अगरतला मेडिकल कालेज के छात्रों ने पांच फोटो जर्नलिस्‍टों को पीटा

अगरतला के सरकारी मेडिकल कालेज अस्पताल के छात्रों ने फोटो खींच रहे पांच फोटो जर्नलिस्‍टों की पिटाई कर दी. पुलिस ने बताया कि यह घटना शुक्रवार को उस समय हुई जब फोटो जर्नलिस्‍ट एक महिला की मौत के बाद अस्पताल के अंदर तस्वीरें ले रहे थे. महिला के रिश्तेदारों ने अस्पताल के कर्मचारियों पर लापरवाही बरतने का आरोप लगाया और फोन पर मीडिया को इस बारे में सूचना देकर अस्‍पताल में बुलाया.

पुलिस ने कहा कि पत्रकारों की उपस्थिति देखकर छात्र गुस्से में आ गये और उन्होंने फोटो पत्रकारों की पिटाई करते हुए अस्पताल के सामने खड़ीं कई कारों और मोटर साइकिलों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया और उन पर पेट्रोल से भरी बोतलें फेंकी. पुलिस और अर्धसैनिक बलों के मौके पर पहुंचने के बाद स्थिति को नियंत्रण में किया जा सका. घायल फोटो पत्रकारों को बाद में अन्य अस्पतालों में भर्ती कराया गया और उन्हें इलाज के बाद छुट्टी दे दी गई.

अगरतला प्रेस क्लब के एक प्रतिनिधिमंडल ने स्वास्थ्य मंत्री तपन चक्रवर्ती और सूचना एवं उच्च शिक्षा मंत्री भानू लाल साहा से मुलाकात करके हमले में शामिल छात्रों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की. प्रेस क्लब के सचिव सुजीत चक्रवर्ती ने कहा कि मंत्रियों ने आश्वासन दिया है कि घटना की जांच कराई जाएगी. जांच के बाद दोषी पाए गए लोगों पर कार्रवाई की जाएगी.

मीडिया में औसत दर्जे के पत्रकार बड़ी संख्‍या में हैं : काटजू

हैदराबाद। भारतीय प्रेस परिषद् के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने पत्रकारों के लिए न्यूनतम योग्यता तय करने के लिए एक पैनल बनाने के अपने फैसले को सही ठहराया है। उन्होंने कहा कि इसका मकसद मीडिया पर लगाम कसना नहीं, बल्कि इसके स्तर में सुधार लाना है। उन्होंने कहा कि ऐसा करने बेहद जरूरी है, क्योंकि औसत दर्जे के पत्रकार बड़ी संख्या में हैं।

पीसीआई के अध्यक्ष ने कहा, 'औसत दर्जे के पत्रकार बड़ी संख्या में हैं और पत्रकारिता की गुणवत्ता गिरी है। इसलिए हमने परिषद् के सदस्य श्रवण कुमार गर्ग के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया है, जो बदली परिस्थितियों में पत्रकारों के लिए न्यूनतम योग्यता का सुझाव देगी।' काटजू ने कहा कि पत्रकारिता में कई तरह की विशेषज्ञात होती है, इसलिए एक न्यूनतम योग्यता की जरूरत है।

गर्ग ने कहा कि समिति देश में विभिन्न पत्रकारिता संस्थानों की गुणवत्ता पर भी गौर करेगी, क्योंकि फिलहाल उन पर कोई नियंत्रण नहीं है। काटजू ने कहा, 'समिति जल्द ही अपनी अनुशंसाएं सौंपेगी। पीसीआई अनुशंसाओं का अध्ययन करेगी और अगर जरूरत पड़ी तो संशोधन में सुझाव देगी। इसके बाद वह भारत सरकार को रिपोर्ट सौंपेगी जिसके आधार पर संसद कानून पारित कर सकती है या इसे खारिज कर सकती है।' उन्होंने कहा कि न्यूनतम योग्यता का विचार मीडिया पर लगाम कसना नहीं है बल्कि इसके स्तर में सुधार लाना है। पीसीआई प्रमुख ने कहा कि पत्रकारों की कार्य स्थिति काफी खराब है और उनका वेतन भी अच्छा नहीं है। (भाषा)

शिलान्‍यास का श्रेय लेने के लिए दो गुटों में बंटे काशी के पत्रकार

गिलट बाजार स्थित पत्रकारपुरम में अगले रविवार को होने वाले पंडित ईश्वरदेव मिश्र सामुदायिक भवन शिलान्यास समारोह को लेकर काशी पत्रकार संघ दो फाड़ हो गया है। इस समारोह का आयोजन पत्रकारपुरम आवासीय समिति की ओर से किया जा रहा है जिसमें काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष कृष्णदेव नारायण राय के अलावा उत्तर प्रदेश जर्ननिस्ट यूनियन (उपजा) की स्थानीय इकाई का सहयोग मिल रहा है, जबकि इस कार्यक्रम को लेकर काशी पत्रकार संघ के महामंत्री राजेंद्र रंगप्पा तथा पूर्व अध्यक्ष योगेश कुमार गुप्त अलग-थलग पड़ गये हैं।

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व इसी पत्रकारपुरम में हाल ही में हुए पत्रकारपुरम आवासीय योजना लोकार्पण समारोह को लेकर पत्रकार दो खेमों में बंट गये थे। उस कार्यक्रम के आयोजन से पूर्व पत्रकारपुरम के प्लॉट आवंटी पत्रकारों को विश्वास में नहीं लिया गया था जिससे उनमें काफी क्षोभ था। इस आयोजन का श्रेय लेने वालों में राजेंद्र रंगप्पा और योगेश गुप्त शामिल थे। स्वर्गीय पंडित ईश्वरदेव मिश्र बनारस के जाने-माने पत्रकार हुआ करते थे। लोग उन्हें संपादक जी कहा करते थे। उन्हीं की स्मृति में पत्रकारपुरम में बनने वाले सामुदायिक भवन का शिलान्यास अगले रविवार यानी सात मार्च को होना है। इसमें मुख्य अतिथि समाजवादी पार्टी के मुखिया व पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव होंगे।

इस कार्यक्रम का आयोजन कराने वाली पत्रकारपुरम आवासीय समिति की ओर से जो निमंत्रण पत्र (कार्ड) लोगों को भेजा गया है उसपर निवेदक के रूप में समिति के संयोजक विकास पाठक व धर्मेंद्र सिंह, अध्यक्ष चेतन स्वरूप, महामंत्री राकेश चतुर्वेदी के अलावा काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष कृष्णदेव नारायण राय और उपजा की स्थानीय इकाई के अध्यक्ष विनोद सिंह बागी के नाम छपे हुए हैं। दरअसल योगेश गुप्त के सामने सबसे बड़ी चुनौती काशी पत्रकार संघ की आड़ में अपनी पहचान को बनाये रखना है। यही वजह है कि वो पिछले दिनों पत्रकारपुरम आवासीय योजना लोकार्पण समारोह के आयोजन से एक संयोजक के रूप में जुड़े हुए थे। संघ में चार साल अध्यक्ष, चार साल महामंत्री और चार साल कोषाध्यक्ष रहने के बाद भी उनका संघ प्रेम शायद इसीलिए कम नहीं हो रहा है। जहां तक राजेंद्र रंगप्पा का सवाल है तो उनका पहले से ही भगोड़ा स्वभाव रहा है। बहरहाल सात मार्च को होने वाले पंडित ईश्वरदेव मिश्र सामुदायिक भवन शिलान्यास समारोह से इन दोनों को दूर ही रखा गया है।

दरअसल इस सामुदायिक भवन का शिलान्यास बहुत पहले ही हो जाना चाहिये था लेकिन प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के चलते यह काम अधर में लटक गया था। इस भवन के निर्माण के लिए पत्रकारपुरम आवासीय समिति के संयोजक विकास पाठक ने करीब एक दशक पूर्व से ही प्रयास करना शुरू कर दिया था। उस समय वो काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष थे। श्री पाठक के अनुसार शिलान्यास समारोह के मुख्य अतिथि समाजवादी पार्टी के मुखिया एवं पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव होंगे। श्री पाठक ने बताया कि वर्ष 2005 में बेनियाबाग के मैदान पर हुई एक रैली में मुलायम सिंह यादव ने हम लोगों की मांग पर पंडित ईश्वरदेव मिश्र सामुदायिक भवन के निर्माण के लिए 50 लाख रुपये देने की घोषणा की थी। लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद प्रदेश की सत्ता बदल गई जिसके चलते यह काम लटक गया। इसी बीच काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष के रूप में मेरा कार्यकाल भी खत्म हो गया। इसके बाद संघ के पदाधिकारियों की जो नई टीम आई वह उस घोषित धनराशि को नहीं ले सकी। अब प्रदेश में फिर से सपा की सरकार आ गई है जो मुलायम सिंह यादव द्वारा घोषित 50 लाख रुपये की राशि को देने के लिए तैयार हैं। (क्‍लाउन टाइम्‍स)

6 मई को लखनऊ में याद किए जाएंगे दिग्‍गज पत्रकार

बंधुवर, हमारे बीच अनेक ऐसे पत्रकार हुए हैं जिनकी कलम का सामाजिक व राजनीतिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। समय की गति और प्रकृति की नियति से आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी स्मृतियाँ हमारे ज़ेहन में हैं जो हमें अक्सर लोक सरोकारों के लिए उन्मुख होने को प्रेरित करती हैं।

इसके तहत सर्वश्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह, पंडित विनोद शुक्ल, पद्मश्री वचनेश त्रिपाठी, अखिलेश मिश्र, वीरेन्द्र सिंह, घनश्याम पंकज, पंडित शिव कुमार (एसके) त्रिपाठी, डा. सदाशिव द्विवेदी, मोहम्मद अब्दुल (एमए) हफीज, श्रीप्रकाश शुक्ल, ओसामा तलहा, जयप्रकाश शाही, ज़ावेद अंसारी और सियाराम शरण त्रिपाठी की सृजनशील स्मृतियों को प्रणाम करने के लिए सर्वप्रथम और जर्नलिस्ट्स फोरम के संयुक्त तत्वावधान में 6 मई, सोमवार को होटल लिनिइज, विराज खंड, गोमती नगर, लखनऊ के सभागार में अपरान्ह तीन बजे से एक शाम-अग्रजों के नाम, स्मृति समारोह आयोजित है। इसमें प्रदेश और देश के अनेक वरिष्ठ व प्रखर पत्रकार तथा वरिष्ठतम राजनीतिज्ञ सम्मिलित होंगे।

ताकि सनद रहे की भावना के तहत अपने अग्रजों की मार्गदर्शक स्मृतियों को संजोने के लिए इस अवसर पर एक पत्रिका स्मृति-शेष का प्रकाशन किया जाएगा। आपसे विनम्र निवेदन है कि स्मृति-शेष के लिए शुभकामना और स्मरणीय मार्गदर्शक आलेख के साथ अग्रजों के उपलब्ध चित्र भी pmatsya1965@rediffmail.com पर 15.04.2013 तक उपलब्ध कराने की कृपा करें। स्मृति समारोह बिंदास जिंदगी के पर्याय फक्कड़ पत्रकार जयप्रकाश शाही के मित्रों की ओर से आयोजित है। अन्य सभी लोगों से केवल मार्गदर्शन और आशीर्वचन अपेक्षित है।

आभार के साथ,

धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव      

कार्यकारी सम्पादक, सर्वप्रथम

संयोजक, स्मृति समारोह

रपड़ा कांड में कोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला, 16 आरोपियों को उम्र कैद

: छह लोगों की मुकदमें सुनवाई के दौरान मौत, 36 गवाहों ने दी गवाही, एक अभियुक्त बरी : शाहजहांपुर। 23 साल पहले पूरे प्रदेश को हिलाकर रख देने वाले रपड़ा कांड का आज कोर्ट ने फैसला सुना दिया। एडीजे-6 सुरेश चंद्र सैनी ने चार लोगों के सामूहिक हत्याकांड में 16 अभियुक्तों को उम्रकैद की सजा सुनाई। इस जघन्य हत्याकांड में 23 अभियुक्तों के खिलाफ मुकदमा चला। जिनमें से छह लोगों की मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही मौत हो गई। एक अभियुक्त को कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। कोर्ट ने सभी पर पचास-पचास हजार रुपये का जुर्माना भी बोला है, जिसका 60 फीसदी मारे गए लोगों के परिजनों को दिए जाने के आदेश दिए हैं।

यह चैहरा हत्याकांड थाना जैतीपुर (अब थाना गढि़या रंगीन) थाना क्षेत्र के रपड़ा गांव में 14 जुलाई 1990 को हुआ था। वह शनिवार का दिन था, जो उस गांव के लिए काला साबित हुआ। एफआईआर के अनुसार 14 जुलाई को गांव के राजेश्वर सिंह अपने भाई ओमेंद्र सिंह व परिजन धनपाल और नत्थूसिंह के साथ घर में बैठा था। तभी हथियारबंद लोगों ने हमला कर दिया। हमलावरों ने लूटपाट व फायरिंग करते हुए राजेश्वर, ओमेंद्र, धनपाल व नत्थू को पकड़ लिया और घसीटते हुए ले गए। फायरिंग में गांव का शिवदास और रामपाल की बेटी राजेश्वरी छर्रे लगने से घायल हुई थी। हमलावरों ने चारों लोगों की हत्या कर लाश को बहगुल नदी में बहा दिया। इस घटना ने जिले ही नहीं, पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था। पुलिस ने 15 जुलाई को रपड़ा के राजकिशोर सिंह पुत्र भगवान सिंह की ओर से मावड़ गांव के रामसिंह, नौवत, एबरन, अभिलाख, बनवारी, ननकू, सत्यपाल, बुद्धन, बरी प्रसिद्धपुर के कलुआ, मंगू, रामकिशन, बांके, जगदीश, ओमकार, रामकुमार, नगला देहात माली के ऋषिपाल व रामभरोसे, जलेबी नगला के रघुराई, नरसिंह, निहालुद्दीन और बदायूं जिले के थाना हजरतपुर अंतर्गत ग्राम कुड़रा निवासी नेत्रपाल, झंडू व श्रीकृष्ण के खिलाफ धारा 395, 396, 397, 427, 364, 201, 302, 307, 436, 412 आइपीसी व 27 आर्म्‍स एक्ट के तहत रिपोर्ट दर्ज की थी। विवेचना के बाद पुलिस ने चार्जशीट न्यायालय में प्रस्तुत कर दी।

23 साल तक चली लंबी सुनवाई के दौरान छह अभियुक्तों रामसिंह, नौवत, एबरन, ननकू, रामकुमार व झंडू की मौत हो गई। मुकदमे में 36 गवाहों ने गवाही दी। वादी और बचाव पक्ष को सुनने के बाद एडीजे-6 सुरेश चंद्र सैनी ने सरकारी वकील मनफूल सिंह वर्मा के तर्कों से सहमत होते हुए 16 अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। एक अभियुक्त नगला देहात के रामभरोसे को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। एडीजे ने सभी अभियुक्तों पर पचास पचास हजार रुपयें का जुर्माना भी बोला। सत्यापाल, बुद्धपाल, बनवारी और ऋषिपाल पर तीन-तीन हजार रुपयें का अतिरिक्त जुर्माना बोला। इसमें साठ फीसदी रकम मारे गए लोगों के परिजनों को देने के आदेश दिए गए हैं। इस चैहरे हत्याकांड की वजह खून का बदला खून थी। बरी प्रसिद्धपुर का रामचरन यादव रपड़ा गांव में रहता था। 1990 में जाड़ों के दिनों में रामचरन यादव की हत्या कर दी गई। रामचरन की हत्या का आरोप गांव के ठाकुर धनपाल, नत्थूसिंह, राजेश्वर सिंह व ओमेंद्र सिंह पर था। उसी की हत्या का बदला लेने के लिए 14 जुलाई को उन चारों की हत्या कर दी गई।

रपड़ा कांड में 16 को उम्र कैद और पचास-पचास हजार रुपयें के जुर्माने की सजा सुनाई गई है। हमे उम्मीद थी कि इस मामले में सभी को फांसी की सजा मिलेगी। – मनफूल सिंह वर्मा सरकारी वकील

शाहजहांपुर से सौरभ दीक्षित की रिपोर्ट.

भारत ब्रांडकास्टिंग ने छह चैनलों के लिए उमेश कुमार से किया 500 करोड़ का समझौता

कई उपलब्धियों को अपने साथ जोड़ चुके समाचार प्‍लस चैनल के सीईओ एवं एडिटर इन चीफ उमेश कुमार को एक और बड़ी सफलता मिली है. दिल्‍ली की भारत ब्राडकास्टिंग कंपनी ने उमेश कुमार के साथ पांच सौ करोड़ रुपये का समझौता किया है. इस समझौते के तहत उमेश कुमार चार रीजनल न्‍यूज चैनल, एक नेशनल न्‍यूज चैनल तथा एक भोजपुरी न्‍यूज चैनल लांच करेंगे. इस चैनल की पूरी जिम्‍मेदारी उनके समेत उनकी टीम संभालेगी. 

यह भारत ब्रांडकास्टिंग कंपनी का शुरुआती इनवेस्‍टमेंट है. कंपनी इसके बाद कई चरणों में पैसा निवेश करेगी. साथ ही नियमानुसार एफडीआई (विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश) के माध्‍यम से भी विदेशों से पैसे जुटाए जाएंगे. समझौते के तहत उमेश कुमार यूपी-उत्‍तराखंड, एमपी-सीजी, हरियाणा तथा राजस्‍थान के लिए रीजनल चैनल लांच कराएंगे. इसके अलावा एक नेशनल हिंदी चैनल तथा एक भोजपुरी न्‍यूज चैनल लांच किया जाएगा. ये चैनल समाचार प्‍लस से अलग होंगे.

सूत्रों का कहना है कि समझौते की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. जल्‍द ही इस पर क्रियान्‍वयन शुरू कर दिया जाएगा. इन चैनलों की जिम्‍मेदारी भी उमेश कुमार और उनकी टीम ही संभालेगी. समाचार प्‍लस चैनल को यूपी-उत्‍तराखंड में पहचान दिलाने वाले मैनेजिंग एडिटर अमिताभ अग्निहोत्री, एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर प्रवीण साहनी एवं अतुल अग्रवाल इन चैनलों में भी प्रमुख भूमिका निभाएंगे. उमेश कुमार के लिए एक बड़ी सफलता मानी जा रही है. इसे मीडिया में उनके लगातार बढ़ते दबदबे के रूप में देखा जा रहा है. गौरतलब है कि उमेश कुमार मीडिया के अलावा रीयल स्टेट, मोबाइल न्यूज सर्विस, गोल्फ टूर्नामेंट, फिल्‍म प्रोडक्‍शन समेत कई क्षेत्रों में सक्रिय हैं.

महाघोटाले की ‘सोसायटी’

यह वाकया एक दिसंबर, 2011 का है जब मध्य प्रदेश में विपक्षी पार्टी कांग्रेस शिवराज सिंह चौहान सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाई थी और विरोधी पार्टी के विधायकों ने मुख्यमंत्री चौहान पर आरोप लगाया था कि उनके करीबी रिश्तेदार उनके पद का गलत फायदा उठाते हुए भांति-भांति के फर्जीवाड़ों में शामिल हैं. तब चौहान ने बड़ी दृढ़ता के साथ जवाब दिया था कि उनकी नजर में मध्य प्रदेश का हर आदमी बराबर की हैसियत रखता है और यदि उनका रिश्तेदार भी कोई नियम विरुद्ध काम करेगा तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी. किंतु राजधानी भोपाल में बावड़िया कला के महंगे इलाके वाली रोहित गृह निर्माण सहकारी सोसाइटी का मामला उनके सदन में दिए गए उस बयान से ठीक उलट है.

इस सोसाइटी में की गई गड़बड़ियों का सिलसिला इस मायने में साधारण नहीं कहा जा सकता है कि यहां खासी तादाद में रसूखदारों ने सहकारिता के बुनियादी नियमों को ताक पर रखते हुए न केवल जमीन की बंदरबांट की बल्कि कई पुराने और पात्र सदस्यों के लिए पहले से ही आवंटित भूखंडों तक की रजिस्ट्री अपने नाम करा ली. हैरानी तब और बढ़ जाती है जब इनमें ऐसे नामों का भी खुलासा होता है जिनका संबंध किसी और से नहीं बल्कि मुख्यमंत्री के निजी सचिव के अलावा मुख्यमंत्री के ही करीब दर्जन भर परिजनों और उनके करीबी रिश्तेदारों से है. दूसरे शब्दों में सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों ने सोसाइटी के कर्ताधर्ताओं की मिलीभगत से एक ऐसा खेल खेला जिसमें वे करोड़पति बन गए और भूखंडों के असली मालिक दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो गए.

2008 में चौहान के मुख्यमंत्री के तौर पर दूसरी बार शपथ लेने के बाद से रोहित नगर सोसाइटी के शिकायतकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने राज्य की जांच एंजेसियों, संबंधित विभागों और मुख्यमंत्री आवास तक कई चक्कर काटे लेकिन उनकी सुनवाई कहीं नहीं हुई. और यह तब है जब राज्य के ही सहकारिता विभाग और कलेक्टर ने समय-समय पर की गई अपनी जांच रिपोर्टों में इस बात का खुलासा किया है कि इस सोसाइटी में भूखंडों के आवंटन और उनकी रजिस्ट्री में भारी फर्जीवाड़ा हुआ है और इन्हीं आधार पर उन्होंने कई भूखंडों के कब्जे को बाकायदा अवैध घोषित करते हुए कब्जाधारियों पर कड़ी कार्रवाई किए जाने की बात भी की है. यही नहीं, इस मामले में हुए गड़बड़झाले की गूंज सड़क से लेकर विधानसभा तक में गूंजी लेकिन रोहित नगर में घरों का ख्वाब देखने वाले सैकड़ों लोगों को कार्रवाई के आश्वासन के सिवा अब तक कुछ हासिल नहीं हुआ है. चौहान सरकार की नीयत पर सवाल इसलिए भी उठता है कि 2012 में जब उसने राज्य भर के भूमाफियाओं के खिलाफ अभियान छेड़ा था तब राजधानी में रोहित नगर सोसाइटी के ऐसे कब्जाधारियों को क्यों छोड़ दिया गया जिसमें खुद मुख्यमंत्री के सगे-संबंधियों के नाम भी शामिल हैं.

कैसे बांधा धांधलियों का पुलिंदा

इस कथित महाफर्जीवाड़े पर से पर्दा हटाने के लिए हमें रोहित नगर सोसाइटी बनने की शुरुआत में जाना पड़ेगा. मार्च, 1983 में जब सोसाइटी का रजिस्ट्रेशन हुआ तब उसके पास कोई भूखंड और पैसा नहीं था. लिहाजा उसने सदस्य बनाकर उनकी जमा की गई रकम से बाजार भाव पर जमीन खरीदी और मकान बनाने के लिए भूखंड काटे. जाहिर है सोसाइटी ने उस सदस्य को भूखंड पाने का पात्र माना जिसके पैसे से उसने जमीन खरीदी और उसे विकसित किया. इस लिहाज से 2003 तक सोसाइटी ने जहां करीब 1,500 सदस्य बनाए वहीं इस समय तक उसके पास सौ एकड़ जमीन पर 1,269 भूखंड हो गए. जाहिर है इस समय तक भूखंडों के मुकाबले सदस्यों की संख्या पहले ही अधिक हो चुकी थी और इसलिए अब सोसाइटी की जिम्मेदारी थी कि वह नए सदस्य बनाने के बजाय पात्र सदस्यों को आवंटित भूखंडों की रजिस्ट्री करवाता. किंतु आगे जाकर हुआ इसके ठीक उलटा.

तहलका के पास मौजूद 2005 में तैयार की गई सोसाइटी की आखिरी ऑडिट रिपोर्ट में यह साफ कहा गया है कि पुराने सदस्यों के नाम पंजीयन में दर्ज नहीं हैं और नए सदस्यों की भर्ती में अनियमितता हुई है. ऑडिट में बताया गया है कि उस साल सोसाइटी के सदस्यों की संख्या बढ़कर 1,644 हो गई थी. ऑडिट के सहकारी निरीक्षक राजेश वर्मा ने तब भूखंड कम होने के बाद भी नए सदस्यों की भर्ती पर आपत्ति जताई थी.

गौरतलब है कि सहकारी सोसाइटी अधिनियम 1960 (72) के मुताबिक भूखंडों के अनुपात से अधिक सदस्यों की भर्ती अपराध है और ऐसी भर्ती किए जाने पर पांच लाख रुपये का जुर्माना और तीन साल तक के कारावास की सजा है. बावजूद इसके सोसाइटी में नए सदस्यों की भर्ती का सिलसिला चलता रहा. अब तक सदस्यता का क्रमांक 2,450 को पार कर चुका है. वहीं एक नियम यह कहता है कि इस तरह से बनाए गए नए सदस्यों का आवंटित या पंजीकृत भूखंड अवैध हैं. बावजूद इसके सहकारिता विभाग की रिपोर्ट में ही यह बात उजागर हो चुकी है कि रोहित नगर सोसाइटी में ऐसे नए सदस्यों के नाम कई भूखंडों की रजिस्ट्री की जा चुकी है.

सीधी बात है कि यदि सहकारिता विभाग ने 2005 की ऑडिट रिपोर्ट को सामने रखते हुए उस समय भी कार्रवाई की होती तो न अवैध तरीके से बड़ी संख्या में नए सदस्यों की भर्ती की जाती न सोसाइटी के संचालक मंडल के हाथों इस हद तक रिकॉर्डों में कूटरचना की जाती, न बड़े अफसरों से लेकर रसूखदारों को अनियमितताओं का फायदा उठाने का मौका मिलता और न ही भूखंडों के असली मालिकों को अपने हक के लिए जांच एजेंसियों और विभागों के पास भटकना पड़ता. किंतु यह संयोग ही है कि 2005 में ही शिवराज सिंह चौहान के पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद जिस बड़े पैमाने पर इस सोसाइटी की जमीन खुदबुर्द की गई और जिस तरीके से इसमें मुख्यमंत्री आवास के अधिकारियों और मुख्यमंत्री के परिजनों के नाम सामने आए उसने मौजूदा सरकार के भरोसे पर संदेह पैदा कर दिया है.

गड़बड़झालों के सूत्रधार

सीबीआई के छापे, सहकारिता विभाग द्वारा तीन बार की गई जांच-पड़ताल, सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन के विधानसभा में दिए गए बयान और सोसाइटी के सदस्यों की मानें तो रोहित नगर सोसाइटी में एक के बाद एक हुए कई गड़बड़झालों का मुख्य सूत्रधार घनश्याम सिंह राजपूत है. सहकारिता विभाग की पहली ही जांच रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि 2005 में सोसाइटी का संचालक बनने के बाद राजपूत ने फर्जी तरीके से कई नए सदस्य बनाए और भूखंड पंजी में कूटरचना करते हुए अवैध कमाई की. कभी रेलवे में तृतीय श्रेणी के कर्मचारी रहे और इन दिनों खुद को सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के नेता के तौर पर प्रचारित करने वाले राजपूत के बारे में सोसाइटी के सदस्यों का कहना है कि सहकारिता विभाग के भीतर इसकी अच्छी पकड़ तो है ही, मुख्यमंत्री के निजी सचिव हरीश सिंह के करीबी होने के नाते मुख्यमंत्री आवास तक सीधी पहुंच भी है. गौर करने लायक बात यह भी है कि हरीश सिंह का भूखंड (भूखंड क्र.265/III) भी इसी सोसाइटी में है. मगर राजपूत का कहना है कि उसके किसी से करीबी होने या न होने का रोहित नगर सोसाइटी की गड़बडि़यों से कोई लेना-देना नहीं है.

राजपूत के मुताबिक, ‘रोहत नगर सोसाइटी की गड़बडि़यों में मेरा कोई हाथ नहीं है.’ लेकिन रोहित नगर सोसाइटी के दो दर्जन से अधिक भूखंडों की गड़बडि़यों की छानबीन के लिए तैनात किए गए सहकारिता विभाग के जांच अधिकारी ज्ञानचंद पाण्डेय की मार्च, 2008 की रिपोर्ट बताती है कि उनकी पड़ताल में 23 मामले ऐसे निकले जिनमें भूखंड किसी और को आंवटित किए गए थे लेकिन सोसाइटी के कर्ताधर्ताओं ने सदस्यों के सदस्यता क्रमांक से छेड़खानी करते हुए उनकी रजिस्ट्री किसी और के नाम करा दी. वहीं छह मामले तो ऐसे निकले जिनमें सदस्यों ने अपने भूखंडों की रजिस्ट्री भी करा ली थी, आश्चर्य कि इसके बावजूद उनकी रजिस्ट्री किसी किसी दूसरे के नाम कर दी.

पाण्डेय ने अपनी रिपोर्ट में इन अवैध गतिविधियों के लिए घनश्याम सिंह राजपूत के साथ सोसाइटी के पूर्व संचालक एनएल रोहितास सहित अवैध पंजीयनधारियों को दोषी ठहराते हुए उन पर कार्रवाई किए जाने की सिफारिश की थी. हालांकि इसके बाद से अब तक सहकारिता विभाग ने राजपूत पर कोई कार्रवाई नहीं की लेकिन रेलवे कर्मचारी रहते हुए फरवरी, 2007 में सीबीआई ने राजपूत के यहां छापा मारा तो रोहित नगर सोसाइटी से जुड़े बेनामी संपत्ति के कई कागजात बरामद हुए. इसके बाद सीबीआई ने यह मामला राज्य की जांच एजेंसी आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो को आवश्यक कार्यवाही के लिए भेजा. यह अलग बात है कि यहां भी कार्यवाही की फाइल पांच साल से धूल चाट रही है.

विवादों की जमीन पर मुख्यमंत्री का परिवार

रोहित नगर सोसाइटी में जब घपलों की कई परतें खुलीं तो यह साफ हुआ कि विवादों की इस जमीन पर सूबे के मुखिया चौहान के कई करीबियों और परिजनों को भी भूखंड बांटे गए हैं (देखें बॉक्स). जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि इस सोसाइटी में जब भूखंडों से अधिक सदस्यों की संख्या हो गई तो सहकारिता विभाग ने अपने ऑडिट में नए सदस्यों की भर्ती पर आपत्ति जताते हुए उन पर रोक लगा दी थी. इसी के साथ सहकारिता विभाग के नियमों के तहत यह भी कहा जा चुका है कि विभाग ने 2003 के बाद से बनाए गए नए सदस्यों को आवंटित या पंजीकृत भूखंडों को अवैध घोषित कर दिया था. बावजूद इसके मुख्यमंत्री के भाई रोहित चौहान (स.क्र. 2198ए) और रोहित सिंह चौहान की पत्नी (स.क्र. 2199ए) को न केवल नए सदस्यों के तौर पर भर्ती किया गया बल्कि दोनों के नाम और आजू-बाजू में ही 2,100 वर्ग फुट के दो बड़े भूखंडों की रजिस्ट्री भी करा दी गई. रोहित सिंह चौहान ने इन भूखंडों पर 2008 में एक आलीशान मकान बनाया और उसे बेच दिया.

वहीं अक्टूबर, 2009 में भोपाल के कलेक्टर की वेबसाइट पर जब रोहित नगर सोसाइटी के सदस्यों ने आवंटित और पंजीकृत सूची में मुख्यमंत्री चौहान के ही कई और परिजनों के नाम देखे तो वे भौचक्के रह गए. वजह यह थी कि सोसाइटी की 2005 की आखिरी ऑडिट की सदस्यता सूची और 2008 की सोसाइटी की मतदाता सूची में जब चौहान परिवार के ऐसे किसी भी सदस्य का नाम था ही नहीं तो अचानक और क्रमबद्ध तरीके से इतने सारे नाम कहां से आ गए. सोसाइटी के कई संस्थापक सदस्यों का आरोप है कि चौहान के परिजनों को दी गई सदस्यता का क्रमांक फर्जी है. अपना भूखंड पाने की उम्मीद पर सालों से लड़ रहे जैनेंद्र जैन बताते हैं कि चौहान के परिजनों के नाम के आगे जो सदस्यता क्रमांक लिखा गया है यदि ऑडिट की सूची से उसका मिलान किया जाए तो वह किसी और आदमी का सदस्यता क्रमांक निकलता है.

उदाहरण के लिए, बृजेश चौहान (सं क्र. 1253), प्रद्युम्न चौहान (सं क्र. 1254) और अनीता चौहान (सं क्र. 1255) के आगे क्रमबद्ध तरीके से जो सदस्यता क्रमांक लिखा गया है यदि ऑडिट की सूची में देखें तो उसमें सदस्यता के ये क्रमांक क्रमशः बीना मखेजा, पंकज मखेजा और संगीता मखेजा के नाम पर दर्ज है. इसी तर्ज पर चौहान परिवार के धर्मेंद्र सिंह चौहान (मुख्यमंत्री के भाई का दामाद ), बलवंत चौहान और ममता चौहान (मुख्यमंत्री के करीबी) सहित बाकी लोगों के नाम के आगे भी किसी दूसरे का सदस्यता क्रमांक लिखा मिलता है. बावजूद इसके इन सभी के नाम 1,500 से लेकर 2,100 वर्ग फुट के भूखंड की रजिस्ट्री भी हो गई है. यहां 1,500 वर्ग फुट के एक भूखंड की कीमत ही 30 लाख रुपये आंकी जा रही है. वहीं जैनेंद्र जैन के मुताबिक, ‘इस समय यहां जमीन का बाजार भाव 2,000 रु वर्ग फुट है, जबकि 2003 तक सोसाइटी के सदस्यों को 30 रु वर्ग फुट के हिसाब से भूखंड दिया गया है. इसलिए सस्ती कीमत पर भूखंड हथियाने के लिए भी इन बड़े लोगों ने 2003 के सदस्यों की सदस्यता का क्रमांक अपने नाम दर्शा दिया.’

खुलासे पर खुलासा, पर कार्रवाई नहीं

रोहित नगर सोसाइटी का ऑडिट 2005 में जब हुआ तब पहली बार स्थापित हुआ कि सोसाइटी में कई गड़बड़झाले हैं.  फिर मार्च, 2008 में सहकारिता विभाग के जांच अधिकारी ज्ञानचंद पाण्डेय ने खुलासा किया था कि सोसाइटी के कर्ताधर्ताओं की सांठगांठ से कई फर्जी सदस्य इसमें घुस गए हैं और उन्होंने 29 भूखंडों पर कब्जा जमा लिया है. मार्च, 2008 में ही विभाग के जांच अधिकारी आरके पाटिल ने और एक घोटाले को उजागर करते हुए कहा कि यहां कई पात्र सदस्यों को नजरअंदाज करते हुए 17 भूखंडों की अवैध तरीके से रजिस्ट्री की गई है. इतना ही नहीं, अगस्त, 2007 को कांग्रेस के विधायकों ने यहां हुए 48 भूखंडों की धोखाधड़ी का मामला विधानसभा में उठाते हुए सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन को घेरा. जवाब में बिसेन ने धोखाधड़ी की बात मानते हुए वादा किया कि दोषियों को जेल की हवा खिलाएंगे. अगली कड़ी में नवंबर, 2009 में सहकारी विभाग के जांच अधिकारी प्रकाश खरे ने जब 23 भूखंडों को नियमों के विरुद्ध बांटे जाने की पड़ताल की तो पाया कि सभी 23 मामलों में हेराफेरी हुई है. खरे ने साथ ही यह भी कहा कि सोसाइटी के कागजात इस हद तक अस्त-व्यस्त पाए गए कि उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इसी से जुड़ी एक अहम बात यह है कि 2005 के बाद से सोसाइटी का ऑडिट नहीं करवाया गया है. पीड़ित सदस्यों की शिकायत है कि सोसाइटी के सरगनाओं ने फर्जी सदस्यों के कारनामों को छिपाने के लिए ऐसा किया. जानकारों की राय में यदि सोसाइटी का ऑडिट किया जाता तो पता चल जाता कि कब, कौन सदस्य बना और सोसाइटी के पास उससे लिए गए पैसों का हिसाब होता. यही वजह है कि भ्रष्टाचार का यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहा और एक बार फिर अगस्त, 2010 में भोपाल के कलेक्टर को 79 भूखंडों की रजिस्ट्री को अवैध ठहराना पड़ा.

हद तो तब हो गई जब 2012 में सोसाइटी के कर्ताधर्ताओं द्वारा आवंटित और पंजीकृत भूखंडों की एक और सूची भोपाल के कलेक्टर की वेबसाइट पर जारी कर दी गई जिसमें 96 लोगों के नाम हैं. गौर करने लायक बात है कि इसमें भी आधे के नाम 2005 की ऑडिट रिपोर्ट में नहीं हैं. और यही वजह है कि अक्टूबर, 2012 में खुद सहकारिता जिला उपायुक्त आरएस विश्वकर्मा ने इस सूची पर आपत्ति जताते हुए सोसाइटी को कारण बताओ नोटिस भेजा है. विश्वकर्मा ने कहा है कि सोसाइटी को चाहिए कि पहले अपना ऑडिट करवाए. यदि ऐसा हुआ तो सदस्यों द्वारा जमा कराए गए पैसों की जानकारी साथ ही यह भी सार्वजनिक हो जाएगा कि उन्हें बांटा गया भूखंड वैध है या नहीं.

तहलका के पास ये सारे दस्तावेज हैं और इनमें घनश्याम सिंह राजपूत के अलावा सोसाइटी के वर्तमान अध्यक्ष रामबहादुर तथा तीन पूर्व अध्यक्ष एमके सिंह, बसंत जोशी और अमरनाथ मिश्र सहित कई कर्ताधर्ताओं को दोषी ठहराया गया है. बावजूद इसके उपयुक्त कार्रवाई न होने से दोषियों के हौसले बुलंद हैं और इसका अंदाजा सोसाइटी के सदस्य योगेश पुर्सवनी की आपबीती से लगाया जा सकता है. 2000 में पुर्सवनी को यहां भूखंड आवंटित हुआ था और इसके लिए उन्होंने सोसाइटी को एक लाख 38 हजार रुपये भी दिए. लेकिन उनके भूखंड की रजिस्ट्री जब संजय कुमार सिंह के नाम पर कर दी गई तो पुर्सवनी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. 2005 में हाई कोर्ट से केस जीतने के बाद भी जिस आदमी की अवैध तरीके से रजिस्ट्री की गई थी वह कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं है. पुर्सवनी का आरोप है कि उसके भूखंड पर परोक्ष तौर पर घनश्याम सिंह राजपूत का कब्जा है.

क्या विकल्प है?

रोहित नगर सोसाइटी प्रकरण में राज्य सहकारी सतर्कता सेल के प्रभारी बीएस बास्केल यह तो मानते हैं कि कार्रवाई गति नहीं पकड़ पा रही है लेकिन इसका कारण पूछने पर उनके पास कोई जवाब नहीं है. बकौल बास्केल, ‘इसके लिए आयुक्त से बात करूंगा.’ वहीं सहकारिता विभाग के आयुक्त मनीष श्रीवास्तव की सुनें तो उन्हें हाल ही में इस सोसाइटी में की गई गड़बडि़यों की जानकारी मिली है. उनका दावा है, ‘दोषी चाहे जो भी हो उसे छोड़ा नहीं जाएगा.’ दूसरी तरफ सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन को लगता है कि इस तरह की गृह निर्माण सोसाइटियों में चल रही धांधलियों पर जल्द ही लगाम कसी जा सकती है. वे कहते हैं, ‘सहकारिता के नियमों की यदि अनदेखी की गई है तो विभाग कोर्ट में सीधे मामला ले जा सकता है और दोषियों को सजा दिलवा सकता है.’ वहीं इस पूरे प्रकरण में जब तहलका ने मुख्यमंत्री चौहान से जवाब मांगने के लिए जनसंपर्क विभाग के आयुक्त राकेश श्रीवास्तव से संपर्क किया तो उन्होंने कहा, 'रोहित नगर को लेकर मुख्यमंत्री कोई जवाब नहीं देंगे.'

दरअसल रोहित नगर सोसाइटी में इतनी सारी गड़बडि़यां सामने आ चुकी हैं कि उन्हें सुलझाने और दोषियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने में काफी वक्त लग जाएगा. विशेषज्ञों के मुताबिक इस हालत में मध्य प्रदेश सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1960 के आठवें अध्याय में सहकारी गृह निर्माण सोसाइटियों को लेकर बनाया गया वह प्रावधान अहम हो सकता है जिसमें उसने एक सीमा तक ही सदस्य बनाए जाने की बात की है और इस बिंदु के आधार पर यदि नए और अवैध तरीके से बनाए गए सदस्यों को सोसाइटी से बाहर कर उन पर कार्रवाई की जाए तो इसके बाद बचे पात्र सदस्यों को भूखंड आंवटित करने का रास्ता साफ हो सकता है. विशेषज्ञों की राय में यह रास्ता इसलिए भी ठीक है कि नए सदस्यों ने समस्या तो पैदा की ही, नाजायज तौर-तरीके से कई भूखंड भी हड़प लिए हैं.

लेकिन अब रोहित नगर सोसाइटी में जिस संख्या में मुख्यमंत्री के परिजनों सहित कई रसूखदारों के नाम आए हैं और जिस तरीके से सहकारिता विभाग ने लंबे समय से अपने ही जांच अधिकारियों की जांच और ऑडिट रिपोर्टों को अनदेखा किया है, उसके बाद सोसाइटी के भूखंड के पात्र सदस्यों में से ज्यादातर की आखिरी उम्मीद अब कोर्ट की चौखट पर जाकर टिक गई है.

तहलका में प्रकाशित शिरीष खरे की रिपोर्ट.

माननीय सीएम साहब अपनी चुप्‍पी तोडिए!

माननीय अखिलेश यादव जी, पूर्वांचल एम्स सत्याग्रह समिति ने 04 फरवरी 2013 को चौरीचौरा से ‘पूर्वांचल एम्स पदयात्रा’ का आयोजन किया था। इसमें सैकड़ों सत्याग्रहियों ने हिस्सा लिया। गोरखपुर, संतकबीरनगर, बस्ती, फैजाबाद और बाराबंकी जिला मुख्यालयों से होते हुए 334 किलोमीटर के पैदल सफर के बाद यह पदयात्रा 21 फरवरी 2013 को लखनऊ विधानभवन के सामने पहुंची थी। पदयात्रा का उद्देश्य पूर्वांचल के गोरखपुर में एम्स की स्थापना है।

21 फरवरी को दोपहर बाद एम्स पदयात्रा जब विधानभवन पहुंच गई तो विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय सत्याग्रहियों के पास पहुंचे थे और समिति के अध्यक्ष जटाशंकर त्रिपाठी की अगुआई में एक प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात उन्होंने कैबिनेट मंत्री आजम खां से कराई। विधानसभा अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री ने आश्वस्त किया था कि बीमारियों और बदहाली से जूझ रहे पूर्वांचल में एम्स की स्थापना के लिए प्रदेश सरकार फिर से पहल करेगी।

राज्य सरकार से आश्वसन मिले एक महीने और 13 दिन का वक्त बीत चुका है। पूर्वांचल की जनता इंतजार कर रही है कि कब हमारे युवा मुख्यमंत्री गोरखपुर में एम्स स्थापना के लिए ठोस पहल करेंगे? पदयात्रा के दौरान सभी जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन कर प्रधानमंत्री को सम्बोधित पत्रक सौंपे गए थे। कैबिनेट मंत्री आजम खां साहब को जो पत्रक दिया गया था वह आपको सम्बोधित था। दुर्भाग्य यह रहा कि न तो प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर चुप्पी तोड़ी और न ही हमारे प्रदेश के होनहार मुख्यमंत्री ने। एक अदद शिष्टाचार पत्र भी नहीं आया।

चूंकि पूर्वांचल एम्स सत्याग्रह आन्दोलन से मैं भी जुड़ा रहा हूं लिहाजा बड़ी उम्मीद के साथ आपको यह पत्र लिख रहा हूं। मानता हूं कि गोरखपुर में एम्स की स्थापना आपके कार्यक्षेत्र का विषय नहीं है लेकिन हमारे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एक चिट्ठी को लिख ही सकते हैं………देश के मौन प्रधानमंत्री को।…..उम्मीद है यह पत्राचार सार्थक रहेगा और कम से कम अखिलेश की चुप्पी तो टूटेगी ही।

वेद प्रकाश पाठक

सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्‍वतंत्र पत्रकार

मोबाइल – 08004606554, 08953002955

जयवीर पुंडीर ने लांच किया पोर्टल न्‍यूज लाइंस24

पत्रकार जयवीर पुंडीर ने न्यूज़ पोर्टल न्यूज़ लाइंस24 लांच किया है। पुंडीर इसके पहले लगभग चार साल तक मैजिक टीवी के साथ जुड़े हुए थे। वे मैजिक टीवी में उत्तराखण्ड राज्य का प्रभार देख रहे थे। उन्‍होंने मैजिक टीवी के लिए कई प्रोग्राम भी बनायें हैं, जिनमें "देवभूमि के रहस्य'' सबसे प्रमुख है।

न्यूज़ लाइंस24 अपने नाम के अनुरूप टीवी चैनल की खासियत से ओत-प्रोत है। अनवरत समाचारों से जोड़ने के साथ -साथ न्यूज़ लाइंस24 पाठकों को दर्शक के रूप में आकर्षित करने में भी सक्षम है।  न्यूज़ लाइंस24 में मैजिक टीवी के डिप्टी एजीएम सुधीर सिंह उजाला कार्यकारी सम्पादक के रूप में जुड़े हुए हैं। जल्द ही पत्रकारिता के अनेक बड़े नाम न्यूज़ लाइंस24 के साथ जुड़ने जा रहे हैं।

गोंडा फर्जी एनकाउंटर मामले में तीन पुलिसवालों को फांसी, पांच को उम्र कैद

लखनऊ : लखनऊ की सीबीआई अदालत ने गोंडा में फर्जी एनकाउंटर में डीएसपी केपी सिंह की हत्या के मामले में 3 पूर्व पुलिसकर्मियों को मौत और 5 को उम्र कैद की सजा सुनाई है. केपी सिंह की 31 साल पहले फर्जी एनकाउंटर में हत्या कर दी गई थी. केपी सिंह गोंडा के डीएसपी थे और एसपी ने एक आरोपी की गिरफ्तारी के लिए उन्हें माधवपुर भेजा था. लेकिन कुछ पुलिस वालों ने ही ये बात आरोपियों को बता दी और गांव में घुसते ही केपी सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई.

केपी सिंह की मौत को मुठभेड़ दिखाने के लिए पुलिस वालों ने गांव के ही बारह लोगों की भी हत्या कर दी थी. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने इस मामले की जांच की. 19 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई. 10 आरोपियों की मौत सुनवाई के दौरान हो गई जबकि एक को अदालत ने बरी कर दिया. केपी सिंह की बेटी किंजल अभी बहराइच की डीएम हैं. अपने पिता के एनकाउंटर के वक्त वो सिर्फ ढाई महीने की थी. शुक्रवार को 31 साल बाद जब यह फैसला आया तो डीएसपी के पी सिंह की बेटी किंजल की आंखें नम हो गईं. (एबीपी)

नवभारत का सुधीर कर रहा पत्रकार बनाने का धंधा, हो रहा सम्‍मानित

मुंबई : आप को बता दें कि नवभारत में कार्यरत सुधीर शर्मा पिछले कुछ दिनों से नवी मुंबई के कुछ लोकल मराठी अखबारों में विज्ञापन देकर "मीडिया इंटेलीजेंस नेटवर्क" का पहचान पत्र बेचना शुरू कर दिया है। इस विज्ञापन में लिखा गया है कि आप मीडिया पुलिस बनकर अपना फर्ज निभाइए। इस विज्ञापन में संपर्क के लिए जो हॉट लाइन नम्बर दिया गया है, उस के शुरुआत में जो नंबर लिखा गया है ९८९२३७२२५८ यह नम्बर सुधीर शर्मा का ही है। इस की जानकारी नवभारत के व्यवस्थापक को होने के बावजूद खुलेआम यह अवैध व्यवसाय शुरू है।  

इतना ही नहीं मंगलवार और बुधवार को मुंबई से प्रकाशित होने वाले नवभारत के नवी मुंबई सप्लीमेंट में शिव साईं संस्था की खबर दो दिनों से प्रकाशित किया जा रहा है। जिस में बुधवार को नवभारत के पत्रकार सुधीर शर्मा को पत्रकारिता में योगदान के लिए पत्रकारिता रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इसके बाद से नवभारत में कार्यरत पत्रकारों और नवी मुंबई के अन्य अखबारों के पत्रकारों द्वारा आश्चर्य व्यक्त किया जा रहा है कि पत्रकारिता अब सिर्फ दलाली तक ही सीमित है क्या?

क्यों कि नवभारत में कार्यरत रजित यादव और ओमप्रकाश ढोर पिछले १० वर्षों से नवी मुंबई में पत्रकारिता कर रहे हैं। नवी मुंबई के विकास में शुरुआती दौर से ही राजित यादव और ओमप्रकाश ढोर का योगदान रहा है, लेकिन लगभग ३ वर्ष पहले तक रियल स्टेट दलाली करते हुए पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले सुधीर शर्मा एक लोकल केबल चैनल से काम की शुरुवात करते हुए पत्रकार का कार्ड बनाकर बेचना शुरू किया। इस के माध्यम से नवी मुंबई में संपर्क बनाकर दलाली करते हुए पिछले वर्ष नवभारत में लग गया है। सुधीर शर्मा के नवभारत में लगाने के साथ ही नवभारत में पहले से कार्यरत पत्रकारों में नाराजगी फ़ैल गयी थी। इस के बावजूद नवभारत के व्यवस्‍थापक बिजनेस के लालच में सुधीर शर्मा को रख लिए हैं।

सन्‍नी कुमार पांडेय

भ्रष्‍ट पत्रकारिता के असली अपराधियों को बचा रहे हैं जस्टिस काटजू!

सवाल यह है कि पत्रकारिता की विकृतियों और विचलनों की जड़ में क्या है? जब अखबार/चैनल का प्रबंधन खुद पेड न्यूज में संलग्न हो तो पत्रकार की व्यक्तिगत ईमानदारी का क्या मतलब रह जाता है? कहने की जरूरत नहीं है कि अगर मीडिया संस्थान ईमानदार, पत्रकारीय मूल्यों और आचार संहिताओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध हो तो वहां इस बात की सम्भावना बहुत कम होगी कि कोई भ्रष्ट, अनैतिक और मूर्ख पत्रकार घुस पाए या लंबे समय तक टिक पाए.

ऐसे भ्रष्ट और अनैतिक पत्रकारों के लिए वहां मनमानी करने की भी गुंजाइश कम होगी क्योंकि सांस्थानिक तौर पर वहां जांच-पड़ताल की व्यवस्था एक अंकुश की तरह काम करेगी. लेकिन अगर संस्थान खुद भ्रष्ट और पत्रकारीय नैतिकता को ठेंगे पर रखता है तो ईमानदार पत्रकार के लिए भी वहां ईमानदार बने रहना या टिके रहना मुश्किल है. यही नहीं, अगर संस्थान खुद भ्रष्ट है तो वहां वैसे ही पत्रकारों को आगे बढ़ाया जाएगा या बढ़ाया जाता है. कहने का तात्पर्य यह है कि आज न्यूज मीडिया की विकृतियों, विचलनों और भ्रष्टाचार का दायरा व्यक्तिगत पत्रकारों से बहुत आगे बढ़कर सांस्थानिक स्वरुप ले चुका है और उसका इलाज भी व्यक्तिगत नहीं बल्कि सांस्थानिक ही होना चाहिए.

ऐसे में, असल मुद्दा यह है कि ईमानदार-साहसी-संवेदनशील पत्रकारों की आज़ादी की सुरक्षा कैसे की जाए? मीडिया के मौजूदा पूंजीवादी बिजनेस माडल में अभिव्यक्ति की आज़ादी पत्रकार की नहीं, उसके मालिक की आज़ादी है. जब तक यह पत्रकार की आज़ादी नहीं बनेगी, कोई डिग्री या मानदंड पत्रकारिता के स्खलन को नहीं रोक पाएगी. अफसोस और चिंता की बात यह है कि न्यूज मीडिया की विकृतियों, विचलनों और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने के बावजूद जस्टिस काटजू इसे जिसे तरह से पत्रकारों की शिक्षा, अपढ़ता और इसके इलाज के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता तक सीमित कर देते हैं, उसके कारण न सिर्फ असली अपराधियों को बच निकलने का मौका मिल जा रहा है बल्कि न्यूज मीडिया की सफाई में जिनकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है और जिन्हें संरक्षण और समर्थन की जरूरत है, वे पत्रकार ही कटघरे में खड़े दिखाई पड़ने लगते हैं. इससे इस लड़ाई में दोस्त के दुश्मन बनने और लड़ाई के कमजोर पड़ने का खतरा पैदा हो गया है.

हालाँकि यह कहने का आशय यह कतई नहीं है कि पत्रकारों को पढ़ने या उनके प्रशिक्षण की जरूरत नहीं है. निश्चय ही, पत्रकारिता में प्रतिभाशाली, पढ़े-लिखे, विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ, संवेदनशील और गंभीर लोगों की जरूरत है. लेकिन यहाँ भी समस्या सांस्थानिक ही है क्योंकि न्यूज मीडिया में मनोरंजन के बढ़ते बोलबाले और उसके दबाव में पत्रकारिता को हल्का-फुल्का बनाने का सांस्थानिक दबाव इस कदर बढ़ता जा रहा है कि कारपोरेट मीडिया को बहुत प्रतिभाशाली, पढ़े-लिखे और विशेषज्ञ पत्रकारों की जरूरत ही नहीं है.

दूसरे, वे इसके लिए उचित वेतन और बेहतर सेवा शर्तें देने को भी तैयार नहीं हैं. ज्यादातर मीडिया कंपनियों का ध्यान गुणवत्ता के बजाय मात्रा पर है और इसके लिए उन्हें सस्ते और ज्यादा मेहनत कर सकनेवाले पत्रकार नहीं, मशीन चाहिए. अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि एक पेशे के बतौर भी पत्रकारिता न तो वेतन के मामले में, न सेवा शर्तों के मामले में और सबसे बढ़कर पत्रकार के बतौर काम की संतुष्टि के मामले में इतनी आकर्षक रह गई है कि वह प्रतिभाशाली युवाओं खासकर उच्च शिक्षा-प्राप्त छात्रों आकर्षित कर सके. लेकिन दूसरी ओर, कारपोरेट मीडिया संस्थानों और दूसरी मीडिया कंपनियों की शिकायत यह रहती है कि पत्रकारिता में प्रतिभाशाली युवा नहीं आ रहे हैं.

असल में, यह एक दुष्चक्र सा बन गया है. लेकिन इस दुश्चक्र की शुरुआत मीडिया के कारपोरेटीकरण की प्रक्रिया के साथ हुई, जब यह घोषित किया गया कि अखबार किसी भी अन्य उत्पाद जैसे साबुन, टूथपेस्ट और डियोडोरेंट की तरह एक उत्पाद है. यही नहीं, यह भी कहा गया कि इस उत्पाद के उत्पादन और बिक्री के लिए संपादक और बहुत पढ़े-लिखे जानकार पत्रकारों की जरूरत नहीं है क्योंकि उसे बेचने के लिए मार्केटिंग की जरूरत है. नतीजा यह हुआ कि बड़े कारपोरेट मीडिया संस्थानों में एक ओर संपादक को महत्वहीन और मैनेजरों को प्रभावी बनाया गया और दूसरी ओर, अखबारों से तेजतर्रार, संवेदनशील और पढ़े-लिखे पत्रकारों को बाहर किया गया.

संभव है कि जस्टिस काटजू इस इतिहास से वाकिफ न हों लेकिन यह सच्चाई न्यूज मीडिया को नजदीक से देखनेवाले सभी शोधकर्ताओं को मालूम है कि न्यूज मीडिया उद्योग में बेनेट कोलमैन एंड कम्पनी लिमिटेड ने ८० के दशक के आखिरी वर्षों और ९० के दशक में अपने अखबारों के कारपोरेटीकरण की प्रक्रिया में एक ओर अखबार को हल्का-फुल्का बनाना शुरू किया. फीलगुड पत्रकारिता के तहत पेज-३ से लेकर मीडियानेट और प्राइवेट ट्रीटी जैसी संदिग्ध तौर-तरीकों को आगे बढ़ाया और दूसरी ओर, ‘टाइम्स आफ इंडिया’ में संपादकों को अपमानित करने से लेकर प्रफुल्ल बिदवई और ए.एन.दास जैसे वरिष्ठ पत्रकारों को बाहर किया. जल्दी ही और मीडिया कंपनियों ने भी इसी रास्ते को पकड़ा और ९० का दशक बीतते-बीतते यह प्रक्रिया पूरी हो गई.

हैरानी की बात नहीं है कि पिछले दशक में जब इन्हीं कारपोरेट मीडिया समूहों ने टी.वी चैनल शुरू किये तो उनके सामने यह व्यावसायिक रूप से ‘सफल’ माडल पहले से मौजूद था. उन्हें बहुत सोचना-विचारना नहीं पड़ा. उनकी देखा-देखी बाकी न्यूज चैनल चलानेवाली कंपनियों ने भी उसी रास्ते को पकड़ा. इसलिए न्यूज चैनलों में आज जो हल्कापन-भोंडापन और उथलापन दिखता है, वह किसी दुर्घटनावश नहीं है बल्कि वह एक बहुत सोची-समझी योजना और रणनीति का हिस्सा है. कारपोरेट मीडिया में विज्ञापनों से होनेवाली आय पर टिके मौजूदा व्यावसायिक माडल को यहीं पहुंचना था. लेकिन जस्टिस काटजू इसे देखकर भी देखने को तैयार नहीं हैं. इसलिए मौजूदा स्थितियों से नाराजगी और अपने गुस्से के बावजूद इस लड़ाई में वे अक्सर डान क्विक्जोट की तरह दिखने लगते हैं.

आईआईएमसी के प्रोफेसर आनंद प्रधान का यह लेख उनके ब्‍लॉग तीसरा रास्‍ता से साभार लिया गया है. यह कथादेश में भी प्रकाशित हो चुका है.

दैनिक जागरण, कानपुर में कई ब्‍यूरोचीफ बदले गए

दैनिक जागरण, कानपुर में कई लोगों की जिम्‍मेदारियां बदल दी गई हैं. सूत्रों का कहना है कि संपादकीय प्रभारी राघवेंद्र चड्ढा ने अखबार और टीम को और मजबूत करने के लिए यह फेरबदल किया है. दैनिक जागरण, इटावा में ब्‍यूरोचीफ की भूमिका निभा रहे गौरव टुटेजा को मैनेजर बना दिया गया है. उनकी जगह रायबरेली से से आशुतोष अग्निहोत्री को इटावा का नया ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. उन बीते दिनों एक बिरादरी के लोगों को दूसरी बिरादरी के लोगों को जूते की माला पहनाए जाने की बड़ी खबर को हल्‍के में लेने का आरोप लगा था.

बताया जा रहा है कि प्रदीप अवस्‍थी के नेतृत्‍व में अमर उजाला इटावा में जागरण को लगातार कड़ी टक्‍कर दे रहा है, लिहाजा प्रबंधन ने अपनी किलेबंदी को मजबूत करने के लिए आशुतोष को वहां भेजा है. हरदोई के ब्‍यूरोचीफ पंकज सचान को रायबरेली का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. जालौन-उरई के ब्‍यूरोचीफ केपी सिंह को हरदोई का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. कन्‍नौज के ब्‍यूरोचीफ राजीव अवस्‍थी को उरई-जालौन का प्रभारी बनाकर भेजा गया है. कानपुर मुख्‍यालय पर तैनात प्रेम किशोर तिवारी को कन्‍नौज का नया ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है.

इसी तरह बांदा के ब्‍यूरोचीफ गोविंद दुबे को फतेहपुर को प्रभारी बनाकर भेजा गया है. फतेहपुर के ब्‍यूरोचीफ अवधेश पाण्‍डेय को मुख्‍यालय बुला लिया गया है. उन्‍नाव के ब्‍यूरोचीफ रजत पांडेय को फोर्स लीव पर भेज दिया गया है. उनकी जगह मुख्‍यालय से अश्‍वनी पांडेय को उन्‍नाव का नया ब्‍यूरोचीफ बनाकर भेजा गया है. बांदा में किसे जिम्‍मेदारी सौंपी गई है इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में कुछ और बदलाव देखने को मिल सकते हैं. 

पांच पत्रकारों को लाइफ टाइम अचीवमेंट तथा आलोक श्रीवास्‍तव समेत 15 को मीडिया अवार्ड

इंदौर प्रेस क्‍लब में आयोजित शार्क भाषायी पत्रकारिता सम्‍मेलन के मौके पर अतिथियों ने ऐसे पांच पत्रकारों को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया, जिन्होंने भाषाई पत्रकारिता में अमूल्य योगदान दिया। सम्मानित होने वाले वरिष्ठ पत्रकारों में सर्वश्री बनवारी बजाज, उमेश त्रिवेदी, कमल दीक्षित, कीर्ति राणा और मांगीलाल चौहान शामिल हैं। इस अवसर पर मध्यप्रदेश के १५ पत्रकारों को मीडिया अवार्ड से सम्मानित किया। 

सम्मानित होने वालों में अनिल शर्मा, राजेश बादल, निर्मल पाठक, अनिल जैन, रवीन्द्र दुबे, शकील अख्तर, आलोक श्रीवास्तव, किरण मोघे, विकास भदौरिया, आकाश सोनी, प्रखर श्रीवास्तव, भुवनेश सेंगर, प्रणय उपाध्याय, निमिष कुमार दुबे, संजय शर्मा शामिल हैं। महोत्सव में कार्यक्रमों का लाइव कवरेज करने के लिए सहारा समय मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के इंदौर ब्यूरो चीफ सुदेश तिवारी, डीजी न्यूज के सेंट्रल इंडिया हेड प्रकाश हिन्दुस्तानी और इंडिया न्यूज के इंदौर ब्यूरो चीफ एतियाब शेख व को-ऑर्डिनेटर संजय शर्मा को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े पत्रकार और गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

इंदौर प्रेस क्‍लब में राष्‍ट्रीय स्‍तर के शोध केंद्र की स्‍थापना करेगी सरकार

: भाषाई पत्रकारिता महोत्सव : समापन सत्र में सम्मान समारोह : इंदौर। मध्य प्रदेश के गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता ने कहा कि राज्य सरकार इंदौर प्रेस क्लब में राष्ट्रीय स्तर के शोध केंद्र की स्थापना के लिए कटिबद्ध है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने इस शोध केंद्र की स्थापना के लिए  उचित दिशा निर्देश जारी कर दिए हैं।

गृहमंत्री श्री गुप्ता ने इंदौर प्रेस क्लब द्वारा आयोजित सार्क देशों के भाषाई पत्रकारिता महोत्सव के समापन अवसर पर मुख्य अतिथि रूप में कहा कि यह प्रसन्नता का विषय है कि इंदौर प्रेस क्लब शोध जैसे गंभीर कार्य के लिए प्रयासरत है। पिछले दिनों इंदौर प्रेस क्लब ने भोपाल आकर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन भी किया था। इस संगोष्ठी में मुख्यमंत्री और जनसंपर्क मंत्री उपस्थित थे। उन्होंने केंद्र की स्थापना के लिए जनसंपर्क विभाग के माध्यम से उचित दिशा-निर्देश जारी किए हैं। भविष्य में भी इंदौर प्रेस क्लब केंद्र के लिए जो भी प्रस्ताव देगा उस पर राज्य सरकार हरसंभव सहायता करेगी।
    
श्री गुप्ता ने कहा कि इंदौर प्रेस क्लब का नाम अब वैश्विक पटल पर अंकित हो गया है। वैसे भी इंदौर प्रेस क्लब का नाम पूरे देश में गर्व के साथ लिया जाता है। इंदौर ने पत्रकारिता जगत को कई मूर्धन्य संपादक दिए हैं, जिन्होंने इंदौर का नाम देश ही नहीं विदेशों में भी रोशन किया है। इंदौर की पत्रकारिता की धाक आज पूरे देश में हैं। सार्क देशों से जो पत्रकार यहां आए हैं, मैं मध्यप्रदेश सरकार की ओर से उनका हार्दिक अभिनंदन करता हूं। अध्यक्षता प.पू. उत्तम स्वामी जी महाराज ने की। विशिष्ट अतिथियों के रूप में स्वास्थ्य राज्यमंत्री महेंद्र हार्डिया, महापौर कृष्णमुरारी मोघे, वरिष्ठ पत्रकार अभय छजलानी, सिम्स के डायरेक्टर डॉ. विनोद भंडारी, वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा, वरिष्ठ छाया चित्रकार उमेश मेहता, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के उपाध्यक्ष जीएम म्हाले, मुंबई के उपमहापौर मोहन मिठगांवकर, समाजसेवी निर्मल जैन, मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री पुष्पराजसिंह उपस्थित थे।
    
वरिष्ठ पत्रकार अभय छजलानी ने कहा कि प्रिंट मीडिया को अपना तेवर, स्वरूप और सामग्री में बदलाव करने की जरूरत है, क्योंकि तत्काल जानकारी देने का काम इलेक्ट्रानिक मीडिया कर रहा है। प्रिंट मीडिया का महत्व कम नहीं हुआ है। वहीं इलेक्ट्रानिक मीडिया का महत्व बढ़ता जा रहा है। इंदौर ने देश को कई पत्रकार दिए हैं। ऐसे पत्रकारों का निर्माण सतत होना चाहिए। इस तरह के भाषाई पत्रकारिता महोत्सव से विचारों के आदान-प्रदान का एक नया रास्ता बना है। इंदौर प्रेस क्लब द्वारा शोध आधारित संस्था शुरू होने से गंभीर और सार्थक विषयों पर अनुसंधान होंगे।

महापौर श्री कृष्णमुरारी मोघे ने कहा कि इस महोत्सव से जो निष्कर्ष निकलेंगे उसका समाज पर सार्थक प्रभाव पड़ेगा। महोत्सव में वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा और वरिष्ठ छाया चित्रकार उमेश मेहता ने भी आयोजन की खुलकर सराहना की। अध्यक्षीय उदबोधन में प.पू. उत्तम स्वामीजी ने कहा कि ऐसे आयोजन समाज में जाग्रति पैदा करते हैं। ऐसे कार्यक्रमों की उपयोगिता आज के परिप्रेक्ष्य महत्वपूर्ण है। स्वागत उदबोधन इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने दिया। संचालन महासचिव अरविंद तिवारी ने किया। आभार कोषाध्यक्ष कमल कस्तूरी ने माना।

मीडिया अब उन्हीं खबरों को दिखाता है जो बाजार को प्रमोट करती है

: भाषाई पत्रकारिता महोत्सव : ‘खबरों पर सवार बाजारवाद’ विषय पर टॉक शो : इंदौर। इंदौर प्रेस क्लब द्वारा आयोजित सार्क देशों के भाषाई पत्रकारिता महोत्सव के पांचवें सत्र के टॉक शो ‘खबरों पर सवार बाजारवाद’ पर बहस का सबसे बड़ा दिलचस्प हिस्सा था, वक्ताओं द्वारा विषय की रोचकता को अंत तक जस का तज बनाए रखा। खबरों पर सवार बाजारवाद एक ऐसा विषय जो यदि आम जनता के बीच होता तो शायद एक सी प्रतिक्रियाएं सुनने को मिलतीं, लेकिन चूंकि यह पत्रकारों के हिस्से था, इसलिए कमाल ये हुआ कि एक ही मुद्दे पर एक सी प्रतिक्रियाओं को पत्रकारों ने अपनी-अपनी जुबान में श्रोताओं तक पहुंचाया।

साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार प्रभु जोशी ने कहा कि बाजार को इसलिए बढ़ावा मिला, क्योंकि मीडिया को बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने संचालित करना शुरू कर दिया। इसे और भी बढ़ावा तब मिला जब संपादकीय व्यवस्था खत्म हुई। वरिष्ठ पत्रकार आकाश सोनी ने कहा कि बाजारवाद को कोसने से बेहतर है हम अपनी शक्ति पहचाने। यही सही है कि हम भटके थे, लेकिन अब संभलना जरूरी है। बाजार ने भी कुछ चीजें तय करना शुरू की है, लेकिन हमारे पास भी अभी बहुत कुछ बाकी है तय करने के लिए। हमें पॉवर ऑफ नो का इस्तेमाल करना होगा। क्या होगा नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा तो ठीक है कम से कम खुद के सम्मान में समझौता तो नहीं करना होगा। वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश हिन्दुस्तानी ने कहा कि मीडिया अब उन्हीं खबरों को दिखाता है जो बाजार को प्रमोट करती है। बाजारवाद, पत्रकारिता की पीठ पर बेताल की तरह सवाल हो गया है।
    
इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के अध्यक्ष के. विक्रमराव ने कहा कि मिशन, प्रोफेशन से अब मालिकों के कमीशन में तब्दील हो चुका है। यदि पत्रकारों को सच लिखने पर पाबंदी है तो गुजारिश है कि वे झूठ भी न लिखे। वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र दुबे ने कहा कि पत्रकारिता अब जनोन्मुखी नहीं धनोन्मुखी हो गई है, शायद इसलिए कार्पोरेट की आवाज बन चुकी है। यह वह दौर है जब मीडिया की प्राथमिकता उपभोक्तावाद ही तय कर रहा है। जरूरत है खबरों और विज्ञापनों में संतुलन बनाए रखी की है। पत्रकार निमिष कुमार दुबे ने कहा कि यह सच है कि आज यदि किसी भी अखबार के चार संपादक  एक साथ मिलते हैं और चर्चा करते हैं, तो  वो बात किसी खबर पर नहीं बाजार में बने रहने की नीतियों पर होती है, दूसरे प्रतियोगी को पछाड़ने पर होती है। वरिष्ठ पत्रकार अनिल शर्मा ने कहा कि अखबार को बाजारवाद में धकेलने वाला भी तो पत्रकार खुद ही है। बाजार में जो कॉम्पीटिशन है उसमें संघर्ष वहीं कर सकता है, जो फिट है और फिट कभी भी बाजार के मुताबिक विचार नहीं बदलता। इसलिए असली लड़ाई खुद से हैं। वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा बाजार और पत्रकारिता में आज कुछ ऐसा संबंध है जैसा राजनीति व आपराधिक तत्वों में, भले ही बाजारवाद ने पत्रकारिता को अपने दरवाजे पर बांध रखा हो, पत्रकारों को जरूरी है अपनी जिम्मेदारियों के साथ एक खबर ऐसी दें जो देशहित, समाजहित में हो।
    
पत्रकार सुश्री पलक शर्मा ने कहा कि हर कोई टीआरपी के फेर में उलझा है, फिर चाहे इलेक्ट्रॉनिक हो या प्रिंट मीडिया। उन खबरों को तवज्जों नहीं दी जाती जो भले ही सही पत्रकारिता के लिहाज से मीडिया की सुर्खियां बनना चाहिए, उन्हें दिखाया जाता है जिन्हें लोग देखना चाहते हैं। पत्रकार एवं साहित्यकार आलोक श्रीवास्तव ने कहा कि पत्रकारिता कभी उद्देश्य हुआ करती थी, लेकिन अब हम बाजार का हिस्सा हो गए हैं तो लोग हमें खरीदेंगे ही। चूंकि हमारी जरूरते बढ़ी हैं, मीडिया ने अपने इन्‍फ्रास्ट्रक्चर को बड़ा कर लिया है। शायद यही वजह है जरूरतें और सुविधाएं जुटाने के लिए यह बाजारवाद हावी हो गया है। अतिथियों का स्वागत नितिन माहेश्वरी, आलोक ठक्कर, अशोक शर्मा, विजय अड़ीचवाल, प्रदीप जोशी, मार्टिन पिंटो आदि ने किया। संचालन सचिव संजय लाहोटी ने किया। विषय प्रवर्तन उपाध्यक्ष अमित सोनी ने किया।

जन आंदोलन से परहेज क्‍यों करती है सरकार?

: भाषाई पत्रकारिता महोत्सव : ‘जन आंदोलनों में मीडिया की भूमिका’ विषय पर टॉक शो : इंदौर। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, म्यांमार आदि पड़ोसी देशों में मीडिया की हालत भारत के मीडिया से बदतर है। भारत के मीडिया से जुड़े पत्रकारों को पड़ोसी देशों में जाकर वहां के मीडिया में क्या चल रहा है इसकी जानकारी लेते रहना चाहिए। इंदौर प्रेस क्लब द्वारा आयोजित सार्क देशों के भाषाई पत्रकारिता महोत्सव में आकर कई पत्रकारों को इस बात की जानकारी मिली। अत: इस तरह के आयोजन प्रेस क्लब आगे भी कराता रहे और अपना दायरा भी बढ़ाएं। ताकि अन्य मुल्कों में क्या हो रहा है इसकी भी जानकारी भारतीय मीडिया को मिलती रहे।

यह कहना है प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य एवं वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का। वे जन आंदोलनों में मीडिया की भूमिका विषय पर आयोजित टॉक शो को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मीडिया की संवेदनशीलता कम हुई है और वह बंटा हुआ है। देश में नर्मदा बचाओ आंदोलन, मनरेगा में हुआ भ्रष्टाचार को लेकर आंदोलन सहित जल, जमीन और जंगल को बचाने को लेकर आंदोलन हो रहे हैं, लेकिन इन आंदोलन के बारे में मीडिया के लोगों को सीमित जानकारी मिल रही है। इससे पूर्व गांधीजी का आंदोलन, जेपी आंदोलन, विनोबा भावे का भू-दान आंदोलन चला। इन आंदोलनों में बड़ी संख्या में लोगों ने जनभागीदारी की थी, जबकि उस समय मीडिया का इतना विस्तृत रूप नहीं था। उन्होंने कहा कि मीडिया चाहे तो किसी जन आंदोलन को शीर्ष पर पहुंचा सकता है और चाहे तो उसे खत्म कर सकता है, क्योंकि मीडिया की ताकत बहुत बढ़ गई है। सरकार किसी भी पार्टी की हो वह मीडिया की आवाज को खत्म करना चाहती है। यह बात भारत में ही नहीं, कई पड़ोसी मुल्कों में भी लागू होती है। ऐसे में मीडिया को बहुत सजग रहने की जरूरत है।
    
वरिष्ठ पत्रकार उमेश त्रिवेदी ने कहा कि सरकार किसी की भी हो उसे जन आदोलन पसंद नहीं आता। इसलिए वह इसे खत्म करना चाहती है। मीडिया को कभी इस भ्रम में नहीं जीना चाहिए कि वह किसी जन आंदोलन का सूत्रधार है। मीडिया आंदोलन को हवा देता है। वह भी तब तक, जब तक आंदोलन में मीडिया को पहले अपनी भूमिका तय कर लेना चाहिए। आरक्षण विरोधी आंदोलन, राम मंदिर आंदोलन में मीडिया की भूमिका रही। आज आम लोगों की जरूरत मीडिया बन चुका है। इसलिए मीडिया में किसी भी तरह की मिलावट नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज मीडिया ने उद्योग का रूप ले लिया है। इसमें ९३२ मिलियन डालर पैसा लगा है। जो २०१५ में १५०० मिलियन डालर हो जाएगा। दरअसल, आज के रीडर्स को अच्छी सामग्री का ग्लैमर और गॉसिप चाहिए। यही कारण है कि आज मीडिया में नंगे चित्रों की भरमार है।
    
इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जनर्लिस्ट यूनियन के अध्यक्ष के. विक्रमराव ने कहा कि जन आंदोलन में मीडिया की भूमिका सशक्त होना चाहिए। जो लोग गलत कर रहे हैं या देश की गुमराह कर रहे हैं। उनके खिलाफ मीडिया को खुलकर बोलना चाहिए। मलेशिया से आए वरिष्ठ पत्रकार चेतन कुलकर्णी कहा कि आज मालिक ही तय करता है कि अखबार में क्या छपना चाहिए और क्या नहीं। पैकेज का जमाना है। रिपोर्टरों को भी जब खबरों के लिए अलग से कमीशन मिलेगा तो पत्रकारिता की छवि स्वच्छ और स्पष्ट कैसे रह पाएगी।
    
नेपाल में स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे नारायण वागले ने कहा कि किस तरह मीडिया ने राजशाही के खिलाफ जनता का सपोर्ट किया था। उन्होंने कहा २००५ में जब हर कोई नेपाल में लोकतंत्र चाहता था, तब कोई ऐसा वर्ग भी था जो राजशाही के ही पेâवर में था, चूंकि, नेपाल की अधिकांश जनता लोकतंत्र के समर्थन में थी इसलिए हमने भी मीडिया का रुख सिर्फ लोकतंत्र की स्थापना की ओर ही रखा और इस तरह हमने जनांदोलन में अहम भूमिका निभाई थी। इस मौके पर काठमांडू पोस्ट के अमित शर्मा ढकाल भी मौजूद थे, जिन्होंने भी २००५ के आंदोलन का जिक्र किया।
    
भूटान के रिनझिन वांगचु ने कहा कि भूटान की स्थिति एकदम अलग है, वहां अब तक कोई ऐसी स्थिति नहीं बनी है कि जब कोई जनांदोलन छेड़ना पड़े और शायद इसलिए कोई आंदोलन हुआ भी नहीं, न ही मीडिया का कोई अहम रोल हुआ। वहां परिस्थितियां सामान्य है। सिलोन टुडे श्रीलंका के वरिष्ठ पत्रकार ललीथ अल्लाहकून ने कहा कि हिन्दुस्तान में मीडिया की आजादी को देख मैं अभिभूत और आश्चर्यचकित हूं। हमारे यहां मीडिया को आजादी नहीं है, प्रेस पर बैन है। सरकार जब चाहे तब मीडिया पर पाबंदी लगा देती है। उन्होंने अपने अनुभव को शेयर करते हुए कहा कि मैं खुद सरकार के आदेश पर दो महीनों तक अन्य किसी देश में रिफ्यूजी की तरह रहा। संचालन डॉ. सुशीम पगारे ने किया। विषय प्रवर्तन उपाध्यक्ष सुनील जोशी ने कहा। आभार इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने माना। अतिथियों का स्वागत सुनील जोशी, अमित सोनी, संजय लाहोटी, कमल कस्तूरी, सुरेंद्र जोशी, रूपेश व्यास ने किया। टॉक शो में बड़ी संख्या में संपादक, पत्रकार और शोधार्थी उपस्थित थे।

जनसंपर्क मंत्री के आदेश पर बनेगी पत्रकारों की कुंडली

मध्‍य प्रदेश शासन के जनसंपर्क विभाग को उन्हीं के मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने फरमान भेजा है, जिसके मुताबिक अब तहसील स्तर तक के कलम घिसने वाले भाइयों की कुंडली तैयार की जाये. इससे अहसास हो रहा है कि चुनाव करीब हैं और ऐसे में मीडिया की अनदेखी सरकार को भारी न पड़ जाये, इसलिए पत्रकारों की जमात सूचीबद्ध करने की कोशिश की जा रही है. शायद शर्मा जी को यह मालूम नहीं है कि पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है. शोषण का शिकार है. अखबार मालिकों का सताया है.

एक पत्रकार किसी आम व्यक्ति की समस्या के प्रति तो गंभीरता से लड़ता है, किन्तु उसका हक सदैव मारा जाता है. मगर बेचारा चौथा स्तम्भ खामोश रहता है. पत्रकारों की याद ऐसे भला कैसे आ सकती है, जो जनसंपर्क विभाग पत्रकारों को प्रेसनोट भेजने में लकवाग्रस्त दीखता है, वो इतना फिक्रमंद भला कैसे हो गया? खबर मिली की मंत्री जी की उपस्थिति में राजधानी में बैठक हुई. इसी का असर चिट्ठी के रूप में पत्रकारों तक पहुंचा. जिसका अर्थ यह है- तहसील स्तर से लेकर जिले में कार्य करने वाले पत्रकारों की सूची तैयार हो रही है.

इसलिए वाकई लिखने वाले पत्रकारों को अपनी पूरी जानकारी यानी नाम, संस्‍थान का नाम, परिचय पत्र की कॉपी, ई-मेल पता, मोबाइल नंबर, आवास का पता दर्ज करना होगा. आश्चर्य की बात है कि प्रदेश के जनसंपर्क दफ्तरों में शायद ही पत्रकारों का ब्योरा होगा, लेकिन मंत्रीजी के आदेश से कम से कम पत्रकार तो सूचीबद्ध हो जायेंगे. हालाँकि इसमें पत्रकारों का कितना लाभ होगा यह तो भगवन जाने. हाँ! चुनावी विज्ञप्ति जरूर आपको मिल जायेगी.

दिलीप सिकरवार

9425002916

दैनिक जागरण, हरियाणा में कई लोगों का तबादला

दैनिक जागरण प्रबंधन ने हरियाणा में कई लोगों का तबादला किया है. पानीपत में तैनात सीनियर सब एडिटर संजय झा का तबादला प्रबंधन ने पटना के लिए कर दिया है. संजय जीएम निशिकांत ठाकुर के नजदीकी माने जाते हैं. सूत्रों का कहना है कि वे पटना जाने के लिए लंबे समय से प्रयासरत थे. संजय मूल रूप से बिहार के ही रहने वाले हैं.

पानीपत से चीफ सब एडिटर राकेश सिंह का तबादला हिसार के लिए कर दिया गया है, जबकि हिसार में चीफ सब एडिटर के पद पर कार्यरत बीरेंद्र को पानीपत भेजा गया है. बताया जा रहा है कि दोनों लोगों को उनकी इच्‍छा के विपरीत तबादले की सजा दी गई है. दोनों लोगों को घर से दूर कर दिया गया है.

इसके अलावा सीनियर सब एडिटर कुलदीप बांगर को अंबाला में रिपोर्टिंग में भेजा गया है, जबकि अंबाला में रिपोर्टर अजयदीप लाठर को पानीपत बुला लिया गया है. कुरुक्षेत्र के रिपोर्टर विनोद मेहला को रोहतक और रोहतक के रिपोर्टर संजय कुमार को कुरुक्षेत्र भेजा गया है. बता दें कि दैनिक जागरण में सभी यूनिट से ट्रांसफर की लिस्‍ट एचआर एडिटोरियल को भेजी गई थी. इसी तरह पूरे ग्रुप में ट्रांसफर की प्रक्रिया चल रही है.   

यहां 86754 पत्र-पत्रिकाएं छपती हैं और 833 टीवी चैनल हैं

: भाषाई पत्रकारिता महोत्सव : ‘युवा, सोशल मीडिया और देश निर्माण’ विषय पर टॉक शो : इंदौर। सोशल मीडिया का देश में अपना एक विशिष्ट स्थान है और मैं उसका सम्मान करता हूं। प्रेस की स्वतंत्रता पर रोक लगाने का काम संप्रग सरकार नहीं कर रही। मीडिया स्वयं अपनी एक रेग्यूलेटर बॉडी बनाकर उस पर नियंत्रण करें। यह कहना है केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी का। वे इंदौर प्रेस क्लब के प्रतिष्ठा प्रसंग सार्क देशों के भाषाई पत्रकारिता महोत्सव में बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित थे।

इस मौके पर मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव पंकज शर्मा, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य एवं वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग, सांसद प्रेमचंद गुड्डू, इंडियन पेâडरेशन ऑफ वर्विंâग जनर्लिस्ट यूनियन के अध्यक्ष के. विक्रमराव, वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव, दैनिक हिन्दुस्तान के राजनीतिक संपादक निर्मल पाठक एवं प्रदेश टुडे के सीएमडी हृदयेश दीक्षित बतौर विशेष अतिथि मंच पर मौजूद थे। इस मौके पर दक्षिण एशियाई देशों के कई वरिष्ठ पत्रकार भी उपस्थित थे। उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने ‘युवा, सोशल मीडिया और देश निर्माण’ विषय पर अपने विचार व्यक्त किए।
    
श्री तिवारी ने कहा कि भारत विधिताओं से भरा देश है। यहां ८६७५४ पत्र-पत्रिकाएं छपती है और ८३३ टीवी चैनल हैं जो अगले वर्ष बढ़कर एक हजार हो जाएंगे। यूपीए सरकार का मानना है कि प्रसारण में खोखलापन नहीं होना चाहिए। मैं सूचना प्रौद्योगिकी संगठन पर सदैव विश्वास करता हूं। साथ ही इंटरनेट का भी समर्थन करता हूं। सोशल साइट्स पर संवाद होना चाहिए, लेकिन दूसरों की निजता और उसकी सुरक्षा का भी हमें ख्याल रखना होगा। उन्होंने आगे कहा कि केंद्रीय मंत्री बनने के बाद मैं भी सोशल साइट्स के माध्यम से लोगों से संवाद करता हूं। पत्रकारिता में सभी का सहमत होना जरूरी नहीं। असहमति की स्थिति में आप कोर्ट की शरण भी ले सकते हैं। श्री तिवारी ने इंदौर प्रेस क्लब की सक्रियता की तारीफ करते हुए भविष्य में स्थापित होने वाले राष्ट्रीय शोध केंद्र के लिए मंत्रालय की ओर से हरसंभव मदद देने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि इंदौर प्रेस क्लब शीघ्र ही शोध केंद्र के संदर्भ में प्रस्ताव तैयार कर केंद्र सरकार को भेजें।
    
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य एवं वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने कहा कि देश और दुनियाभर की सरकारों को सोशल मीडिया शूल की तरह चुभ रहा है। मीडिया को दबाने की साजिश जारी है। बोलने और लिखने की आजादी पर पाबंदी लगा रही है। सरकार की अनुदारता इस कदर है कि अगर कोई कार्टूनिस्ट कोई कार्टून बनाता है तो सरकार उस पर पाबंदी लगा देती है। सोशल साइट्स की बढ़ती ताकत से सरकार डरी हुई है। टीवी पत्रकार राहुल देव ने कहा कि सोशल साइट्स के फायदे अनेक हैं। इंटरनेट और मोबाइल ने दुनिया में बड़ी क्रांति की। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। मोबाइल इंटरनेट, पेâसबुक, ट्विटर आदि के माध्यम से लोग एक दूसरे के साथ सार्थक संवाद कर रहे हैं। सोशल मीडिया आज टीवी चैनलों के एजेंडे तय कर रहा है।
    
मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया ने कहा कि भाषाई पत्रकारिता महोत्सव के माध्यम से जो अमृत निकलेगा वह समाज को चेतनशील बढ़ाने में मददगार होगा। पत्रकारिता समाज का आइना है और प्रजातंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ। मीडिया के पास किसी हीरो को जीरो और किसी जीरो को हीरो बनाने की ताकत है। उन्होंने आगे कहा कि देश में सूचना क्रांति को लाने में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की भूमिका अग्रणी रही। अब उनके कामों को सोनिया गांधी आगे बढ़ा रही है। श्री भूरिया ने कहा कि इंदौर प्रेस क्लब में शोध आधारित पत्रकारिता संस्थान बनना चाहिए। इसके लिए केंद्र का सहयोग जरूरी है।
    
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव एवं पूर्व पत्रकार पंकज शर्मा ने कहा कि आज के युवा कम्प्यूटर और इंटरनेट पर अधिक समय बीता रहा है। घरों में, परिवारों में संवाद ही नहीं हो रहा है। यह लोगों को जोड़ने के बजाय दूर कर रहा है। सोशल गतिविधियों में दिलचस्पी के बजाय लोग सोशल मीडिया का अन्य गतिविधियों के लिए ज्यादा उपयोग कर रहे हैं। श्री शर्मा ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री से अनुरोध किया कि स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर इंदौर प्रेस क्लब में स्थापित होने वाले पत्रकारिता के राष्ट्रीय शोध केंद्र के लिए हर संभव मदद करें। उन्होंने कहा कि इंदौर प्रेस क्लब ने अपनी व्यापक गतिविधियों से साबित किया है कि वे ऐसे शोध केंद्र के हकदार हैं।
    
वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने सरकार को सोशल मीडिया की ताकत को महत्व पहचानने की समझाइश दी। उन्होंने कहा कि तकनीक के सही और गलत दोनों ही परिणाम होते हैं, लेकिन सोशल मीडिया ने आज जिस तरह वर्गों के भेद को खत्म किया है, अनंत संवादों को जन्म दिया है वो महत्वपूर्ण है। मेरे ख्याल में इसमें नेताओं को भी उतरकर सीधे लोकतांत्रिक संवाद स्थापित करना चाहिए। इंडियन पेâडरेशन ऑफ वर्विंâग जनर्लिस्ट यूनियन के अध्यक्ष के. विक्रमराव ने कहा कि प्रजातंत्र में मीडिया बहुत ताकतवर बनकर उभरा। वह संसद को हिला सकता है। इसका उदाहरण गत वर्ष देखने को मिला।

प्रारंभ में स्वागत उदबोधन में अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने कहा कि यह वर्ष इंदौर प्रेस क्लब का स्वर्ण जयंती वर्ष है और इसकी शुरुआत हम आज दक्षिण एशियाई सहयोग संगठन यानी सार्क के सदस्य देशों के भाषाई पत्रकारिता महोत्सव से कर रहे हैं। अपनी तरह के इस अनूठे और महत्वाकांक्षी अंतरराष्ट्रीय आयोजन के अवसर पर मैं यहां पधारे हमारे सभी विशिष्ट अतिथियों का, इंदौर प्रेस क्लब के निमंत्रण पर देश-विदेश से आए तमाम पत्रकार साथियों का और आप सभी का इंदौर प्रेस क्लब की ओर से हार्दिक अभिनंदन और स्वागत करता हूं। मित्रों यह इंदौर शहर के लिए ही नहीं बल्कि मध्य प्रदेश के लिए भी हर्ष और गौरव की बात है कि यहां पहली बार सार्क देशों के पत्रकार भाषाई पत्रकारिता की चुनौतियों और संभावनाओं पर विचार-विमर्श के लिए जुटे हैं।

मित्रों, सार्क के सभी सदस्य देश भले ही अपनी-अपनी भौगोलिक सीमाओं और भाषाओं के स्तर पर अपनी अलग पहचान रखते हों, पर आर्थिक, सामाजिक सांस्कृतिक तौर पर उनके बीच कई ऐसी समानताएं, संभावनाएं और चुनौतियां विद्यमान है जो उन्हें एक विशाल परिवार का रूप देती है। यही नहीं, सभी सार्क देशों का प्राकृतिक परिवेश भी आपस में काफी मिलता-जुलता है। जाहिर है कि जब सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक तौर पर हमारे बीच इतनी अधिक समानता हो तो हमारी भाषाई पत्रकारिता को भी इससे अलग रखकर नहीं देखा जा सकता। आखिर हर भाषा की पत्रकारिता अपने  समाज का आईना ही होती है जो समाज की सभी अच्छाइयों और बुराइयों का दिग्दर्शन कराती है।

मैं समझता हूं कि सार्क के सभी सदस्य देशों में भाषाई पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां भी कमोबेश समान है और उनके सामने संभावनाएं भी एक जैसी है। यही वजह है कि हमने इस वृहद आयोजन के दौरान जनांदोलनों में मीडिया की भूमिका, युवा शक्ति का रचनात्मक इस्तेमाल, सोशल मीडिया की सीमाएं और संभावनाएं, साहित्य का भविष्य, खबरों पर हावी होता बाजारवाद और चुनाव सुधार जैसे अहम मसले विचार-विमर्श के लिए चुने हैं। दरअसल, ये सभी वे मुद्दे हैं जो किसी एक देश से नहीं बल्कि सभी सार्क देशों से, वहां के समाज से और आम अवाम से ताल्लुक रखते हैं। मित्रों, इंदौर शहर मध्य प्रदेश का सबसे उन्नत, शिक्षित और सुसंस्कृत शहर है। एक तरह से यह शहर आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तौर पर समूचे प्रदेश को नेतृत्व देने काम करता है। यह शहर अपनी इस महती भूमिका को महज पिछले कुछ वर्षों से ही नहीं बल्कि इस प्रदेश की स्थापना के समय से ही निभा रहा है। यही वजह है कि आज भी इस इंदौर शहर को न्यायप्रिय और प्रजापालक शासिका देवी अहिल्याबाई होलकर, महान शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खां साहब, अपने समय के महान क्रिकेटर कैप्टन मुश्ताक अली और कर्नल सी.के. नायडु, उच्चकोटि के विश्वप्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन और सुर साधिका लता मंगेशकर जैसी महान और कालजयी हस्तियों के नाम से देश-दुनिया में जाना जाता है। राजनीति के क्षेत्र में भी कॉमरेड होमी दाजी और लाडली मोहन निगम जैसे जुझारू और विशिष्ट राजनेताओं का ताल्लुक इसी इंदौर शहर से रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में यह शहर इसलिए भी देश में अपना विशिष्ट स्थान रखता है कि यहां आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थान  हैं। इसके अलावा इंफोसिस और टीसीएस, सिमबायसेस, सहारा, मेदांता, नसीमुजी, रिलायंस जैसे बड़े अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के बड़े समूहों ने भी इस शहर में आने के लिए दस्तक दे दी है।

जहां तक पत्रकारिता की बात है, समाचार पत्रों के प्रकाशन के लिहाज से तो यह शहर लंबे समय से प्रदेश का ही नहीं बल्कि देश का अग्रणी केंद्र बना हुआ है ही, इलेक्ट्रानिक मीडिया के मामले में भी यह शहर देश में अपनी पहचान बना रहा है। दस से अधिक पत्रकारिता एवं जनसंचार संस्थान यहां हैं जहां देश के विभिन्न इलाकों से आए हजारों छात्र यहां पत्रकारिता का कोर्स कर रहे हैं। भारत की भाषाई पत्रकारिता में तो इंदौर की पहचान ही एक विशिष्ट पत्रकारीय घराने के तौर पर होती है। इस घराने ने ही राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, राहुल बारपुते, शरद जोशी और अभय छजलानी जैसे राष्ट्रीय ख्याति के संपादक और पत्रकार दिए हैं तथा श्रवण गर्ग और वेदप्रताप वैदिक सहित कई प्रतिष्ठित पत्रकार आज भी राष्ट्रीय फलक पर छाए हुए हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारिता के क्षेत्र में इंदौर घराने की परंपरा को विशिष्टता प्रदान करने में इन यशस्वी संपादकों और पत्रकारों के साथ ही एक संस्था के तौर पर इंदौर प्रेस क्लब की भी अहम भूमिका रही है। सीमांत गांधी और बादशाह खान के नाम से मशहूर पख्तून नेता खान अब्दुल गफ्फार खान, लोकनायक जयप्रकाश नारायण, निर्वासित तिब्बती नेता दलाई लामा, समय-समय पर देश के प्रधानमंत्री रहे नेताओं में श्रीमती इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, पीवी नरसिंहराव, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, इंद्रकुमार गुजराल के अलावा कॉमरेड ए.एस. डांगे, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडिस, राजनारायण, लालकृष्ण आडवाणी जैसे विशिष्ट राजनेताओं के साथ ही हमारे लोकजीवन को प्रभावित करने वाले कई विशिष्ट साहित्यकार, कवि, लेखक, पत्रकार, रंगकर्मी, चित्रकार, खेल और सिने जगत की हस्तियां, न्यायविद, वैज्ञानिक, शिक्षाविद, डॉक्टर, समाजकर्मी, धर्मगुरू और उच्च पदस्थ प्रशासनिक अधिकारी समय-समय पर इंदौर प्रेस क्लब में आ चुके हैं और यह सिलसिला आज भी जारी है।

आपको यह जानकारी देते हुए मुझे बड़ा फख्र हो रहा है कि इंदौर प्रेस क्लब आने वाले समय में अपने यहां एक विशाल और बहुआयामी शोध संस्थान की स्थापना करने जा रहा है। शोध आधारित पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए मध्य प्रदेश सरकार के सहयोग से स्थापित होने वाला यह देश में अपनी तरह का पहला शोध संस्थान होगा। यह शोध केंद्र कैसा हो, इसके लिए हमने कुछ दिनों पहले भोपाल में देश के जाने-माने विशेषज्ञों को आमंत्रित कर उनसे भी मार्गदर्शन प्राप्त किया है।

इंदौर प्रेस क्लब अपने सदस्यों के लिए विभिन्न पेशागत गतिविधियां तो निरंतर संचालित करता ही है, इसके अलावा उनके वेलफेयर के लिए के लिए भी कार्यक्रम और योजनाएं प्रेस क्लब की ओर से संचालित की जा रही हैं। इंदौर प्रेस क्लब पिछले पांच वर्षों से भाषाई पत्रकारिता महोत्सव का आयोजन कर रहा है इस बार अपनी स्थापना के पचासवें वर्ष में प्रवेश करने के मौके पर आयोजित सार्क देशों का यह भाषाई पत्रकारिता महोत्सव भी पत्रकारिता के इंदौर घराने की और इंदौर प्रेस क्लब की गौरवमयी परंपरा की नई कड़ी ही है।  यहां मैं यह उल्लेख भी करना चाहूंगा कि हमारे पिछले दो आयोजनों में देश के दो उपराष्ट्रपति श्री भैरोसिंह शेखावत और डॉ. मोहम्मद हामिद अंसारी भी बतौर मुख्य अतिथि शिरकत कर चुके हैं।

अतिथि स्वागत अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल, पूर्व अध्यक्ष शशीन्द्र जलधारी, ओमी खंडेलवाल, जीवन साहू, कृष्णकुमार अष्ठाना, विकास मिश्रा, सतीश जोशी, जयकृष्ण गौड़ ने किया। इस अवसर पर अतिथियों ने इंदौर प्रेस क्लब की स्मारिका अन्वेषण का विमोचन भी किया। स्मारिका के संपादक शशीन्द्र जलधारी ने स्मारिका की जानकारी दी। प्रारंभ में अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन कर महोत्सव का शुभारंभ किया। संचालन महासचिव अरविंद तिवारी ने किया। आभार सचिव संजय लाहोटी ने माना।

स्वतंत्र विचारों से पैदा होती है असहमति

: भाषाई पत्रकारिता महोत्सव : ‘असहमति में क्यों हैं आक्रमकता’ विषय पर टॉक शो : इंदौर। इंदौर प्रेस क्लब के प्रतिष्ठा प्रसंग सार्क देशों के भाषाई पत्रकारिता महोत्सव की शुरुआत गुरुवार २८ मार्च २०१३ को टॉक शो से हुई, जिसका विषय था ‘असहमति में क्यों है आक्रमकता’। इस विषय पर शिक्षाविद पत्रकार, साहित्यकार एवं विचारकों ने अपनी बात बेबाकी के साथ रखी। सभी ने इस बात को एकमत से स्वीकारा कि प्रजातंत्र में असहमति एवं किस्म का आलोचनात्मक हथियार है और इस पर आक्रमकता नहीं होना चाहिए। घर परिवार से लेकर राष्ट्र तक असहमतियां होती है, लेकिन उसे हम एक बहस के रूप में लें, स्वस्थ आलोचना के रूप में लें पर उसको दबाएं नहीं। वरना ये आक्रमकता एक तरह की सामंतवादी या हिटलरशाही होगी।

वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने कहा कि क्या हम घर-परिवार में वास्तव में अपने बच्चों की असहमति को बढ़ावा दे रहे हैं। क्या एक विद्यार्थी जब शिक्षक के प्रति असहमति दिखाता है तो क्या शिक्षक हिटलर नहीं बनता। एक संपादक की बात पर रिपोर्टर असहमति दिखाता है तो क्या संपादक उसे स्वीकारता है। दरअसल असहमति स्वतंत्र विचारों से पैदा होती है। चूंकि, भारत एक प्रजातांत्रिक देश है, इसलिए असहमति होना जरूरी है।
    
साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार प्रभु जोशी ने कहा कि मीडिया और माफिया की युक्ति से असहमति को दबाया जा रहा है। मीडिया हमारी सोच को बदल रहा है। वह एफडीआई को बढ़ावा दे रहा है। मीडिया ही हमें पश्चिम की तरफ देखकर हमारे सपने पूरे होने की शिक्षा दे रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने के बाद राज्यों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन को बेच दिया। हमारा समाज राज्यों की कार्यप्रणाली पर असहमति व्यक्त करता है पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कामकाज पर नहीं। १९९१ के बाद देश में ग्लोबलाइजेशन आया, उसके बाद सच कच्चे माल की तरह बिक रहा है। लादेन के अफगानिस्तान में अमेरिका उस राष्ट्र को समाप्त कर देता है तो कभी इराक को बम बताकर उसे खत्म कर देता है। यानी छोटे लोगों की असहमति को दबाने का क्रम जारी है।
    
विचारक एवं शिक्षा शास्त्री सुषमा यादव ने कहा कि हमारे बच्चे परिवार से नहीं, टीवी, रेडियो, इंटरनेट, पेâसबुक, ट्विटर आदि से सीख रहे हैं, क्योंकि बड़ों के पास वक्त नहीं है अपने बच्चों से बात करने का। घर में सुनने सुनाने की परंपरा खत्म होती जा रही है। एक तरफ राजनीति को घृणा की दृष्टि से देखते हैं तो दूसरी तरफ उसे बदलाव की अपेक्षा करते हैं। ये संभव नहीं है। हमें अपने संविधान के प्रति सम्मान करना सीखना होगा। आलोचक रोहिणी अग्रवाल ने कहा कि हरियाणा के बच्चे सेना, खेल या पुलिस विभाग में जाते हैं पर उनमें अनुशासन की कमी होती जा रही है, जबकि ये तीनों ही विभाग अनुशासन की सबसे अधिक वकालत करते हैं। एक तरफ हरियाणा की महिला पीएचडी कर स्वयं को अधिक शिक्षित होने का दंभ भर रही है। उसी हरियाणा में सबसे अधिक कन्याभ्रूण हत्या हो रही है। उन्होंने कहा कि असहमति का सबसे बड़ा उदाहरण है ऑनर कीलिंग और यह आक्रामकता और असहमति उपजी है विचारशीलता की कमी से। उन्होंने कहा कि परिवार के साथ ही शिक्षा भी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है जहां शिक्षक सिर्पâ अपना आर्थिक आधार सुधारता है न कि नई पीढ़ी के भविष्य को गढ़ता है। वर्तमान क्षेत्र में सिनोप्सिस से लेकर वायवाय तक के पैकेज तय हैं। यहां किसान खेती बेचकर अपने स्टेट्स को संवार रहे हैं, फिर चाहे वो गैर लाइसेंसी हथियार के जखीरा रखने की बात हो या पैसों के दम पर राजनीति में घुसपैठ की। अपने अध्यक्षीय उदबोधन में डॉ. शरद पगारे ने कहा कि सरकार असहमति को दबाने का काम कर रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण अण्णा हजारे के आंदोलन को विफल करना है।
    
प्रांजल धर ने कहा कि लोकतंत्र में जनता की आवाज को अनसुना कर दिया गया है। हमें दो विकल्प में से एक चुनना है। दो विकल्पों के बाहर चुनने की स्वतंत्रता नहीं है। अतिथि स्वागत प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल, मुवुंâद कुलकर्णी, सुनील तिवारी, अतुल लागू, रानी तिवारी, विजय अड़ीचवाल आदि ने किया। टॉक शोक का संचालन राहुल ब्रजमोहन ने किया। आभार प्रेस क्लब महासचिव अरविंद तिवारी ने माना।

मनमोहन सरकार की जिम्‍मेदारी पर क्‍यों नहीं बोले राहुल गांधी?

कांगेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी ने अपनी फ्री स्टाइल की राजनीति के नए-नए प्रयोग शुरू कर दिए हैं। वे राजनीति की तमाम पारंपरिक शैलियों की लक्ष्मण रेखा तोड़ते नजर आते हैं। शायद इसीलिए कि उनकी छवि कुछ अलग किस्म की बन जाए। पार्टी में औपचारिक रूप से उनकी नंबर दो की हैसियत हो गई है। वे पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिए गए हैं। यह नई जिम्मेदारी मिलने के बाद उन्होंने पहली बार उद्योगपतियों के मंच पर अपना आर्थिक नजरिया देश के सामने रखा। इस मौके पर उन्होंने कई ऐसी बातें कहीं, जिससे कि लगे राहुल गांधी कुछ अलग मिट्टी के नेता हैं। वे सत्ता राजनीति में बड़े बदलाव का सपना देख रहे हैं। उन्होंने देश के समग्र विकास के लिए करोड़ों लोगों की हिस्सेदारी की हिमायत की। कह दिया कि महज चंद लोग ही निर्णायक भूमिका में रहेंगे, तो बात नहीं बनेगी।

गुरुवार को राहुल गांधी यहां उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के दो दिवसीय सालाना कार्यक्रम में बोल रहे थे। उन्होंने यह ऐलान किया कि उद्योगपतियों और कारोबारियों की मेहनत के चलते दुनिया भर में भारत की छवि बदली है। नई आर्थिक नीतियों के चलते आर्थिक विकास की रफ्तार भी तेज हुई है। जरूरत इस बात की है कि ये विकास समावेशी हो, इसमें खासतौर पर दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यक वर्गों की भी पूरी भागीदारी सुनिश्चित हो। वरना दूसरी तरह की दिक्कतें बढ़ेगीं।
 
कांग्रेस उपाध्यक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि विकास की नीतियों में ग्राम प्रधान के नजरिए की भी भागीदारी हो। वरना लोकतांत्रिक प्रकिया मजबूत नहीं हो सकती। यूं तो राहुल कांग्रेस की उस परंपरा से आगे आए हैं, जहां पर नेहरू-गांधी परिवार का सदस्य होना ही पार्टी की अगुवाई के लिए पर्याप्त योग्यता हो जाती है। राहुल कई अवसरों पर स्वीकार भी कर चुके हैं कि एक खास परिवार में जन्म लेने की वजह से उन्हें पार्टी में आगे आने का मौका मिला है। लेकिन वे खुद इस परंपरा को और आगे नहीं ले जाना चाहते।
 
उन्होंने बड़े दार्शनिक अंदाज में कह दिया कि देश के युवा बहुत उम्मीदों से भरे हैं। उनमें कुछ कर गुजर जाने की गजब की ऊर्जा है। जरूरी है कि देश के उद्योगपति इस युवा ऊर्जा का सही उपयोग करने की पहल करें। यह काम अकेले सरकार नहीं कर सकती। जरूरी है कि हमारा उद्योग केवल पैसा कमाने के बारे में न सोचे। उसे अपनी मानसिकता में समय के अनुरूप बदलाव लाना बहुत जरूरी है। यह सच्चाई है कि विकास की रफ्तार बढ़ानी है, तो ढांचागत विकास तेज करना होगा। सड़कें बनानी होंगी, बिजली की आपूर्ति ठीक करनी होगी। इसके बिना हम दुनिया के साथ  विकास की दौड़ में मुकाबला नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि आज बेरोजगारी की बहुत बात होती है। लेकिन बेरोजगारी असली समस्या नहीं है। सच्चाई तो यह है कि अच्छी ट्रेनिंग न होना हमारे यहां बड़ी समस्या है। युवाओं की ऊर्जा का बेहतर उपयोग करना है, तो शिक्षा को बाजार से जोड़ने की जरूरत है। यानि शैक्षणिक क्षेत्र में बुनियादी परिवर्तन बहुत जरूरी हो गए हैं। उन्होंने यह बात जोर देकर कही कि जनभागीदारी और नई सोच से विकास के नए रास्ते खुलेंगे।
 
उद्योगपतियों के बीच राहुल ने अपना भाषण संवाद शैली में करना पसंद किया। उन्होंने बड़ी सहजता से कई बार नाटकीय मुद्राओं के जरिए अपनी बातें रखने की कोशिश की। यह बता डाला कि कैसे उन्होंने गोरखपुर से मुंबई और बंगलुरु आदि की लंबी रेल यात्राएं करके देश को समझने की कोशिश की है। उन्होंने कुछ अपने निजी अनुभवों को बांटते हुए कहा कि ग्रामीण इलाके के युवाओं में जूझने का बहुत माद्दा है। गोरखपुर से एक बेरोजगार युवक अपनी मेहनत के भरोसे मुंबई जाने वाली ट्रेन में बैठ जाता है। कुरेदने पर कह देता है कि उसे शहर में रोजगार जरूर मिलेगा, क्योंकि उसे अपनी मेहनत पर भरोसा है। राहुल ने इस बात पर जोर दिया कि यदि हम अपनी युवा आबादी की ऊर्जा सही दिशा में मोड़ पाए, तो तस्वीर बदल सकती है।
 
करीब एक घंटे का भाषण उन्होंने टुकड़ों-टुकड़ों में किया। इस बात पर भी चुटकी ली कि हमारे यहां गैर जरूरी मुद्दों पर ज्यादा बहस करने की आदत डाल दी गई है। यह ठीक नहीं है। यहां लोग उनसे सवाल करते हैं कि आप कब कर शादी कर रहे हैं? या प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं? या फिल्म अभिनेत्री ऐश्वर्या राय की शादी आदि को लेकर तमाम चर्चाएं की जाती हैं। इससे तमाम ऊर्जा जाया होती है। वैसे भी उनके लिए ये सवाल ज्यादा अहम नहीं हैं। ज्यादा जरूरी यह है कि पार्टी पदाधिकारी और सांसद के नाते अपनी जिम्मेदारी कितनी निभा पाते हैं? अलग शैली के संवाद के चलते सभागार में कई मौकों पर बड़े-बड़े उद्योगपति ताली बजाते भी नजर आए। खास बात यह रही कि वे बगैर किसी ‘स्क्रिप्ट’ के सहारे लंबे समय तक बड़े विश्वास से बोलते रहे। याद कीजिए, पार्टी के जयपुर सम्मेलन में भी राहुल की भाषण अदा पर पार्टी सहित तमाम लोग उन पर फिदा हो गए थे। इस मौके पर भी यही लगा कि अब वे लोटपोट कर  राजनीति के पक्के खिलाड़ी जरूर बनते जा रहे हैं।
 
लेकिन तार्किक दृष्टि से विचार करें, तो इस मौके पर भी आर्थिक मामलों में राहुल का कोई स्पष्ट ‘रोड मैप’ नजर नहीं आया। उन्होंने अपनी सरकार की आर्थिक नीतियों को ही विकास का जरिया बताने की कोशिश की। विकास की दिशा में आ रही तमाम बाधाओं को उन्होंने गिनाया। यह भी बता दिया कि ‘गणेश परिक्रमा’ की राजनीति के चलते जनभागीदारी नहीं बढ़ पा रही है। इस स्थित में बदलाव लाना जरूरी है। उन्होंने उद्योगपतियों को भी बड़े प्यार से लालची न होने की नसीहत दे डाली। लेकिन सवाल यह है कि यदि आजादी के बाद इतने वर्षों में व्यवस्थागत ये खामियां चली आ रही हैं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? जबकि सच्चाई तो यही है कि छह दशक तक केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकारें रही हैं। इस बारे में ‘युवराज’  चुप्पी साधे रहे। मनमोहन सरकार पिछले नौ सालों से सत्ता में है, क्या इस पर उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? इस पर भी राहुल ने एक शब्द भी नहीं बोला। कई बार ऐसा लगा कि वे व्यवस्था को ढर्रे पर लाने की जिम्मेदारी सरकार के अलावा सबकी समझ रहे हैं।
   
राहुल भले प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए अपनी ज्यादा बेचैनी न दिखा रहे हों, लेकिन पार्टी ने उनके लिए यह तैयारी कर ली है। भाजपा में इस जगह के लिए महीनों से नरेंद्र मोदी का नाम उछल रहा है। राजनीतिक हलकों में आगे राजनीति का मुकाबला राहुल बनाम मोदी के रूप में देखा जा रहा है। मोदी भी राहुल के सामने राजनीति की बड़ी लकीर खींचने में लगे हैं। दिल्ली में राहुल ने आर्थिक मुद्दों पर अपना नजरिया रखा, तो इसी दिन गांधी नगर में एक कार्यक्रम में बोलते हुए नरेंद्र मोदी ने कह डाला कि वे लफ्फाजी नहीं, काम करके दिखाने में यकीन करते हैं। उनकी सरकार ने दस सालों में राज्य में जो विकास का मॉडल दिया है, उस पर दुनिया के तमाम लोग रिसर्च करने आ रहे हैं। इस तरह से बातों-बातों में मोदी ने राहुल की ‘प्रवचन’ शैली पर कटाक्ष भी किए। यही जताने की कोशिश की कि वे तो केवल बातें करते हैं, जबकि यहां एक शख्स ऐसा है, तो बातें कम काम ज्यादा करता है।
   
भाजपा नेतृत्व ने कहा है कि राहुल को मोदी का फोबिया हो गया है। भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावेडकर ने कह दिया कि राहुल के आर्थिक नजरिए में विजन कम, प्रवचन ज्यादा रहा। इस आलोचना से नाराज होकर केंद्रीय राज्य मंत्री वी नारायण सामी ने कह दिया कि कांग्रेस को नहीं बल्कि भाजपा को ही मोदी का फोबिया है। बुधवार को सीआईआई के समारोह में प्रधानमंत्री ने अपना उद्घाटन भाषण दिया था। उन्होंने यही कहा था कि कुछ भी हो जाए, आर्थिक सुधारों के कार्यक्रम जारी रहेंगे। उन्होंने गठबंधन राजनीति की मजबूरियों पर ठीकरा फोड़ते हुए कह दिया था कि कुछ जरूरी फैसले राजनीतिक मजबूरियों की वजह से नहीं हो पाए। प्रधानमंत्री ने अपनी नीतियों की जमकर तारीफ की थी। वहीं राहुल गांधी ने एक दार्शनिक किस्म के ‘युवराज’ के रूप में साफगोई वाली बातें कहीं। वैसे भी वे कह चुके हैं कि उनकी मां ने बता दिया है ‘सत्ता जहर होती है’। जयपुर में उन्होंने यह बात कही थी। इस अवसर पर भी उन्होंने यह जताने की कोशिश की थी कि उन्हें सत्ता की नहीं, सेवा का अवसर मिलने की दरकार है। तमाम कोशिशों के बवजूद राहुल यह नहीं बता गए कि आखिर उनका वास्तविक आर्थिक-राजनीतिक दर्शन क्या है?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

मिश्राजी, यशवंत को श्राप देने के बाद कुछ पुण्‍य बचा हो तो इन नेताओं से मुक्‍त कराओ

आप सब जितना मजाक उड़ा लें स्वतंत्र मिश्रा जी का लेकिन आपको ये बात तो माननी पड़ेगी कि आज भी संसार में ऐसे लोग हैं, जो श्राप देने की हिम्मत रखते हैं, ये जानते हुए भी कि इस श्राप का कोई असर नहीं होगा. मैं तो टेप सुन के थोड़े समय के लिए सोच में पड़ गया कि आप ने तो एक ऐसे आदमी की तथाकथित सच्चाई दिखने की कोशिश की जो न जाने कितने गरीब बच्चों के पढ़ाई का खर्च उठाता है, वृद्धा आश्रम जाता है और न जाने कितने ऐसे काम करके पुण्‍य प्राप्त करने में लगा रहता है ताकि वक़्त आने पे दूसरों को श्राप दे सके.

और तो और मिश्रा जी ने तो ये भी कहा कि उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता क्यूंकि उनके पास बहुत अच्छे कर्म और पुण्‍य हैं. इनकी बात सुनने के बाद मुझे लगा कि फिर तो संजय दत्त और सलमान खान जैसा व्यक्ति तो खामखाह ही वकीलों को इतने पैसे देते हैं खुद का केस लड़ने के लिए, जितना भी हो इनके पास तो मिश्रा जी से ज्यादा पुण्‍य होगा, दत्त साहब का तो कैंसर हॉस्पिटल है और खान भाई का "BEING HUMAN". और न जाने कितने लोगों का भला किया है इन दोनों ने. मेरे ख्याल से आप अगर मिश्रा जी और इनका संपर्क कर दो ये सितारे भी जान जायेंगे कि कैसे अच्छे कर्मों का "fixed Deposite" तोड़ते हैं.

टेप सुनते वक़्त मुझे लगा कि लगता है आप कल का सूरज नहीं देखोगे. अरिंदम चौधरी का भी आत्म विश्वास डगमगा जाये मिश्रा जी आत्मविश्वास के सामने. मिश्रा जी अगर आप ये पढ़ रहे हैं तो एक निवेदन है कि अगर आपका और आपके परिवार का पुण्‍य थोड़ा बचा हो यशवंत जी को श्राप देने के बाद तो कृपा कर हम भारतवासियों को इन भ्रष्ट नेताओं के चंगुल से भी बचाएं, इन्हें भी श्राप दे डालो और मेरे हिसाब से इन नेता लोगों का तो पाप का घड़ा लगभग भर चुका होगा, तो आपकी थोड़ी अलौकिक शक्ति में तो ये निपट ही जायेंगे. मानता हूँ कि यशवंत जी के चक्कर में आपका संचित पुण्‍य काफी खर्च हो गया होगा, क्यूंकि यशवंत जी के अच्छे कर्म भी बहुतेरे हैं तो इनके नाश में तो ज्यादा खर्च आएगा ही, लेकिन थोड़ी सुधि इस देवभूमि, क्रन्तिभूमि की भी कर दें, क्या पता जो काम शहीद-ए-आजम, आजाद और अशफाक उल्ला साहब जैसे लाखों शहीद नहीं कर पाए आपके थोड़े से पुण्‍य के खर्च पर हो जाये. ध्यान दें और जगत का कल्याण करें.

(नमस्ते यशवंत जी, मैं तो मीडिया का नहीं हूँ. हाँ, आपका शुभचिन्तक जरूर हूँ. 'स्वतंत्र मिश्रा को गुस्सा कब और क्यों आता है?' वाला टेप सुनने के बाद दिल में कुछ भाव उत्पन्न हुये हैं, अगर आपको सही लगे तो प्रकशित कर दें. अभी २७ का ही हूँ इसलिए भाव दिल में ही उत्पन्न होते हैं ह्रदय तक पहुँचने में अभी थोड़ा वक़्त है.)

विवेक कुमार

vivekkumarcs@gmail.com

जिस चौदह साल की लड़की से रेप किया गया, उसी को सौ कोड़े भी मारे गए, मर गई

मुस्लिम समाज में कितना बुरा हाल है महिलाओं का, यह सीएनएन की इस स्टोरी से समझा जा सकता है. कहानी बांग्लादेश की है. चौदह साल की लड़की से रेप किया गया. फिर उसी पर व्यभिचार का आरोप लगाकर मौलवी ने सौ कोड़े मारने की सजा सुनाई. सत्तर कोड़े पड़ने के बाद लड़की बेहोश हो गई. उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई. उफ्फ… कितना बर्बर है यह सब कुछ. इसे पढ़ें और दूसरों को पढ़वाएं. सोचें कि ये धर्म और धर्मगुरु कितने अमानवीय हो चुके हैं. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

Only 14, Bangladeshi girl charged with adultery was lashed to death

By Farid Ahmed and Moni Basu, CNN : March 29, 2011

Shariatpur, Bangladesh (CNN) — Hena Akhter's last words to her mother proclaimed her innocence. But it was too late to save the 14-year-old girl. Her fellow villagers in Bangladesh's Shariatpur district had already passed harsh judgment on her. Guilty, they said, of having an affair with a married man. The imam from the local mosque ordered the fatwa, or religious ruling, and the punishment: 101 lashes delivered swiftly, deliberately in public. Hena dropped after 70. Bloodied and bruised, she was taken to hospital, where she died a week later.

Amazingly, an initial autopsy report cited no injuries and deemed her death a suicide. Hena's family insisted her body be exhumed. They wanted the world to know what really happened to their daughter.

Sharia: illegal but still practiced

Hena's family hailed from rural Shariatpur, crisscrossed by murky rivers that lend waters to rice paddies and lush vegetable fields.

Hena was the youngest of five children born to Darbesh Khan, a day laborer, and his wife, Aklima Begum. They shared a hut made from corrugated tin and decaying wood and led a simple life that was suddenly marred a year ago with the return of Hena's cousin Mahbub Khan.

Mahbub Khan came back to Shariatpur from a stint working in Malaysia. His son was Hena's age and the two were in seventh grade together.

Khan eyed Hena and began harassing her on her way to school and back, said Hena's father. He complained to the elders who run the village about his nephew, three times Hena's age.

The elders admonished Mahbub Khan and ordered him to pay $1,000 in fines to Hena's family. But Mahbub was Darbesh's older brother's son and Darbesh was asked to let the matter fade.

Many months later on a winter night, as Hena's sister Alya told it, Hena was walking from her room to an outdoor toilet when Mahbub Khan gagged her with cloth, forced her behind nearby shrubbery and beat and raped her.

Hena struggled to escape, Alya told CNN. Mahbub Khan's wife heard Hena's muffled screams and when she found Hena with her husband, she dragged the teenage girl back to her hut, beat her and trampled her on the floor.

The next day, the village elders met to discuss the case at Mahbub Khan's house, Alya said. The imam pronounced his fatwa. Khan and Hena were found guilty of an illicit relationship. Her punishment under sharia or Islamic law was 101 lashes; his 201.

Mahbub Khan managed to escape after the first few lashes.

Darbesh Khan and Aklima Begum had no choice but to mind the imam's order. They watched as the whip broke the skin of their youngest child and she fell unconscious to the ground.

"What happened to Hena is unfortunate and we all have to be ashamed that we couldn't save her life," said Sultana Kamal, who heads the rights organization Ain o Shalish Kendro.

Bangladesh is considered a democratic and moderate Muslim country, and national law forbids the practice of sharia. But activist and journalist Shoaib Choudhury, who documents such cases, said sharia is still very much in use in villages and towns aided by the lack of education and strong judicial systems.

The Supreme Court also outlawed fatwas a decade ago, but human rights monitors have documented more than 500 cases of women in those 10 years who were punished through a religious ruling. And few who have issued such rulings have been charged.

Last month, the court asked the government to explain what it had done to stop extrajudicial penalty based on fatwa. It ordered the dissemination of information to all mosques and madrassas, or religious schools, that sharia is illegal in Bangladesh.

"The government needs to enact a specific law to deal with such perpetrators responsible for extrajudicial penalty in the name of Islam," Kamal told CNN.

The United Nations estimates that almost half of Bangladeshi women suffer from domestic violence and many also commonly endure rape, beatings, acid attacks and even death because of the country's entrenched patriarchal system.

Hena might have quietly become another one of those statistics had it not been for the outcry and media attention that followed her death on January 31.

'Not even old enough to be married'

Monday, the doctors responsible for Hena's first autopsy faced prosecution for what a court called a "false post-mortem report to hide the real cause of Hena's death."

Public outrage sparked by that autopsy report prompted the high court to order the exhumation of Hena's body in February. A second autopsy performed at Dhaka Medical College Hospital revealed Hena had died of internal bleeding and her body bore the marks of severe injuries.

Police are now conducting an investigation and have arrested several people, including Mahbub Khan, in connection with Hena's death.

"I've nothing to demand but justice," said Darbesh Khan, leading a reporter to the place where his daughter was abducted the night she was raped.

He stood in silence and took a deep breath. She wasn't even old enough to be married, he said, testament to Hena's tenderness in a part of the world where many girls are married before adulthood. "She was so small."

Hena's mother, Aklima, stared vacantly as she spoke of her daughter's last hours. She could barely get out her words. "She was innocent," Aklima said, recalling Hena's last words.

Police were guarding Hena's family earlier this month. Darbesh and Aklima feared reprisal for having spoken out against the imam and the village elders.

They had meted out the most severe punishment for their youngest daughter. They could put nothing past them.

Journalist Farid Ahmed reported from Shariatpur, Bangladesh, and CNN's Moni Basu reported from Atlanta.

“रवीश कुमार और एनडीटीवी के बहाने”

वैसे सामान्यतः अब रवीश कुमार जी का एनडीटीवी पर आने वाला कार्यक्रम प्राइम टाइम नहीं देखता हूँ. लेकिन कल सुबह परसों रात के कार्यक्रम का रिपीट टेलीकास्ट जो सुबह 9 बजे आता है उसे संयोगवश देख लिया था. उसके कुछ समय बाद यशवंत भाई के मार्फत यह जानकारी प्राप्त हुई कि रवीश जी का फेसबुक ट्विट्टर एकाउंट बंद हो गया है और यह भी अटकलें सामने आईं कि शायद एनडीटीवी से उनका कुछ विवाद हो गया है और वह शायद हट रहे हैं.

इस जानकारी को लेकर कोई बहुत ज्यादा परेशान या व्याकुलता तो नहीं रही. क्योंकि यह सब तो आम बातें है, मीडिया में होता रहता है. लेकिन फिर भी एक उत्सुकता के नाते प्राइम टाइम को को देखना पड़ा, पर हाँ देखा आज सुबह के रिपीट टेलीकास्ट में ही. रवीश जी उसी अंदाज़ में मौजूद थे और दिग्विजय सिंह के बयान को लेकर कांग्रेस के सत्ता द्वय केन्द्र पर विमर्श कर रहे थे.

अब इससे पहले उस चर्चा पर आता हूँ जिसमें यह कहा जा रहा था कि रवीश जी को एक दिन पहले के कार्यक्रम में अरविन्द केजरीवाल जो आजकल आम आदमी पार्टी “आप” बनाकर राजनीति में उतर पड़े हैं उनके पक्षधर के रूप में दिखे. खैर कभी देश में भ्रष्टाचार को लेकर राजनैतिक जमात और लोकतंत्र को ही निशाने पर रखने वाले “आप” लोगों का लोकतंत्र के वास्तविक रास्ते राजनीति में दिखना एक अच्छा और शुभ कदम ही मान जाएगा.

रवीश कुमार का वह कार्यक्रम जो अरविन्द केजरीवाल के दिल्ली में बिजली बिलों को लेकर हो रहे अनशन पर था, उसमें ऐसा कुछ खास तो नहीं दिखा कि उन्होंने अरविन्द के पक्ष में सबको अपने कटाक्ष से धाराशायी कर दिया हो. उस कार्यक्रम में आप पार्टी की ओर से ख्यातिप्राप्त राजनैतिक विश्लेषक योगेन्द्र यादव मौजूद थे, जिनकी राजनैतिक समझ के हम सब नए पुराने पत्रकार कम या अधिक मात्रा में प्रशंसक रहे ही हैं. वहीँ कांग्रेस और बीजेपी के ओर से अपेक्षाकृत कम नज़र आने वाला या यूँ कहें राजनैतिक बहसों में अपेक्षाकृत थोड़े कमजोर रहे लोग मुकेश शर्मा और विजेंदर ही मौजूद थे. ऐसे में कार्यक्रम थोड़ा एकतरफा हो जाना बनता ही है.

इस मामले में सवाल यहाँ रवीश कुमार से ज्यादा प्रोग्राम कोआर्डीनेटर पर ज्यादा बनता है. जिन्होंने भी इन लोगों को चर्चाओं में बुलाने की व्यवस्था की रही होगी. अधिकतर लोग जो पत्रकारिता खास तौर पर टीवी पत्रकारिता से जुड़े हैं उन्हें पता ही होगा कि टीवी बहस में एंकर की भूमिका मेहमान तय करने में न के बराबर रहती है. ऐसे में बातें कहीं दूसरे कोने में चली जाती दिखती हैं.

इन सबके बाद बात आती है उस सूचना पर जो अब निरर्थक हो गई है कि उक्त कार्यक्रम में अरविन्द का पक्ष लिए जाने से रवीश कुमार पर कुछ तनातनी चैनल के अंदर हो गई थी. इससे एक प्रश्न मन में उठता है कि क्या किसी पत्रकार को किसी भी संगठन या राजनैतिक पार्टी का पक्षधर होना चाहिए. भले ही वह एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में उस संगठन या पार्टी के विचारों का घोर समर्थक हो लेकिन अगर पत्रकार के रूप में बात की जाए तो उसे पक्षधरता से दूर रहना चाहिए. पत्रकारिता की सूचना या जानकारी से सामान्य व्यक्ति को किसी भी मुद्दे, राजनैतिक आंदोलन या जनजमाव के कई पहलुओं की जानकारी मिलती है जो सामान्य भावनात्मक उबाल के आगे दिखाई देना बंद हो जाता है. परन्तु जब ऐसे मौकों पर पत्रकार ही उन्माद में बह जाए तो इसमें से कई सारे मौजूद काले कोने छुप जाते हैं.

इस तरह के कारनामे काफी ज्यादा देखने को मिले हैं चाहें अरविन्द और उनकी भूतपूर्व टीम को मिला अभूतपूर्व 600 घंटे का कवरेज या फिर हाल ही में दामिनी या निर्भया नाम से दिल्ली बलात्कार कांड का पूरा मसला. लेकिन जब हम आज पलटकर इन मुद्दों का विश्लेषण करते हैं तो सब कहीं गायब हो जाता है. जो कल तक मेट्रो से लेकर गाँव कूचों तक टोपी लगाए घूमते थे आज वह छोटे बड़े हर कारनामे में मुस्कुराहट के साथ घूस देते हुए आसानी से मिल जाते हैं. लोकपाल कहाँ चला गया किसी को याद करने की फुर्सत नहीं है. जिले मुहल्ले के जो ठेकेदार कैंडिल जलाते थे वह तब और अब भी मजदूरों का वैसे ही शोषण कर रहे हैं. वही हाल बलात्कार कांड को लेकर प्रदर्शन करने को आमादा भीड़ आज जस्टिस वर्मा कमिटी की सिफारिशों को एकदम भुलवा चुकी सरकार पर चुप हैं. आपवा की कविता कृष्णन जैसी नेत्रियों ने वर्मा कमिटी की सिफारिशों को मनवाने के लिए मोर्चा बनाये रखा है. अन्यथा वह भीड़ आज जाने कहाँ खो सी गई है जो लाठी और पानी की बौछार खाने को अमादा थी. कुल मिलाकार टीवी देखकर जोश में आए लोगों के लिए वह मुद्दे समय बीतने से अपने मूल विषयों पर अप्रासांगिक हो जाते हैं.

पत्रकारिता के बारे में एक बात कही जाती है कि इसका स्वरूप आलोचनात्मक होना चाहिए. साथ ही कुछ मित्र व वरिष्ठ यह भी कहते हैं कि पत्रकारिता जब अपने असली स्वरूप में होती हैं तो पूर्णत: वामपंथी ही हो जायेगी. ऐसे में किसी की भी पक्षधरता का आरोप भी अजीब लगता है. यहाँ मुझे वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी का एक कथन याद आता है कि पत्रकार को डिटैच होकर ही लिखना चाहिए. अगर किसी मुद्दे से जुड़कर कोई बात कही जायेगी तो उसमें वह बैलेंस नहीं दिखेगा. पत्रकारिता के मिशन में चाहे वह कैसे भी मुद्दे हों उन्हें सामान्य नज़र से इतर होकर माइक्रोस्कोपिक निरिक्षण करके सबके के सामने रखना चाहिए. और शेष निर्धारण लोगों पर छोड़ देना चाहिए.

रवीश कुमार के कार्यक्रम से पहले इसी चैनल के इंटरनेट पर लीक फुटेज में कांग्रेस की तरफ से डिफेंड कर देने के आग्रह भी सामने आया था. ऐसे में अगर किसी भी राजनैतिक दल की पक्षधरता अगर रखी जाए तो बातें काफी उलझती जायेंगी. लेकिन यह भी एक सच है कि अगर सवाल जनहित में है तो वह बदलेंगे नहीं उसे कोई भी कहेगा वह वैसे ही लगेंगे. उस कार्यक्रम में पक्षधरता तो कहीं नहीं दिखी थी लेकिन अगर पक्षधरता के आरोप सिर्फ इसलिए लगा दिए जायें कि तथाकथित राजनीति में मजबूत दो पार्टियों को मौका नहीं मिला. तो यह बात बेहद गलत ही जायेगी. खैर, अब जिस तरह की इलेक्ट्रानिक मीडिया है उससे सही की उम्मीद तो नहीं ही रहती है.

लेखक हरिशंकर शाही युवा पत्रकार हैं. सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर बेबाक टिप्पणियां करते रहते हैं.

समीर दीवान ने दैनिक भास्कर छोड़ा, द पायोनीयर में न्यूज एडिटर बने

भास्कर से वरिष्ठ पत्रकारों के इस्तीफे की खबर पढ़ रहा हूं। मैं भी पिछले पांच साल से भास्कर में बतौर डीएनई काम करता रहा। जिन कमलेश सिंह और राजीव सिंह के बड़े पत्रकार होने की खबर मैं इस साइट पर पढ़ता आ रहा हूं, उनमें से एक राजीव सिंह को बहुत पास से मैंने देखा है। जिस तरह के संपादकों की तानाशाही की बात खास कर अमर उजाला के लखनऊ संस्करण के इंदुशेखर पंचोली की तानाशाही के बारे में इस साइट पर खबर है, वह लगता है जैसे तमाम मीडिया हाउसों में बड़े पदों पर बने रहने के लिए एक तरह से अनिवार्य शर्त हो गई है। इनमें से बहुतेरे पत्रकार बड़े पदों पर आते ही शायद इसी एक योग्यता के बल पर हैं कि वे मालिक की गैरहाजिरी में बड़े हाउसेस में मालिक बन कर रहें।

मैं पिछले दो दशकों से हिन्दी, अंग्रेजी के अखबारों में काम करता रहा हूं और रायपुर छत्तीसगढ़ के अलावा मैं प्रदेश के ही विभिन्न शहरों में कभी ब्यूरो प्रमुख तो कभी संपादक के पद पर रहा। पर हद तो तब हो गई जब राजीव सिंह ने स्टेट हेड रहते हुए एक दिन मुझे भरे एडिटोरियल में न्यूज मैगजीन पढऩे से रोका। प्रतिकार करने पर ट्रांसफर की धमकी दी और कर भी दिया। मैंने इसी एक बात से खिन्न होकर भास्कर से इस्तीफा दे दिया और बतौर न्यूज एडिटर अंग्रेजी अखबार -द पायोनीयर जाइन कर लिया।

इसके पीछे कारण यह था कि वे अपने साथ लाए एक सज्जन को न्यूज एडिटर बनाना चाहते थे। जो उस उम्र में भास्कर लाए गए थे जिसमें भास्कर में एंट्री ही नहीं मिलती। तमाम तरह के एसाइनमेंट्स में फेल होने के बाद भी उन्हें सीनियर न्यूज एडिटर बनाने की उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई तो ऐन अपनी रवानगी के डेढ़ महीने पहले मेरा छोटी सी जगह पर तबादला कर दिया। अपने आदमी को उस जगह पर टिका दिया, जो कायदे से मेरी जगह थी। भास्कर रायपुर में इसे सब जानते हैं।

बहरहाल मैंने भास्कर रायपुर से डीएनई के पद से 14 तारीख को इस्तीफा दे दिया है। बकायदा जितने साल मैं भास्कर में रहा, हर साल ही मुझे किसी न किसी बड़े एसाइनमेंट के लिए नेशनल एडिटर से प्रशंसा पत्र मिलते रहे हैं। वे मेरे सगे नहीं हैं। मै चाहता हूं कि मेरे इस्तीफे की खबर भी इसमें छपे। पांच साल पहले मेरे नवभारत छोड़कर भास्कर भिलाई-दुर्ग के एडिटर होने की खबर आपने भड़ास में छापी थी। वह खबर तो मुझे नहीं देनी पड़ी थी वह तो ऐसे ही छप गई थी। धन्यवाद सहित।

समीर दीवान

एनई

द पायोनीयर

रायपुर एडिशन (छत्तीसगढ़)

Imprimis announces key leadership appointments

: Focuses on growth, expansion in sectors like biotechnology, education, retail, corporate : New Delhi: Imprimis PR, one of the leading communications consultancies in India with focus on the healthcare and pharma sectors, announced key leadership appointments in New Delhi. The firm will be undertaking a thorough forensic audit with Ernst & Young after the immediate release of the former CEO Mr. Aman Gupta and set the stage for implementing its future expansion plans.

Strengthening its leadership team, Imprimis has appointed Ms Gracelle Gerber, a seasoned communication professional with expertise in reputation management and strategic advocacy and former SVP International at Baird’s, as the CEO of Imprimis. Gerber joins Imprimis with international expertise and experience in the Healthcare & Pharma sector as well as industries like ICT, Manufacturing, Consumer, Agriculture and Tourism. She has worked extensively across India, Africa and Brazil. Included amongst a wide range of global FDI clients, she was the lead strategic business director for the Tata Group in Africa over the past decade, before moving to India on a full-time basis.

Ms Nymphia Vishin, formerly the Chief Strategy Analyst at Imprimis, has been appointed the Deputy CEO of the firm. Vishin has been associated with Imprimis for over seven years, working in various leadership positions assisting key clients for their communication mandates. Her experience of working with clients cutting across a diverse set of industries gives her the ability to understand business complexities and successfully design communication programs that are suited to specific local needs. Ms Tanya Kewalramani has also been inducted as the Chief Science Communications Officer at Imprimis. Kewalramani, a Science Communications professional holding a Masters degree from the prestigious Australian National University will be responsible for building the biotechnology division for Imprimis in the coming years.

Dilip Cherian, Consulting Partner Perfect Relations Group said, "As a team we are getting aggressive and looking at opportunities to scale new heights. We will be looking at new sectors and vectors of growth. Our aim is to conquer new skills, of having people who have the confidence of the skills they possess so that we can look at providing services that were never before possible. Today, client needs are based on the fact that the markets are extremely competitive. Knowledge and constant practice with the much needed quality will aid in achieving far more growth and help sustaining it in the long run."

The appointments are in line with the company’s overall plans to expand presence in the Indian markets and strengthen its position across key sectors including biotechnology, education, retail and corporate other than the healthcare and pharma domain in which it’s already a leader.

Imprimis, part of the Perfect Relations Group, India’s foremost independent communications firm, gained stronghold in the healthcare and pharma space over the last decade working with a slew of domestic and international pharma majors. The firm has been associated with organisations like Novartis, Lilly, Gilead, GSK, Sanofi, Apollo Hospitals, Fortis Healthcare, Jubilant Life Sciences, etc. and in recent years expanded its portfolio to include clients from education, IT/Telecom and retail sectors. Similarly, Imprimis has also been active in the CSR space working with large social institutes like the Bill & Melinda Gates Foundation, WHO, and International Aids Vaccine Initiative to name a few.

Press Release
 

परफेक्ट रिलेशंस ग्रुप से जुड़े सीईओ अमन गुप्ता को रिजाइन देने के लिए क्यों कहा गया?

: Can you really trust your CEO? The Imprimis PR Story : In a rapidly growing India, decentralisation is increasingly becoming a staple of Indian business. With top-level managements delegating large amounts of work, CEOs today enjoy substantial power. But does this work to the business’ advantage? As the example of Imprimis PR, a sister concern of Perfect Relations, south Asia’s biggest image management consultancy reveals, abuse of power by CEOs can be a real risk for businesses.

Recently, ex-CEO of Imprimis PR, Aman Gupta was asked to resign from his position. The word on the street is that Mr. Gupta, who had been associated with the Perfect Relations group for about 10 years, was engaged in running PR agencies on the side, moving business from Imprimis PR to his smaller companies by offering clients more attractive prices.

For someone who practically started his career with the group and owed his position in the industry to the Perfect Relations brand name, it appears that his own private agenda had become more important than the business he had been entrusted with. It appears that following his ouster, he has been unsuccessfully chasing the group’s current client base in hopes to advance his new companies.

A recent release issued by Perfect Relations states that the group is now conducting a forensic audit to analyze the damage caused by Mr. Gupta’s unlawful activities. Rumor has it that Mr. Gupta swindled between Rs 4-6 crores from the company he was CEO of  the incident has made managements sit up and think about what companies today need to do to ensure that their employees stay on the track.

भड़ास4मीडिया के पास आए एक पत्र पर आधारित.

जनसंदेश टाइम्‍स से मानसी सिंह का इस्‍तीफा, नीरज सिंह बने नए ब्‍यूरोचीफ

जनसंदेश टाइम्‍स, मिर्जापुर से खबर है कि ब्‍यूरोचीफ मानसी सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे प्रबंधन द्वारा कोई भी बात स्‍पष्‍ट नहीं किए जाने तथा उन्‍हें लगातार अंधेरे में रखे जाने से नाराज थीं. प्रबंधन ने उनकी जगह नीरज सिंह को अखबार का नया ब्‍यूरोचीफ बनाया है. सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन ने मानसी को बिना विश्‍वास में लिए कार्यालय बदल दिया तथा उन्‍हें नीरज सिंह के ज्‍वाइनिंग के बारे में भी जानकारी नहीं दी गई. इससे नाराज मानसी ने प्रबंधन को कड़ा पत्र लिखते हुए अपना इस्‍तीफा सौंप दिया.

दूसरी तरफ नीरज सिंह की नियुक्ति को लेकर कुछ आरोप भी सामने आ रहे हैं. आरोप लग रहे हैं कि प्रबंधन के कुछ लोगों ने मोटी रकम लेकर नीरज सिंह को मिर्जापुर का नया ब्‍यूरोचीफ बनाया है. उनकी छवि भी विवादित है. हालांकि प्रबंधन के लोग इस तरह के आरोपों को साफ नकारते हुए कह रहे हैं कि व्‍यवस्‍था बदले जाने से नाराज लोग इस तरह की अफवाह उड़ा रहे हैं. मानसी सिंह दैनिक जागरण से इस्‍तीफा देकर जनसंदेश टाइम्‍स पहुंची थीं. वहीं नए ब्‍यूरोचीफ नीरज सिंह पायनियर हिंदी से जुड़े हुए थे.

22 अप्रैल को तय होगा कि अरेस्‍ट होंगे या बचे रहेंगे सुब्रत राय

सहारा समूह के चेयरमैन सुब्रत राय को गिरफ्तार करने और अदालत की अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की मांग करने वाली सेबी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 22 अप्रैल से सुनवाई करेगा. कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई जल्‍द शुरू करने की सेबी की अपील मंजूर कर ली है. निवेशकों के 24000 करोड़ रुपये लौटाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को सुब्रत राय उलझाने में लगे हैं. इसे देखते हुए ही भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (सेबी) ने यह याचिका दायर कर रखी है.

न्‍यायाधीश केएस राधाकृष्‍णन की पीठ ने सुनवाई जल्‍द शुरू करने की सेबी की अपील पर सहमति जताते हुए सुनवाई की तारीख 22 अप्रैल तय की है. सेबी ने 15 मार्च को दायर अपनी याचिका में सहारा समूह के प्रमोटर सुब्रत राय की गिरफ्तारी की मांग करते हुए उनके देश से बाहर जाने पर रोक लगाने की मांग की थी. समूह के दो निदेशकों अशोक राय चौधरी और रविशंकर दुबे की गिरफ्तारी की भी इसमें मांग की गई है. इससे पहले छह फरवरी को अदालत में सहारा समूह को नोटिस जारी कर अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की सेबी की मांग पर अपनी सफाई चार सप्‍ताह में देने को कहा था. (एजेंसी)

बीजेपी के बिखराव में तस्वीर तलाशती वसुंधरा

 

वसुंधरा राजे सुराज यात्रा लेकर निकली हैं। तेवर बहुत आक्रामक हैं। लेकिन सीएम अशोक गहलोत एकदम सहज। सहज इसलिए भी क्योंकि गहलोत आमतौर पर नकली नहीं हो पाते। वैसे तो राजनीति में आश्वस्त भाव किसी में भी किसी भी स्तर पर नहीं होता। लेकिन गहलोत के लिए इन दिनों सहज रहने की एक वजह यह भी है कि राजस्थान में यह मान्यता बनती जा रही है कि वसुंधरा और उनकी बीजेपी कोई बहुत बड़ा तीर नहीं मार पाएगी। बीजेपी के बाकी नेताओं की की मजबूरी यह है कि वे मन से वसुंधरा का साथ नहीं दे सकते और वसुंधरा किसी भी तरह की राजनीतिक मजबूरी निभाने में बहुत विश्वास नहीं करती। वसुंधरा समर्थक इसी को उनकी ताकत भी मानते हैं, पर मामला जब सरकार को हटाकर सरकार में आने का हो तो ताकतें अकसर दगा भी दे जाती हैं। गहलोत इसीलिए आश्वस्त हैं।
वसुंधरा राजे की चाल कोई धीमी नहीं है। अभी तो चुनाव में कम से कम छह महीने हैं, और अभी से वे बहुत तेज चल रही है। राजनीति कहती है कि स्पीड ऐसी ही रही तो चुनाव आते आते उनके सारे हाथी घोड़े थक जाएंगे। हालांकि वे इसलिए अचानक बहुत सक्रिय हो गई है कि उनको लग रहा है कि चुनाव आते आते वे बीजेपी के अंदरूनी झमेले सुलझा लेंगी। चुनाव के वक्त तक कौन साथ है, कौन नहीं, कौन ताकतवर हैं और कौन कमजोर, इसका भी पता चल जाएगा। लेकिन राजनीति में आम तौर पर जो दिखता है वह होता नहीं और जो होना होता है वह कई बार तो होने के बाद भी कईयों को तो पता तक नहीं चलता। प्रदेश में बीजेपी की अंदरूनी हालत असल में कैसी है, इसमें जाना बेमानी हैं।
 
वसुंधरा के ग्लैमर, गहलोत के जादू और आज के हालात की बात की जाए, तो दोनों के बीच नकली और असली दोनों का भेद एकदम साफ है। गहलोत और वसुंधरा में से कौन असली और कौन नकली हैं, यह कमसे कम राजस्थान में तो किसी से भी पूछने की जरूरत नहीं हैं। फिर भी वसुंधरा राजे अपने ग्लैमर से लोगों को लुभा रही है तो गहलोत सादगी और संवेदनशील नेता के रूप में भलमनसाहत वाली अपनी पुरानी छाप को कायम रखे हुए हैं। इस सबके बीच वसुंधरा राजे की आधुनिक किस्म की आक्रामकता और गहलोत की पारंपरिक सदाशयता को समझने के मामले में राजस्थान की जनता कोई बहुत उलझन में नहीं है। लटके झटके के पीछे की लालसा लोग समझ रहे है और सादगी के पीछे का सच भी। हालांकि यह पहला मौका है जब राजस्थान की राजनीति में किसी सत्तासीन सरकार की आसन्न विदाई की अवधारणा ने अचानक यू टर्न ले लिया हो। लोगों को समझ में आ रहा है कि गहलोत सरकार के बारे में जो उल्टी गिनती कुछ महीनों पहले शुरू हुई मानी जा रही थी, वह अचानक रुकी ही नहीं, यू टर्न ले चुकी है।
 
साढ़े चार साल पहले गहलोत जब प्रदेश के दूसरी बार सीएम बने थे, तो वह कोई कांग्रेस का कमाल नहीं बल्कि गहलोत का जादू और उनकी भलमनसाहत का करिश्मा था। उधार के आधार पर बनी गहलोत की सरकार को पहले दिन से ही अब गई – तब गई की तरह से देखा जाता रहा। फिर जिस सरकार का विपरीत भविष्य उसके बनने से पहले ही लिखा जा चुका हो, वह आज विपक्ष से बिल्कुल बराबरी का मुकाबला कर रही हो, तो उसके पीछे गहलोत की राजनीतिक सोच का जादू ही माना जा सकता है। गहलोत की काबिलियत का जलवा यह भी है कि उन्होंने अपनी कोशिशों से एक लाचार, बेबस और एक कमजोर सरकार को मजबूत शख्ल बख्श कर बीजेपी और वसुंधरा से अपने मुकाबले के बारे में लोगों की धारणा ही बदल दी है। सीएम के तौर पर दूसरे दौर के दसवें साल में गहलोत अपने राजनीतिक जीवन का सबसे शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। पर उधर, वसुंधरा राजे बीजेपी के बिखराव में अपनी तस्वीर तलाशती नजर आ रही है। लेकिन तस्वीरों की तासीर यही है कि बिखराव के बियाबान में वे अकसर बरबाद हालत में ही मिला करती है, इसका क्या किया जाए! 
 
लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं.

दैनिक जागरण, अलीगढ़ के सिटी इंचार्ज बने रमाकांत, नवीन को हटाया गया

 

: कृष्‍ण‍ बिहारी हाथरस के नए ब्‍यूरोचीफ : दैनिक जागरण, अलीगढ़ से खबर है कि चीफ रिपोर्टर और सिटी इंचार्ज रहे नवीन पटेल से जिम्‍मेदारी लेकर उन्‍हें डेस्‍क पर भेज‍ दिया गया है. उनकी जगह हाथरस के ब्‍यूरोचीफ रमाकांत चतुर्वेदी को अलीगढ़ का चीफ रिपोर्टर और सिटी इंचार्ज बनाया गया है. हाथरस का नया ब्‍यूरोचीफ कृष्‍ण बिहारी शर्मा को बनाया गया है. कृष्‍ण बिहारी अलीगढ़ में तैनात थे.  
माना जा रहा है कि दैनिक जागरण की आड़ में पोर्टल चलाकर विज्ञापन वसूलने के आरोप में नवीन पर कार्रवाई की गई है. नवीन की शिकायत कुछ लोगों ने मालिकों से भी की थी, जिसके बाद उन्‍हें सिटी इंचार्ज के पद से हटाकर डेस्‍क पर भेज दिया गया. इस मामले में जांच की जा रही है. खबर है कि पोर्टल को बंद करने के निर्देश भी प्रबंधन की तरफ से दिए गए हैं. 

‘एनडीटीवी’ के गर्दन तक पहुंचा ‘इंडिया न्यूज’

तेरहवें हफ्ते की टीआरपी की जो खास बात है वो ये कि इंडिया न्यूज चैनल का विजय अभियान रुक नहीं रहा. टीआरपी में बढ़ोत्तरी का सिलसिला इस हफ्ते भी जारी रहा और यह चैनल अब एनडीटीवी के बहुत नजदीक पहुंच गया है. संभव है, अगले कुछ हफ्तों में एनडीटीवी से आगे निकल जाए इंडिया न्यूज. एनडीटीवी की टीआरपी 6.1 है और इंडिया न्यूज की 5.3 हो चुकी है टीआरपी. इस हफ्ते इंडिया न्यूज को 0.6 की बढ़त मिली है.

आजतक इस हफ्ते कुछ लूज करने के बावजूद नंबर वन पर कायम है और नंबर दो पर इंडिया टीवी को काफी फासले से पीछे किए हुए है. तेरहवें हफ्ते की टीआरपी इस प्रकार है…

WK 13 2013, (0600-2400)
Tg CS 15+, HSM:

Aaj Tak 19.9 dn 1.4
India TV 16.0 same
ABP News 14.6 up 0.7
ZN 11.2 up 0.2
News 24 9.0 up 0.4
IBN 7.3 up 0.1
NDTV 6.1 dn 0.2
India news 5.3 up 0.6
Tez 4.6 up 0.1
DD 2.7 up 0.3
Samay 2.2 dn 0.7
Live India 1.2 same

xxx

WK 13 2013, (0600-2400)
Tg CS M 25+ABC

Aaj Tak 19.7 dn 1.5
India TV 17.0 dn 0.3
ABP News 13.4 up 1.1
ZN 12.1 up 0.1
IBN 8.5 up 0.6
News24 8.0 dn 0.1
NDTV 6.8 dn 0.5
India news 5.0 up 0.7
Tez 4.4 dn 0.3
DD 2.4 same
Samay 1.6 up 0.3
Live India 0.9 dn 0.1

एम्स ट्रामा सेंटर में तेजी से रिकवर कर रहे हैं दीपक चौरसिया (देखें तस्वीरें)

इंदौर एयरपोर्ट पर एक महिला यात्री द्वारा ट्राली लेकर अचानक आगे दौड़ पड़ने से गिर पड़ने वाले चर्चित पत्रकार दीपक चौरसिया का आपरेशन एम्स ट्रामा सेंटर में कर दिया गया है. उनकी हालत में तेजी से सुधार हो रहा है. डाक्टरों ने उन्हें थोड़ी थोड़ी देर में टहलने का अभ्यास शुरू करा दिया है. माना जा रहा है कि दो चार दिन में वे अस्पताल से छुट्टी पा लेंगे.

पहले चर्चा ये थी कि कूल्हे की हड्डी में हेयरलाइन फ्रैक्चर के कारण उन्हें तकरीबन छह सात हफ्ते बेड पर पड़े रहना पड़ सकता है. पर डाक्टरों की मेहनत के कारण दसवें दिन तक दीपक चौरसिया को अस्पताल से मुक्ति मिल जाएगी और वे अपना रुटीन का काम शुरू कर सकते हैं. एम्स ट्रामा सेंटर में दीपक चौरसिया से मिलने वालों का ताता लगा हुआ है. नेता, पत्रकार, शुभचिंतक लगातार वहां जा रहे हैं और दीपक के स्वस्थ होने की कामना कर रहे हैं.

दीपक के करीबी लोगों का कहना है कि जो दीपक चौरसिया रात में पांच घंटे भी लगातार नहीं सोते थे, जिनके जीवन का सिद्धांत रहा हो कठिन मेहनत, आज वह पच्चीस साल बाद ऐसी स्थिति में आ पड़े हैं कि हफ्ते भर से लगातार बेड पर हैं.

भड़ास4मीडिया को एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

तुर्की मीडिया को जर्मन अदालत में जगह नहीं मिली, फैसले को देंगे चुनौती

आतंकवाद से जुड़े एक जर्मन मुकदमे ने राजनीतिक रूप ले लिया है. जिस आतंकी हमले में आठ तुर्क मारे गए थे, उसकी रिपोर्टिंग के लिए तुर्की मीडिया को अदालत में जगह नहीं मिली. तुर्क पत्रकार फैसले को चुनौती देने का मन बना रहे हैं. तुर्की के विदेश मंत्री एहमत दावुतोग्लू मे जर्मन विदेश मंत्री गीडो वेस्टरवेले को फोन किया और मांग की कि संदिग्ध नवनाजी आतंकी बैआटे चैपे के खिलाफ मुकदमे में तुर्क पत्रकारों और नेताओं को भी सीटें मिलें. जर्मनी ने तुर्की की मांग को गंभीरता से लिया है लेकिन साथ ही अदालतों की स्वतंत्रता का भी ध्यान दिलाया है. इस आतंकी हमले में दस लोग मारे गए थे, जिनमें से आठ तुर्क मूल के थे.

तुर्की अखबार सबाह ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का एलान किया है. अखबार के डिप्टी एडिटर इस्माइल एरेल का कहना है, "हम समझते हैं कि प्रेस और सूचना की आजादी जर्मनी के तुर्क भाषी पत्रकारों के लिए भी है और इसलिए हम इस मुकदमे की कार्यवाही में हिस्सा लेना चाहते हैं."

दुनिया के ज्यादातर देशों की तरह जर्मनी में अदालतें स्वतंत्र हैं. इसकी वजह संविधान में अधिकारों का बंटवारा है. इसके अनुसार न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका, जिसमें पुलिस भी शामिल है, एक दूसरे से स्वतंत्र हैं. बर्लिन के राजनीतिशास्त्री हायो फुंके कहते हैं, "अदालत की स्वतंत्रता बहुत मूल्यवान है. कानूनसम्मत राज्य की मूल्यवान चीज, और उस पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए." लेकिन म्यूनिख की अदालत को सीटों के बंटवारे में नरमी दिखाने की जरूरत है. फुंके कहते हैं, "ऐसा वह कर सकता है, लेकिन स्वतंत्र रूप से."

अदालत में आम लोगों के लिए 100 सीटें हैं, उनमें से अदालत ने 50 सीटें मीडिया को दी हैं. पहले आओ, पहले पाओ के हिसाब से. अदालत का कहना है कि पहले आवेदन देने वाले 50 मीडिया प्रतिनिधियों को सीटें दी गई हैं, बाकी प्रतीक्षा सूची में हैं. जर्मनी के सर्वोच्च न्यायालय के रिटायर्ड जस्टिस वोल्फगांग हॉफमन रीम का कहना है कि एक विकल्प यह हो सकता था कि कुछ सीटों को तुर्की के मीडिया प्रतिनिधियों के लिए रिजर्व कर दिया जाता क्योंकि एनएसयू द्वारा मारे गए अधिकांश लोग तुर्क मूल के थे और इसकी वजह से तुर्क मीडिया की इस मुकदमे में काफी दिलचस्पी है.

ऐसी व्यवस्था पत्रकार योर्ग काखेलमन के मुकदमे में की गई थी, जो स्विट्जरलैंड के नागरिक हैं और मुकदमे में स्विस मीडिया की बड़ी दिलचस्पी थी. इस मुकदमे के शुरू होने से पहले ही स्विस पत्रकारों के लिए कुछ सीटें रिजर्व कर दी गई थीं. सीटों के बंटवारे पर हुए विवाद के कारण तुर्की में जर्मन अदालतों की विश्वसनीयता पर संदेह उठ रहे हैं. लेकिन राजनीतिशास्त्री फुंके इसे बढ़ा चढ़ा हुआ मानते हैं. उनका कहना है कि नुकसान यह नहीं है कि अदालत स्वतंत्र नहीं है, इस बात के कोई संकेत नहीं हैं, "और मैं यह मानता हूं कि एनएसयू मामले में स्वतंत्र मुकदमा चलेगा."

जर्मन संसद के निचले सदन बुंडेसटाग के विदेश नीति आयोग के प्रमुख और सीडीयू सांसद रूपरेष्ट पोलेंस का भी यही मानना है. वे कहते हैं कि जर्मन न्याय व्यवस्था में उनका भरोसा है और यह उन्होंने तुर्की से भी कहा है. उन्होंने तुर्की से संयम बरतने की अपील की है. उनका भी कहना है कि सीटों का बंटवारे में चतुराई नहीं दिखाई गई है, लेकिन वे कहते हैं, "उससे यह नतीजा निकालना कि पूरा मुकदमा निष्पक्ष और कानूनसम्मत नहीं है, उचित नहीं होगा." पोलेंस का कहना है कि तुर्की को जर्मन कानूनी व्यवस्था और जर्मन अदालतों पर भरोसा करना चाहिए.

जर्मन विदेश मंत्री को तुर्की के विदेश मंत्री के फोन से पहले ही जर्मनी की विदेशी मामलों की मंत्री मारिया बोएमर ने इस मामले में कहा था, "इस मामले में पूरी दुनिया जर्मनी की ओर देख रही है." उनका कहना है कि हत्याकांड में मारे गए लोगों और उनके परिजनों के सम्मान में और भरोसा दोबारा जीतने के लिए वे इसे जरूरी मानती हैं कि तुर्की और ग्रीस के मीडिया प्रतिनिधियों पर सीटों के बंटवारे में ध्यान दिया जाए. उन्होंने अदालत से विवादास्पद फैसले पर दोबारा विचार करने की अपील की.

म्यूनिख की अदालत के जजों पर जर्मन और तुर्क जनमत का दबाव बढ़ रहा है. फुंके इस बात का स्वागत करते हैं कि यहां विवेकपूर्ण जनमत है और वे उसके अप्रत्यक्ष प्रभाव से इनकार नहीं करते. "लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस वजह से अदालत स्वतंत्र नहीं है." उनका कहना है कि यह मुकदमे की प्रक्रिया पर कोई प्रभाव नहीं है, बल्कि उससे जुड़े सार्वजनिक ढांचे पर." उग्र दक्षिणपंथी संगठन एनएसयू (नेशनल सोशलिस्ट अंडरग्राउंड) के संदिग्ध आतंकियों और समर्थकों पर मुकदमा म्यूनिख की अदालत में 17 अप्रैल को शुरू होगा. (डायचेवेले)

गमगीन माहौल में हुआ पत्रकार पाली का अंतिम संस्कार

रामगढ़ : जिले के पत्रकार व कांग्रेसी नेता बलजीत सिंह बेदी के छोटे भाई जसपाल सिंह बेदी उर्फ पाली का अंतिम संस्कार गुरुवार को गमगीन माहौल में दामोदर नदी तट पर कर दिया गया। इससे पूर्व उनके रांची रोड स्थित आवास से शवयात्रा निकाली गई। शवयात्रा सीधे रामगढ़ गुरुद्वारा साहिब पहुंची। यहां अंतिम अरदास के बाद शव को सीधे दामोदर नदी तट लाया गया। वहां शव का अंतिम संस्कार किया गया। शव जैसे ही आवास से निकला पूरा माहौल गमगीन हो गया। उनकी पत्‍‌नी व परिजन दहाड़े मार-मार कर रो रही थीं।

ज्ञात हो कि बुधवार की रात रांची रोड अशोक सिनेमा हाल के समीप एक अज्ञात वाहन की चपेट में आकर घटनास्थल पर ही पत्रकार पाली की मौत हो गई थी। अंतिम संस्कार में भारी संख्या में पत्रकार, विभिन्न राजनीतिक दलों व गणमान्य लोग शामिल हुए। इनमें मुख्य रूप से एसडीओ दीपक कुमार, एसडीपीओ धनंजय कुमार सिंह, थाना प्रभारी इंस्पेक्टर दिलू लोहार, गुरुद्वारा के प्रधान रम्मी सिंह गांधी, आजसू नेता रोशन चौधरी, विमल बुधिया, चेंबर अध्यक्ष जितेंद्र प्रसाद, मानद् सचिव विष्णु पोद्दार, निवर्तमान अध्यक्ष राजू चतुर्वेदी, पूर्व अध्यक्ष अध्यक्ष सुबोध पांडे, प्रदीप सिंह, कांग्रेस जिला अध्यक्ष कुमार महेश सिंह, सी पी संतन, शहजादा अनवर, शांतनु मिश्रा, परशुराम साह, डॉ. चेतन चतुर्वेदी, संजय अग्रवाल, मनजी सिंह, दुर्गा प्रसाद सिंह उर्फ वकील सिंह, संजीव सिंह संजू, अमित सिन्हा, जगजीत सिंह सोनी, टोनी सिंह, महेंद्र सिंह गांधी, जितेंद्र सिंह पवार, मनजीत सिंह होरा, सज्जन पारिख, अनिल गुप्ता, डब्लू साव, डीके तिवारी, आरके पांडे, शंकर मिश्रा, अरुण कुमार राय, नीरज मंडल, बबलू सैनी, रवीन्द्र सिंह छाबड़ा, विजय सिंह व लालधारी राम सहित काफी लोग शामिल थे।
 

ज़ी न्यूज़ की मांग- नवीन जिंदल को गृह मंत्रालय की स्थायी समिति से हटाएं

नई दिल्ली : ज़ी न्‍यूज़ लिमिटेड ने लोकसभा स्‍पीकर श्रीमती मीरा कुमार को एक पत्र लिखकर कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल के खिलाफ कार्रवाई करने की अपील की है। पत्र में कहा गया है कि नवीन जिंदल को गृह मंत्रालय की संसदीय समिति से हटाया जाए। लोकसभा स्‍पीकर को लिखे पत्र में कहा गया है कि नवीन जिंदल की कंपनी जेएसपीएल और ज़ी न्‍यूज़ लिमिटेड के बीच कानूनी विवाद में जिंदल अपने राजनीतिक प्रभाव का गलत इस्‍तेमाल कर रहे हैं।

कोयला घोटाला से जुड़े ज़ी-जिंदल विवाद की जांच दिल्‍ली पुलिस कर रही है, जिसमें दोनों पक्षों की शिकायतों पर इस वक्‍त जांच चल रही है। ज़ी ग्रुप का आरोप है कि नवीन जिंदल होम मिनिस्‍ट्री (गृह मंत्रालय) की स्‍टैंडिंग कमेटी के सदस्‍य होने के नाते दिल्‍ली पुलिस पर दबाव डाल रहे हैं, जिससे इस मामले की जांच निष्‍पक्ष नहीं रह गई है। क्‍योंकि दिल्‍ली पुलिस गृह मंत्रालय के अधीन आती है।

ज़ी न्‍यूज़‍ लिमिटेड ने इसी मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी अर्जी दाखिल की है जिसमें दिल्‍ली पुलिस द्वारा दायर की गई तीन गैरकानूनी एफआईआर को रद्द करने की अपील की गई है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, दिल्‍ली पुलिस और जेएसपीएल को नोटिस भी जारी किया है। मीरा कुमार को लिखे पत्र में ज़ी न्‍यूज़ ने कहा है कि संसदीय परंपरा को ध्‍यान में रखते हुए ऐसे किसी भी सांसद को ऐसी संसदीय समिति का सदस्‍य नहीं बनाया जाना चाहिए जहां सांसद के निजी हित और समिति के कामकाज में विरोधाभास हो। पत्र में अपील की गई है कि कोयला घोटाला को लेकर चल रहे कानूनी विचार और ज़ी ग्रुप के खिलाफ अपना प्रभाव इस्‍तेमाल करने के आरोपों के चलते नवीन जिंदल को तत्काल प्रभाव से गृह मंत्रालय की संसदीय समिति से हटाया जाना चाहिए।

Joint CBI, I-T team examines Radia tapes

A joint team of officials from the CBI and the Income Tax (I-T) have started examining more than 5,800 tapped conversation of corporate lobbyist Niira Radia with politicians, corporate honchos and others. A Supreme Court bench on February 22 had ordered formation of special team to scrutinise the conversations to see any element of criminality in it.

The six-member team — five from CBI and one from the I-T department—has been formed to see if there were any elements of criminality in them. The team is headed by a deputy IG-rank officer. “The team started its work a week back,” said a CBI source. The conversations were tapped by the I-T department after a complaint was received against Radia that within a short period she built a business empire worth Rs.300 crore. (HT)

एफएम गोल्ड में महिलाओं का होता है यौन शोषण, हाईकोर्ट ने सीईओ को नोटिस भेजा

दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को एक याचिका की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार तथा प्रसार भारती के खिलाफ नोटिस जारी किया. उच्च न्यायालय में दायर याचिका में प्रसार भारती के एफएम गोल्ड तथा ऑल इंडिया रेडियो में महिला रेडियो प्रस्तोताओं का यौन उत्पीड़न एवं शोषण रोकने के निर्देश देने की मांग की गई है. मुख्य न्यायाधीश डी. मुरुगेसन और न्यायमूर्ति वी. के. जैन की खंडपीठ ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तथा प्रसार भारती के मुख्य कार्यकारी अधिकारी से, इस जनहित याचिका पर जवाब मांगा तथा मामले की सुनवाई 15 मई तक के लिए स्थगित कर दी.

सामाजिक कार्यकर्ता मीरा मिश्रा ने अपनी जनहित याचिका में कहा है कि उन्हें मीडिया रपटों के जरिए प्रसार भारती के रेडियो चैनलों में महिला कर्मचारियों के यौन उत्पीड़न की जानकारी मिली है. इसके पहले ऑल इंडिया रेडियो ब्रॉडकास्टिंग प्रोफेशनल्स एसोसिएशन (एआईआरबीपीए) ने दिल्ली महिला आयोग में एक शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें कहा गया था कि एफएम गोल्ड रेडियो स्टेशन में उन्हें यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है. जनहित याचिका में इस शिकायत का जिक्र किया गया है.

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में पेश हुए वकील सुग्रीव दुबे ने कहा कि इन रेडियो चैनलों में ये महिला कर्मचारी 15 वर्ष से भी ज्यादा समय से काम कर रही हैं, इसके बावजूद उनका यौन शोषण किया जाता है, और कई बार उन्हें बिना कारण बताए नौकरियों से हटा दिया जाता है. याचिका में अदालत से आग्रह किया गया है कि केंद्र सरकार तथा प्रसार भारती को महिला कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए सेवा शर्तो के अनुसार ठोस नीति एवं दिशा-निर्देश निर्मित करने एवं अन्य जरूरी उपाय करने के निर्देश दिए जाएं.

सुप्रीम कोर्ट में लटकता दिख रहा है मजीठिया वेज बोर्ड पर फैसला

मजीठिया वेज बोर्ड का मामला सुप्रीम कोर्ट में लटकता दिख रहा है. डेट पर डेट लग रही है. फैसला आने के आसार दूर दूर तक नहीं दिख रहे हैं. देश भर के पत्रकार इस मामले में टकटकी लगाए हैं पर जाने किस दुष्चक्र में फंस गया है मजीठिया वेज बोर्ड. मीडिया के मालिकों की मौज है कि उन्हें कोर्ट के लफड़े की वजह से वेज बोर्ड नहीं देना पड़ रहा है.

ताजी जानकारी ये है कि न्यायमूर्ति आफताब आलम, जो इस मामले की सुनवाई कर रही पीठ के जज हैं, 18 अप्रैल को रिटायर हो जाएंगे. फिलहाल वो छुट्टी पर चल रहे हैं. इस मामले की सुनवाई की नई तारीख 9 जुलाई तय की गई है. तब तक नई बेंच भी बन जाएगी.

प्रभात खबर ने यूपी में दस्तक दी, बलिया एडिशन लांच

प्रभात खबर ने यूपी में भी अपनी दस्तक दे दी. अखबार का बलिया एडिशन लांच कर दिया गया है. लांचिंग के मौके पर बिहार के प्रभारी स्वयं प्रकाश, पटना के स्थानीय संपादक प्रमोद मुकेश, बिजनेस हेड विजय बहादुर आदि लोग मौजूद थे. लांचिंग के मौके पर बलिया के जिला पंचायत सभागार में संगोष्ठी आयोजित की गयी. संगोष्ठी में काशी हिंदू विश्‍वविद्यालय के कुलपति डॉ लालजी सिंह ने भी अपने विचार रखे.

डा. लालजी सिंह ने समाचार पत्रों का व्याख्यान करते हुए कहा कि आज कोई भी समाचार पत्र सारी बातें छापता तो है, पर वैज्ञानिकों को जगह नहीं देता है. उन्होंने प्रभात खबर के प्रभारी संपादक (बिहार) स्वयं प्रकाश की तरफ जोर देते हुए कहा कि आप अपने पत्र में वैज्ञानिकों को स्थान दीजिए. उन्होंने बताया कि आज समाज में अगर अपने उत्तरदायित्व का सभी सही उपयोग करने लगे, तो एक विकसित समाज का स्वरूप बन सकता है. मौके पर बीएचयू के डीन डॉ विनय कुमार सिंह, जेपी विश्‍वविद्यालय के डीन डॉ वीरेंद्र नारायण यादव,बलिया के डीएम सत्य नारायण श्रीवास्तव आदि उपस्थित थे. इससे पहले सुबह संपादकीय प्रभारी (बिहार)स्वयं प्रकाश ने चित्तू पांडेय चौराहे पर प्रभात खबर के जनपदीय कार्यालय का उद्घाटन किया और कहा कि आज का युग पैसे से प्रभावित तो है, पर उसमें भी प्रभात खबर ने अपनी पवित्रता बनाये रखी है, इसीलिए आज बिहार झारखंड एवं बंगाल में नंबर एक पर है. बिहार बिजनेस हेड विजय बहादुर ने अतिथियों को स्मृतिचिह्न् भेंट कर सम्मानित किया.

दैनिक जागरण के दो ब्यूरो चीफ बदले, अजय का डीडी न्यूज से इस्तीफा, वीरेंद्र फारवर्ड प्रेस से जुड़े

दैनिक जागरण, वाराणसी से सूचना है कि गाजीपुर व सोनभद्र जिले के ब्यूरो चीफ बदल दिए गए हैं. गाजीपुर में लंबे समय से कार्यरत ब्यूरो चीफ राजकमल राय को वाराणसी आफिस बुला लिया गया है. उनकी जगह पर अखिलेश मिश्रा को ब्यूरो चीफ बनाकर गाजीपुर भेजा गया है. इसी तरह सोनभद्र से सूचना आ रही है कि राकेश पांडेय को वाराणसी आफिस से संबद्ध कर दिया गया है और उनकी जगह पर रत्नाकर दीक्षित को ब्यूरो चीफ बनाकर भेजा गया है.

एक अन्य खबर के मुताबिक डीडी न्यूज़ के एडिटर अजय शुक्ला के बारे में जानकारी मिली है कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है. अजय डीडी न्यूज़ पर रात 8 बजे से 10 बजे तक प्रसारित होने वाले प्राइम बैंड 'न्यूज़ नाइट' को होस्ट करते थे.

उधर, एक अन्य जानकारी के अनुसरा वीरेंद्र कुमार को फारवर्ड प्रेस का पूर्वी चंपारण संवाददाता बनाया गया है. वीरेंद्र इससे पहले राष्ट्रीय सहारा से सुगौली संवाददाता के रूप में कार्यरत रहे हैं.

महुआ के इनपुट हेड को रिपोर्टर ने दिया करारा जवाब, भेजा इस्तीफा (पढ़ें पत्र)

 बिहार के मुजफ्फरपुर में पिछले चौदह वर्षों से मीडिया में सक्रिय और इन दिनों महुआ न्यूज से जुड़े हुए रिपोर्टर (स्टाफ रिटेनर) अरुण श्रीवास्तव ने इस्तीफा दे दिया है. अरुण से आईपीएस गुप्तेश्वर पाण्डेय (एडीजीपी) की खबर मांगी गई… अरुण ने समय पर खबर नहीं भेजा… दो दिनों से बिजली संकट रहने के कारण अरुण का मोबाइल भी बंद मिला तो चैनल ने खबर नहीं भेजने का पत्र मेल कर दिया….

भाई वाह, समय पर पैसा नहीं…. पिछले दस महीने से महुआ न्यूज़ ने भुगतान नहीं किया… और फिर, खबर के इतना दबाव… इस कारण अरुण श्रीवास्तव ने महुआ न्यूज़ के चैनल हेड सहित सभी अधिकारियों को अपना इस्तीफा मेल से भेज दिया….. अरुण अब नेशनल चैनल के लिए करेंगे काम…. अरुण को कहा गया कि आप जिम्मेदार रिपोर्टर थे, पिछले 5-6 महीने से आपकी लापरवाही हद पार कर चुकी है…. कोई ये समझाए महुआ वालों को कि अगर रिपोर्टर के पास बाईक में तेल न हो तो कैसे जिम्मेदार होगा, यह प्रबंधन को सोचना चाहिए..
नीचे वो मेल जो अरुण को महुआ के इनपुट हेड धर्मेंद्र की तरफ से सेंड किया गया..

— ———- Forwarded message ———-
mahuaanews@gmail.com
Date: 2013/4/3
Subject: URGENT INFO
To: arunmfp72@gmail.com
Cc: kishore.malviya@mahuaanews.com

डीयर अरुण जी,

आपको कई बार कहा जा चूका है कि आप महुआ न्यूज़ के जिम्मेदार रिपोर्टर थे, लेकिन 5-6 महीने से आपकी लापरवाही हद पार कर चुकी है। गुप्तेश्वर पाण्डेय के खिलाफ जांच शुरू होने वाली खबर जब आपसे माँगा गया तो आपने बहाना बना दिया, दो दिन से कैमरा खराब होने का बहाना बना रहे हैं, जब मैंने आज आपको फोन किया तो आपने फोन काटकर अपना मोबाइल बंद कर लिया।

अगर आपको दिक्कत है तो आज से आप काम करना बंद कर सकते हैं, बहुत हो चुका, अब ऐसे काम नहीं चलेगा। आपने हद कर दी है।

धर्मेन्द्र
इनपुट हेड
महुआ न्यूज़

उमेश डोभाल स्मृति युवा पत्रकारिता पुरस्कार इस बार भास्कर और कोमल को

: 6 एवं 7 अप्रैल को स्मृति एवं सम्मान समारोह बागेवर में : शोभा बहन, टीसी त्रिपाठी और चारुचंद्र चंदोला होंगे सम्मानित : रुद्रपुर (उत्तराखण्ड)। साल 2012 का प्रिंट मीडिया के क्षेत्र में उमेश डोभाल युवा पत्रकारिता पुरस्कार दैनिक हिन्दुस्तान देहरादून में कार्यरत 33 वर्षीय भास्कर उप्रेती को व इलेक्ट्रानिक मीडिया के क्षेत्र में उमेश डोभाल युवा पत्रकारिता पुरस्कार पिथौरागढ़ के जी न्यूज संवाददाता 34 वर्षीय कोमल मेहता को दिया जायेगा। इस पुरस्कार के चयन के लिये राज्य भर से प्रबुद्ध पत्रकारों, लेखकों व सार्वजनिक जीवन में काम कर रहे व्यक्तियों से युवा संभवनाशील पत्रकारों को प्रस्तावित करने का अनुरोध किया गया था जो जनपक्षीय रिपोर्टिग करते रहे हों।

मिले नामांकनों को आधार बनाते हुये उनके साल भर के कामकाज उनकी रिपोर्टिग आदि पर चर्चा उपरान्त ज्यूरी जिसमें कोटद्वार से पीटीआई के कमल जोशी, वरिष्ठ पत्रकार अनूप मिश्र, पौड़ी से वरिष्ठ पत्रकार जी.पी. सेमवाल एवं वरिष्ठ पत्रकार अनिल बहुगुणा एवं ट्रस्ट की ओर से कार्यकारी बिमल नेगी की मौजूदगी में सर्वसम्मत निर्णय लिया गया। इसमें ट्रस्ट के वरिष्ठ उपाध्यक्ष बी. मोहन नेगी एवं कोषाध्यक्ष सुरेन्द्र सिंह रावत भी उपस्थित थे।

पहले नैनीताल व हल्द्वानी में चार साल दैनिक जागरण में सेवायें दे चुके 33 साल के भास्कर उप्रेती 2008 से दैनिक हिन्दुस्तान देहरादून संस्करण में वरिष्ठ संवाददाता/उपसंपादक है। हिन्दी एवं अंग्रेजी साहित्य से एम.ए. व बी.एड. की शिक्षा प्राप्त कर चुके भास्कर लेखनी के बहुत धनी हैं व जनपक्षीय मसलों पर लिखते रहे हैं। जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के 34 वर्षीय कोमल मेहता ने अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत साप्ताहिक पत्र 'आज का पहाड़' से की। इतिहास से स्नातकोत्तर एवं जनसंचार में पीजी डिप्लोमा, व पत्रकारिता में एम.ए कोमल मेहता कुछ समय जैन टीवी से भी सम्बद्ध रहे। उसके बाद उन्होंने दूरदर्शन प्रोडक्शन हाउस गिरीदूत के लिये भी काम किया। 2009 से वे पिथौरागढ़ में जी न्यूज उ.प्र. उत्तराखण्ड के प्रतिनिधि हैं और अपने चैनल के माध्यम से लगतार क्षेत्र के जनपक्षीय मसलों को उठाते रहे हैं।          

उल्लेखनीय है कि ट्रस्ट हर साल साहित्य, पत्रकारिता, कविता एवं समाजसेवा के क्षेत्र में मनीषियों को उनकी आजन्म सेवाओं के लिये सम्मानित भी आया है। साल 2013 के सम्मानों का पहले ही ऐलान किया जा चुका है। इसके तहत उमेश डोभाल स्मृति सम्मान इतिहास, भाषा एवं लोकसाहित्य के क्षेत्र में सतत रूप से कार्य कर रहे हल्द्वानी के 72 वर्शीय ताराचन्द त्रिपाठी को, प्रचार प्रसार से दूर बागेश्वर पिथौरागढ़ की सीमा पर धरमघर में काम कर रहीं 70 वर्षीय समाज सेविका सरला बहिन की शिष्या शोभा बहिन को राजेन्द्र रावत ‘राजू’ जनसरोकार सम्मान एवं देहरादून के 74 वर्षीय कवि चारूचन्द्र चन्दोला को कविता के क्षेत्र में योगदान के लिये गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ जनकवि सम्मान दिया जा रहा है।

संगम नगरी बागेश्वर में होने वाले इस समारोह के अवसर पर स्मारिका का भी विमोचन किया जायेगा। होली के कारण इस बार यह समारोह 25 मार्च की बजाय 6 एवं 7 अप्रैल को हो रहा है। राज्य के विधानसभाध्यक्ष मा. गोविन्द सिंह कुंजवाल संगम नगरी बागेश्वर में होने जा रहे 23वें उमेश डोभाल स्मृति समारोह में मुख्य अतिथि होंगे। पी.यू.सी.एल. के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, संविधान विशेषज्ञ एवं इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता रवि किरन जैन मुख्य वक्ता के रूप में ''विकेन्द्रीकृत व्यवस्था ही उत्तराखण्ड के विकास का रास्ता है'' पर अपनी बात रखेंगे। इस आयोजन को उत्तराखण्ड श्रमजीवी पत्रकार संगठन बागेश्वर एवं उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट के द्वारा किया जा रहा है जिसकी तैयारियां अन्तिम चरण में हैं। समारोह में राज्य के दूर-दूर से पत्रकारों, साहित्य कला व संस्कृति से जुडे महानुभावों के पहुंचने की उम्मीद है। 6 अप्रैल की शाम नगर में एक सांस्कृतिक जुलूस निकाला जायेगा इसके उपरान्त स्लाइड शो, लघु चित्रों, की प्रस्तुतियां की जायेंगी। सम्मान समारोह 10 बजे आरम्भ होगा जिसमें पत्रकारिता पुरस्कार एवं सम्मानों को दिया जायेगा। ज्ञात रहे कि पत्रकार उमेश डोभाल की मृत्यु का यह पच्चीसवां साल चल रहा है। 25 साल पहले वे शराब माफिया के खिलाफ अपनी लेखनी चलाने के कारण पौड़ी में मारे दिये गये थे। 1991 से उमेश की पत्रकारिता की धारा को याद करने के लिये यह कार्यक्रम 22 साल से नगर नगर होता आया है।

अयोध्या प्रसाद 'भारती' की रिपोर्ट. अयोध्या प्रसाद ‘भारती’ हिंदी साप्ताहिक 'पीपुल्स फ्रैंड' के संपादक हैं.

दैनिक भास्कर, रामगढ़ के संवाददाता जसपाल सिंह बेदी की सड़क हादसे में मौत

रामगढ़ के दैनिक भास्कर संवादददाता जसपाल सिंह बेदी उर्फ पाली की बुधवार रात सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। श्री बेदी रामगढ़ स्थित कार्यालय से स्कूटी से घर जा रहे थे। इसी बीच रांची रोड अशोक सिनेमा के बाहर एनएच 33 पर अज्ञात वाहन ने उन्हें अपने चपेट में ले लिया। इससे घटनास्थल पर ही उनकी मौत हो गई। पत्रकार बेदी रामगढ़ चेंबर ऑफ कॉमर्स के पूर्व अध्यक्ष व रामगढ़ गुरुद्वारा के पूर्व प्रधान बलजीत सिंह बेदी के छोटे भाई थे।

इसकी खबर मिलने पर शहर के व्यवसायियों, बुद्धिजीवियों व पत्रकारों में शोक की लहर है। जानकारी के अनुसार पत्रकार बेदी बुधवार रात आठ बजे चुटूपालू घाटी में सीटी राइट बस के पलटने की खबर संकलन करने के बाद अपने कार्यालय पहुंचे थे। इसके बाद वह अपने घर लौट रहे थे। श्री बेदी की दो पुत्री हैं जिनकी सूनी आंखें अपने पापा को तलाश रही हैं। श्री बेदी का आज रामगढ दामोदर नदी घात पर अंतिम संस्कार किया गया। इस मौके पर रामगढ जिला इलेक्ट्रोनिक मिडिया और प्रिंट मिडिया के पत्रकारों ने उनकी आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

ए2जेड चैनल से प्रभाकर चंचल और साधना से अनामिका सिंह का इस्तीफा

ए2जेड चैनल से प्रभाकर चंचल ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर रनडाउन प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत थे. वे अपनी नई पारी जल्‍द 4रीयल न्यूज के साथ शुरू करने जा रहे हैं. खबरों के मामले तेजतर्रार व जुझारू माने जाने वाले प्रभाकर पिछले 6-7 सालों से मीडिया में कार्यरत हैं. इससे पहले प्रभाकर चंचल इण्डिया टीवी में कार्यरत थे.

उधर, लखनऊ से सूचना मिली है कि साधना न्यूज में कार्यरत रिपोर्टर अनामिका सिंह ने इस्तीफा दे दिया है. वे जल्द एक नए चैनल के साथ अपनी नई पारी शुरू करने जा रही हैं.

ईमानदारी के लिए सम्मान रखने वाले लोगों को अरविंद केजरीवाल का समर्थन करना चाहिए

Dilnawaz Pasha : लोग मुझे आ आमदी पार्टी का प्रवक्ता, पेड इंटरनेट एजेंट, झुका हुआ पत्रकार, बिका हुआ पत्रकार और न जाने क्या-क्या कह रहे हैं… देश और दुनिया में इतना कुछ घटित हो रहा है, लेकिन फिर भी रह-रहकर अनशन पर बैठे अरविंद केजरीवाल की सेहत का ख्याल मेरे मन से नहीं निकल रहा… अभी कुछ और लिखना चाह रहा था…लेकिन जहन अरविंद के अनशन की ओर चला गया…आप में से बहुत से लोगों के लिए उनका यह अनशन सुपर फ्लॉप है…कई के लिए नौटंकी तो अन्य के लिए टीआरपी ड्रामा है…

जैसे आप उनके अनशन के बारे में कोई भी राय बनाने के लिए स्वतंत्र हैं वैसे ही मैं भी… तमाम तर्कशीलता के बावजूद मैं इसी नतीजे पर पहुंचा हूं कि अपने मन में ईमानदारी के लिए सम्मान रखने वाले लोगों को अरविंद केजरीवाल का समर्थन करना चाहिए…उनकी पीड़ा और मकसद को समझना चाहिए… मैं जानता हूं कि मैं पत्रकार हूं…मेरा काम तटस्थ रहना है…अपने विचारों के बजाए तथ्य पेश करना है…लेकिन मैं पत्रकार होने से पहले एक ईमानदार व्यक्ति हूं…मैं ईमानदार हूं इसलिए पत्रकार हूं…पत्रकार हूं इसलिए ईमानदार नहीं हू…

और मेरी ईमानदारी मुझे अरविंद केजरीवाल के साथ खड़ा कर देती है…और अंत में एक बात और…आप कुछ भी करिए…कुछ भी कहिए…कम से कम फेसबुक पर मैं वही लिखूंगा जो मेरा दिल कहेगा.. मैं फेसबुक पर हमेशा दिल से लिखता रहा हूं…और लिखता रहूंगा… आप मेरे पत्रकार होने का हवाला देकर, मुझे बिकाऊ या झुकाऊ कहकर, आम आदमी पार्टी का प्रवक्ता कहकर वह लिखने या कहने से नहीं रोक पाएंगे जो मेरा दिल सोचता है…इसलिए आप सब लोगों से माफी के साथ…मैं अपने विचार अभिव्यक्त करता रहूंगा… और आपके पास मुझे ब्लॉक करने का ऑप्शन हमेशा मौजूद है…और मार्क जुकरबर्हेग की कृपा से रहेगा भी…

भास्कर के पत्रकार दिलनवाज पाशा के फेसबुक वॉल से.


Mayank Saxena : मोदी भक्तों के लिए अरविंद केजरीवाल का अनशन ड्रामा है…अच्छा सर्वज्ञानी मोदी भक्तों ये बताइए कि सद्भावना उपवास क्या था, ड्रामा, प्रहसन, नौटंकी या मज़ाक… (फिलहाल केजरीवाल के पक्ष में, बाद में देखा जाएगा…मुद्दा ज़रूरी है…)

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बड़े टीवी चैनल अम्बानी और टाटा के दबाव में केजरीवाल की ख़बर नहीं दिखाते हैं, तो छोटे चैनल इसलिए क्योंकि बड़े चैनल नहीं चला रहे हैं…

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फिलहाल केजरीवाल के साथ…(बिना किसी लाभ और विचारधारा को ध्यान में रखते हुए…कांग्रेस-बीजेपी दोनों के खिलाफ़ जाते हुए…मुद्दे पर समर्थन देते हुए…)

समाचार प्लस चैनल में कार्यरत मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.

बीते 31 मार्च को नेशनल दुनिया के एक साल पूरे (देखें चित्र)

यह तस्वीर नेशनल दुनिया के फोटोग्राफर रवि बत्रा ने फेसबुक पर शेयर की है. मौका है नेशनल दुनिया अखबार के एक साल पूरे होने का. इस मौके पर एक छोटा सा कार्यक्रम आयोजित किया गया. इसमें तारिक अनवर भी शरीक हुए. तस्वीर में तारिक अनवर के अलावा मालिक और एडिटर इन चीफ शैलेंद्र भदौरिया, ग्रुप एडिटर कुमार आनंद, एडिटर प्रदीप सौरभ और सीओओ संदीप विश्नोई दिख रहे हैं. ताजी सूचना के मुताबिक सीओओ संदीप विश्नोई अखबार से इस्तीफा देकर जा चुके हैं.

तस्वीर में बाएं से दाएं- प्रदीप सौरभ, शैलेंद्र भदौरिया, तारिक अनवर, कुमार आनंद, संदीप विश्नोई.

अरविन्द केजरीवाल की तपस्या पर ऊंगली उठाने वाली नेट वीरों की अल्हड़ जमात आये और देखे

Aam Aadmi Party : जैसे ही अरविन्द के उपवास ने 13वें दिन में प्रवेश किया, दिल्ली में बिजली पानी के नाजायज़ बिल न भरने की शपथ लेने वालों की संख्या 9,60,603 पहुँच गयी है! ये संख्या आज रात तक 10,00,000 पहुँचने की संभावना है! कल, 5 अप्रैल को 10 बजे बाद, सुन्दर नगरी में एक सर्वधर्म प्रार्थना आयोजित की जायेगी, दिल्ली के हर क्षेत्र से कार्यकर्ता इस प्रार्थना सभा में आयेंगे. 6 अप्रैल से सविनय अवज्ञा आन्दोलन का द्वीतीय चरण प्रारम्भ होगा. कार्यकर्ता और जनता उन कटे हुए तारों को जोड़ेंगे जो बिल न भरने के कारण काट दिए गए.

6 अप्रैल 1930 को ही गांधीजी ने डांडी में मुट्ठी भर नमक बनाकर, नमक कानून तोडा था,जिसे ब्रिटिश साम्राज्य की नीव पर पहला आघात मानते हैं. आज़ादी से पहले भारी करों के चलते नमक ऐसा उत्पाद हो गया था,जिसे खरीद पाना गरीबों के लिए मुश्किल हो था. आज बिजली पानी भी आम जनता के बूते के बाहर हो गयी है, जिसके बिल चुकाने के लिए उसे लोन तक लेना पड़ रहा है ! आज सुबह अरविन्द का रक्त चाप 111/73, पल्स 64 , शुगर 131 ,कीटोन 3+ और वज़न 56.5 था ! वो मंच परर तो आये,पर कमजोरी के कारण सुन्दरनगरी में आई जनता से बात नही कर पाए.

As Arvind Kejriwal's upwas enters the 13th day today, the number of people who have pledged not to pay the inflated bijli-pani bills in Delhi has swelled to 9,60,603. The figure is expected to cross the 10 lakh figure by today night. Tomorrow, i.e. April 5th, a sarva-dharma prarthna would be organized from 10am onwards in Sundar Nagri. Volunteers from all over Delhi would visit Sunder Nagri tomorrow for the prarthna.

From April 6th onwards, the second phase of Civil Disobedience movement would be launched. Volunteers and people would break the law to restore connections of households whose bijli-pani connections had been disconnected on non-payment of inflated bills. On April 6th, 1930, Gandhiji had broken the salt law in Dandi thereby indicating the downfall of the British Empire. During pre-independence period, due to heavy taxes, salt had become a commodity which the poor could not afford. Today, electricity and water have become out of reach for the common man, who is forced to take loans for paying the bills.

In the morning today, Arvind Kejriwal's blood pressure was 111/73, pulse 64, sugar 131, ketones 3+ and weight was 56.5 kgs. Due to weakness, though he came out on the stage, but restrained from addressing the people gathered at Sunder Nagri.

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इस उपवास पर अपने कुतर्को और बचकानी दलीलों को देकर अरविन्द की तपस्या पर ऊँगली उठाकर इसे महज़ राजनीतिक लालसा का नाम दे देने वाली नेट वीरों की अल्हड जमात आये और देखे कि 2013 में सुन्दर नगरी में 13 दिन से भूखे बैठे अरविन्द ने 2002 में भी इन्ही गलियों में यहाँ की बेबअस, लाचार जनता में अलख जगाने की लड़ाई लड़ी थी, तब न जनलोकपाल था और न पार्टी थी ! अगर था तो बस वही परिवर्तन का सपना देखने वाला नौजवान ! मखमली गलीचों पर से जिन्होंने नीचे कभी कदम नही रखा, जिन्होंने एक बार वोट लेकर कभी मुड़ कर नही देखा,ऐसे सूटेड- बूटेड गरिमामय नेता और आँख कान बन्द रखने वाले उनके स्वघोषित राष्ट्रवादी लड़ाका देख सकते हैं कि 2002 से 2013 तक अरविन्द की दलील भी वही है, जूनून वही है, जोश वही है ,हौसला वही है ,सादगी वही ……और हरे रंग का स्वेटर भी वही है !

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वो भगत सिंह ही थे जो फांसी पर चढ़ते हुए भी मुस्कुरा रहे थे और जीवन के आखिरी पलों में भी जिनके लबों पर देश का नाम था और जिसका एक एक कतरा इन्कलाब होकर "मेरा रंग दे बसंती चोला" गा रहा था" ! आज यही गीत जब मंच पर झुग्गी बस्ती के 2 छोटे छोटे बच्चों ने गुनगुनाया तो 13 दिन से भूखे अरविन्द के चेहरे पर मुस्कान झलक उठी !
ऐसा वक़्त बार बार नही आता जब आपको ऐसा मौका मिले कि आप अपनी धरती का क़र्ज़ चुका सकें ! अरविन्द आज इसी सौभाग्य से पुलकित हैं ! इन्कलाब जिंदाबाद ! जय हिन्द !

एक सूरज के छुपने से अँधेरा हो जाता है,
लाख दीये जला लो, छट नही पाता है !
भीड़ चल देगी ,जिधर ले जाएगा ज़माना,
जो क्रान्ति बन जाए,वो शख्स रोज़ नही आता है !

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अरविन्द केजरीवाल क्यों उपवास कर रहे हैं? इसका मकसद क्या है? क्या मिलेगा,इन सब सवालों का जवाब इन झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग बेहतर दे सकते हैं ! एक मजदूर का 35 लाख का बकाया,50 गज के प्लॉट जिस पर सिर्फ दीवार बनी है ,उसका 26,000 रुपए बिजली बिल ,और अब 76 वर्षीय सुस्वतिदेवी जो 6/6 के एक कमरे में अकेली रहकर 1 बल्ब और 1 पंखा चलाती है,उनका बिल 18,100 रुपए आया है ! जब पैसे हैं ही नही, तो चुकाये कहाँ से? अब बिजली विभाग वाले मीटर काटने आ गए ! क्या ये कहना गलत है कि शीला सरकार इन गरीबों का खून चूस कर बिजली कम्पनियों की दलाली कर रही है ?

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जब आम आदमी सांसदों के भ्रष्टाचार पर बोलता है, तो संसद की गरिमा, संवैधानिक पदों के अपमान के नाम पर उसे चुप करा दिया जाता है. परन्तु जब सीएजी जैसी सम्मानजनक संवैधानिक संस्था पक्ष और विपक्ष के 2 मुख्यमंत्रियों 'शीला दीक्षित' और 'नरेन्द्र मोदी' के भ्रष्टाचार और कुशासन की पोल खोलती है तो, तस्वीर ही बदल जाती है! मोदी पर सीएजी की रिपोर्ट को कांग्रेस सही बताती है, और भाजपा गलत, वहीँ शीला दीक्षित पर सीएजी की रिपोर्ट को भाजपा सही बताती है, और कांग्रेस गलत! आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों? एक तरफ अम्बानी तो दूसरी तरफ अदानी. दिल्ली से लेकर गुजरात तक देश का पैसा जमकर लूटा जा रहा है. खुद के स्वार्थ के लिए सीएजी की ईमानदारी और विश्वसनीयता पर ऊँगली उठाकर कांग्रेस और भाजपा अपने भ्रष्टाचार और चोरी के काले धन को सफ़ेद नही कर सकते!

When a common man speaks about corruption by politicians then it is said that he's demeaning the constitutional posts and is made silent. But when a constitutional agency like CAG questions the corruption and mis-governance by Sheila Dixit and Narendra Modi, the whole scenario changes. BJP says that the CAG report on Modi is wrong but cites the same for Congress. The vice-versa is true for Congress. Why this dual standard? On one side there is Ambani and on the other side is the Common Man. From Delhi to Gujarat, India's wealth is being looted. People who raise questions on CAG for their own vested interests can't hide the corruption and loot by Congress and BJP.

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संघ की वैचारिक प्रखरता के "चाणक्य" कहे जाने वाले, भारतीय राजनीती के इस दौर के सब से प्रकाण्ड अन्वेषी और बीजेपी को दो बार सत्ता तक पहुचने वाले के.एन.गोविन्दाचार्य जी अरविन्द की तबियत पूछने और मिलने आये थे ! उस से मिलने के बाद जो उन्होंने पत्रकारों को कहा वो वही है जो इस देश में इन दोनों दलों की निर्ल्लज खो-खो से दुखी हर आम-आदमी सोचता है ! अटल जी के मंत्रिमंडल के सबसे योग्य चेहरे अरुण शौरी के बाद गोविन्दाचार्य जी ने भी यही कहा कि अब मुझे तो लगता ही है कि अगला चुनाव बीजेपी और कांग्रेस "हाथ में कमल के फूल" निशान पर, मिल कर लड़ेंगी ! सत्य के इस संघर्ष में कोई तठस्थ नही रह सकता ! या तो आप भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं ,या उसके साथ ! अब तो भ्रष्ट कुनबे से भी छनकर लोग व्यक्तिगत ईमानदारी का परिचय देंते हुए जनता के साथ आकर खड़े हो रहे हैं !

आम आदमी पार्टी के फेसबुक वॉल से.

लोकसभा टीवी के स्टूडियो में आग लगी, सारी बिल्डिंग खाली कराई गई

Alok Dixit : दोस्तों, आज लोकसभा टीवी के स्टूडियो में ऐसिड अटैक के विषय पर लाइव पैनल डिश्कशन के ठीक पहले आग लग गई और सारी बिल्डिंग को खाली करा लिया गया। विषय पर बहस अगले गुरूवार इसी समय यानि 4 बजे होगी।

Friends, due to fire caused in the studio of Loksabha TV, today's debate on the subject of Acid Attacks has been postponed to next Thursday at 4 PM. Acid attacks are one of the most heinous crimes practiced especially against women across globe.

आलोक दीक्षित के फेसबुक वॉल से.

रिपोर्टर प्रेम ठाकुर की ग्लेशियर के नीचे दब जाने से मौत

Arun Dogra Reetu : पत्रकार परिषद बिलासपुर ने हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में एक रिपोर्टर प्रेम ठाकुर की ग्लेशियर के नीचे दब जाने से हुई मौत पर शोक जताया है और परम पिता परमात्मा से शोक संतप्त परिवार के प्रति साहस देने की प्रार्थना की है। परिषद ने मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह से आग्रह किया है कि प्रेम के परिवार जनों को उचित मुआबजा राशि प्रदान करने की अनुकंपा करे। परिषद इस बारे में मुख्यमंत्री को पत्र भी लिख रही है।

पत्रकार अरुण डोगरा रीतू के फेसबुक वॉल से.


उल्लेखनीय है कि मनाली के राहलाफाल से 100 मीटर दूर हिमखंड की चपेट में आकर पत्रकार की मौत हुई. पत्रकार का साथी कैमरामैन बाल-बाल बच गया. सीमा सड़क संगठन व अटल बिहारी वाजयेपी पर्वतारोहण संस्थान के बचाव दल ने करीब 5 घंटे की मशक्कत के बाद हिमखंड के नीचे दबे पत्रकार का शव बरामद किया. बुधवार सायं लगभग 4 बजे राहलाफाल के पास कवरेज के लिए गये पत्रकार प्रेम ठाकुर हिमखंड गिरने से उसकी चपेट में आ गये. इस घटना में उसके साथ गया कैमरामैन कर्ण बच गया. पुलिस के मुताबिक पत्रकार ने राहलाफाल में अपनी गाड़ी खड़ी की और उसके बाद वे लगभग 100 मीटर की दूरी पर सड़क से बर्फ हटा रही जेसीबी मशीन का छायांकन कर रहे थे. इतने में पहाड़ी से ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे आ गिरा और वह भी उस ग्लेशियर के नीचे दब गये.

अंधविश्वास के कारण फ्रीलांस फोटोग्राफर पूरे परिवार के साथ जहर खाकर मर गया

Swami Balendu : राजस्थान में शिव के दर्शन की लालसा में पूरे परिवार के साथ जहर खा कर आत्महत्या करने वाला व्यक्ति फ्रीलांस फोटोग्राफर था, उसके बच्चे स्कूल जाते थे, वो कोई निरक्षर नहीं था| आप उसे अन्धविश्वासी कहते हो परन्तु वो अपने आपको आस्थावान कहता था| उसे पूरा विश्वास था कि वो मरेगा नहीं, तभी उसने सबूत के लिए वीडियो बनाई थी, उसे विश्वास था कि शंकर भगवान प्रगट होकर उसे बचा लेंगे, क्योंकि धर्मग्रन्थ भरे पड़े हैं इस प्रकार की कहानियों से कि जब भक्त मरने लगता है तो भगवान प्रगट होकर बचा लेते हैं|

पढ़ लो कहानी ध्रुव की या प्रहलाद की…. फिर भी वो अभागा अपने बच्चों समेत मर गया…. कोई भगवान नहीं आया उसे बचाने! किसने मारा उसे! क्या कहोगे: अन्धविश्वास, आस्था या फिर दृढ विश्वास! मैं ऐसे बहुत से पढ़े लिखे मूर्खों से मिला हूँ जो इस प्रकार की धार्मिक बकवास को सच मानते हैं और अपने बच्चों को भी अन्धविश्वासी बनाते हैं| इसलिए मैं कहता हूँ कि धर्म और ईश्वर अन्धविश्वास के अलावा और कुछ नहीं और ये धार्मिक किताबें तो जला डालने लायक हैं, जो कि अन्धविश्वास को फैलाने का कारण हैं|

स्वामी बालेंदु के फेसबुक वॉल से.

आज जिया उल हक साहब का चालीसवां है

Dilnawaz Pasha : आज शाम शहीद डीएसपी जिया उल हक की बेवा परवीन आजाद का एसएमएस मिला। एसएमएस से पता चला कि कल जिया उल हक साहब का चालीसवां है। यानि कल उनके शहादत को पूरे चालीस दिन हो जाएंगे। इन बीते चालीस दिनों में उत्तर प्रदेश के सियासी रहनुमा जिया उल हक की कब्र पर गए और फातेहा पढ़ी।

राहुल गांधी, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव…और न जाने कौन-कौन। सभी ने जिया उल हक की रूह को इंसाफ दिलाने की बात की। मैं जिया के गांव गया था, उनकी जवान बेवा और बूढ़ी मां से मिला था।….उनकी कब्र पर जाकर फातेहा भी पढ़ी थी…और फातेहा पढ़ते वक्त यह दुआ भी मांगी थी कि उनकी शहादत ईमानदार लोगों में नया जज्बा पैदा करे और उनकी मरहूम रूह को इंसाफ मिले।

वह न सिर्फ एक बेहद ईमानदार अफसर, अच्छे शौहर और प्यारे बेटे थे बल्कि एक अहम भारतीय नागरिक भी थे। उनकी मौत से जितना नुकसान उनके परिवार को हुआ है उससे ज्यादा हमारे समाज और देश को हुआ है। वक्त की जरूरत है कि हम इस नुकसान की भरपाई करने की कोशिश करें… और इन बीते चालीस दिनों में बहुत कुछ हुआ है। सीबीआई ने लगभग यह कह ही दिया है कि राजा भैया का हाथ जिया उल हक की मौत में नहीं है….हाईकोर्ट ने सरकार से पूछ लिया है कि जिया उल हक के परिवार को दो नौकरियां किस आधार पर दी गईं… और न जाने क्या-क्या कहा और सुना गया है….

खैर इस सबके बीच बस यही दुआ है कि जिया उल के असली कातिल अपने अंजाम तक पहुंचे, उनकी शहादत कौम और देश में नया जज्बा पैदा करे…ईमानदारों को हौसला दे…. ये जिया उल हक की कब्र है…हो सके तो इस कब्र को देखकर दुआ पढ़ लीजिए….और एक सवाल खुद से कर लीजिये कि हमारे मुल्क में हालात ऐसे क्यों हैं कि ईमानदार और अच्छे लोग कब्र में सो रहे हैं और बुरे और बेईमान लोग राज कर रहे हैं? इस सवाल का जबाव मिले तो जरूर साझा कीजियेगा…हो सकता है आपका जबाव ही हम जैसों को नई रोशनी दे दे…

भास्कर के पत्रकार दिलनवाज पाशा के फेसबुक वॉल से.

सहारा समूह का सेबी पर पलटवार

नई दिल्ली : नई दिल्ली। सहारा समूह ने गुरुवार को भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) पर पलटवार करते हुए निवेशकों को 20000 करोड़ रुपए लौटाने के अपने दावे को सही ठहराया। सहारा समूह ने सेबी को अमीरों का नियामक करार देते हुए कहा कि उसे छोटे निवेशकों की स्थिति के बारे में अंदाजा नहीं है। इस बहुचर्चित मामले में अपने निवेशकों के आधार का ब्योरा देते हुए कंपनी ने कहा कि उसके कुल निवेशकों की संख्या 3.07 करोड़ है, जिसमें से 2.99 करोड़ लोग अधिकतम 20,000 रुपए तक के निवेशक हैं। इनमें से करीब 90 फीसदी निवेशकों का पैसा लौटा दिया गया है, जो पूरी तरह उचित है।

सहारा समूह ने दावा किया कि 1.33 करोड़ निवेशक ऐसे हैं जिन्होंने 5,000-5,000 रुपए जमा कराए थे। वहीं 88 लाख निवेशक 10,000 रुपए प्रत्येक, 42 लाख 15,000 रुपए प्रत्येक तथा 36 लाख 20,000-20,000 रुपए जमा कराने वाले हैं। सहारा समूह का नाम लिए बिना सेबी प्रमुख यूके सिन्हा ने बुधवार को एक संगोष्ठी में सहारा समूह द्वारा निवेशकों के 20,000 करोड़ रुपए लौटाने के दावे पर सवाल उठाया था। सिन्हा ने कहा था इस पर सोचें कि यह कितना व्यावहारिक है, उनकी यह कहानी कितनी विश्वसनीय है।

सेबी प्रमुख के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए सहारा ने आज जारी बयान में कहा है कि सेबी गरीब निवेशकों की स्थिति के बारे में नहीं जानता और न ही उनको पहचानता है। सेबी प्रमुख को इस प्रकार का गैर जिम्मेदाराना बयान नहीं देना चाहिए कि किस तरह चार महीनों में 20,000 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया। पिछले साल उच्चतम न्यायालय ने सहारा समूह की दो कंपनियों को निवेशकों का 24,000 करोड़ रुपए लौटाने का निर्देश दिया था। सेबी को निवेशकों के धन लौटाने के काम को पूरा करवाना है।

हालांकि समूह ने दावा किया कि इसमें से ज्यादातर राशि लौटाई जा चुकी है और निवेशकों का कुल बकाया 5,120 करोड़ रुपए से कम है। समूह द्वारा यह राशि सेबी के पास जमा कराई गई है। सहारा ने बयान में कहा कि सेबी के चेयरमैन पिछले एक साल से उसके चेयरमैन को मिलने का समय नहीं दे रहे हैं और न ही वे टीवी पर बहस के लिए तैयार हैं। निवेशकों का पैसा नकद लौटाने को उचित ठहराते हुए सहारा ने कहा कि हमने सेबी को कई बार लिखा है कि हमारे निवेशक काफी छोटे हैं जो छोटे कस्बों या ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। ये निवेशक बैंक के पास नहीं जाते, न ही बैंक उनके पास आता है। सेबी के चेयरमैन से माफी मांगने की मांग करते हुए सहारा समूह ने कहा कि 20,000 करोड़ रुपए का नकद भुगतान देश के कानून के तहत किया गया है और उसके खातों में कोई भी जाली या नकली निवेशक नहीं है। समूह ने स्पष्ट किया है कि यह ज्यादातर राशि पिछले 5 माह से अधिक समय के दौरान लौटाई गई है। (भाषा)

प्रणब मुखर्जी ने खारिज की नौ दोषियों की दया याचिका

नई दिल्‍ली: राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गंभीर अपराधों में सजा पा चुके नौ दोषियों की दया याचिका पर अपना फैसला दे दिया है. गृह मंत्रालय की सिफारिश पर राष्ट्रपति ने कुल नौ दोषियों में से सात की फांसी की सजा बरकरार रखी है, जबकि दो की सजा उम्रकैद में बदल दी है. लेकिन शर्त ये है कि दोषियों को पूरी जिंदगी जेल में ही बितानी होगी.

गौरतलब है कि प्रणब मुखर्जी ने ही मुंबई हमले के दोषी कसाब और संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की दया याचिकाएं खारिज करते हुए मौत की सजा बरकरार रखी थी. दोनों को फांसी दी जा चुकी है. अब कोई भी दया याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित नहीं है. प्रणब से पहले राष्ट्रपति रहते हुए प्रतिभा पाटिल ने 2007 से 2012 के बीच 35 दोषियों की सजा-ए-मौत को उम्रकैद में बदल दिया था. तीन याचिकाएं उन्होंने रद्द की थी.

कसाब के ‘भूत’ के कारण जिंदाल आर्थर रोड जेल से होगा शिफ्ट

मुंबई : 26/11 केस के आरोपी अबू जिंदाल को आखिरकार कसाब के 'भूत' छुटकारा मिलने जा रहा है। उसे अगले कुछ दिनों में आर्थर रोड जेल से नवी मुंबई की तलोजा जेल ले जाने की तैयारी है। आर्थर रोड जेल के सुपरिंटेंडेंट ने मंगलवार को स्पेशल मकोका कोर्ट को बताया कि वह जिंदाल को नवी मुंबई की तलोजा जेल ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। जिंदाल ने स्पेशल मकोका कोर्ट में याचिका देकर धमकी दी थी कि अगर उसे कसाब की कोठरी से नहीं हटाया जाता, तो वह भूख हड़ताल पर चला जाएगा।

मकोका जज के सामने जेल सुपरिंटेंडेंट ने कहा कि जिंदाल को आर्थर रोड जेल में आ रही परेशानियों को देखते हुए उसे तलोजा जेल में शिफ्ट किया जाएगा। गौरतलब है कि आर्थर रोड जेल में कसाब के लिए खास सेल बनाया गया था। आजकल उसी सेल में अबू जिंदाल को रखा गया है। अबू जिंदाल का कहना है कि कसाब उसे सोने नहीं देता। उसके सपने में आता है। वह परेशान है। जिंदाल का कहना था कि जब उसे सऊदी अरब में हिरासत में लिया गया, तब वह मानसिक रूप से परेशान था और तिहाड़ जेल में भी उसका इलाज चल रहा था। अब मुंबई में उसके सपने में कसाब आ रहा है।

मुंबई से नागमणि पांडेय की रिपोर्ट.

सहारा ग्रुप के दावों पर सेबी को नहीं है भरोसा

नई दिल्ली: क्या सहारा ग्रुप के दावों पर सेबी को नहीं है भरोसा? सेबी ने सहारा ग्रुप का नाम लिए बगैर कहा कि निवेशकों का पैसा लौटाने के दावों पर विश्वास नहीं किया जा सकता. सेबी के चेयरमैन यू के सिन्हा ने एक सेमीनार में कहा कि,"यह एक मशहूर मामला है. मुझे उसका नाम लेने की जरूरत नहीं है लेकिन एक कंपनी ने दावा किया है कि वो अपने तथाकथित निवेशकों का बीस हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा लौटे देगी और इस रकम का नब्बे फीसदी से भी ज्यादा पैसा तीन-चार महीने में नकद भुगतान कर देगी. ये कैसे संभव है और इस पर कैसे विश्वास किया जा सकता है."

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सेबी सहारा ग्रुप की दो कंपनियों से की जांच कर रहा है. सहारा ग्रुप को निवेशकों का चौबीस हज़ार करोड़ रुपये लौटाने को कहा गया है. (एबीपी न्यूज)

चिटफंड कंपनियों से परेशान हैं तो सेबी के टॉल फ्री नंबर 1800 266 7575 पर काल कर कंप्लेन करें

कलेक्टिव इन्वेस्टमेंट स्कीम के जरिए पैसा जुटाकर निवेशकों को धोखा देने वाली कंपनियों सेबी ने कड़ी चेतावनी दी है। सेबी ने सहारा ग्रुप का नाम लिए बिना कहा कि सहारा के निवेशकों को पैसे लौटाने के दावे पर विश्वास नहीं किया जा सकता। सेबी के अनुमान के मुताबिक कई कंपनियों ने बड़े रिटर्न के वादे के साथ करीब 10,000 करोड़ जुटाएं हैं। सेबी के मुताबिक इन कंपनियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।

सेबी चेयरमैन का इशारा सहारा की ओर है। निवेशकों को 20,000 करोड़ रुपये लौटाने के सहारा के दावे पर भरोसा नहीं किया जा सकता। सेबी चेयरमैन यूके सिन्हा के मुताबिक देश में सोने और रियल एस्टेट में बढ़ते निवेश की चिंता के साथ ही एक और बड़ी चिंता है देश में तेजी से पनप रहा ग्रे मार्केट। सेबी प्रमुख के मुताबिक देश में कई कंपनियां कलेक्टिव इन्वेस्टमेंट स्कीम के नाम पर निवेशकों से पैसा जुटाकर उनके साथ धोखा कर रही हैं।

इन स्कीमों के जरिए 10,000 करोड़ रुपये जुटाए जा चुके हैं। सेबी इन स्कीमों की बारीकी से जांच करेगा और गलती पकड़े जाने पर सख्त कार्रवाई होगी। सेबी चेयरमैन ने ये भी माना कि कलेक्टिव इन्वेस्टमेंट रेगुलेशन मे बड़े बदलाव की जरूरत है। फिलहाल कलेक्टिव इन्वेस्टमेंट को सेबी रेगुलेट करता है। लेकिन इसमें कोऑपरेटिव सोसायटी, निधी स्कीम, चिट फंड को छूट है। जिसका कई कंपनियां गलत फायदा उठा रही हैं और निवेशकों से बड़े पैमाने पर पैसा इकट्ठा किया जा रहा है। सेबी के मुताबिक इन स्कीमों के लिए एक अलग रेगुलेटर की जरूरत है।

सेबी चेयरमैन ने कहा कि निवेशकों के लिए सेबी अगले सप्ताह से निवेशक जागरुकता अभियान शुरु करेगा। अगर आपको भी कलेक्टिव इन्वेस्टमेंट स्कीम से जुड़ी कोई शिकायत करनी हो तो आप सेबी के टोल फ्री नंबर 1800 266 7575 पर शिकायत कर सकते हैं। वहीं अगर किसी कंपनी की सेवा में कोई दोष है तो आप कंज्यूमर फोरम का दरवाजा खटखटा सकते हैं। और अगर आपका चेक बाउंस हुआ है तो आप कोर्ट भी जा सकते हैं। तो ऐसी किसी भी स्कीम में निवेश करने से पहले हजार बार सोंचे क्योंकि बाद में आपको कहीं पछताना न पड़े। (मनी कंट्रोल)

एनडीटीवी मैनेजमेंट से कोई विवाद नहीं, एकाउंट डिएक्टीवेट करना निजी मामला : रवीश कुमार

मशहूर टीवी एंकर और पत्रकार रवीश कुमार ने भड़ास4मीडिया को फोन करके जानकारी दी कि उनके द्वारा फेसबुक और ट्विटर एकाउंट डि-एक्टीवेट किए जाने का मामला नितांत निजी है. इसका एनडीटीवी मैनेजमेंट से कोई लेना देना नहीं है. वे समय समय पर अपना एकाउंट एक्टीवेट, डि-एक्टीवेट करते रहते हैं. ऐसा वो अपनी सुविधा के हिसाब से करते हैं. उन्होंने एनडीटीवी प्रबंधन से किसी विवाद से इनकार किया और कहा कि इसमें तनिक भी सच्चाई नहीं है.

उधर, सूत्रों का कहना है कि रवीश कुमार ने अरविंद केजरीवाल पर जिस शो-डिबेट को होस्ट किया था, उसमें उन्होंने केजरीवाल व आम आदमी पार्टी के प्रति जमकर पक्षधरता दिखाई थी. उस डिबेट का आप इस लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं…

http://khabar.ndtv.com/video/show/prime-time/270301

इस बीच, फेसबुक पर रवीश कुमार को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है. हर कोई अपने अपने हिसाब से अंदाजा लगा रहा है. नीचे देखिए एक झलक…

Yashwant Singh :  क्या रवीश कुमार एनडीटीवी वाले ने अपना फेसबुक और ट्विटर एकाउंट डिएक्टीवेट कर दिया है? किसी ने कल रात एनडीटीवी पर रवीश का शो देखा हो तो बताए कि क्या कुछ शो के दौरान हुआ था… कई चर्चाएं सामने आ रही है… रवीश फोन नहीं उठा रहे…

    Arbind Jha ab nae kahiyega ki naukri bhi chor diye
 
    Hari Jaipur aapke phone se to sab darte bhi hain bhai ]
 
    Shravan Kumar Shukla हाँ.. ट्विटर एकाउंट नहीं दिख रहा ..! सुबह तो था
   
    Pushkar Eak Krantikari om ji frd reqst to dijiye
 
    Prashant Dubey ऐसा तो कुछ नहीं हुआ यशवंत भाई | आम आदमी पार्टी के अभी चल रहे प्रदर्शन पर चर्चा हुई थी | योगेन्द्र भाई आये थे | अभय दुबे थे " कांग्रेस से मुकेश जी थे और भाजपा से विजेंद्र जी |
 
    Sheetal Mishra huya kya Sir? he is my favorite Reporter & Anchor …
    
    Syed Najeeb Ashraf bhai site per dkh lo..
 
    Yashwant Singh फेसबुक पर रवीश कुमार नहीं दिख रहे हैं..
     
    Harishankar Shahi कल का शो कुछ खास नहीं था.. वैसे भी अब उनका शो नहीं देखता हूँ. लेकिन आज सुबह रिपीट टेलीकास्ट देख लिया था. कुछ खास नहीं "आप" पार्टी के मामले पर बहस वगैरह थी.
     
    Shravan Kumar Shukla नहीं दिख रहे.. न फेसबुक पर न ट्विटर पर.. उनका अकाउंट बंद है
     
    Puneet Balaji Bhardwaj ये उनके प्रोग्राम का लिंक है… http://khabar.ndtv.com/video/show/prime-time/270301 j
    कितना सफल होगा अरविंद का अनशन…? वीडियो – हिन्दी न्यूज़ वीडियो एनडीटीवी ख़बर
    khabar.ndtv.com
    कितना सफल होगा अरविंद का अनशन…? हिन्दी न्यूज़ वीडियो। एनडीटीवी खबर पर देखें
 
    Yashwant Singh किसी ने सूचना दी है कि रवीश कुमार ने आम आदमी पार्टी का पक्ष लिया डिबेट में जिस कारण एनडीटीवी के मालिकान उनसे नाराज हो गए… उसके बाद रवीश ने एफबी ट्विटर आदि डिएक्टीवेट कर लिया… पता नहीं सच्चाई क्या है… रवीश खुद बोलें तो पता चले…
 
    Shravan Kumar Shukla वैसे वह ट्विटर पर अक्सर 'आप' का ही पक्ष लेते हैं.. हो सकता है शायद यह हो.. ! उनके केजरीवाल से अच्छे सम्बन्ध भी हैं
   
    Prashant Dubey पक्ष तो अभय जी ने लिया था और यह बात कही भी थी |
    
    Harishankar Shahi हाँ ऐसा कुछ लग तो रहा था. बीजेपी कांग्रेस के नेताओं को काफी बैकफुट में रखे हुए थे.. लेकिन यह उनका अंतर नहीं है. बीजेपी से बिजेन्द्र जी और कांग्रेस से मुकेश जी थे. जिन लोगों को पीछे किया जाना बड़ा नहीं था..
     
    Zafar Irshad Ravish Kumar ji ka Page dikh raha hai….Ravish Kumar NDTV ke naam se
     
    आदेश शुक्ला वही बात बार बार बिना कहे गूँज जाती है -कांग्रेस की तरफ से डिफेंड कर देना
     
    Suneel Verma लगता हुई बेचारे की कुर्सी गई <
    खंग्रेस पर उन्ल्न्गी उतना इतना आसन नहीं है
     
    माधो दास उदासीन जफर भाई वहा भी लास्ट अपडेट सितंबर का है
     
    Harish Baba No.
    
    Shravan Kumar Shukla जफ़र भाई.. वह फेक पेज है
    
    Yashwant Singh खबर डाल दी है… हो सकता है मालिक लोग खंडन करने को कहें तब रवीश भाई का पलट कर फोन आए.. फिलहाल तो हम लोग यही मान कर चलेंगे कि अपने प्रिय पत्रकार को एनडीटीवी वालों ने हैरेस किया है.. http://bhadas4media.com/edhar-udhar/10013-2013-04-03-10-11-49.html
    एनडीटीवी के मालिकों से नाराजगी के बाद रवीश कुमार ने फेसबुक और ट्विटर एकाउंट बंद किया!
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    Prashant V. Singh Yashwant Singh bhai unke har promo mein bhi AAP ka favour tha! Waise ek achche anchor ko balanced hona chaiye…kisi ka bhi favour galat hai!
     
    Prashant V. Singh https://www.facebook.com/pages/Ravish-Kumar-on-NDTV/174053199226?ref=ts&fref=ts
    Ravish Kumar on NDTV
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    Hari Om Pandey http://social.ndtv.com/ravishkumar
    Ravish Kumar – NDTV Social
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    Marx can't be History. History can't be without Marx. He will be central to the many themes and ways of history writing. 11 months ago
     
    Sandesh Dixit kal se hi band they accounts…..program raat ko tha…aisa kuchh nahi hai
     
    Sanjeev Mishra टव्ीटर का एकाउंट तो परसों से ही बंद है । कल के शो से कोई लेना देना नहीं है।
     
    Nikhil Bhusan कांग्रेस की तरफ से डिफेंड कर देना। http://www.firstpost.com/topic/person/rahul-gandhi-ndtv-exposed-anchor-requesting-to-defend-congress-on-live-tv-video-li-QsMKI_JQ-92252-1.html
    NDTV Exposed – Anchor requesting to defend Congress on Live TV – Rahul Gandhi Videos – Firstpost To
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    Shravan Kumar Shukla परसों से कैसे? आज सुबह भी तो मैंने उनके त्वीट्स देखे थे
 
    Zafar Imam dekha to tha 4 logo se aap party ke barey me charcha ho rahi thi sab kuch sammaan tha..
   
    
    Niraj Dubey In this programme he stoped debate without conclusive remark. Also said that director not permiting me………any hidden?
     
    Rajesh Utsahi कल का शो आधा तो मैंने भी देखा था…रवीश कुमार जिस तरह से बहस करवा रहे थे..या अब करवाते हैं..वह बिलकुल ही उनके स्‍तर का नहीं है..कल भी वे जिस अंदाज में गरियाते हुए कांग्रेस और बीजेपी के प्रतिनिधियों से बात कर रहे थे…कम से कम मुझे तो पसंद नहीं आया…कांग्रेस के मुकेश शर्मा को तो उन्‍होंने लगभग डांट ही डाला था। पता नहीं रवीशकुमार अपने कार्यक्रम की रिकार्डिंग कभी देखते हैं कि नहीं…उन्‍हें देखना चाहिए…। कांग्रेस और बीजेपी के प्रतिनिधियों से जैसी अपेक्षा होती है वे उसी तरह व्‍यवहार कर रहे थे..दोनों के पास कहने को कुछ था नहीं…।उधर योगेन्‍द्र यादव कल सचमुच आम आदमी लग रहे थे..हालांकि मैंने उन्‍हें जब भी टीवी पर देखा है..वे अपनी बात बहुत शालीनता और विनम्रता से कहते हैं..पर कल तो वे इस कदर विनम्र थे कि किसी सुदूर अंचल में सरकार के कारिंदों के सामने हाथ जोड़कर बैठे किसी असहाय का चेहरा उनमें नजर आ रहा था। इन बहसों में अभय कुमार दुबे बिलकुल क्रिकेट के सुनील गावस्‍कर या संजय मांजरेकर नजर आते हैं..जिनका काम केवल टिप्‍पणी करना होता है।..एनडीटीवी ने यह शो बंद न किया हो तो अब बंद कर दे..।
     
    Poojaditya Nath रवीश जी ने अकाउंट परसों ही बंद करलदिया था… जहाँ तक मुझे लगता है कल के शो से कोई लेना देना नहीं है…
     
    Yogesh Sharma NDTV is a MMS/Sonia shop. Earlier it was CPM"s.
     
    Monavie India Aman Bose ndtv hmmm भारत Vs INDIA
 
    Madan Tiwary रविश वैसे भी फ़ालतू चिरकुट टाईप की बहस करते है , रही डाटने ख़ी बात तो थोबडा दिख जाये इसके लिये गाली भी सुनने को तैयार रहते है लोग।
 
    Jyotika Patteson रवीश जी का पूरा शो मैने देखा था ऐसा कुछ भी नही था जो नया हो…. जो एनडीटीवी पर होता है वही हुआ था………
   
    Jitendra Choubey Ravish ne kuchh kadwa sach bol diya hoga.. aadmi diler hai… raveesh on air hain..chinta na karain..
     
    Rajeev Ranjan Vimal bahut jyada banawatipan hai, pahle toh acha lagta tha lekin ab chat jate hain.
 
    Harender Singh aadat badalne se achha hai channel badal lo bhaiya khush rahoge !!!
 
    Aamir Pasha http://khabar.ndtv.com/video/show/prime-time/270301
    कितना सफल होगा अरविंद का अनशन…? वीडियो – हिन्दी न्यूज़ वीडियो एनडीटीवी ख़बर

    Yashwant Singh रवीश कुमार का कल फोन आया और उन्होंने बताया कि एनडीटीवी मैनेजमेंट से कोई अनबन नहीं है.. वे समय समय पर अपने एफबी ट्विटर एकाउंट एक्टीवेट व डी-एक्टीवेट करते रहते हैं… इसका एनडीटीवी से कोई लेनादेना नहीं है..
    उधर, एक मित्र ने मैसेज कर के यह लिंक दिया है जिसमें अरविंद केजरीवाल पर रवीश कुमार की स्टोरी है… http://khabar.ndtv.com/video/show/prime-time/270301

    Shivnath Jha मुद्दा : केजरीवाल वनाम शिला दीक्षित यानि टांय-टांय फ़ीस
    http://www.youtube.com/watch?v=s7RTrHZQy9A&list=HL1365041829&feature=mh_lolz
    GSTV-Mudda- 2nd April 2013 ( watch everyday at 9.30pm @ Tata Sky -894 )
    Crew- ( Anchor – Suchi Sinha, Cameraman-Montu, Guest- Shivnath Jha, News Head- Suchi Sinha & Managed by-Vijay Srivastava )
 

आर्थिक संकट से जूझ रहे जनसंदेश टाइम्स, इलाहाबाद में इस्तीफों का दौर

जनसंदेश टाइम्स अखबार के इलाहाबाद संस्करण के जनरल मैनेजर जीएस शाक्य ने इस्तीफा दे दिया है. इन पर कई तरह के आरोप थे. खराब व्यवहार के कारण जीएस शाक्य से इंप्लाई बहुत परेशान रहते थे. कौशांबी के ब्यूरो चीफ सुशील केसरवानी ने जीएम के रवैये के कारण ही इस्तीफा दे दिया था. कई अन्य ने भी इस्तीफा दिया था. जीएस शाक्य के बारे में जब बनारस आफिस जानकारी पहुंची तो उनसे इस्तीफा मांग लिया गया.

उधर, कुछ लोगों का कहना है कि जनरल मैनेजर जीएस शाक्य ने अपने साथ कुल 20 लोगों का इस्तीफा मैनेजमेंट को भेजा है. ऐसा दबाव बनाने की रणनीति के तहत किया गया है. इनमें से कई लोगों ने अपने इस्तीफे वापस ले लिए हैं. बताया जाता है कि जनसंदेश टाइम्स के डायरेक्टर अनुराग कुशवाहा ने जनरल मैनेजर को टाइट किया जिसके बाद इस्तीफे का दौर शुरू हुआ. आर्थिक संकट से जूझ रहे जनसंदेश टाइम्स को पटरी पर ले आना सबसे बड़ी चुनौती है. इस अखबार के हर एडिशन की हालत खराब है और रोज कुआं खोद कर पानी पीने जैसी स्थिति है. बनारस में पूरे मामले को लेकर बैठक जारी है.

सुभाष चंद्रा, आईसीएल, आईपीएल और जी न्यूज

Pankaj Mishra : जी न्यूज़ ने लगता है आइपीएल के विरुद्ध मुहिम सी छेड़ दी है….. कल का प्रोग्राम आज फिर दिखाया जा रहा है……. और इसकी अगुवाई कर रहे है जी के सबसे होनहार विद्वान् जेल रिटर्न पत्रकार सुधीर चौधरी….. ऐसा क्यों है…..!!!!!!! क्योंकि बीसीसीआइ ने सुभाष चन्द्र के आइसीएल की बाट लगा दी थी……… चैनल पानी की बरबदी की बात कर रहा है…….. उधर विधर्भ की भी बाट की जा रही है……. चैनल को आज ही ऐसा क्यों कर रहा है……!!!!! कहीं किसी को फिर से ब्लैकमेल तो नहीं किया जा रहा……… !!! वैसे सुधीर चौधरी प्रवचन अच्छा करते हैं……

पत्रकार पंकज मिश्रा के फेसबुक वॉल से.

पत्रकारों के इशारे पर बनारस पुलिस ने पत्रकार शशि को लिया हिरासत में, बाद में छोड़ा

वाराणसी : कैंट थानान्तर्गत टैगोर टाउन अर्दली बाजार में क्लीनिक चलाने वाले चिकित्सक डॉ. ओम प्रकाश सिंह के यहां लिंग परीक्षण का स्टिंग आपरेशन कर पांच लाख रुपयों की मांग करने वाले फर्जी पत्रकारों संग पांच अन्य लोगों के खिलाफ भी कैंट थाने में मुकदमा कायम किया गया था। इसमें शक के दायरे में आ रहे पत्रकार शशि मौर्या को कुछ इलेक्ट्रोनिक मीडियाकर्मियों के कहने पर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

शशि खुद भी राष्ट्रीय चैनल का वाराणसी में संवाददाता है। जब डॉक्टर ओपी सिंह को बुला कर पुलिस ने पहचान करने को कहा तो डॉक्टर ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया तथा कहा कि शशि ने उनसे कोई रंगदारी नही मांगी तथा ये उन पत्रकारों में शामिल नहीं था। इसके बाद देर शाम शशि मौर्या को पुलिस ने छोड़ दिया।  31 मार्च को वाराणसी में शिवपाल के आगमन पर एक प्रेस वार्ता में शशि कवरेज के लिए आया हुआ था। इस पर इलेक्ट्रोनिक मीडियाकर्मि राजू श्रीवास्तव, पुरुषोत्तम चतुर्वेदी और क्लाऊन टाईम्स पत्रिका के संपादक अशोक मिश्र ने वाराणसी के पुलिस कप्तान को फ़ोन करके इसकी सुचना दी थी तथा कहा था कि डाक्टर से रंगदारी मांगने के प्रकरण में शशि का हाथ है।

ज्ञात हो कि पिछले दिनों एक युवती डॉक्टर ओपी सिंह के यहाँ भ्रूण का लिंग परीक्षण करवाने पहुंची। डाक्टर ओपी सिंह का खुद मानना है कि उन्होंने लिंग परीक्षण कर दिया था। जब परीक्षण में कुछ नतीजा नहीं निकला तो डॉक्टर ने उसे परीक्षण का परचा डांट कर दे दिया था। डाक्टर के अनुसार ठीक उसके अगले ही दिन कुछ लोग डॉक्टर के यहाँ पहुंचे और खुद को मीडियाकर्मी बता कर और लिंग परिक्षण का परचा दिखा डॉक्टर से 5 लाख रुपये की मांग करने लगे थे और धमकी भी दे दिया की ऐसा नही करने पर उनके इस परीक्षण को अपने अखबार में तथा न्यूज़ चैनल पर प्रकशित कर देंगे।

डॉक्टर का कहना था कि उन्होंने 2 दिन की मोहलत मांगी। तब कथित पत्रकार चले गए। तब उन्होंने आइऍमए को इसकी सूचना दी थी। इसके बाद आइएमए के एक प्रतिनिधि मंडल ने पुलिस कप्तान से मिल कर इस पर कार्यवाही करने की मांग की थी जिस पर पुलिस ने सतर्कता से कार्य करते हुए 2 फर्जी पत्रकारों के ऊपर मुकदमा दर्ज किया है जिसमे प्रवीण व अनुज को नामजद करते हुए बाकी 6 अज्ञात के नाम से मुकदमा दर्ज किया था।

शशि मौर्य के ऊपर रंगदारी का आरोप लगाने वाले अशोक मिश्र जो एक मासिक पत्रिका के संपादक है, के ऊपर शहर के विभिन्न थानों में रंगदारी, जान से मारने धमकी देने, जमीन कब्ज़ा करने का मामला दर्ज है. अशोक मिश्र सबसे ज्यादा चर्चा में तब आये जब उसके ऊपर लक्सा थाना क्षेत्र में रहने वाले बंगाली पिता ने तत्कालीन एसएसपी नवनीत सिकेरा को प्रार्थना पत्र देते हुए आरोप लगाया कि अशोक मिश्र उसकी लड़की के ऊपर तेजाब फेकने तथा परिवार सहित जान से मारने की धमकी देकर उसके लड़की से शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करने का दबाव बना रहा है।

बंगाली बुजुर्ग पिता के प्रार्थना पत्र पर कार्यवाही करते हुए पुलिस ने मुक़दमा पंजीकृत कर आरोप पत्र न्यायलय में दाखिल किया था. लेकिन रहस्यमय ढंग से बंगाली परिवार के गायब हो जाने के बाद न्यायालय ने अशोक मिश्र को बरी कर दिया। समय समय पर अपने कारनामों के लिए अशोक मिश्र शहर में चर्चित रहते हैं। पुरषोत्तम चतुर्वेदी का खुद शहर में कई ऑटो चलता है जिसके सकुशलपूर्वक चलाने के लिए माईक आईडी थामे घूमते हैं। जिस चैनल का खुद को प्रतिनिधि बताते हैं वो चैनल सिर्फ दिल्ली तक में अपने को समेटा हुआ है। यूपी का आपरेशन एक साल से बंद किये हुए है। रही बात राजू श्रीवास्तव की तो वो गोयनका कांड के लिए जाने जाते हैं।

बनारस से आर. मिश्रा द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

आजतक वाले नवीन कुमार के सम्मान में

Amit Tripathi : एक स्क्रिप्ट राइटर हैं.. क्या लिखते हैं वो… लफ्जों में ललकार… आवाज में तड़प… शब्द-शब्द संघर्ष.. उन्हें सुनकर ऐसा लगता है जैसे कोई कानों में दहकते अंगारे छोड़ रहा हो… जैसे दिल में भरा दर्द का प्याला छलका जा रहा हो.. जैसे कोई अंतरात्मा में अचानक घुस जाए… और उन्मत्त होकर तांडव करने लगे… उनके शब्दों में स्वाभिमान की झंकार है, आदर्शों का ज्वार है.. इंसानियत की चीत्कार है… पहली बार मैंने उन्हें STAR NEWS पर सुना था.. राज ठाकरे की करतूत पर लिखा गया था पैकेज… और मैं उस आवाज के प्रति सम्मोहित सा हो गया.. उस कमरे में जितने भी लोग थे सब ठिठक गए.. सुनने लगे गौर से… और जब पैकेज खत्म हुआ तो तारीफ में शब्द कम पड़ रहे थे…

आजकल वो AAJTAK चैनल के लिए लिखते हैं… मैं ऐसे ढेर सारे लोगों को जानता हूं जो केवल उनका पैकेज, उनकी आवाज सुनने के लिए तय समय पर आजतक देखते हैं, जो उनके मुरीद हैं.. मेरा दोस्त अजीत त्रिपाठी तो उन्हें ‘द्रोण’ और खुद को ‘एकलव्य’ कहता है… शायद देशभर में जो जहां भी उन्हें सुनता होगा.. उसका मन खबर लिखने वाले की तारीफ किए बिना नहीं मानता होगा..

लेकिन विडंबना है… कि शब्दों के उस जादूगर का नाम मैंने आज तक किसी चैनल पर नहीं सुना… साइन ऑफ या तो किसी रिपोर्टर का होता है या फिर ‘ब्यूरो रिपोर्ट’.. मैं मीडिया की परंपरा से वाकिफ हूं… लेकिन कुछ लोग होते हैं.. जिन्हें सम्मान देने के लिए ऐसे छोटे-मोटे कायदे-कानून ताक पर रख दिए जाते हैं.. रख दिए जाने चाहिए… जैसे हॉकी में ध्यान चंद, जैसे क्रिकेट में सचिन.. जैसे राजनेताओं में अटल जी… मैं आजतक के प्रबंधन से निवेदन करना चाहता हूं.. कि ‘नवीन कुमार’ जी के लिए भी ऐसा किया जाए.. जिस खबर पर वो लिखते हैं… उसमें ( खबर लाने वाले के साथ जोड़कर ही सही.. ) अंतिम लाइन में ‘नवीन कुमार’ शब्द की गूंज जरुर होनी चाहिए.

अमित त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से.

तीन कार्टून— पूंछ, वसूली और न्याय

दो कार्टून.. पूंछ और वसूली…




अन्य कार्टून देखने के लिए यहां क्लिक करें–

  1. सीबीआई जी
  2. पत्रकारिता का स्कोप
  3. शर्मिंदा ना करें
  4. अविनाश चोपड़ा का कार्टून
  5. ठीक है
  6. कीर्तन शिविर
  7. धर चोट्टा के
  8. तीन कार्टून
  9. वालमार्ट का गड़ासा
  10. एफडीआई विक्ट्री
  11. बड़ी मछली
  12. कांग्रेस का हाथ
  13. बेटा मुलायम
  14. मस्त कार्टून
  15. एगो रिक्वेस्ट है
  16. गर्लफ्रेंड बदलिए
  17. मूर्ति नहीं असली है
  18. थोड़ा थोड़ा निकालेंगे मनमोहन

रवीश कुमार को ट्विटर और फेसबुक से क्यों गायब होना पड़ा है?

Dilnawaz Pasha : ये एनडीटीवी के पत्रकार और रविश की रिपोर्ट से खास पहचान बनाने वाले रवीश कुमार के फेसबुक प्रोफाइल पेज की तस्वीर है… भड़ास फॉर मीडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक रवीश कुमार को अपने चैनल की दखलअंदाजी के बाद ट्विटर और फेसबुक से गायब होना पड़ा है…

नए युग की पत्रकारिता का यह काला अध्याय है…सोशल मीडिया ने पत्रकारों को सीधे दर्शकों और पाठकों के साथ संपर्क स्थापित करने का माध्ययम दिया है…यहां पाठक और दर्शक न सिर्फ पत्रकारों का ध्यान उनकी गलतियों की ओर दिलाते हैं बल्कि उन्हें रिपोर्ट करने के लिए कई स्टोरी आइडिया भी देते हैं…

यही नहीं पत्रकार को भी पता चलता रहता है कि जनमानस क्या सोच रहा है…मैं मानता हूं कि पत्रकारिता का सिर्फ एक ही सिद्धांत है…ऐसी स्टोरी करना जो लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएं…यदि लोगों के जीवन के बारे में सटीक और सीधी जानकारी मिले तो पत्रकार ऐसी स्टोरीज और भी बेहतर तरीके से कर सकते हैं…

रवीश कुमार का इस तरह सोशल मीडिया से गायब हो जाना बेहद दुखद है… और यह सोशल मीडिया की बढ़ती ताकत का भी अहसास कराता है… यदि भड़ास की खबर पक्की है तो दो बातें समझ में आती हैं… 1. सोशल मीडिया ने स्थापित मीडिया की चूलें हिला दी हैं 2. अब सच को किसी भी पर्दे से ढका नहीं जा सके….वह अपने हर स्वरूप में सामने आता रहेगा…

अंत में बस यही उम्मीद करता हूं कि सोशल मीडिया पर मीडिया की सशक्त आवाज बने रवीश कुमार जल्द ही वापस आएंगे…और उनके तेवर पहले की तरह ही रहेंगे…

दैनिक भास्कर में कार्यरत युवा व तेजतर्रार पत्रकार दिलनवाज पाशा के फेसबुक वॉल से.

राम मोहन पाठक रिटायर, प्रो. ओम प्रकाश बने काशी विद्यापीठ पत्रकारिता संस्थान के निदेशक

वाराणसी। प्रोफेसर ओम प्रकाश सिंह को मदन मोहन मालवीय हिंदी पत्रकारिता संस्थान, काशी विद्यापीठ का नया निदेशक नियुक्त किया गया है। प्रोफेसर सिंह ने निदेशक नियुक्त होने के बाद कहा कि बहुत जल्द ही यह पत्रकारिता संस्थान अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त होगा। मीडिया की पढाई का एक ऐसा केंद्र निर्मित करने की तैयारी है जो आज के समय में विद्यार्थियों के लिए लाभकारी हो।

प्रो.. ओम प्रकाश सिंह के पूर्व प्रोफेसर राम मोहन पाठक पत्रकारिता संस्थान के निदेशक पद पर तैनात रहे। वे लम्बी सेवा के

प्रो. ओपी सिंह
प्रो. ओपी सिंह
बाद 2 अप्रैल को सेवानिवृत हुए हैं। प्रों ओम प्रकाश सिंह ने बताया कि संस्थान में निर्माण कार्य जारी है। सांसद मुरली मनोहर जोशी की निधि से 62.47 लाख की लागत से प्रथमतल का निर्माण पूरा कर लिया गया है।

ओपी सिंह के मुताबिक संस्थान में चार नए डिप्लोमा पाठ्यक्रम चलाने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही विद्यार्थियों के लिए कंप्यूटर पाठ्यक्रम भी प्रारंभ किया जाना है। मीडिया फील्ड में हो रहे परिवर्तनों को ध्यान में रखकर  पाठ्यक्रम में बदलाव किया जाएगा। आगामी सत्र से सेमेस्टर पद्धति लागू की जाएगी।

सहारा में बड़े पैमाने पर फेरबदल, राव बीरेंद्र सिंह बने नेशनल के हेड, रवि पराशर के जिम्मे एनसीआर

सहारा समूह के न्यूज चैनलों में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकारों के कामकाज में फेरबदल किया गया है. राव बीरेंद्र सिंह को नेशनल न्यूज चैनल 'समय' का एडिटर बनाया गया है. रवि पराशर को एनसीआर चैनल का जिम्मा दिया गया है. यह पद राजेश कौशिक के निधन के चलते खाली हो गया था. स्वतंत्र मिश्रा को सहारा समय यूपी उत्तारखंड का पूरा प्रभार यानि संपादक बना दिया गया है. कई अन्य लोगों की जिम्मेदारियों में भी फेरबदल किया गया है. आंतरिक बदलाव से संबंधित सर्कुलर की एक प्रति भड़ास के पास भी आई है, जिसका आप लोग भी अध्ययन करें..


भड़ास तक सूचनाएं आप bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

सहारा समय के मीडियाकर्मी को स्टेपनी बदलते वक्त बदमाशों ने लूटा

पूर्वी दिल्ली के जगतपुरी इलाके में बाइक सवार दो बदमाश सहारा समय के मीडिया कर्मी से रिवाल्वर के बल पर लूटपाट कर फरार हो गए. विरोध करने पर बदमाशों ने पीड़ित को जान से मारने की धमकी दी. बदमाशों ने उनसे सोने की चेन, अंगूठियां, मोबाइल फोन सहित अन्य चीजें लूट लीं. इस बाबत जगतपुरी थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई है.

साक्षी प्रकाश (40) अपने परिवार के साथ बी-35ए, विवेक विहार फेज-2 में रहते हैं. वह सहारा समय न्यूज चैनल में कार्यरत हैं. रविवार देर रात करीब सवा 11 बजे वह घर से ऑफिस जा रहे थे. उसी दौरान कड़कड़डूमा रेड लाइट से आगे जाकर जगतपुरी क्षेत्र में उनकी कार के टायर में पंचर हो गया. वह कार से बाहर निकले और स्टेपनी बदलने लगे. उसी दौरान वहां एक पल्सर मोटर साइकिल सवार दो युवक आए और उनसे कहा कि साइड में आइए आपको कुछ बताना है.

जैसे वह उनके साथ फुटपाट पर पहुंचे तो एक बदमाश ने उनपर रिवाल्वर तान दी. उन्होंने विरोध किया तो बदमाशों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी. बदमाशों ने उनके कानों में पहनी सोने की बाली, गले में पहनी सोने की चेन, दो अंगूठियां, मोबाइल फोन व पर्स में रखे 4 हजार रुपए लूट लिए. बदमाश उनकी कार की चाबी भी ले गए.

शहरयार खान का ट्रांसफर, इस्तीफे की चर्चाएं, हरीश का इस्तीफा, सुधांशु का तबादला

न्यूज एक्सप्रेस चैनल बदलाव के दौर से गुजर रहा है. प्रबंधन चैनल को नए स्टेज में ले जाने के लिए पुरानी टीम के लोगों को इधर-उधर कर रहा है और नए लोगों को नई जिम्मेदारियां व चुनौतियां देकर नियुक्त कर रहा है. पता चला है कि चैनल के सेल्स और मार्केटिंग हेड शहरयार खान का ट्रांसफर गुजरात कर दिया गया है. अभी तक उनकी एक्टिविटी मुंबई सेंट्रिक थी. चर्चा है कि शहरयार खान ने तबादला स्वीकारने की जगह इस्तीफा देने वाले हैं.

एक अन्य जानकारी के मुताबिक हिंदुस्तान, बलिया से सुधांशु सिंह का तबादला वाराणसी हो गया है. सुधांशु बलिया में मीडिया मार्केटिंग इंचार्ज के रूप में कार्यरत थे. उन्हें हिंदुस्तान, वाराणसी आफिस में नई जिम्मेदारी दी जाएगी. सुधांशु ईटीवी के साथ बरेली में काम कर चुके हैं. रेड एफएम और न्यूज24 में भी वे सेवाएं दे चुके हैं.

एक अन्य सूचना के मुताबिक दैनिक प्रभात, गाजियाबाद के मार्केटिंग हेड हरीश राठौर ने इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने सीन्यूज के साथ नई पारी शुरू की है.

एनडीटीवी के मालिकों से नाराजगी के बाद रवीश कुमार ने फेसबुक और ट्विटर एकाउंट बंद किया!

एक गासिप आई है. उड़ते उड़ते. हालांकि अफवाहों के पंख नहीं होते. पर ये उड़ते पंख वालों से ज्यादा तेज होते हैं. बताया जा रहा है कि रवीश कुमार और एनडीटीवी के मालिकों के बीच अनबन हो गई है. रवीश कुमार ने इसी गुस्से में अपना फेसबुक और ट्विटर एकाउंट डि-एक्टीवेट यानि बंद कर दिया है. सूत्रों के मुताबिक कल एनडीटीवी पर डिबेट के दौरान रवीश कुमार ने आम आदमी पार्टी का पक्ष लिया.

रवीश वैसे भी जनता के पक्षधर माने जाते हैं और आम आदमी पार्टी के लोग इन दिनों आम जनता से जुड़े मुद्दों पर स्थापित पार्टियों कांग्रेस बीजेपी को घेर रहे हैं. ऐसे में कोई भी सहज व सरोकारी पत्रकार आम आदमी पार्टी के तथ्यों व सवालों के साथ खड़े होकर कांग्रेस व बीजेपी से सवाल करेगा. बताया जाता है कि कांग्रेस के शीर्ष लोगों ने एनडीटीवी मैनेजमेंट पर दबाव बनाया.

एनडीटीवी के मालिकों ने रवीश कुमार को कुछ कहा होगा. इस सबसे दुखी रवीश ने खुद को नेपथ्य में डाल लिया है. उन्होंने फेसबुक और ट्विटर पर अपने एकाउंट को बंद कर दिया है. ये सब सूचनाएं कितनी सही और गलत है, इसके बारे में खुद रवीश कुमार ही स्पष्ट कर सकेंगे. भड़ास की तरफ से जब रवीश कुमार को फोन किया गया तो उन्होंने फोन उठाया नहीं. (कानाफूसी)

संदीप विश्नोई ने नेशनल दुनिया से इस्तीफा दिया, श्रीटाइम्स लखनऊ में विशेष संवाददाता बने कमल जैन

नेशनल दुनिया के चीफ आपरेटिंग आफिसर (सीओओ) संदीप विश्नोई ने इस्तीफा दे दिया है. वे भास्कर और लोकमत समूह के साथ काम कर चुके हैं. संदीप ने किन वजहों से छोड़ा, यह पता नहीं चल सका है.

उधर, लखनऊ से सूचना है कि कमल जैन ने श्रीटाइम्स ज्वाइन कर लिया है. वे अभी तक वायस आफ लखनऊ में ब्यूरो चीफ के पद पर कार्यरत थे. कमल ने कई अखबारों में काम किया है और उन्हें लखनऊ में पत्रकारिता का अच्छा-खासा अनुभव है.

‘मेरी 34 सहेलियों ने 8-10 साल की नौकरी के बाद काम छोड़ दिया’

Manisha Pandey : अभी मैं बैठकर कुछ हिसाब लगा रही थी। हिसाब के नतीजे कुछ इस तरह हैं- 1- मेरी 34 सहेलियों ने मीडिया, कॉरपोरेट, आईआईटी और टेलीविजन सीरियल की दुनिया में 8-10 साल की नौकरी के बाद काम छोड़ दिया। नए पैदा हुए बच्चे को पालने के लिए। 34 में से 31 अब तक काम पर लौटकर नहीं गईं। बच्चे की जिम्मेदारियां कभी खत्म ही नहीं होतीं।

2- जिन लड़कियों ने बच्चा किया और नौकरी नहीं छोड़ी, वो पागल बनी फिरती हैं। जब भी मिलो, एक ही रोना। काम, काम और काम। मैं बहुत थक गई हूं सब संभालते-संभालते।

3- ऑफिस में स्‍मोकिंग जोन में रोज एक लड़की मिलती है। उसके दो बच्चे हैं। हमेशा थकी-थकी। एक दिन कह रही थी कि मैं डबल शिफ्ट में काम करती हूं। नौ घंटे ऑफिस में और नौ घंटे घर। बच्चों के एग्जाम्‍स आने वाले हैं। घर भागकर उन्हें पढ़ाना है।

4- अपने इतने सालों के कॅरियर में मैंने देखा है कि हर शादीशुदा और बच्‍चों वाली स्‍त्री जल्‍दी से जल्‍दी ऑफिस से छूटकर घर भागना चाहती है। वो कभी खुद इनीशिएटिव लेकर नहीं कहती कि नए प्रोजेक्‍ट की जिम्‍मेदारी मुझे दो। मैं करूंगी। वो सुबह 7 बजे ऑफिस आने और रात 2 बजे तक काम करने को तैयार नहीं होती। घर पर बच्‍चा अकेला है। फैमिली को देखना है। कॅरियर जैसे चल रहा है, चलता रहे। इससे ज्‍यादा नहीं कर सकती।

5- मेरी एक दोस्‍त आईआईटी में बहुत शानदार कॅरियर छोड़कर कॉन्वेंट स्‍कूल में टीचर बन गई। अब उसे बच्चे के लिए ज्‍यादा वक्त मिलता है।

6- एक दोस्त ने नौकरी तो नहीं छोड़ी, लेकिन बाकी सब छोड़ दिया। अब कभी आउट ऑफ स्टेशन किसी सेमिनार में नही जाती। न किताब लिखती है। कई फैलोशिप्‍स मिलीं। इंडिया के बाहर जाना था दो-दो साल के लिए। सब रिजेक्‍ट कर दिया। उसने आगे बढ़ने के सारे ऑफर ठुकरा दिए हैं। बच्चा अभी छोटा है। लेकिन पति की जिंदगी पर कोई फर्क नहीं पड़ा। जनाब अभी-अभी एक साल इस्‍तांबुल रहकर लौटे हैं। पति का नाम है। पत्‍नी की पहचान खो गई।

7- मैं अपनी नौकरीपेशा बहनों को देखा है। घर, नौकरी, बच्चों के बौराई रहती हैं। फोन करो तो बात करने की भी फुरसत नहीं। अभी मैं बेटे को पढ़ा रही हूं। अभी फलां काम कर रही हूं, अभी ढिमका काम कर रही हूं। उसके काम कभी खत्‍म नहीं होते और उसके पास अपने लिए वक्‍त लिए।

ये सब क्‍या है? क्‍या मातृत्‍व का गौरव है? प्रेम का प्रतीक है। न्‍याय, समता, बराबरी का राग है। एक खूबसूरत, मानवीय संसार की झलकियां हैं। आखिर क्‍या है। और जिस लड़की ने ये सब होने से इनकार किया, वो क्रूर हो गई। औरत ही नहीं है वो तो। डायन है, कुलटा है, स्‍वार्थी है। नए जमाने की दुष्‍ट, मॉडर्न लड़की है।

इंडिया टुडे की फीचर एडिटर मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल से.

गुजरात में मोदी के सरकारी लोकपाल पर इतना सन्नाटा क्यों है भाई!

Nadim S. Akhter : ये सन्नाटा सालता है…गुजरात में नए टाइप का लोकायुक्त बनाया गया है…ऐसा लोकपाल जिसे नरेंद्र मोदी दिन कहे तो वह कहे दिन और जिसे मोदी कहे कि कान पकड़ो तो वह नाक-कान दोनों पकड़ ले…पूरा सरकारी लोकपाल…लेकिन 'मजबूत लोकपाल की अलख' जगाने वाले अन्ना हजारे एंड टीम का कोई रिएक्शन नहीं आया इस पर…सब चुपचाप हैं…अरविंद केजरीवाल तो अब राजनीतिज्ञ बन गए हैं, सो उनसे कुछ expect करना वैसे भी बेइमानी है…लेकिन अन्ना की खामोशी बहुत कुछ कहती है…

नरेंद्र मोदी ने लोकपाल के मुद्दे पर गुजरात हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी लेकिन हार गए…अंत में नया कानून ही बना डाला, जिसके मुताबिक लोकपाल उनकी जेब में रहे…आश्रचर्य नहीं कि बीजेपी वाहवाही कर रही है और कांग्रेस चुप है क्योंकि मजबूत लोकपाल की वकालत अगर कांग्रेस करेगी, तो उनका भी तो गला फंसेगा…ईमानदार कौन है यहां…'आ बैल मुझे मार" कौन कहेगा भला…

एक वक्त था, जब 'मजबूत लोकपाल' को लेकर अन्ना हजारे ने पूरे देश में हायतौबा मचा रखी थी…मैं भी गया था वहां…लेकिन अंततः वही हुआ, जो होना था…अन्ना को जोश ठंढा पड़ गया…पब्लिक ने हाथ-पैर समेट लिया और अरविंद केजरीवाल को राजनीति के शहद की मिठास लुभा गई…किरण बेदी से लेकर सब आपस में ही उलझ पड़े, कि मलाई कौन खाएगा…यानी तथाकथित आंदोलन चारों खाने चित….

अब अन्ना देशभ्रमण पर निकले हैं…क्या होगा इससे…पब्लिक भाव नहीं देने वाली….उसका भरोसा आप पर से भी उठ गया है…ये जो पब्लिक है, वह बलिदान मांगती है, फिर गुणगान करती है…क्या जरूरत थी आधा-अधूरा अनशन करके उसे बीच में तोड़ने की…जान दे देते तो आप शहीद कहलाते और पब्लिक मूर्ति बनाकर किसी चौराहे पर टांग देती….अब तो खुमार उतर चुका है…डरी सरकार अब सीना ताने खड़ी है…कौन सी सिविल सोसायटी और कैसी सिविल सोसायटी…कैसी जनता…सब सरकार की जूती के नीचे !!!

तेजतर्रार पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

‘द न्यूज’ चैनल बंद नहीं हुआ, उसका आफिस ओखला से नोएडा शिफ्ट हुआ

सुशील खरे द्वारा 'द न्यूज' चैनल को लेकर प्रेषित पत्र के भड़ास पर प्रकाशन के बाद 'द न्यूज' चैनल से जुड़े कई लोगों ने भड़ास को फोन कर सूचित किया कि यह चैनल बंद नहीं हुआ है बल्कि उसका आफिस ओखला से नोएडा शिफ्ट किया गया है. चैनल से जुड़े ब्रजेश निगम, तारिक मुख्तार, सुषमा त्यागी ने भड़ास को लिखित पत्र भेजकर चैनल के बंद होने का खंडन किया है. इन तीनों के पत्रों का प्रकाशन नीचे किया जा रहा है ताकि चैनल को लेकर कायम भ्रम की स्थिति खत्म हो सके और असली तस्वीर सामने आ सके. साथ ही एक अन्य पत्र भी है जिसमें सुशील खरे के बारे में काफी कुछ लिखा गया है, उसे भी नीचे दिया जा रहा है. -एडिटर, भड़ास4मीडिया


Brajesh Nigam

brajeshnigamnews@gmail.com

Dear yashwnt, meri aap say yeh guzarish hai, kay aap koi bhee khabar chapnay say pehlay kirpiya ye chek kar liya kare ki ye khabar sahi hai ya galat kiu ki the news channel okha face 2 band nahi hua hai blki the news k sath ek chenel ko or lekar aa raha hai

kuch frji partrkar jo ki jis channel ka naam lekar baat kar rahe hai us channel ka kahi se kahi tk M.i.B. list mai naam nahi hai sushiul khare ke khilaf hamari channel ki ek ladki ne chedkhani ka mukkdma okhla thane mai likhaya tha jiski wajah se aaj ye harkat kar raha hai bina astitv wale  insan kya karega ye aap bhi samjh rahe hai brajesh nigam jameen se juda insan hai jo kahi nahi bhagega ham un sabhi ko jald apne naye office mai bulyege jo is waqt meri khamosi ka fayda utha rahe hai agr kisi mahila se 2c hamne liye hai to apse nivedan hai k 2 cr ka agreement bhi apni is site par chapne ki kripa kare

thnks
Brajesh Nigam


tariq mukhtar

mukhtartariq@hotmail.com

Yashwant bhai, pls meri aap say request hai, k yeh jo khabar aap ko mili hai k the news band ho gaya hai, yeh khabar sara sar jhoot hai,kyu kee the news band nahi hua hai,sirf shift hua hai noida may jo kee next month on air ho ay gaa, ar rahi baat sushil khare kee tow uskotow iss baat pur the news say nikala gaya ky kee usnnay the news kee hee ek repoter kay sath office primess may chairkhani kee thee, jis karan wash ussay sushil khare k khilaf aaj bhee okhla police station may us larki kee taraf say complain darg hai,beachara sushil khare,khisyani billi khamba noachay wali halat ho gaye hai uss beacharay kee, kyu kee the news say usko baizzat karkay nikala diya gaya hai, jiski wajah say itnay dino say delhii takk nahi aa pa raha hai,dehradun k kisi konay may baith kar yeh ghainauna krat kar raha hai

Yashwant bhai thnks for reply, but aap ko maray CMD mr brijesh nigam aur the news kay assigment head mohd hamza kee bhee mail mili hogi, aap ko in 3 mail may say jo bhee better lagay woh aap chapnay ke kripa kariya gaa, kyu kee The news sirf sushil khare kee sacchai batana chahta hai,aur jo log the news ko badnaam kar rahay unko bhee batana chahta hai,

Thnks
Tariq


sushma tyagi

sushma.sushmatyagi.tyagi9@gmail.com

dear sir, mai sushma tyagi the news channel m crime hed ki post par kaam karti hu.nd aap se jo sushil khare naam k aadmi ne kaha h ki the news channel ka the end ho gaya ye bilkul galat h.the news noidea m shift ho raha h or yahi wajh h ki okhla se saman uthaya ja raha h.or ye jo sushil khare naam ka viykti h. ye to khud hi rajeev lawyal naam k shakhs k sath mil kar logo ko bevakuf bana raha h.ye wo shakhs h.jisne mere ofc me akar mere sath batmiji ki thi or ye bhi ni soha ki kya use ek ladki k saath itna galat vayavhar karna chahiye tha jo esne kiya jiski complain m ne delhi k okhla thane m ki thi jis se chup kar ye abhi tak bhaga fir raha h.or jis channel ko kholne ki ye baat kar raha h uska to iske paas abhi tak lasens tak ni h. or jo iska sathi h rajeev lawyal wo bhi the m hi distibiution ka kaam karta tha…sir aap meri in baato ko anytha na le mere sirf kahne ka ye matalb h ki kisi bhi sharif viyakti ko badnam karne se pahle hame ye sochna chahiye ki hum kitne saf or sache h…..ummid karti hu ki aap meri baat ka matlb samjh gaye honge…..

sushma tyagi                                                 
crime hed
the news                                      


mohd hamza

hamzamohd42@gmail.com
    
hello yashwant ji,
sushil khare ka dil to baccha hai ji… YASHWANT JI  meri aap se guzarish hai ki mai jo aap ko mail kar raha hun use zara vistar se chaapne ki krapa karey plz,sushil khare jo kabhi THE NEWS channel ke uttrakhand ke bureau chief the yeh shaks samachaar plus channel or bhi kayi channel mein kaam kar chuke hai inki kharaab chhavi ke karan inko kayi channelo ne apna daman thaamne se piche hata liya or inhe nikal diya gaya.phir sushil khare ji ne THE NEWS channel ka daman thama or kaam shuru kar diya tabhi inhone crime department ki head lady ke sath chedkani ki or use phone kar ke kafi pareshan kiya or kafi anya tareeko se pareshan kiya jab the news ki crime head ne is ka virodh kiya to unko shushil khare ne jaan se marne tk ki dhamki de dali jisse tang akar crime head ne dlhi ke okhla face-2 ke thane mai report darj karai or okhla pollice se bachene ke chakkar mai wo delhi chod kar bhag gaya or ab tk pata nahi kis chuhe ke biil mai aaj tak chipa baitha hai or jab is mamle ki jankari chairman ko hui to unhone isko apne channel se dhakke maar kar nikal diya or aaj isi baat ki khunnas se ye bhadas 4 media ko apna hathiya bana kar unko badnam karne ki koshi kar raha hai  or jb isko pata chala ke the news noida shift ho raha hai or sath mai ek or bhakti channel lekar aa raha hai to isi baaat ko lekar shushil khare ne bhadas 4 media ko apna naya  hathiyar bana kar us channel ko badnaam kiya jiske tukdo par wo pala hai hai hamari patrkar bandhuon se gujaris hai ki aise patrkaro se bach kar rahe jo jis channel mai kaam karte hai baad mai usi ko badnam or ab suna hai ki shushil khare rastr khabar naam ke kisi farji channel ki id uttra khand mai bech rahe hai
jab ki ministri of broadcasting  ki channel list mai is naam se koi bhi channel regtred nahi hai  aise barsati medhko se sabhi patrkar bandhu bach kar rahe ye gujaris hai
ha ek baat or hasi wali baat ye bhi hai ki tathakathit rastr khabar naamk channel  ko chalane wala bhi ek aisa banda hai jo kabhi distribution ka ek sabse chota karmchari raha hai jise kisi bhi khabar ka koi gyan nahi hai hai use gyan hai to is baat ki kaise channel ki id bech kar paisa kamaya jata hai
shushil khare meri apse gujaris hai ki patrkarita jagat mai aisa kaam mat karo warna apko farji channel mai kaam to mil jayega lekin kisi acche channel wala apko ghusne bhi nahi dega,
doosaro ke bahkawe mai akar kisi bhi sansthan par aise aroop lagane se socha kare apko abhi bahut seekhna hai sirf dhadhi rakhne se koi bada nahi ho jata hai apko ham bahut sinior samjhete the magar meri najar mai aap bacche hai

Your Sincerly
mohd hamza


मूल खबर–

'द न्यूज'  चैनल का समापन समारोह हो गया!

महुआ न्यूज, समस्तीपुर के रिपोर्टर रजनीश कुमार का इस्तीफा

समस्तीपुर में पिछले सात वर्षों से मीडिया में सक्रिय और इन दिनों महुआ न्यूज से जुड़े हुए रिपोर्टर रजनीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया है. वे नई पारी की शुरुआत ईटीवी बिहार के साथ बतौर कापी एडिटर कम रिपोर्टर करने जा रहे हैं. वे पटना में पदस्थ होंगे. रजनीश फिलहाल ईटीवी मुख्यालय हैदराबाद में ट्रेनिंग लेंगे.

उसके बाद ईटीवी के पटना आफिस में अपनी सेवाएं देंगे. रजनीश महुआ न्यूज के साथ वर्ष 2009 से जुड़े हुए थे. रजनीश सीएनईबी, वीओआई, पीटीएन न्यूज़, न्यूज़ एक्स चैनलों के लिए भी कार्य कर चुके हैं. वे पटना के नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी से मॉस कॉम से पीजी करने के बाद टीवी पत्रकारिता में सक्रिय हुए.
 

गुवाहाटी के वरिष्ठ पत्रकार डीएन सिंह के घर पर भूमाफियाओं की नजर

गुवाहाटी : भूमाफियाओं की नजर वरिष्ठ पत्रकार डीएन सिंह के घर पर लगी है। पत्रकार श्री सिंह ने घर को बचाने के लिए गुवाहाटी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आनंद प्रकाश तिवारी से गुहार लगाई है। उन्होंने पिछले दिनों पलटन बाजार पुलिस थाने में अपने मित्र प्रदीप कुमार डे के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। लेकिन पुलिस की निष्क्रियता को देखते हुए श्री सिंह ने गुरुवार को पुलिस अधीक्षक से शिकायत की।

पुलिस में दर्ज शिकायत के अनुसार श्री सिंह के पुराने मित्र प्रदीप कुमार डे जाली कागजात बना कर घर को कब्जाने का लंबे समय से षडयंत्र कर रहा था। पिछले दिनों अपना घर बेचने के बाद डे ने घर का मरम्मत होने का बहाना बना कर एक कमरा भाड़ा पर ले लिया और बाद में घर से निकलने के नाम पर बहुत सारा बहाना बनाना शुरू कर दिया। लेकिन 80 वषीय वयोवृद्ध श्री सिंह को षडयंत्र का पता तब चला जब निगम का एक अधिकारी उनके घर को डे का घर बता कर संपत्ति कर के लिए एसेसमेट करने आया।

बाद में किसी पड़ोसी ने श्री सिंह की पत्नी को रायबेरली फोन कर मामले की जानकारी दी। वो भागी-भागी गुवाहाटी पहुंच गई। पड़ोसियों का कहना है कि जमीन अपने नाम पर करवाने के बाद श्री सिंह को गायब करवाने की फिराक में चनाचुर व्यवसायी डे लगा हुआ था। श्री सिंह ने बताया कि उन्होंने जमीन पंजाब निवासी एक व्यक्ति जो आज कल चंडीगढ़ में रहते हैं, से खरीदी थी।

जमीन खरीदने के बाद डे उनके घर आने जाने लगा और पिछले 30 साल से एक पड़ोसी के नाते अच्छा संबंध रहा है, वे दुख -सुख में भागी भी रहें हैं। लेकिन आज भी उन्हें यह विश्र्वास नहीं हो रहा है कि डे ऐसा कर सकता है। मालूम हो कि पत्रकारिता में आज भी सक्रिय श्री सिंह को पुत्र नहीं है। बेटियां ससुराल चली गईं हैं। तब से वे अकेले घर में रहते हैं। पत्नी रायबरेली में अपनी विधवा बेटी जो शिक्षिका हैं, के साथ रहती हैं।

गुवाहाटी से नीरज झा की रिपोर्ट.

असम में वाहनों पर प्रेस लिखने के लिए डीआईपीआर जारी करेगा लोगो

: अब हर कोई अपने वाहन पर नहीं लिख सकेगा प्रेस : गुवाहाटी :  गाड़ियों पर प्रेस लिख कर खुद को मीडिया से होने   का गलत प्रदर्शन करने वालों पर अब नकेल कसने जा रही है। राज्य का सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने गैर मीडिया कर्मियों को अपने वाहनों पर प्रेस लिख चलने से रोकने के लिए एक विशेष लोगों तैयार किया है। यह लोगों  सक्रिय पत्रकारों को जारी किया जाएगा। मुख्यमंत्री तरुण गोगोई अगले 4 अप्रैल को विधानसभा के सेंट्रल हाल में इस लोगो का विधिवत रूप से जारी करेंगे।

इस मौके पर मुख्यमंत्री विभाग द्वारा प्रकाशित सप्ताहिक अखबार राइजर बातोरी के वेबसाइट का भी उद्‌घाटन करेंगे। डीआईपीआर के अधिकारियों ने बताया कि सेंट्रल हाल में आयोजित  इस कार्यक्रम में पत्रकार चिकित्सा कल्याण योजना के तहत प्रफुल्ल चंद्र बरुवा,प्रणब सिंहा और प्रमेश्वर चित्रकार को एक लाख रूपए तथा जदु काकोटी व राजीव भट्टाचार्य को 50 हजार का चेक प्रदान किया जाएगा। इस मौके पर सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) वसंत दास सम्माननीय अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे।

गुवाहाटी से नीरज झा की रिपोर्ट

बर्मा में 16 निजी दैनिक अख़बारों को एक अप्रैल से सर्कुलेशन की अनुमति

बर्मा ने प्रेस सुधारों की तरफ ऐतिहासिक कदम बढ़ाते हुए 16 निजी दैनिक अख़बारों को एक अप्रैल से सर्कुलेशन की अनुमति दे दी है. पांच दशक के सैन्य शासन की 2011 में समाप्ति के बाद बर्मा ने लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माने जाने वाले क्लिक करें मीडिया में सुधारों की शुरुआत की है. जिन अख़बारों को प्रकाशन की अनुमति दी गई है उनमें विपक्ष की नेता क्लिक करें आंग सांग सू ची की पार्टी द्वारा संचालित अख़बार भी शामिल है. हाल ही में जापान की संवाद एजेंसी क्योदो ने भी रंगून शहर में अपना ब्यूरो खोला था.

हालांकि देश की पत्रकार बिरादरी में इसे लेकर ज़्यादा उत्साह नहीं हैं. दरअसल वे सूचना मंत्रालय के एक प्रस्तावित क़ानून से ख़फ़ा हैं. उन्हें लगता है कि ये क़ानून मुश्किल से मिली उनकी आज़ादी पर कुठाराघात है. क़ानून का मसौदा पहली बार 27 फरवरी को सरकारी अख़बारों में छपा था और पांच दिन बाद इसे मंजूरी के लिए संसद भेजा गया था. हालांकि मीडिया और कुछ सांसदों की आलोचना के बाद इसे कार्यसूची से हटा दिया गया था. लेकिन जून में संसद में इस पर चर्चा होने की संभावना है.

बर्मा में प्रेस की आज़ादी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स की वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडैक्स में देश को 179 की सूची में 151वें स्थान पर रखा गया है. मीडिया पर लगी कई पाबंदियों को पिछले साल हटाए जाने के बाद बर्मा ने इस सूची में 18 स्थान का सुधार किया था. अगर ये विधेयक पारित होता है तो सैन्य शासन द्वारा 1962 में मीडिया के संबंध में पारित क़ानून और 1931 का प्रेस (इमरजेंसी पॉवर्स) एक्ट रद्द हो जाएंगे. लेकिन आलोचकों का कहना है कि इस विधेयक में पुराने क़ानूनों के कई प्रावधानों को बरकरार रखा गया है.

साप्ताहिक न्यूज जर्नल इलेवन न्यूज ने अपनी वेबसाइट में संपादकीय में लिखा है कि 1962 के क़ानून की धारा सात के चैप्टर तीन को इस विधेयक में शामिल किया गया है. विधेयक में कहा गया है कि प्रिंटिंग फर्म या प्रकाशक को ऐसी सामग्री के प्रकाशन की अनुमति नहीं होगी जिससे देश में क़ानून की स्थिति खराब हो, हिंसा को बढ़ावा मिले, किसी धर्म या जाति का अपमान हो या जो संविधान या किसी क़ानून का ख़िलाफ़ हो.

अगर नया अख़बार सरकार के साथ अपना पंजीकरण नहीं करता है तो उसके मालिक को छह महीने की कैद हो सकती है या 3500 डॉलर का जुर्माना भरना पड़ सकता है. अख़बारों को लाइसेंस जारी करने और क़ानून तोड़ने वालों पर नज़र रखने के लिए एक अधिकारी नियुक्त किया जाएगा. बर्मा पत्रकार संघ ने इस मसौदे को नई बोतल में पुरानी शराब बताया है. संघ ने कहा कि मसौदा प्रकाशन के मूलभूत नियमों के ख़िलाफ है.

साउथईस्ट एशियन प्रेस एलायंस सेक्रेटेरिएट ने कहा कि ये मसौदा इस बात का प्रमाण है कि सरकार लाइसेंस कंट्रोल के माध्यम से प्रिंट मीडिया पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहती है और वो मीडिया की पूरी आज़ादी देने के लिए तैयार नहीं है. पत्रकारों का कहना है कि मीडिया ने हाल में रखाइन और मैखटीला प्रांतों में हुई साम्प्रदायिक हिंसा तथा कचीन विद्रोहियों के साथ हुई झड़पों की मीडिया ने अच्छी खासी रिपोर्टिंग की थी और प्रस्तावित क़ानून से मीडिया की आज़ादी प्रभावित हो सकती है. नार्वे से संचालित बर्मीज डेमोक्रेटिक वॉयस ऑफ बर्मा ने कहा कि इस कानून का मतलब है कि अगर आपने कचीन के पक्ष में कुछ लिखा तो आपका लाइसेंस रद्द हो जाएगा और आपको जेल भी हो सकती है.

सरकार द्वारा गत सितंबर में गठित अंतरिम प्रेस परिषद भी इस बात से नाराज है कि विधेयक के बारे में उससे कोई सलाह तक नहीं ली गई. परिषद को प्रकाशन क़ानून को दोबारा लिखने के लिए कहा गया था लेकिन सूचना मंत्रालय के विधेयक से परिषद के सदस्यों को आश्चर्य हुआ है. हालांकि सूचना मंत्री आंग क्यी ने इस विधेयक के मसौदे का बचाव किया है. उन्होंने कहा कि इससे प्रेस की आज़ादी में दखल दिए बिना देश में वैमनस्य फैलाने वाली सूचना सामग्री को प्रकाशित होने से रोका जा सकेगा. (बीबीसी)

‘चैनल वन’ के मालिक जहीर अहमद समेत 11 के खिलाफ सहारा ने लखनऊ में दर्ज कराया मुकदमा

लखनऊ से सूचना है कि अलीगंज थाने में सहारा समूह की तरफ से न्यूज चैनल 'चैनल वन' के मालिक जहीर अहमद समेत 11 लोगों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया है. सहारा की ओर से प्रदीप राय चौधरी ने तहरीर दी जिस पर एफआईआर दर्ज है. जहीर अहमद के अलावा मोहम्मद आरिफ, राकेश सक्सेना, नेहा माहेश्वरी, वंदना चंदेल, राम मोहन शर्मा, प्रदीप नांबियार, अनिल उपाध्याय, भूपेंद्र सिंह आदि के नाम एफआईआर में हैं. इनके खिलाफ आईपीसी की धारा 304, 389, 406, 506 के तहत रिपोर्ट लिखाई गई है.

यह एफआईआर जनवरी महीने में ही सहारा ने दर्ज करा दी थी पर इसका पता अब सबको चला है. पता चला है कि पुलिस के लोग जहीर अहमद व अन्य को पूछताछ के लिए लखनऊ बुला रहे हैं. चैनल वन पर पिछले साल सितंबर महीने में सहारा के खिलाफ एक खबर का प्रसारण किया गया था. इसमें उन निवेशकों को स्टूडियो में बिठाकर वक्तव्य लिया गया जिन्होंने सहारा में पैसा लगाया लेकिन उन्हें रिटर्न नहीं मिला. इसके बाद मुंबई में इसी ग्रुप के चैनल लेमन न्यूज पर सहारा के खिलाफ कार्यक्रम दिखाए गए. सूत्रों का कहना है कि इन कार्यक्रमों से चिढ़े सहारा समूह ने चैनल वन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी है.

सेबी सहारा विज्ञापन मामला : दो सप्ताह में जवाब दाखिल करें सहारा और सुब्रत राय

Nutan Thakur : सहारा इंडिया द्वारा दिनांक 17 मार्च 2013 को प्रमुख समाचारपत्रों में प्रकाशित पूरे पृष्ठ के विज्ञापन को विधि-विरुद्ध बताती पीआईएल में इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच ने सहारा इंडिया तथा सुब्रत रॉय सहारा को दो सप्ताह में अपना जवाब दाखिल करने के आदेश दिये हैं. जस्टिस उमा नाथ सिंह और जस्टिस डॉ सतीश चंद्रा की बेंच ने मेरे और पति अमिताभ ठाकुर की याचिका पर यह आदेश दिया.

आज हमारे अधिवक्ता अशोक पाण्डेय ने इस विज्ञापन के सम्बन्ध में कठोर कार्यवाही किये जाने की मांग की जबकि अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल के सी कौशिक ने इसका कोई विरोध नहीं किया. पिछली सुनवाई में कोर्ट ने सहारा और सुब्रत रॉय को नोटिस जारी किया था. मामले की अगली सुनवाई 22 अप्रैल को होगी. याचिका में एक निजी व्यक्ति और एक निजी संस्था द्वारा विधि द्वारा स्थापित संस्था सेबी के विरूद्ध विज्ञापन के माध्यम से कही आपत्तिजनक बातों को प्रथमद्रष्टया धारा 186 तथा 189 आईपीसी के अंतर्गत आपराधिक कृत्य और कंपनी क़ानून का उल्लंघन बताते हुए नियमानुसार कार्यवाही कराये जाने की मांग की गयी है.

Progress in SEBI Ad PIL-HC asks Sahara India, Subrata Roy to Reply within 2 weeks

In the PIL calling the full page advertisement dated 17 March 2013 by Sahara India as being against the provisions of law, Allahabad High Court, Lucknow Bench today directed Sahara India and Subrata Roy Sahara to file their reply within 2 weeks. The Bench of Justice Uma Nath Singh and Justice Dr Satish Chandra passed this order in the PIL by me and husband Amitabh.

Our advocate Asok Pande strongly argued for strong action against Sahara and Subrata Roy while Additional Solicitor General K C Kaushik did not oppose it. In the last hearing, Court had issued notice to the two private respondents. 22 April has been fixed as the next date of hearing.

The PIL said that a private person and a private organization have openly denigrated and accused SEBI which seems to be a criminal misconduct under sections 186 and 189 IPC and provisions of Companies Act 1956 and hence had asked for enquiry into the issue and necessary subsequent legal actions against Sahara India parivar and Subrata Roy.

नूतन ठाकुर के फेसबुक वॉल से.

पत्रकार स्व. चेतन शारदा को श्रद्धांजलि दी गई

जालंधर :  वरिष्ठ पत्रकार चेतन शारदा का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था। उनकी आत्मिक शांति के लिए श्रद्धांजलि समारोह सोमवार को श्री देवी तालाब मंदिर के भगवान राम हाल में संपन्न हुआ। पिता किशोर चंद शारदा, माता कुसुम शारदा, पत्नी संतोष शारदा, भाई राकेश शारदा व प्रभात शारदा ने शोक सभा में संवेदना व्यक्त करने वालों का आभार व्यक्त किया।

श्रद्धासुमन अर्पित करने वालों में मुख्य संसदीय सचिव केडी भंडारी, मेयर सुनील ज्योति, श्री देवी तालाब मंदिर प्रबंधक कमेटी के प्रधान शीतल विज, सोमदत्त कालिया, ललित चड्ढा, पार्षद अश्विनी भंडारी, रूबी भारद्वाज, एडवोकेट राजेश भारद्वाज, पवन मेहता, मनदीप मदान, जेके जोशी, एनके मल्होत्रा, लवली शारदा, प्रिंसिपल विभा शारदा, रविन्दर धीर, इन्द्र सूजी, दिनेश खन्ना, राजीव टंडन, डा. सुरिन्दर शारदा, नरेश शर्मा, संजय कोछड़, ललीत भसीन, सिमर सदोष, विकास शर्मा, दीपक जालंधरी, अश्विनी शर्मा, किशोर कुमार, पुरुषोतम लाल, विनोद खन्ना, अमित खन्ना और महिन्दर पाल अग्रवाल के अलावा मीडिया जगत से जुड़े पत्रकार व छायाकार सहित सामाजिक, राजनीति संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद थे। शोक सभा में दैनिक जागरण परिवार के सदस्य भी मौजूद थे।

हार्डडिस्क और ईमेल से पता चलता है कि कांडा ने गीतिका को खुदकुशी के लिए उकसाया था

दिल्ली पुलिस ने मंगलवार को कहा है कि गीतिका शर्मा खुदकुशी मामले में आरोपी गोपाल कांडा का दोष इलेक्ट्रानिक डेटा से साबित होता है. दिल्ली पुलिस ने एक अदालत से कहा कि गीतिका शर्मा खुदकुशी मामले में आरोपी हरियाणा के पूर्व मंत्री गोपाल कांडा के कार्यालय से जब्त हार्डडिस्क और अन्य इलेक्ट्रानिक डेटा से साबित होता है कि कांडा पीड़ित लड़की पर दुबई से भारत लौटने का दबाव बना रहा था जिसके कारण पीड़ित ने खुदकुशी की.

कांडा और उसकी सहयोगी अरूणा चड्ढा के खिलाफ आरोप तय करने पर अपनी दलीलों में अभियोजन पक्ष ने जिला न्यायाधीश एसके सरवारिया के सामने कहा कि जांच में मिली हार्डडिस्क और ईमेल से पता चलता है कि इन दोनों आरोपियों ने गीतिका को खुदकुशी के लिए उकसाया था. अभियोजन पक्ष ने कहा कि कांडा का इरादा गीतिका को बिना योग्यता लुभावनी नौकरी देना और फिर एमीरेट्स एयरलाइंस से जुड़ने के बाद उस पर एमडीएलआर में वापस आने के लिए मजबूर करना था.
 
दिल्ली पुलिस ने अपने मुख्य एवं पूरक आरोपपत्रों में यह भी कहा कि कांडा का गीतिका से बहुत झुकाव था और वह उसका यौन शोषण करने के लिए उसे अपनी कंपनी में वापस लाना चाहता था. अतिरिक्त लोक अभियोजक राजीव मोहन ने कहा कि एमडीएलआर एयरलाइंस में कर्मचारी रह चुकी गीतिका जब एमीरेट्स एयरलाइंस से जुड़ी तो कांडा ने उन्हें एमडीएलआर की ओर से गुडगांव पुलिस में की गयी उस शिकायत की जानकारी दी जिसमें कहा गया था कि गीतिका ने फर्जी अनुभव प्रमाणपत्र तैयार किया और एमडीएलआर के दस्तावेज और लैपटाप अपने साथ ले गयी है. उन्होंने यह भी कहा कि कांडा ने एक अन्य आरोपी चंदशिवरूप की मदद से फर्जी ईमेल आईडी बनवाई और गीतिका को दुबई में उसके खिलाफ कथित प्रत्यर्पण कार्यवाही के बारे में फर्जी ईमेल भेजे.

अभियोजन पक्ष ने कहा कि इलेक्ट्रानिक डाटा और अन्य सबूतों से भारतीय दंड संहिता के तहत खुदकुशी के लिए उकसाने, आपराधिक साजिश, धमकाने, जालसाजी, प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने, फर्जी दस्तावेजों को असली के रूप में प्रयोग करने और सबूत मिटाने का मामला बनता है जिसके तहत दोनों को आरोपित किया गया है. उन पर सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कानून की धारा 66 के तहत भी मामला दर्ज किया गया है.

तीस मार्च को पिछली सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कहा था कि गीतिका और उसकी मां के सुसाइट नोटों को आरोपियों के खिलाफ ठोस सबूत माना जाना चाहिए. अदालत 12 अप्रैल को भी दलीलों पर सुनवाई करेगा. कांडा और अरूणा दोनों फिलहाल जेल में बंद हैं और उन पर गीतिका को खुदकुशी के लिए उकसाने का आरोप है. गीतिका पिछले साल पांच अगस्त को दिल्ली के अशोक विहार स्थित आवास पर मृत पाई गई थी.

वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय भी शामिल हैं अन्ना हजारे की जनतंत्र यात्रा में

जनतंत्र यात्रा क्रम में समाजसेवी अन्ना हज़ारे, पूर्व सैन्य प्रमुख जनरल वीके सिंह, वर्ल्ड सूफ़ी काउंसिल के चेयरमैन मौलाना सूफ़ी जिलानी कत्ताल और चौथी दुनिया के प्रधान संपादक संतोष भारतीय हुसैनीवाला स्थित अमर शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की समाधि पर श्रद्धांजलि देने पहुंचे. शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की समाधि पर अन्ना हज़ारे अत्यंत भावुक हो गए और वे विलख-विलखकर रोने लगे.

यह भावुक दृश्य देखकर जनतंत्र यात्रा में शामिल हज़ारों लोग और स्थानीय नागरिकों की आंखें नम हो गईं. अन्ना हज़ारे ने हुसैनीवाला जाकर अमर शहीदों की समाधि पर श्रद्धासुमन अर्पित किए. इस दौरान पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि वे देशभक्तों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाने देंगे.

अन्ना के मुताबिक़, देश में जिस तरह भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, उससे आम लोगों के जीवन में कठिनाइयां और ज्यादा बढ़ती जा रही हैं. देश में ग़रीबों के साथ अन्याय बढ़ता जा रहा है. किसानों से उनकी ज़मीनें छीनी जा रही हैं और खनिज-संपदाओं की चौतरफा लूट मची हुई है. उन्होंने अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा कि इसे देखकर ऐसा लगता है कि शहीदों का बलिदान बेकार चला गया.

ग़ौरतलब है कि अन्ना की अगुआई में चल रहे इस जनतंत्र यात्रा में हज़ारों की संख्या में लोग शामिल हो रहे हैं. हुसैनीवाला के बाद अन्ना हज़ारे, पूर्व सैन्य प्रमुख जनरल वीके सिंह, वर्ल्ड सूफ़ी काउंसिल के चेयरमैन मौलाना सूफ़ी जिलानी और चौथी दुनिया के प्रधान संपादक संतोष भारतीय फ़रीदकोट स्थित दरगाह पर जियारत करने पहुंचे. अन्ना के मुताबिक़ भारत साधु, संतों और दरवेशों की भूमि है.

देश और समाज के कल्याण के लिए इन सूफ़ी संतों ने तत्कालीन बादशाहों की भी मुख़ालफ़त की थी. फ़रीदकोट के बाद समाजसेवी अन्ना हज़ारे जनतंत्र यात्रियों के साथ जैतो पहुंचे और यहां उन्होंने एक जनसभा को संबोधित किया. अन्ना ने लोगों का आह्वान किया कि वे भ्रष्ट सरकारों को अब और बर्दाश्त नहीं करें. उन्होंने लोगों से अपील किया कि जनता अपनी शक्तियों को पहचानें और सरकार को इस बात का अहसास कराएं कि लोकतंत्र में जनता ही असली मालिक है. अन्ना हज़ारे ने केंद्र सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर सरकार सश्कत जनलोकपाल क़ानून पारित नहीं करेगी, तो उसे हर हाल में जाना ही होगा.

वहीं इस मौक़े पर पूर्व सैन्य प्रमुख जनरल वीके सिंह ने कहा कि मौजूदा केंद्र सरकार पूरी तरह जनविरोधी है, उसे ग़रीब जनता, किसान, मज़दूरों और युवाओं के भविष्य की कोई चिंता नहीं है. जनतंत्र यात्रा में शामिल वर्ल्ड सूफ़ी काउंसिल के चेयरमैन मौलाना सूफ़ी जिलानी कत्ताल ने कहा कि केंद्र सरकार की नीयत में खोट है, इसीलिए वह जन लोकपाल विधेयक पर टाल-मटोल की नीति अपना रही है.

प्रेस विज्ञप्ति

कांग्रेस से दोस्ती दुश्मनी के बीच जयललिता का अभिनय

जयललिता को पता नहीं क्या हो गया है। बहकी बहकी बातें करने लगी है। वैसे जयललिता कब क्या कह दें, या कर दें, कोई गारंटी नहीं ले सकता। पर, कांग्रेस से फिलहाल तो उनका दूर दूर तक लेना देना है और न ही फिलहाल कांग्रेस ने उनको या उनकी सरकार को सताया है। फिर भी कह रही है कि कांग्रेस को भंग कर देना चाहिए। सीधे पार्टी को ही खतम करने की बात। राजनीति में शायद ऐसा भी होता ही होगा, अम्मा इसीलिए हुंकार भर रही है।

कांग्रेस खतम हो जाए, जिससे हमारे देश के कई सारे नेता बहुत सारी भवबाधाओं से मुक्ति पा ले। न रहे बांस न बजे बांसुरी। जैसे, कांग्रेस ही नहीं रहेगी, तो देश तो जैसे उछलकर सीधे अम्मा की गोद में ही आ जाएगा। देश नहीं जैसे कोई फुटबॉल हो गया। पता नहीं किस मंशा में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री सुश्री जे. जयललिता ने कांग्रेस को भंग करने की अपनी बात को साबित करने के लिए बहुत सारे साक्ष्य भी खोज लिए। बोली, कि देश की स्वतंत्रता के बाद महात्मा गांधी कांग्रेस पार्टी को भंग करना चाहते थे।

मामला बढ़ गया और विधानसभा में कांग्रेस के सदस्यों ने उनसे यह साबित करने की मांग की तो दूसरे दिन अम्मा आक्रामक होकर विधानसभा में आईं और जो बहुत सारे दस्तावेज भी लाई, उनमें से ‘दी कलेक्टेड वर्क्‍स ऑफ महात्मा गांधी-वॉल्यूम 90’ के वे कुछ अंश पढ़े, जिनमें महात्मा गांधी ने यह भावना व्यक्त की थी कि देश आजाद हो गया है, अब कांग्रेस की जरूरत नहीं है। 

विधानसभा में जयललिता ने कहा कि भारत के विभाजन के बावजूद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से अपनाए तरीकों से राजनीतिक स्वतंत्रता मिल चुकी है, अब कांग्रेस का उसके वर्तमान स्वरूप में यानी देश को आजाद कराने वाले एक हथियार के रूप में निश्चित समय से अधिक वक्त तक इस्तेमाल हो चुका है। कांग्रेस का जन्म ही देश को आजाद कराने के लिए हुआ था, और अब देश आजाद हो चुका है, सो इसकी कोई जरूरत नहीं है।

कांग्रेस को अब समाप्त कर देना चाहिए। हालांकि विधानसभा में कांग्रेस के सदस्यों ने दावा किया था कि महात्मा गांधी ने कभी इस संदर्भ में कुछ नहीं कहा, लेकिन जयललिता की ओर से आज यह दस्तावेज पेश किए जाने के बाद कांग्रेस के सदस्य निरुत्तर हो गए। विवादों को जन्म देना जयललिता का शगल है और उनसे घिरे रहना उनकी किस्मत का हिस्सा। विवाद शायद इसीलिए जयललिता का पीछा नहीं छोड़ते। पर, इस बार समझ में नहीं आ रहा है कि जयललिता को अचानक कांग्रेस का यह सपना क्यों आया।

इस नए विवाद को जन्म देने के पीछे भी कोई लंबी रणनीति हो सकती है। वैसे जयललिता रणनीतियों की भी उस्ताद रही हैं। वे एक सोची समझी रणनीति के तहत ही अपनी हीरोइन मां का दामन थामकर किसी लाजवंती नायिका की तरह तमिल सिनेमा में आईं और एमजीआर के नाम से बहुत प्रसिद्ध तब के वहां के सुपर स्टार एमजी रामचंद्रन की परम सखी के रूप में छा जाने की रणनीति में कब सफल हो गईं, किसी को पता भी नहीं चल सका। बाद में रामचंद्रन राजनीति में घुसे। चूंकि वे सुपर स्टार थे, इसलिए उनके नाम से पार्टी चलने लगी। और राजनीतिक कारणों से तो नहीं पर श्रृंगारिक कारणों की वजह से अपनी रणनीतियों के तहत जयललिता स्वयं को एमजीआर का सच्चा उत्तराधिकारी मानती थीं।

एमजीआर की धर्म पत्नी होने के बावजूद बेचारी जानकी तो कहीं पिक्चर में भी नहीं थी। उन रणनीतिबाज जयललिता से कांग्रेस का कलह उसी समय शुरू हो गया था, जब कांग्रेसियों के फाइनेंस वाली फिल्मों में भी जयललिता भरपूर नखरे करती थी। पर, अभी शायद इसलिए कांग्रेस पर प्रहार कर रही हैं, क्योंकि एक तो चुनाव आ रहे हैं, और दूसरे, कांग्रेस से दोस्ती और दुश्मनी दोनों का अभिनय कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया है। रणनीति की राजनीतियां भी बहुत मजबूत हुआ करती है।

लेखक निरंजन परिहार वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं.

सीबीआई की सिफारिश पर कुंडा के चार थानेदार और एएसपी हटाए गए

लखनऊ : कुंडा में डीएसपी जिया-उल-हक मर्डर केस की जांच कर रही सीबीआई की सिफारिश के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने कुंडा के चार थानों के थानाध्यक्षों को हटा दिया है. सीबीआई ने यूपी सरकार को चिट्ठी लिखकर सिफारिश की थी कि चार थानों के थाना प्रभा‍री और एक एएसपी आशाराम यादव जांच में अडंगा डाल रहे हैं लिहाजा उनका तबादला कर दिया जाए. सीबीआई की उसी सिफारिश पर यूपी सरकार ने चार थानों के थानाध्यक्षों और एएसपी आशाराम यादव को हटा दिया है.

सीबीआई दो मार्च को कुंडा के बलीपुर में हुई प्रधान नन्हें यादव, उसके भाई सुरेश यादव की हत्या के अलावा डीएसपी जिया-उल-हक की हत्या की जांच कर रही है. जिया-उल-हक दो मार्च को प्रधान की हत्या की जांच के लिए कुंडा के बलीपुर गांव गए थे. इस केस में कुंडा के विधायक राजा भैया पर भी उंगली उठ रही है. जिन पुलिस अधिकारियों को हटाया गया है उनमें अपर पुलिस अधीक्षक आशाराम यादव, कुंडा थाना प्रभारी प्रकाश राय, हथिगवां थाना प्रभारी निशिकांत राय, महेशगंज थाना प्रभारी अशोक पांडेय और नवाबगंज थाना प्रभारी अरविंद सिंह शामिल हैं.

उधर डीएसपी समेत तिहरे हत्याकांड की जांच कर रही सीबीआई टीम की पूछताछ से आजिज आए प्रधान के परिजन नार्को टेस्ट कराने को तैयार हैं. उनका मानना है कि जो कुछ भी था, वह सीबीआई को बता चुके हैं. फिर भी सीबीआई को उनकी बातों पर यकीन नहीं हो रहा है, ऐसे में सीबीआई उनका नार्को टेस्ट करा ले. इस मांग संबंधी पत्र तैयार करके प्रधान के पिता दुखीराम सीबीआई को सौंपने की तैयारी कर रहे हैं.

स्व. राजेश कौशिक के लिए रस्म पगड़ी कल दोपहर बाद दो बजे से गाजियाबाद में

बड़े ही दुख के साथ आप सभी को सूचित करना पड़ रहा है कि 27 मार्च 2013 दिन बुधवार को हम सब के प्रिय श्री राजेश कौशिक जी, चैनल हैड, सहारा समय न्यूज़ चैनल, एनसीआर, का देहांत हो गया था। आप सभी को सूचित किया जाता है कि दिनांक 04 अप्रैल 2013, दिन-गुरुवार को राजेश कौशिक जी के निवास स्थान पर रस्म पगड़ी का आयोजन किया गया है।

आप सभी से निवेदन है कि कृपया रस्म पगड़ी आयोजन में पधारकर स्वर्गीय राजेश कौशिक जी की आत्मा की शांति के लिए दुआ करें ।

दिन- गुरुवार

दिनांक- 04 अप्रैल 2013

समय:- सांय 2 से सांय 4 तक

स्थान:- राजेश कौशिक जी का निवास, SI-64, शास्त्रीनगर, निकट थाना कविनगर, गाज़ियाबाद।

संपर्क सूत्र:- 98-18-761-786.

निवेदक- स्व. राजेश कौशिक के परिजन.

वरिष्ठ पत्रकार श्याम माथुर की एक और पुस्तक : ‘सिनेमा का सफ़र – निर्देशकों के साथ’

फिल्म विश्लेषक और पत्रकार श्याम माथुर की एक और किताब ‘सिनेमा का सफ़र – निर्देशकों के साथ’ हाल ही प्रकाशित हुई है। इस किताब में उन्होंने दस समकालीन निर्देशकों के विस्तृत इंटरव्यू शामिल किए हैं और इस तरह आधुनिक सिनेमा की नवीन प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास किया है। ये ऐसे फिल्मकार हैं, जिन्होंने व्यावसायिक सिनेमा के प्रचलित फॉर्मूलों के भीतर रहते हुए भी सिनेमाई मनोरंजन का एक नया मुहावरा रचने की कोशिश की है और इसमें वे किसी हद तक कामयाब भी हुए हैं।

किताब के बारे में अपनी लंबी और जज्बाती भूमिका में  श्याम माथुर लिखते हैं, ‘….पिछले सौ वर्षों से यानी अपने जन्म से लेकर आज तक सिनेमा हमारे सुख-दुख का साथी रहा है। फिल्मों ने हमें हंसना और रोना सिखाया है, हमें अपने सपनों को नई बुलंदी देना सिखाया है, हमारी खुशियों को कहकहों की आवाज दी है, तो हमारे गमों को आंसुओं की सौगात भी दी है। ….जैसे परदे पर किरदार बदलते हैं, इधर पीढिय़ां बदल जाती हैं।….अगर कुछ नहीं बदलता है, तो वो है सिनेमा, जो हमेशा अपने सुपर हिट मेलोड्रामा के साथ नई और सार्थक संभावनाएं तलाशता रहता है।….’

कहने की शायद जरूरत नहीं है कि इधर फिल्मकारों की एक पूरी नई पीढ़ी सामने आ  गई है। करण जौहर से लेकर राजकुमार हीरानी तक या फिर  प्रकाश झा से लेकर दीपा मेहता  तक। हरेक की अपनी-अपनी प्रतिबद्धताएं  हैं और प्रतिबद्धता के बावजूद मनोरंजन के तत्व से भी उन्होंने किनारा नहीं किया है। नई पीढ़ी के फिल्मकारों में एक बात समान है और वह यह कि इस पीढ़ी ने सामाजिक विद्रूपताओं पर आंसू बहाने की बजाय उन्होने मनोरंजन के फॉर्मूलों के सहारे एक अनूठे और दिलचस्प तरीके से हमारे सामने रखा है और इन त्रासदियों को दूर करने की एक सार्थक पहल भी की है। वे अपने इस प्रयास में कहां तक कामयाब हुए हैं, यह जांचना समाज शास्त्रियों का काम है। लेकिन इस बात से शायद ही कोई इनकार करेगा कि विषयों में नवीनता और मौलिकता के कारण उनकी फिल्मों ने एक बड़े दर्शक वर्ग को अपना बनाया है। ये ऐसे फिल्मकार हैं, जो सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर जुबान बंद नहीं रखते, बल्कि सिनेमा के जरिए और सिनेमा से इतर दूसरे मंचों पर मुखर रूप से खुद को अभिव्यक्त करते हैं।

बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि अपनी फिल्मों के जरिए परदे पर नई इबारत लिखने वाले लगभग सभी फिल्मकारों ने इंटरव्यू के दौरान अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में ईमानदारी से चर्चा की है। किताब हमें बताती है कि नई पीढ़ी के फिल्मकारों का मकसद साफ है – मनोरंजन के माध्यम से देश, दुनिया और समाज में परिवर्तन की मामूली ही सही, लेकिन उत्तेजक लहर पैदा करना।

‘सिनेमा का सफ़र’ को पढऩे के दौरान यह बात बार-बार रेखांकित होती है कि नई पीढ़ी के फिल्मकारों ने मानवीय गरिमा और जीवन मूल्यों को तरजीह देते हुए एक नए किस्म का सिनेमाई मुहावरा रचा है। ये ऐसे फिल्मकार हैं, जो सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं समझते। उनके लिए परछाइयों का यह खेल जीवन की सच्चाइयों को सामने लाने का एक प्रभावी जरिया है। उन्होंने यथार्थवादी संवेदनशीलता को बरकरार रखते हुए अपनी फिल्मों में अलहदा बिंब, रूपक और विधान रचे। यही कारण है कि बाहर से बहुत साधारण-सी नजर आने वाली उनकी फिल्मों में जब हम गहराई तक झांकते हैं, तो उनमें हमें हमारी जिंदगी का हर वो रंग नजर आता है, जो बेपनाह दर्द से गुजरने के बावजूद मुहब्बत की खुशबू से महकता रहा है।

ऐसे समय में जबकि भारतीय सिनेमा शताब्दी का जश्न मना  रहा है, वर्तमान दौर के चर्चित और कामयाब फिल्मकारों से गुफ्तगू करना, उनसे रूबरू होना एक अनूठे अहसास की अनुभूति कराता है। सिने प्रेमियों के साथ सिनेमा के शोधार्थियों के लिए भी यह पुस्तक बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। पुस्तक ‘सिनेमा का सफ़र – निर्देशकों के साथ’ का प्रकाशन राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी ने किया है। पुस्तक में यथास्थान चित्रों का भी भरपूर इस्तेमाल किया गया है और ब्लैक एंड व्हाइट होते हुए भी तमाम चित्र आकर्षक स्वरूप में प्रकाशित किए गए हैं। 175 पेज की इस पुस्तक का मूल्य है 130 रुपए। जो सिने प्रेमी इस पुस्तक को प्राप्त करना चाहें, वे इस पते पर संपर्क कर सकते हैं– निदेशक, राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी, प्लॉट नं. 1, झालाना सांस्थानिक क्षेत्र, जयपुर – 302004 (फोन नंबर – 0141-2711129, 2710341)।

लेखक श्याम माथुर प्रिंट मीडिया का पच्चीस वर्ष का अनुभव  रखते हैं। फिल्म पत्रकारिता में उनकी विशेष रुचि है और वे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में नियमित भागीदारी करते रहे हैं। वे समाचार वाचक के तौर पर आकाशवाणी से भी संबद्ध रहे हैं। सिनेमा, टेलीविजन और संगीत से जुड़े विषयों पर वे पिछले तीन दशकों से बहुआयामी लेखन कर रहे हैं। इससे पूर्व उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें ‘सिने पत्रकारिता’ (2009) को केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्रालय के भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कारों की शृंखला में राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उनकी एक और पुस्तक ‘वेब पत्रकारिता’ (2011) को केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से राजीव गांधी राष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है।

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी

मध्य प्रदेश के उज्जैन से खबर है कि यहां की एक अदालत ने कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह और सांसद प्रेमचन्द्र गुड्डू के खिलाफ आज गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किया। अभियोजन पक्ष के अनुसार 17 जुलाई 2011 को उज्जैन में भारतीय जनता युवा मोर्चा तथा कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच हुई मारपीट की घटना के बाद जीवाजीगंज थाने में जयसिंह, अनंत नारायण मीणा, मुकेश भाटी, अमरलाल आदी के खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज हुआ था। थाने में इस मामले में प्रकरण दर्ज होने के बाद शासन की और से न्यायालय में अर्जी दायर की गई थी कि इस मामले में दिग्विजय सिंह, प्रेमचन्द्र गूड्डू हेमन्त चौहान, तथा दिलीप चौधरी को भी आरोपी बनाया जाए।

उज्जैन के दशम अपर सत्र न्यायाधीश दीपेश तिवारी की अदालत में शासन की अर्जी स्वीकार करते हुए उक्त चारों को सम्मन जारी किये थे। इस मामले की पिछली सुनवाई में हेमन्त एवं दिलीप ने जमानत ली थी जबकि दिग्विजय एवं प्रेमचन्द्र की और से मामले में व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट दिये जाने का आवेदन दिया गया था। इस मामले की आज हुई सुनवाई में अदालत ने उनका आवेदन अस्वीकार कर सिंह एवं गुड्डू के खिलाफ गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया और सुनवाई के लिए आगामी 30 अप्रैल की तारीख निर्धारित की है।

पूरे उत्तराखंड भर से पत्रकारों ने अपना संदेश पत्र बहुगुणा को भेजा

उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की प्रदेश कार्यकारिणी की हरिद्वार में पिछले महीने 16 मार्च की बैठक में लिए गए फैसले के क्रम में मंगलवार को उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की प्रदेश भर की सभी नगर, तहसील और जिला इकाइयों ने अपने जनपद के जिलाधिकारी अथवा नगर में उपलब्ध अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के नाम अट्ठारह सूत्रीय मांग-पत्र के ज्ञापन भेजा।

ये हैं प्रमुख मांगें…

उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन द्वारा प्रदेश के कोने – कोने से मुख्यमंत्री के नाम भेजे गए ज्ञापनों में प्रदेश में प्रेस मान्यता और विज्ञापन मान्यता समितियों का  विधिवत गठन किए जाने, अपर जिला सूचनाधिकारी / सूचनाधिकारी एवं सूचना तथा जन सम्पर्क से प्रत्यक्ष / परोक्ष रूप में जुड़े तमाम पदों की नियुक्ति में इन पदों की शैक्षणिक योग्यता / अहर्ता में पत्रकारिता एवं जन सम्पर्क में स्नातक, स्नातकोत्तर डिप्लोमा या स्नातकोत्तर डिग्री होना अनिवार्य किए जाने, प्रदेश में तत्काल पारदर्शी सूचना नीति लागू करने और मीडिया परिषद् का गठन किए जाने, राज्य से प्रकाशित अख़बारों और दूसरे समाचार संस्थानों में काम कर रहे श्रमजीवी पत्रकारों को पत्रकारों के लिए गठित वेतन बोर्ड की सिफारिशों के मुताबिक वेतन / भत्ते  दिलाए जाने, राज्य से प्रकाशित तमाम समाचार संस्थानों में डेस्क पर काम करने वाले पत्रकारों एवं ब्लाक स्तर पर कार्य कर रहे पत्रकारों को प्रेस मान्यता दिए जाने, प्रदेश के सभी श्रमजीवी पत्रकारों का दस लाख रूपये का  दुर्घटना बीमा कराये जाने, राज्य के लघु एवं मध्यम श्रेणी के समाचार – पत्र एवं पत्रिकाओं के लिए सुस्पष्ट विज्ञापन नीति बनाए जाने, राज्य सूचना आयोग में प्रदेश के दो वरिष्ट पत्रकारों / संपादकों को सुचना आयुक्त नियुक्त किए जाने, प्रदेश के जिलों, तहसीलों और ब्लाकों से राजधानी आने वाले श्रमजीवी पत्रकारों के लिए पूर्व की भांति देहरादून में तत्काल आवासीय सुविधा बहाल  किए जाने  सभी समाचार संस्थानों में श्रम कानूनों का कड़ाई से पालन किया जाना सुनिश्चित किए जाने और उत्तराखंड के हरेक जिला एवं तहसील मुख्यालयों में पत्रकारों की आवासीय कालोनियों के निर्माण के लिए भूमि उपलब्ध कराये जाने आदि मांगें शामिल हैं। ज्ञापन में यूनियन ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि मौजूदा राज्य सरकार श्रमजीवी पत्रकारों की समस्याओं को सरासर अनदेखा कर रही है।

प्रदेश भर से भेजा गया ज्ञापन

राज्य मुख्यालय देहरादून में यूनियन के अध्यक्ष अनूप गैरोला के नेतृत्व में प्रदेश के सूचना महानिदेशक विनोद शर्मा को ज्ञापन सौंपा गया। देहरादून जिला इकाई के महासचिव गिरधर शर्मा ने मांग पत्र प्रस्तुत किया। यहाँ ज्ञापन देने वालों में यूनियन के प्रांतीय कोषाध्यक्ष अविक्षित रमन, सांगठनिक सचिव भूपेन्द्र कंडारी, दर्शन सिंह रावत, अजय गौतम, विकास गुसाईं, नीरज कोहली, रतन सिंह नेगी आदि वरिष्ठ पत्रकार शामिल थे। कुमाऊँ के मंडल मुख्यालय नैनीताल में नैनीताल इकाई के अध्यक्ष माधव पालीवाल के नेतृत्व में जिला मजिस्ट्रेट सुश्री निधिमणि त्रिपाठी को ज्ञापन दिया गया। यहाँ ज्ञापन देने वालों में यूनियन के प्रांतीय महासचिव प्रयाग पाण्डे, भूपेन्द्र मोहन रौतेला, किशोर जोशी, हेम भट्ट, ललित जोशी, कुंवर सिंह देव, सुनील बोरा, प्रवीण कपिल, सुरेश कांडपाल, विनोद कुमार, कांता पाल, धर्मा चंदेल आदि पत्रकार शामिल थे।

हल्द्वानी में यूनियन के प्रांतीय उपाध्यक्ष पंकज वार्ष्वेय के अगुवाई में यूनियन के नैनीताल जिला इकाई के कोषाध्यक्ष गौरव गुप्ता, महेन्द्र नेगी, रवि दुर्गापाल, नाजिम एवं योगेश आदि पत्रकारों ने सिटी मजिस्ट्रेट आईडी पालीवाल को ज्ञापन सौंपा। यूनियन की रामनगर इकाई ने यूनियन के अध्यक्ष एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया प्रकोष्ट के प्रांतीय संयोजक गणेश रावत की अगुवाई में प्रभात ध्यानी, जितेन्द्र पपनै, गोविन्द पाटनी, मदन बिष्ट, त्रिलोक रावत और डॉ. जफर जैदी ने एसडीएम के द्वारा मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजा। यूनियन की हरिद्वार जिला इकाई के जिला अध्यक्ष डॉ . शिव शंकर जायसवाल की अगुवाई में जिले के जिला अधिकारी सचिन कुर्वे को ज्ञापन दिया गया। ज्ञापन देने वालों में यूनियन के प्रांतीय उपाध्यक्ष  डॉ. रजनीकांत शुक्ल, डॉ. हिमांशु द्विवेदी, श्रवण झा, संजय आर्य, दीपक नौटियाल, अमित कुमार, प्रवीन झा, महेश पारीख, एहसान अंसारी, नरेश सैनी, राम नरेश यादव, जितेन्द्र चौरसिया, बिक्रम झाझर एवं वेद प्रकाश चौहान आदि पत्रकार शामिल थे। कोटद्वार में वरिष्ठ पत्रकार देवेन्द्र सिंह, राज गौरव नौटियाल, जगमोहन रावत, नवीन नेगी, अनिल सती आदि पत्रकारों ने ज्ञापन दिया। जबकि पौड़ी जिले में यूनियन के प्रांतीय सचिव त्रिभुवन उनियाल के नेतृत्व में ज्ञापन दिया गया।

कुमाऊँ मंडल के सीमान्त जिले पिथौरागढ़ में यूनियन के जिला अध्यक्ष जगदीश कलौनी के नेतृत्व में योगेश पाठक, ललित जोशी, बिजेंद्र लूंठी, प्रकाश पाण्डे, दीपक गुप्ता, मनोज चंद, राकेश पन्त, फरहान अहमद, दिनेश अवस्थी, सुशील खत्री, जीवन सिंह बोरा एवं दिलीप वाल्दिया आदि पत्रकारों ने जिला प्रशासन के जरिये मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजा। अल्मोड़ा जिले में आईएफडब्ल्यूजे के मानवाधिकार प्रकोष्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी, जिले के संयोजक रमेश जोशी, प्रकाश पाण्डे, गितेश त्रिपाठी, संजय अग्रवाल, अनिल सनवाल, पुष्कर बिष्ट, प्रमोद जोशी, दीपक बिष्ट, उदय किरौला, दीपांकर कार्की, नसीम अहमद, विपिन कुमार, हरीश भट्ट और शिवेन्द्र गोस्वामी सहित अनेक पत्रकारों ने जिले के अपर जिला अधिकारी के जरिये मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजा। यूनियन की चम्पावत और बागेश्वर जिले की इकाइयों ने जिला प्रशासन के जरिये मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजे। उधमसिंह जिले में यूनियन के जिला सचिव प्रेम अरोरा के नेतृत्व में जिला प्रशासन के जरिये मुख्यमंत्री को भेजा गया। इसके अलावा उत्तराखंड के दूसरे जिलों से भी यूनियन की ओर से मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन भेजे गए।

उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महासचिव प्रयाग पाण्डे ने कहा कि प्रदेश भर की सभी नगर और जिला इकाइयाँ द्वारा श्रमजीवी पत्रकारों की समस्याओं / मांगों को लेकर अपने-अपने जिलों के जिलाधिकारियों के माध्यम से प्रदेश के मुख्यमंत्री को सम्बोधित ज्ञापन भेजना पहला चरण था। अगले चरण में यूनियन की प्रदेश कार्यकारणी का एक प्रतिनिधि मंडल मुख्यमंत्री से मुलाकात कर उन्हें प्रदेश के श्रमजीवी पत्रकारों की समस्याओं / मांगों से सम्बन्धित समयबद्ध ज्ञापन सौंपेगी। इसके बाद भी पत्रकारों की तकलीफों पर गौर नहीं किया गया तो यूनियन उत्तराखंड के श्रमजीवी पत्रकारों की पिछले कई सालों से लम्बित समस्याओं को लेकर सीधे संघर्ष का रास्ता अपनाएगी। यूनियन के महासचिव प्रयाग पाण्डे ने साफ किया की यूनियन का पहला और अंतिम लक्ष्य राज्य के श्रमजीवी पत्रकारों के हितों की हिफाजत करना है। श्रमजीवी पत्रकारों के हितों के संरक्षण के लिए यूनियन सभी मोर्चों पर संघर्ष करने को कृत संकल्प है।

क्या दैनिक भास्कर का नेशनल न्यूज रूम दो हिस्सों में बंटने जा रहा?

एक सूचना आई है कि दैनिक भास्कर अपने नेशनल न्यूज रूम को दो हिस्सों में बांटने जा रहा है। एक टीम कल्पेश याग्निक की लीडरशिप में इंदौर में बैठेगी और दूसरी नवनीज गुर्जर के मातहत भोपाल में। यह सूचना कितनी सही या गलत है? कृपया कनफर्म करें।

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सलोनी अरोड़ा का मुंबई तबादला, बीएस हिंदी छोड़ भीम ने नई दुनिया पकड़ा

दैनिक भास्कर, इंदौर से खबर है कि सलोनी अरोड़ा का तबादला इसी अखबार के मुंबई एंटरटेनमेंट ब्यूरो में कर दिया गया है। एक अन्य जानकारी के मुताबिक बिजनेस स्टैंडर्ड के हिंदी संस्करण में कार्यरत उप संपादक भीम सिंह ने इस्तीफा देकर नईदुनिया, इंदौर में ज्वाइन कर लिया है।

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विनोद पुरोहित ने पत्रिका और अनुराग अन्वेषी ने अमर उजाला छोड़ा

पत्रिका इंदौर के स्थानीय संपादक विनोद पुरोहित ने नईदुनिया का भोपाल संस्करण नवदुनिया ज्वाइन कर लिया है। उन्हें भोपाल का संपादक बनाया गया है। अमर उजाला नोएडा कार्यालय से समाचार संपादक अनुराग अन्वेषी ने इस्तीफा दे दिया है। हालांकि वो कहां ज्वाइन कर रहे हैं इसकी जानकारी फिलहाल नहीं है।

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सुधीर शर्मा को ‘पत्रकारिता रत्न’ पुरस्कार

नवी मुंबई : नव भारत हिंदी दैनिक के राजनीतिक संवाददाता सुधीर शर्मा को पत्रकारिता रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। कमोठे में शिव साईं सामाजिक सेवासंस्था द्वारा आयोजित एक विशेष समारोह के दौरान स्मृति चिन्ह एवं पुष्प गुच्छ सहित यह पुरस्कार विधायक प्रशांत ठाकूर के हाथों प्रदान किया गया।

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एवं उद्योगपति हरिबंश सिंह की मुख्य उपस्थिति में सुधीर शर्मा को यह सम्मान पत्रकारिता में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया गया। हिंदी भाषी समाज ने इसके लिए सुधीर को बधाई दी है। इस अवसर पर कई बड़े नेताओं सहित सैकड़ों नागरिक उपस्थित थे।

दीदी, अंतरिक्ष में सबसे ज्यादा आपको किसकी याद सताती थी?

: खतरों को ठेंगा दिखाने वाली उड़नपरी की भारत यात्रा : भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स इन दिनों भारत यात्रा पर आई हैं। वे अपने पिता के देश में आकर पहले की तरह इस बार भी भावुक हो गईं। उन्होंने कहा है कि भारतीय युवाओं में तकनीकी प्रतिभा बेमिसाल है। उन्हें उम्मीद है कि एक न एक दिन अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत, दुनिया में अपनी बुलंदी के झंडे जरूर गाड़ेगा।

वे दुनिया की ऐसी पहली महिला अंतरिक्ष यात्री हैं, जिन्होंने अंतरिक्ष में सबसे ज्यादा चहलकदमी (स्पेसवॉक) करने का रिकॉर्ड बना दिया है। उन्हें लगता है कि आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष तकनीक का तेजी से विकास होगा। इसके जरिए ब्रह्माण्ड के तमाम रहस्य दुनिया के सामने उजागर होंगे। संभव है कि इसके द्वारा मानव जीवन की और बेहतरी के लिए नए विकल्प निकल आएं।

अमेरिकी नेवी की पायलट सुनीता ‘नासा’ से लंबे समय से जुड़ी हैं। उनमें इतनी गजब की हिम्मत और जूझने का माद्दा है कि वे बड़े-बड़े खतरनाक अभियानों के लिए सहज तैयार हो जाती हैं। कहती हैं कि अंतरिक्ष मिशन खतरे से भरे जरूर होते हैं, लेकिन उनके जैसा रोमांच और कहीं किसी को नहीं मिल सकता। वे सात बार अंतरिक्ष अभियानों में यात्रा कर चुकी हैं। कई बार मौत के खतरे को बहुत पास से महसूस कर चुकी हैं। लेकिन, इन खतरों के बाद भी वे नए अंतरिक्ष अभियान में जाने के लिए उतावली हैं। उन्हें लगता है कि अंतरिक्ष के करियर में उन्हें अभी बहुत कुछ करना बाकी है।

1965 में ओहायो (अमेरिका) के युक्लिेड शहर में पैदा हुईं सुनीता, स्कूली जीवन से ही खतरों की खिलाड़ी बन गई थीं। उन्हें सड़कों पर तेज रफ्तार से बाइक चलाने में खासा मजा आता था। बाइक रेस की कई प्रतियोगिताएं भी स्कूली दौर में उन्होंने फतह की थीं। बेटी के रफ्तार प्रेम से कई बार उनके पिता को भी डर लगने लगता था। रेसिंग के चक्कर में कई बार उन्हें पिता की डांट भी खानी पड़ी थी। सुनीता याद करती हैं कि उनके पिता और मां कई बार चिंतित जरूर हो जाते थे। लेकिन, उन्होंने कभी भी अपनी इच्छाएं उन पर थोपने की कोशिश नहीं की। शायद, इसी वजह से वे अंतरिक्ष के करियर में इतनी सफलता हासिल कर पाई हैं।

सुनीता के पिता दीपक पांड्या और मां बोनी पांड्या हमेशा बेटी की हौसला अफजाई करते रहे हैं। सुनीता अपनी बेमिसाल सफलता का पूरा श्रेय अपने मां और पिता को ही देती हैं। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है कि जीवन के कई मोड़ों पर वे बुरी तरह से असफल हो चुकी हैं। लेकिन, ऐसे क्षणों में सबसे ज्यादा हौसला अफजाई का काम उनके पिता ने ही किया है। वे यही कहते थे कि असफलताओं से ही सफलता का रास्ता निकलता है। ऐसे में, असफलताओं से क्या घबराना?

दीपक पांड्या, ओहायो के एक जाने-माने डॉक्टर रहे हैं। वे मूलरूप से गुजरात के मेहसाणा के रहने वाले हैं। अमेरिका जाकर उन्होंने सल्वेनिया मूल की बोनी से शादी कर ली थी। अमेरिका में प्रवास के बावजूद दीपक का जीवंत संपर्क गुजरात से बना रहा। वे हर दो-चार साल में परिवार सहित गुजरात जरूर लौटते रहे हैं। ऐसे में, भले सुनीता का जन्म अमेरिकी धरती पर हुआ हो, लेकिन पिता के ठेठ भारतीय संस्कारों का गहरा असर उन पर रहा है। सुनीता कहती भी हैं कि पिता की आंखों से उन्होंने भारत को बहुत करीब से देखा है। खास तौर पर भगवत गीता और उपनिषदों की शिक्षा का उन पर गहरा प्रभाव है।

अंतरिक्ष अभियानों के दौर में सुनीता अपने साथ भगवत गीता और उपनिषदों की दो पुस्तकें भी ले गई थीं। कहती हैं कि गीता के जरिए उन्हें जीवन का नया दर्शन मिला है। वे समझ पाई हैं कि डर इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी है। जब जोखिम ज्यादा हो, ऐसे क्षणों में गीता के संदेश बहुत कारगर होते हैं। अंतरिक्ष मिशन के दौर में उन्होंने कठिन क्षणों में गीता के संदेशों से नई ऊर्जा ली थी। क्योंकि, गीता का संदेश है कि सकारात्मक उद्देश्य के लिए मजबूत दृढ़ संकल्प अपने अंदर पैदा करो और आगे बढ़ते चलो। किसी ने डर पर काबू पा लिया, तो समझो आधी सफलता तो अपने आप ही मिल गई। उन्हें लगता है कि इस तरह की मजबूत इच्छाशक्ति उन्हें गीता के ज्ञान से प्राप्त हुई है। इसीलिए वे हर अंतरिक्ष अभियान में अपने साथ गीता ले जाना नहीं भूलतीं।

इन भारतीय धार्मिक पुस्तकों के अलावा सुनीता को कई भारतीय व्यंजन बहुत लुभाते हैं। वे कहती हैं कि खास तौर पर अलग-अलग किस्म के समोसे उन्हें बहुत भाते हैं। पिछले साल वे लंबे अंतरिक्ष अभियान में थीं। इस दौर में उनके साथ समोसे भी थे। जिनका मजा उन्होंने अंतरिक्ष में लिया था। 2007 में सुनीता ने एक बड़ा अंतरिक्ष मिशन पूरा किया था। कई दिन अंतरिक्ष में गुजारने के बाद वे सकुशल धरती पर लौंट आई थीं। इस अंतरिक्ष अभियान की सफलता से सुनीता की चर्चा पूरी दुनिया में हो गई थी। इसी अभियान के बाद वे अक्टूबर 2007 में भारत यात्रा पर आई थीं। यहां आने पर उनका स्वागत जिस गर्मजोशी से हुआ था, उससे वे भाव-विभोर हो गई थीं।

इस यात्रा के दौरान वे गुजरात में अपने पिता के पैतृक स्थान का दौरा भी करने गई थीं। भाव-विभोर होकर उन्होंने पिता के पैतृक घर की मिट्टी को माथे पर लगा लिया था। 2008 में भारत सरकार ने उन्हें विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में खास उपलब्धि के लिए ‘पद्म भूषण’ सम्मान से नवाजा था। 2007 में उन्होंने अंतरिक्ष अभियान 14-15 को रिकॉर्ड सफलता से पूरा किया था। इस अभियान में भी उन्होंने लंबे समय तक अंतरिक्ष में जोखिम भरी चहलकदमी का रिकॉर्ड बना दिया था। पिछले साल अगस्त-सितंबर में सुनीता ने अंतरिक्ष प्रवास के दौरान सात बार ‘स्पेसवॉक’ करने का करिश्मा कर दिखाया। उन्होंने 50 घंटे और 40 मिनट अंतरिक्ष में चहलकदमी करके एक विश्व रिकॉर्ड बना डाला है।

वे अंतरिक्ष में 322 दिन तक रहने का विश्व रिकॉर्ड भी बना चुकी हैं। वे दुनिया की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री हैं, जिन्होंने इतना लंबा समय अंतरिक्ष में सफलता पूर्वक बिताया है। 47 वर्षीय सुनीता को लगता है कि उम्र से भले वे नौजवान न रह गई हों, लेकिन उनका हौसला तो पहले से भी ज्यादा जवां हो गया है। उनकी इच्छा है कि वे अंतरिक्ष में प्रवास का नया विश्व रिकॉर्ड बनाएं। अंतरिक्ष प्रवास के दौरान कुछ न कुछ ऐसा खोज लें, जो कि अगली पीढ़ी के लिए बहुत कारगर साबित हो। बस, जिंदगी के लिए उनकी यही ख्वाइश बची है। वह चाहती हैं कि मून मिशन में और काम हो। वहां भी अंतरिक्ष स्टेशन बनाया जाए। ताकि, अंतरिक्ष अभियान के काम में तेजी आए।

इस सप्ताह वे भारत की यात्रा पर यहां पहुंची हैं। सोमवार को ही दिल्ली के राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र के एक कार्यक्रम में उन्होंने हिस्सा लिया था। इस कार्यक्रम में देश के तमाम हिस्सों के स्कूली बच्चे जुटे थे। इन बच्चों ने अपनी ‘अंतरिक्ष दीदी’ से जमकर सवाल पूछे। हर सवाल का जवाब सुनीता ने बड़े धैर्य से दिया। उन्होंने बच्चों को चांद-सितारों की दुनिया से जुड़े अपने तमाम अनुभव बताए। यह भी बता डाला कि कैसे अंतरिक्ष अभियान में कई बार उन्हें दौड़-दौड़कर एक-एक बूंद पानी लपकना पड़ता था? क्योंकि, पानी एकदम उड़ने लगता है। वे टूथपेस्ट से दांतों में ब्रश भी कैसे कर पाती थीं, इसके अनुभव भी उन्होंने बड़े मजेदार ढंग से बताए। बातों-बातों में ही अंतरिक्ष अभियान का तमाम ज्ञान देकर उन्होंने बच्चों को खूब हंसाया भी।

एक बच्चे का सवाल था कि दीदी, आप पिछले साल अंतरिक्ष में लंबे समय तक थीं। उस समय सबसे ज्यादा आपको किसकी याद सताती थी? मासूम के इस सवाल पर सुनीता पहले खिलखिलाकर हंसी, फिर उन्होंने बताया कि सच्चाई तो यह है कि वे अंतरिक्ष में अपने प्यारे डॉगी को सबसे ज्यादा मिस करती थीं। यह बात उनके प्यारे पति को भी पता है। उन्हें यह जानकर अच्छा नहीं लगा कि वे उनकी बजाए प्यारे डॉगी को सबसे ज्यादा मिस करती थीं। यह जवाब सुनाकर सुनीता ने सभी बच्चों को खूब हंसाया। जाते-जाते सबको नसीहत भी दे गईं कि बड़े से बड़े काम को मजबूत इरादों से किया जा सकता है। बस, कठिन क्षणों में हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। उन्होंने एक ही चीज सीखी है कि परेशानी आती है, तो उसका कोई न कोई तोड़ जरूर होता है। बस, इन क्षणों में धैर्य बनाए रखने की खास जरूरत होती है।

एक सवाल था कि कल्पना चावला के हादसे के बाद उन्हें अंतरिक्ष मिशन में कितना डर लगा था? कल्पना चावला का जिक्र आया, तो सुनीता काफी भावुक नजर आईं। ‘नासा’ में उनकी दोस्ती कल्पना से हो गई थी। उल्लेखनीय है कि कल्पना भारतीय मूल की पहली महिला थीं, जो कि ‘नासा’ के अभियान में अंतरिक्ष पर पहुंची थीं। लेकिन, 1 फरवरी 2003 को मिशन से लौटते वक्त उनका यान ध्वस्त हो गया था और उनकी मौत हो गई। कल्पना चावला की मौत से पूरे देश में शोक की लहर फैल गई थी।

कल्पना को खोने के बाद देश के लोग सुनीता की सलामती के लिए ज्यादा जज्बाती हो जाते हैं। पिछले साल जब वे अंतरिक्ष मिशन से धरती पर लौटने वाली थीं, तो इस भारतीय मूल की बेटी की सलामती के लिए देशभर में प्रार्थनाओं का दौर शुरू हुआ था। स्कूली बच्चों ने प्रार्थनाएं की थी कि ‘सुनीता दीदी’ तुम सकुशल धरती पर जरूर लौट आना। क्योंकि, कल्पना दीदी को खोने का गम हम नहीं भूले हैं।

सुनीता ने कहा है कि भारत सरकार ने जिस तरह से अंतरिक्ष अभियान कार्यक्रमों को वरीयता देनी शुरू की है, ऐसे में उन्हें विश्वास है कि इस देश में तमाम कल्पना चावला जरूर पैदा होंगी। उन्हें भी भारत में अपनी पैतृक जड़ें होने का बहुत गर्व है। उनकी इच्छा है कि वे यहां पर हिमालय क्षेत्र और दक्षिण भारत की जमकर यात्राएं करें। उन्होंने अंतरिक्ष मिशनों में वहां से कई बार भारत की धरती को निहारा है। अंतरिक्ष से भारत जितना खूबसूरत लगता है, उससे कहीं ज्यादा यहां आने पर उसकी खूबसूरती महसूस होती है।

भारत प्रवास के दौरान दिल्ली-मुंबई-कोलकाता के कार्यक्रम पूरे होने के बाद सुनीता, अपने पिता के पैतृक स्थान मेहसाणा जाएंगी। गुजरात सरकार ने ‘सुनीता बेटी’ का बड़े पैमाने पर अभिनंदन करने का कार्यक्रम बनाया है। दिल्ली के बाद मुंबई में भी सुनीता ने दोहराया है कि विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में भारतीय युवाओं ने पूरी दुनिया में अपनी प्रतिभा का डंका बजाया है।

कंप्यूटर क्षेत्र में जिस तरह से भारतीय प्रतिभाओं ने अपना दबदबा बनाया है, उससे दुनिया में भारत की छवि एकदम बदल गई है। उन्हें उम्मीद है कि आने वाले सालों में अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारतीय युवा अपनी प्रतिभा से ब्रह्मांड के तमाम उलझे रहस्यों को सुलझा लेंगे। दिल्ली की ‘वर्कशॉप’ में एक छात्र ने सुनीता से सवाल किया था कि आखिर हम लोग ‘ब्लैक होल’ की गुत्थी अभी तक क्यों नहीं सुलझा पाए? इस पर अंतरिक्ष की इस बेमिसाल उड़नपरी का दो टूक जवाब था कि अब इन अनसुलझी अंतरिक्ष पहेलियों को सुलझाने की जिम्मेदारी भारतीय युवाओं की है। उन्हें विश्वास है कि यहां के युवाओं का तेज दिमाग दुनिया में कुछ भी अनसुलझा नहीं रहने देगा।

सुनीता विलियम्स ने बच्चों को यह भी बता दिया कि जीवन में कई बार संयोगों की भी बड़ी भूमिका होती है। जैसे कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे एक दिन अंतरिक्ष यात्री बनेंगी। दरअसल, वे तो पशु-चिकित्सक (वेटेरनरी डॉक्टर) बनना चाहती थीं। क्योंकि, उन्हें कुत्ते-बिल्लियों से काफी प्रेम रहा है। लेकिन, भौतिक शास्त्र में डिग्री लेने के बाद उनका रुझान अंतरिक्ष विज्ञान की तरफ बढ़ने लगा। जब वे नेवी में लड़ाकू हैलीकॉप्टर की पायलट बनीं, तो उन्हें लगा कि वे हैलीकॉप्टर से जांबाजी दिखाने का माद्दा रखती हैं, तो अंतरिक्ष यान क्यों नहीं उड़ा सकतीं? बस, वे अपने लक्ष्य में जुट गईं। इसी के चलते जून 1998 में उनका चुनाव ‘नासा’ के अंतरिक्ष मिशन के लिए हो गया।

वे अपनी कामयाबी का श्रेय पिता से मिले भारतीय संस्कारों और जीवन-दर्शन को देना नहीं भूलतीं। अब भला बताइए! कि भारत के प्रति इतनी भावुक ह्रदय सुनीता विलियम्स को आप कैसे खांटी अमेरिकी मान सकते हैं? सुनीता कहती भी हैं कि जिसने अंतरिक्ष से दुनिया को देखा है, उसने समझ लिया है कि पूरी दुनिया वाकई में गोल है और इंसान ने ही इसको सीमाओं में बांधा है। वरना, प्रकृति ने तो दुनिया को एक ही बनाया है। वह भी तरह-तरह के रंगों से भरपूर।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

‘युवराज’ के भरोसे जमे रहेंगे बेनी बाबू!

केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा और सपा के बीच चल रही जुबानी जंग अब अंदर ही अंदर और गहराने लगी है। यह तकरार काफी दिनों से चली आ रही है। एक बार माफी मांग लेने के बाद भी जिस तरह से केंद्रीय मंत्री वर्मा, बार-बार सपा पर हमले कर रहे हैं, उससे सपा का शीर्ष नेतृत्व भी हलकान होने लगा है। उसे समझ में नहीं आ रहा कि बेनी के बहाने कांग्रेस एक खास रणनीति के तहत सपा को ‘तंग’ करा रही है या कोई और रणनीतिक खेल है? बहरहाल, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने बेनी के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाने का फैसला कर लिया है। उन्होंने संकेत दे दिए हैं कि इस मामले में कांग्रेस उनके साथ छल-कपट की राजनीति न करे। वरना, इसका नकारात्मक अंजाम कांग्रेस को ही भुगतना पड़ सकता है।

बेनी वर्मा लंबे समय तक मुलायम के खास सिपहसालार रह चुके हैं। वे प्रदेश में उनकी सरकार के दौर में खासी महत्वपूर्ण हैसियत में रहते थे। रिश्ते बिगड़े, तो दोनों नेताओं के बीच गजब की कड़वाहट भर गई है। सपा से अलग होने के बाद बेनी ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया था। वे पूर्वांचल के कद्दावार पिछड़े वर्ग के नेता हैं। कई सालों से कांग्रेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी के खास करीबी ही बन गए हैं। माना जाता है कि राहुल के खास संरक्षण के चलते तमाम विवादों के बावजूद बेनी बाबू की कुर्सी बरकरार बनी हुई है। जबकि, उनके तेवरों के चलते सरकार कई बार बड़े राजनीतिक संकट भी झेल चुकी है।

उल्लेखनीय है कि डीएमके के समर्थन वापसी के बाद यूपीए सरकार के अस्तित्व के लिए सरकार को सपा का समर्थन अपरिहार्य बन गया है। क्योंकि, अल्पमत की सरकार सपा और बसपा के बाहरी समर्थन पर ही टिकी है। लोकसभा में सपा के 22 सांसद हैं। जबकि, बसपा के 21 हैं। कुछ राजनीतिक मतभेदों के बावजूद बसपा सुप्रीमो मायावती, सरकार को मजबूती से समर्थन दे रही हैं। वे सरकार को तंग करने के राजनीतिक दांव भी नहीं चला रहीं। जबकि, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव, डीएमके के समर्थन वापसी के बाद कड़क तेवरों पर चल रहे हैं। वे लगातार मनमोहन सरकार को ‘आंख’ दिखा रहे हैं। होली के मौके पर उन्होंने इटावा के अपने पैतृक गांव में कांग्रेस की जमकर खबर ली थी। यहां तक कह दिया था कि कांग्रेस की राजनीति धोखेबाजी की रहती है। इसकी नीतियों के चलते महंगाई बढ़ी है। मनमोहन सरकार ने घोटालों और घपलों का रिकॉर्ड बना लिया है। इसके चलते अगले चुनाव में कांग्रेस का सफाया तय है। उन्होंने यह भविष्यवाणी भी कर डाली है कि एक बार फिर तीसरे मोर्चे की मिलीजुली सरकार बनने के आसार हो गए हैं। क्योंकि, जनता कांग्रेस के साथ भाजपा को भी सबक सिखा देगी।

अपनी रौ में बोलते हुए मुलायम ने भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी की तारीफ भी कर दी थी। जबकि, आम तौर पर सपा सुप्रीमो, भाजपा नेताओं की कभी सराहना नहीं करते। शायद, इसीलिए राजनीतिक हलकों में मुलायम की इस टिप्पणी के अलग-अलग राजनीतिक निहितार्थ ढूंढे जाने लगे थे। सपा के ये तेवर देखकर, कांग्रेस ने भी गिड़गिड़ाने की जगह पलटवार की रणनीति अपना ली है। कांग्रेस प्रवक्ता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने यहां तक कह दिया कि यदि मुलायम को कांग्रेस इतनी खराब लग रही है, तो वे अपना समर्थन वापस क्यों नहीं ले लेते? यह फैसला करने से क्यों डरते हैं? दिग्विजय सिंह सहित कई और नेताओं ने सपा को आड़े हाथों लेने की रणनीति अपना ली।

इस बीच बेनी वर्मा ने एक बार फिर अपने कड़क बयानों से विवाद बढ़ा दिया है। उन्होंने शनिवार को खुलकर आरोप लगाए कि मुलायम की राजनीति मुसलमानों को धोखे में रखने की रही है। चूंकि, वे दो दशक तक मुलायम के करीबी रह चुके हैं, ऐसे में उनसे ज्यादा सपा सुप्रीमो की असलियत कोई नहीं जानता है। अक्खड़ नेता बेनी   ने यहां तक कह डाला कि अंदर-अंदर मुलायम और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के बीच सांठ-गांठ रहती है। वे ऐसे तमाम मामलों को जानते हैं, जहां पर भाजपा की ‘कृपा’ पाने के लिए मुलायम ने बहुत कुछ ऐसा किया था, जिसे कोई और नहीं जानता।

इसके पहले भी बजट सत्र के दौरान बेनी ने आरोप लगाया था कि मुलायम के रिश्ते आतंकवादियों से हैं। वे वोट राजनीति के लिए मुल्क को खतरे में डाल सकते हैं। इस दौरान उन्होंने कई और अभद्र किस्म की बातें भी कह डाली थीं। इसको लेकर काफी राजनीतिक बवेला मचा था। इस मुद्दे पर लोकसभा के अंदर कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने हाथ जोड़कर मुलायम को शांत कराने की कोशिश की थी। यह भी अपील की थी कि वे बेनी बाबू को मंत्रिमंडल से हटवाने के लिए दबाव न बनाएं। कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने भी केंद्रीय मंत्री की टिप्पणियों पर खेद जताया था। इस साफ-सफाई के बाद मामला कुछ ठंडा पड़ने लगा था। लेकिन, मुलायम ने होली के मौके पर कांग्रेस को धोखेबाज करार किया, तो फिर टंटा बढ़ गया।

सपा नेतृत्व भी समझ नहीं पा रहा कि आखिर खेद जताने के बाद भी बेनी प्रसाद एक बार फिर इतने कड़े तेवर कैसे अपना रहे हैं? पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने डीएलए से अनौपचारिक बातचीत में कहा कि उन लोगों को लगने लगा है कि इसके पीछे कांग्रेस की कोई न कोई सोची समझी रणनीति जरूर है। ताकि, सपा का नेतृत्व बेनी के बयानों में ही उलझा रहे। ऐसा लगता है कि ‘बदजुबान’ नेता बेनी को कांग्रेस से पक्के संरक्षण का आश्वासन है। वरना, वे अपनी कुर्सी बार-बार दांव पर क्यों लगाते? सूत्रों के अनुसार, इस संदर्भ में सपा नेतृत्व ने रविवार को अपनी नाराजगी सोनिया के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल से जता दी है। पटेल ने भरोसा दिया है कि वे सपा की नाराजगी का संदेश आलाकमान तक पहुंचा देंगे। यह भी आश्वासन मिला है कि बेनी प्रकरण के पीछे कांग्रेस की कोई बदनीयत नहीं है। सो, वे इस मामले को दिल पर न लें।

बेनी प्रसाद के करीबी सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का पूरा विश्वास केंद्रीय मंत्री जीत चुके हैं। दो दिन पहले बेनी ने राहुल से संपर्क किया था। उन्होंने अपनी सफाई में यही कहा है कि वे साफ दिल के नेता हैं, ऐसे में खरी-खरी बातें करने की उनकी आदत है। वे कांग्रेस नेतृत्व को धोखेबाज करार करने वाले नेता की पोल खोलेंगे। वे डर कर राजनीति नहीं कर सकते। बेनी के करीबी दावा कर रहे हैं कि मुलायम चाहे जितना दबाव बना लें, लेकिन बेनी बाबू की कुर्सी हिला नहीं सकते। यदि इतना वाकई में जोखिम होता, तो शायद वे चुप्पी साधना पसंद कर लेते।
मुलायम ने अपने सिपहसालारों से कहा है कि वे बेनी के बयानों की उपेक्षा करना शुरू कर दें। जनता, ऐसे नेता को सबक सिखा दे। इसका राजनीतिक प्रबंधन मजबूत करें। सूत्रों के अनुसार, मुलायम ने विपक्ष के कई सेक्यूलर दलों से संवाद बढ़ाया है। इस काम में पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा उनकी खास मदद कर रहे हैं। देवगौड़ा के जरिए ही मुलायम सिंह ने ओडिसा के मुख्यमंत्री एवं बीजद के प्रमुख नवीन पटनायक से संपर्क साधा है। संभावना है कि जल्द ही दोनों नेताओं की मुलाकात होगी। इस सिलसिले में पहले पटनायक से देवगौड़ा मुलाकात के लिए भुवनेश्वर जाएंगे। यह अलग बात है कि मुलायम ने यू-टर्न लेते हुए कह दिया है कि वे सरकार से समर्थन वापस लेने नहीं जा रहे। क्योंकि, इससे सांप्रदायिक ताकतों को लाभ मिल जाएगा। इस आश्वासन के बाद भी कांग्रेस के लोग मुलायम की रणनीति को लेकर आशंकित हैं। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता जुबानी जंग लड़ने वाले अपने ‘योद्धा’ बेनी बाबू को बधाई भी दे रहे हैं। मुलाकातियों से बेनी कहते भी हैं कि कांग्रेस के तमाम बड़े नेता उनकी सराहना कर रहे हैं। क्योंकि, मुलायम को ललकारना हर किसी के बूते की बात नहीं है। वैसे भी, वे कुर्सी से ज्यादा राजनीतिक स्वाभिमान की कद्र करते हैं। यह भी जानते हैं कि वे केंद्रीय मंत्री मुलायम की ‘कृपा’ पर नहीं हैं। ऐसे में, दबने-डरने का सवाल नहीं है। बेनी के करीबी मंत्री जी के हौसले देखकर यही कह रहे हैं कि ‘युवराज’ की जिस पर खास इनायत हो, वह भला डरे भी तो क्यों?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

प्रतिष्ठित वागीश्वरी पुरस्कार से पंकज सुबीर, वसंत सकरगाए तथा अखिलेश पुरस्कृत

भोपाल : सरकार को चाहिए कि पुरस्कार में केवल पुस्तकें भेंट की जाए चाहे वो पहलवान को ही क्यों न दी जाए, किताब पढऩे से पहलवान कमजोर नहीं होगा किताब कभी एक्सपायर नहीं होती है और न ही यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। यह बात साहित्य अकादमी पुरस्कार से विभूषित देश के वरिष्ठ कवि श्री चन्द्रकांत देवताले ने भोपाल में मप्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन तथा मायाराम सुरजन फाउण्‍डेशन द्वारा आयोजित वागीश्वरी पुरस्कार समारोह में कही।

इस अवसर पर कथाकार पंकज सुबीर, लेखक चित्रकार अखिलेश तथा युवा कवि वसंत सकरगाए को समारोह पूर्वक वागीश्वरी पुरस्कार प्रदान किया गया। भोपाल स्थित राष्‍ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण एवं शोध संस्‍थान के सभागार में दिनांक 30 मार्च 2013 को आयोजित गरिमामय कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए श्री चन्द्रकांत देवताले ने कहा कि रचनाकारों का सम्मान करना जरुरी है इससे उनका हौसला बढ़ता है साथ ही इस बात का भी पता चलता है कि समाज की निगाह उनके लेखन पर है। साथ ही रचनाकारों को भी ये समझना चाहिये कि पुरस्‍कार एवं सम्‍मान एक बड़ी चुनौती होती है अपने आप के लिये।

कार्यक्रम के मुख्‍य अतिथि पूर्व पुलिस महानिदेशक आरपी मिश्रा ने वरिष्ठ पत्रकार मायाराम सुरजन फाउण्डेशन द्वारा हिन्दी साहित्य जगत के लिए किए जा रहे कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि स्व. मायाराम जी के कार्यों को जनता तक पहुंचाना हम सभी का दायित्व बनता है अच्छी बातों को सदा समाज तक पहुंचना ही चाहिए। सुप्रसिद्ध कवि श्री प्रयाग शुक्‍ल ने कहा कि मायाराम सुरजन फाउण्डेशन का कार्य काफी सराहनीय है कला से जुड़े लोगों में संवाद और भी बढऩा चाहिए भोपाल में जो वातावरण है वो देश में कहीं और दिखाई नहीं देता है। इससे पहले मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के नव निर्वाचित अध्यक्ष पलाश सुरजन का पुष्‍प गुच्‍छ भेंट कर स्‍वागत किया गया।

सम्‍मेलन के महामंत्री प्रो विजय अग्रवाल ने कार्यकम की जानकारी प्रदान की। मायाराम सुरजन फाउण्डेशन के प्रबंध न्यासी ललित सुरजन ने मायाराम सुरजन फाउण्डेशन द्वारा किए जा रहे कार्यों के बारे में विस्‍तार से चर्चा की । कार्यक्रम में कथाकार पंकज सुबीर को उनके उपन्‍यास ये वो सहर तो नहीं हेतु, लेखक चित्रकार अखिलेश को उनकी पुस्‍तक दरसपोथी तथा युवा कवि वसंत सकरगाए को काव्‍य संग्रह निगहबानी में फूल के लिये वागीश्वरी पुरस्कार प्रदान किया गया। तीनों को पुरस्‍कार के रूप में शाल श्रीफल सम्‍मान पत्र तथा इक्‍यावन सौ रुपये की सम्‍मान राशि प्रदान की गई।

इस अवसर पर अक्षर पर्व के स्‍व. मायाराम सुरजन पर केन्द्रित विशेषांक तथा मप्र हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन द्वारा वागीश्‍वरी पुरस्‍कार पर विशेष रूप से प्रकाशित विवरणिका का विमोचन अतिथियों द्वारा किया गया। अक्षर पर्व की संपादक सर्वमित्रा सुरजन ने विमोचन कराते हुए अक्षर पर्व की जानकारी दी। कार्यक्रम का संचालन साहित्यकार श्री मुकेश वर्मा द्वारा किया गया, आभार वसुधा संपादक राजेन्‍द्र शर्मा ने व्यक्त किया। कार्यक्रम में मायाराम सुरजन फाउण्डेशन द्वारा बनाई गई वेव साइट का भी लोकापर्ण किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्‍या में साहित्‍यकार उपस्थित थे।

समाचार संकलन- चन्‍द्रकांत दासवानी

बाल आयोग पीआईएल में प्रमुख सचिव हाई कोर्ट तलब, एक माह में आयोग गठन का आश्वासन

बाल अधिकार सुरक्षा आयोग अधिनियम 2005 के अनुसार उत्तर प्रदेश में राज्य बाल आयोग नहीं बनने के सम्बन्ध में सामाजिक कार्यकर्त्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा दायर पीआईएल में इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच ने अत्यंत ही सख्त रूख लेते हुए प्रमुख सचिव, समाज कल्याण सदाकांत को तलब किया.

प्रमुख सचिव ने हाई कोर्ट को आश्वासन दिया कि एक माह के अंदर राज्य बाल आयोग का गठन कर दिया जाएगा. जस्टिस उमा नाथ सिंह और जस्टिस डॉ सतीश चंद्र की बेंच ने प्रमुख सचिव को यह भी आदेशित किया कि इस सम्बन्ध में राज्य सरकार द्वारा बनाए जा रहे नियम के ड्राफ्ट कोर्ट के सामने प्रस्तुत किये जाएँगे. कोर्ट ने अगली सुनवाई 22 अप्रैल को नियत करते हुए सदाकांत को पुनः कोर्ट के सामने पेश हो कर प्रगति से अवगत कराने को कहा है.

इस अधिनियम की धारा 17 में प्रत्येक राज्य में एक बाल आयाग बनाए जाने की बात कही गयी है. इसके अलावा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 की धारा 44 में भी प्रावधान है कि बाल यौन शोषण तथा बच्चों को पोर्नोग्राफी में प्रयोग किये जाने पर अंकुश लगाए जाने के कार्यों का पर्यवेक्षण राज्य बाल आयोग द्वारा किया जाएगा.

बहुत सारे राज्यों में इस तरह के आयोग गठित किये जा चुके हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में बाल आयोग अब तक गठित नहीं किया गया है.  अतः ठाकुर ने इस पीआईएल में यूपी में भी तत्काल बाल आयोग गठित किये जाने की मांग की है.

न्यूज चैनल को सीसीटीवी फुटेज देने वाला सिपाही लाइन हाजिर

नई दिल्ली : दीपक भारद्वाज हत्याकांड में हत्यारों के सीसीटीवी फुटेज एक न्यूज चैनल को मुहैया कराने वाले वसंतकुंज थाने के सिपाही अरविंद डबास को लाइन हाजिर कर दिया गया है। साथ ही उसके खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं। इस मामले में एक इंस्पेक्टर व एक सब-इंस्पेक्टर की भी भूमिका सामने आ रही थी किंतु जांच के बाद उन्हें क्लीनचिट दे दी गई। जांच में पता चला कि अरविंद डबास ने ही गुपचुप तरीके से सीसीटीवी फुटेज मुहैया कराई थी। न्यूज चैनल की महिला पत्रकार को वह 2006 से जानता है।

इस वाकये से थाना पुलिस की भी बहुत बड़ी लापरवाही उजागर हुई थी कि सीसीटीवी फुटेज पर इंस्पेक्टरों का नियंत्रण कैसे नहीं था। 26 मार्च को घटना वाले दिन जब दोनों हत्यारे दीपक भारद्वाज की हत्या कर हाथों में पिस्टल लहराते पैदल गेट की तरफ भाग रहे थे, और कार चालक कार गेट तक लाया था, तब दोनों शूटरों व कार की तस्वीर गेट पर लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई थी। पुलिस की कई टीम मामले की छानबीन कर ही रहीं थी कि सिपाही ने पांच घंटे के अंदर आरोपियों की सीसीटीवी फुटेज एक महिला पत्रकार को पेन ड्राइव से मुहैया करा दी थी। इससे पहचान उजागर होने से हत्यारे भूमिगत हो गए थे। इस कारण पुलिस को इन्हें पकड़ने में परेशानी आई।

Ethiopia: UN Calls for Immediate Release of Jailed Journalist Eskinder Nega

For Immediate Release: UN Finds Imprisonment of Ethiopian Journalist Eskinder Nega Arbitrary under International Law and Calls for Immediate Release : Washington, D.C. : In an opinion released today by Freedom Now, the UN Working Group on Arbitrary Detention found the Government of Ethiopia’s continued detention of independent Ethiopian journalist and blogger Eskinder Nega a violation of international law. The panel of five independent experts from four continents held that the government violated Mr. Nega’s rights to free expression and due process. The UN Working Group called for his immediate release.

Mr. Nega is serving an 18-year prison sentence on terror and treason charges in response to his online articles and public speeches about the Arab Spring and the possible impact of such movements on the political situation in Ethiopia. Arrested in September 2011, Mr. Nega was held without charge or access to an attorney for nearly two months before authorities charged him under Ethiopia’s widely criticized anti-terror laws. This is the eighth time during his 20-year career as an independent journalist and publisher that the Ethiopian government has detained Mr. Nega. His appeal has been repeatedly postponed, most recently on March 27, 2013.

In the attached opinion, released in conjunction with an op-ed by the renowned Ethiopian opposition leader and former prisoner of conscience Birtukan Mideksa, the UN Working Group found that the application of overly broad anti-terror laws against Mr. Nega constituted an “unjustified restriction” on his right to freedom of expression. The UN Working Group’s opinion also recognized “several breaches of Mr. Nega’s fair trial rights,” further rendering his continued detention arbitrary under international law.

“The Ethiopian government cannot continue to use anti-terrorism legislation to muzzle the work of independent journalists, even when it does not like what is being reported,” said Freedom Now Executive Director Maran Turner. “The targeting of journalists by resorting to overly broad anti-terror laws, just like the use of anti-state charges in the pre-9/11 era, is a violation of the internationally protected right to free expression and undermines international efforts to address real security threats.”

Freedom Now represents Mr. Nega as his international pro bono counsel.

बिहार में नीतीश कुमार किसी पत्रकार को भी भेजेंगे विधान परिषद!

आगामी एक-दो माह में बिहार विधान परिषद की रिक्त पड़ी 15 सीटों का भरा जाना है। इसके लिए कवायद भी तेज हो गई है। इसमें 12 राज्यपाल कोटे की सीटें हैं, जबकि तीन विधान सभा कोटे की सीटें हैं। ये सभी सीटे जदयू -भाजपा के खाते में ही जाएंगी। सवाल है कि क्या इनमें से एकाध सीट पत्रकारों को भी नसीब होगी। इसको लेकर पटना के राजनीतिक व मीडिया के गलियारे में चर्चा हो रही है। नामों को लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं। इसमें सबसे ज्यादा चर्चा राजपूज जाति के एक पत्रकार को लेकर हो रही है। इसके अलावा भी कुछ पत्रकार हैं, जो चर्चा में हैं।

हालांकि गया के एक वरीय पत्रकार इन संभावनाओं को खारिज करते हैं। उनका कहना है कि नीतीश कुमार ने तीन कसमें खार्इं हैं। पहली कसम है कि भूमिहारों को नहीं छेड़ना है। दूसरी कसम है कि नौकरशाहों  की मनमानी पर कोई अंकुश नहीं लगाना है और तीसरी कसम है कि अब किसी पत्रकार या बुद्धिजीवी को राज्यसभा या विधान परिषद में नहीं भेजना है। अब देखना है कि अखबारों को विज्ञापन का चासनी देने वाले नीतीश कुमार क्या पत्रकारों को सत्ता की मलाई भी देंगे।

राजस्थान पत्रिका के बैनर और केनोपी को आयोजन स्थल से हटाना पड़ा

सूरत। राजस्थान युवा संघ, सूरत द्वारा पिछले दिनों फागोत्सव आयोजित कराया गया था. सूरत में राजस्थान के प्रवासी परिवार राजस्थान पत्रिका के पाठकों में सबसे बड़ा वर्ग है. राजस्थान युवा संघ भी राजस्थान के प्रवासियों का यहां सबसे बड़ा संगठन है. इस संगठन की हैसियत इस बात से समझी जा सकती है कि युवा संघ द्वारा राजस्थान मानव सेवा चिकित्सालय के नाम से पांच करोड़ का प्रकल्प निर्माणाधीन है जहां रियायती दरों पर इलाज की सभी आधुनिक सुविधाएं सुलभ करवाई जाएंगी.

राजस्थान युवा संघ ने होली के अवसर पर चार दिवसीय फागोत्सव का आयोजन किया जिसमें चार दिन राजस्थान के अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातनाम कलाकारों ने लोक संस्कृति के रंग बिखेरे। फागोत्सव में रोजाना बीस से पच्चीस हजार प्रवासी राजस्थानी शरीक हुए। जैसा कि पत्रिका प्रबंधन की नीति रही है, मुफ्त में प्रचार के लिए स्थानीय सम्पादकजी ने आनन-फानन में दस-बीस बैनर भिजवाये और कार्यक्रम स्थल पर मुख्य द्वार के पास केनोपी भी लगवा दी।

पत्रिका टीम ने मुख्य द्वार के आसपास जगह-जगह नम्बर वन अखबार और दक्षिण गुजरात की धड़कन राजस्थान पत्रिका के बैनर टंगवा दिए। लेकिन जैसे ही आयोजन समिति के मुख्य लोगों को इसकी भनक लगी तो उन्होंने बिना देरी किए न केवल बैनर हटवा दिए बल्कि केनोपी को भी उतरवा दिया। इतना ही नहीं, उन पर सम्पादकजी की नाराजगी का भी असर नहीं हुआ।

स्वतंत्र मिश्रा पर संतोषी माता की भरपूर कृपा, सुब्रत राय ने दिया अभयदान

तंत्र-मंत्र, मारण, तारण समेत कई तरह के जाप, महाजाप, श्राप आदि कराने वाले स्वतंत्र मिश्रा पर संतोषी माता की अदभुत कृपा है. अपने सीनियर का क्रेडिट कार्ड चोरी करके उससे भरपूर खरीदारी करने और सुबूतों-साक्ष्यों के जरिए पकड़े जाने के बाद भी उनका बाल तक बांका नहीं हो सका है. सुब्रत राय ने भी उन्हें अभयदान दे दिया है. उन्होंने इसे निजी मामला बताकर इगनोर कर दिया है.

मतलब ये कि आप संस्थान की चोरी न करें, बाकी चाहें किसी का कुछ भी उड़ा दें, छेड़ दें, छीन लें… ये सारा निजी मामला माना जाता है सहारा में. हालांकि इसी सहारा में ऐसी भी नजीर है कि दो चार सौ रुपये के इधर उधर के लिए रेजीडेंट एडिटर्स तक की नौकरी चली गई. पर स्वतंत्र मिश्रा अपवाद हैं क्योंकि वह सहारा मीडिया के चार पांच सेनापतियों में से एक प्रमुख सेनापति हैं.

चौबीस हजार करोड़ रुपये के घनचक्कर में फंसे सहारा समूह के लिए भला डेढ़ लाख रुपये की चोरी से की गई खरीदारी क्या मामला हो सकता है. इस तरह की चोरी के लिए सहारा समूह अपने प्रमुख सेनापतियों में से एक को किनारे नहीं करना चाहता. इसी कारण सुब्रत राय ने पूरी मेहरबानी दिखाई और स्वतंत्र मिश्रा को अभयदान दे दिया. कल स्वतंत्र मिश्रा सहारा नोएडा के आफिस में सुब्रत राय के पिताजी की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में सहारा मीडिया हेड संदीप वाधवा के साथ आए और वाधवा के अनुरोध पर सुब्रत राय के पिताजी के बारे में दो शब्द बोले. उनको बोलते देख सहारा कर्मियों में तरह तरह की चर्चाएं शुरू हो गई. पर कहा जाता है न कि, समरथ को नहीं दोष गुसाईं.

”सर की वजह से महिलाओं का काम करना कठिन हो रहा है, मैं क्या करूं”

यशवंत सर नमस्ते.. सर मैं आपको ये बहुत परेशान होकर खत लिख रही हूं. मैंने जिस दिन से …… चैनल ज्वाइन किया, यहां पर कार्यरत सीनियर बहुत परेशान कर रहे हैं. मुझे पहले मौसम की एंकरिंग दी गई, अब मुझे न्यूज की एंकरिंग के लिए ….. सर परेशान कर रहे हैं. रोज मुझे साथ घूमने के लिए परेशान कर रहे हैं. अब क्या करूं. समझ भी नहीं आ रहा है. मीडिया में जाब भी आसानी से नहीं मिलती है. मीडिया में …. सर की वजह से महिलाओं का काम करना कठिन हो रहा है. मुझे आप जैसे लोगों की मदद चाहिए. plz ये खबर प्रकाशित करें, परंतु मेरा नाम न लिखें. मेरा करियर खराब हो जाएगा. इसके अलावा ….. चैनल में और भी लोग हैं…

एक महिला पत्रकार

नए लांच हुए एक चैनल में कार्यरत

(चैनल का नाम,  महिला पत्रकार का नाम और परेशान करने वाले वरिष्ठ पत्रकारों का नाम हटा दिया गया है ताकि किसी की पहचान उजागर न हो. ऐसा महिला पत्रकार के अनुरोध पर किया गया है.)


उपरोक्त पत्र पर भड़ास के एडिटर यशवंत द्वारा महिला पत्रकार को भेजा गया जवाब…

आप अपनी सीमारेखा खुद तय करें और उसके प्रति अपने वरिष्ठों-कनिष्ठों को सावधान कर दें. जो लक्ष्मण रेखा पार करे, उसे तुरंत दो झापड़, कंटाप, लाफा, लप्पड़ दे दो. करियर की चिंता मत करो. अगर तुमने लप्पड़ लगा दिया तो तुम्हारी आगे की नौकरी की गारंटी मैं देता हूं. बाकी, तुम्हारे जैसी ढेरों लड़कियां हैं जो करियर के चक्कर में अपना ईमान और जीवन खराब कर लेती हैं. करियर कोई अलग-थलग चीज नहीं है.

अगर तुम्हारे भीतर खुद के प्रति अभिमान, प्यार और ईमानदारी बाकी है तो तुम करियर व जाब की चिंता छोड़ दो, खुद के प्रति निष्ठावान रहो. जो तुम्हारे जीवन से खेले, तुम उसके गले से खेल जाओ और मौका मिलते ही दबा दो. देखना, सब ठीक हो जाएगा. पूरा मामला विस्तार से बताओ तो समझ में आएगा कि हुआ क्या है और इसमें क्या किया जा सकता है. पर एक चीज ध्यान रखना, जीवन में 'नहीं' कहना और 'मना' करना जरूर सीख लो, वरना हर कोई तुम्हारा हर मोड़ पर शोषण करेगा.

आभार
यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

न्यूज एक्सप्रेस के यूपी हेड बनाए गए योगेश मिश्र

लखनऊ से सूचना मिली है कि योगेश मिश्र को न्यूज एक्सप्रेस चैनल का यूपी ब्यूरो चीफ बनाया गया है.  योगेश मिश्र नई दुनिया समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके हैं. बताया जाता है कि योगेश मिश्र की नियुक्ति हो चुकी है पर इसकी आधिकारिक तौर पर घोषणा अभी नहीं की गई है.

उधर, न्यूज एक्सप्रेस के ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य देख रहे राजकुमार सिंह के बारे में कयासों का बाजार गर्म है. कुछ लोग कह रहे हैं कि उन्होंने चैनल से इस्तीफा दे दिया है वहीं कुछ का कहना है कि अभी तक उन्होंने इस्तीफा दिया नहीं है, पर दे सकते हैं. इस बारे में खुद राजकुमार सिंह ने बताया कि वे चैनल के हिस्से बने हुए हैं. उनके इस्तीफे से संबंधित सूचनाएं निराधार हैं.

मीडिया के अंदरखाने की हलचलों को आप भड़ास तक bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं. सूचना भेजने वालों का नाम हमेशा गोपनीय रखा जाएगा.

चिटफंड गणित… मान गए बाबू मोशाय…

Prakash Hindustani : गणित के शिक्षक मदद करें. चौबीस हज़ार करोड़ कितने होते हैं? कितने शून्य 24 के बाद? मेरे ज्ञान से 24000 के बाद सात शून्य 0000000. यानी 24000,0000000. अब अगर 1000 गाँवों में भी एक एक करोड़ लगा दें कितने कितने लगेंगे? 1000 करोड़. अब 24000,0000000 में से 1000,0000000 घटा दें तो भी कितने बचेंगे, मेरे गणित ज्ञान से 23000,0000000 करोड़.

अब इसमें से विज्ञापनबाज़ी के दो चार करोड़ और अन्न प्राशन्न पार्टी का खर्च एकाध करोड़ और जोड़ लो तो भी तेईस हज़ार करोड़ के आसपास की रकम बची. 23000 करोड़ (23000,0000000) हज़म! मान गए बाबू मोशाय. आ गा मा का का जू जै पा…..

वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश हिंदुस्तानी के फेसबुक वॉल से.

चैनल वन से उदय सिन्हा का नाता टूटा, युसूफ अंसारी भी आफिस नहीं जा रहे

खबर है न्यूज चैनल 'चैनल वन' से वरिष्ठ पत्रकार उदय सिन्हा ने अपना नाता तोड़ लिया है. 31 मार्च उनका अंतिम वर्किंग डे था. उदय सिन्हा कई बड़े अखबारों व चैनलों में एडिटर रह चुके हैं. वे नया क्या करने वाले हैं, इसकी जानकारी नहीं मिल सकी है. सूत्रों के मुताबिक उदय सिन्हा जल्द ही अपनी नई पारी की शुरुआत किसी दूसरे मीडिया हाउस के साथ कर सकते हैं.

उधर, वरिष्ठ पत्रकार युसूफ अंसारी के भी चैनल वन से रुठे रुठे रहने की खबर मिली है. बताया जाता है कि वे काफी दिनों से आफिस नहीं आ रहे थे. उल्लेखनीय है कि युसूफ अंसारी की ये दूसरी पारी चैनल वन के साथ थी. इसी तरह उदय सिन्हा की भी ये दूसरी पारी थी क्योंकि बीच में उन्होंने भी काफी समय के लिए आफिस जाना बंद कर दिया था और बाद में फिर से चैनल वन से जुड़ गए थे. चर्चा है कि चैनल वन प्रबंधन की बातचीत सहारा समेत कई चैनलों में काम कर चुके संजय पाठक से चल रही है और सब कुछ स्मूथ रहा तो संजय पाठक चैनल वन के साथ नई पारी की शुरुआत कर सकते हैं. हालांकि इसकी अभी आधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है.

नई दुनिया के हिस्से बने अनिल जैन और अरविंद तिवारी

नई दुनिया अखबार में दो पत्रकारों के ज्वाइन करने की सूचना है. अनिल जैन, जो कि पहले नेशनल दुनिया, दिल्ली में थे, अब नई दुनिया से जुड़ गए हैं. अनिल जैन कई अखबारों में काम कर चुके हैं. उधर, इंदौर में नई दुनिया अखबार में अरविंद तिवारी के ज्वाइन करने का समाचार है. अरविंद तिवारी इसके पहले दबंग दुनिया अखबार, इंदौर में हुआ करते थे. इंदौर प्रेस क्लब के महासचिव भी हैं अरविंद तिवारी.

आवाजाही संबंधी सूचनाएं भड़ास तक bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

शहीद डिप्टी एसपी की पत्नी परवीन बोलीं- भगोड़े पुलिस वालों पर चले देशद्रोह का मुकदमा

: कुंडा में शहीद डिप्टी एसपी की पत्नी ने कहा कि न्याय न मिलने पर आंदोलन होगा : इलाहाबाद। कुंडा में ट्रिपल मर्डर में शहीद डिप्टी एसपी जियाउल हक की विधवा परवीन आजाद ने भगोड़े पुलिस कर्मियों पर राश्ट्रदोह का मुकदमा दर्ज कर उन्हें कड़ी सजा देने की मांग की है। कहा है कि जिस तरह जंग के समय भगोड़े सैनिकों पर राष्ट्रदोह का मुकदमा किया जाता है, उसी तरह कुंडा में वारदात के समय जियाउल हक का साथ छोड़कर भागने वाले पुलिस कर्मियों को भी दंडित किया जाना चाहिए। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि ऐसा न होने पर वे आंदोलन करने को मजबूर होंगी। जरूरत पड़ने पर अनशन भी कर सकती हैं।

परवीन आजाद रविवार को अपने पति जियाउल हक का घरेलू सामान देवरिया ले जाने के लिए कुंडा आईं थी। मीडिया से मुखातिब परवीन के तेवर काफी तल्ख थे। उन्होंने कहा, वारदात के समय डिप्टी एसपी के साथ जाने वाले पुलिसकर्मियों के पास असलहे थे। इसके बावजूद वे लोग दुम दबाकर भाग निकले। जियाउल हक तीन घंटे सड़क पर घायल अवस्था में तड़पते रहे। अगर समय पर इलाज मुहैया करा दिया जाता तो शायद उनकी जान बच जाती।

इस बीच अचानक भावुक हुई परवीन ने रूंधे गले से कहा कि उनकी लड़ाई केवल अपने पति के लिए ही नहीं बल्कि एक जाबांज पुलिस अफसर की शहादत को उनके मुकाम तक पहुंचाने के लिए भी है। इसके लिए वे ज्यादा इंतजार नहीं कर सकती। इसके पूर्व सीबीआई टीम की देखरेख में वे अपने पति के सरकारी आवास में गईं। वहां उनकी निजी डायरी व अन्य कई सामानों को हासिल किया। सीबीआई ने उनसे कई घंटे पूछताछ की। सामानों को पैक कराने के बाद ट्रक से उनके घर देवरिया भेजा गया।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट

मदिरा ने मेरठ के प्रतिभाशाली फोटो जर्नलिस्ट की जान ली

चीकू-काजू नाम से मशहूर दो भाइयों में से एक काजू उर्फ अमित कौशिक की मृत्यु हो गई. मेरठ के आनंद अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांसें ली. वे काफी दिनों से इस अस्पताल में भर्ती थे और डायलिसिस पर चल रहे थे. उनके लीवर में समस्या था. पीलिया में भी मदिरा पान करना उनके लिए काफी भारी पड़ गया. वे रेगुलर व हेवी ड्रिंकर थे.

उनकी उम्र चालीस-पैंतालीस के आसपास रही होगी. उन्होंने कई अखबारों में काम किया. आखिरी दिनों में वे आई-नेक्स्ट टैबलायड को तस्वीरें और सहारा समय चैनल को वीडियो दिया करते थे. पिछले छह सात महीनों से बीमारी के कारण कुछ नहीं कर पा रहे थे. उनकी एक किशोर उम्र की बेटी है. पत्नी मेरठ विश्वविद्यालय में कर्मचारी हैं. काजू के निधन से मेरठ के पत्रकारों व गैर-पत्रकारों में शोक का माहौल है.
 

‘द न्यूज’ चैनल का समापन समारोह हो गया!

जानकारी के मुताबिक बृजेश निगम द्वारा चलाये जा रहे न्यूज़ चैनल 'द न्यूज़' का समापन समारोह हो गया… बृजेश निगम के ऊपर काफी कर्जा है… दिल्ली की एक महिला का लगभग दो करोड़ रुपए फंस गए हैं… उसे पैसे लौटाने में बृजेश निगम आनाकानी कर रहे हैं और महिला पैसा वापसी के लिये भटकने को मजबूर है… इसी कारण बृजेश निगम ने तुरन्त फुरन्त में अपना बोरिया बिस्तर समेट लिया…

जानकारी मिली है कि जनाब अब कोई 'महिमा' नाम का चैनल नोएडा में शुरू करने जा रहे हैं…  दोस्तों बच के रहना, काफ़ी लोग इसके चंगुल में फंस कर अपना पैसा और समय बर्बाद कर चुके हैं… मैं भी अपना पैसा और समय बर्बाद कर चुका हूं… आप सभी लोगों से निवेदन है कि ऐसे लोगों से सावधान रहें…. बृजेश निगम द्वारा चलाये जा रहे न्यूज़ चैनल द न्यूज़ का समापन हो गया दो दिन पहले निगम द्वारा ऑफिस से सारा सामान समेट लिया गया है…

सुशील खरे
Sushil Khare
irdsddn@gmail.com

मनमोहन सिंह ने अपना इस्तीफा नरेंद्र मोदी को सौंपा!

Mayank Saxena : ख़बर है कि मनमोहन सिंह ने पश्चाताप और अपराध बोध में अपना इस्तीफा नरेंद्र दामोदर दास मोदी को सौंप दिया…इस दौरान ओवैसी और तोगड़िया भी मौजूद थे…नरेंद्र भाई इतने भावुक हो गए, कि रोते हुए प्रण लिया कि जब तक मनमोहन सिंह ज़िंदा हैं, वो पीएम नहीं बनेंगे…इसे देख सोनिया गांधी एक बार फिर रोते हुए राहुल गांधी के पास पहुंची…और कहा कि बेटा अब तो तू पीएम बनने से रहा…ऐसा कर वापस विदेश जा और पढ़ाई ही पूरी कर ले…शादी कर और पीएम नहीं तो पति ही बन जा…

बाबा रामदेव ने इस बात पर तय किया कि वो बेबी बाबा को योग सिखाएंगे और उनका खोया पौरुष वापस लाएंगे…लेकिन बाबा, सड़क किनारे वाले तम्बू में शरण लिए हैं, जिसके बाहर हिमालयी दवाखाना लिखा है…संजय पुत्र वरुण ने कहा है कि नरेंद्र मोदी के बाद पीएम पद के उम्मीदवार वही हो सकते हैं, क्योंकि मौका मिला तो वो भी क़त्लोगारत करवा सकते हैं…उनके पापा को भी मौका मिला होता तो…इन सबके बीच राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज और लालकृष्ण आडवाणी की अरुण जेटली के घर पर बैठक चल रही है कि आखिर उनमें से पीएम पद का उम्मीदवार कौन होगा…आडवाणी का कहना है कि पीएम बनने से ज़्यादा ज़रूरी है पीएम पद का उम्मीदवार होना…वेटिंग क्लीयर हो न हो…डब्बे में चढ़ने को तो मिल ही जाता है…

पत्रकार मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.

अप्रैल फूल

कुंडा ट्रिपल मर्डर में भाड़े के शूटरों का इस्तेमाल?

: सीबीआई ने चार शूटरों के स्केच बनवाए, पूर्व सांसद गोपाल से कई घंटे पूछताछ : इलाहाबाद। कुंडा के चर्चित ट्रिपल मर्डर केस में क्या भाड़े के शूटरों का इस्तेमाल किया गया। फिलहाल, सीबीआई की जांच अब इसी लाइन पर आगे बढ़ रही है। उसका शक अब यकीन में बदलने लगा है। टीम मान रही है कि ग्रामप्रधान नन्हे यादव का मर्डर भाड़े के शूटरों ने किया। चार शूटरों के स्केच तैयार कर  लिए गए हैं।

याद दिला दें कि 2 मार्च को प्रतापगढ़ जिले के कुंडा के निकट बलीपुर चौराहे पर ग्रामप्रधान नन्हे यादव, उसके भाई सुरेश यादव की हत्या कर दी गई थी। थोड़ी देर बाद मौके पर पुलिस बल के साथ पहुंचे डिप्टी एसपी जियाउल हक को भी गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया था। उनकी सर्विस रिवाल्वर, मोबाइल भी हमलावर उठा ले गए। नन्हे यादव की हत्या के लिए कामता पाल को जिम्मेदार मानकर उनका मकान फूंक दिया गया।

कई घंटे तक चले तांडव के दौरान इलाके में कानून, सरकार, पुलिस व्यवस्था का अता-पता नहीं था। अराजक तत्वों की गोलियों की तड़तड़ाहट से इलाका थर्रा उठा। इतना ही नहीं, ‘भीड़’ के कब्जे में कई घंटे तक डिप्टी एसपी की लाश रही। उनके साथ गए सशस्त्र पुलिसकर्मी खेतों में छिपे रहे। चार घंटे बाद पुलिस गांव में प्रवेश इस घटना ने प्रदेश की कानून व्यवस्था को हिलाकर रख दिया।

आरोप के घेरे में फंसे यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री व चर्चित बाहुबली रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया का मंत्री पद छिन गया। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को ग्रामप्रधान नन्हे यादव के घर आना पड़ा। कुंडा कांड लगातार कई दिनों तक मीडिया की सुर्खियां बन देश के कोने-कोने में छाया रहा। घटना की जांच सीबीआई को सौंपी गई। करीब एक सप्ताह बाद सीबीआई अफसरों की टीम ने कुंडा में डेरा डाल दिया। टीम की छानबीन में पुलिस के कई दारोगा, राजा भैया और उनके खास माने जाने वाले करीब आधा दर्जन लोग फंसे। कई राउंड पूछताछ के बाद सीबीआई ने अभी भी उन्हें निशाने पर रखा है।

29 मार्च को सीबीआई टीम बलीपुर चौराहे पहुंची। यहां से चार दुकानदारों टी स्टाल चलाने वाले गोलई पटेल, उसके बगल स्थित टी स्टाल के दुकानदार चोखेलाल, हेयर ड्रेसर कामता और चौराहे पर रहने वाले विश्णु राजा को बुलाकर घटना की बाबत पूछताछ की। ये चारों घटना के चश्मदीद बताए जा रहे हैं। थोड़ी देर बाद सीबीआई उन चारों को साथ लेकर गंगा के बंधे पर पहुंची। 

सूत्रों के अनुसार, यहां घटों दुबारा पूछताछ के बाद सीबीआई अफसरों ने चार शूटरों के स्केच तैयार कराया है। इस दौरान घटना के समय की परिस्थितियां, हमला के तरीके, हमलावरों के आने और जाने आदि से संबंधित कई तरह के सवाल विस्तार से किए गए। इसके अलावा सीबीआई ने 30 मार्च की शाम को राजा भैया के करीबी व पूर्व सांसद अक्षय प्रताप सिंह उर्फ गोपालजी को कुंडा कैंप कार्यालय में बुलाकर ढाई घंटे तक लंबी पूछताछ की है।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट

प्रिंट और वेब वालों की बदमाशी पर सफाई टीवी पर आकर देंगी अभिनेत्री दीप्ति नवल

मुंबई। फिल्म अभिनेत्री दीप्ति नवल अपने बयान को सनसनीखेज खबर बनाकर छापने के लिए एक न्यूज पेपर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगी। दरअसल दीप्ति ने अपने किसी पत्रकार दोस्त से अपनी कुछ बातें शेयर की थीं। जिसे टेबलायड समाचार पत्रों द्वारा सनसनीखेज खबर बनाकर प्रकाशित किया गया। इस मामले के एक सप्ताह बाद अभिनेत्री दीप्ति नवल कानूनी कार्रवाई पर विचार कर रही हैं। इसके लिए दीप्ति सबसे पहले किसी विश्वसनीय टेलीविजन चैनल के सामने यह बताना चाहती हैं कि कैसे मीडिया के एक वर्ग ने सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर पेश किया।

दीप्ति ने कहा, कि मैं जरूर कार्रवाई करूंगी, क्योंकि जो भी कुछ हुआ, वह गलत और नुकसानदेह है। मैंने सच्ची भावना से एक पत्रकार दोस्त से अपनी परेशानी बताई थी कि कैसे मेरे हाउसिंग सोसायटी के सदस्यों ने टेलीविजन साक्षात्कार की अनुमति नहीं दी। मैंने पत्रकार को साक्षात्कार नहीं दिया। अगली सुबह एक समाचार पत्र ने 'प्रास्टीट्यूशन रैकेट' शीर्षक से खबर छाप दी। अब वेबसाइटों पर इस खबर को भी तोड़-मोड़कर नई खबर प्रकाशित की गई है। नई खबर में ऐसा आशय बाहर आता है कि मुझे देह व्यापार का रैकेट चलाने के लिए अपने घर से निकाल दिया गया है। यह सब शर्मनाक और प्रतिष्ठा के खिलाफ है। इससे यह भी पता चलता है कि कैसे मीडिया का एक वर्ग सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर पेश कर सकता है।

दरअसल, हाउसिंग सोसाइटी के मेंबर्स के साथ कहा-सुनी होने की खबर को टैबलायड ने सनसनीखेज खबर की तरह छाप दिया था। दीप्ति ने कहा, 'मैं जरूर कार्रवाई करूंगी। क्योंकि जो भी कुछ हुआ, वह गलत और नुकसानदेह है। मैंने सच्ची भावना से एक पत्रकार दोस्त से अपनी परेशानी बताई थी कि कैसे मेरे हाउसिंग सोसायटी के मेंबर्स ने टेलिविजन इंटरव्यू की परमिशन नहीं दी। मैंने पत्रकार को इंटरव्यू नहीं दिया। अगली सुबह एक अखबार ने 'प्रॉस्टिट्यूशन रैकिट' टाइटल से खबर छाप दी। अब वेबसाइटों पर इस खबर को भी तोड़-मोड़कर नई खबर पब्लिश की गई है। नई खबर लगता है कि मुझे देह व्यापार का रैकेट चलाने के लिए अपने घर से निकाल दिया गया है। यह सब शर्मनाक और प्रतिष्ठा के खिलाफ है। इससे यह भी पता चलता है कि कैसे मीडिया का एक वर्ग सचाई को तोड़-मरोड़ कर पेश कर सकता है।'
 

नीलकंठ पारटकर ‘दबंग दुनिया’ में, नवभारत में सुरेंद्र मिश्र को प्रमोशन

मुंबई : पीटीआई के पूर्व वरिष्ठ पत्रकार व मेट्रो 7 डेज के संपादक नीलकंठ पारटकर हिंदी दैनिक दबंग दुनिया के संपादक नियुक्त किए गए हैं। दबंग दुनिया इस माह के मध्य मुंबई से प्रकाशित होने वाला है और इसके लिए मीडियाकर्मियों की चयन प्रक्रिया चल रही है।

मुंबई से प्रकाशित हिंदी दैनिक नवभारत के संवाददाता सुरेंद्र मिश्र को पदोन्नत कर विशेष संवाददाता के रूप में नियुक्त किया गया है। सुरेंद्र मिश्र पिछले 7 वर्षों से नवभारत में कार्यरत हैं और कई वर्षों से मंत्रालय की रिपोर्टिंग कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में जौनपुर के निवासी श्री मिश्र पिछले एक दशक से अधिक से पत्राकरिता कर रहे हैं। नवभारत से पहले पंजाब केसरी (मुंबई) तथा आज (वाराणसी) में कार्य कर चुके हैं।  

इस बीच नवभारत के संवाददाता विजय सिंह कौशिक दैनिक भास्कर में तथा विजय यादव ने एशियर एज ज्वाइन कर लिया है। विजय सिंह कौशिक नवभारत में मंत्रालय की रिर्पोटिंग करते थे जबकि विजय यादव क्राइम रिपोर्टिंग करते थे।

सेबी विवाद के बाद सहारा में सिक्योरिटी सख्त

सेबी से बढ़ते विवाद के बाद सहारा पर कार्रवाई भी लगभग तय मानी जा रही है। सहारा प्रबंधन को ये भी डर है कि सेबी के लोग उनके यहां कभी जांच के लिए आ सकते है। यही वजह है कि नोयडा सहारा में भी इन दिनों सिक्योरिटी सख्त कर दी गई है। बात 28 मार्च की रात तकरीबन नौ बजे की है। सहारा इंडिया कांपलेक्स नोयडा में अचानक एक मारुति इको गाड़ी धड़धड़ाती हुई घुसती चली गई। गार्डों ने हाथ देने की कोशिश की, लेकिन गाड़ी अंदर जाकर ही रुकी। पीछे से तमाम गार्ड दौड़ते हुए पहुंचे और ये जानने की कोशिश करने लगे कि आने वाले कौन हैं और किस काम से आए हैं। आने वालों ने गार्डों को खातिर में न लाते हुए दबंगई दिखाने की कोशिश की और चैनल में काम करने वाले एक व्यक्ति का नाम बताते हुए उनसे मिलने आने की बात कही।

गार्डों ने उनसे गाड़ी बाहर ले जाने को कहा और इस तरह जबरन अंदर घुस आने पर डपटने लगे। बातों-बातों में बात बढ़ गई और तब तक कई और गार्ड भी वहां पहुंच गए। उसके बाद आने वाले मेहमानों,  जिनकी संख्या चार-पांच बताई जाती है… को वह प्रिंट के मशीनरी सेक्शन में ले कर गए और उनकी वहां कायदे से कुटाई की गई। उसके बाद उन्हें वहां से भगा दिया गया। अब सहारा प्रबंधन इस बात की जांच कर रहा है कि आने वाले लोग कौन थे और वह किस व्यक्ति से मिलने आए थे।

 

यादें (एक) : देवनागरी का ज्ञान ही मेरे जीवन की बड़ी कमाई!

अतीत की यादें अक्सर हमारी स्मृति को कुरेदती हैं. और… गुजरी जिंदगी में कुछ पल ऐसे भी होते हैं, जिन्हें हम चाहकर भी नहीं भूल सकते! किसी के भी जीवन में तीन अवस्थाएं बेहद खास होती हैं- बचपन, जवानी व बुढ़ापा. मैंने इनमें दो पड़ाव को, कुछ अपनी मर्जी से और कुछ जबरिया जी ही लिया है. इसलिए इनसे जुड़े किस्से का होना भी स्वाभाविक है. सही है कि जीवन कोई व्यवसाय नहीं, जिसके हर पल का हिसाब लिया जाए. लेकिन एक लेखक के तौर पर भावनाओं की पड़ताल कर, उसे लच्छेदार शब्दों में तब्दील करने की आदत सी हो चली है. सो, ना चाहने के बावजूद भी भावुक मन फ़्लैश बैक में चला ही जाता है. शुरुआत बीते बचपन से करना चाहूंगा.

छुटपन से ही दादा का यह कथन सुनते हुए बड़ा हुआ, ‘खेलोगे-कूदोगे तो होखोगे खराब, पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब!’ दादा यानी आम ग्रामीण की तरह पूरे खेतिहर, स्वभाव से कर्मठ व जमीन से जुड़े एक इंसान. 20 बीघे जमीन जोतने वाले किसान थे वह. सो खेतों वाले झगड़े-फसाद में मुकदमा लड़ने को लेकर पूरे गाँव में उनकी कोई सानी नहीं थी. दूर-दराज के गरीब-गुरबे व मजदूर टाइप के लोग उनसे जमीनी विवाद से संबंधित कानूनी मशविरा लेने आते रहते थे. हालांकि मेरे दादा स्व. रामरीत सिंह किताबी जानकारी के मामले में अनपढ़ थे. लेकिन दुनियादारी के मामले में काफी व्यावहारिक व सुलझे हुए थे. कुछ इस तरह कि डिग्री वाले सज्जन भी सामने पानी भरने लगे. चाणक्य की इस नीति पर उनका अटूट भरोसा था, ‘राजा बनने से अच्छा है, दूसरे को राज-पाट दिलाओ.’ उनके दादा राम अवतार सिंह देश की आजादी के बाद से ही 33 वर्षों तक कनछेदवा पंचायत का मुखिया रहते हुए स्वर्ग सिधार गए. जब ग्रामीणों ने दादा को मुखिया (ग्राम प्रधान) पद संभालने का प्रस्ताव दिया, तो उन्होंने सिरे से इसे ख़ारिज कर दिया. चूंकि उस वक्त मुखिया पद का चुनाव मतदान से नहीं होकर प्रत्यक्ष तरीके से होता था. उन्होंने अन्य व्यक्ति को समर्थन देकर मुखिया बनवा दिया.

अधेड़पन की बेला में दादा को गाँव की ही रात्रि पाठशाला में हिंदी भाषा का अक्षर ज्ञान मिला था. इसलिए अपना हस्ताक्षर तो करते ही थे, अख़बार व धार्मिक किताबों में छपे शब्दों की धर-पकड़ कर, उनका पाठ भी कभी-कभार कर लेते थे. मुझे वो दिन अभी भी याद हैं, जब बाबा मोतिहारी स्थित कचहरी से मुक़दमे की तारीख कर लौटते. कचहरी के वकीलों की कमाई व हकीमों के ठाट-बाट का वर्णन करते अघाते नहीं थे. शायद यह रात्रि पाठशाला में मिले ‘अक्षर ज्ञान’ का ही असर था कि दादा शिक्षा को लेकर बेहद संजीदा रहते थे, कम- से-कम मुझे तो ऐसा ही लगता है. दादा मुझे अच्छी पढ़ाई कर अफसर बनने की सलाह देते थे. उनका मानना था कि कड़ी मेहनत के बाद किसी भी महकमे में कोई बड़ा पद मिल जाएगा. तो फिर शेष जिंदगी रौब-रुआब व मजे से गुजरेगी. इस मायने में पिता जी जो कि अब इस दुनिया में नहीं हैं, तो उनसे भी बीस थे. दिल से नरम व स्वभाव से बेहद कड़क मिजाज वाले आदमी थे, पेशे से ठेकेदार. कद व चेहरा भी बिल्कुल अमिताभ बच्चन की तरह, पर थे बेहद स्मार्ट व दबंग व्यक्तित्व वाले. अक्सर ठेकेदारी के लिए टेंडर भरने जिला मुख्यालय जाना-आना व इंजीनियरों के साथ उनका उठना-बैठना लगा रहता था.

पिता जी जब देर रात घर लौटते तो प्रायः मां को सुनाकर कर कहते, यद्दपि उनका इशारा मेरी तरफ होता था. ‘अजी सुनती हो जी, फलाने एसई साहब के लड़के ने आईआईटी का एंट्रेंस निकाल लिया है!’ तो कभी किसी जेई साहब के लड़के की बीपीएससी पास कर एसडीओ बनने की बात कहते थे. मैं उस वक्त गाँव के ही ‘सैंट बोरिस विद्दालय’ (इसकी जिक्र बाद की सीरीज में करूंगा) में पांचवी का छात्र था. पिताजी की आए-दिन दी जाने वाली नसीहतें सुन-सुनकर कोफ़्त महसूस करता था. आखिर क्यों, गांव में रहने वाले एक अदने बच्चे की तुलना शहरी लड़कों से करते हैं? कहां बिजली के उजाले में रहकर अंग्रेजी कांवेंट में पढ़ने वाले वे बच्चे. और कहां प्राइमरी स्कूल में प्लास्टिक के बोरे पर बैठ देवनागरी लिपि में पढ़ने वाला यह नीचट देहाती, जो दुअरा पर ‘भुकभुकिया लालटेन’ की धूमिल रौशनी में देर रात गए बीटीसी की किताबों में उलझे हुए मच्छर मारते रहता. पता नहीं, क्यों जलन होने लगी थी, इन सब बातों से? लेकिन पिता जी का खौफ जेहन में इस कदर भरा हुआ था कि क्या मजाल हम मुंह से बगावत के एक शब्द भी निकाल सके. क्योंकि ये उम्र ही ऐसी होती है, जब डांट-फटकार से ज्यादा पिटाई का डर लगता है. मन ही मन घुटने व कोसने के अलावा चारा भी क्या था.

इसके बावजूद सच कहूं तो अपना अकादमिक सत्र बेहद ही ख़राब रहा. जाने क्यों, स्कूल के समय से ही इन कोर्स की किताबों से उबकाई आती रही है? इसी कारण ज्यादा सीरियसली पढ़ाई नहीं की कभी. बस किसी तरह स्नातक कर लिया, वह भी ताक-झांक करके. कुछ तक़दीर की भी मेहरबानी रही. वरना 28 साल की उम्र बीतने को है. बंदे को ये बात अभी तक समझ में नहीं आई कि इतने दिनों तक फिजूल में स्कूल व कॉलेज की पढ़ाई में वक्त क्यों जाया किया? मैं तो देवनागरी ज्ञान यानी हिंदी की सतही जानकारी को ही जीवन की अमूल्य उपलब्धि मानता हूं. यहीं मेरी सबसे बड़ी कमाई भी है. बाकि जो भी पढ़ा महज क्लास पास करने के लिए, वह भी उस समाज के लोक-लाज के भय से जहां पला-बढ़ा, जिसका दबाव अभी भी झेल रहा हूं. यह कि पढ़-लिख कर जो सरकारी चाकरी पकड़ ले, चाहे वह चपरासी की नौकरी ही क्यों ना हो. बोले तो वही दुनिया में सबसे बड़ा ‘तीस मार खां’ है.

क्रमशः…

लेखक श्रीकांत सौरभ पूर्वी चंपारण में पत्रकारिता से जुड़े हैं. प्रस्तुत आलेख उनके ब्लॉग- मेघवाणी से साभार है. उनसे मो.न. 9473361087 पर संपर्क कर सकते हैं.

नवरुणा अपहरण मामले में बिहार डीजीपी को सम्मन जारी

पटना: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग(एनएचआरसी) ने पिछले वर्ष 18 सितंबर से लापता एक नाबालिग लड़की नवरुणा के अपहरण को लेकर राज्य के पुलिस महानिदेशक अभयानंद को नई दिल्ली स्थित आयोग के कार्यालय में 3 मई को हाजिर होने का निर्देश दिया है। एनएचआरसी ने इस घटना के बारे में शिकायत दर्ज करवाने के बाद रिपोर्ट तलब की थी, लेकिन राज्य पुलिस रिपोर्ट पेश नहीं कर सकी। आयोग ने कहा है, "पर्याप्त समय और अवसर दिए जाने के बावजूद मांगी गई रिपोर्ट नहीं मिली है। इस परिस्थिति में बिहार के पुलिस महानिदेशक रिपोर्ट के साथ व्यक्तिगत रूप से आयोग के समक्ष हाजिर हों।"

ज्ञात हो कि राज्य के मुजफ्फरपुर जिले में 18 सितंबर को 13 वर्ष की एक लड़की का उसके घर से अपहरण कर लिया गया। इस मामले में राज्य पुलिस को कोई सुराग नहीं मिल पाया है। पिछले वर्ष अक्टूबर में दिल्ली विश्वविद्यालय में कानून के छात्र अभिषेक रंजन ने एनएचआरसी से शिकायत की और आयोग ने उस पर बिहार पुलिस को 6 दिसंबर तक रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा था। राज्य के गृह विभाग के मुताबिक बिहार पुलिस को दो-दो ताकीद जारी करने के बावजूद आयोग को इस घटना के बारे में कोई जवाब नहीं दिया गया। इस साल के शुरू में मामले की जांच बिहार पुलिस की अपराध अनुसंधान शाखा (सीआईडी) को जांच सौंप दी गई।

लड़की के पिता अतुल्य चक्रवर्ती ने आरोप लगाया है कि उनकी बेटी का भू माफियाओं ने अपहरण कर लिया है, क्योंकि उन्होंने एक कीमती जमीन का टुकड़ा बेचने से इनकार कर दिया था। चक्रवर्ती के घर के समीप नाले से एक कंकाल पाया गया था, लेकिन अदालती आदेश के बावजूद चक्रवर्ती दंपति ने डीएनए जांच के लिए रक्त का नमूना देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि यह कंकाल उनकी बेटी का नहीं है।
 

मोदी से नहीं, अब वरुण से होगी राहुल गांधी की तुलना

कांग्रेस में राहुल गांधी, बीजेपी में वरुण गांधी। कांग्रेस में सोनिया गांधी, बीजेपी में मेनका गांधी। राजनाथ सिंह ने हिसाब बराबर करने की कोशिश की है। अपनी टीम में राजनाथ सिंह ने जिस तरह से वरुण गांधी को अचानक बहुत भाव दिया है, उससे तो कमसे कम यही लगता है। राजनीति में किसी को भी वजन यूं ही नहीं मिलता। उसके पीछे बहुत सारे मकसद एक साथ काम करते हैं। वरुण गांधी भी मकसद के मोहरे हैं। इसीलिए महासचिव पद पर आ गए हैं। हालांकि वरुण गांधी पहले भी सचिव पद पर थे। लेकिन अब उससे बहुत ऊपर के पद पर हैं।

माना जा कहा है कि उनको इस पद पर लाकर बीजेपी ने यूपी में युवा चेहरे के रूप में उन्हें राहुल गांधी से भिड़ाने का मंच तैयार कर दिया है। कोई कुछ भी कहे, पर इस मामले को राहुल गांधी के मुकाबले के रूप में ही देखा जा रहा है। वैसे माना जा रहा है कि राजनाथ सिंह ने वरुण गांधी के जरिए एक तीर से दो निशाने लगाने की कोशिश की है। राजनीति में कई बार तो तीसरा निशाना फोकट में भी लग जाता है।

सो, वरुण गांधी को लाकर बीजेपी ने यह संदेश तो दिया ही है कि वह यूपी को ज्यादा अहमियत देने जा रही हैं। साथ ही, यह भी बताने की कोशिश की है कि बीजेपी अब युवा चेहरों को आगे बढ़ा रही है। वैसे, एक बहुत साफ संदेश यह भी है कि बीजेपी में युवाओं के लिए बहुत सारा स्पेस है। यूपी में कांग्रेस के पास अकेले राहुल गांधी हैं। उन्हीं ने वहां सका सारा दारोमदमार अपने ऊपर ले रखा है। उनकी काट में वरुण गांधी को खड़ा करके चुनावी मुकाबले को राहुल बनाम वरुण गांधी करने की तैयारी की गई है।

जिस तरह से राहुल गांधी में कांग्रेस अपना फायदा देख रही है, उसी तरह से वरुण में बीजेपी अपना फायदा तलाश रही है। वैसे भी, राजनीति में फायदे के अलावा कुछ नहीं देखा जाता। राहुल भैया का ज्यादा ध्यान यूपी पर ही है। उनका ज्यादातर वक्त भी वहीं कटता है। वे सहीं से सफल होना चाहते हैं। वैसे, यह बहुत मुश्किल काम है। दो दो बार वे भद्द पिटवा चुके हैं, फिर भी राहुल गांधी को लगता है कि यूपी से ही कांग्रेस को फिर से देश के नक्शे पर सबसे बड़ा सेंटर बनाया जा सकता है। तो, लो भैया, बीजेपी ने आपके इस लगने में रोड़ा खड़ा कर दिय़ा है।

वरुण गांधी यूपी में लगातार सिमटती जा रही कांग्रेस के लिए एक और आफत के रूप में आ गए हैं। लोग तुलना तो करेंगे ही। सो, अब राहुल गांधी की तुलना यूपी में तो कमसे कम सिर्फ और सिर्फ वरुण गांधी से ही होगी। नरेंद्र मोदी से नहीं होगी। इसके अलावा बीजेपी का यह भी मानना है कि राहुल के मुकाबले वरुण ज्यादा अग्रेसिव है। राहुल गांधी ठंडे हैं। उनमें स्पार्क नहीं है। थ्रिल भी नहीं है। वे बोलते हैं, तो बचकाने लगते हैं। वाणी में ओज नहीं है। वरुण गांधी में अग्रेशन है। अग्रेसिव लीडर लोगों को लुभाता है। फिर भी यूपी में राहुल सक्रिय हैं। सो, राहुल को रोकना जरूरी है। वगैरह वगैरह.. बीजेपी इतनी सारी मान्यताएं एक साथ लेकर चल रही है।

इसीलिए, वरुण को यूपी से महासचिव बनाकर कांग्रेस को ही नहीं पूरे देश को संदेश दिया गया है कि कांग्रेस अगर यूपी को अहमियत दे रही है तो बीजेपी के लिए भी यूपी की कीमत कोई कम नहीं है। लेकिन लग रहा है कि यूपी में राहुल गांधी की तरह गली गली घुमाने के लिए वरुण गांधी को आने वाले दिनों में कोई और भूमिका भी दी जा सकती है। तख्त सज चुका है और तस्वीर साफ है कि आने वाले दिनों में अब राहुल गांधी की तुलना वरुण गांधी से ही होगी, नरेंद्र मोदी से नहीं।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

दैनिक जागरण, गोरखपुर से जुड़े तीन ग्रामीण पत्रकार बाहर

गोरखपुर से सूचना है कि यहां से प्रकाशित दैनिक जागरण के तीन ग्रामीण पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. कहा जा रहा है कि देवरिया जिले के सलेमपुर प्रभारी को नहीं खुश रख पाना तीनों पत्रकारों पर भारी पड़ा है. लिखने-पढ़ने से ज्यादा, अन्य गुणों के कारण पत्रकार बनने वाले सहजूर के पत्रकार राम कुमार सिंह ने जब जिला के लोगों को ओबलाइज करना बंद किया तो उन्हें बाहर कर दिया गया. हालांकि पत्रकार बनने से पहले उन्हें अखबार की एजेंसी भी दी गयी थी.

राम कुमार के पक्ष में आने की वजह से पिंडी के पत्रकार सत्य प्रकाश पाण्डेय और लार बाजार के पत्रकार विद्यानंद को भी बाहर कर दिया गया है. यहाँ यह भी बताया जा रहा है कि विद्यानंद २२०, रामकुमार १५० और सत्यप्रकाश १३० कापी की एजेंसी भी लिए थे. उधर इस संबंध में सलेमपुर के ब्यूरो प्रभारी का कहना है कि तीनों लोग पत्रकारिता कम, अन्य व्यवसायों में ज्यादा संलिप्त थे. साथ ही दफ्तर में आकर धमका रहे थे, ऐसे माहौल में उनसे काम लेना मुश्किल था.

उपरोक्त सूचनाओं में कोई कमी-बेसी नजर आए तो अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए भड़ास तक पहुंचा सकते हैं.

साहित्यकार दूधनाथ सिंह पर मानहानि का मुकदमा, सम्मन जारी

शाहजहांपुर में कवि डा. राजकुमार शर्मा ने साहित्यकार दूधनाथ सिंह पर मानहानि का मुकदमा दायर किया है. मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने दूधनाथ को कोर्ट में उपस्थित होने के लिए सम्मन जारी किया है. मामला साहित्यिक कंटेंट चोरी का है. भड़ास तक यह सूचना एडवोकेट विवेक शर्मा, एडवोकेट भाव शील शुक्ल और एडवोकेट कमल शुक्ल शील के हस्ताक्षरों से जारी एक प्रेस रिलीज के जरिए पहुंची है.

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महाराष्ट्र में होने वाले 16 आईपीएल पर होगी 48,00,000 लीटर पानी की बर्बादी

मुंबई : महाराष्‍ट्र के कुछ इलाकों में सूखे के जबर्दस्‍त कहर के बावजूद महाराष्ट्र में होने वाले 16 मैचों के लिए और क्रिकेट पिच के घास पर लगभग ४८००००० लीटर पानी बर्बाद किया जाने वाला है जिसमें से सिर्फ मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में आईपीएल मैचों के दौरान मुंबई क्रिकेट असोसिएशन २२.५ लाख लीटर पानी पिचों और घास पर खर्च करने का निर्णय लिए जाने का खुलासा किया गया है।

गौरतलब हो कि महाराष्ट्र में सूखे ने पिछले चालीस सालों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. लगातार दूसरे साल भी बारिश कम होने से ऐसी स्थिति बनी हुई है जिसके कारण ३४ जिले इस समय सूखे की चपेट में है जिसमें से सोलापुर, अहमदनगर, सांगली, पुणे, सतारा, बीड़ और नासिक सूखे से सबसे अधिक प्रभावित जिले हैं. बुलढाना, लातूर, उस्मानाबाद, नांदेड़, औरंगाबाद, जालना, जलगांव और धुले जिलों में भी स्थिति गंभीर है. सूखे के कारण लोग गाव छोड़कर शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं।

वहीं महाराष्ट्र में होने वाले कुल १६ मैचों के लिए लगभग ४८००००० लीटर पानी सिर्फ क्रिकेट के पिच और घास के लिए खर्च किया जाने वाला है जिसमें से ९ अप्रैल से १५ मई तक होने वाले आईपीएल के ८ मैच मुंबई के होम पिच वानखड़े स्टेडियम में होने वाला है। इसके लिए १५ दिन पहले से ही पिच तयार कर रखा गया है। प्रतिदिन करीब ६ टैंकर (प्रति टैंकर १० हजार लीटर) पानी इस पिच पर खर्च किया जायेगा। इस स्टेडियम में लगाने वाले पानी की आपूर्ति मेट्रो सिनेमा के पास बने बोरवेल से किये जाने का दावा मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन द्वारा किया गया है। इस बारे में मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन के सदस्य नदीम मेनन ने दिए बयान में बताया है कि मैदान पर सही तरीके से घास का उगा होना आवश्यक है ताकि खिलाड़ी खेल के दौरान जख्मी न हो जाये।

उन्होंने बताया कि हर मैदान बीसीसीआई के तय नियमों के अनुसार ही टायर किया जाता है जिसके लिए पानी की जरूरत होती है। इसके साथ ही पुणे सहित दुसरे शहरों में आईपीएल मैच होने हैं। पुणे के सुब्रत राय सहारा स्टेडियम में भी ८ मैच होने हैं जिसके लिए २२.५ लाख लीटर पानी की खपत होने का अनुमान मेनन ने व्यक्त किया है।

मुंबई के युवा व प्रतिभाशाली पत्रकार नागमणि पांडेय की रिपोर्ट. संपर्क- nagmani4@gmail.com

पैंतीस साल की सेवा के बाद विनोद कोहली ने दैनिक ट्रिब्यून से विदाई ली

दैनिक ट्रिब्यून अखबार के उप समाचार संपादक (डीएनई) विनोद कोहली ने अखबार से विदाई ले ली है. इस मौके पर उन्होंने अपने सभी सहयोगियों को संदेश भेजकर अखबार व साथियों के बेहतर भविष्य की शुभकामना दी. कोहली जी द्वारा प्रेषित संदेश इस प्रकार है-

सभी सहयोगियों के ध्यानार्थ…

साथियों लगभग 35 वर्ष की सेवा के बाद मैं आज दैनिक ट्रिब्यून से विदाई ले रहा हूं। इस दौरान मुझे आप सभी का पूर्ण सहयोग मिला है। विशेषकर, पिछले 2-3 महीनों के दौरान आप सभी ने समाचार-पत्र को नई दिशा देने में जो सहयोग दिया उसकी बदौलत ही अखबार की लोकप्रियता फिर से बढऩे लगी है। मुझे पूरा विश्वास है कि हमारे संवाददाताओं की पूरी टीम संपादक श्री संतोष तिवारी के नेतृत्व में इसी निष्ठा व कड़ी मेहनत से काम करते हुए दैनिक ट्रिब्यून को नयी बुलंदियों तक ले जायेगी।
 
शुभकामनाओं सहित
 
विनोद कोहली,
 
उप समाचार संपादक  दैनिक  ट्रिब्यून

कोई प्रतिभाशाली दलित मीडिया में प्रवेश पा भी लेता है तो उसे शीर्ष तक पहुंचने नहीं दिया जाता

: मीडिया में दलितों के साथ दलित समस्याएं भी अनुपस्थित : संजय कुमार की पुस्तक ‘मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे’ का लोकार्पण और इसी विषय पर परिसंवाद का आयोजन : लखनऊ, 31 मार्च। मीडिया में दलितों के साथ दलित समस्याएं भी अनुपस्थित है। साथ ही वे अगर मीडिया में आ भी जाये तो करेंगे क्या? एक बड़ा सवाल मौजूद है, जिस पर समग्र रूप से विचार करने की जरूरत है। मुख्य धारा की मीडिया को जनतांत्रिक कैसे बनाया जाये, इस पर भी विमर्श की आवश्यकता है।

आज यू.पी. प्रेस क्लब लखनऊ में लेखक व पत्रकार संजय कुमार की किताब ‘मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे’ के लोकार्पण के बाद वक्ताओं ने परिसंवाद में यह बातें कही। पुस्तक का लोकार्पण संयुक्त रूप से मानवाधिकार कार्यकर्ता व दलित चिंतक एस आर दारापुरी, जाने माने आलोचक वीरेन्द्र यादव, प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन, दलित चिंतक अरूण खोटे और जसम के संयोजक कौशल किशोर ने किया।

परिसंवाद के दौरान जाने माने आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि मीडिया में मुकम्मल भारत की तस्वीर नही हैं, गांव नहीं है, हाशिये का समाज नहीं है। मीडिया में दलितों के साथ दलित समस्याएं भी अनुपस्थित है। आज समाज को समग्र नजरिये से देखने की जरूरत है। उपस्थिति के साथ, दलित समाज के आलोचना की जरूरत के लिए भी मीडिया में दलितों की आवश्यकता है। वहीं दलित चिंतक अरूण खोटे ने कहा कि इतिहास में जायें तो दलित ही मीडिया के जनक रहे हैं। इसके बावजूद शिक्षा और संसाधनों से वंचित यह वर्ग अब मीडिया से गायब हो गया है। आज बात सिर्फ मीडिय में दलितों के प्रतिनिधित्व नहीं है, बल्कि दलितों के मुद्दों के लिए क्या यहां जगह है-सवाल यह भी है।

दलित चिंतक एस आर दारापुरी ने कहा कि दलितों के साथ अब भी भेदभाव बरकरार है। लेकिन यह सब मीडिया में खबर नहीं बनती है, क्योंकि मीडिया भी उसी द्विज वर्चस्व को बरकरार रखना चाहता है। उन्होंने कहा कि मीडिया में दलित नहीं है यह सच्चाई है तो सवाल यह है कि हम क्या करें। ऐसे में दलित मीडिया को आगे लाने की जरूरत है। दूसरी ओर महिला एसोसिएशन की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन ने कहा कि राजनीति को समझते हुए दलितों और मुस्लमानों को एक साथ आगे आना होगा और लामबंद तरीके से लड़ाई लड़नी होगी। जसम के संयोजक कौशल किशोर ने कहा कि कहने को तो लोकतांत्रिक व्यवस्था है लेकिन समाजिक बराबरी आज भी दुर्लभ है। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है परन्तु इसकी बनावट जातिवादी तथा दलित विरोधी है। दलित मीडिया से जुड़ना तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें जान-बूझकर इससे दूर रखा जाता है। यदि कोई प्रतिभाशाली और योग्य दलित मीडिया में प्रवेश भी पा लेता है तो उसे शीर्ष तक पहुंचने नहीं दिया जाता, बल्कि उसे बाहर का रास्ता दिखाने के लगातार उपाय ढूंढ़े जाते हैं।

पुस्तक के लेखक और आकाशवाणी पटना के समाचार संपादक संजय कुमार ने कहा कि मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है परन्तु इसकी बनावट जातिवादी तथा दलित विरोधी है। दलित मीडिया से जुड़ना तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें जान-बूझकर इससे दूर रखा जाता है। यदि कोई प्रतिभाशाली और योग्य दलित मीडिया में प्रवेश भी पा लेता है तो उसे शीर्ष तक पहुंचने नहीं दिया जाता, बल्कि उसे बाहर का रास्ता दिखाने के लगातार उपाय ढूंढ़े जाते हैं। उन्होंने राष्ट्रीय मीडिया के सर्वे का हवाला देते हुए कहा कि  मीडिया में दलित ढूंढते रह जायगे। सर्वे के अनुसार कुल जनसंख्या में 8 प्रतिशत वाली ऊँची जातियों का मीडिया हाऊस में 71 प्रतिशत शीर्ष पदों पर कब्जा है। इनमें 49 प्रतिशत ब्राह्मण, 14 प्रतिशत कायस्थ, वैश्य और राजपूत 7-7 प्रतिशत, खत्री-9, गैर द्विज उच्च जाति-2 और अन्य पिछड़ी जाति 4 प्रतिशत हैं। इनमें दलित कहीं नहीं दिखते।

श्री कुमार ने कहा कि  राजनैतिक रूप से जागरूक बिहार की राजधानी पटना के मीडिया घरानों में काम करने वालों के भी सर्वे है। सर्वे के मुताकिब बिहार के मीडिया में सवर्णों का 87 प्रतिशत कब्जा है। इनमें ब्राह्मण 34, राजपूत-23, भूमिहार-14 और कायस्थ-16 प्रतिशत है। शेष 13 प्रतिशत में पिछड़ी जाति, अति पिछड़ी जातियों, मुसलमानों और दलितों की हिस्सेदारी है। इनमें सबसे कम लगभग 01 प्रतिशत दलित पत्रकार ही बिहार की मीडिया से जुड़े हैं। सरकारी मीडिया में लगभग 12 प्रतिशत दलित है। जसम की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में नाटककार राजेश कुमार, अलग दुनिया के के.के.वत्स, कवि आलोचक चंद्रेश्वर सहित कई चर्चित पत्रकार-साहित्यकार उपस्थित थे। विषय पर परिसंवाद का आयोजन जन संस्कृति मंच ने यू0 पी0 प्रेस क्लब में किया गया। कार्यक्रम का संचालन जसम के संयोजक कौशल किशोर किया।

प्रेस विज्ञप्ति

नीरज मेहरा बने पिंकसिटी प्रेस क्लब अध्यक्ष, विजेताओं की लिस्ट देखें

जयपुर। पिंकसिटी प्रेस क्लब की वार्षिक कार्यकारिणी 2013-14 के लिए शनिवार को हुए मतदान के बाद रविवार को मतों की गिनती की गई, जिसमें नीरज मेहरा ने अध्यक्ष पद के लिए हुई चुनावी दौड़ में जीत हासिल की और प्रेस क्लब के अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित हुए। पिंकसिटी प्रेस क्लब की वार्षिक कार्यकारिणी के लिए हुए मतदान के बाद हुई मतगणना में क्लब कार्यकारिणी के अन्य सभी पदों का भी फैसला हुआ। इसमें उपाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, जनरल सेक्रेट्री और कार्यकारिणी सदस्यों का भी निर्वाचन हो गया।

प्रेस क्लब के कुल 898 सदस्यों में से कुल 770 सदस्यों द्वारा किए गए मतदान में अध्यक्ष पद के उम्मीदवार के रूप में नीरज मेहरा को कुल 370, किशोर शर्मा को 208, जगदीश शर्मा को 108 और राधारमन शर्मा को 77 मत प्राप्त हुए। उपाध्यक्ष पद पर राहुल गौतम और कान्हाराम कड़वा को जीत प्राप्त हुई। उपाध्यक्ष पद के उम्मीदवार राहुल गौतम को 305, कान्हाराम कड़वा को 179, परमेश्वर शर्मा को 174, तरूण जैन को 171 और वसीम कुरैशी को 168 मत मिले।

कोषाध्यक्ष पद के लिए मुकेश चौधरी को जीत मिली। कोषाध्यक्ष पद के लिए चुनावी मैदान में उम्मीदवार मुकेश चौधरी को 310, योगेश शर्मा को 169, रघुवीर जांगिड़ 140 और यतीश शर्मा को 122 वोट हासिल हुए। जनरल सेक्रेट्री के उम्मीदवार के रूप में विकास शर्मा ने कुल 258 मत प्राप्त किए, इन्होने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी मांगीलाल पारीक को 30 मतों से मात दी और जीत हासिल की। इसके अतिरिक्त कार्यकारिणी सदस्यों के रूप में डीसी जैन, यशपाल भाटी, अशोक भाटी, कश्यप अवस्थी, राजेश पारीक, निखलेश शर्मा, गिरधारी लाल पारीक, जयसिंह गौड़, प्रेम शर्मा और शरद दाधीच निर्वाचित हुए।

क्रेडिट कार्ड और वीडियो का कर्ज : जय संतोषी मां !!

“नाश हो इस भड़ास का और उन तमाम सूअरों और कुत्तों का जो झुंड में चलते हैं…अरे शेर तो हमेशा अकेला चलता है…” … लानत है यशवंत भाई  ऐसे शेर का आप शिकार करने निकल पड़े हैं। खुद तो कलम का निशाना साधे भड़ास की मचान पर बैठ गए हैं और शेर को फंसाने के लिए नीचे वीडियो का बकरा बांध दिया। शेर आया बकरे पर मुंह मारा और आप हैं कि ऐसे वक्त में भी शेर को गुदगुदी करने से बाज नहीं आ रहे।

शुक्र मनाइए कि शेर ने सिर्फ आपको अपना दिव्य और अलौकिक रूप ही दिखाया पंजा नहीं मारा। अब ये अलग बात है कि उसके पंजे में नाखून नहीं है, उसे आप जैसे ही सहकर्मियों ने उखाड़ फेंका है…सुना नहीं आपने..”मुझे अपनों ने ही लूटा गैरों में कहां इतना दम था”। कमाल करते हो आप भी…रंगे हाथों पकड़े जाने पर किसी से यूं मजाक नहीं किया जाता। आपको शेर के दर्द का थोड़ा भी एहसास नहीं…  

मजाल क्या किसी की, छू ले दिलेर को,
वैसे तो धोखे से कुत्ते भी मार लेते हैं शेर को।

पूरी सहारा इंडिया कंपनी में मशहूर है और आप इसे चवन्नी छाप शेर बताकर खीसें निपोर रहे हैं।ये आपकी गलती नहीं है छात्र जीवन में मार्क्सवादी रहे हैं ना इसीलिए आपको इसमे कविताई नजर नहीं आ रही। तो क्या उखाड़ लिया आपने क्रांतिकारी विचारधारा से लैस होकर। पेशे से पत्रकार होकर भी आप किस चैनल में अपनी चौधराहट दिखा सके। अरे आपसे तो अच्छा ये शेर है और इसके जैसे कई सवा शेर हैं, जो ‘मसि कागद छुऔ नहीं कलम गही नहिं हाथ’ का जाप करते हुए मीडिया की मंडी में जमकर पंजीरी जीम रहे हैं। आपसे अच्छा तो ये नख दंत विहीन शेर है जो आपके विडियो के कर्ज को सूद सहित लौटाने की बात कर रहा है। वर्ना आज के दौर में कर्ज वसूलने के लिए तो सरकारी तहसीलदारों तक को नाकों चने चबाने पड़ते हैं।

लेकिन शेर इसीलिए तो शेर है कि उसने अपनी मां का दूध पिया है जबकि आप जैसे लोग मदर डेयरी का दूध भी चाय के बहाने ही पीते हैं। मैं आपकी बात नहीं, आप जैसे लोगों की बात कर रहा हूं। आपके बारे में तो मुझे अच्छी तरह से पता है कि पीने का नाम लेते ही आपके सामने शराब की बोतल नाचने लगती है। यशवंत भाई ये क्रांतिकारिता भी शराब के नशे से कम नहीं और इस नशे में आप एक स्वतंत्र शेर आदमी को वीडियो दिखाकर जला रहे हो। आपको मेरी सलाह है अगर आपमें थोड़ा सा भी धर्म कर्म बचा है तो चेत जाइये। वर्ना जिस दिन इस शेर आदमी की आभा से सामना हो गया तो पांव डगमगा जाएंगे।

एक सीधा सादा भक्त आदमी जो खुद  को ईश्वर का प्रतिरूप मानता  है उसके ऊपर आप लांक्षन  लगा रहे हैं। खैर मनाइये कि महाप्रभु इस कलियुग में  भी कोर्ट और कचहरी को नहीं मानते वर्ना सृष्टि का विनाश हो जाता। यशवंत भाई थेथरई मत कीजिए…चिकोटी काटकर चुम्मा लेने की आपको पुरानी बीमारी है। निर्मल बबवा को भी आपने इसी तरह से पलीता लगाकर हलकान किया था। लेकिन बबवा को देखिए…क्या उखाड़ लिया आपने…उल्टे आपको धोबी पछाड़ देकर फिर से कई चैनलों पर किरपा बरसाने लगा है। मुझे तो लगता है कि बबवा के सराप से ही आपको जेल की हवा खानी पड़ी थी। यशवंत भाई एक शुभचिंतक के नाते आपको जबरदस्ती सलाह दे रहा हूं…सुधर जाइए…बबवा के सराप से अभी उबरे नहीं हैं कि साक्षात दिव्य और अलौकिक परम पिता परमेश्वर के प्रतिरूप को चुनौती दे रहे हैं…कि जो उखाड़ना है उखाड़ लो…कहीं आप बनारस से औघड़ई की दीक्षा लेकर तो नहीं आएं हैं ?…अगर ऐसा है तो अवधूत बाबा यशवंत की जै हो!!!

लेखक श्याम शिवनंदन मुंबई में टीवी सीरियल के लिए पटकथा लेखन से जुड़े हैं। कुछ दिनों तक मीडिया की मंडी में हाथ आजमाया और इस दौरान कई मीडिया के महारथियों को नजदीक से देखने जानने का मौका मिला। संपर्क : shyamshivnandan@gmail.com


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