारी थी भला। पुरखे देवरिया से आ कर हैदरगढ़ के पास के गांव पूरे झाम तिवारीपुरवा में बसे थे और पिता विरासत में ईमानदारी और संघर्ष दे गए थे। दुर्भाग्य से संजय भी अपने दोनों बेटों को यही विरासत सौंप गए हैं।

शुरु के दिनों में जब संजय स्वतंत्र भारत में अपने को फ़ोटोग्राफ़र साबित करने के संघर्ष में लगा था, उसे हर कोई फ़ोटोग्राफ़ी सिखाने में लगा था। जिसे कैमरा पकड़ने का शऊर नहीं होता वह भी, जिसे फ़ोटो की समझ नहीं होती वह भी। उन्हीं लोगों में से एक मैं भी था। मैं भी उसे कभी रघु रॉय के फ़ोटो दिखाता तो कभी सत्यजीत रॉय के फ़ोटो। और बताता कि देखो फ़ोटो यह होती है। वह फ़ोटो देखता, मेरी बात सुनता और टाल जाता। यह सब जब कई बार हो गया तो संजय कहने लगा यह दिल्ली नहीं है, बंबई और कलकत्ता नहीं है, लखनऊ है। यहां ऐसी फ़ोटो कौन खींचता है, कौन छापता है। तो मैं उसे अनिल रिसाल सिंह के फ़ोटो दिखाता। सत्यपाल प्रेमी के फ़ोटो दिखाता और कहता यह देखो, यह तो लखनऊ के फ़ोटोग्राफ़र  हैं। वह तड़पता हुआ कहता, इन के कैमरे देखे हैं, इन के लेंस देखे हैं? क्या है मेरा कैमरा? यह कोई कैमरा है?

वह कहने लगा दिला दीजिए ऐसा ही कैमरा, ऐसा ही लेंस और ऐसी ही सुविधा। और फिर धरना, प्रदर्शन, नाटक, नौटंकी की रूटीन फोटुओं से फुर्सत, डाल दीजिए मेरे पेट में भरपेट रोटी। ऐसी ही सुविधा और ऐसी ही निश्चिंतता। इन से अच्छी फ़ोटो खींच कर न दिखाऊं तो कहिएगा। वह कहता, यहां तो रोज जब फ़ोटो खींचता हूं तो शिव सिंह सरोज का अपमानित करने वाला सामंती रवैया दिमाग में सवार रहता है। फ़ोटो क्या खाक खींचूंगा? रोटी दाल चलाने दीजिए परिवार की। व्यवहार में यही है, बाकी सब सिद्धांत है। सच यही है कि अधिकांश रिपोर्टर, फ़ोटोग्राफ़र रोटी दाल में ही स्वाहा हो जाते हैं और अपना बेस्ट नहीं दे पाते हैं। शिव सिंह सरोज और रणविजय सिंह जैसे पत्रकारिता के दलाल गिद्ध जाने कितने संजय त्रिपाठी खा गए हैं, खाते रहेंगे। क्यों कि अब इन्हीं शिव सिंह सरोज और रणविजय सिंह जैसे दलालों और भडुओं का ज़माना है। अख़बारों में यह भडुए दलाल ही भाग्य विधाता हैं। पढ़े-लिखे लोगों की ज़रुरत अब किसी प्रबंधन को नहीं है।

अलविदा मेरे भाई, मेरे दोस्त, मेरे बेलीगारद! बहुत सारी बातें हैं, बहुत सारी यादें हैं। स्मृतियों में तुम सर्वदा उपस्थित रहोगे। अभी इतना ही। शेष फिर कभी। लेकिन तुम ने आज मुझे रुलाया बहुत है। अकसर तुम्हें चुप कराने वाला मैं आज कैसे चुप रह पाता भला। सो रो-रो कर हलका किया ख़ुद को। तुम धू-धू कर जलते रहे, मैं फूट-फूट रोता रहा। यही तो आज हुआ, मेरे बेलीगारद, डियर बेलीगारद! पर अब किसे इतने दुलार से कहूंगा डियर बेलीगारद! तुम तो चले गए!

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है। यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है।


मूल खबर…

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‘कलम के धनी यशवंत ने एक साधारण व्यक्ति की मृत्यु की असाधारण व्याख्या की!’

भड़ास के एडिटर यशवंत अपने गांव गए तो सबसे गरीब ब्राह्मण परिवार के सबसे बेटे बिग्गन महराज की असमय मौत के घटनाक्रम को सुन-देख कर उन्होंने एक श्रद्धांजलि पोस्ट फेसबुक पर लिख दी और बाद में उसे भड़ास पर भी अपलोड करा दिया. इस श्रद्धांजलि पोस्ट को बड़े पैमाने पर पसंद किया गया और सैकड़ों लाइक कमेंट्स मिले. आइए इस स्टोरी पर आए कुछ चुनिंदा कमेंट्स पढ़ते हैं. मूल स्टोरी नीचे बिलकुल लास्ट में, कमेंट खत्म होने के बाद है, ‘श्रद्धांजलि : दोस्त, अगले जनम अमीर घर ही आना!‘ शीर्षक से.

Sanjaya Kumar Singh

टीआरपी और लाइक की होड़ में आज बिग्गन महाराज जैसों की खबर कुछ सेकेंड या लाइन भी नहीं पाती है। आपने याद किया तो समाज में मौजूद ऐसे कई लोगों की बरबस याद आ गई। पेट भरा होता तो ये भी कहते रहते 10-10 बच्चे पैदा करो। पर जैसा कि आपने लिखा है – उनके जाने से परिवार को भी फर्क (भावनात्मक छोड़कर) नहीं पड़ेगा। गनीमत यही है किगरीबी में जीने वाले लोग वोट की राजनीति नहीं करते वरना अपने जैसे कई और बनाकर जाते।

Rajesh Agrawal

कलम के बड़े धनी हैं आप, आपने पूरा दुख-दर्द अपनी लेखनी में समेट दिया है। एक साधारण व्यक्ति की मृत्यु की असाधारण व्याख्या है यह।

Nimish Kumar

बाबा..तेरी लेखनी को सलाम..गजब लिखे हो..दिल चीर दिए हो…बहुत शानदार…हम-तुम जैसे कलम के सिपाही किसी को ऐसी ही श्रद्धांजलि दे सकते हैं…सैलूट, इस हरामखोर समाज का सच लिखने के लिए..जो किसी इंसान को सिर्फ पैसे से आंकता है..उसके इंसान होने से नहीं…

Nahid Fatma

Aise laga jaise Sab apni aankho se dekha !!! Ishwar aapke dost k jaane par aapko sabr de !!! Ye to ek Biggan the jinke baare me pta chal gya aise bohut saare Biggan roz jaate hen jinka pta hi nhi chalta…

Madhav Krishna

यशवंत भैया। यह पढ़ने के बाद अब मुझे आपकी ‘जानेमन जेल’ का इंतज़ार है

Vinay Shrikar

तुमको तो कथाकार होना चाहिए था। था, क्या हो! क्या ही मर्मस्पर्शी और हृदयविदारक कथारस है एक-एक कथन में ! What a sharp observation of smallest things of life ! What a peculiar and sensitive way of narration ! Biggan Maharaj’s sad story will always haunt our minds and memories for long!

Vikas Mishra

भाई बिग्गन महाराज की कथा पढ़कर भीतर से कुछ कचोट सी महसूस हुई। गजब लिखा है आपने, बिग्गन महाराज गांजा पीते हुए, मां से पैसे के लिए झगड़ते हुए, शांत भाव में चिर निद्रा में सोते हुए और अंतिम संस्कार के तौर पर गंगा में प्रवाहित होते हुए दिखने से लगे।

Arun Kumar Roy

मैं भी दो साल पहले अपने गांव गया था. पास के टोले के लम्बी दाढ़ी केश वाले बाबा को पहचान कर बचपन के हमउम्र के नाते मित्रवत बाते करने लगा तो पता चला ऊनकी मजबूरी भी कुछ इस ही तरह की थी. तभी उन्होंने मुझे औरों की ही तरह आदर पूर्वक सम्बोधन करने का आग्रह किया. तब कम, अब अधिक समझा, आपके insightful post के मनन के बाद. साधुवाद!

Manoj Anuragi

ये सच कहानी बहुत मार्मिक है और एक ख़ास तरह की जीवन की जद्दोजहद को दर्शाती है, आपने बहुत सुंदर भाषा शैली में लिखी है जी करता है कि पत्रिका में छाप दूँ क्या अनुमति है महोदय

Neelesh Misra

कितना सशक्त और मार्मिक चित्रण एक ऐसी शख़्सियत का जिस से कभी मिले नहीं, मिलेंगे नहीं, लेकिन लगता है बरसों से मिलते रहे हों। बहुत ही बढ़िया लिखा है, यशवंत। अनेकों बधाइयाँ! अपनी रचनात्मकता के इस पक्ष को सँवारें। ख़ूब, ख़ूब लिखें! ‘गाँव कनेक्शन’ में छाप सकते हैं इसे यशवंत?

Vinay Oswal

“मेरे दोस्त, अगले जनम किसी अमीर घर ही आना”। इस तरह धारा की तरह प्रवाहमान आलेख मुझे बहुत प्रिय लगते हैं। जिनमें कहीं ठहराव नहीं। बस जो अपने साथ यात्रा कराते हैं, माहौल की बारीक से बारीक हलचल के बोध के साथ। मानवीय संवेदनाओं को उकेरते हुए, जीवंत बनाते हुए, बढ़ते जाते हैं लक्ष्य की ओर…!!!!

JP Tripathi

लिखावट में ऐसी जान फूंक दी आपने कि दिल अब तक कचोट रहा है। श्रद्धांजलि

Sudha Singh

मृतक को श्रद्धांजलि और इस बेहतरीन याद को सलाम।

Onkar Singh

बिग्गन महराज के साथ आपको भी निष्ठावान साथी के असमय और विस्मय कूच पर कंजूसी के लिए नमन,ये तो मृत्यु कथा थी जिन्दगी की कहानी में मर्दवा आप तो साझीदार थे.

Manu Laxmi Mishra

बिग्गन महाराज की कथा पढ़कर जीवंत चलचित्र आँखों के सामने जीवित हो उठा,बहुत लोग ग़रीबी के मारे अपना चोला बदल लेते हैं,अपनी इच्छाओं का दमन कर लेते हैं

Prateek Chaudhary

यशवंत भैया. बिग्गन महाराज का जीवन हमारे समाज का ही एक हिस्सा है। अत्यंत मर्मस्पर्शी।

Santosh Singh

भाई जी…आँखे नम हो गयी आपके लिखने के अंदाज से. क्या जीवंत चित्रण किया है

Dhyanendra Tripathi

बेहद मार्मिक और इस क्रूर दुनिया का मर्मान्तक सच. कितनी साफगोई से आपने लिखा है.. बिग्गन महराज को विनम्र श्रद्धान्जलि..

Suresh Neerav

यशवंत भाई श्रद्धांजलि भी सोचपरक ढंग से दी जा सकती है, यह आपने सिद्ध कर दिया।

Devendra Verma

विग्गन महराज समाज की जीवन्त लीला के यशस्वी पात्र थे चरित्र जीवन्त रहेगा सिर्फ पात्र बदलते रहेगे तमाम विग्गन महराज काल कलवित हो गये और कितने होने के लिए कतार मे है…सामाजिक कुव्यवस्था के कारण न जाने कितने लोग विग्गन महराज बनने के लिए विवश होते रहेंगे

Niranjan Sharma

बिग्गन महाराज की जय हो ! आपकी भावपूर्ण श्रद्धांजलि में हम भी शरीक हैं!

Lambu Ji

बिग्गन महराज big आदमी थे…आपके संस्मरण ने उन्हें अमर कर दिया.

Maharshi Kumar Tiwari

हमारे समाज में मौत पर चर्चा कोई नही करता ऐसे जी रहे है जैसे हमेशा इस ग्रह पर रहना हो ।

Divakar Singh

बेहद मार्मिक श्रद्धांजलि। ऐसे फक्कड़ों से ईर्ष्या होती है, जो हमारी आपकी तरह न जीकर असल ज़िन्दगी जी लेते हैं।

Sarang Upadhyay

बिग्गन महाराज केवल आपके गांव के नहीं रहे। वे अब सदा के लिए…! नमन..!

A.k. Roy

आज के समाज और समय को देखते हुए, आपका सटीक, सामयिक विश्लेषण है।

Pramod Kumar Pandey

आपके दोस्त बिग्गन महाराज को श्रद्धांजलि। मार्मिक लिखा है आपने।

Manoj Kumar

बेहद मार्मिक और मर्मान्तक सच। बिग्गन महराज को विनम्र श्रद्धान्जलि..

Jayesh Agarwal

गांव हो या शहर.. गरीब और गरीबी का कोई हमदर्द, दोस्त कहां होता है.. जीवंत लेखन..

Prakash Bhushan Singh

वैसे भी गरीब और गरीबी के हमदर्द-दोस्त होते कहां हैं? अनदेखे अंजाने बिग्गन महराज को विनम्र श्रद्धांजलि!

Rajesh Somani

Lost true freind however he was better than town freind

Ashok Das

उनको श्रद्धांजलि। उनके साथ बचपन की कुछ और यादें साझा करिये।

Ajay Singh

बेहतरीन संस्मरण!

Ashok Anurag

दोस्त…अगले जन्म अमीर घर ही आना……

Kamal Sharma

गांव में गरीब और गरीबी के हमदर्द-दोस्त होते कहां हैं. सही बात है भाई.


उपरोक्त कमेंट्स जिस पोस्ट पर आए हैं, उसे यहां पढ़ सकते हैं :

यशवंत की एफबी पोस्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

Yashwant Singh Facebook Post of Biggan Mahraj

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बचपन के मित्र बिग्गन महाराज के गुजरने पर यशवंत ने यूं दी श्रद्धांजलि : ‘दोस्त, अगले जनम अमीर घर ही आना!’

Yashwant Singh : गांव आया हुआ हूं. कल शाम होते-होते बिग्गन महाराज के गुजर जाने की खबर आई. जिस मंदिर में पुजारी थे, वहीं उनकी लाश मिली. उनके दो छोटे भाई भागे. मंदिर में अकेले चिरनिद्रा में लेटे बड़े भाई को लाद लाए. तख्त पर लिटाकर चद्दर ओढ़ाने के बाद अगल-बगल अगरबत्ती धूप दशांग जला दिया गया. देर रात तक बिग्गन महाराज के शव के पास मैं भी बैठा रहा. वहां उनके दोनों सगे भाइयों के अलावा तीन-चार गांव वाले ही दिखे.

बिग्गन महाराज गांव के सबसे गरीब ब्राह्मण परिवार के सबसे बड़े बेटे थे. अभाव और अराजकता के दुर्योग से वह भरी जवानी में बाबा बनने को मजबूर हुए. अगल-बगल के गांवों के मंदिरों पर रहने लगे. कुछ बड़े बाबाओं के शिष्य भी बने. बताया गया कि वह कल मरने से पहले एक यजमान के यहां जाकर उन्हें दीक्षा दी. गुरुमुख बनाया. बदले में उन्हें नया स्टील का कमंडल और एक बछिया मिली. जिस दिन उन्हें इतना कुछ मिला, उसी दोपहर उनके पेट में अन्न जल न था. उपर से तगड़ी धूप. बिग्गन महाराज मंदिर लौटे और गिर कर मर गए. शव के साथ बैठे लोग किसिम किसिम की चर्चाएं कर रहे थे. कौन जानता था अपने यजमान को मोक्ष-मुक्ति का मार्ग बता मंदिर लौट रहे गुरु पर इस मायावी संसार को अलविदा कहने के वास्ते मारण मंत्र का जाप शुरू हो चुका था.

बतकही जारी थी. पुरवा हवा की सरसराहट से बिग्गन महाराज के शव पर पड़ा चद्दर सर से पांव तक इस कदर फड़फड़ा रहा था जैसे पंडीजी बस अब कुछ बोलने के लिए उठने ही वाले थे. ताड़ी से तारी साथ बैठे एक सज्जन उदात्त भाव और तेज स्वर से कहने लगे- बिग्गन महराज गांजा के बाद हीरोइन पीने लगे थे. आजकल तो पैसे के लिए गांव आकर अपनी मां से लड़कर सौ पचास ले जाने लगे थे. जितने मुंह उतनी बातें. कईयों ने मौत को अनिवार्य सच बताया. कुछ ने बिग्गन महाराज की कम उमर होने का हवाला दिया. मुझे अजीब इच्छा हुई. तख्त पर लिटाए गए बिग्गन महाराज के चेहरे को देखने की. रात दो बजे के करीब उनके छोटे भाई ने महराज के चेहरे से चद्दर हटाया. लंबी बाबाओं वाली दाढ़ी और सांवला चेहरा. बिलकुल शांत. लग ही नहीं रहा था कि यह मरे आदमी का चेहरा है. जैसे वो सोए हों. ध्यान में हों. चिलम के असर के बाद मौन साध गए हों.

चार भाइयों में सबसे बड़े बिग्गन महाराज के गुजर जाने से उनके परिवार पर कोई असर न पड़ेगा. एक तो उनका खुद का कोई निजी परिवार न था. उनने शादी न की थी. कह सकते हैं शायद हुई ही न हो. इसलिए वे बाल ब्रह्मचारी कहलाए गए. दूसरे उनके जाने से सगे भाइयों को कभी कभार सौ पचास मां से मांग ले जाने के अप्रत्याशित कर्म से मुक्ति मिली.

हां, बुजुर्ग महतारी जरूर देर तक छाती पीट पीट कर रोती रहीं. शायद मां के कलेजे में उस बेटे के खास तड़प होती है जो थोड़ा मजबूर हो, जो थोड़ा शोषित हो, जो थोड़ा अव्यवस्थित हो, जो थोड़ा मिसफिट हो, जो गैर-दुनियादार हो, जो संघर्षरत हो.

शाम के समय मरने की खबर जब घर पहुंची तो नाती-नातिन के साथ बैठी बुजुर्ग महतारी छाती पीट पीट कर रोने लगी. अगल-बगल घरों की महिलाएं एक एक कर पहुंच कर उन्हें पकड़ कर दिलासा देने लगीं- ”होनी को कौन टाल सकता है मइया, चुप रहिए, भगवान को शायद यही मंजूर था.” पड़ाइन मइया कुछ गा-गा कर लगातार रोती बिलखती हिलती फफकती हांफती रहीं. शायद इस तरह बेटे को अंतिम बार पूरे दिल और पूरी शिद्दत से याद किया उनने.

मुझे बिग्गन महाराज के साथ बचपन के दिन याद आए. उनके साथ बगीचों में आम तोड़ना, उनके साथ पूड़ी खाने दूसरे गांवों में जाना, ढेर सारी शरारतों और बदमाशियों में उनको अपने विश्वासपात्र सिपाही की तरह साथ रखना. बिग्गन महाराज लायल थे. निष्ठा उनने कभी न तोड़ी. दोस्ती की तो खूब निभाया. बाबा बने तो उसी दुनिया के आदमी हो गए, बाकी सबसे नाता तोड़ लिया. बस केवल अपनी मां से नाता रखा. देखने या मांगने चले आते थे, आंख चुराए, मुंह नीचे झुकाए.

बिग्गन महाराज जीते जी मरने की कामना करने लगे थे. मौत के दर्शन और लाभ का शायद वह कोई रहस्यमय धार्मिक अध्याय बांच चुके थे. तभी तो वह दुनियादारों की तरह मौत से डरते न थे और मौत से बचने के लिए कोई उपक्रम न करते. जैसे वह मौत को चुनौती देते रहते. खुद को नशे में डुबोने के लिए वह अतिशय गांजा-चिलम पीने लगे.

बताते हैं कि जिस गांव के मंदिर पर वह पुजारी थे, उस गांव के कुछ नशेड़ियों की संगत में सुल्फा-हीरोइन को अपना बैठे. गांजे के असर की हद-अनहद वह जी चुके थे. उन्हें इसके परे, इससे भी दूर, अंतरिक्ष के पार, जाना था. सफेद धुओं के रथ पर सवार होकर जाना था. हीरोईन-सुल्फा ने इसमें उनकी मदद की होगी शायद.

इस नई शुरुआत ने इतना आनंदित किया कि वह इसे अपना गुरु बना बैठे. हीरोइन-सुल्फा की लत के शिकार बिग्गन महाराज को पहले कभी-कभार फिर अक्सर पैसे का अभाव खलने लगा. ऐसे में उन्हें अपनी मां याद आतीं जिनके अलावा किसी पर उनका कोई अधिकार न था. वह अपने घर आ जाते, चुपके से. मां से लड़ते-झगड़ते और आखिर में कुछ पैसे पा जाते. घर वाले थोड़े परेशान रहने लगे. उनके लिए बिग्गन महराज की यह आदत नई और अप्रत्याशित थी. छोटे तीन भाइयों के बच्चे-पत्नी हैं. वे छोटे-मोटे काम धंधा कर जीवन गृहस्थी चलाने में लगे रहते. पैसे का अभाव सबके लिए एक बराबर सा था. ऐसे में मां जाने कहां से सौ-पचास उपजा लेतीं और बिग्गन महाराज को डांटते डपटते, आगे से आइंदा न मांगने की लताड़ लगाते हाथ पर चुपके से धर देतीं.

बिग्गन महाराज की मिट्टी को जब आज सुबह अंतिम यात्रा पर ले जाया गया तो मैं गहरी नींद में था. देर रात तक सोए बिग्गन महाराज संग जगा मैं जीवन मौत के महात्म्य को समझता गुनता रहा. घर आकर बिस्तर पर गिरा तो सुबह दस बजे आंख खुली. तब तक बिग्गन महाराज गांव से कूच कर चुके थे. उनके शरीर को गंगा के हवाले किया जा चुका था. उन्हें साधुओं सरीखा सम्मानित सुसज्जित कर जल समाधि दी गई.

इस देश में अभाव और गरीबी के चलते जाने कितने बिग्गन महाराज भरी जवानी बाबा बनने को मजबूर हो जाते हैं. फिर इस मजबूरी को ओढ़ने के लिए नशे के धुएं में उड़ने लगते हैं. बिग्गन महाराज हमारे गांव के लिए कोई उतने जरूरी शख्स नहीं थे. वैसे भी गांव में गरीब और गरीबी के हमदर्द-दोस्त होते कहां हैं. बिग्गन महाराज किसी से कुछ न बोलते और गांव से परे रहते. बेहद गरीब परिवार के सबसे बड़े बेटे बिग्गन महाराज को पता था कि उनके लिए कोई निजी इच्छा रखना, किसी कामना को पालना नामुमकिन है इसलिए उनने इसे विरुपित करने वाले चोले को ओढ़ लिया. एक आकांक्षाहीन जीवन को साधु के चोले से ही दिखावट कर पाना संभव था.

बिग्गन महाराज का जाना मेरे लिए बचपन के एक निजी दोस्त का असमय काल के गाल में समाना है. उनने जिस राह को चुना और आगे जिस राह पर जाने को इच्छुक थे, बाबागिरी से मृत्यु यात्रा तक, इसका सफर उनने रिकार्ड कम समय में, बेहद सटीक-सधे तरीके से की. शायद देश के करोड़ों युवा बिग्गन महाराजों के लिए इस व्यवस्था ने मोक्ष और मुक्ति के लिए यही आखिरी रास्ता बुन-बचा रखा है जिससे परे जाने-जीने के लिए कोई विकल्प नहीं है.

राम-राम बिग्गन महाराज.

नई दुनिया के लिए शुभकामनाएं. इस लुटेरी-स्वार्थी दुनिया से जल्द निकल लेने पर बधाई.

दोस्त, अगले जनम किसी अमीर घर ही आना!

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


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स्मृति शेष : दिनेश ग्रोवर जितना मजेदार और जिन्दादिल इंसान कम ही देखा है

बड़ी ही मजेदार थी दिनेश ग्रोवर की जिन्दादिली…  बहुत साल पहले की बात है। वयोवृद्ध पत्रकार एवं कवि-लेखक इब्बार रब्बी राजेन्द्र यादव की साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ में संपादन सहायक के तौर पर अवैतनिक सेवा दे रहे थे। रब्बी जी नवभारत टाइम्स से रिटायर हो चुके थे और आर्थिक रूप से परेशान चल रहे थे। रब्बी जी राजेन्द्र यादव के दरियागंज स्थित दफ्तर में बैठकबाजी करने कभी-कदार चले जाया करते थे।

बाद में यादव जी के कहने पर रब्बी जी ‘हंस’ का कुछ काम करने लगे और वह रोज वहां जाने लगे। उन्हें उम्मीद थी कि यादव जी उनके संपादकीय कार्य-सहयोग के बदले में हर महीने उन्हें कुछ न कुछ मुद्रा जरूर थमाएंगे। कई महीने बीत गये, पर यादव जी ने कुछ न दिया। यहां तक कि घर से ‘हंस’ के दफ्तर तक आने-जाने का किराया तक नहीं। रब्बी जी टाइम काटने की गरज से लगभग एक साल तक वहां बैठते रहे। उन्हीं दिनों की बात है कि मैं रब्बी जी से मुलाकात करने ‘हंस’ के कार्यालय गया हुआ था। रब्बी जी राजेन्द्र जी के चैम्बर में उनके सामने वाली कुर्सी पर विराजमान थे।

वहां एक और भी व्यक्ति, जो लगभग राजेन्द्र जी की ही उमर का था, उनकी बायीं तरफ बैठा था। उस व्यक्ति से मैं अपरिचित था। सोचा कोई लेखक-वेखक होगा। कक्ष में जोर-जोर के ठहाके लग रहे थे। बहरहाल, जैसे ही रब्बी जी ने मुझे देखा, अपने बगल वाली कुर्सी पर बैठने का इसारा किया। जब ठहाके थम गये तो रब्बी जी ने उस अपरिचित आदमी से मेरा परिचय करवाया। उस समय मेरे लिए वह अपरिचित व्यक्ति थे— लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद के मालिक दिनेश ग्रोवर।आज सुबह उनके निधन की खबर फेसबुक पर मिली, तो सहसा ग्रोवर जी का ठहाका लगाता चेहरा सामने घूम गया। मुझे गहरा धक्का लगा।

जिस दिन की मैंने ऊपर चर्चा की है, उस दिन ‘हंस’ के दफ्तर में दरअसल हगने-मूतने से संबंधित किस्से सुने-सुनाये जा रहे थे। एक किस्सा किसी बडे लेखक से जुड़ा था, जो ग्रोवर जी मेरे वहां पहुंचने से पहले सुना चुके थे और उसी पर ठहाके लगाये जा रहे थे। बाद में ग्रोवर जी ने देर तक चले हंसी-मजाक के उपसंहार के तौर पर किसी डॉक्टर के हवाले से एक तथ्य की चर्चा की। उन्होंने बताया कि व्यक्ति का पेट कभी भी पूरी तरह साफ नहीं हो सकता। एक किलो के करीब मल उदर में हमेशा भरा रहता है। यदि वह निकल जाये तो आदमी गश खाकर गिर जाएगा। उनकी इस बात पर भी ठहाका लगा।

कुछ देर बाद ही चैम्बर का माहौल तब तनावपूर्ण हो गया, जब राजेन्द्र जी ने ग्रोवर जी की किसी बात पर कहा—‘’तुम साले हिन्दी जगत के लेखकों का घोर शोषण करते हो।‘’ ग्रोवर जी भी नहीं चूके। उन्होंने कहा— ‘’प्रकाशन की दुनिया का सबसे बड़ा शोषक राजेन्द्र यादव है।‘’ दोनों लोगों के बीच कहासुनी का यह दौर आधे घंटे से ज्यादा चला। दोनों तमतमाया चेहरा देखकर यही लगता था कि इस वाद-विवाद की परिणति निश्चित तौर पर मारपीट होगी। हालांकि ऐसा कुछ हुआ नहीं। बाद में रब्बी जी ने मुझे बताया कि ये दोनों एक-दूसरे के जिगरी दोस्त और जानी दुश्मन दोनों हैं। इस प्रकरण का गवाह बनने के बाद मैं इलाहाबाद जब भी गया, ग्रोवर जी से जरूर मिला। हिन्दी जगत में इतने मजेदार और जिन्दादिल इंसान मैंने कम ही देखे हैं।

इस स्मृति शेष के लेखक विनय श्रीकर वरिष्ठ पत्रकार हैं और ढेर सारे बड़े हिंदी अखबारों में उच्च पदों पर कार्य कर चुके हैं. उनसे संपर्क shrikar.vinay@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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पहले प्रदीप संगम, फिर ओम प्रकाश तपस और अब संतोष तिवारी का जाना….

एक दुर्भाग्यपूर्ण संयोग या दुर्योग, जो कहिए… मेरे ज्यादातर प्रिय पत्रकारों का समुदाय धीरे-धीरे सिकुड़ता छोटा होता जा रहा है… दो-तीन साल के भीतर एकदम से कई जनों का साथ छोड़कर इस संसार को अलविदा कह जाना मेरे लिए स्तब्धकारी है… पहले आलोक तोमर, फिर प्रदीप संगम, उसके बाद ओमप्रकाश तपस और अब संतोष तिवारी… असामयिक रणछोड़ कर चले जाना या जीवन के खेल में आउट हो जाना हर बार मुझे भीतर तक मर्माहत कर गया… सारे पत्रकारों से मैं घर तक जुड़ा था और प्यार दुलार का नाता बहुत हद तक स्नेहमय सा बन गया था… इनका वरिष्ठ होने के बाद भी यह मेरा सौभाग्य रहा कि इन सबों के साथ अपना बोलचाल रहन-सहन स्नेह से भरा रसमय था… कहीं पर कोई औपचारिकता या दिखावापन सा नहीं था… यही कारण रहा कि इनके नहीं होने पर मुझे खुद को समझाने और संभलने में काफी समय लगा…

फिलहाल तो बात मैं संतोष जी से ही शुरू करता हूं । मेरा इनसे कोई 23 साल पुराना नाता रहा। भीकाजी कामा प्सेस के करीब एक होटल में शाम के समय कुछ लोगों से मिलने का कार्यक्रम था । मेरे पास अचानक हिन्दुस्तान से संतोष जी का फोन आया- अनामी शाम को एक जगह चलना है, तैयार रहना। मैने जब जिज्ञासा प्रकट की तो वे बौखला गए। अरे जब मैं बोल रहा हूं तो फिर इतने सारे सवाल जवाब क्यों? बस् इतना जान लो कि जो मेरी नजर में सही और मेरे प्रिय पत्रकार हैं, बस्स मैं केवल उन्ही दो चार को बुला भी रहा हूं।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले तो मेरी संतोष जी से दर्जनों बार फोन पर बातें हो चुकी थी, मगर अपने अंबादीप दफ्तर से 100 कदम से कम की दूरी पर एचटी हाउस की बहुमंजिली इमारत में कभी जाकर मैं संतोष जी से मिला नहीं था। ना ही कभी या कहीं इनसे मिलने का सुयोग बना था। मैं फटाफट अपने काम को निपटाया और फोन करके एचटी हाउस के बाहर पहुंच गया। वहां पर संतोषजी पहले से ही मौजूद थे। मुझे देखते ही बोले- अनामी… मेरे सिर हिलाने पर उनने लपक कर मुझे गले से लगा लिया। साले कलम से जितना आक्रामक दिखते हो उतना तीखा और आक्रामक तो तुम लगते नहीं। अब इस पर मैं क्या कहता… बस्स जोर से खिलखिला पड़ा तो वे भी मेरे साथ ही ठहाका लगाने लगे। यह थी मेरे प्रति संतोष जी की पहली प्रतिक्रिया।

देर रात तक मेहमानों के संग बातें होती रहीं और साथ में मदिरामय माहौल भी था। इससे मैं काफी असहज होने लगा तो संतोष जी मुझे कमरे से बाहर ले गए और ज्ञान प्रदान किया। जब तुम कहीं पर पत्रकार के रूप में जाओ तो जरूरी नहीं कि सारा माहौल और लोग तुम्हारी अपेक्षाओं या मन की ही बातें करेंगे। कहीं पर असामान्य लगने दिखने से बेहतर है कि तुम खान पान पर अपने ध्यान को फोकस कम करके काम और जो बातचीत का सेशन चल रहा है उसमें औरों से हटकर बातें करो ताकि सबों का ध्यान काम पर रहे और खान पान दोयम हो जाए। इन गुरूमंत्रों को बांधकर मैं अपने दिल में संजो लिया और अंदर जाकर बातचीत के क्रम को एक अलग तरीके से अपने अनुसार किया।

पत्रकारिता के लगभग दो दशक लंबे दौर में बहुत दफा इस तरह के माहौल का सामना करना पड़ा। जब अपने साथी मित्रों का ध्यान काम से ज्यादा मदिरा पर रहा तो मैंने अपने अनुसार बहुत सारी बातें कर ली और मदिरा रानी के संग झूले में उडान भर रहे मेरे मित्रों ने मेरी बातों पर कोई खास तवज्जो नहीं दी। इसके फलस्वरूप मेरी रिपोर्ट हमेशा औरों से अलग और कुछ नयी रहती या होती थी। इस पर अगले दिन अपने साथियों से मुझे कई बार फटकार भी खानी पड़ी या कईयों ने मुझे बेवफा पत्रकार का तगमा तक दे डाला था कि खबरों के मामले में यह साला विश्वास करने लायक नहीं है। आपसी तालमेल पर भी न्यूज को लेकर किसी समय सीमा का बंधन नहीं मानेगा।

तमाम उलाहनों पर भिड़ने की बजाय हमेशा मेरा केवल एक जवाब होता कि न्यूज है तो उसके साथ कोई समझौता नहीं। इस तरह के किसी भी संग्राम में यदि मैं कामयाब होता या रहता तो संतोषजी का लगभग हमेशा फोन आता, वेरी वेरी गुड अनामी डार्लिंग। वे अक्सर मुझे मेरे नाम के साथ डार्लिंग जोडकर ही बोलते थे। मैने उनसे कई बार कहा कि आप जब डार्लिंग कहते हैं तो बबल कहा करें जिससे लोग समझेंगे कि आप किसी महिला बबली से बात कर रहे हैं…. अनामी में डार्लिंग जोडने से तो लोग यही नहीं समझ पाएंगे कि आप किसी को अनामी बोल रहे है या नामी बोल रहे है या हरामी बोल रहे हैं। मेरी बातें सुनकर वे जोर से ठहाका लगाते… वे कहते- नहीं, बबल कहने पर ज्यादा खतरा है यार… अनामी इतना सुंदर और अनोखा सा इकलौता नाम है कि इसको संबोधित करना ज्यादा रसमय लगता है।

इसी तरह के रसपूर्ण माहौल में मेरा नाता चल रहा था. मुझसे ज्यादा तो मुझे फोन करके अक्सर संतोषजी ही बात करते थे। हमेशा एचटी हाउस की जगत विख्यात कैंटीन में मुझे बुलाते और खान पान के साथ हमलोग बहुत मामले में बात भी कर लिया करते थे। उनका एक वीकली कॉलम दरअसल दिल्ली की समस्याओं पर केंद्रित होता था। कई बार मैने कॉलम में दी गयी गलत सूचनाओं जानकारियों तथ्यों और आंकड़ो की गलती पर ध्यान दिलाया तो मुझे हमेशा लगा कि शायद यह उनको बुरा लगेगा। मगर एक उदार पत्रकार की तरह हमेशा गलतियों पर अफसोस प्रकट किया और हमेशा बताने के लिए प्रोत्साहित किया।

हद तो तब हो गयी जब कुछ प्रसंगों पर लिखने से पहले घर पर फोन करके मुझसे चर्चा कर लेते और आंकड़ो के बारे में सही जानकारी पूछ लेते। उनके द्वारा पूछे जाने पर मैं खुद को बड़ा शर्मसार सा महसूस करता कि क्या सर आप मुझे लज्जित कर रहे हैं, मैं कहां इस लायक कि आपको कुछ बता सकूं। मेरे संकोच पर वे हमेशा कहते थे कि मैं भला तुमको लज्जित करूंगा, साले तेरे काम का तो मैं सम्मान कर रहा हूं, मुझे पता है कि इस पर जो जानकारी तुम दोगे वह कहीं और से नहीं मिलेगी।

उनकी इस तरह की बातें और टिप्पणियां मुझे हमेशा प्रेरित करती और मुझे भी लगता कि काम करने का मेरा तरीका कुछ अलग है। आंकड़ो से मुझे अभी तक बेपनाह प्यार हैं क्योंकि ये आंकड़े ही है जो किसी की सफलता असफलता की पोल खोलती है। हालांकि अब नेता नौकरशाह इसको लेकर काफी सजग और सतर्क भी हो गए हैं मगर आंकडों की जुबानी रेस में ज्यादातर खेलबाजों की गाड़ी पटरी से उतर ही जाती है। संतो,जी र मेरा प्यार और नेह का नाता जगजाहिर होने की बजाय लगातार फोन र कैंटीन तक ही देखा जाता। हम आपस में क्या गूफ्तगू करते यह भी हमारे बीच में ही रहता।

एक वाक्या सुनादूं कि जब वे मयूरविहार फेज टू में रहते थे तो मैं अपने जीवन में पहली और आखिरी बार किसी पर्व में मिठाई का एक पैकेट लेकर खोजते खोजते सुबह उनके घर पर जा पहुंचा। । घर के बाहर दालानव में मां बैठी थी। मैने उनसे पूछा क्या आप संतो,जी की मां है ? मेरे सवाल पर चकित नेत्रों से मुझे देखते हुए अपने अंचल की लोक भाषा में कुछ कहा जिसका सार था कि हां । मैने उनके पैर छूए और तब मेरा अगला सवालथा कि क्या वे घर पर हैं ? मां के कुछ कहने से पहले ही तब तक भीतर से उनकी आवाज आई जी हा अनामी डार्लिंगजी संतोष जी घर पर हैं आप अंदर आईए। उनकी आवाज सुनकर मां ने जाने का रास्ता बना दिया तो मैं अंदर जा पहुंचा।

मेरे हाथ में मिठाई का डिब्बा देखकर वे बोल पड़े ये क्या है ? थोडा तैश में बोले गजब करते हो छोटे भाई हो और बड़े भाई के यहां मिठाई लेकर आ गए। अरे बेशरम मिठाई खाने आना चाहिए ना कि लाना। मैं भी थोडा झेंपते हुए कहा कि आज दीवाली था और आप दिल्ली के पहले पत्रकार हो जिसके घर मैं आया हूं। तो बोले- मुझे ही आखिरी पत्रकार भी रखना जब किसी पत्रकार के यहां जाओगे मिठाई लेकर तो वह तेरी ईमानदारी पर संदेह करेगा कि घर में मिठाई के कुछ डिब्बे आ गए तो लगे पत्रकारों में बॉटकर अपनी चौधराहट दिखाने। कुछ देर के बाद जब मैं जाने लगा तो मुझे मिठाई के दो डिब्बे तमाया एक तो मेरी तरफ से तुमको और दूसरा डिब्बा जो लाया था उसके एवज में यह दूसरा डिब्बा।

मैं दोनों डिब्बे थामकर जोर से हंसने लगा,तो वे थोडा असहज से होते हे सवाल किया कि क्या हुआ? मैंने कहा कि अब चौधराहट मैं नहीं आप दिखा रहे हैं। फिर हमलोग काफी देर तक खिलखिलाते रहे और अंत में फिर चाय पीकर घर से बाहर निकला। दीपावली या होली पर जब कभी शराब की बोतल या कभी कभी बंद पेटी में दर्जनों बोतल शराब की घर पहुंचा देने पर ही मैं अपने उन मित्रों को याद करता जिनके ले यह एक अनमोल उपहार होती। बाद में कई विधायकों को फोन करके दोबारा कभी भी शराब ना भेजने का आग्रह करना पड़ता ताकि मुझे से कपाने के लिए परिश्रम ना करना पड़े।

इसी तरह 1996 के लोकसभा चुनाव में बाहरी दिल्ली के सांसद सज्जन कुमार की एक प्रेसवार्ता में मैं संतोषजी के साथ ही था। मगर सज्जन कुमार के बगल में एक मोटा सा आदमी बैठा था । दोनों आपस में कान लगाकर सलाह मशविरा कर रहे थे। बातचीत के दौरान भी अक्सर उनकी कनफुसियाहट जारी रही। प्रेस कांफ्रेस खत्म होने के बाद मैं दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के तालकटोरा रोड वाले दफ्तर के बाहर खडा ही था कि सज्जन कुमार के उसी मोटे चमच्चे पर मेरी नजर गयी। तीसरी दफा अंदर से निकल कर अपनी गाड़ी तक जाना और लौटने की कसरता के बीच मैने हाथ जोडते हुए अभिवादन के साथ ही पकड़ लिया। माफ करेंगे सर मैं आपको पहचाना नहीं?

दैनिक जारगण के रिपोर्टर ज्ञानेन्द्र सिंह मेरे साथ था। मैने अपना और ज्ञानेन्द्र का परिचय दिया तो वो बोल पडा अरे मैं गोस्वामी एचटी से । मगर इस क्षणिक परिचय से मैं उनको पहचान नहीं सका। तब जाकर हिन्दुस्तान के चीफ रिपोर्टर रमाकांत गोस्वामी का खुलासा हुआ। मैने कहा कि सर आप मैं तो सज्जन का कोई पावर वाला चमच्चा मान रहा था। मेरे यह कहने पर वे झेंप से गए मगर तभी उन्होने हाथ में लिए अंडे पकौडे और निरामिष नाश्ते को दिखाकर पूछा कुछ लोगे ? मैने उनसे पूछा कि क्या आप लेते है ? तो वे एक अंहकार भाव से बोले मैं तो पंडित हूं ? तब मैंने तुरंत पलटवार किया मैं तो महापंडित हूं इसको छूता तक नहीं। मेरी बातों से वे बुरी तरह शर्मसार हो उठे। मगर कभी दफ्तर में आकर मिलने का न्यौता देकर अपनी जान बचाई। मैने इस घटना को संतोषजी को सुनाया तो मेरी हिम्मत की दाद दी। हंसते हे कहा की ठीक किय़ा जो लोग पत्रकार होकर चमच्चा बन जाने में ज्यादा गौरव मानते हैं उनके साथ इस तरह का बर्ताव जरूरी है।

शांतभाव से एक प्यार लगाव भरा हमारा रिश्ता चल रहा था कि एकाएक पता लगा कि वे अब दैनिक जागरण में चले गए. इस खबर पर ज्यादा भाव ना देकर मैं एक बार अपने भारतीय जनसंचार संस्थान काल वाले मित्र उपेन्द्र पांडेय से मिलने जागरण पहुंचा तो संयोग से वहीं पर संतोषजी से मुलाकात हुई। जागरण के कुछ स्पेशल पेज में आए व्यापक परिवर्तनों पर मैने उपेन्द्र से तारीफ की तो पता चला कि आजकल इसे संतोषजी ही देखरहे हैं। तब मैंने पूरे उल्लास के साथ उनके काम करने के अंदाज पर सार्थक प्रतिक्रिया दी। मैंने यह महसूस किया कि वे हमेशा मेरी बातों या सुझावों को ध्यान से लेते थे। मैने कहा भी कि आप आए हैं तो भगवती जागरण में धुंवा तो प्रज्जवलित होनी ही चाहिए। मेरी बातों को सुनकर संतोषजी ने फिर कहा अनामी तेरी राय विचारों का मैं बड़ा कद्र करता हूं क्योंकि तुम्हारा नजरिया बहुतों से अलग होता है। यह सुनकर मैंने अपना सिर इनके समक्ष झुका लिया तो वे गदगद हो उठे। उन्होंने कहा तेरी यही विन्रमता ही तेरा सबसे बड़ा औजार है। लेखन में एकदम कातिल और व्यक्तिगत तौर पर एकदम सादा भोला चेहरा। अपनी तारीफ की बातें सुनकर मैं मारे शरम के धरती में गड़ा जा रहा था।

जागऱण छोड़कर उपेन्द्र के साथ चंड़ीगढ बतौर संपादक दैनिक ट्रिब्यून में चले गए। 1990-91 में लेखन के आंधी तूफानी दौर में कई फीचर एजेंसियों के मार्फत ट्रिब्यून में मेरी दर्जनों रपट लेख और फीचर छप चुके थे। 193 में मैं जब चंडीगढ़ एक रिपोर्ट के सिलसिसे में गया तो उस समय के ट्रिब्यून संपादक विजय सहगल जी से मिला। परिचय बताने पर वे एकदम चौंक से गए। बेसाख्ता उन्होंने कहा अरे अनामी मैं तो अभी तक अनामी को 40-45 साल का समझ रहा था. आप तो बहुत सारे प्रसंगों पर रोचक लिखते हैं। सहगल जी की बातें सुनकर मैं भी हंसने लगा। लगभग यही प्रतिक्रिया थी पहले चौथी दुनिया और बाद में राष्ट्रीय सहारा के पटना ब्यूरो प्रमुख परशुराम शर्मा की। 1995 में एक दिन नोएडा स्थित सहारा दफ्तर में मिल गए। परिचय होने पर उन्होंने मुझे गले से लगा लिया- अरे बाप रे बाप,  कितना लिखता है तू। मैं तो उम्रदराज होने की सोच रहा था पर तू तो एकदम बच्चा निकला। दो दशक से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी उनका स्नेह बरकरार है।

कभी कभी मैं लिखने की रफ्तार तथा छपने की बारिश पर सोचता हूं तो अब मैं खुद चौंक जाता हूं। पहले लगता था कि मेरे हाथ में सरस्वती का वास हो। लंबा लिखना मेरा रोग था। कम शब्दों में लिखना कठिन होता था। बस कलम उठाया तो नदियां बह चलीं वाली हालत थी। पर अब लगता है मेरे लेखन का खुमार ही पूरी तरह उतर-सा गया हो। अब तो लिखने से पहले उसकी तैयारी करनी पड़ती है। तब कहीं जाकर लगता है मानो लिखना संभव हो पाता है। मुझे कई बार चंडीगढ भी बुलाया पर मैं जाकर मिल ना सका। उपेन्द्र पांडेय ने मुझे दिल्ली का भी फोन नंबर दिया और कई बार बताया भी कि संतोष, अभी दिल्ली में ही हैं, मगर मैं ना मिल सका और ना ही बातचीत ही हो सकी। अभी पिछले ही माह उपेन्द्र ने फोन करके कहा कि अब माफी नहीं मिलेगी, तुम चंडीगढ़ में आओ, बहुत सारे मित्र तुमसे मिलने के लिए बेताब हैं।

मैं भी अप्रैल में दो तीन दिन के ले जाना चाह रहा था। इसी बहाने अपनी मीरा मां और रमेश गौतम पापा समेत अजय गौतम और छोटे भाई के साथ एक प्यारी सी बहन से भी मिलता। कभी हजारीबाग में रहकर धूम मचाने वाले ज्योतिषी पंडित ज्ञानेश भारद्वाज की भी आजकल चंडीगढ में तूती बोल रही है. संतोष जी के साथ एक पूरे दिन रहने और संपादक के काम काज और तमाम बातों पर चर्चा करने के लिए मैं अभी मानसिक तौर पर खुद को तैयार ही कर रहा था कि एक रोज रात 11 बजे एकाएक फेसबुक पर भडास4मीडिया में संतोष तिवारी के न रहने की खबर देखकर सन्न रह गया। ऐसा प्रतीत हुआ मानों वे रूठ गए हों मुझसे। कोई उलाहना दे रहे हों कि साले दो साल से बुला रहा हूं तो तेरे को फुर्सत नहीं थी तो ठीक है अब तू चंडीगढ़ आ तो सही पर अब मेरे पास भी तुमसे मिलने का समय नहीं।

मैं इस लेख को देर रात तक जागकर कल ही लिख देना चाह रहा था पर मेरे सामने संतोषजी इस कदर मानों आकर बैठ गए हों कि मेरे लिए उनकी यादों से निकलना और शब्द देना संभव नहीं हो पाया। और अंतत: पौने एक बजे रात को मैंने अपना कम्प्यूटर बंद दिया। आज सुबह से ही मेरे भीतर संतोषजी समाहित से हैं। लगता है मानो वे मेरे लेख को देख रहे हों और जल्दी जल्दी लिखने को उकसा रहे हों। आमतौर पर मेरे नयन जल्दी सजल नहीं होते मगर हिन्दी पत्रकारिता ने एक सुयोग्य उत्साही संपादक को खो दिया है। अपने सहकर्मियों को अपने परिवार का सदस्य सा मानकर प्यार और स्नेह देने वाले दिल्ली में कितने लोग रह गए है? उपेन्द्र पांडेय के लाख कहने पर भी अब तो फिलहाल चंडीगढ जाने का उत्साह ही नरम पड़ गया। किस मुंह से जाउं या किसके लिए? फिलहाल तो संतोषजी की अनुपस्थिति / गैरमौजूदगी ही मेरे को काट रही है. मुझे बारबार अनामी डार्लिंग की ध्वनि सुनाई पड़ रही है कि दिल्ली जैसे शहर में संतोषजी के अलावा और कौन दूसरा हो सकता है जो अनामी डार्लिंग कहकर अपना प्यार स्नेह और वात्सल्य दिखला सके।

और अंत में, माफ करेंगे प्रदीप संगम जी और ओम प्रकाश तपस जी। आलोक तोमर भैय्या पर तो एक लेख लिखकर मैं अपना प्यार तकरार इजहार कर चुका हूं। मगर आप दोनों पर अब तक ना लिखने का कर्ज बाकी है। पूरा एक लेख आप लोगों पर हो, यह मेरा प्रयास होगा। फिलहाल तो इस मौके पर केवल कुछ यादों की झांकी। संगम जी से मैं सहारनपुर से जुडा था। जिंदगी में बतौर वेतन कर्मी यह पहली नौकरी थी। शहर अनजाना और लोग पराय़े। मगर डा. रवीन्द्र अग्रवाल और प्रदीप संगम ने मुझे एक सप्ताह के अंदर शहर की तमाम बारीक जानकारियों से अवगत कराया। संगम जी के घर के पास में ही मैं भी किराये पर रहता था तो सुबह की चाय के साथ देर रात तक संगम क्लास जारी रहता। भाभी का व्यावहार स्नेहिल और मिलनसार स्वभाव था। इससे मेरे मन के भीतर की लज्जा खत्म हो गई और संगम जी का घर एक तरह से हमारे लिए जब मन चाहा चले गए वाला अपना घर हो गया था। बाद में संगमजी दिल्ली हिन्दुस्तान में आए तो 1988 की बहुत सारी यादें सजीव हो गयी। हम लोग कनाट प्लेस में अक्सर साथ रहते। मगर सपरिवार संगम जी हिमाचल घूमने क्या गए कि पहाड की वादियों में ही एकाएक हमलोगों को अलविदा बोल गए।

यह मेरे लिए भी एक सदमा था। तभी नवभारत टाईम्स में काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश तपस जी एकाएक हमारे बीच से चले गए। बात 1994 की है जब मैंने दिल्ली के दो गांवों पर एक स्टोरी की. दिल्ली और साक्षरता अभियान को शर्मसार करने वाले दो गांव यमुना नदी के मुहाने पर है। मैं जहांगीरपुरी के निर्दलीय विधायक कालू भैय्या को तीन किलोमीटर तक पैदल लेकर इस गांव में पहुंचा और मुस्लिम बहुल इस गांव की बदहाली पर मार्मिक रपट की। राष्ट्रीय सहारा में खबर तो पहले छपी मगर हमारे डेस्क के महामहिमों के चलते यह खबर पहले पेज पर ना लेकर भीतर के किसी पेज में लगा दी गयी। अगले दिन मैंने काफी नाराजगी भी दिखाई मगर चिड़िया चुग गयी खेत वाली हालत थी।

खबर छपकर भी मर गयी थी, मगर एक सप्ताह के भीतर ही नवभारत टाईम्स में यही खबर छपी- ‘दिल्ली के दो अंगूठा टेक गांव’। खबर छपने पर दिल्ली में नौकरशाही स्तर पर हाहाकार मचा। सरकार सजग हुई और एक माह के अंदर ज्ञान पुर्नवास साक्षरता आदि की व्यवस्था करा दी गयी। मैने खबर की चोरी पर तपस जी से फोन पर आपत्ति की. मैने कहा कि आपको खबर ही करनी थी तो एक बार तो मुझसे बात कर लेते मैं आपको इतने टिप्स देता कि आप और भी कई स्टोरी बना सकते थे। मैं तो फिर से इस प्रसंग पर अब लिखूंगा ही नहीं क्योंकि पेपर वालों को इसकी समझ ही नहीं है। मेरी बातों पर नाराज होने की बजाय तपस जी ने खेद जताया और मिलने को कहा। जब हम मिले तो जिस प्यार उमंग उत्साह और आत्मीयता से मुझसे मिले कि मेरे मन का सारा मैल ही धुल गया। हम लोग करीब 16-17 साल तक प्यार और स्नेह के बंधन में रहे। इस दौरान बहुत सारी बातें हुई और वे सदैव मुझे अपने प्यार और स्नेह से अभिभूत रखा। मगर एक दिन एकाएक सुबह सुबह तपस जी के भी रूठने की खबर मिली. हर अपना वो वो पत्रकार लगातार मेरी नजरों से ओझल हो रहे हैं जिसको मैं बहुत पसंद करता हूं। हे भगवान मुझे इस दुर्भाग्य से बचाओ प्रभू।

लेखक अनामी शरण बबल आईआईएमसी के पासआउट हैं और कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनसे संपर्क asb.deo@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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संतोष तिवारी की प्रतिभा को अंकुरित-पल्लवित होते बहुत निकट से देखा था मैंने

Rajendra Rao : दैनिक ट्रिब्यून के संपादक और मेरे अजीज संतोष तिवारी का असमय प्रस्थान स्तब्ध और उदास कर गया। सत्तर के दशक में मैंने उनकी प्रतिभा को अंकुरित और पल्लवित होते बहुत निकट से देखा था। तब वे इंटर में पढ़ते थे। लेखन का जुनून सवार था और अपनी प्रारंभिक रचनाएं दिखाने लाल कालोनी (किदवई नगर) से मेरे घर (अर्मापुर) नियमित रूप से आते थे। उनकी पहली ही कहानी धर्मयुग में छपी और फिर उन्होंने मुड़ कर नहीं देखा।

मैंने उन्हें रविवार के संपादक एसपी सिंह से मिलवाया तो उनकी फ्री लांस पत्रकारिता का दौर शुरू हो गया। आनंद बाजार ग्रुप की अंग्रेजी पत्रिका संडे के लिए रिपोर्टिंग करने को एमजे अकबर ने उन्हें प्रोत्साहित किया। वे हिंदी में रिपोर्टिंग करके भेजते थे और अकबर उन्हें अंग्रेजी में अनुदित करवा कर छापते थे। जैसे ही संतोष तिवारी कानपुर छोड़ कर गए दिल्ली ने उन्हें लपक लिया।

दिनमान में कैरियर की पारी शुरू कर के वे हिंदुस्तान, इंडिया टी वी, दैनिक जागरण होते हुए ट्रिब्यून में शीर्ष पर पहुंचे। पत्रकारिता की तूफानी दुनिया के झंझावातों के बीच साहित्य उनसे छूट गया। एक विलक्षण प्रतिभा के सहसा विलोप हो जाने से हिंदी पत्रकारिता की अपूरणीय क्षति हुई है। मेरे कानों में अब भी उनका ‘भाई साहब’ संबोधन प्रतिध्वनित हो रहा है।

साहित्यकार राजेंद्र राव की एफबी वॉल से.

मुख्यमंत्री तथा सूचना एवं जन सम्पर्क मंत्री का संपादक के निधन पर शोक व्यक्त

शिमला : मुख्यमंत्री श्री वीरभद्र सिंह ने दैनिक ट्रिब्यून समाचार पत्र के सम्पादक श्री सन्तोष तिवारी के निधन पर शोक व्यक्त किया है। उनका आज पीजीआई चण्डीगढ़ में देहांत हो गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि श्री तिवारी एक जाने-माने पत्रकार थे, जिन्होंने विभिन्न समाचार पत्रों तथा टी.वी. चैनलों में वरिष्ठ सम्पादकीय पदों पर कार्य कर पिं्रट तथा इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में एक बड़ा योगदान दिया है।

श्री वीरभद्र सिंह ने शोक संतप्त परिजनों के प्रति गहरी सवेंदनाएं प्रकट की हैं और दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की है। सूचना एवं जन सम्पर्क मंत्री श्री मुकेश अग्निहोत्री ने भी वरिष्ठ पत्रकार के निधन पर गहरा दुःख प्रकट किया है। उन्होंने कहा कि श्री तिवारी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में चार दशकों से अधिक अवधि के दौरान उत्साहपूर्वक एवं समपर्ण भाव से कार्य किया है और वह लम्बे समय तक नवोदित पत्रकारों के लिए एक प्रेरणास्त्रोत रहेंगे। (विजयेन्दर शर्मा की रिपोर्ट.)

मूल खबरें…

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गोरखपुर प्रेस क्लब द्वारा आयोजित स्मृति समारोह में शिरकत करने दिल्ली से पहुंचे संजय और विनीता

गोरखपुर। कवि व समालोचक प्रो अनन्त मिश्र ने कहा है कि  रावण ने पूरी दुनिया से बटोरकर सोने की लंका बनाई थी। अन्तत: उसका दहन हुआ। आज भी होड़ सोने की लंका बनाने की है। मनुष्य को नजरअंदाज करते हुए हो रहा विकास दुनिया के अस्तित्व के लिए खतरनाक है। प्रो मिश्र शुक्रवार को स्व़ रोहित पांडेय की सातवीं पुण्य तिथि के अवसर पर आयोजित स्मृति व श्रद्धांजलि कार्यक्रम को बतौर मुख्य वक्ता संबोधित कर रहे थे। इसका आयोजन गोरखपुर जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब ने अपने सभागार में किया था।

अपने सारगर्भित वक्तव्य में उन्होंने निरंतर आत्मकेन्द्रित हो रही दुनिया पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि हम ऐसी दुनिया रच रहे हैं जिसमे हमें दूसरे की चिंता नहीं है। बिना सोच विचार की दुनिया बन रही है। चेतन मनुष्य का लक्ष्य जब जड़ हो जाता है तो समाज नष्ट हो जाता है। रोहित को याद करते हुए उन्होंने कहा कि जब भी मिलता था मैं कहता था योग उपवास छोड़ दो। प्रकृति से लड़ना ठीक नहीं, पर वह जुनूनी था। दूसरे के लिए सोचता था।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रेस क्लब आफ इंडिया के निदेशक संजय सिंह ने गोरखपुर की अपनी स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि मैं अब तक अपने घर में ही बेगाना था। आज मुझे यहां मुख्य अतिथि का सम्मान मिला है तो संतोष हो रहा है। रोहित को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वह भले इंसान थे। उनके इलाज के लिए हम कुछ खास नहीं कर पाए क्योंकि उस समय हम विवश थे। उन्होंने कहा कि प्रेस क्लब को अपना ऐसा ढांचा बनाना चाहिए जिससे बीमारी के चलते रोहित जैसे पत्रकार असमय काल कवलित न हो जाएं। रोहित हमारी स्मृति का अंग हैं वह भूलेंगे नहीं। विशिष्ट अतिथि प्रेस क्लब आफ इंडिया की पूर्व संयुक्त सचिव विनीता यादव ने कहा कि रोहित आप सबके बीच अपनी स्मृतियों से जिंदा हैं। उन्होंने इस मौके पर रक्तदान के कार्यक्रम के आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि वे डीपीसी में भी ऐसे आयोजन का प्रस्ताव रखेंगी।

विशिष्ट अतिथि न्यूज फाक्स के संपादक रामेन्द्र सिन्हा ने कहा कि रोहित के बहाने हम यहां अपने सरोकारों और चुनौतियों पर चर्चा कर रहे हैं। पत्रकारिता पहले जैसी नहीं रही। आज सब कुछ बाजार से संचालित हो रहा है। बहुत से दबाव हैं। पत्रकारिता की भाषा से लेकर सरोकार तक बदल गए हैं। यह मेरा अपना अनुभव है कि पत्रकारिता अब पहले की तुलना में कठिन चुनौती हो गयी है। पर इन कठिनाईयों और चुनौतियों के बीच हमें ही रास्ता निकालना होगा। ऐसा माहौल पैदा किया जाय कि सिस्ट्म में सुधार हो। कैसे हम पेशागत ईमानदारी को बनाए रखते हुए समाज और मनुष्यता को कुछ दे सकते हैं। इस दिशा में सोचना होगा। रोहित को श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने कहा कि रोहित कुछ अलग थे। तभी वह हमारी स्मृति में अब भी जीवित हैं।

इस मौके पर उपस्थित प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष अरविंद शुक्ल, शफी आजमी, एसपी सिंह व अशोक चौधरी ने भी रोहित से जुड़ी स्मृतियों को साझा किया और उन्हें श्रद्धांजलि दी। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते प्रेस क्लब के वर्तमान अध्यक्ष अरविंद राय ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और कहा कि रोहित प्रखर और बेलौस पत्रकार थे। उन्होंने प्रेस क्लब की उपलब्धियों के बारे में बताते हुए कहा कि न सिर्फ पत्रकारों के लिए बल्कि समाज के हित भी क्लब सक्रिय रहता है। इंसेफेलाइटिस पीड़ितों के नौ लाख रुपये का दान राज्य सरकार को दिया था। साथ ही हर वर्ष रोहित की याद में रक्तदान का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।

कार्यक्रम का संचालन प्रेस क्लब के वर्तमान महामंत्री ओंकार धर द्विवेदी ने किया। कार्यक्रम में रक्तदान कार्यक्रम के संयोजक पूर्व उपाध्यक्ष कुंदन उपाध्याय, मनोज कुमार सिंह, मृत्युंजयशंकर सिन्हा, जद यू नेता अरूण कुमार, धर्मेन्द्र उर्फ टाटा दूबे, वेद प्रकाश पाठक, आर पी सिंह, अजीत कुमार यादव, मार्कण्डेय मणि, देवेन्द्र दूबे, नीरज श्रीवास्तव, अरूण कुमार श्रीवास्तव, अमीरूद्दीन उर्फ गुड्डू, संगम दूबे, शिवहर्ष द्विवेदी, शफी अंसारी, डीके गुप्ता, ईश्वर सिंह, बैजू गुप्ता, फैयाज अहमद समेत भारी संख्या में पत्रकार उपस्थित थे।

कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों और पत्रकारों ने रोहित के चित्र पर माल्यार्पण और पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। इसके पूर्व क्लब के पदाधिकारियों व वरिष्ठ सदस्यों ने अतिथियों को माला पहनाकर व पुष्पगुच्छ देकर सम्मानित किया। कार्यक्रम के अंत में अतिथियों को शाल, प्रशस्तिपत्र व टेराकोटा कलाकृति स्मृति चिह्न के रूप में भेंट किया गया।

चार पत्रकारों को सम्मान
प्रेस क्लब की ओर से दैनिक आज के वरिष्ठ पत्रकार कामेश्वर उपाध्याय, पाइनियर के ब्यूरो प्रभारी सतीश त्रिपाठी, दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार विवेकानंद मिश्र व अमर उजाला के टीपी शाही को अतिथियों ने शाल और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया।

25 लोगों ने किया रक्तदान
इसके पूर्व सुबह नवजीवन ब्लड बैंक, बेतियाहाता में 25 लोगों ने रक्तदान किया। कार्यक्रम के दौरान इन सभी को प्रशस्तिपत्र देकर सम्मानित किया गया।

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पत्रकारिता की राह पर शंभूनाथ शुक्ला का सफर… कुछ यादें, कुछ बातें

मैं बनवारी जी से मिलने साढ़े चार सौ किमी की यात्रा तय कर दिल्ली आ गया

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल

जब से विजुअल मीडिया का दौर आया है पत्रकारिता एक ग्लैमरस प्रोफेशन बन गया है। पर हमारे समय में दिनमान ही पत्रकारिता का आदर्श हुआ करता था और रघुवीर सहाय हमारे रोल माडल। लेकिन उनकी दिक्कत यह थी कि वे साहित्यकार थे और पत्रकारिता उनके लिए दूसरे दरजे की विधा थी। पर दिनमान वे पूरी पत्रकारीय ईमानदारी से निकालते थे। हमारे घर दिनमान तब से आ रहा था जब उसके संपादक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय थे। लेकिन जब मैने उसे पढऩा शुरू किया तो संपादक रघुवीर सहाय हो गए थे।

दिनमान हम पढ़ते जरूर थे। उसके तीखे तेवर, हर विषय पर सामयिक टिप्पणी और उसके शीर्षक। सदस (सर्वेश्वरदयाल सक्सेना) का नियमित कालम तथा श्याम लाल शर्मा, शुक्ला रुद्र, सुषमा पाराशर, त्रिलोक दीप और जवाहर लाल कौल के लेख और रपटें। पर बनवारी जी ने जब इस पत्रिका में कदम रखा तो इसके तेवर ही बदल गए और यह एक विशुद्ध रूप से सामयिक पत्रिका बन गई।

बनवारी जी के लिखने की स्टाइल ही अलग थी। चाहे वह नेपाल के चुनाव की रपटें हों या दिल्ली में कुतुब मीनार की सीढिय़ों से फिसल कर ४२ बच्चों की मौत की रपट। अब तो शायद लोगों को पता भी नहीं होगा कि आज से ३२ साल पहले तक कुतुब मीनार पर चढ़ा भी जा सकता था। लेकिन १९८२ में एक भयानक दुर्घटना घटी। कुतुब मीनार देखने आई छात्राओं की एक भीड़ भरभराती हुई तीसरी मंजिल से नीचे आ गिरी, उसमें ४२ छात्राएं मरीं। बनवारी की इस रपट की हेडिंग थी घिसी हुई सीढिय़ों पर मौत। मुझे यह शीर्षक इतना आकर्षक और रपट इतनी कारुणिक लगी कि मैं सिर्फ बनवारी जी से मिलने के लिए साढ़े चार सौ किमी की यात्रा तय कर कानपुर से दिल्ली आ गया।

चूंकि मैं हावड़ा-दिल्ली (इलेवन अप) एक्सप्रेस पकड़कर दिल्ली आया था और वह ट्रेन सुबह पांच बजे ही पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन आ जाया करती थी इसलिए पूरे तीन घंटे तो प्लेटफार्म पर ही वाक कर काटे और आठ बजे के आसपास वहां से पैदल ही दिनमान के दफ्तर के लिए निकल पड़ा। ठीक नौ बजे १० दरियागंज स्थित टाइम्स बिल्डिंग में पहुंच गया। पता लगा कि बनवारी जी तो दस के बाद आएंगे। लेकिन वहां मौजूद सक्सेना नामके चपरासी ने चाय पिलाई और समोसे लाकर खिलाए।

मैं उसकी सज्जनता से गदगद था। उसने बताया कि टाइम्स से उसे १२ सौ रुपये महीने पगार मिलती है जो मेरी पगार से ड्यौढ़ी थी जबकि मैं कानपुर में दैनिक जागरण में उप संपादक था। खैर करीब सवा दस बजे बनवारी जी आए। मैं उनसे जाकर मिला। वे हल्की लाइनों वाला कुरता तथा एकदम झकाझक सफेद पायजामा धारण किए हुए एक बेहद सौम्य और उत्साही पत्रकार लगे। पर यह भी महसूस हुआ कि शायद पत्रिकाओं के संपादक कुछ हौवा टाइप के हुआ करते थे। क्योंकि बनवारी जी मुझसे बात करते समय कुछ सहमे से लगे और बार-बार संपादक रघुवीर सहाय के केबिन की तरफ देख लिया करते थे। ऐसा लग रहा था कि अभी एक दरवाजा खुलेगा और एक डरावना सा अधबूढ़ा संपादक निकलेगा। जो महान कवि होगा और महान चिंतक भी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और केबिन खुला तो खाकी रंग की एक जींस नुमा पैंट पहने एक व्यक्ति निकला और लंबे-लंबे संगीतकार जैसे बालों वाले सदस की टेबल तक गया फिर उसने हाल पर नजर डाली मुझे भी देखा और लौट गया। बनवारी जी ने बताया कि वे रघुवीर जी थे।

मेरी मिलने की बहुत इच्छा हुई लेकिन न तो बनवारी जी ने मेरी उनसे मुलाकात के लिए बहुत उत्कंठा जताई और न ही वे सज्जन हाल में ज्यादा देर तक रुके थे। इसलिए मन मारकर चला आया। दिल्ली में तब तक किसी को जानता नहीं था इसलिए नई दिल्ली स्टेशन गया। पता लगा कि गोमती जाने को तैयार है। टिकट लिया कुल बीस रुपये अस्सी पैसे का। और ट्रेन में जाकर बैठ गया। तब गोमती एक्सप्रेस नई-नई चली थी। और दिल्ली के बाद सीधे कानपुर आ कर ही रुकती थी। सामने वाली बर्थ पर जो मोहतरमा थीं वे कोई लखनऊ के नवाब परिवार से ताल्लुकात रखती थीं। जब भी वे अपना पानदान खोलतीं तो पूरा कोच उसकी गमकती खुशबू से भर जाता।

आगे है…

मोहन बाबू ने कहा- नौकरी चलती रहेगी, लेकिन होगी ठेके पर

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नए और जोखिम प्रयोग क़े लिए याद किए जाएंगे संपादक बच्चन सिंह

वरिष्ठ पत्रकार बच्चन सिंह जी का अवसान हिंदी पत्रकारिता के एक युग का अंत है. बच्चन जी दरअसल पुरानी से लेकर अति आधुनिक पत्रकारिता तक के सफर के युग का  प्रतिनिधित्व करते थे. उन्होंने जो मानक स्थापित किये, वह भाषायी पत्रकारिता के 80 के दशक के बाद के एक सौ संपादक भी मिलकर नहीं कर सकते. पत्रकारिता में जो बदलाव को लेकर जो समझ और अनुमान उन्होंने तीन दशक पहले लगा लिए था, वह आज सामने  है.

बच्चन जी ने जिस भी अख़बार में काम किया वहां अपनी दूरदर्शिता की जो छाप छोड़ी वह भूली नहीं जा सकती. वह जिस भी अख़बार में जाते थे, उसका तेवर ही बदल जाता था. भाषा से लेकर हैडिंग तक में वह अख़बार अलग ही पहचान बना लेता था.  मेरा उनके साथ काम करने का लंबा अनुभव रहा है. पत्रकारिता में वह मेरे मार्गदर्शक थे. मैंने उनके जैसा संपादक अपने तीन दशक के पत्रकारिता करियर में कभी नहीं पाया. न गुस्सा और न किसी बात पर खीज. न ईर्ष्या और न किसी के बारे में नुक्ता-चीनी. उनके अधीन काम करने वाले बड़ी से बड़ी गलतियां कर बैठते थे लेकिन अगले दिन जब उनके चैम्बर में सम्बंधित सहयोगी जाता था तो अपने गुस्से को  प्रकट नहीं करते थे. शालीन और कम शब्दों में वह उसे अख़बार में की गयी गलती बता देते थे. सहयोगी इतना शर्मिंदा हो जाता था क़ि उसके मुंह से कोई शब्द नहीं निकल पाता था. काम लेने और करने का अदभुत तरीका था उनका.

मैं 1986 में उनके निर्देश पर जब दैनिक जागरण इलाहाबाद छोड़ कर स्वतंत्र भारत वाराणसी ज्वाइन करने गया तो उन्होंने मुझे खेल से साथ ही फीचर, सेंट्रल डेस्क की जिम्मेदारी दी. लिखने के लिए खूब प्रोत्साहित किया. स्वतंत्र भारत नया नया लांच  हुआ था. उन्ही के नेतृत्व में. बहुत मेहनत  की थे लांच होने के बाद से एक साल तक. 18 घंटे तक हम लोग काम करते थे. और, नतीजा यह निकला क़ि इस  अख़बार ने  वाराणसी में आज को  पीछे कर नंबर 2 में स्थान बना लिया. उस समय वाराणसी में आज और दैनिक जागरण ही बराबर के अख़बार थे और दोनों का सर्कुलेशन लगभग समान था, कभी कोई बढ़त ले लेता था तो कभी कोई, ऐसी हालात में तीसरे अख़बार के लिए गुंजाइश कम ही बचती है, तब बच्चन जी ने अनूठा प्रयोग किया. उन्होंने तय किया क़ि ऐसा अख़बार निकल जाये जो भाषा से लेकर मेकअप तक में एकदम अलग हो. यह एक बड़ा रिस्क भी था. लोग पसंद कर लें, इसकी कोई गारंटी नहीं थी, फिर नए नए प्रयोगों के पक्षधर बच्चन जी ने इस रिस्क को स्वीकार किया.

ले आउट छह कालम का और भाषा एकदम सरल और उसमे अंग्रेजी के भी शब्द. जैसे दौड़ की जगह रेस, दरवाजे की जगह डोर, होनहार की जगह टैलेंट. कुर्सी-मेज की जगह चेयर-टेबल, प्रबंधक की जगह मैनेजर आदि दिए जाने लगे. जब अख़बार में इस तरह के शब्दों को शहर क़े पत्रकारों ने पढ़ा तो उन्होंने आपत्ति जताई और इस हिंदी पत्रकारिता के साथ खिलवाड़ माना. बच्चन जी का तर्क था क़ि आने वाले समय में लोग क्लिष्ट हिंदी नहीं पढ़ेंगे. वह वही पढ़ना पसंद करेंगे जो बोलते हैं और जो शब्द बोलने में प्रयुक्त होता है, वही अख़बार में भी लिखना चाहिए. उनका यह फैसला सही साबित हुआ और स्वतंत्र भारत ने पाठकों के बीच मजबूती से अपना स्थान बना लिया. इस तरह शब्दों के मामले में  वाराणसी की पारंपरिक हिंदी पत्रकारिता से कुछ हटकर थी बच्चन जी की पत्रकारिता.

ताकतवर लोगों ने की खूब साजिश

स्वतंत्र भारत वाराणसी ने जितने कम समय में जिस तेजी से  सफलता हासिल की थी उसी  तेजी से उसका   दुर्भाग्य पीछे-पीछे दौड़ रहा था. दो साल होते-होते यूनियन ने बोनस की मांग को लेकर हड़ताल कर दी. लेबर ऑफिस ने अख़बार में लॉक आउट घोषित कर  दिया. 26  दिन बाद  लॉक आउट हटा तो अख़बार को फिर से नयी ऊर्जा के साथ मार्किट में लाने की चुनौती थी. इस बार अख़बार फिर आगे बढ़ा लेकिन दूसरे स्थान से काफी दूर ही रहा. दरअसल,  बच्चन जी की सफलता ही उनकी दुश्मन बनती जा रही थी.

लखनऊ में उच्च पदों पर बैठे अख़बार के अधिकारी बच्चन जी के खिलाफ मैनेजिंग डायरेक्टर शिशिर जैपुरिया के कान भरने लगे. उन्हें खतरा इस बात का था क़ि बच्चन जी को कही वाराणसी के साथ ही लखनऊ का भी संपादक न बना दिया जाये. बात-बात पर अख़बार में बिना वजह नुक्स निकाले जाने लगे. बच्चन जी को आभास हो गया था क़ि  साजिश करने वाले काफी ताकतवर हैं, इसलिए उन्होंने  सितम्बर  1988  में इस्तीफा दे दिया है.   कुछ दिन बाद  ही बोनस की मांग को लेकर फिर हड़ताल हो गयी.. इस बार 16  दिन चली. जब हड़ताल ख़त्म हुई और अख़बार छपने लगा तो मार्किट में हम बहुत पीछे हो चुके थे.

पाठकों  ने इस अख़बार से नाता तोड़ लिया था. हॉकर्स ने अख़बार उठाने से इनकार कर दिया. वर्क्स मेनेजर के सी इन्दोरिया को लखनऊ बुलवाया गया और उनसे पूछा गया कि अख़बार को फिर से पटरी पर लाने के लिए क्या किया जा सकता है? इन्दोरिया जी ने सुझाव दिया कि किसी नामी चेहरे को संपादक  बनाकर भेजा जाये तो हो सकता है कुछ लाभ मिल जाये. जाने-माने साहित्यकर ठाकुर प्रसाद सिंह को संपादक बनाया गया. कुछ असर तो दिखा लेकिन तब   तक अख़बार में अनुशासनहीनता बढ़ गयी थी. यूनियन के नाम पर कामचोरी और मनमानी  होने लगी थी. ठाकुर प्रसाद उत्तर प्रदेश के सुचना निदेशक पद से कुछ समय पहले ही रिटायर्ड हुए थे. स्वाभाव से सरल होने के कारण संपादकीय टीम पर वह नियंत्रण नहीं कर सके. और 1987 समाप्त होते-होते जैपुरिया  खानदान ने इस अख़बार को बेच दिया

क्यों थे अन्य संपादकों से अलग?

बच्चन जी को बरेली से दैनिक जागरण लांच करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी.. अख़बार अक्टूबर 1986 में शुरू होना था. सितम्बर में उन्होंने मुझे स्वतंत्र भारत छोड़कर बरेली पहुँचने को कहा. मैं पहुँच गया. सुबह ऑफिस गया और बच्चन जी मुझे देख बहुत खुश हुए. लेकिन अगले दिन ही कुछ ऐसी स्थिति आ गयी कि मैं जागरण न ज्वाइन करके अमर उजाला ज्वाइन कर लिया. जागरण में प्रस्तावित वेतन से 800  रूपये ज्यादा में. बच्चन जी की महानता देखिए, उन्होंने मुझे न रोका और न बुरा माना. वह तो इस बात पर खुश थे कि मुझे 800 ज्यादा मिल रहे हैं. यही सब गुण बच्चन जी को अन्य संपादकों से अलग करता था.

दंगे की ख़बरों में मृतकों का नाम छपने की परंपरा डाली

अमर उजाला की बरेली मंडल और कुमाऊं (उत्तराखंड) में भरी साख थी. उसके मुकाबले जागरण को जगह बनाना चुनौतीपूर्ण काम था. जागरण लांच होने के 10  दिन बाद (november 1986) में  किसी मामूली बात पर बदायूं (बरेली से 40 km दूर) में दंगा फैल गया.  इतना भीषण दंगा कि कण्ट्रोल नहीं हो पा रहा था. सेना बुलानी पड़ी थी.  बच्चन जी ने कवरेज की वह परंपरा तोड़ी जो कोई भी संपादक हिम्मत नहीं जुटा सकता. उन्होंने दंगे में मारे गए लोगों के नाम छापे. अमर उजाला ऐसा नहीं कर रहा था. नाम छापने से जागरण को फायदा यह हुआ कि लोग उसे खरीदने लगे.

बरेली के तत्कालीन कमिश्नर डी पी सिंह और आई जी जोन अजय राज शर्मा ने बच्चन जी को फ़ोन करके सलाह दी कि नाम छापने से दंगा नहीं कण्ट्रोल होगा..बच्चन जी ने जवाब दिया कि नाम नहीं छापने से अटकलें और अगवाहें फैलती हैं,  इसलिए लोगों को पता होना चाहिए कि कौन ज्यादा ज्यादती कर रहा है, उसी इलाके में  पुलिस को प्रभावी एक्शन लेना चाहिये. कमिश्नर ने दूसरे दिन फिर फ़ोन किया और चेतावनी दी कि अगर मृतकों का नाम छपा होगा तो वह अख़बार को नहीं बंटने देंगे. बच्चन जी ने कहा, करके देख लीजिये लेकिन आप इसमें सफल नहीं होंगे.  कमिश्नर ने बदायूं में अख़बार की गाड़ी रोककर बंडलों को जब्त करवा दिया. इसका भी जागरण को लाभ मिला. लोगों को लगा कि प्रशासन जान बूझ कर ऐसा कर रहा है.लोगों तक सही बात पहुँचने से रोक रहा है. हलाकि अगले ही दिन प्रशासन को अपनी कार्रवाई वापस लेनी पड़ी.

देश के सभी भाषायी अख़बारों के संपादकों में बच्चन सिंह पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने दंगो में मृतकों के नाम देने की शुरुवात की. और अब तो बड़े-बड़े अंग्रेजी के भी अख़बार नाम देते हैं.जागरण बरेली मंडल में ठीक-ठाक स्थान बनाने में सफल रहा. दुर्भाग्य से बरेली में भी वह अपनों के ही छल- कपट की राजनीति का शिकार हुए और जागरण छोड़ना  पड़ा  यहाँ कुछ समय संवाद केसरी पत्रिका के साथ जुड़े फिर वाराणसी लौट गए अपने घर. घर में वह किताब लिखने में खुद को व्यस्त रखते थे.

मूल्यांकन नहीं हुआ

बच्चन सिंह जी प्रचार और झूठी  वाहवाही से दूर रहते थे. चापलूसी उनके खून में नहीं थी. अख़बार को बढ़ाने क़े मामले में उनसे बेहतर सोच वाला संपादक मैंने कभी नहीं देखा. उनमे एक मरे हुए अख़बार में प्राण डालने का सामर्थ्य था. वह जितना योग्य थे उतना सौ संपादक मिलकर भी उनके जैसी  योग्यता हासिल नहीं कर सकते हैं. वह तर्क नहीं करते थे. कोई खुद को ज्यादा समझदार बनने  की कोशिश करता था तो उसे भी सम्मान देते थे. उनका फार्मूला था कि युवा ही संपादकीय टीम के ऑक्सीजन होते हैं इसलिए युवा रिपोर्टरों को रिस्क वाले काम सौंपते थे.

उनकी कमजोरी यह थी कि एक बार जिस किसी भी सहयोगी पर विश्वास कर लेते थे तो फिर उससे सम्बन्ध नहीं तोड़ते थे, भले ही वह उन्हें धोखा  क्यों न दे दे? अखबारी दुनिया में बच्चन जी का मूल्यांकन नहीं हुआ. पत्रकारिता का दुर्भाग्य देखिये,  संपादकीय सहयोगियों को हंटर के जरिये  हांकने  की कला में कुख्यात  लोग ग्रुप एडिटर, प्रधान संपादक, एडिटोरियल  प्रेसीडेन्ट जैसे पद पाकर खुद को सुपर जर्नलिस्ट तो मान बैठे. लेकिन अपना  दिमागी संतुलन  कायम नहीं रख सके. इन बड़े पद वाले कथित पत्रकारों में न मर्यादा दिखती है और न शालीनता. दिखता है तो सिर्फ ढोंग और बनावटी व्यक्तित्व. पत्रकारिता में नए और जोखिम प्रयोग के लिए बच्चन जी हमेशा याद किये जायेंगे. उनके साथ और सानिध्य में काम करने वाले उन्हें कभी नहीं भूल सकेंगे.

सम्मान की योजना बनी थी

कुछ दिन पहले ही मैं इलाहाबाद में अपने कुछ पुराने दोस्तों के साथ मिलकर बच्चन जी का जोरदार सम्मान करने की योजना बना रहा था. बच्चन जी की मौत के दो दिन पहले ही मेरी दूरदर्शन के पूर्व संपादक और बच्चन जी क़े मित्र डॉ अशोक त्रिपाठी से इस सम्बन्ध में बात हुयी थी. उन्होंने बच्चन जी के जीवन और कृतित्व पर एक फोल्डर छपाने का सुझाव दिया.  31 जनवरी को सुबह मेरे 35 साल पुराने मित्र डॉ प्रदीप भटनागर (पूर्व संपादक दैनिक भास्कर झालावाड़) ने मुझे फ़ोन कर बताया कि बच्चन जी नहीं रहे. उन्होंने दोपहर में कंपनी बाग़ में शोक सभा बुलाई.  प्रदीप भी बच्चन जी के सानिध्य में काम कर चुके हैं.

इंद्र कांत मिश्र

वरिष्ठ पत्रकार

9827434787

heritagemental@yahoo.in


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श्रद्धांजलि : बच्चन सिंह और खुरदरी चट्टानों की यादें

खुरदरी चट्टान से जीवन पर / आशा के बादल बरसे जरूर हैं। पर नहीं उगा सके / सुख की एक हरी कोपल भी। और… / मैं बांझ चट्टान की तरह / चुपचाप अड़ा रहा, खड़ा रहा। अपने से ही लड़ता रहा / जीत-हार का फैसला किए बिना / मजबूरी की राह चलता रहा…।

देश के मूर्धन्य पत्रकार और संपादक नरेंद्र मोहनजी की यह कविता दैनिक जागरण के साप्ताहिक परिशिष्ट में 18 अगस्त 1991 को छपी थी। तराई के सिख आतंकवाद को इंगित करते हुए लिखी गई इस कविता के साथ छपी थी मेरी लीड स्टोरी। शीर्षक था- ‘तराई में लहलहाई आतंक की फसल।’

नरेंद्र मोहनजी की कविता मजबूरी की राह नहीं, मेरी जिंदगी की राह बनी..। मेरे जीवन की प्रेरणा बनी…, आस्था बनी…, जिसमें हकीकत का रंग भरा हमारे गुरु, मार्गदर्शक, यशस्वी पत्रकार और संपादक बच्चन सिंहजी ने। यह बात उन दिनों की है जब मैं दैनिक जागरण के बरेली संस्करण में उनके सानिध्य में आतंकवाद के खिलाफ, भ्रष्टाचार के खिलाफ, तमाम बिद्रुपों के खिलाफ और समाज की पथरीली चट्टानों से फौलादी इरादों के साथ जंग लड़ने की तरकीब सीख रहा था…।

बुलंद हौसले के पीछे मेरी प्रेरणा और ताकत थे बच्चन सिंहजी। विषय कोई भी हो, लिखने से न कभी रोका, न टोका, बल्कि हर समय खुरदरी चट्टानों पर पथरचट्टी घास उगाने की प्रेरणा देते रहे…। कभी मर्यादा के पहाड़ों पर चढ़ना सिखाया तो कभी जीवन की मजबूरियों का रंग-ढंग समझाया। उनके साथ काम करते हुए अंधेरे बहुत थोपे गए, लेकिन मन का उत्साह, हर स्थिति से मुकाबला करने का तेवर और आगे बढ़ने का हौसला कभी दफ्न नहीं हुआ। हमेशा उमंगों के निर्झर झरनों की तरह बहता रहा। ऊबड़-खाबड़ जिंदगी के बावजूद बारिश के बुलबुलों की तरह सपनों को फूटने नहीं दिया। जिंदगी की पथरीली ढलान पर आशा के बादलों को बरसाने की ताकत किसी और ने नहीं, बच्चन सिंहजी ने ही दी। 

यूं सीखा हौसले का जज्बाः उत्तर प्रदेश के तराई इलाके में हिंसा और सिख आतंकवाद का नया दौर शुरू हुआ तो बच्चन सिंह ने गोला-बारुदों, असाल्ट रायफलों और बमों से खून की होली खेलने वाले आतंकवादियों से लड़ने के लिए मुझे अपनी टीम का कमांडर चुना। यहां बताना चाहता हूं कि वाराणसी से दैनिक जागरण के लखनऊ संस्करण में इंट्री हमें बच्चन सिंहजी ने ही दिलाई थी। दैनिक जागरण के बरेली संस्करण के संपादक बने तो उन्होंने प्रधान संपादक नरेंद्र मोहनजी से सबसे पहले मुझे मांगा। लखनऊ के संपादक विनोद शुक्लाजी की नजर में मेरी इमेज काफी अच्छी थी। वह नहीं चाहते थे कि हम लखनऊ छोड़ें। मगर जब बरेली संस्करण को कामयाबी के शिखर पर पहुंचाने का जिम्मा खुद उन्हें सौंपा गया तो उन्होंने सबसे पहले मुझे ही बरेली बुलाया।

एक अगस्त 1989 को बरेली पहुंचा। खुरदरी और विशाल चट्टानों को पिघलाने के लिए…। शिलाजीत बनाने के लिए…। ऐसा वटवृक्ष लगाने के लिए जो न कभी झुके, न कभी टूटे…। बरेली में बच्चन सिंहजी से जो पहला पाठ सीखा वह था काई जमी और फिसलनभरी चट्टानों की ढलानों पर जांबाज कमांडो की तरह डटे रहने की। कई मौके आए, कई मोड़ आए-हर बार मुझे ही आजमाया गया।

लखनऊ से बरेली पहुंचते ही बदायूं के दंगे की कवरेज का जिम्मा मुझे सौंपा गया। पास हुआ तो बरेली के दंगे में लगा दिया गया। तराई में पंजाब का आतंकवाद छलका तो यथार्थ के कब्रिस्तान में मर्यादा के पहाड़ के बीच से रास्ता निकालने का दायित्व मुझे ही मिला। पत्रकारिता के आसमां में उन्मुक्त पंक्षी की तरह मैं भी उड़ना चाहता था। बुलंद हौसले के साथ जीवन की मजबूरियों को…, अंधेरे के घटाटोप को… छलनी करते हुए आगे बढ़ाता गया। इस दौरान न कभी मर्यादा के पहाड़ को लांघा और न ही पथरीले रास्तों पर फिसला। सपने मन को भाते रहे। बच्चन सिंहजी सिखाते रहे। तरक्की की कोपलें फूंटती रहीं। सिर्फ दिलेरी ही नहीं, हौसला ही नहीं, बोल-चाल की भाषा भी उनसे ही सीखी। पत्रकारिता में बेहद कठिन और संस्कृतनिष्ठ शब्दों की मठाधीशी से परहेज करने का गुर उनसे ही सीखा।

अंगारों पर चलने की सिखाई कलाः तराई का सिख आतंकवाद यथार्थ का कब्रिस्तान था। इस कब्रिस्तान में हमने अनगिनत रिपोटर्स लिखी। इस दरम्यान बच्चन सिंहजी ने मुझे दो ऐसे टास्क दिए, जिसे मैं कभी नहीं भुला पाया।

16 अक्टूबर 1991 की रात रुद्रपुर (तब नैनीताल जिले की नगर पालिका थी) में आतंकवादियों ने रात 11.10 बजे रम्पुरा रोड स्थित रामलीला मैदान में ब्लास्ट किया। दर्जनों दर्शक मौके पर मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए। तमाम लोगों के शरीर के क्षत-विक्षत अंग सौ-सौ मीटर दूर जा गिरे। घायलों को हल्द्वानी, किच्छा, बाजपुर और बरेली भेजा गया। मुसीबत में फंसे वे लोग जिन्हें रुद्रपुर अस्पताल ले जाया गया। आतंकवादियों ने वहां भी शक्तिशाली बम लगा रखा था। लोगों का हुजूम घायलों को लेकर पहुंचा तो वहां भी ब्लास्ट हो गया। दर्जनों लोग मौके मारे गए।

रात करीब 11.20 बजे खबर बरेली पहुंची तो बच्चन सिंह ने फौरन गाड़ी बुलाई और मुझे फोटोग्राफर के साथ मौके पर रवाना कर दिया। उन दिनों न तो मोबाइल का साधन था, न तार वाला फोन सामान्य रूप से उपलब्ध था। हम रात में ही करीब 72 किमी दूर ऊबड़-खाबड़ रास्ते से रुद्रपुर पहुंचे। घटना की कवरेज की। वहां से लौटे और सिटी संस्करण में हमारी रपटें छपीं। रुद्रपुर कांड में तब तक 70 लोगों की मौत हो चुकी थी। खबरों के अलावा दो पेज तो घटना की तस्वीरें ही छपीं।

अगले दिन 17 अक्टूबर की सुबह नाश्ता भी नहीं कर पाया था, तभी संपादक बच्चन सिंहजी का आदेश मिला- फोटोग्राफर के साथ तत्काल रुद्रपुर पहुंचो। 24 घंटे से जगे थे। भूख से बेहाल थे। बगैर समय गंवाए निकल पड़े टास्क पर। दोबारा साथ में थे हमारे वरिष्ठ साथी शिव प्रसाद सिंहजी (मौजूदा समय में हिन्दुस्तान के गोरखपुर संस्करण में वरिष्ठ समाचार संपादक)। नेकदिल, बेहद संजीदा, दूसरों के दुख-दर्द पर आंसू बहाने वाले। हम रुद्रपुर पहुंचे तो लोगों के अंग-भंग शवों को देख हम सभी की आंखें छलछला उठीं। शाम को हम कवरेज करके लौटे। मेरी रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने उस महिला को गिरफ्तार कर लिया, जिसने आतंकवादियों को अपने घर में पनाह दी थी। 

लड़ गए मौत सेः दूसरी घटना एक अगस्त 1992 की है। पीलीभीत जिले के सुदूरवर्ती गढ़ा रेंज के घनघोर जंगल में आतंकवादियों ने 29 ग्रामीणों का अपहरण कर लिया था। ये ग्रामीण उन इलाकों में पहुंच गए थे, जहां आतंकवादियों ने किसी भी हालत में उस तरफ न आने का फतवा जारी कर रखा था। कटरुआ (एक पेड़ की जड़ में निकलने वाला फल) निकालने के चक्कर में भोले-भाले ग्रामीण खौफनाक इलाके की ओर चले गए। गढ़ा रेंज के जंगल से होकर गुजरने वाली सकरिया नदी के पास भिंडरवाला टाइगर फोर्स का मुखिया सुखदेव सिंह उर्फ छोटा छीना ट्रेनिंग कैंप चलाता था। इस जंगल में पीलीभीत जिला पुलिस जाने के बारे में सोचती तक नहीं थी। पीलीभीत के इस जंगल में पुलिस का नहीं, कुख्यात आतंकवादी सुखदेव की समानांतर सरकार चलती थी। उसका राज चलता था और हुक्म (फतवा) भी चलता था।

29 ग्रामीणों के गायब होनों की खबर पुलिस के लिए अबूझ पहेली की तरह थी। तीन अगस्त 1992 को संपादक बच्चन सिंहजी ने मुझे गढ़ा रेंज जाने का निर्देश दिया। मेरे साथ था मेरा सहयोगी अनिल गौरव (अब दुनिया में नहीं)। क्राइम रिपोर्टिंग वही करता था। पगडंडियों के सहारे घंटों हिचकोले खाते हुए हम जंगल में पहुंचे। तक तक रात हो चुकी थी। हर तरफ घुप अंधेरा था। जंगल में अगर कुछ था तो सिर्फ पेड़-पौधे और झाड़ियां। हम गढ़ा रेंज के जंगल में घुस तो गए, लेकिन वापस आने का रास्ता ही नहीं सूझा। रुक-रुककर हो रही बारिश के बीच भूखे-प्यासे जंगल में पड़े रहे। हमारा कोई लोकेशन नहीं मिला तो बच्चन सिंहजी ने वायरलेस से सूचना प्रसारित करा दी कि आतंकवादियों ने हम सभी का अपहरण कर लिया है। मामला पत्रकारों का था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हड़कंप मच गया। समूचे तराई इलाके में चप्पे-चप्पे पर वाहनों की तलाशी शुरू हो गई। बच्चन सिंह और हमारे साथी चिंता में डूब गए।

उधर, जंगल में भूख से हम सभी की अतड़ियां सूखती जा रही थीं। लाचारी में पेड़ों की पत्तियां खानी पड़ी। गड्ढे में इकट्ठा बारिश के पानी से प्यास बुझानी पड़ी। जंगल में सांपों का जमघट था। जंगली जानवर थे। रुह कंपा देने वाली कीट-पतंगों की डरावनी आवाजें थीं। जंगल में हम सभी गाड़ी में पड़े रहे। सिकुड़े हुए और बेदम। आधी रात में बारिश थमी और आसमां से चांद भी बाहर निकला। हमने हिम्मत की और करीब आधे घंटे की मेहनत के बाद सीताफल का एक पेड़ ढूंढने में सफल हो गए। सीताफल के फलों ने हमें थोड़ी ताजगी दी।

तड़के आसमान में चील और गिद्धों को मंडराते हुए पाया तो उन्हें देखते हुए आगे बढ़े।  सकरिया नदी के पास पहुंचे तो देखा कि ग्रामीणों की लाशें पानी में फूलकर उतरा रही हैं। दूर-दूर तक बदबू फैली थी। पास में आतंकवादियों के बंकर और वाच टावर थे। शायद घटना के बाद आतंकवादी अपना ट्रेनिंग कैंप छोड़कर जा चुके थे। काफी जद्दोजहद के बाद सुबह करीब दस बजे भटकते हुए जंगल से बाहर निकले। हम समीप के एक पुलिस बूथ पर पहुंचे। सुरक्षाकर्मियों को मारे गए ग्रामीणों के बारे में जानकारी दी। साथ ही वायरलेस से अपने कुशलक्षेम के बारे में बरेली सूचना पहुंचाई।

करीब आठ घंटे बाद हजारों जवानों के साथ पुलिस और प्रशासनिक अफसर हमारी मदद से सकरिया नदी के पास पहुंच सके। बाद में सभी 29 शवों को ट्रैक्टर पर भूसे की तरह लादकर पीलीभीत लाया गया। अगले दिन लाशों को कफन नसीब हुआ।

दोनों घटनाओं ने मुझे खुरदरी चट्टानों से टकराने की ताकत दी। यह ताकत, यह हौसला, जीवन की कठोर सच्चाइयों की पटकथा लिखने का हुनर सबकुछ संपादक बच्चन सिंहजी से ही सीखा। मुझे गर्व है कि वे मेरे ऐसे मार्गदर्शक बने, जिन्होंने मुझे खतरों से लड़ने और निडर होकर सच लिखने की ताकत दी, हौसला दिया। उनके दिखाए पथ पर मैं अनवरत आगे बढ़ता जा रहा हूं। मेरी कोशिश है कि उनके सपनों को…, उनकी उम्मीदों को…, उनके आदर्शों को… कभी दाग न लगे। संपादक बच्चन सिंहजी मेरे प्रेरणा पहले भी थे और कल भी रहेंगे।

लेखक विजय विनीत जनसंदेश टाइम्स के वाराणसी संस्करण में समाचार संपादक हैं।

मूल खबर…

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अतुल माहेश्वरी की पुण्य स्मृति : इतनी विनम्रता और संकोच शायद ही किसी मालिक में रहा होगा…

Shambhunath Shukla : नौकरी छोड़े भी चार साल हो चुके और अमर उजाला में मेरा कुल कार्यकाल भी मात्र दस वर्ष का रहा पर फिर भी उसके मालिक की स्मृति मात्र से आँखें छलक आती हैं। दिवंगत श्री अतुल माहेश्वरी को गए छह वर्ष हो चुके मगर आज भी लगता है कि अचानक या तो वे मेरे केबिन में आ जाएंगे अथवा उनका फोन आ जाएगा अरे शुक्ला जी जरा आप यह पता कर लेते तो बेहतर रहता। इतनी विनम्रता और संकोच शायद ही किसी मालिक में रहा होगा।

साल 2002 की अगस्त में मैने अमर उजाला ज्वाइन किया था और 2011 की तीन जनवरी को वे नहीं रहे पर इतने ही वर्षों में उन्होंने ऐसी अमिट छाप छोड़ी जो दुर्लभ थी। वे अपना बुरा चाहने वालों का भी भला चाहते थे। स्वयं का नुकसान उठाकर दूसरों का भला करने में भरोसा करते थे और अपने कर्मचारियों को अपना सहकर्मी समझते थे। संपादकीय विभाग के लिए वे एक पत्रकार पहले थे मालिक बाद में। हारी-बीमारी में मदद करने के लिए उनका हाथ सदैव खुला रहता और अपना दिया पैसा वापस लेने में वे उतना ही संकोच करते। ऐसे अमर उजाला के स्मृतिशेष मालिक को कोटिश: प्रणाम।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के इस एफबी पोस्ट पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Vivek Shukla : मेरा अतुल जी से परिचय भाई Hari Joshi जी ने 1988 में करवाया। मैं सन्डे मैगज़ीन के लिए लिखने लगा। फिर एक दिन उन्होंने मुझे मेरठ बुलाया। कहा, आप दिल्ली से खेल और बिज़नेस पर लिखो। 1989 में लोक सभा चुनाव, फिर खाड़ी युद्ध और उसके बाद भी अमर उजाला से दैनिक हिन्दुस्तान में रहते हुए जुड़ा रहा। कई बार उनसे बंगाली मार्किट में मिला भी। बेहतरीन इन्सान थे वे। पर बाद में अमर उजाला में भी कुछ मित्रों को हटाया गया तो लगा क़ि बदलने लगा है अमर उजाला।

Lalit Chaturvedi : शत शत नमन। शुक्ला सर पत्रकारिता के इस असाधारण व्यक्तित्व की असामयिक मौत प्राकृतिक तो नहीं थी। यह बात दबी जबान से आप सभी जानते हैं। आश्चर्य है कि 6 वर्ष बाद भी परिवार या वाह्य आवरण में इस प्रश्न को किसी ने नहीं छेड़ा। सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब इस तथ्य की निष्पक्ष जाँच होगी तथा सच सामने होगा। हां, अतुल भाई साहब के जाने से कुछ लोग आज अरबों में जरूर खेल रहे हैं। उन्हें सजा दिलाना जरूरी है।

Surendra Mohan Sharma : दस ग्यारह वर्ष की उम्र में अतुल और राजुल के साथ बचपन में खेलने का मौका मिलता था जब वे अपने पिता श्री मुरारीलाल माहेश्वरी जी के साथ होलीगेट मथुरा पर रहते थे। उनके पिता और मेरे पिता का अच्छा दोस्ताना था उस समय। असमय ही चले गए अतुल। नमन।

Harendra Narayan : बहुत सच्चे इंसान. भोपाल में पत्रकारिता के बाजारवाद पर खुद का लिखा पेपर पढा था। आज भी याद है। मुझे बुलाया था। समय ऐसा बदला फिर उनसे मिलना ना हुआ। अब न वो रहे, न मैं पत्रकारिता में! ऐसे इंसान को श्रद्धासुमन।

Mukesh Shriram : अतुलजी को सादर नमन…आज के सभी मीडिया मालिकों को अतुलजी जैसा मन और समर्पण मिले। कोटिशः धन्यवाद…

राकेश कुमार मिश्रा : स्व. डोरी लाल अग्रवाल जी मुरारी माहेश्वरी जी से विनम्रता सीखी है अगली पीढ़ियों ने। क्या ग़ज़ब लोग थे ये।


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यादे! कितने सरल और सहज थे अतुल माहेश्वरी

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अनिल यादव ने जब लेखक बनने के लिए लंबी छुट्टी की अर्जी अतुल माहेश्वरी को दी…

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अतुल माहेश्‍वरी ने कहा- जाकर कानपुर में संपादकीय प्रभार संभालिए

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वरिष्ठ पत्रकार इरा झा ने अपने अदभुत पापा को यूं दी श्रद्धांजलि

अलविदा डेविड कॉपरफील्ड. ये उपमा जस्टिस सुरेश दत्त झा के लिए है जो संयोग से हमारे पिता थे. वो अकसर खुद अपनी तुलना डेविड कॉपरफील्ड से करते थे. उन्होंने बड़ी कठिनाइयों में अपना शुरुआती जीवन गुजारा था पर इससे कभी वह विचलित नहीं हुए. उल्टे, यह उनकी ताकत बना. उन्होंने आगे बढने के लिए मेहनत की, अपनी लाचारी का रोना नहीं रोया. यह जरूर है कि वह अपने रिश्तेदारों के घर रहकर पढे थे. जाहिर है उन्हें बड़ी दिककतें पेश आई होंगी पर उनके चेहरे पर कभी किसी के लिए शिकन नहीं देखी, उपेक्षा नहीं देखी.

वह बताते थे कि पहली बार अपने अमीर भाई का जूता सुधरवाकर जब उन्होंने पहना तो उन्हें लगा था कि वह हवा में उड रहे हैं. कैसे वह रोज शाम अपनी इकलौती शर्ट धोकर पहनते थे. उन्हें कभी जरूरत महसूस ही नहीं हुई. सुप्रीम कोर्ट जज के बराबर उपलोकायुक्त के पद पर रहे थे वो. कई बार हमें लगता कि पापा इतने सीधे और सरल क्यों हैं. कहीं वो इस दुनिया से परे किसी दूसरी दुनिया से तो नहीं आए हैं? हम उनके परम मित्र और मध्यप्रदेश के डीजीपी रहे दिवंगत आईपीएस अधिकारी आनंद कुमार से यह पूछते कि बदमाश से बदमाश आदमी उन्हें बुरा क्यों नहीं लगता तो अंकल कहते कि यह तुम्हारे पापा का न्यायिक नजरिया है जो तब तक किसी को बदमाश नहीं मानता जब तक कि यह साबित न हो जाए. उन्हें कभी किसी पर गुस्सा आता था या नहीं, यह भी हम कभी नहीं समझ पाए. वह बड़े अच्छे किस्सागो थे. उनके पास किस्सों का खजाना था और वह ऐसे दिलचस्प तरीके से सुनाते कि कोई ऊब नहीं सकता था.

कानून के सिपहसालार

वह कानून के बड़े पाबंद थे और अपने काम के लिए किसी की परवाह नहीं करते थे. कभी देश के किसी सर्वोच्च नेता का चर्चित बेटा उनके पीछे पड़ गया था. उसकी कर्नाटक की बहुचर्चित खानों में दिलचस्पी थी और वह अपने किसी समर्थक को वह खान दिलाना चाहता था. पर पापा तो पापा ठहरे. उन्होंने टका सा जवाब दे दिया कि जो भी होगा नियम-कानून से. धमकियों के दौर चल पड़े पर वो जरा भी विचलित नहीं हुए. इसी तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चाहती थीं कि हम लोग पेरिस कन्वेंशन के सदस्य बन जाएं. उदारवाद की दिशा में यह पहला कदम था. पर उस जमाने में पापा को ये बात जंची नहीं. उनके हिसाब से यह संधि विकसित देशों के लिए उपयोगी थी. हम जैसे पिछड़े देश में दवाइयों के बाजार में इसका सदस्य बनते ही हाहाकार मच जाता. इसके अलावा भी बहुत सी ऐसी बातें थी इसमें जिससे अपनी अर्थव्यवस्था बैठ जाती. उन्होंने जब अपनी यह राय इंदिरा जी के सामने रखी तो वह मान गर्इं. बौद्धिक संपदा का वो जमाना कुछ और था. नेता और मंत्री अफसरों की राय को वजन देते थे. विधि मंत्रालय में पापा के पास कम से कम 20 मंत्रालय थे. इन सभी मंत्रालयों को वही सलाह देते थे. एक बार मध्यप्रदेश के किसी मुख्यमंत्री से भी उन्होंने कहा था कि कानून बनाना कोई भुट्टा भूनना नहीं है. इसका पूरे देश और दुनिया पर असर पड़ता है.

कहानी पर बवाल

फिल्म उद्योग से जुडे किसी लेखक शायद ख्वाजा अहमद अब्बास की कहानी पर एक बार बवाल मच गया. यह कहानी उस जमाने की बहुचर्चित पत्रिका सारिका में छपी थी और इसका शीर्षक किसी समुदाय विशेष के नाम पर था. देश भर में प्रदर्शन शुरू हो गए थे. माहौल बिगड़ता देख प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस पर आपात कानूनी राय मांगी. विधि मंत्रालय में तो सबके हाथ-पांव फूल गए. हिंदी जानने वाला कोई शख्स था नहीं जो उसका अनुवाद करता. शाम के छह बज रहे थे. मरते क्या न करते. विधि सचिव वेंकटसूर्या दौड़े-दौड़े पापा से मदद मांगने आए. पापा ने कहानी पढ कर अंग्रेजी में अनुवाद शुरू किया तो पता लगा कि कहानी अधूरी है. इसकी शुरुआत का हिस्सा आया ही नहीं है. खैर किसी तरह उसका गायब भाग पहुंचा और अनुवाद के बाद पता लगा कि कहानी तो उस कौम की तारीफ में है. सरकार यूं ही घबरा रही है. लोग वहम को हवा दे रहे हैं. तब जाकर प्रदर्शन ओर विरोध का दौर थमा. उस दिन वेंकटसूर्या ने उन्हें संकट मोचक कहा था और बाद में वो उन्हें वापस जाने देने को तैयार नहीं थे.

गोपनीयता की रक्षा

पापा की बड़ी तमन्ना थी कि वह अंग्रेजी न्यूज रीडर बनें. सुबह उठते ही वह अकले ही आल इंडिया रेडियो की तर्ज पर अखबार पढते. उनके पास सूचना प्रसारण मंत्राालय भी था. लिहाजा सेंसर बोर्ड वगैरह में दखल रखते थे. कई बार हमें वो अप्रदर्शित फिल्मों की कहानी सुनाते और उस परचर्चा भी करते थे. ‘गांधी’ फिल्म के रोजमर्रा के डेवलपमेंट का मुझे पता रहता. रिचर्ड एटनबरो से समझौता उन्होंने कराया था. पर जब मैं पत्रकार बन गई तो वो मुझसे गोपनीयता बरतने लगे. यह भी कहते कि बेटा तुम्हें अलग रहना पडेगा. जब लड़कियों को लोग घर से बाहर नहीं जाने देना चाहते थे तब वह पूछते कुछ इंतजाम हुआ तुम्हारा? पर इसी बीच मेरा विवाह पत्रकार अनंत मित्तल से हो गया और वो नौबत टल गई. मुझे ही नहीं, अपनी सभी संतानों के वो मन की बात करते. हमें रोकते-टोकते नहीं थे कि इतनी रात को कहां चली या इत्ती देर कहां थी. उन्हीं की हौसला अफजाई की वजह से मैं पाटलिपुत्र टाइम्स में काम करने पटना गई थी. और लोग थे कि उसका सबब समझने की बजाय मुझे बहुत तंगहाल मजबूर लड़की समझने लगे थे जिसके घर खाने-पीने को नहीं है. कुछ लोग मुझे घर से भागा हुआ समझते थे. मुझे लोगों की बुद्धि पर तरस आता था. लड़कियों का घर पर एक गिलास पानी निकालना उन्हें पसंद नहीं था. वह अपनी बहू का भी घरेलू काम करना पसंद नहीं करते थे. वह कहते कि ये सेवाएं तो खरीदी जा सकती हैं. शायद इसीलिए उनका आखिरी वाक्य था कि लडकियां काम-धाम छोड़कर आने की हड़बड़ी न करें. सीधे तेरही पर आएं. पर पापा की जैसे इतनी बातें नहीं मानीं, एक और सही. हम वक्त पर पहुंचकर उनके अंतिम दर्शन करने में कामयाब हो गए.

अखबारों की आजादी

अखबार की दुनिया में उनका बड़ा अमूल्य योगदान है. कांग्रेस सरकार इंडियन एक्सप्रेस से परेशान थी. जब जागरण कानपुर से बाहर निकलना चाहता था तो उन्हें सुनहरा मौका मिल गया. जागरण के बहाने इंडियन एक्सप्रेस पर रोक लगाने का विचार चल पड़ा. पापा के पास कानूनी राय के लिए यह मसला आया. तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री उनसे ऐसी राय चाहते थे कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. पापा ऐसा लिख दें कि एक्सप्रेस के सारे संस्करण सिमट जाएं. पूरे अध्ययन के बाद पापा ने कहा कि यह ठीक नहीं होगा. इससे संविधान में दिए बुनियादी अधिकारों पर आंच आएगी. और मामला टल गया. सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची तो उसकी दलील खारिज हो गई. सुप्रीम कोर्ट ने भी पापा की ही राय को आधार बनाते हुए फैसला दिया. आज देश में अखबारों के बहुसंस्करणों का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उसमें मेरे पिता न्यायमूर्ति एसडी झा का भी दिमाग लगा है.

कानून में जनभागीदारी

वह मुझे हर हफ्ते स्टोरी आइडिया दिया करते थे. वैसे वो आर्थिक, राजनीतिक और विेदेशी मामलों के बढिया जानकार थे पर उन्हें ग्रामीण अर्थव्यवस्था की भी गहरी समझ थी. जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में मैने लंबे समय तक कानूनी पहलुओं पर जो लिखा उसमें उनकी खासी मदद मिलती रहती थी. मार्च में वो मुझे बता रहे थे कि कैसे अदालतों से जनता की भागीदारी समाप्त कर दी गई है. वो ज्यूरी सिस्टम की बात कर रहे थे. कह रहे थे कि किसी दिन घंटे भर बात करके मुझे नोट करवा देंगे. इस बात को कई महीने गुजर गए तो बोले बेटा उस पर तो फिल्म भी बन गई है. यही मौका है लिख डालो. वह नानावती कांड पर बनी अक्षय कुमार की फिल्म ‘रूस्तम’ की चर्चा कर रहे थे. उनका कहना था कि सीआरपीसी में अब भी ये प्रोविजन है. मैंने उस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. पापा के पास वक्त नहीं था इसलिए वो जोर दे रहे थे और मेरे पास भी वक्त नहीं, लिहाजा मैं कोताही किए जा रही थी. वह दस साल पहले से कह रहे थे कि गंगा पर कोई काम करो और अब गंगा पर चारों ओर काम हो रहा है. एक बार मेरे पति की स्टोरी ‘कार है या कामधेनु’ का स्टोरी आइडिया भी उन्हीं का था. उन्होंने बताया कि कार निर्माण में कितनी बार एक्साइज ड्यूटी लगती है.

अतिथि प्रेमी

हमारे पापा अंदर से बेहद कड़क और दिखने में बहुत सुकुमार थे. उन्हें बहुत जल्दी एलर्जी हो जाती थी. उनकी खासियत ये थी कि वह कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और हम लोगों को भी ऐसा करने से रोकते थे. दिल्ली में हमारे पास मध्यप्रदेश जैसा बंगला नहीं था और मेहमानों का तांता लगा रहता था. उनकी अदालत में अर्जी लगाई- पापा पढाई में बडी दिक्कत होती है, तो बोले- किस्मत वालों के घर मेहमान आते हैं. कल से मुंह बनाओ तो कोई नहीं झांकेगा. ये लोग कहीं भी ठहर सकते हैं, किसी होटल में, भवन में, नेताओं के अहाते में भी ठहर सकते हैं, तुम्हारे ही यहां क्यों आते हैं? हमारे घर को दिल्ली में पड़ोसी मध्यप्रदेश भवन कहने लगे थे.

पदों से वैराग्य

उन्हें किसी पद से मोह नहीं था. न हीं नेताओं से मिलना-जुलना पसंद करते थे. बस काम से काम. वह कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोरा, कर्नाटक की पूर्व राज्यपाल रमादेवी और राजदूत गिरीश चंद्र  मेहरा जैसे यशस्वी अफसरों के समकालीन थे. रमा देवी ने तो उनके साथ विधि मंत्रालय और कस्टम ट्रिब्यूनल में काम भी किया था. उन्हें पद और पैसे का मोह छू भी नहीं गया था. वह कोई पद लेना ही नहीं चाहते थे वरना न्यायपालिका और कार्यपालिका में उनकी जो पकड़ थी उसमें उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं था. उनके जैसा अनुभव न्यायपालिका में विरलों के पास ही होगा. वह फौजदारी और दीवानी कानून तक सीमित आम जज नहीं थे. अपने जीवनकाल में उन्होंने सात बार मध्यप्रदेश के विधिसचिव का पद ठुकराया था. वह तब गए जब वह पद उनके लिए अपग्रेड करके प्रधान सचिव का बनाया गया. इसके अलावा उन्होंने विधानसभा सचिव, इंडिस्ट्रियल ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष और राष्ट्रीय महत्व का एमआरटीपी कमीशन के अध्यक्ष का पद ठुकराया था. एमआरटीपी के अध्यक्ष पद पर समयबद्ध नियुक्ति न कर पाने के लिए तब भारत सरकार को सुप्रीम कोर्ट में माफी मांगनी पड़ी थी. मुझे याद है मैं उन दिनों नवभारत टाइम्स में थी और ये खबर इकनॉमिक टाठमस में बैनर लीड छपी थी. तब यह पद बेहद ताकतवर था पर कुछ अखबारों ने उन्हें तब विश्वनाथ प्रताप सिंह का महज इसलिए करीबी बता दिया था कि वह उन जैसी टोपी लगाते थे. पापा इससे बेहद विचलित हो गए थे. सच्चाई यह थी कि विश्वनाथ प्रताप सिंह से उनका कभी कोई साबका ही नहीं पड़ा था.

धान का कटोरा नहीं, भंडार

वह अंग्रेजी के विद्वान थे, इस नाते कई बातों की उनकी अपनी समीक्षा होती थी. जैसे उन्हें छत्तीसगढ को धान का कटोरा कहने पर बडी आपत्ति थी. उनका कहना था कि हमारे यहां तो कटोरा भिक्षा का प्रतीक है. पढने लिखने से जी चुराने वालों को कहते हैं ना- जो ना माने बडों की सीख, ले कटोरा मांगे भीख. अंग्रेजी के ‘राइस बोल’ का सीधा अनुवाद करना ठीक नहीं है. इसे धान का भंडार कहना चाहिए. इसके लिए वह कई शब्दकोश भी देखकर मुझे बताते थे. इस पर मेरा नवभारत में लेख छपा था. ज्ञान का अथाह भंडार और प्रेम का सागर थे मेरे पापा. वह ऐसी-ऐसी बातें बताते जो कई बार हमारी समझ से परे होती. जीवन का तजुर्बा तो बहुतों के पास होता है पर गजब की दृष्टि मिली थी उन्हें. माया मोह से दूर वह वास्तव में इस दुनिया की शख्सियत नहीं थे. वरना आधा दर्जन आकर्षक पदों का मोह छोड़ने के लिए बड़ी हिम्मत और मजबूत इच्छाशक्ति चाहिए.

पापा दस साल और चल सकते थे. लेकिन उनकी कोई इच्छा अधूरी नहीं थी. पद, पैसा और प्रतिष्ठा भी भरपूर कमा चुके थे.

मुझसे उन्होंने कहा था कि मेरा काम पूरा हो गया है. मेरा शोक मत करना.

ऐसे पापा को इरा, शिप्रा, विक्रमादित्य, स्मिता और शेफाली का प्रणाम.

इरा झा वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुकी हैं. उनसे संपर्क irajha2@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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पहली विदेश यात्रा (2) : जब तक जहाज का दरवाजा बंद न हो जाए, बताना मत….

पार्ट वन से आगे…. भारत के विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने जब मेल कर मुझे सूचित किया कि वेनेजुएला में होने वाले गुट निरपेक्ष सम्मेलन में शिरकत करने जा रहे भारतीय उप राष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी के साथ जाने वाले भारतीय मीडिया डेलीगेशन के लिए भड़ास4मीडिया डॉट कॉम की तरफ से एक पत्रकार को भेजा जाना है, इसके लिए भड़ास किसे नामित कर रहा है, उनका डिटेल वगैरह चाहिए, तो मैंने तत्काल रिप्लाई में अपना मोबाइल नंबर दे दिया और लिखा कि फोन करिए, बात करते हैं. थोड़ी ही देर में फोन आ भी गया.

वापसी के दौरान वीपीआई (वाइस प्रेसीडेंट आफ इंडिया) ने जब प्रेस कांफ्रेंस और सवाल-जवाब का सत्र खत्म किया तो इस यात्रा की याद के बतौर ग्रुप फोटो की परंपरा के तहत तस्वीरें खिंचवाई गईं. मीडिया डेलीगेट्स की संख्या बीस के करीब थी तो एक बार में सभी का ग्रुप फोटो संभव नहीं हो पा रहा था. ऐसे में दो किश्तों में क्लिक क्लिक हुआ. सबसे उपर वाली तस्वीर में इस संस्मरण के लेखक यशवंत सिंह भी दिख रहे हैं, वीपीआई के ठीक पीछे ह्वाइट शर्ट में. तस्वीरों को डिटेल में देखने के लिए आप तस्वीरों के उपर कर्सर मारें. वापसी के समय जहाज में प्रेस कांफ्रेंस के दौरान वीपीआई ने क्या कहा, सवाल क्या पूछे गए, इस वीडियो लिंक पर क्लिक कर देख सुन सकते हैं : Youtube.com/FAJQIV5HoR8 वेनेजुएला से लौटते वक्त जहाज में पीसी


उनको मैंने कहा कि भइया, फिलहाल तो मेरा ही नाम लिख लो क्योंकि दो साल से पासपोर्ट बना रक्खा है, एक भी मुहर ठप्पा नहीं पड़ा है उस पर, कहीं वो सारे कागज कोरे ही न रह जाएं, इसलिए मैं खुद ही भड़ास4मीडिया की तरफ से जाने लायक सबसे उपयुक्त व्यक्ति हूं और खुद को इसके लिए अधिकृत करता हूं.

उन्हें यह भी बताया कि मैं कभी विदेश नहीं गया हूं और किशोर उम्र में जो तीन सपने देखे थे, उसमें तीसरा और आखिरी सपना यही था कि विदेश गए बगैर न मरूं. वो यह समझते हुए थोड़ा हंसे कि ये बंदा मजाक कर रहा है, फिर बोले- एक मेल भेज रहे हैं जिसमें जो जो जानकारी मांगी जा रही है आपके बारे में, उसे भरकर, अटैच करके भेज दीजिए. मैंने फौरन कहा- ‘यस सर, जय हिंद’.

इसके बाद मेल पर जानकारी लेने-देने, डाक्यूमेंट्स भर कर भेजने और वीजा के लिए दूतावास जाने आदि के लिए जो क्रम चला उसे थोड़े अतिरिक्त प्रेशर की तरह मैं झेलता रहा क्योंकि उन्हीं दिनों भड़ास के आठवें बर्थडे पर कांस्टीट्यूशन क्लब में होने वाले कार्यक्रम की तैयारियों और लोगों को निमंत्रित करने का काम जोरों पर जारी था. बताया गया कि वीजा जर्मनी का भी लेना है क्योंकि फ्लाइट तकनीकी कारणों से जर्मनी के फ्रैंकफर्ट में आते-जाते लैंड करेगी, हो सकता है रुकना भी पड़े, इसलिए जर्मनी के वीजा की फार्मेल्टीज के लिए फलां टाइम पर जर्मनी दूतावास सभी लोग पहुंचिए.

दिल्ली में जर्मनी दूतवास पहुंचा तो इस टूर पर जा रहे दूसरे कई पत्रकार साथी भी मिले. वेनेजुएला के वीजा के लिए बस एक पन्ने का फार्म भर कर मिनिस्ट्री में जमा कर देना था, फिजिकल उपस्थिति की कोई जरूरत नहीं थी. लेकिन जर्मनी का वीजा पाने के लिए जर्मन दूतावास में फिजिकल प्रजेंस के साथ साथ आंख, हाथ के दोनों पंजों और अंगूठों को कंप्यूटर के जरिए स्कैन कराना था, जिसे बायोमीट्रिक्स या बायोमैट्रिक्स कहा जाता है. यूरोपियन यूनियन के देशों में जाने के लिए वीजा की शर्तें काफी कठिन होती हैं. चूंकि हम लोग डिप्लोमेटिक विजिट पर जा रहे थे, इसलिए उन सब कठिन सवाल का सामना करने से बच गए जिससे आम तौर पर आम पर्यटकों को सामना करना होता है. हाथ के दोनों पंजों, अंगूठों और आंखों की स्कैनिंग के बाद हम लोगों को जर्मन दूतावास से छुट्टी मिल गई, हम लोगों के पासपोर्ट वहीं जमा हो गए. बाद में उसे विदेश मंत्रालय के लोगों ने इकट्ठा कर वेनेजुएला के वीजा के लिए वहां के दूतावास को दे दिया होगा.

भड़ास स्थापना दिवस का कार्यक्रम 11 सितंबर को बेहद सफलतापूर्वक बीत गया तो 12 सितंबर से वेनेजुएला जाने की तैयारियों में लग गया. हम लोगों को बंदोबस्त मीटिंग के लिए उड़ान भरने की पूर्व संध्या यानि 14 सितंबर की शाम पांच बजे दिल्ली के शास्त्री भवन में स्थित मिनिस्ट्री आफ एक्सटर्नल अफेयर्स के आफिस बुलाया गया. बंदोबस्त मीटिंग में सभी लोगों को वीजा, पासपोर्ट, सेक्युरिटी टैग, टिकट्स आदि दिए जाते हैं और विदेश मंत्रालय के वे अधिकारी जो मीडिया के दल को लीड करते हैं, वे यात्रा के बारे में ब्रीफ करते हैं. बंदोबस्त मीटिंग को लेकर जो मेल आई थी, उसमें जहां जहां रुकना था, वहां के तापमान और ड्रेस कोड का भी जिक्र था. यानि मौसम के हिसाब से कपड़े रखें और कुछ कपड़े आफिसियल भी रखें, यानि कोट सूट टाई आदि. टाई तो अपने कभी लगा न पाए. सूट शादी वाला रखा था. जाते वक्त जर्मनी के बर्लिन में रुकने और वहां तापमान कम होने की सूचना को देखते हुए एक जैकेट भी ले जाना उचित समझा. करने को ढेर सारे काम थे. 

भड़ास की खबरों मेल्स आदि से जूझते हुए मुझे बस इतना मौका मिला कि मैं अपने नहीं हो सके कई सारे काम दोस्तों में बांट दू. सो जिम्मेदारी दे दी दो मित्रों को. अपने बीएसएफ वाले भाई जनार्दन यादव को फोन किया कि मुझे एक चमड़े का काला जूता दस नंबर का, एक अमेरिकन टूरिस्टर ट्राली बैग, एक जैकेट अपने कैंटीन से खरीद कर रख लें और 15 सितंबर की दोपहर एक बजे से दो बजे के बीच पालम एयरफोर्स स्टेशन के गेट पर मिल कर मेरे हवाले कर दें. जनार्दन जी डन बोल खरीदारी में लग गए. कमल को फोन किया कि भाई साठ सत्तर हजार रुपये को अमेरिकन डालर में कनवर्ट कराने की व्यवस्था कराओ क्योंकि विदेश मंत्रालय के अफसरों ने बताया है कि हमें रहने और खाने के बिल खुद पे करने होंगे, सिर्फ आना जाना फ्री रहेगा, इसलिए डालर यहीं से ले जाना होगा.

मैंने शादी वाला सूट रख लिया. अन्य कपड़े डाल लिए. लैपटाप ले जाऊं या न ले जाऊं, इसको लेकर सोचता रहा. हालांकि विदेश मंत्रालय के लोगों ने साथ ले जाए जा रहे सामान की लिस्ट और लैपटाप कैमरे आदि के डिटेल मंगा लिए थे ताकि उसके विवरण संबंधित देशों और सुरक्षा एजेंसियों को एडवांस में दे सकें. फिर भी ये सोचता रहा कि लैपटाप की क्या जरूरत, वहां कोई भड़ास तो अपडेट करना नहीं है. जो थोड़ा बहुत काम होगा वह स्मार्टफोन से हो ही जाएगा. लेकिन मैं लैपटाप ले गया. लैपटाप रखने के लिए एक नया केबिन बैग भी जनार्दन जी से खरीदवाया. ये अलग बात है कि लैपटाप जी केबिन बैग में सोते गए और सोते ही लौटे, विदेश की हवा तक न लगी. यानि बैग से बाहर तक नहीं निकाला. भड़ास के मेल चेक करने और कुछ अन्य आनलाइन कामधाम वेनेजुएला के गुट निरपेक्ष सम्मेलन स्थल पर बने मीडिया सेंटर में लगे ढेर सारे कंप्यूटरों में से एक पर कब्जा जमाकर निपटाया. बाकी काम मोबाइल से होटल आदि जगहों के वाई फाई से कनेक्ट करके निपटाया.

मेरी यह पहली विदेश यात्रा थी, इसलिए कई विदेश पलट विशेषज्ञ मित्रों से फोन कर पूछा था कि क्या क्या तैयारी करनी चाहिए, क्या क्या ध्यान रखना चाहिए. खासकर कुछ उन पत्रकार मित्रों को भी फोन किया जो पीएम या राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति के साथ विदेश जा चुके हैं. मैंने सबसे लास्ट में कहा कि भाई अभी किसी को बताना नहीं कि मैं उप राष्ट्रपति के साथ जा रहा हूं, जब 15 सितंबर की शाम पांच बजे जहाज का दरवाजा बंद हो जाए तब बताइएगा ताकि कोई मेरा शुभचिंतक टंगड़ी न मार पाए. सुनने वाले साथी लोग हंसने लगे कि कुछ भी सोचते बोलते रहते हो, लेकिन उन लोगों ने यह माना कि मामला संवेदनशील है और यह जानकारी पता चलते ही कि यशवंत उप राष्ट्रपति के साथ जाने वाले हैं, कई मीडिया हाउस और कई कई शत्रु किस्म के मित्र सक्रिय हो जाएंगे, इसलिए उन लोगों ने चुप्पी साधे रखी. लेकिन अपन की आदत है कि दूसरे लोग डेडलाइन का उल्लंघन करें न करें, अपन खुद ही पेट में भरी गैस बाहर निकालने के लिए समय से पहले ही अकुला व्याकुल होकर बक देते हैं. सो फेसबुक पर पंद्रह सितंबर की सुबह ‘ब्रेकिंग न्यूज’ लिख दिया. जनता ने पसंद किया. देखें स्क्रीनशॉट….

पंद्रह सितंबर की दोपहर जनार्दन भाई मय साजो सामान मिले. ट्राली बैग कुछ ज्यादा ही बड़ा खरीद लिया था जिसमें मैं खुद और मेरा सारा सामान पैक हो जाता तो भी नहीं भरने वाला था. सो, अपना ही बैग ले जाने का इरादा किया जो भले ही छोटा था लेकिन सारा सामान उसमें आ जा रहा था. जनार्दन भाई को अपना डेबिट कार्ड देकर एटीएम पिन नंबर बता दिया और बोल दिया कि जितना पैसा लगा है, इससे निकाल लीजिएगा, और अगर मैं विदेश में ही रह गया या उपर से बिलकुल उपर चला गया तो ये कार्ड और एटीएम पिन नंबर मेरे घरवालों को दे दीजिएगा.

यादव जी ठठाकर हंसे और कहे कि शुभ शुभ बोलिए, आप भी पक्के वाले पत्रकार हैं, नकारात्मक एंगल भी हमेशा सूंघते सोचते रहते हैं.

कमल भाई मनी एक्सचेंजर ले आए जो पचास हजार रुपये लेकर छह सात सौ डालर के करीब दे गया. इसमें से खर्चा केवल चार-पांच सौ डालर के बीच ही हुआ. तब भी मेरे जैसे गरीब पोर्टल वाले के लिए यह रकम काफी थी, क्योंकि जब खर्चा का हिसाब रुपय्या में लगाता तो पता चलता कि काफी खर्च हो गया, लेकिन जब डालर में खर्च जोड़ता तो लगता कि अभी तो कुछ खर्च ही नहीं हुआ है. कमल ने पालम एयरफोर्स स्टेशन गेट पर टैग वगैरह फिल करते वक्त मेरी तस्वीर कब ले ली, पता नहीं नहीं चला. बाद में उनने उस तस्वीर को कुछ यूं पोस्ट किया फेसबुक पर…

पालम एयरफोर्स स्टेशन पर एक अलग काउंटर बना दिया गया था, हम सभी मीडिया डेलीगेट्स के लिए. हर विभाग के लोग क्रम से बैठे मिले, सिक्योरिटी से लेकर एयर इंडिया तक वाले. सबने फटाफट मुहर ठप्पा ठोंककर एयर इंडिया वन की तरफ बढ़ा दिया. हम सभी पत्रकार जब सारी औपचारिकता कंप्लीट करके एयरपोर्ट के फाइनल गेट के साथ बने हॉल में पहुंचे तो वहां एक एक कर इंट्री कर रहे लोगों का एक सेक्युरिटी वाला वीडियो बनाता मिला.

मैं वीवीआईपी सिक्योरिटी के बारे में सोच रहा था. जाने कितने लेयर्स पर ये लोग तैयारी करते होंगे ताकि कहीं कुछ भी छूट न जाए. यानि हम जो जो जा रहे थे, उन सभी के चेहरे मोहरे का हाई रिजोल्यूशन वाला वीडियो तैयार हो चुका था. वीपीआई (वाइस प्रेसीडेंट आफ इंडिया) के आने के दो घंटे पहले ही हम लोगों को जहाज पर चढ़ने के लिए कह दिया गया. मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि मैं किशोर उम्र में देखे गए अपने तीसरे सपने को साकार करने पहली बार विदेश जा रहा हूं, वह भी उप राष्ट्रपति के मीडिया दल का सदस्य बनकर, वह भी देश-दुनिया के सबसे ताकतवर और एलीट जहाज एआई वन (एयर इंडिया वन) में सवार होकर….

….जारी….

यशवंत से संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.


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वर्ष 2008 में यशवंत जब एक हजार सदस्यों वाले सबसे बड़े हिंदी कम्युनिटी ब्लाग भड़ास का संचालन करते थे तो किसी जहाज पर बैठने उड़ने का पहली बार एक मौका मिला था. इस यात्रा के ठीक पहले और ठीक बाद उनने जो लिखा, उसे पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षकों पर क्लिक कर सकते हैं…

कल है मेरी पहली जहाज यात्रा

पहली जहाज यात्रा के अनुभव

जहाज दारू दिग्गज विमर्श

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अलविदा अज्ञात जी, आप तो अशोक थे लेकिन हम अब भारी शोक में हैं

(स्व. अशोक अज्ञात जी)

कभी माफ़ मत कीजिएगा अशोक अज्ञात जी, मेरे इस अपराध के लिए … हमारे विद्यार्थी जीवन के मित्र अशोक अज्ञात कल नहीं रहे। यह ख़बर अभी जब सुनी तो धक् से रह गया । सुन कर इस ख़बर पर सहसा विश्वास नहीं हुआ । लेकिन विश्वास करने न करने से किसी के जीवन और मृत्यु की डोर भला कहां रुकती है। कहां थमती है भला ? अशोक अज्ञात के जीवन की डोर भी नहीं रुकी , न उन का जीवन । अशोक अज्ञात हमारे बहुत ही आत्मीय मित्र थे । विद्यार्थी जीवन के मित्र । हम लोग कविताएं लिखते थे। एक दूसरे को सुनते-सुनाते हुए हम लोग अकसर अपनी सांझ साझा किया करते थे उन दिनों।

गोरखपुर की सड़कें , गलियां पैदल धांगते-बतियाते घूमते रहते थे। क्रांति के फूल खिलाते , खिलखिलाते रहते थे। वह हमारी मस्ती और फाकाकशी के भी दिन थे । हमारी आन-बान-शान और स्वाभिमान से जीने के दिन थे । ज़रा-ज़रा सी बात पर हम लोग किसी भी ख़्वाब या किसी भी प्रलोभन को क्षण भर में लात मार देने में अपनी शान समझते थे । इसी गुरुर में जीते और मरते थे । अठारह-बीस बरस की उम्र में हम लोग दुनिया बदलने निकले थे । दुनिया तो खैर क्या बदली, हम लोग ही बदलते गए , हारते और टूटते गए । लेकिन यह तो बाद की बात है । अब की बात है । पर उस समय , उस दौर की बात और थी । और अशोक अज्ञात तो अशोक ही थे। अशोक मतलब बिना शोक के। कुछ भी बन बिगड़ जाए उन को बहुत फर्क नहीं पड़ता था । अज्ञात का गुरुर उन्हें शुरु ही से और सर्वदा ही रहा।

हम लोग विद्यार्थी ज़रुर थे पर साहित्य में स्थानीय राजनीति की ज़मीन को तोड़ने के लिए जागृति नाम से एक संगठन भी बनाया था । जिस का मुख्य काम उन दिनों कवि गोष्ठियां आयोजित करना था । अशोक अज्ञात उन दिनों संकेत नाम से एक अनियतकालीन पत्रिका भी निकालते थे । और कि उस में वह किसी की सलाह या दखल नहीं लेते थे । वह उन का व्यक्तिगत शौक और नशा था । पान खाते-चबाते वह एक से एक गंभीर बात कर लेते थे । वह जल्दी किसी विवाद में नहीं पड़ते थे लेकिन चुप भी नहीं रहते थे। स्वार्थ उन में नहीं था , भावुकता लेकिन बहुत थी । उन के एक मामा जिन्हें हम लोग ओझा जी कहते थे, हम लोगों को पढ़ने के लिए अकसर सोवियत साहित्य उपलब्ध करवाते रहते थे।

अशोक अज्ञात का गांव टांड़ा हमारे गांव बैदौली से थोड़ी दूरी पर ही था । वह बाहुबली और कई बार काबीना मंत्री रहे हरिशंकर तिवारी के ख़ास पट्टीदार थे । लेकिन तमाम मुश्किलों और निर्धनता के बावजूद कभी भी उन से कोई मदद नहीं मांगी । न ही उन के हुजूर में गए । बचपन में ही उन के पिता नहीं रहे थे । उन की मां ने ही उन्हें पाला-पोसा और पढ़ाया-लिखाया । टीन एज तक आते-आते अज्ञात जी ने परिवार की ज़िम्मेदारियां उठा लीं । उन्हीं दिनों अपनी एक बहन की शादी उस कच्ची उम्र में तय की थी । मैं भी गया था तब उन की बहन की शादी में उन के गांव। संयोग से विद्यार्थी जीवन में कुछ समय मैं गोरखपुर के रायगंज मुहल्ले में भी रहा था । वहां अज्ञात जी हमारे पड़ोसी रहे थे । अपनी बड़ी बहन के साथ रहते थे । वह हमारी कविताओं के , हमारे संघर्ष और हमारी उड़ान के दिन थे । पत्रकारपुरम , राप्ती नगर , गोरखपुर में भी वह मेरे पड़ोसी रहे थे । इस नाते जब भी गोरखपुर जाता था तो नियमित मुलाकात होती थी उन से । वह जब कभी लखनऊ आते तब भी हमसे मिलते ज़रुर थे । हमारे कथा साहित्य के वह अनन्य पाठक थे । खोज कर , मांग कर जैसे भी हो वह पढ़ते ज़रुर थे । न सिर्फ़ पढ़ते थे बल्कि पात्रों और कथाओं पर विस्तार से चर्चा भी करते थे । प्रश्न करते थे । किसिम किसिम के सवाल होते उन के पास । कई बार वह फ़ोन कर के बात करते । मिलने का इंतज़ार नहीं कर पाते थे।

मेरी कहानी मैत्रेयी की मुश्किलें और उपन्यास वे जो हारे हुए उन को बहुत प्रिय थे । इस लिए भी कि वह ख़ुद हारे हुए थे और कि इस उपन्यास के बहुत से चरित्र उन के जाने और पहचाने हुए लोग थे । हरिशंकर तिवारी भी इस उपन्यास में खल पात्र के रुप में उपस्थित थे इस लिए भी वह इसे बहुत पसंद करते थे । इतना ही नहीं , यह उपन्यास भी उन्हों ने उन तक पहुंचवा दिया यह कह कर कि आप अपने को चाहे जितना सफल मानिए , नायक मानिए लेकिन देखिए समय और साहित्य आप को किस तरह दर्ज कर रहा है । यह बात उन्हों ने मुझे फ़ोन कर बताई । मैं ने चिंतित हो कर कहा , यह क्या किया आप ने ? वह बोले , घबराईए नहीं आप । वह लोग बहुत बेशर्म और घाघ लोग हैं । उन को इन सब चीजों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता । और सचमुच अशोक अज्ञात ने सही ही कहा था । उन या उन जैसों को कोई फ़र्क नहीं पड़ा था । फ़र्क तो छोड़िए , नोटिस भी नहीं ली उन या उन जैसे लोगों ने । लेकिन मैं चिंतित इस लिए हुआ था क्यों कि एक बार एक ख़बर के सिलसिले में महीनों धमकी आदि झेलना पड़ा था , इन्हीं तिवारी जी के चमचों से । अज्ञात जी बोले थे , ख़बर की बात और है।

अशोक अज्ञात अपनी कविताओं में जो चुभन बोते थे , अपने जीवन में भी वह चुभन महसूस करते रहे । निरंतर । इतना कि बाद के दिनों में वह सिर्फ़ पाठक बन कर रह गए । रचना छूट गई। उन के जीवन में आर्थिक संघर्ष इतना ज़्यादा था कि बाक़ी सारे संघर्ष और रचनात्मकता खेत हो गई थी । आज अख़बार की नौकरी ने उन्हें निचोड़ लिया था । पांच हज़ार , सात हज़ार या दस हज़ार रुपए की नौकरी में आज अख़बार की नौकरी में आज की तारीख में किसी स्वाभिमानी व्यक्ति और उस के परिवार का बसर कैसे होता रहा होगा , समझा जा सकता है । गोरखपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष भी रहे हैं वह । आज अख़बार में वह संपादक भी रहे कुछ समय तक । लेकिन संपादक और प्रेस क्लब के अध्यक्ष हो कर भी अज्ञात ही रहे । क्षुद्र समझौते कभी नहीं किए । दलाली आदि उन से कोसों दूर भागती थी । भूखे रह लेना वह जानते थे लेकिन हाथ पसारना नहीं । अशोक तो वह खैर थे ही । अशोक मतलब बिना शोक के । लेकिन अशोक अज्ञात भी हो जाए तो मुश्किल हो जाती है । अज्ञात नाम तो उन्हों ने कविता लिखने के लिए ख़ुद रखा था । पर क्या पता था कि अज्ञात नाम से कविता लिखने वाला , संकेत नाम की पत्रिका निकालने वाला यह व्यक्ति इतना भी अज्ञात हो जाएगा कि कैंसर की बीमारी का इलाज भी अपने पिछड़े गांव में करते हुए अपने गांव में ही आंख मूंद लेगा ! अपनी जन्म-भूमि में ही प्राण छोड़ेगा । और कि इस बीमारी की सूचना भी हम जैसों मित्रों को देने की ज़रुरत नहीं समझेगा।

अशोक अज्ञात फ़ेसबुक पर भी उपस्थित रहे हैं । और इस दौर में जब लोग अपनी फुंसी , खांसी , बुखार की भी सूचना परोस कर भी अपनी आत्म मुग्धता में फ़ोटो डाल-डाल कर धन्य-धन्य होते रहते हैं , वहीं हमारे अशोक अज्ञात ने अपने कैंसर की भनक भी नहीं होने दी किसी को । आप उन के अशोक और अज्ञात होने का अंदाज़ा इस एक बात से भी लगा सकते हैं । अब हम भी अपने को सिर्फ़ और सिर्फ़ कोस ही सकते हैं कि एक अभिन्न आत्मीय और स्वाभिमानी मित्र को क्यों इस तरह निर्वासित हो कर अज्ञात मृत्यु के कुएं में धकेल दिया । क्यों नहीं , खोज ख़बर रखी । माथा ठनका तो तभी था जब कुछ समय पहले गोरखपुर जाने पर उन के घर गया तो पता चला कि वह तो अपना घर बेच कर कहीं और जा चुके हैं । उन का फ़ोन मिलाया । फ़ोन बंद मिला । दूसरे पड़ोसी गिरिजेश राय ने बताया कि वह कर्ज में डूब गए थे , मकान की किश्तें बहुत हो गई थीं, पारिवारिक जिम्मेदारियां भी थीं सो घर बेचना ही रास्ता रह गया था।

अब तो गिरिजेश राय भी नहीं रहे । फिर बाद में भी कई बार फोन किया , कभी फ़ोन नहीं मिला उन का । न ही कोई मित्र उन का बदला हुआ उन का कोई दूसरा नंबर दे पाया । फिर मैं भी अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों में उलझ गया । अज्ञात जी की खोज-ख़बर लेना बिसर गया । ख़बर मिली भी तो यह शोक भरी ख़बर। जाने गोरखपुर के पत्रकार लोग गोरखपुर से कोई सत्तर किलोमीटर दूर उन के गांव टांड़ा भी पहुंचे होंगे या नहीं , मैं नहीं जानता। यह ज़रुर जानता हूं अज्ञात जी के इस तरह अज्ञात चले जाने में एक अपराधी मैं भी हूं। कभी माफ़ मत कीजिएगा अज्ञात जी , मेरे इस अपराध के लिए । इस लिए कि मैं कभी इस अपने अक्षम्य अपराध के लिए ख़ुद को माफ़ करने वाला नहीं हूं। अलविदा अज्ञात जी। आप तो अशोक थे लेकिन हम अब भारी शोक में हैं, अशोक नहीं हैं। दल्लों भड़ुओं के इस दौर में , कुत्ता और चूहा दौड़ में इस तरह बेनाम और बेपता मौत ही हम सब की अब तकदीर है। करें भी तो क्या करें अशोक अज्ञात जी । ख़ुद्दारी की खता की भी आख़िर कुछ तो सज़ा भी होती ही है।

मुश्किल यह भी है कि जैसे उन के पिता उन्हें भंवर में छोड़ कर चले गए थे , वैसे ही अज्ञात जी भी अपने बच्चों को भंवर में ही छोड़ कर गए हैं। दो बेटे हैं, बेरोजगार हैं। एक बेटी है, विवाह बाकी है। पत्नी भी बीमार रहती हैं। उनका इलाज भी वह नहीं करवा पाते थे। मुश्किलें और भी बहुत हैं। ईश्वर उन के परिवार को उन के विछोह की शक्ति दे और उन की आत्मा को शांति। एक अभागा मित्र और कर भी क्या सकता है भला?

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं.

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…और इस तरह नींद में चले गये अशोक अज्ञात

गोरखपुर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ हिन्दी पत्रकार अशोक अज्ञात नहीं रहे। इस सत्य को स्वीकार करने के अलावा हमारे पास अब कोई चारा नहीं है। करीब छह-सात साल पहले की बात है। अशोक अज्ञात प्रेस क्लब का चुनाव जीते। उनकी पत्रकार-मंडली का शपथ-ग्रहण समारोह होना था। अज्ञात एक दिन मुझसे टकरा गये। बोले– शपथग्रहण समारोह के लिए मुख्य अतिथि के रूप में किसे बुलाऊँ?

मैंने कहा– सोचने का मौका दीजिए। दिमाग और नजर दौड़ाने लगा। अन्त में एक नाम सूझा। मैंने कहा– इस शोभा के लिए किसी ऐसे आदमी को बुलाया जाना चाहिए जो शब्द और वाणी का जादूगर हो। अज्ञात ने चयन का काम मुझ पर छोड़ दिया। मैंने कृष्ण कल्पित का चयन किया। गोरखपुर की पत्रकार बिरादरी अब भी कृष्ण कल्पित को याद करती है। मुझे याद आता है कि अशोक अज्ञात ने उस आयोजन में छोटा-सा भाषण देने के बाद कल्पित की चर्चित काव्यकृति ‘एक शराबी की सूक्तियां’ से कुछ कविताओं का पाठ भी किया था। अज्ञात मेरे ऐसे मित्र थे, जिनकी सादगी और सरलता मुझे किसी अन्य मित्र में नहीं दीखती। निष्कपट, निष्कलुष और निश्छल व्यक्तित्व के धनी अज्ञात सदैव मुस्कुराते हुए ही मिलते थे। कभी उन्हें उदास मुद्रा में नहीं पाया। दुख और पीड़ा भले उनके भीतर पल रही हो। बाहर से यही लगता था कि वह सुखी जीवन जी रहे हैं।

अज्ञात से व्यक्तिगत तौर पर मेरा परिचय 1977 के आसपास हुआ था। गोरखपुर के राजकीय जुबली कॉलेज के सामने एक फर्नीचर की दुकान है, जो मेरे एक मित्र दयाराम साहनी की है। वहीं अज्ञात का बैठना-उठना होता था। कई बार वहां अज्ञात को देखा, लेकिन सीधे उनसे परिचय न होने के कारण बातचीत नहीं हुई। एक दिन जब मैं उस अड्डे पर पहुँचा तो अज्ञात एक कविता सुना रहे थे। वह कविता इतनी दमदार थी कि मैंने उनसे उसे दोबारा सुनाने का इसरार किया। उन्होंने सुनाई। कविता गीतनुमा थी। मैंने उनसे कहा— यह कविता तो शायद बाबा नागार्जुन की है। वह कुछ-कुछ झेंपते-शरमाते हुए बोले— नहीं-नहीं यह मेरी लिखी है। मैंने उनकी बात मान तो ली, पर विश्वास नहीं हुआ। एक बार शाम के वक्त उनके डेरे पर जाना हुआ। उन दिनों अज्ञात शायद दैनिक जागरण में सब-एडिटर थे। उन्होंने रात में मेरे वहीं रुकने का कार्यक्रम बना दिया। मीट-चावल पकाया और मदिरा की व्यवस्था की। उनकी फरमाइश पर मैंने एक कविता सुनायी। और तब क्या था] उनका कवि जाग गया।

उन्होंने अलमारी से अपनी डायरी निकाली और दस-बारह गीत एवं कुछ अतुकांत कविताएं सुना डालीं। सच कहता हूँ, वैसी कविताएं मैंने न तो आज तक पढ़ी और न सुनीं। मजे की बात यह कि अज्ञात की इनमें से शायद ही कोई कविता अखबार या पत्रिका में छपी हो। तब मैं लघु पत्रिकाओं में खूब छप रहा था। अज्ञात की तुलना में मेरी कविताएं कहीं नहीं ठहरती थीं। उस समय गोरखपुर का बुद्धिजीवी समाज अज्ञात को बेहद अच्छा आदमी तो मानता था, लेकिन वह एक आला दर्जे के कवि हैं यह मान्यता नदारद थी। अज्ञात के व्यक्तित्व में गजब का वैराट्य और औदार्य था, लेकिन न जाने उनमें कौन-सी ऐसी ग्रंथि थी जो उनको ख्यात होने की कोशिश से रोकती थी। साल-डेढ़ साल पहले की बात है। मैं उनके घर पर रात में रुका था। उनकी बहुत सारी कविताएं सुनीं। उनसे कहा कि इनकी पाण्डुलिपि तैयार कर मुझे दे दीजिए। संग्रह छपवाने की जिम्मेदारी मैं लेता हूँ। वह टाल गये। अब वह डायरी कहॉं और किस हालत में होगी, नहीं कह सकता। गोरखपुर गया तो खोजबीन कराने का प्रयास करूँगा। सातवें-आठवें दशक में गोरखपुर और आसपास के जिलों के गांव-कस्बों के स्कूल-कालेज विभिन्न अवसरों पर कवि सम्मेलन आयोजित किया करते थे, जिनमें स्थानीय कवि-शायर आमंत्रित किये जाते थे। अशोक अज्ञात भी इन आयोजनों में काव्यपाठ किया करते थे। वाहवाही मिलती थी, खुश हो लेते थे।

उन दिनों गोरखपुर में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी एवं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का अच्छा जनाधार हुआ करता था। मेरा नाता माकपा से था। अशोक अज्ञात भाकपा के कार्ड होल्डर थे। पार्टी के धरना-प्रदर्शन में सक्रिय रूप से भाग लेते थे। मैं था तो माकपा में, लेकिन लाल झंडा वाली सभी पार्टियों की गतिविधियों में रुचि लेता था और सभी के नेताओं-कार्यकर्ताओं के सम्पर्क में रहता था। 1978 के आरम्भ में मुझे लखनऊ में सरकारी नौकरी मिल गयी और मैं गोरखपुर से चला गया। अशोक अज्ञात से इस बीच कोई सम्पर्क नहीं रख सका। अगस्त 1979 में रामेश्वर पाण्डेय के प्रयास से मुझे दैनिक जागरण में पत्रकार की नौकरी मिल गयी। मैं दोबारा गोरखपुर में। अप्रैल 1981 में दैनिक जागरण से निकाले जाने और उसके कुछ महीने बाद तक मैं गोरखपुर में रहा, लेकिन इस दौरान कभी अज्ञात से मिलना न हो पाया। हो सकता है, कभी कहीं दो-चार मिनट के लिए मिलना हुआ हो। याद में नहीं है।

1984 में मैंने कुछ महीने ‘आज’ अखबार में काम किया। तब अज्ञात भी ‘आज’ में आ चुके थे। आये दिन उनके घर आना-जाना होता था। मैं उनके परिवार का सदस्य जैसा था। मौका मिलने पर हम शाम की बैठकें भी कर लेते थे। इस अखबार में रहने के दौरान अज्ञात से मेरी प्रगाढ़ मैत्री हो गयी। ‘आज’ मैं ज्यादा दिन न रहा। इसके बाद कई घाटों का पानी पीता रहा। आखिरकार, 1986 में ग्वालियर में पहुँच गया। वहां दैनिक भास्कर से मुझे तत्कालीन स्थानीय सम्पादक श्याम कश्यप ने निकलवा दिया। मजे की बात यह कि श्याम कश्यम ने ही मुझे नौकरी दिलवायी भी थी। कुछ महीने ‘चम्बलवाणी’ नाम के छोटे से अखबार में बिताये। और तभी मुझे राम विद्रोही जी ने, जो ‘दैनिक आचरण’ अखबार के सम्पादक हुआ करते थे, पार्ट टाइम नौकरी दिला दी। वे मेरे अत्यधिक आर्थिक कष्ट के दिन थे। एक रोज मेरे मित्र और जाने-माने पत्रकार अनिल पाण्डेय ग्वालियर आ धमके। तब वह ‘आज’ गोरखपुर में थे। ‘आज’ ज्वाइन करने का ऑफर लेकर गये थे। मैं कानपुर लग गया। उस दौरान लगभग हर महीने गोरखपुर एक-दो दिन के लिए जाता था, क्योंकि मेरा परिवार वहीं था। किसी से मिलूँ न मिलूँ, अशोक अज्ञात से अवश्य मिलता था। मेरे पास अज्ञात से जुड़ी अनगिनत यादें हैं। सभी यादें बॉंट पाना सम्भव नहीं।

अशोक अज्ञात ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद आजीविका के साधन के रूप में ट्यूशन करना शुरू किया। कई साल तक इसी से वह गुजारा करते रहे। इसके बाद उन्होंने आजमगढ़ के अखबार दैनिक देवल, गोरखपुर के ‘हिन्दी दैनिक’ और दैनिक जागरण में काम करते हुए ‘आज’ में जगह पायी। आज अखबार से ही वह रिटायर हुए। आज से ग्रेच्युइटी और पीएफ का पैसा निकलवाने में उन्हें नाको चने चबाने पड़े। पता नहीं, मरने से पहले पूरा पैसा प्राप्त कर सके या नहीं। 2014-15 में मैं गोरखपुर में रहने लगा था। उस समय अज्ञात घोर आर्थिक तंगी में जी रहे थे। उनका परिवार भी बिखर रहा था। लेकिन कभी उनके माथे पर शिकन नहीं देखता था।

पत्नी सीजोफ्रेनिया की शिकार हो गयी थीं। और बाद में चल बसीं। बड़ा बेटा अतुल मानसिक रूप से बीमार हो चला था। छोटा वाला किसी प्रकार सातवीं पास कर सका और पढ़ना बन्द कर दिया। दोनों के बीच की एक बेटी है— नेहा। वह पढ़ने में ठीक थी। नेहा शायद एम कॉम कर चुकी है। अज्ञात कहते थे कि नेहा जब तक पढ़ना चाहेगी, तब तक इसकी शादी करूँगा। मैं आये दिन उनके डेरे पर पहुँच जाता था और में वहीं रुक जाता था। वह अपनी कोई परेशानी शेयर नहीं करना चाहते थे। मैं ही उनको खोद-खोद कर पारिवारिक दिक्कतों की जानकारी लेता था। उनकी गम्भीर बीमारी की शुरुआत अनवरत हिचकी आने से हुई। करीब एक साल तक उन्हें हिचकी आती रही। इलाज चलता रहा। कोई फायदा नहीं होता था। इसी बीच, उन्‍हें मसूढ़े में दर्द की शिकायत हुई। कुछ दिन टालते रहे। जब शुभचिन्तकों के दबाव में जांच करायी तो कैंसर निकला। कीमोथेरैपी ने कुछ महीने उन्हें जिन्दगी बख्शी। जिस रोज उनकी मौत की खबर पायी, उससे दस दिन पहले ही फोन पर बात हुई थी। फोन नेहा ने उठाया था। बोली— पापा बात कर पाने की हालत में नहीं हैं। वह लाइन पर आये, दो-चार वाक्य बोल सके। और अन्त में कहा— विनय जी, नींद आ रही है। अब सोने दीजिए!

लेखक Vinay Shrikar से संपर्क shrikar.vinay@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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टैक्स गुरु सुभाष लखोटिया कैंसर के ताजा अटैक को मात न दे सके

सुभाष लखोटिया के प्रशंसकों एवं चहेतों के लिए यह विश्वास करना सहज नहीं है कि वे अब इस दुनिया में नहीं रहे। भारत के शीर्ष टैक्स और निवेश सलाहकार के रूप में चर्चित एवं सीएनबीसी आवाज चैनल पर चर्चित शो ‘टैक्स गुरु’ के 500 से अधिक एपिसोड पूरा कर विश्व रिकार्ड बनाने वाले श्री लखोटिया अनेक पुस्तकों के लेखक थे। वे पिछले कई दिनों से जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे थे। उनको कैंसर था। डाक्टरों ने बहुत पहले उनके न बचने के बारे में कह दिया था लेकिन अपने विल पावर और जिजीविषा के कारण वे कैंसर व मौत, दोनों को लगातार मात दे रहे थे। पर इस बार जब हालत बिगड़ी तो कई दिनों के संघर्ष के बाद अंततः दिनांक 11 सितम्बर 2016 की मध्यरात्रि में इस दुनिया को अलविदा कह गए।

हम सबके लिए यह हृदय विदारक और मन को पीड़ा देने वाला क्षण है जब हम सब अपने अजीज एवं हजारों-हजारों के चेहते श्री लखोटिया के असामयिक निधन के संवाद से उबर नहीं पा रहे हैं, यह अविश्वसनीय-सा लग रहा है और गहरा आघात दे रहा है। क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से वे न केवल दिल्ली बल्कि देश की विभिन्न सार्वजनिक संस्थाओं की धड़कन बन गये थे। उनका मन अंतिम क्षण तक युवा-सा तरोताजा, सक्रिय, आशावादी और पुरुषार्थी बना रहा।

सुभाष लखोटिया के जीवन के दिशाएं विविध हैं। आपके जीवन की धारा एक दिशा में प्रवाहित नहीं हुई है, बल्कि जीवन की विविध दिशाओं का स्पर्श किया है। आपने कभी स्वयं में कार्यक्षमता का अभाव नहीं देखा। क्यों, कैसे, कब, कहां जैसे प्रश्न कभी सामने आए ही नहीं। हर प्रयत्न परिणाम बन जाता कार्य की पूर्णता का। यही कारण है कि राजधानी दिल्ली की अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और जनकल्याणकारी संस्थाएं हैं जिससे वे सक्रिय रूप से जुड़े थे, वे अपने आप में एक व्यक्ति नहीं, एक संस्था थे। वे राजस्थान अकादमी, इनवेस्टर क्लब, लायंस क्लब नईदिल्ली अलकनंदा, मारवाड़ी युवा मंच, राजस्थान रत्नाकर और ऐसी अनेक संस्थाओं को उन्होंने पल्लवित और पोषित किया। उनकी अनेक अनूठी एवं विलक्षण विशेषताएं थीं और इसी कारण वे जन-जन में लोकप्रिय थे। वे एक सच्चे सामाजिक कार्यकर्ता थे, वहीं उत्कृष्ट समाज सुधारक और संवेदनशील जनसेवक एवं विचारक थे। वे चित्रता और मित्रता के प्रतीक थे। उनका जीवन घटनाबहुल था उसमें रचनात्मकता और सृजनात्मकता के विविध आयाम गुंथित थे।

अजमेर में जन्में श्री लखोटिया राजस्थान की संस्कृति एवं राजस्थानी भाषा के विकास के लिये निरन्तर प्रयत्नशील थे। दिल्ली में राजस्थानी अकेडमी के माध्यम से वे राजस्थानी लोगों को संगठित करने एवं उनमें अपनी संस्कृति के लिये जागरूकता लाने के लिये अनेक उपक्रम संचालित करते रहे हैं। न केवल राजधानी दिल्ली बल्कि देश-विदेश में राजस्थान की समृद्ध कला, संस्कृति व परंपरा पहुंचाने के लिये प्रयासरत थे। बीते 25 वर्ष से अकेडमी द्वारा लगातार दिल्ली में सांस्कृतिक कार्यक्रमों, विभिन्न प्रतियोगिताओं, कवियत्री सम्मेलन, मरु उत्सव, राजस्थानी लेखकों को सम्मानित करने के आयोजन उनके नेतृत्व में होते रहे हैं। वे राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलवाने के लिए पिछले कई वर्षो से प्रयासरत थे। महिलाओं के लिए यह संस्था विशेष कार्यक्रमों का आयोजन करती है और विशेष कार्य करने वाली महिलाओं को सम्मानित भी करती है। संस्था का उद्देश्य देश-विदेश में रह रहे लोगों को एक साथ एक मंच पर लाना और आपसी भाई-चारे का मजबूत करना भी है। संस्था राजस्थान से जुड़ी हर परम्परा और उन क्षेत्रों से जुड़े कलाकार, विशेषज्ञ तथा बेहतर कार्य करने वालों को सहयोग कर आगे बढ़ावा देती है।

श्री सुभाष लखोटिया को सम्पूर्ण जीवन लायनिज्म को समर्पित रहा है। वे 1970 में ही लायंस इंटरनेशनल के द्वारा सर्वश्रेष्ठ युवा लायंस के रूप में सम्मानित हो गये थे। वे लायंस क्लब नई दिल्ली अलकनंदा के संस्थापक एवं आधारस्तंभ थे। उनकी भारत में लायनिज्म को आगे बढ़ाने के लिए अविस्मरणीय एवं अनुकरणीय सेवाएं रही हैं। वे इस क्लब के माध्यम से सेवा, परोपकार के अनेक जनकल्याणकारी उपक्रम करते रहते थे। हाल ही में उन्होंने सेवा की गतिविधियों को प्रोत्साहन देने के लिये प्रतिवर्ष एक लाख रूपये का ‘सुभाष लखोटिया सेवा पुरस्कार’ देना प्रारंभ किया। वे क्लब के विकास में न केवल सहभागी बने बल्कि उसे बीज से बरगद बनाया, उन सब घटनाओं और परिस्थितियों का एक अलग इतिहास है। उनसे जुड़े अनेक प्रसंग और घटनाएं हैं जिन्हें लांयस क्लब नई दिल्ली अलकनंदा के लिए ऐतिहासिक कहा जा सकता है। श्री रामनिवास लखोटिया के वे पुत्र थे। पिता और पुत्र दोनों ने अजमेर में विक्टोरिया अस्पताल के समीप मोहनलाल गंगादेवी लखोटिया धर्मशाला का निर्माण करके समाजोपयोगी एवं प्रेरणादायी कार्य किया। वे पुष्कर के विकास के लिये भी तत्पर रहते थे। उन्होंने पद-प्रतिष्ठा पाने की न कभी चाह की और न कभी चरित्र कसे हासिये में डाला। स्वस्थ चिंतन से परिवर्तन की जो बुनियाद तैयार होगी वही स्वस्थ समाज एवं लोकमंगलकारी जीवन का नव-विहान करेगी- यही लखोटियाजी के जीवन का मार्ग है।

श्री सुभाष लखोटिया अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हुए है। सन् 2010 में ‘साहित्यश्री पुरुस्कार’, ‘सूर्यदत्त राष्ट्रीय अवार्ड’ एवं सन् 2014 में उन्हें लायंस इंटरनेशनल के द्वारा ‘सद्भावना के राजदूत पुरुस्कार’ से सम्मानित किया गया। सन् 2010 में टैक्स गुरु बिसनेस शो के लिये राष्ट्रीय टेलीविजन अवार्ड भी प्रदत्त किया गया। हर व्यक्ति को लखपति और करोड़पति बनाने के लिये उनके द्वारा लिखी गयी पुस्तकें काफी लोकप्रिय हुई है। वे समृद्धि की ही बात नहीं करते बल्कि हर इंसान को नैतिक एवं ईमानदार बनने को भी प्रेरित करते। देश के दर्जनों अखबारों में उनके न केवल टैक्स सलाह एवं निवेश से संबंधित बल्कि जीवन निर्माण एवं आध्यात्मिक मूल्यों से प्रेरित लेख-साक्षात्कार प्रकाशित होते रहते थे। लखोटियाजी सतरंगी रेखाओं की सादी तस्वीर थे। गहन मानवीय चेतना के चितेरे थे। उनका हंसता हुआ चेहरा रह-रहकर याद आ रहा है।

इस संसार में जन्म-मृत्यु का क्रम सदा से चलता रहा है। कुछ लोग अपने चुंबकीय व्यक्तित्व से अमिट छाप छोड़ जाते हैं। ऐसे ही दुर्लभ व्यक्तित्व के धनी थे लखोटियाजी। मिलनसार एवं हंसोड़ व्यक्तित्व उनका था, जो उन्हें हर किसी से एकाकार कर देता था। गुणग्राहकता ने उनके इस व्यक्तित्व को और भी लुभावना रूप दे दिया था। सरल व्यवहार से संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को वे आकर्षित कर लेते थे। उनके जीवन की दिशाएं विविध हैं, वे एक दिशा में प्रवाहित नहीं हुई है, बल्कि जीवन की विविध दिशाओं का स्पर्श किया है। उनके जीवन की खिड़कियाँ समाज को नई दृष्टि देने के लिए सदैव खुली रही। वे एक सच्चे सामाजिक कार्यकर्ता थे, वहीं उत्कृष्ट समाज सुधारक और संवेदनशील जनसेवक एवं विचारक थे। वे चित्रता और मित्रता के प्रतीक थे।

लखोटियाजी की अनेकानेक विशेषताओं में एक प्रमुख विशेषता यह थी कि वे सदा हंसमुख रहते थे। वे अपने गहन अनुभव एवं आध्यात्मिकता के कारण छोटी-छोटी घटना को गहराई प्रदत्त कर देते थे। अपने आस-पास के वातावरण को ही इस विलक्षणता से अभिप्रेरित करते थे। यही मानक दृष्टि उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व को समझने की कुंजी है। लखोटियाजी कहा करते थे कि जितना हो सके दूसरों के लिए सुख बांटो क्योंकि इस संसार में उसके समान अन्य कोई धर्म नहीं है। किसी को पीड़ित मत करो, किसी का दिल मत दुखाओ, क्योंकि उसके समान अन्य कोई पाप नहीं है। यह प्रयोग, समस्याओं के आर-पार जाने की क्षमता, वास्तविकता पर पडे़ आवरणों को तोड़ देने की ताकत और मनुष्यों की चिंता उनके अनुभवों में भी दिखाई पड़ती थी। इतिहास और वर्तमान-दोनों जगह वह उत्पीड़न के खिलाफ हैं और उसकी अभिव्यक्ति में पूरी तरह भयमुक्त हैं। अपनी तेज आंखों से वे उस सच को पहचान ही लेते हैं जो आदमी को तोड़ता है और उसे मशीन का केवल पुर्जा बनाकर छोड़ देता है।

लखोटियाजी के जीवन के सारे सिद्धांत मानवीयता की गहराई से जुड़े हैं और उस पर वह अटल भी रहते हैं किंतु किसी भी प्रकार की रूढ़ि या पूर्वाग्रह उन्हें छू तक नहीं पाता। वह हर प्रकार से मुक्त स्वभाव के हैं और यह मुक्त स्वरूप भीतर की मुक्ति का प्रकट रूप है। यह उनके व्यक्ति की बड़ी उपलब्धि है। स्वभाव में एक औलियापन है, फक्कड़पन है और फकीराना अंदाज है और यह यह सब नैसर्गिक रूप में विद्यमान है जिसका पता उन्हें भी नहीं है। उनका दिल और द्वार सदा और सभी के लिए खुला रहा अनाकांक्ष भाव से जैसे यह स्वभाव का ही एक अंग है। मित्रों की सहायता में सदा तत्पर रहे। अपना दुख कभी नहीं कहा किन्तु दूसरों का दुख अवश्य बांटते रहे। छोटी बातों को बड़ा बनाकर कभी नहीं कहते, बड़ी बात को सहज भले बना दें।

लखोटियाजी में विविधता थी और यही उनकी विशेषता थी। उन्हें प्रायः हर प्रदेश के और हर भाषा के लोग जानते थे। उनकी अनेक छवि, अनेक रूप, अनेक रंग उभर कर सामने आते हैं। ये झलकियां बहुत काम की हैं। क्योंकि इससे सेवा का संसार समृद्ध होता है। लखोटियाजी का जितना विशाल और व्यापक संपर्क है और जितने अधिक लोग उन्हें करीब से जानने वाले हैं, अपने देश में भी और विदेशों में भी, उस दृष्टि से कुछ शब्दों से उनके बारे में बहुत नहीं जाना जा सकता, और भी आयाम और अनेक रोचक प्रसंग उजागर हो सकते हैं। यह काम कठिन अवश्य है, असंभव नहीं। इस पर भविष्य में ठोस काम होना चाहिए, ताकि उनकी स्मृति जीवंत बनी रहे।

लेखक ललित गर्ग से संपर्क 9811051133 के जरिए किया जा सकता है.

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एक बर्बाद जीनियस उर्फ ब्रजेश्वर मदान की याद…

Prabhat Ranjan : आज ब्रजेश्वर मदान को कोई याद नहीं करता. वे अपने जमाने के मशहूर फिल्म पत्रकार थे. ‘फ़िल्मी कलियाँ’ के संपादक थे और यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘जंजीर’ की पब्लिसिटी उन्होंने ही की थी. किस्सा यह है वे जासूसी लेखन के बादशाह सुरेन्द्र मोहन पाठक के दोस्त थे. दोनों अक्सर शाम को रसरंजन की महफ़िल जमाते थे. Continue reading

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दो दिनी अलीगढ़ यात्रा : जिया, मनोज, प्रतीक जैसे दोस्तों से मुलाकात और विनय ओसवाल के घर हर्ष देव जी का साक्षात्कार

पिछले दिनों अलीगढ़ जाना हुआ. वहां के छात्रनेता और पत्रकार ज़ियाउर्रहमान ने अपनी पत्रिका ‘व्यवस्था दर्पण’ के एक साल पूरे होने पर आईटीएम कालेज में मीडिया की दशा दिशा पर एक सेमिनार रखा था. सेमिनार में सैकड़ों इंजीनियरिंग और एमबीए छात्रों समेत शहर के विशिष्ट जन मौजूद थे. आयोजन में शिरकत कर और युवाओं से बातचीत कर समझ में आया कि आज का युवा देश और मीडिया की वर्तमान हालत से खुश नहीं है. हर तरफ जो स्वार्थ और पैसे का खेल चल रहा है, वह सबके लिए दुखदायी है. इससे आम जन की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं. सेमिनार में मैंने खासतौर पर मीडिया में आए भयंकर पतन और न्यू मीडिया के चलते आ रहे सकारात्मक बदलावों पर चर्चा की. बड़े मीडिया घरानों के कारपोरेटीकरण, मीडिया में काले धन, मीडिया में करप्शन जैसे कई मामलों का जिक्र उदाहरण सहित किया. 

अलीगढ़ शहर में पहली बार गया था. वहां शहर में सेंट्रल प्वाइंट स्थित मीनार होटल में मुझे ठहराया गया था. प्रोग्राम के बाद अलीगढ़ के जाने माने फोटो जर्नलिस्ट मनोज अलीगढ़ी के साथ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) देखने के लिए निकला. मनोज ने एक बेहतरीन गाइड की तरह अपनी कार में बिठाकर न सिर्फ एएमयू घुमाया बल्कि शहर के चर्चित स्थलों, इमारतों, सड़कों आदि से भी परिचय कराया. मनोज अलीगढ़ी इन दिनों आगरा के ऐतिहासिक स्थलों पर काम कर रहे हैं और उनकी फोटो स्टोरी अमर उजाला में प्रकाशित हो रही है. साथ ही उनके चर्चित फोटो अन्य दूसरे बड़े स्थानीय और राष्ट्रीय अखबारों में छपते रहते हैं. मनोज अलीगढी का फोटोग्राफी के प्रति जुनून देखने लायक था. वे हर पल कुछ नया करने, कुछ नया क्लिक करने, कुछ नया रचने के बारे में सोचते रहते हैं.

जिस युवा और उत्साही पत्रकार ज़ियाउर्रहमान उर्फ ज़िया ने मीडिया पर केंद्रित सेमिनार का आयोजन किया था, वे खुद अपने आप में एक संस्थान की तरह दिखे. छोटी उम्र में उन्होंने छात्र राजनीति और पत्रकारिता के क्षेत्र में जिस सक्रिय नेतृत्वकारी भूमिका में काम किया, वह सराहनीय है. बेहद कम उम्र से ही वह अपने आसपास के अंतरविरोधों और उलटबांसियों से दो-दो हाथ करते हुए आज अनुभवों का पिटारा अपने पास रखे हैं. इस आयोजन में उन्होंने बहुत सारे बड़े लोगों, नेताओं, मंत्रियों, अफसरों आदि को बुलाया था लेकिन उनमें से कोई नहीं आया. ज़ियाउर्रहमान ने मंच से कहा कि इस आयोजन ने उनको बहुत सारे सबक दिए हैं. जिया की सक्रियता के कारण उनके ढेर सारे विरोधी भी अलीगढ़ में पैदा हो गए हैं जिनने कार्यक्रम असफल करने की पूरी कोशिश की लेकिन हुआ उल्टा. प्रोग्राम जबरदस्त रूप से सफल रहा. हां, जिन जिन ने आने का वादा किया था और उनके नाम होर्डिंग्स बैनर पर छापे गए थे, उनके न आने से जिया को थोड़ा झटका तो जरूर लगा दिख रहा था. पर वह इस अनुभव का इस्तेमाल आगे के जीवन, आयोजन में करने को तत्पर दिख रहे थे. वो कहते हैं न कि कोई भी युवा अपने जोश जज्बे के कारण समय के साथ व्यावहारिक पहलुओं-अनुभवों से वाकिफ होता जाता है और इस प्रकार पहले से ज्यादा मेच्योर होता जाता है.

बुके देकर सम्मानित करते सीनियर फोटो जर्नलिस्ट मनोज अलीगढ़ी

तस्वीर में सबसे बाएं सोशल मीडिया के चर्चित चेहरे वसीम अकरम त्यागी दिख रहे हैं और कार्यक्रम के आयोजक जियाउर्रहमान खड़े होकर श्रोताओं की तरफ जाने को उन्मुख दिख रहे हैं.

तस्वीर में खचाखच भरा हाल दिख रहा है और कार्यक्रम आयोजक जियाउर्रहमान खड़े कुछ चिंतन मनन करते दिख रहे हैं. 

सबसे दाएं गोरखपुर से आए पत्रकार साथी राशिद और बाएं से दूसरे एडवोकेट प्रतीक चौधरी संग कार्यक्रम की याद सहेजने के वास्ते फोटोग्राफी. 

जिया के एक साथी हैं एडवोकेट प्रतीक चौधरी. वकालत के क्षेत्र में प्रतीक ने अपने जन सरोकारी रवैये के कारण कम समय में अच्छा खासा नाम कमाया है. उन्होंने गरीबों को न्याय दिलाने के वास्ते तरह तरह से लड़ाई छेड़ रखी है और उनके साथ बहुत सारे लोग कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते हैं. प्रतीक ने अलीगढ़ शहर में प्रदूषण से लेकर पुलिस उत्पीड़न तक के मामलों में लंबी लड़ाई लड़ी और उद्यमियों, अफसरों, नेताओं को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया.

कार्यक्रम के अगले दिन अलीगढ़ निवासी वरिष्ठ पत्रकार विनय ओसवाल जी के घर दोपहर के खाने पर जाने का कार्यक्रम बना. मैं, जिया और प्रतीक एक एक कर विनय ओसवाल जी के घर पहुंचने लगे. विनय ओसवाल जी नवभारत टाइम्स में लंबे समय तक हाथरस के संवाददाता रहे. उन्होंने पत्रकारिता को कभी कमाई का जरिया नहीं बनाया. पैसे कमाने के लिए उन्होंने बतौर उद्यमी कई काम शुरू किए और आज वह अपनी फैक्ट्रीज का संचालन करके पूरे परिवार को सम्मानजनक जीवन दे सके हैं. वे अब फिर पत्रकारिता क्षेत्र में सक्रिय हो गए हैं. ब्लाग, वेब, सोशल मीडिया के माध्यम से वह खरी खरी बात कहने लिखने लगे हैं.

विनय ओसवाल जी ने बताया कि उनके घर पर थोड़ी ही देर में नवभारत टाइम्स दिल्ली में कई दशक तक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में कार्यरत रहे हर्षदेव जी आने वाले हैं. हर्षदेव जी का नाम तो मैंने सुन रखा था लेकिन उनसे मुलाकात नहीं हुई थी. जब वो आए तो तुरंत उनका एक वीडियो इंटरव्यू किया, जिसे आप इस लिंक https://www.youtube.com/watch?v=LGArckWHAIU पर क्लिक करके देख सुन सकते हैं.

विनय ओसवाल जी (दाएं) के अलीगढ़ स्थित आवास पर वरिष्ठ पत्रकार हर्ष देव (बीच में) के साथ दोपहर का भोजन.

विनय ओसवाल ने सभी लोगों को दोपहर के भोजन में उत्तर और दक्षिण भारतीय व्यंजन परोसकर दिल जीत लिया. सबने तबीयत से खाया और विनय ओसवाल जी की सेवा भावना और आतिथ्य की सराहना की. मेरे लिए अलीगढ़ की दो दिन की यात्रा यादगार रही. कई नए साथी मिले. कई नए किस्म के अनुभव हुए. लगा कि दुनिया में अच्छे लोग हैं, बस वे बिखरे हैं, उनकी अखिल भारतीय या प्रादेशिक स्तर पर कोई यूनिटी नहीं है. यह भी समझ आया कि उत्तर प्रदेश की राजनीति अगले पांच दस सालों में बड़े बदलाव से गुजरेगी क्योंकि युवाओं के बीच से ऐसे ऐसे लोग सामने आ रहे हैं जो बिना भय खौफ सच कहने और सच को जीने का साहस रखते हैं. थैंक्यू दोस्तों, दो दिन की अलीगढ़ यात्रा के दौरान आप सबने मेरा दिल जीत लिया.

एएमयू के मुख्य द्वार पर यशवंत. तस्वीर : मनोज अलीगढ़ी

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं. उनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.


आयोजन में किन किन का हुआ सम्मान, किसने क्या कहा, संबंधित अन्य तस्वीरें देखने पढ़ने के लिए नीचे क्लिक कर अगले पेज पर जाएं…

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सबसे माफी मांगते अनंत की ओर चले गये नीलाभ जी

Hareprakash Upadhyay : सबसे माफी माँगते हुए अनंत की ओर चले गये नीलाभ जी। बेहद प्रतिभावान-बेचैन, सहृदय लेखक, कवि- अनुवादक! मुझसे तो बहुत नोक-झोक होती थी, मैं उन्हें अंकल कहता था और वे मुझे भतीजा! अंकल! अभी तो कुछ और दौर चलने थे। कुछ और बातें होनी थी। आप तो सबका दिल तोड़ चले गये। पर शिकायतें भी अब किससे और शिकायतों के अब मानी भी क्या! अंकल, हो सके तो हम सबको माफ कर देना। नमन अंकल! श्रद्धांजलि!

Ajit Rai : नीलाभ नहीं रहे। नीलाभ से मेरी पहली मुलाकात तब हुई थी जब मैं 1989 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान में एम ए का छात्र था। सिविल लाइंस मे नीलाभ प्रकाशन के दफ्तर में सार्त्र और कामू के अस्तित्ववाद पर चर्चा करने जाता था। तब वे बीबीसी लंदन से लौटे ही थे। इन 27 सालों में अनगिनत मुलाकातें हैं। अभी पिछले साल हम अशोक अग्रवाल के निमंत्रण पर कुछ दिन शिमला में थे। उनके साथ की तीखी धारदार बहसों से हमे बहुत कुछ मिलता था। वे हमारी यादों मे हमेशा अमर रहेंगे।

Vishnu Nagar : खबर है कि नीलाभ नहीं रहे। कुछ ही दिन पहले उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ के समारोह में देखा था बल्कि पहले उन्होंने मुझे देखा था और जैसा कि वे करते थे अक्सर समकालीनों के साथ व्यंग्योक्ति के साथ मेरा स्वागत किया था। फिर जब कार्यक्रम के बाद लौटने लगा तो वह संसद भवन के सभागार से निकलकर कुछ दूर एक दरवाज़े से टिककर खड़े थे पत्नी के साथ। ध्यान दिया तो उनके दोनो पैर बुरी तरह सूजे हुए थे। मैंने पूछा कि क्या हुआ तो टाल गये। एक मित्र ने बताया कि उनकी दोनों किडनियाँ क्षतिग्रस्त हो गई थीं। मैंने प्रस्ताव किया कि मैं आपको सहारा देकर दरवाज़े तक ले चलूँ तो उन्होंने कहा, नहीं धीरे-धीरे चला जाऊँगा। क्या पता था कि इतनी जल्दी वे नहीं रहेंगे। उनके एक घनिष्ठ मित्र पंकज सिंह सात महीने पहले नहीं रहे थे, अब वे भी नहीं हैं। वे अच्छे कवि तो थे ही, अनुवाद करने में उनका सानी नहीं था। पिछले दिनों मैं उनके विदेशी कविताओं के कुछ अनुवाद पढ़ता रहा हूँ। उन्होंने वर्धा के हिंदी विश्वविद्यालय के लिए हिंदी साहित्य के मौखिक इतिहास पर बहुत अच्छा काम किया था, अपने ढँग का अनूठा मगर उसकी पूरी तरह अनदेखी हो गई, जिससे उनका तो क्या नुक्सान होना था हिंदीजगत का नुक्सान हुआ और होता रहेगा।

हरेप्रकाश उपाध्याय, अजित राय और विष्णु नागर की एफबी वॉल से.

मूल खबर :

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पलाश दा जैसा विद्रोही और उन्मुक्त स्वभाव वाला इंसान 25 साल तक किसी अख़बार में कैसे टिक गया?

जनसत्ता कोलकाता से शैलेंद्र (दाएं) के रिटायरमेंट के दिन उन्हें विदाई देते और यादगार के बतौर तस्वीर खिंचाते पलाश विश्वास (बाएं)

पलाश विश्वास का संस्मरण पढ़ा कि वो एक सप्ताह के अंदर ही रिटायर हो रहे हैं. जनसत्ता में लम्बी अवधि गुजरने के बाद अब वो नौकरी वाली पत्रकारिता से निजात पा जायेंगे. दरअसल   नौकरी वाली पत्रकारिता आपको बाँध कर रखती है. आप अपनी मर्ज़ी से कुछ भी नहीं लिख सकते. आपका पूरा दिमाग और विचार अख़बार के प्रबंधन के पास गिरवी रखा होता है. मुझे तो इस बात पर आश्चर्य हुआ है कि पलाश दा जैसा विद्रोही और उन्मुक्त स्वभाव वाला इंसान 25 साल तक किसी अख़बार में कैसे टिक गया? 1991 में जब मैं अमर उजाला बरेली में उनके साथ काम करता था तब उन्हें अच्छी तरह समझने का अवसर मिला. वह मुझसे सीनियर थे और हम दोनों सेंट्रल डेस्क पर थे. न्यूज़ एडिटर थे इंदु भूषण रस्तोगी. एडिटर अख़बार के मालिक खुद होते थे.

बरेली के एडिटर अशोक अग्रवाल जी थे. लेकिन पूरे यूनिट की जिम्मेदारी राजुल माहेश्वरी जी सँभालते थे. ऑफिस काफी विशाल कैंपस में है. पलाश  दा को मैंने सुबह चार बजे तक सिटी एडिशन निकालते  देखा  है.. पांच-छह लोगों की सेंट्रल डेस्क टीम में मई भी शामिल था. सुनील शाह के अलावा अन्य थे- पंकज जोशी, मनोज मिश्र, देशपाल सिंह पंवार. टीम का हर सदस्य दक्ष था. मनोज पत्रकारिता में एकदम नए थे और नीरवता के साथ उनमे जबरदस्त जुझारूपन था. जब पलाश दा डेस्क प्रभारी होते थे तो वे  सबसे कठिन किन्तु महत्वपूर्ण तार (UNI /PTI  क़ी ख़बरें ) बनाने को मुझे ही देते थे. शाम  सात बजे आने के बाद एडिशन छोड़ने तक उनमे जोश भरा रहता था. रोज़ ही पहले पेज पर कुछ नया करने का जूनून रहता था. यही कारण था कि 1989 में दैनिक जागरण वहाँ से लांच होने के दो साल  बाद भी रफ़्तार नहीं पकड़ पा रहा था. मैंने उनके साथ काम करके बहुत कुछ सीखा.  वामपंथी विचारों से प्रभावित होने के बावजूद वह कभी ख़बरों में अपने विचार हावी नहीं होने देते थे.

क्यों नहीं बन सके संपादक?

अक्सर अशोक अग्रवाल जी शाम 6-7 बजे के बीच कमरे में आ जाते थे और आज की न्यूज़ पूछते थे और कुछ कुछ देश-समाज-शहर की बातें करते थे. बहुधा खबरों को लेकर पलाश दादा उनकी राय से सहमत नहीं होते थे. अशोक जी अपनी राय में तर्क-वितरक पसंद नहीं करते थे. इसी कारण अशोकजी पलाश दा से चिढ़े रहते थे. पलाश दा को मैंने और स्वर्गीय सुनील शाह जी ने कई बार समझाया कि जो अशोक जी कहें, उस पर हां कर दिया करें, बेवजह क्यों हम लोगों को भी उनके कोप का भाजन बनवाते हैं. पलाश जी दो टूक कहते थे कि  मैं अपनी बात कहूंगा, अगर किसी के विचार से सहमत नहीं हूँ तो क्यों कहूं हाँ.  लेकिन ठीक इसके विपरीत पलाश दा अख़बार के दूसरे मालिक स्वर्गीय अतुल माहेश्वरी के अत्यन्त नज़दीक थे. समूचे सम्पादकीय टीम में अतुल जी या तो पलाश दा को या सुनील जी को सबसे ज्यादा अहमियत देते थे. पांच-छह लोगों की सेंट्रल डेस्क टीम में मई भी शामिल था. सुनील शाह के अलावा अन्य थे- पंकज जोशी, मनोज मिश्र, विनोद कापड़ी, देशपाल सिंह पंवार. टीम का हर सदस्य दक्ष था. मनोज और कापड़ी पत्रकारिता में एकदम नए थे. मनोज में लेख लिखने की भारी उत्कंठा थी. अशोकजी के जाने के २ घंटे बाद राजुल जी कमरे में आते थे और न्यूज़ पूछते थे, वे राय तो कुछ नहीं देते थे पर और मामलों में निर्देश जरूर देते थे जैसे कल एडिशन देर से क्यों छूटा, लखनऊ से फलां  खबर क्यों नहीं आई जबकि आज जागरण में है आदि. पहाड़ का एडिशन छूटने के बाद रात 10 -10 ,30 बजे राजुल जी मुझे अपने चैम्बर में बुलाते थे और 20  -25  मिनट तक ऑफिस से लेकर काम-काज की तमाम बातें होती थी. बाद में उनका मुझ पर इतना भरोसा जमा कि बड़े फैसले में भी मेरी राय लेने लगे. परिस्थितयां बदली, अमर उजाला का समूचा ढांचा बदला,  अमर उजाला छोड़ने के 11 साल बाद भी मैंने यह भरोसा आज तक नहीं टूटने दिया. जब उनके कमरे से बाहर आता था तो कोई भी सहयोगी यह नहीं पूछता था कि क्या बात हुई? सभी को मुझ पर बहुत विश्वास था.

पलाश दा अमर उजाला में वह मात्र दो साल ही नौकरी कर सके. कोलकाता से जनसत्ता लांच होने वाला था उन्होंने उसमे अर्जी लगा दी मुझसे और शाह जी से भी अर्जी लगाने  को कहा तो दोनों ने अनिच्छा जता दी. सुनील जी बरेली छोड़कर कही और नहीं जाना चाहते थे क्योंकि नैनीताल में उनकी एस्टेट थी. और  इसी कारण जनसत्ता दिल्ली छोड़कर अमर उजाला आये थे. मैं अपनी पत्नी की वजह से नहीं जाना चाहता था जो वही एक बड़े पब्लिक स्कूल में प्रिंसिपल हो गयी थीं.

जब पलाश दा को जनसत्ता से इंटरव्यू के लिए बुलाया गया तो न्यूज़ एडिटर रस्तोगी जी ने हम लोगो से कहा कि देखना, पलाश दा अपने स्वभाव के कारण वहां एक साल से ज्यादा नहीं टिक पाएंगे. हम लोगों ने उनकी बात से इत्तेफ़ाक़ भी किया. अब जब दो दिन पहले उनका संस्मरण पढ़ा तो निश्चित तौर पर उस घटना की याद आ गयी जब हम लोग उनके कही भी ज्यादा दिन न टिक पाने की सम्भावना जता  रहे थे. पलाश दा के किसी अख़बार में 25 साल तक काम करने की घटना को  चमत्कारिक  कहा जायेगा.

मैं यह बात इसीलिए भी कह रहा हूँ कि पलाश दा एक बेहद योग्य और खबरों की विस्तृत समझ वाले इंसान हैं. उनमे टीम को लीड करने की अपार  क्षमता है लेकिन समस्या बस वही है कि वे विद्रोही प्रवृति के कारण अख़बारों के मालिकान के कृपापात्र नहीं बन सकते और बने भी नहीं.

मैंने तो ऐसे- ऐसे ढीठ और अज्ञानी किस्म के संपादक/समूह संपादक  देखे हैं जिनमे पत्रकारिता के अंशमात्र गुण नहीं होते, उनमे जो कुछ दीखता है वह ईंट भट्टा के ठेकेदार  का दूसरा रूप ही है.  ग्वालियर में मैं दो ऐसे संपादक के साथ काम कर चूका हूँ जो ठीक से चार वाक्य भी नहीं लिख सकते हैं. बस अपने आका की कृपा से संपादक की कुर्सी का सुख भोग रहे हैं. दोनों चीफ सब पद योग्य भी नहीं हैं. इन सम्पादकों के ऐसे-ऐसे कृत्यों की घटनाएं मेरे जेहन में हैं जिसे सुनने पर लोग सिर पीट लें. कई और सम्पादकों को नज़दीकी से जानता हूँ, कोई लड़कियों का प्रेमी है तो कोई धन वसूली का, 90 फीसदी संपादक अपनी योगयता की बदौलत नहीं, अपने आका को खुश करके बने रहते हैं. यही वजह है कि जब आका बदलते हैं तो उनकी भी कुर्सी खिसक जाती है. अब आप बताईये, उधमसिंह नगर (उत्तराखंड) के दिनेशपुर गांव निवासी पलाश दा इसमें कहाँ से फिट बैठेंगे?

जब एनडी तिवारी ने जागरण से निकालने को कहा

मुझे एक घटना याद है. अमर उजाला में आने से पहले पलाश दा दैनिक जागरण मेरठ में कार्यरत थे. 1990  के पहले की बात है. एक बार उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री  नारायण दत्त तिवारी के खिलाफ कोई लेख लिख दिया था. श्री तिवारी इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने जागरण के मेरठ प्रभारी (मालिक) धीरेंद्र मोहन को फ़ोन कर पलाश दा को निकाल देने को कहा. मालिक दबाव में आ गए. इस बीच किसी ने श्री तिवारी को बताया कि पलाश दा को नाराज़ करने का मतलब है पुरे दिनेशपुर और आसपास गांव के बंगालियों को नाराज़ करना. इन गाँवो में हज़ारों बंगाली हैं जो देश के विभाजन के समय पाकिस्तान से यहाँ आकर बसे थे. और श्री तिवारी का विधानसभा चुनाव क्षेत्र भी यही है. अगर बंगाली भड़क  गए तो उनका जीतना मुश्किल हो जायेगा.   श्री तिवारी को गलती का अहसास हुआ और धीरेंद्र मोहन को पुनः फ़ोन करके कोई कदम न उठाने का कहा. बाद में पलाश दा का मन इतना खट्टा हुआ कि उन्होंने जागरण छोड़ ही दिया.

अप्रकाशित पड़ी हैं कहानियां

पलाश दा को कहानी लिखने का शौक है लेकिन उनकी कहानी जो प्रकाशक एक बार छाप देता है तो दोबारा कहानी से कुछ शब्द निकालने की शर्त पर ही छापने को तैयार होता है. उनकी कहानी होती तो शुद्ध पारिवारिक और सामाजिक है पर उसमे कही एक-दो जगह आपको ऐसे नॉन वेज शब्द मिल जायेंगे जो अश्लील से कम नहीं हैं. पलाश दा कहते हैं शब्द कहानी की आत्मा है, इसे हटाने पर मूलता ख़त्म हो जाएगी, जहाँ जैसा भाव वहां वैसा शब्द. 3-4 साल पहले एक बार फ़ोन पर उन्होंने मुझे बताया था कि सैकड़ों कहानिया अप्रकाशित पड़ी हैं, इलाहाबाद का कोई प्रकाशक बताईये जो इस संग्रह को छाप दे. मैंने कहा कि क्या कोलकाता में प्रकाशक नहीं हैं, तो बोले, हैं तो पर अपनी शर्त लगाते हैं जो मुझे मंज़ूर नहीं. मैंने कहा कि तो क्या इलाहाबाद के प्रकाशक बिना शर्त लगाए छाप देंगे? आप क्यों नहीं कहानी से नॉन वेज शब्दों को निकाल देते? पलाश दा बोले, पंडितजी देखना कोई न कोई तो मिल ही जायेगा. रिटायर्ड होने के बाद पलाश दा गांव लौंटेंगे कि कोलकाता में ही बसेंगे, मुझे नहीं पता. हाँ दोनों जगह उनके पास बहुत कुछ है करने के लिए, वह ख़ाली नहीं बैठेंगे.

वह रीता बहुगुणा नहीं, कुमुदिनी पति थीं.

भड़ास में पलाश दा ने अपने संस्मरण में लिखा है कि रीता बहुगुणा PSO की थी जो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की उपाध्यक्ष  बनी. मैं बता दूँ कि वह रीता बहुगुणा नहीं बल्कि कुमुदिनी पति थीं. कुमुदिनी PSO की सक्रिय नेता थीं और छात्र संघ उपाध्यक्ष पद का चुनाव लड़ी, भरी मतों से जीतीं. रीता बहुगुणा कभी छात्र राजनीति में सक्रिय नहीं रहीं. कुमुदिनी ने बाद में CPI (ML ) के महासचिव विनोद मिश्र (अब स्वर्गीय) से शादी कर ली थी. वह इसी यूनिवर्सिटी  के तत्कालीन प्रो-वाईस चांसलर प्रो. टी पति की  बेटी हैं.

लेखक इंद्र कांत मिश्र से संपर्क 9827434787 या heritagemental@yahoo.in के जरिए किया जा सकता है.


पलाश विश्वास का वो संस्मरण पढ़िए जिसका जिक्र इंद्र कांत मिश्र ने अपने उपरोक्त आलेख में किया है… नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें…

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संस्मरण : उस समय मैं जालंधर के एक अखबार में सब एडिटरी करता था…

बादशाहत सबकी सलामत रहे ! हालांकि अब बादशाहों, राजाओं का जमाना नहीं रहा, लेकिन मेरा दिल नहीं मानता। ये आज भी होते हैं और विभिन्न रूपों में हर जगह मौजूद हैं। मन के राजा, मन के बादशाह, मन के शेर…। वन टू का फोर करने वालों से लेकर कर्ज उठाकर अय्याशी करने वालों तक। बात कोई दो दशक पुरानी है। उस समय मैं जालंधर के एक अखबार में सब- एडिटरी करता था। रोज सहयोगी पत्रकार मित्र के साथ साइकिल पर पीछे बैठ कर कार्यालय जाता और रात को उसी तरह लौटता।

दफ्तर में भीगी बिल्ली बना रहने वाला यह मित्र जब साइकिल चला रहा होता तो एकदम नए रूप में आ जाता। उसकी छाती चौड़ी हो जाती और आंखें रोब से मत्थे चढ़ आतीं। पैदल चल रहे लोगों और सुस्त रिक्शे वालों को वह इस तरह फटकारते हुए निकलता जैसे सारी सड़क का वह अकेला वारिस है। साइकिल की रफ्तार से भी अधिक तीव्रता से वह ठेठ पंजाबी गालियां बिखेरता हुआ चलता, जिस कारण मुझे हर समय उसके साथ पिटने का भय बना रहता।

एक दिन फुर्सत में मैंने मित्र से पूछ ही लिया, “भाई! जब आप साइकिल चला रहे होते हैं तो राह चलतों को इस तरह गालियां क्यों देने लगते हो।”

मित्र ने जो तर्क दिया वह हैरान कर देने वाला था। उसने कहा, “गालियां देने से मेरा आत्मविश्वास बढ़ता है, एहसास होता है कि हम भी कुछ हैं…, किसी से कम नहीं हैं… दिल को इससे बड़ी राहत सी मिलती है।”

मेरा हैरान होना स्वाभाविक था। मेरे लिए यह एकदम नया ज्ञान था। ज्ञान भी क्या… बस ऐसे ही एक नया अनुभव सा था। मन ही मन कहा, “बच्चू ! जिस दिन किसी से पिट गया ना, सारी हेकड़ी छूमंतर हो जाएगी। …सुधर जाओगे।”

ऐसे ही समय बीतता गया। एक दिन अखबार की गाड़ी (ट्रक) द्वारा घर (शिमला) जाने का कार्यक्रम बना। आज गाड़ी बाया लुधियाना- चंडीगढ़ होते हुए जानी थी। रात करीब 12 बजे अखबार के बंडल लोड होने के बाद गाड़ी चली। चालक के साथ मैं, एक अन्य व्यक्ति और एक कंडक्टर (क्लीनर) बैठे थे। क्लीनर, एक 18-19 वर्ष का दुबला सा लड़का, कमाल का गालीबाज। सामने पड़ने वाले वाहनों को देखते ही उसके मुंह से अश्लील गालियों की बौछार होने लगती। अक्सर खिड़की से आधा बाहर लटक कर वाहन चालकों को ललकारते हुए इस कदर मां- बहन की गालियां देने लगता कि मैं और मेरा सहयात्री मारे शरम के सीट में गड़ने को हो जाते। चालक चुपचाप मूछों ही मूछों में मुस्कुराता रहता।

शायद लुधियाना पहुंचने से पहले या बाद में रेलवे का एक फाटक पड़ा, सारा ट्रैफिक कुछ समय के लिए रोकना पड़ गया। लेकिन क्लीनर को यह कतई मंजूर नहीं था। वह ललकार भरते हुए तुरंत खिड़की से कूदा और तेजी से हाथ हवा में लहराते हुए फाटक की ओर बढ़ चला। ट्रक में बैठे ऊंघते हुए हमने देखा- …कुछ ही दूर सामने सड़क पर गाड़ियों की हेडलाइटों के कारण एक स्टेज जैसा बन गया है। स्टेज पर क्लीनर बदहवास हवा में हाथ लहराते हुए सबको ललकार रहा है। इस कुव्यवस्था को वह तुरंत खड़े- खड़े हल कर देना चाहता है…। कुछ ही क्षण में स्टेज पर सीन बदलता नजर आया। अभिनय के लिए तीन- चार अन्य पात्र स्टेज की ओर बढ़े, …अरे, यह क्या? ये सभी एक साथ हीरो (क्लीनर) पर टूट पड़े…। 

ट्रक में बैठे सहयात्री ने लगभग चीखते हुए कहा, “अरे, क्लीनर की पिटाई हो रही है…।”

हम दोनों ने एक साथ चालक की ओर प्रश्नवाचक नजरों से देखा। चालक ने अपना माथा पीटते हुए कहा, “इसदा आज दिन ई माड़ा ए, सबेर तों लैके तिज्जी बारी पिट चुकया ए।” (इसका आज दिन ही बुरा है, सबेरे से लेकर तीसरी बारी पिट चुका है।)

इसी बीच रेलगाड़ी लाइन क्रास कर गई और फाटक भी खुल गया। ट्रैफिक में हरकत शुरू हो गई। क्लीनर लौट आया था। किसी ने भी उससे बात नहीं की। कनखियों से उसकी हालत का जायजा लिया, ठुकाई ठीक ठाक हो रखी थी। ट्रक तेज गति से दौड़ रहा था, लेकिन क्लीनर बिल्कुल चुपचाप बैठा था। रह रह कर अपने शरीर को सहला लेता था।   

ट्रक अभी पांच- सात किलोमीटर ही आगे बढ़ा होगा कि मेरी हैरानी का कोई ठिकाना नहीं रहा। क्लीनर फिर से अपने असली रूप में लौट आया। उसका वही खिड़की से आधा बाहर लटक कर अश्लील गालियां देना और हवा में हाथ लहराते हुए वाहन चालकों को ललकारना, सभी कुछ पहले जैसा। अभी-अभी हुई पिटाई की चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं।

मैं हैरान मुंह बाये उसे देखता रह गया। चालक मूछों ही मूछों में मंद मंद मुस्करा रहा था।

उसी समय मेरा दिल किया कि जोर से क्लीनर की पीठ थपथपाऊं और कहूं, “शाब्बाश! तू ही है सड़क का असली बादशाह। तेरी बादशाहत सदा सलामत रहे।” लेकिन मैंने ऐसा किया कुछ नहीं।

लेखक एच. आनंद शर्मा himnewspost.com के संपादक हैं. उनसे संपर्क h.anandsharma@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. 

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एक बार कमला पति त्रिपाठी के कहने पर हेमवती नंदन बहुगुणा भांग खा कर चित भी हुए थे

Rajiv Nayan Bahuguna : दरअसल इंदिरा गांधी और हेमवती नन्दन बहुगुणा में सन्देह के अंकुर 10 साल पहले ही पनप चुके थे, जिन्हें उनके उद्दंड, दबंग और अशिष्ट पुत्र संजय गांघी ने बाद में खाद पानी दिया। 1971 में कांग्रेस की शानदार जीत के उपरान्त बहुगुणा को उम्मीद थी कि पार्टी विभाजन और फिर राष्ट्र पति के विकट चुनाव में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के चलते इंदिरा गांधी उन्हें केंद्र में ताक़तवर मंत्री बनाएंगी। लेकिन उन्हें मात्र संचार राज्य मंत्री बनाया गया, वह भी अधीनस्थ। क्योंकि वह पहली बार सांसद बने थे। इससे रूठ कर बहुगुणा कोप भवन में चले गए और 15 दिन तक चार्ज नहीं लिया। हार कर और कुढ़ कर इंदिरा गांधी ने उन्हें मंत्रालय का स्वतन्त्र चार्ज तो दे दिया पर मन में गाँठ पड़ गयी। इधर बहुगुणा भी अपनी बड़ी भूमिका की तलाश में थे, जो नियति ने उन्हें प्रदान कर दी।

उत्तर प्रदेश के धोती धारी महंत किस्म के बूढ़े मुख्य मंत्री कमला पति त्रिपाठी बुरी तरह फेल हो चुके थे। पुलिस वाले हड़ताली बन अपने हथियारों समेत सड़कों पर थे। यह एक अभूतपूर्व स्थिति थी। ऐसे में इंदिरा गांधी के चाटुकार एवं विश्वास पात्र ज्ञानी ज़ैल सिंह ने बहुगुणा को प्रदेश की कमान सौंपने की सलाह दी। इंदिरा ने आशंका व्यक्त की कि यह जगजीवन राम का आदमी है। इस पर बुद्धिमान चाटुकार दरबारी ने उत्तर दिया कि हम सत्ता के लोभी राजनेता किसी के नहीं होते। आप इसे मुख्य मंत्री बना दो, तो तुरन्त आपका बन जाएगा। उधर कमला पति त्रिपाठी एक घोर जातिवादी नेता थे। उन्हें लगता था कि प्रदेश की ब्राह्मण विरोधी लॉबी ने उन्हें हटवाया है। पद से हटने पर वह आहत तथा अपमानित महसूस कर रहे थे, तथा अपनी जगह अपनी पसन्द का मुख्य मंत्री चाहते थे। लेकिन उनकी हालत केले के छिलके पर रपट पड़े उस बूढ़े जैसी दयनीय और हास्यास्पद थी, जो खुद उठ न पा रहा हो। बहुगुणा अपने पिता के सिवा सिर्फ उन्हीं के पैर छूते थे।

दोनों के पुराने रिश्ते थे। एक बार त्रिपाठी के कहने पर बहुगुणा भांग खा कर चित भी हुए थे। अतः उन्होंने भी बहुगुणा की सिफारिश की। ऐसा कर दिया गया। बहुगुणा ने आते ही प्रदेश के हालात सम्भाले और छह महीने बाद प्रदेश में अधमरी हो चुकी कांग्रेस को चुनाव भी जिता दिया। यहां तक कि प्रदेश में विपक्ष के महान दिग्गज चन्द्र भानु गुप्त की छल बल से ज़मानत भी ज़ब्त करवा दी। चन्द्र भानु गुप्त उनसे पूछते थे- रे नटवर लाल, हराया तो ठीक, लेकिन ज़मानत कैसे ज़ब्त करायी मेरी, यह तो बता। बहुगुणा का जवाब था- आपकी ही सिखाई घातें हैं गुरु देव। मैंने भी बहुत बाद में एकाधिक बार उनसे यह रहस्य जानना चाहा। “तुम्हें कभी यह अवश्य बताऊंगा”, उनका जवाब होता, लेकिन उससे पहले वह मर गए।

वरिष्ठ पत्रकार और रंगकर्मी राजीव नयन बहुगुणा के फेसबुक वॉल से.

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