जज लोया प्रकरण : रिव्यू पिटिशन होगा दाखिल, न्याय की जंग जारी

मुंबई से दबंग दुनिया अखबार के संपादक उन्मेष गुजराथी की रिपोर्ट…

सुप्रीम कोर्ट ने जज बृजगोपाल लोया की मौत की एसआईटी से जांच करवाने की मांग को खारिज कर दिया है, लेकिन इसके बावजूद न्याय की जंग जारी है। सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले की जांच कर रहे सीबीआई के विशेष जज बृजगोपाल हरकिशन लोया को न्याय दिलाने के लिए रिव्यू पिटिशन दाखिल की जाएगी। बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन की ओर से याचिका देने वाले वकील अहमद आब्दी ने कहा है कि न्याय के लिए रिव्यू पिटिशन दाखिल करेंगे। गौरतलब है कि महाराष्ट्र सहित देश की जनता जज लोया की संदिग्ध मौत के मामले को बहुत गंभीरता से ले रही थी।

जज लोया की स्वतंत्र जांच को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर राजनीति गरमा गई है। भाजपा की ओर से कांग्रेस पर जोरदार निशाना साधा जा रहा है, जबकि सच तो यह है कि जज लोया पूरे देश के थे और उनके न्याय की चिंता आम जनता को भी थी। इस मामले में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने जज लोया की स्वतंत्र जांच का सबसे अधिक विरोध किया था।

ज्ञात हो कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जज लोया मौत की एसआईटी जांच की मांग वाली याचिका में कोई दम नहीं है, कोर्ट ने इस याचिका में कोई तर्क नहीं पाया है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने एसआईटी से जांच करवाने की मांग को खारिज करने का फैसला सुनाया है।

बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन की ओर से याचिका दायर करने वाले वकील अहमद आब्दी का कहना है कि उन्हें इस फैसले से मायूसी हुई है। उन्होंने कहा कि याचिका के पीछे कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं था। उन्होंने कहा कि फैसला पढ़ने के बाद वे रिव्यू पिटिशन दाखिल करेंगे।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र के लातूर शहर के बार एसोसिएशन ने लोया की मौत की जांच को लेकर एक न्यायिक आयोग के गठन की मांग की थी। 4 जनवरी 2018 को बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन ने जज लोया की मौत की परिस्थितियों की जांच के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की थी। इसके अलावा सामाजिक कार्यकर्ता तहसीन पूनावाला ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाल दी थी।

वहीं इस मामले में महाराष्ट्र के पत्रकार बंधू राज लोन ने भी स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाली थी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने मुंबई हाई कोर्ट में लंबित लॉयर्स एसोसिएशन की याचिका को भी ट्रांसफर करवा लिया और सारी याचिकाएं मिलाकर एक मामला बना दिया था। अब इस फैसले से सभी याचिकाकर्ताओं में मायूसी है।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से जज लोया की स्वतंत्र जांच की मांग खारिज करने के बावजूद इस मामले से जुड़े कई सवाल अनुत्तरित रह गए। जज लोया के परिजन ने जो एक पत्रिका के माध्यम से लोया की हत्या होने का संदेह जताया था, उन सवालों का कोई जवाब नहीं मिल पाया। इसके अलावा भी कई तरह के संदेह थे, जिनको लेकर समाजसेवियों के मन में कई प्रश्न थे। सबसे महत्वपूर्ण तो यह था कि इस मामले में देश की आम जनता, जवाब चाह रही थी।

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण कहते हैं- मेरी राय में ये एक बहुत ही गलत फैसला हुआ। सुप्रीम कोर्ट के लिए यह एक काला दिन है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने बजाय इसके कि एक स्वतंत्र जांच हो जाए, जब इतने सारे संदेह हो गए थे, जज लोया के मौत के ऊपर पर्दा डालने का काम किया है। लोया के परिवार ने बोला था कि उनके कपड़ों पर खून के निशान थे, लेकिन उसकी भी कोई जांच नहीं कराई गई। ये सवाल भी उठा था कि तीन जज, दो बिस्तर के एक कमरे में रात में कैसे सोए और क्यों सोए, जबकि उस गेस्ट हाउस में कई और कमरे थे जो कि खाली थे। इस कहानी की भी जांच होनी चाहिए थी।

पूर्व जज बीजी कोलसे पाटिल का कहना है- ‘‘जो काम जांच एजेंसी को करनी चाहिए थी, वह सुप्रीम कोर्ट ने क्यों किया? यह गलत फैसला है। यह फैसला न्यायपालिका के ऊपर कलंक है।”

लेखक उन्मेष गुजराथी दबंग दुनिया अखबार के मुंबई एडिशन के संपादक हैं.

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