साधना मैनेजमेंट ने अपने चैनल पार्टनर का 60 लाख रुपये हड़पा, एसएन विनोद नाराज

साधना न्यूज में रोजाना कुछ न कुछ नया घटनाक्रम घटित हो रहा है. ताजी सूचना ये है कि साधना न्यूज के मालिक गुप्ताज ने अपने एक चैनल पार्टनर का साठ लाख रुपये हड़प लिया है. इस चैनल पार्टनर को चैनल से जोड़ने का काम एसएन विनोद ने किया था. सीईओ राकेश शर्मा के कुत्सित सलाह पर चलते हुए साधना के मालिकों ने इन दिनों किसी भी प्रकार से पैसा बनाने का अभियान शुरू कर दिया है. इसके तहत वे चैनल पार्टनर के नाम पर लोगों को जोड़ते हैं और करोड़ों रुपये निवेश कराने के बाद चैनल पार्टनर से किनार करके व एग्रीमेंट रद्द करके नया मुर्गा उर्फ नया चैनल पार्टनर तलाशना शुरू कर देते हैं.

साधना प्रबंधन के इस रवैये से चीफ एडिटर एसएन विनोद बेहद नाराज हैं. उन्होंने प्रबंधन को चेतावनी दी है कि यदि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चैनल पार्टनर को साठ लाख रुपये न लौटाए गए तो वो इस्तीफा दे देंगे. सूचना है कि वे विरोध स्वरूप कई दिनों से आफिस नहीं जा रहे हैं. फिलहाल साधना मैनेजमेंट न उगल पा रहा है और न निगल पा रहा है. एसएन विनोद ने साधना न्यूज के भीतर जो एक जांच शुरू की है, उससे भी हड़कंप मचा हुआ है.

बताया जाता है कि एसएन विनोद जल्द ही मैनेजमेंट को अपनी जांच रिपोर्ट अग्रसारित करेंगे जिसमें उन लोगों का नाम दर्ज होगा जिनके कारण साधना न्यूज की छवि व साख खराब हुई है. साधना से जुड़े सूत्रों के मुताबिक एसएन विनोद के विरोधी कुछ लोग उनके इस्तीफे की खबर उड़वा रहे हैं ताकि एसएन विनोद कमजोर पड़ सकें, जबकि सच्चाई ये है कि उन्होंने कोई इस्तीफा नहीं दिया है. एसएन विनोद अपने सिद्धांतों और सरोकारों के आगे न झुकते हुए चैनल के अंदर व्याप्त गड़बड़ियों को दूर करने के लिए कटिबद्ध हैं. देखना है कि साधना प्रबंधन अब क्या स्टैंड लेता है.

कुलपति विभूति राय ने अपने खिलाफ चल रही जांच में अपना बयान मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भेजा

Sanjeev Chandan : कल से मैं खुद को ताकतवर महसूस कर रहा हूँ. राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का सम्मान करते हुए उनसे थोड़ा कम. कल मैं मानव संसाधन मंत्रालय में पेश किया गया एक दस्तावेज पढ़ रहा था. दरअसल दारोगा कुलपति 'विभूति राय' के खिलाफ जांच चल रही है. विभूति ने जांच के सन्दर्भ में अपना बयान जो मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भेजा है, उसमें वह अपने को बेहद इमानदार और कर्तव्य निष्ठ बताते हुए सफाई देते हैं कि यह तो मैं (संजीव चन्दन ) और Rajeev Suman हैं, जो देश भर के वरिष्ठ मीडिया कर्मियों को, कई संसद सदस्यों को बरगला रहे हैं, जो विभूति के खिलाफ जांच की मांग करते रहे हैं या खबरें बनाते रहे हैं.

मजेदार है कि हमारे बरगलाने में कैग और केन्द्रीय विजिलेंस आयुक्त भी आ चुके हैं. विभूति कहते हैं कि कुछ अवैध डिग्रियों, नियुक्तियों के जो प्रसंग हैं वह हमारे द्वारा इस इर्ष्या से उठाये जा रहे हैं कि हमारे साथ पढ़ने वाले वहां नियुक्त कर दिए गए और हम नहीं हुए. अब हमारी इर्ष्या में कैग तक शामिल है, जो कई नियुक्तियों को अवैध मानता है, अब उनमें कुछ नियुक्तियां वैसी भी हैं, जिनमें हमारे क्लासमेट या बैचमेट भी शामिल हैं. मानव संसाधन मंत्रालय ने स्वयं 18 नियुक्तियों को अवैध बताया है या उन्हें विवादित बना रखा है. बेचारा दारोगा कितना भला आदमी है. वह अपने बचाव में कहता है कि उस पर महिला विरोधी होने का आरोप भी मनगढ़ंत और हमारी साजिश है. अब २०१० के अगस्त के टीवी फुटेज तो उपलब्ध होंगे न, जहाँ जनाब दारोगा जी और एक इन्स्पेक्टर आलोचक 'छिन्न-नाल' का नायाब आइडिया लेकर आये थे. और तो और, दारोगा यह भी कहते हैं कि जो उन्होंने चोर गुरु अनिल राय पर कोई कारवाई नहीं की है या उस पर मेहरबानियाँ बख्श रखी है, वह सब इसलिए कि स्वयं मंत्रालय ऐसी अकादमिक चोरियों को कापी राईट के दायरे में नहीं मानता. यह जवाब उस समय दिया जा रहा है, जब कई प्रोफेसरों और कुलपतियों तक की नौकरी इस अकादमिक चोरी के कारण गई है. एक तो चोरगुरु के सहधर्मी चोर जामिया मिलिया से ही हटाए गए हैं. तो क्या हम सचमुच इतने ताकतवर हो गए हैं….! Sandeep भाई, हमारी ताकत के कई राजों में से एक राज तो आप खुद भी हो, थोड़ा दारोगा को भी बताओ भाई. फिलहाल तो हमें दारोगा के जवाब का जवाब मंत्रालय को भेजना है ताकि उनके 'सगोत्रीय भाई बंधु' उन्हें क्लीन चिट न दे दें ……..!!!

        Tara Shanker brave! keep it up sir!
 
        Sameer Sameera aakhir bhai kiska ho
 
        Jitendra Narayan संघर्ष जारी रहे….
   
        Manoj Kumarjha संजीव जी, इनकी अनियमितताओं के बारे में कई खबरें आई हैं। ये लेखक होने के नाम पर ये सब कर रहे हैं। मैं ऐसे कुछ लोगों को जानता हूं, जो किसी भी दृ्ष्टि से प्राध्यापक बनने के लायक नहीं थे, जिन्हें इन्होंने नियुक्त किया और बाद में उनमें से एक जो अपने-आप को कवि मनवाते हैं, एक वरिष्ठ आलोचक के दामाद हैं, दिल्ली यूनिवर्सिटी में रीडर बन गए। उन पर लाख रुपये का लैपटॉप ले उड़ने का आरोप है….
    
        Ajamil Vyas ये घटियापन पूरे देश में है। ऐसे गिरोहों सरकारों का भी संरक्षण प्राप्त है। जिसकी पूँछ उठाओ वही मादा निकलता है।
     
        Sanjeev Chandan Ajamil Vyas, सर यह मुहावरा जेंडरड है . हालांकि आप सन्दर्भ स्पष्ट है .
      
        Ajamil Vyas मै तो आपके हौसले की दाद देता हूँ। आप इनके खिलाफ आवाज़ तो उठा रहे हैं। लेकिन ये मानिये क़ि इनका कोई चरित्र नहीं है।अलाहाबाद में भी ऐसे मठाधीशों को नवनीत लेपन करने वाले कम नहीं हैं।
       
        Arti Mishra हाय रे दरोगा बाबू। लानत है तुम्हारी गलथेथरी पर।
        संजीव जी ठीक कह रहे हैं आप। छिनान प्रकरण के दौरान एनडीटीवी का फुटेज देखे सभी जिसमें मैत्रेयी पुष्पा के साथ किस बेशर्मी से पेश आ रहे है यह पुलिसवाला गुंडा। पुलिसवाला गुंडा है न बेशर्मी तो इनके नस-नस में होगी।
        
        Arti Mishra विभूति जी गलत बयानी ना करें। ईमानदार हैं तो डर क्यों रहे हैं? जाँच होने दे। दूध का दूध पानी का पानी सामने होगा। इनपर लगा दाग भी धुल जाएगा?
     
        Sanjeev Chandan हमारी ताकत का एक राज तो मैं बता सकता हूँ Yashwant Singh और उनका भड़ास . वैसे मोहल्ला लाइव ने हमारी ताकत थोड़ी कम कर दी है , नहीं तो प्रणव दा…
      
        Rajdhir Singh Bhai Sanjiv Chandan, aap bhi Vibhuti babu ka thoda buttering kar rahe hain….. Ek Hawaldar ko baar baar Daroga kah kar sambodhit karte rehte hain.
       
        Sanjeev Chandan Rajdhir Singh … हा …हा ..हा….

संजीव चंदन के फेसबुक वॉल से.

Court quashed criminal proceedings against Priyabhanshu in Nirupama Murder Case

: IIMCAA Statement on HC Order in Nirupama Case : Hon. Jharkhand High Court quashed criminal proceedings against Priyabhanshu Ranjan in Nirupama Pathak Murder Case today. We have from the beginning believed that Nirupama was killed by her family members on April 29 three years ago. But the administration under pressure was trying to implicate Priyabhanshu.

Today's judgement has upheld our belief in Priyabhanshu that he was in no way involved in Niru's death. In fact her death was the biggest loss for him. While our demand to clear Priyabhanshu name has been met with the HC order. Our fight for justice continues. We will not rest till Niru's killers… her family is punished. R.I.P. Niru.

Mukesh Kaushik

President
IIMC Alumni Association

बेलगाम नौकरशाही राज्‍यमंत्री पर भारी

प्रदेश मे बेलगाम नौकरशाही सरकार के मंत्रियों पर भी भारी पड़ रही है।प्रदेश सरकार के मंत्रियों की आवाज भी सरकारी अफसर अनसुना कर दे रहें है।मामला गाजीपुर के समाज कल्याण विभाग से जुड़ा हुआ है। जहां एक महिला के प्रार्थनापत्र पर कार्यवाही को राज्यमंत्री विजय मिश्र की सिफारिश के बावजूद चार महीनों से सरकारी कर्मचारी और अधिकारी लटकायें हुये हैं।बताया जा रहा है,कि जिले के सौरम गांव की रहने वाली एक महिला ने पति के मरने के बाद पारिवारिक लाभ के लिए समाज कल्याण विभाग मे प्रार्थना पत्र दिया। सदर विधायक और प्रदेश सरकार मे राज्यमंत्री विजय मिश्र ने महिला के प्रार्थना पत्र पर बीते जनवरी माह मे अपनी सिफारिश भी लगाई,लेकिन समाज कल्याण विभाग की ओर से आज तक कोई कार्यवाही नही की गई।महीनों से इस मामले के लंबित होने से और खुद कई बार निर्देशित करने के बाद भी कार्यवाही न होने से नाराज राज्य मंत्री आज खुद विभाग मे जा पहुंचे और अधिकारियों को कार्य प्रणाली मे तेजी लाने का निर्देश दिया।इस मौके पर मीडिया के सवालों का जवाब देते हुये राज्य मंत्री ने सरकारी विभागों की कार्यवाही पर लापरवाही का आरोप लगाया।उन्होने सरकारी दफ्तरों मे सरकार की मंशा के अनुरुप कार्य न होने का आरोप लगाते हुये कहाकि सरकारी दफ्तरों मे कर्मचारी और अधिकारी निष्क्रिय बने हुये है। जब मेरे कहे को ये अनसुना कर दे रहे है तो जनता का क्‍या होता होगा।

फोटो नहीं देने पर पुलिस ने अमर उजाला के दो जर्नलिस्‍टों को घंटों हिरासत में रखा

आगरा में पुलिस ने अमर उजाला के दो पत्रकारों को सोमवार की रात को एक घंटे से ज्‍यादा समय तक हिरासत में रखा। एत्‍मादपुर इलाके में साम्‍प्रदायिक तनाव की तस्‍वीरें खींचने पर एसएसपी को गुस्‍सा आ गया था। एसएसपी ने कैमरे की चिप मांगी। अमित और मनीष नामक पत्रकारों ने चिप देने से मना कर दिया। इसके बाद एसएसपी के आदेश पर दोनों को थाने में बैठा लिया गया। एसएसपी ने दोनों को मां-बहन की गालियां दी। इनमें से एक फोटोग्राफर है और एक रिपोर्टर।

इस खबर को हिन्‍दुस्‍तान अखबार ने प्रकाशित किया है। लेकिन अमर उजाला चुप बैठा रहा। उसके संपादक ने केवल पत्रकारों को छुड़ाने की मेहनत की। पुलिसिया कार्रवाई के विरोध में अमर उजाला में एक शब्‍द नहीं लिखा गया है। अमर उजाला के अधिकारियों ने अपने दोनों पत्रकारों को शांत रहने को कह दिया है। आगरा के पत्रकारों में यह चर्चा का विषय बना हुआ है। हर पत्रकार गुस्‍से में है। खून खौल रहा है। जब अमर उजाला ही चुप है तो कैसे दूसरे पत्रकार इसका विरोध करें। हद कर दी संपादक ने।

एक दिन पहले ही एसएसपी ने आगरा के तीन प्रमुख अखबारों के संपादकों के साथ बैठक की थी। इसमें पुलिसकर्मियों के साथ एसएसपी ने बताया था कि कैसे अखबारों में खबरें प्रकाशित की जानी चाहिए। एसएसपी ने अपने मनमुताबिक खबरें प्रकाशित करने के लिए दबाव भी बनाया था। इसी का नतीजा था कि रात को एसएसपी का मन बढ़ गया और अमर उजाला के पत्रकारों को हिरासत में ले लिया। संपादक जी कुछ बोल भी नहीं रहे हैं।

सीपीजे ने कहा – जितेंद्र सिंह की हत्‍या की जांच कराए सरकार

वाशिंगटन। पत्रकारों के हितों की पैरोकार संस्था ‘कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ (सीपीजे) ने भारत सरकार से आग्रह किया है कि झारखंड में एक पत्रकार की हत्या की जांच की जाए। सीपीजे के एशिया क्षेत्र के समन्वयक बॉब डेट्ज ने एक बयान में कहा कि भारत सरकार को हत्या के पीछे का मकसद का पता लगाने और हत्यारों को न्याय के जद में लाने के लिए विस्तृत जांच करानी चाहिए।

झारखंड के खूंटी जिले में एक हिंदी अखबार के पत्रकार जितेंद्र सिंह की बीते 27 अप्रैल को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया ने इस हत्या की जिम्मेदारी स्वीकार की थी। (भाषा)

दैनिक भास्‍कर से प्रमोद वशिष्‍ठ का इस्‍तीफा

दैनिक भास्‍कर, चंडीगढ़ से खबर आ रही है कि प्रमोद वशिष्‍ठ ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे ब्‍यूरोचीफ के पद पर कार्यरत थे. प्रमोद के इस्‍तीफा देने के कारणों की जानकारी नहीं मिल पाई है. प्रमोद 16 सालों से दैनिक भास्‍कर को अपनी सेवाएं दे रहे थे. वे अपनी नई पारी किस संस्‍थान के साथ शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. प्रमोद वशिष्‍ठ का इस्‍तीफा भास्‍कर के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. गौरतलब है कि इसक पहले भी भास्‍कर से कई लोग इस्‍तीफा देकर जा चुके हैं.

सूचना आयुक्त की नियुक्ति प्रत्यावेदन का निस्तारण करें : हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच ने आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा दायर रिट याचिका में राज्य सूचना आयोग में सूचना आयुक्त पद पर उन्हें नियुक्त करने सम्बंधित प्रत्यावेदन पर नियमानुसार निर्णय लेने के आदेश पारित किये हैं. जस्टिस उमा नाथ सिंह और जस्टिस महेंद्र दयाल की बेंच ने प्रमुख सचिव, प्रशासनिक सुधार विभाग और प्रमुख सचिव, मुख्यमंत्री को आदेशित किया कि इस सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की परिधि में उचित निर्णय लिया जाये.

लखनऊ स्थित आरटीआई कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा ने 09 अप्रैल 2012 के अपने प्रत्यावेदन द्वारा अखिलेश यादव, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश से अनुरोध किया था कि राजनैतिक पहुँच वालों के स्थान पर वास्तविक रूप से सक्रिय और जानकार आरटीआई कार्यकर्ताओं को ही सूचना आयुक्त के पद पर तैनात किया जाए. उन्होंने एक ऐसे नाम के रूप में नूतन का बायोडाटा प्रस्तुत किया था.

नूतन ने 24 जनवरी 2013 के प्रत्यावेदन के माध्यम से राज्य सरकार से निवेदन किया था कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में पारदर्शिता बरती जाए, इसके लिए सभी इच्छुक अभ्यर्थियों से आवेदन प्राप्त कर पारदर्शी तौर-तरीके से उनकी नियुक्ति की जाए. वर्तमान में उत्तर प्रदेश में सूचना आयुक्तों के आठ पद खाली हैं जिन पर शीघ्र नियुक्ति होना संभावित है.

वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (सताईस) : मतदान की पूर्व संध्या और लिट्टी-चोखा का आनंद

चुनाव के लिए मतदान की पूर्व संध्या महत्वपूर्ण होती है। इसके लिए उम्मीदवार पूरी तैयारी कर लेते हैं। धनबल से लेकर बाहुबल तक। कोई किसी से कम नहीं। वोटरों को जोड़ने-फोड़ने-तोड़ने से लेकर खरीदने तक सभी कर्म-कुकर्म इसी रात को होते हैं। क्योंकि अगली सुबह का एक-एक पल महत्वपूर्ण होता है। एक-एक वोट का समीकरण से लेकर कीमत तक निर्धारित होती है। जीत का सपना पाल रहे उम्मीदवारों के लिए इसी रात का इंतजार होता है। वोटर की चुप्पी तो मतगणना के दिन ही टूटती है। लेकिन चुप्पी को बेसकीमती समझने वाला वोटर वसूली का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहता है।

खानों में बंटे वोटर वसूली की मर्यादा तय कर लेते हैं। यादव, मुसलमान व पासवान को छोड़ दें तो अन्य उम्मीदवारों की जाति कोई मायने नहीं रखती थी। हर उम्मीदवार अपनी सीमाओं में अधिकतम कीमत चुकाने को तैयार था। कोई गांव के रूप में कीमत चुका रहा था तो कोई जाति के रूप में। यही वजह थी कि हर उम्मीदवार को अपने ही गांव व टोले में वोट मिले। अपना न टोला था, न गांव। जाति का भी भरोसा नहीं था। इस कारण निश्चिंत थे।

19 दिसंबर, 12 को दिनभर इस गांव से उस गांव जनसंपर्क करता रहा। जनता के आश्वासन का पुलिंदा कंधे पर रख कर थका-हारा शाम को घर की ओर चला। चुनाव क्षेत्र से करीब 6 किमी दूर। बस में सवार हुआ। बस अपनी गति से चली जा रही थी। बस वाले ने न किराया मांगा और न मैंने दिया। चुनाव के समीकरण को लेकर मंथन चल रहा था। इस बीच में मैंने पत्नी संजू को फोन लगाया और कहा कि आज लिट्टी-चोखा बनाना। बस चली जा रही थी। स्टॉप आया जिनोरिया। बस वाले ने आवाज लगाई। मेरा ध्यान टूटा। बस से उतरा। बस आगे बढ़ गयी। आसमान में अंधेरा छा चुका था। ठंड अपने वेग में थी। उससे बचने की कोशिश कर रहा था। पैदल ही चलते-चलते घर पहुंचा। बच्चे सो चुके थे। पत्नी इंतजार कर रही थी। लिट्टी अभी आग में पक ही रही थी। चोखा बन गया था।

हाथ-पैर धोकर रजाई में घुसा। थोड़ी देर बाद पत्नी थाली में लिट्टी-चोखा लेकर आयी। कटोरी में घी भी था। गरम घी की सुगंध में थकान धूमिल हो गई थी। घी की सुगंध ने बचपन को सामने लाकर खड़ा कर दिया। घर में कुछ भैंस रहती थी। दूध बैठता था। गोइठा की धीमी आंच में घंटों दूध उबलता था। सफेद रंग का दूध लाल हो जाता था। उस दूध का बना दही एकदम लाल। खाने का स्वाद ही निराला। दही को मथ कर निकाला गया मक्खन और उससे बना घी। दादी सप्ताह में एक या दो बार मक्खन को आंच पर चढ़ाती थी। जिस दिन मक्खन को करकराया जाता था, उस दिन पूरे घर का माहौल सौंधा हो जाता था। कड़ाही से घी को बर्तन में डालने के बाद खाली कड़ाही भी चाटने का मौका मिल जाता था। उस दिन घी की वही सुगंध याद आ गयी थी।

चुनाव की पूर्व संध्या पर जनसंपर्क की हड़बड़ी नहीं थी। अगली सुबह जनता को जहां वोट देना है, देगी। बस, जमकर खाओ और रजाई ओढ़कर आराम करो। यही एक काम बच गया था। लिट्टियों को तोड़कर उन्हें घी में डुबोया। लिट्टी भी गरम थी और घी भी। पत्नी की उपस्थिति माहौल को और रोमांटिक बना रही थी। एक-एक कर कई लिट्टियों का भोग लगा चुका था। करीब 20 दिनों तक लगातार जनसंपर्क, उलाहना, अपेक्षा, विश्वास के साथ जीत जाने की कोशिश पर अब विराम लग चुका था। हमारा हर प्रयास आज पूर्णता पर था। एक-एक वोट के लिए पल-पल की पहल की परिणति अगली सुबह होने वाली थी। प्रयास हमारे वश में था, परिणाम तो जनता को तय करना था।

जनता की अदालत में 20 दिनों तक घूम-घूम कर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी थी, वोट मांगा था। इससे ज्यादा मैं कुछ करने की स्थिति में नहीं था। अगली सुबह जल्दी उठकर मतदान केंद्रों का जायजा लेना था। इसकी हड़बड़ी थी। लिट्टी भी अपना असर दिखाने लगी थी। पत्नी बर्तन लेकर कमरे से बाहर निकली और मैं रजाई में समा गया।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क kumarbypatna@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा

शारदा मीडिया के पूर्व सीईओ कुणाल घोष से पूछताछ

कोलकाता। चिटफंड घोटाले में शारदा ग्रुप के अध्यक्ष सुदीप्तो सेन के आरोपों से घिरे शारदा मीडिया के पूर्व सीईओ एवं टीएमसी के राज्यसभा सदस्य कुणाल घोष को सोमवार को पुलिस ने पूछताछ के लिए बुलाया। मामले की जांच कर रही विधाननगर सिटी पुलिस ने घोष को बुलाया। घोष ने बताया कि उपायुक्त (जांच विभाग) अर्णव घोष ने उन्हें फोन किया और कहा कि वह उनसे बातचीत करना चाहते थे। तृणमूल सांसद ने कहा, 'वह मुझसे बातचीत करना चाहते थे और मैं आया हूं।'

इससे पहले दिन में घोष ने कहा था कि वह किसी भी जांच का सामना करने के लिए तैयार हैं और उन्होंने पुलिस से अनुरोध किया है कि उनकी बात सुनी जाए। सेन ने सीबीआई को लिखे पत्र में कुणाल के खिलाफ आरोप लगाये थे। घोष ने कहा था, 'मैंने पुलिस से बात करने और मेरा पक्ष सुने जाने का अनुरोध किया है। मैं सहयोग करने और किसी भी जांच का सामना करने को तैयार हूं।'

तृणमूल कांग्रेस सांसद ने कहा कि इस मुद्दे पर उनके खिलाफ दुष्प्रचार किया जा रहा है। सीबीआई को लिखे पत्र में सेन ने घोष पर एक खबरिया चैनल उन्हें बेच देने के लिए कुछ दस्तावेजों एवं पत्रों पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य करने का आरोप लगाया था। (भाषा)

My ex-employer Provident Fund Form has not been attested

Dear Sir, Subject:  My ex-employer Provident Fund Form has not been attested. This is to inform you that, I was employed with M/s “CVK Mind Source Consulting Services Private Limited” bearing PF A/C No KN/BN/41509/358 and left the said company on 30/04/2010.

I am continuously trying to withdraw my P.F amount from last three year but not getting the response from the ex-employer. In this three year I had got dangerous diseases- cancer and brain ham rage (Right hemisphere disability (paralyzed) – since 16.07.2010 – during Chemotherapy treatment).

So, Documents attested by Authorized officer and sent by speed post (EU875207080IN) to "Office Of Regional P.F Commissioner, Bhavishyanidhi Bhavan, No. 13, Raja Ram Mohan Roy Road,  Bangalore – 560 025 (KN)"  on 22/04/2013.

Requesting you please see this matter on high priority basis and  please revert back to me with complaint number.

I am sent the complete documents for your reference i.e. offer letter, experience letter, salary slip, Resignation Letter, SALARY CERTIFICATE, salary structure, bank statement , e-mail’s, paralysis certificate, medical certificate, Employee details, Employer details and complaint application.

Thanking you.

Regards

Sunil mishra

Amethi

चैनल हेड निशांत चतुर्वेदी पर हमला, आरोपी पत्रकार बर्खास्त

न्यूज़ एक्सप्रेस चैनल हेड निशांत चतुर्वेदी पर हमला करने वाले पत्रकार कुबेरनाथ को प्रबंधन ने तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर दिया है। बताया जा रहा है कि पत्रकार तब भड़का जब उससे एक रेप पीड़िता की खबर के बारे में, गलत तरीके से खबर चलाने को लेकर सवाल-जवाब किया जा रहा था। घटना के बाद आरोपी पत्रकार ने अपनी गलती मान ली और एक पत्र लिखकर क्षमा याचना भी की, लेकिन प्रबंधन ने घटना को अप्रत्याशित बताते हुए आरोपी पत्रकार को तुरंत प्रभाव से बर्खास्त कर दिया।

पूरी घटना को देखते  हुए पुलिस में भी तहरीर दी गई है, ताकि आने वाले समय में किसी भी अप्रिय घटना से बचा जा सके। चैनल हेड की शिकायत पर सेक्‍टर 58 की पुलिस कुबेर को अपने साथ लेकर गई है। कुबेर की शादी भी अगले महीने में होने वाली है।

सीबीआई हलफनामे पर सुप्रीम कोर्ट सख्‍त, कहा – भरोसा तोड़ा गया

नई दिल्ली। कोयला घोटाले पर सीबीआई के हलफनामे को लेकर सरकार की किरकिरी और बढ़ गई है। विपक्ष तो सरकार पर हमलावर है ही, सुप्रीम कोर्ट भी सरकार के रवैये से नाखुश है। सुप्रीम कोर्ट ने हलफनामे में सरकारी दखल को लेकर सख्त टिप्पणियां की हैं। इसे लेकर हो रही सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार से सीबीआई को सियासी दवाब से मुक्त करने को कहा। आज सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई शुरू होते ही कोर्ट ने सख्त रूख अपनाते हुए कहा कि हलफनामे की बातें बहुत ही चिंताजनक हैं। जिस तरह से स्टेटस रिपोर्ट को सरकार के लोगों से शेयर किया गया है उससे पूरी प्रक्रिया को झटका लगा है। सरकार ने हमारा भरोसा तोड़ा है।

कोर्ट ने कहा कि स्टेटस रिपोर्ट सरकार से साझा करने से हमारी जांच की बुनियाद हिल गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस तरह से स्टेटस रिपोर्ट को शेयर किया गया है। उससे कोर्ट का भरोसा टूटा है। सुप्रीम कोर्ट ने कठोर टिप्पणी करते हुए सीबीआई से पूछा कि सुप्रीम कोर्ट को जांच रिपोर्ट को सरकार से साझा करने को अंधेरे में क्यों रखा गया? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारा पहला काम ये होना चाहिए की सीबीआई को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना चाहिए। सीबीआई को स्वतंत्र करना जरूरी है।

वहीं बीजेपी के नेता राजीव प्रताव रूडी ने कहा कि ये सामान्य स्थिति में टिप्पणी नहीं हो रही है। स्टेटस रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट चिंतित है। इस मामले में देश के पीएम का नाम जुड़ा है। गौरतलब है कि भाजपा समेत कई विपक्षी दल इस मामले को लेकर सरकार के कानून मंत्री का इस्‍तीफा मांग रहे हैं। सीबीआई रिपोर्ट में बदलाव सरकार के गले की हड्डी बन गया है।

अमर उजाला का हाल : सीएमओ और पत्रकारों को बंधक बनाया फिर भी खबर में निजी पैथोलॉजी लैब का नाम नहीं

रुद्रपुर (उत्तराखंड)। एक निजी पैथोलॉजी सेंटर वालों ने अल्ट्रासाउंड मशीन की रुटीन जांच को आये मुख्य चिकित्साधिकारी और उनके अधिनस्थों के साथ बदसलूकी की। मामले की खबर कवर करने गये पत्रकारों और प्रेस फोटोग्राफरों सहित सीएमओ को पैथोलॉजी सेंटर वालों ने बंधक बना लिया। इसकी खबर हल्द्वानी उत्तराखंड से प्रकाशित दैनिक अमर उजाला में आज 28 अप्रैल को छपी है, लेकिन पैथोलॉजी सेंटर का नाम नहीं छपा। पत्रकारों ने मामले की तहरीर सौंप दी है। डीजी (हेल्थ) डा. वाईसी शर्मा ने आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात कही है।

शनिवार देर शाम सीएमओ डा. राकेश सिन्हा, वीर सिंह और नगर निगम काशीपुर के मुख्य नगर स्वास्थ्य अधिकारी डा. टीके शर्मा के साथ रामनगर मार्ग पर चीमा चौराहा के निकट स्थित एक पैथोलॉजी लैब पहुंचे। पत्रकार और फोटोग्राफर भी वहां पहुंच गए। लैब स्वामी के गाजियाबाद होने से सीएमओ ने उनसे मोबाइल पर बात की तो डॉक्टर ने लौटने पर जानकारी उपलब्ध कराने की बात कही। इसी दौरान डॉक्टरों की यूनियन से जुड़ा एक चिकित्सक सीएमओ से उलझ गया। कुछ अन्य ने भी सीएमओ और उनकी टीम से अभद्रता की।

प्रेस फोटोग्राफरों के साथ भी अभद्रता कर कैमरे छीन लिए। कुछ लोगों ने अस्पताल का शटर गिराकर सीएमओ, उनकी टीम और पत्रकारों को बंधक बना दिया। अन्य पत्रकारों के पहुंचने पर सभी को छोड़ दिया गया। सीएमओ ने कहा कि सरकारी काम में बाधा पहुंचाने और अभद्रता करने के लिए डॉक्टर के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा नोटिस दिया जाएगा। पत्रकारों ने कोतवाली पहुंच मामले में दो चिकित्सकों के खिलाफ तहरीर सौंपी है।

जनसंदेश टाइम्‍स में पत्रकार काम करते हैं या कबाड़ी?

पत्रकार के लिए जरुरी है खबरों की समझ। इसके अलावा विषय का अच्छा ज्ञान और शब्दों एवं वाक्यों में शुद्धता का पूरा ध्यान। लेकिन जब अखबार के लोग पत्रकारिता को आड़ बनाकर केवल कोरम पूरा करते चलें तो यहीं पत्रकारिता की हत्या होती है। यह बात 'जनसंदेश टाइम्स' के वाराणसी यूनिट ऑफिस में डेस्क पर काम कर रहे लोगों और जिले में काम कर रहे पत्रकारों पर सटीक बैठती है। ऐसा इसलिए क्योंकि जब जनसंदेश टाइम्स बनारस में आया तो उसके साथ बनारस की पत्रकारिता के 'तथाकथित दिग्गज' भी आये।

टीम को सर्वोत्तम का दर्जा स्वयं ही इस टीम ने दे दिया। लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी जो दशा इस अखबार की है, उससे लगता है कि यह अखबार से जुड़े उपर के लोग भी केवल जो सामग्री जिले से भेजी जा रही है उसे चेक नहीं करते और आँख बंद करके जस का तस उतार कर अपनी इतिश्री कर रहे हैं।

अखबार में दो खबर इस हफ्ते में छपी। पहली 23 अप्रैल को मंत्री शिवपाल यादव चन्दौली जिले के कसवड़ (सकलडीहा तहसील) में आने की थी। अखबार के पत्रकारों ने अपने-अपने जिला कार्यालय को खबर दी। जनसंदेश टाइम्स ने मेन लीड लेते हुए इस खबर को दो जगह से छापी। मतलब एक ही खबर दो डेटलाइन से। पहली खबर सकलडीहा से तो दूसरी चन्दौली ब्यूरो कार्यालय से छपी। एक ही कार्यक्रम में सांसद विधायक समेत कई लोगों के नाम दो-दो जगह प्रकाशित हुए। यहां साफ दिखायी देता है कि ब्यूरो कार्यालय का अपने संवाददाताओं से भी सामंजस्य नहीं है। लेकिन इससे भी बड़ी गलती डेस्क प्रभारी और सम्पादकीय विभाग से हुई जिसने इस चूक को नजरअंदाज कर दिया और एक ही खबर को दो अलग जगहों से छाप दिया। यह पत्रकारिता के नाम पर मजाक नहीं तो और क्या है।

दूसरी घटना 29 अप्रैल के अंक में दिखायी पड़ी कि मुगलसराय में एक सेनेटरी के शो-रुम का उद्घाटन हुआ। उद्घाटन सांसद रामकिशुन ने किया। खबर छपी सेकेंड लीड के रुप में और हेडिंग लगा कि विधायक ने किया सेनेटरी हाउस का उद्घाटन। चूंकि स्थानीय संवाददाता ने खबर बनाकर ब्यूरो कार्यालय भेजा होगा, वहां खबर को भेज कर इति श्री हो गयी। बनारस डेस्क पर खबर गयी तो उपर के लोगों ने भी बस देखा होगा कि खबर आ गयी। पेज सेट किया चिपकाया और भेज दिया छपने के लिए। जबकि पूरे खबर में सांसद रामकिशुन लिखा हुआ है। इससे जनसंदेश के पत्रकारिता के स्तर का पता चलता है जहां पत्रकारिता कम, मजाक और हत्या ज्यादा होती है। क्या संदेश दे रहा है जनसंदेश पाठकों को। ऐसे अखबारों को तत्काल नोटिस जारी कर देनी चाहिए।

रितेश कुमार

ritesh26192@gmail.com

मीडिया के सहयोग से भयादोहन एक कुटीर उद्योग का रूप लेता जा रहा है

असम के मीडिया के बारे में कहा जाने लगा है कि यहां जरूरत से अधिक मीडिया हो गया। जरूरत से अधिक अखबार छप रहे हैं, कई ऐसे हैं जो जीवन रक्षक दवाओं के सहारे चल रहे हैं लेकिन फिर भी चल रहे हैं। यही हाल चैनलों का है। कई ने ठीक से चलना भी नहीं सीखा कि उनके सामने अपने जनम-मरण का सवाल आ गया।

कुछ लोगों को इनकी अधिक संख्या को लेकर आपत्ति है। कहते हैं इतने ज्यादा अखबारों और चैनलों की क्या जरूरत है। लेकिन हमारा मानना है कि बीस अखबार होना कोई बुरी बात नहीं है। क्योंकि भारत की तरह असम में भी विभिन्न समुदायों के लोग रहते हैं। उनके विभिन्न दृष्टिकोण हैं। जिस तरह राजनीति में विभिन्न राजनीतिक पार्टियां अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं उसी तरह मीडिया में विभिन्न अखबार भी बने रहें तो क्या आपत्ति है। लेकिन सवाल है कि ये बीस अखबार क्या बीस दृष्टिकोण लेकर चल रहे हैं? क्या किसी एक सवाल पर इन अखबारों में बीस अलग-अलग पहलू निकलकर आते हैं?

अफसोस की बात यही है कि ये बीस अखबार मिलकर एक अखबार का ही काम कर रहे हैं। असम में ऐसे लोग कम ही हैं जो किसी एक विषय पर अपनी सुचिंतित राय रखते हों। इसलिए अधिकांश अखबारों के संपादकीय पृष्ठों तक जाने की जरूरत ही नहीं होती। ये बीस अखबार मिलकर किसी एक भीड़ की तरह काम करते हैं। बातचीत के दौरान एक मित्र ने आरोप लगाया कि हाल ही में उभर कर आया एक "मसीहा' मीडिया की ही उपज है। हमने मित्र को समझाया कि हमारे यहां मीडिया कोई ऐसी चीज नहीं है जो अपने विवेक से निर्णय लेता हो। या जिसके कामों के पीछे कोई पूर्व परिकल्पना हो। यह एक भीड़ की तरह काम करता है। मान लीजिए किसी चौराहे पर कोई एक व्यक्ति कोई हंगामा कर रहा है या कोई हैरतअंगेज हरकत कर रहा है। वहां हमारे जैसे आते-जाने लोग उत्सुकतावश खड़े हो जाएंगे। यदि हंगामा दिलचस्प हुआ तो वहां काफी देर तक रहेंगे। और न हुआ तो आगे अपने काम के लिए निकल जाएंगे। अब हो सकता है कोई आरोप लगाए कि रास्ते पर आने-जाने वाले इन लोगों ने इस हंगामा खड़ा करने वाले की औकात इतनी बढ़ा दी है। लेकिन रास्ते पर गुजरने वाले लोगों ने सिर्फ अपने स्वभाव के अनुकूल काम किया है। उसके काम के पीछे कोई योजना नहीं है।

यही बात हमारे आज के मीडिया पर लागू होती है। कहीं भी कोई हंगामा खड़ा हो जाए तो वहां मीडिया पहुंचकर उस घटना के महत्व को बढ़ाने में अनजाने में लग जाता है। इसके पीछे कोई योजना नहीं होती। वह एक भीड़ की मानसिकता से काम करता है। भीड़ किसी भी घटना की तह में जाने की कोशिश नहीं करती। यदि मारो-मारो कहकर किसी व्यक्ति को दो-चार लोग पीटने लग जाएं तो बाकी भीड़ भी उसे पीटने पर उतारू हो जाती है। वह उन शुरू में पीटने वाले लोगों की बात पर विश्वास कर लेती है कि पिटने वाला व्यक्ति चोर है।

मीडिया की इस मानसिकता का लाभ कई शातिर दिमाग वालों ने उठाया है। अपने प्रतिद्वंद्वी को फंसाने के लिए उसके विरुद्ध किसी तरह का आपराधिक मामला दायर कीजिए और इसके बाद मीडिया के अपने मित्रों को बुला लीजिए। अपने प्रतिद्वंद्वी को आप बदनाम तो कर ही देंगे साथ ही भविष्य में उसे तंग न करने की एवज में मोटी राशि भी ऐंठ सकते हैं। अधिकांश संवाददाता आज भी यह सोचते हैं कि थाने में रपट का होना ही किसी के विरुद्ध कुछ भी लिखने की पूरी आजादी दे देता है। इसका एक दूसरा रूप भी है। मान लीजिए किसी अस्पताल में किसी की अस्वाभाविक मौत हो गई। आप उस अस्पताल पर इलाज में लापरवाही बरतने का आरोप लगाते हुए वहां जाकर हंगामा कीजिए, साथ ही मीडिया के अपने मित्रों को बुला लीजिए, कैमरों के सामने कुछ तोड़-फोड़ कीजिए। मीडिया वालों के जाने के बाद आप अस्पताल के मालिकों के साथ मोटी रकम का लेन-देन कर सकते हैं। हमारे राज्य में यह एक अचूक नुस्खा है और मीडिया के सहयोग से भयादोहन एक कुटीर उद्योग का रूप लेता जा रहा है।

रोज एक "मसीहा' बनाने का आरोप लगाने वाले मित्र के सामने हमने अरविंद केजररवाल का उदाहरण रखा। कल तक उसे मीडिया की उपज कहा जा रहा था। लेकिन अब जब वे दो सप्ताह तक अनशन पर बैठे रहे तो वही मीडिया कहां गायब हो गया। क्या मीडिया ने आपस में कोई मंत्रणा कर ली कि अब इस "मसीहा' को आगे नहीं दिखाना है। दरअसल इसका कारण है मीडिया की भीड़ मनोवृत्ति। कल तक केजरीवाल के तमाशे में रस मिल रहा था। इसे मीडिया वाले न्यूज वैल्यू कहते हैं। आज वह रस खत्म हो गया तो मीडिया भी मोदी बनाम राहुल के बेमतलब विमर्श में व्यस्त हो गया। दो सप्ताह तक अन्न-जल छोड़ने वाले केजरीवाल की ओर उसने झांका तक नहीं।

असम में इतने अखबार निकलते हैं लेकिन किसी भी राजनीतिक या सामाजिक प्रश्न पर किन्हीं दो अखबारों की राय में रत्ती भर भी फर्क नहीं मिलता। मीडिया राह चलतों की भीड़ की तरह उसकी ही ओर आकर्षित हो जाता है जिसके फेफड़े ज्यादा मजबूत होते हैं। जो अधिक ऊंची आवाज में चिल्ला सकते हैं। चीख-पुकार बंद होते ही वह भीड़ के लोगों की तरह अपने दूसरे काम पर निकल पड़ता है। जहां तक असम के मीडिया की बात है, उसने तो सौ प्रतिशत अपने आपको राजनीतिक रूप से सही-सही कहने की सुरक्षित सीमाओं के बीच कैद कर रखा है। अखबारों पर कोई प्रत्यक्ष दबाव नहीं है लेकिन मीडिया का कुल वातावरण इतनी बौद्धिक धार वाला नहीं है कि वह किसी भी मुद्दे की विभिन्न कोणों से चीरफाड़ कर सके। उसकी इतनी औकात कहां कि वह मसीहा बना सके। वह खुद ही लोगों की नजरों से तेजी से गिर रहा है।

लेखक विनोद रिंगानिया पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. इनसे संपर्क bringania@gmail.com के जरिए किया जाता है.

इंडियन एक्‍सप्रेस और नभाटा में प्रकट हुआ न्‍यूज एक्‍सप्रेस

यशवंतजी, कहा जाता है कि मेहनत का फल जरूर मिलता है. सरबजीत मामले में अनेक चैनलों ने कवरेज किया, लेकिन सभी चैनलों से हटकर साबित हुआ है न्‍यूज एक्‍सप्रेस. इस पर मुहर लगी है कि इंडियन एक्‍सप्रेस और नवभारत टाइम्‍स में प्रकाशित खबर और फोटो से. इन दोनों अखबारों ने सरबजीत के परिजनों को टीवी चैनल पर न्‍यूज देखते हुए कवर किया है और इसमें खास बात यह है कि दोनों अखबारों में सरबजीत के परिजन न्‍यूज एक्‍सप्रेस पर खबर देखते हुए दिखाई पड़ रहे हैं.

न्‍यूज एक्‍सप्रेस की टीम इसके लिए बधाई की पात्र है कि तमाम टीआरपी में खुद को उपर बताने-दिखाने वाले चैनलों के बीच किसी विशेष और बड़े मुद्दे पर न्‍यूज एक्‍सप्रेस चैनल को देख रहे हैं. यह चैनल और उसकी टीम के लिए बड़ी सफलता है. नीचे भेजी गई कटिंग को आप भी देख सकते हैं.

इंडियन एक्‍सप्रेस में प्रकाशित फोटो
नवभारत टाइम्‍स में प्रकाशित फोटो

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

बंदी के कगार पर पहुंच गया है मौर्या टीवी

: प्रकाश झा का हुआ बिहार से मोहभंग : मात्र 34 स्टाफ रह गए हैं पटना कार्यालय में : एक साल से नहीं मिल रहा स्ट्रिंगरों को वेतन : राजनीतिक संपादक नवेन्दू भी गए लंबी छुट्टी पर : पंद्रह करोड में बिकने को तैयार है मौर्या की बिल्डिंग

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मौजूदगी में पूरे तामझाम के साथ 7 फरवरी 2010 को प्रारंभ हुआ मौर्या टीवी चैनल अपनी स्थापना के तीन वर्ष बाद अब दम तोड़ने के कगार पर पहुंच गया है। आने वाले कुछ माह के अंदर अगर यह चैनल बंद हो जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। सूत्रों की माने तो बीते दिनों गांधी मैदान में आयोजित बिहार दिवस में अपनी हुई उपेक्षा से चैनल के मालिक सह चर्चित फिल्म निर्माता प्रकाश झा काफी दुखी हैं और उन्होंने बिहार को अलविदा कहने और अब अपना सारा ध्यान फिल्म निर्माण में ही लगाने का मन बना लिया है।

मौर्या टीवी को बंदी के कगार पर पहुंचाने में मुख्य भूमिका प्रकाश झा के भांजे और चैनल के निदेशक मनीष झा की बतायी जाती है। कभी होटल मौर्या में वेटरों को पांच-पांच हजार की टिप्स देने वाले मनीष झा अब साधारण होटल में बैठने को मजबूर हैं। कंपनी की स्थिति यह है कि बीते वर्ष के मार्च महीने से ही दर्जनों स्ट्रिंगरों (वीडियो रिपोर्टरों) को वेतन नहीं मिला है। मौर्या टीवी के पटना स्थित कार्यालय में जहां अब मात्र 30-35 स्टाफ ही रह गए है वहीं इसके राजनीतिक संपादक नवेन्दू के भी लंबी छुट्टी पर जाने की चर्चा है, जिनकी वापसी की उम्मीद ना के बराबर ही बतायी जा रही है। सूत्रों की माने तो मौर्या टीवी का पटना स्थित आलीशान दफ्तर भी पंद्रह करोड रुपये में बिकने का तैयार है जिसकी बिक्री के लिए मोल-भाव चल रहा है।

वरिष्‍ठ पत्रकार विनायक विजेता के एफबी वॉल से साभार.

पंकज प्रसून न्‍यूज नेशन एवं सुमित झा जी न्‍यूज से जुड़े

पंकज प्रसून ने अपनी नई पारी नोएडा में न्‍यूज नेशन के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां प्रोड्यूसर बनाया गया है. न्‍यूज नेशन ज्‍वाइन करने से पहले पंकज नक्षत्र न्‍यूज में प्रोड्यूसर कम एंकर के पद पर कार्यरत थे. सात सालों से मीडिया में कार्यरत पंकज डीडी न्‍यूज, सीएनबीसी आवाज, जूम टीवी, देश लाइव, न्‍यूज11 जैसे चैनलों ने छोटी-छोटी पारियां खेली हैं.

सुमित झा ने जी न्‍यूज ज्‍वाइन किया है. उन्‍हें जी न्‍यूज के एमपी-सीजी चैनल में एंकरिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. सुमित इसके पहले महुआ न्‍यूज को अपनी सेवाएं दे रहे थे.

सहारा ने दी सफाई – नहीं की सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना

नई दिल्‍ली। सहारा समूह और इसके प्रवर्तक सुब्रत राय ने सोमवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि उनके खिलाफ आदेश की अवमानना का कोई मामला नहीं बनता, क्योंकि उन्होंने सेबी को दस्तावेजों की आपूर्ति करने के मुद्दे पर न्यायालय के निर्देशों का पालन किया है और अपने निवेशकों को 24000 करोड़ रुपए लौटाना शुरू कर दिया है।

सहारा समूह ने न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मामले का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने अवमानना के नोटिस के संबंध में हलफनामा दाखिल किया है और सेबी द्वारा दायर अर्जी के संबंध में जवाब देने के लिए उन्हें और समय की जरूरत है।

नियामक ने राय और अन्य निदेशकों को सिविल हिरासत में लेने की अनुमति मांगते हुए उच्चतम न्यायालय में यह अर्जी दी है। पिछली सुनवाई के दौरान, उच्चतम न्यायालय ने निवेशकों को 24000 करोड़ रुपए नहीं लौटाने और राहत के लिए विभिन्न मंचों से संपर्क कर चालाकी करने के लिए सहारा समूह और राय को फटकार लगाई थी।

न्यायालय ने सेबी की अवमानना संबंधी याचिका पर जवाब नहीं देने के लिए भी समूह और राय को लताड़ लगाई थी और सेबी की याचिका पर उन्हें नोटिस जारी किया था। उल्लेखनीय है कि सहारा समूह की दो कंपनियों एसआईआरईसी और एचएचआईसी द्वारा तीन करोड़ से अधिक निवेशकों को 24000 करोड़ रुपए लौटाने के मुद्दे पर समूह और सेबी कानूनी विवाद में फंसे हैं।

उच्चतम न्यायालय ने 6 फरवरी को सेबी को समूह की दो कंपनियों के बैंक खातों पर रोक लगाने और इसकी संपत्तियों को जब्त करने की अनुमति दी थी। पीठ ने कहा कि वह उसकी याचिका पर 2 मई को विचार करेगी। सहारा की याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी और अधिवक्ता केशव मोहन द्वारा पेश की गई।

उल्लेखनीय है कि सहारा और इसके प्रवर्तकों ने करीब 10 हलफनामे दायर किए हैं और दो अतिरिक्त हलफनामे जल्द ही दायर किए जाने की संभावना है। सहारा के वकीलों ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के आदेश की जानबूझकर अवज्ञा करने का कोई मामला नहीं बनता क्योंकि दस्तावेज सेबी को उपलब्ध कराए जा चुके हैं और अदालत 5 दिसंबर, 2012 को धन जमा करने के मुद्दे पर विचार कर चुकी है। (भाषा)

कवरेज करने गए पत्रकारों पर पुलिस ने बरसाई लाठियां, कैमरा भी तोड़ा

उड़ीसा के बलांगीर जिले में निर्माणाधीन लोअर बांध का विरोध कर रहे लोगों की खबर कवरेज करने गए पत्रकारों पर भी पुलिस ने लाठी चार्ज की. एक पत्रकार की जमकर पिटाई करने के बाद उसका कैमरा भी तोड़ दिया गया. नाराज पत्रकारों ने डीआईजी को पत्रक देकर आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है.

जानकारी के अनुसार बांध का विरोध कर रहे लोगों पर पुलिस लाठियां बरसा रही थी. इसी बीच पूरे घटना का कवरेज कर रहे मीडियाकर्मियों पर भी पुलिस ने लाठियां भांजनी शुरू कर दी. इसमें कई मीडियाकर्मी घायल हो गए. पुलिस कर्मियों ने खासकर मीडियाकर्मी अमिताभ पात्र की पिटाई की. उनका कैमरा भी तोड़ दिया. पत्रकार संगठन पुलिस के इस कार्रवाई की निंदा करते हुए विरोध स्‍वरूप उत्तारांचल पुलिस डीआईजी कार्यालय के समक्ष संबलपुर प्रेस और मीडियाकर्मियों ने प्रदर्शन किया और घटना की जांच के बाद दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई किए जाने की मांग की.

उत्तारांचल पुलिस डीआइजी के अवकाश पर होने से पश्चिमांचल पुलिस डीआईजी आरके शर्मा के नाम ज्ञापन प्रेषित कर पूरे मामले की जानकारी दी तथा आरोपी पुलिस वाले के खिलाफ आवश्‍यक कार्रवाई की मांग की. पत्रकार संगठनों ने बताया है कि मीडियाकर्मी अमिताभ पात्र खबर संग्रह करने बलांगीर जिले के मागुरबेडा गए थे, जहां उनके हाथों में कैमरा देखने के बाद भी पुलिस वालों ने उन पर लाठी बरसाई. घायल अमिताभ को बलांगीर अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

अल जजीरा समेत दस टीवी चैनलों के लाइसेंस रद्द

इराक में सांप्रदायिक तनाव बढ़ने पर सरकार ने दस टीवी चैनलों के लाइसेंस रद्द कर दिए हैं. अल-जज़ीरा टीवी और शर्किया भी उन चैनलों में शामिल हैं जिन पर “हिंसा को भड़काने” का आरोप लगाया गया है. पूरे देश में इनके काम करने पर पाबंदी लगा दी गई है. इराक में एक हफ़्ते से भी कम समय में 170 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं. प्रधानमंत्री नौरी मालिकि इराक में एक “सांप्रदायिक लहर” की बात करते हैं जो बाहर से आई है.

मंगलवार को एक सुन्नी विरोध शिविर पर सेना की छापेमारी के बाद बड़े पैमाने पर संघर्ष शुरू हो गया. उत्तरी इराक में किर्कुक के नज़दीक हविजा कस्बे में सेना की छापेमारी में बीस से ज़्यादा लोग मारे गए थे जिसके विरोध में सुन्नी मंत्रियों ने इस्तीफ़े दे दिए थे. इसके बाद उत्तरी इराक के कस्बों और शहरों के अलावा पश्चिमी इराक के रमाडी और फालुजा में प्रदर्शन शुरू हो गए.

प्रदर्शनकारी शिया-नेतृत्व वाली सरकार पर सुन्नियों से भेदभाव का आरोप लगा रहे हैं और प्रधानमंत्री मालिकि के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं. इराक के संचार और मीडिया आयोग ने एक बयान मं कहा, “सेटेलाइट चैनल घटनाओं को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं, गलत सूचनाएं देते हैं और कानून तोड़ने और इराकी सुरक्षा कर्मियों पर हमले के लिए कहते हैं.”

मीडिया पर निगरानी रखने वाले आयोग ने टीवी कवरेज में सांप्रदायिक लहजे का आरोप लगाया, “अनुशासनहीन मीडिया के फैलाए संदेशों ने सभी जायज़ सीमाएं लांघ दीं और जिससे लोकतांत्रिक प्रकिया पर ख़तरा पैदा हो गया.” बीबीसी के बग़दाद संवाददाता राफ़िद जबूरी कहते हैं कि 10 में ज़्यादातर चैनलों के मालिक सुन्नी हैं और कतर में स्थित अल-जज़ीरा के अरबी चैनलों को सुन्नियों के प्रति नरम माना जाता है. अल-जज़ीरा के बगदाद ब्यूरो प्रमुख उमर अबुल-इलाह ने बीबीसी समाचार को कहा कि अभी तक यह साफ़ नहीं है क्या चैनल के अंग्रेजी-भाषा के प्रसारणों पर भी रोक लगाई गई है या नहीं.

प्रभावित टीवी चैनल

बगदाद टीवी- इस्लामिक पार्टी से ताल्लुक़, शर्किया और शर्किया न्यूज़, बबिलिया- उप प्रधानमंत्री (जो सुन्नी हैं) से ताल्लुक़, सलाहुद्दीन, अनवर 2 (शिया कुवैती चैनल), तघयीर, फालुजा, अल-जज़ीरा – मुख्यालय कतर में है, ग़र्बिया.

अश्‍लील कार्यक्रम और विज्ञापन दिखाने के 62 मामलों में चैनलों पर कार्रवाई

नई दिल्ली। सरकार ने विभिन्न टेलीविजन चैनलों के खिलाफ अश्लील कार्यक्रम दिखाने और महिलाओं और बच्चों को गलत ढंग से पेश करने वाले विज्ञापन दिखाने के 62 मामलों में कार्रवाई की है। सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने सोम को राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में ये जानकारी दी।

उन्होंने कहा कि मनोरंजन चैनलों की आत्म-नियमन संस्था प्रसारण सामग्री शिकायत परिषद ने पिछले वर्ष एक परामर्श जारी किया था, जिसमें चैनलों से टीवी सीरियलों, रियल्टी शो और विज्ञापनों में बच्चों के भाग लेने से संबंधित दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करने को कहा गया था। ये दिशा-निर्देश राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने जारी किये थे।

साक्षी मीडिया चेयरमैन जगन की जमानत याचिका पर सीबीआई को नोटिस

साक्षी मीडिया के चेयरमैन एवं वाईएसआर कांग्रेस के नेता जगन मोहन रेड्डी की जमानत याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को सीबीआई को नोटिस जारी किया। आय के ज्ञात स्त्रोतों के मुकाबले अकूत संपत्ति जमा करने के आरोप में जगमोहन न्यायिक हिरासत में जेल में बंद हैं।

जगन मोहन की पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे के यह सूचित किया कि जगन 5 मई 2012 से ही न्यायिक हिरासत में हैं, न्यायमूर्ति पी सदाशिवम और न्यायमूर्ति एम वाई इकबाल की खंडपीठ ने नोटिस जारी किया। साल्वे ने कहा कि जब रेड्डी की जमानत याचिका अक्टूबर 2012 में सुनवाई के लिए रखी गई तब केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने कहा था कि रेड्डी के खिलाफ सात मामलों में वे अंतिम आरोप पत्र दाखिल करेंगे। रेड्डी के वकील ने कहा कि अब सीबीआई ने एक पृथक आरोप पत्र दाखिल कर दिया है और दावा किया है कि उसे जांच करने में और समय लगेगा।

आजतक का फर्जी आई कार्ड देकर पिता-पुत्र को बना दिया पत्रकार

भरतपुर। थाना मथुरा गेट पुलिस में सुरेश फौजदार निवासी गांव कसौदा थाना सेवर ने दिल्ली निवासी अनिल पांडे के खिलाफ आज तक न्यूज चैनल के फर्जी आई कार्ड बनाने का मामला दर्ज कराया है। थाना मथुरागेट के एसआई रतनलाल ने बताया कि सुरेश फौजदार ने सूचना दी कि मोहल्ला गोपालगढ़ निवासी भगवती व उसके पिता भूपेंद्र द्वारा स्वयं को आज तक न्यूज चैनल का पत्रकार बताते हुए दो न्यूज चैनलों के प्रतिनिधि धनेश चंद व संजीव कुंतल को फोन कर बताया कि उनके यहां राशन का गेहूं सड़ा हुआ आया है इसलिए इसकी कवरेज करें।

जब यह दोनों मौके पर पहुंचे तो पिता-पुत्री ने स्वयं को आज तक न्यूज का प्रतिनिधि बताया व आई कार्ड भी दिखाए। जब कार्ड देने के वाले के विषय में पूछा तो पता चला कि इन दोनों को अनिल पांडे ने आज तक न्यूज चैनल के कार्ड बनाकर दिए हैं। इस पर धनेश चंद व संजीव ने सुरेश फौजदार को सूचना दी। सुरेश फौजदार ने आज तक न्यूज के दिल्ली ऑफिस फोन कर पता किया तो वहां से अनिल पांडे को चैनल कर्मचारी नहीं बताया गया। इस पर थाना मथुरागेट पुलिस में फर्जीवाड़े का मामला दर्ज कराया गया। एसआई रतनलाल ने बताया कि रिपोर्ट के आधार पर मामले की जांच की जा रही है। थाना प्रभारी वीरेंद्र शर्माने बताया कि पूछताछ के लिए अनिल पांडे को हिरासत में लिया गया है।

कवरेज करने पहुंचे मीडियाकर्मियों को पुलिसवालों ने पीटा

चंडीगढ़ के सेक्टर-18 स्थित टैगोर थिएटर में सोमवार को एक वीवीआईपी प्रोग्राम की कवरेज करने पहुंचे एक न्यूज चैनल के कैमरामैन और रिपोर्टर के साथ चंडीगढ़ पुलिस के एक एएसआई ने मारपीट की। मीडियाकर्मियों का कसूर सिर्फ इतना था कि दोनों ने मोटरसाइकिल खड़ी करने के लिए एएसआई से पार्किंग के बारे में पूछ लिया था। इससे नाराज एएसआई ने कैमरामैन और रिपोर्टर के साथ बदसलूकी की और फिर अपने अन्य तीन पुलिसकर्मियों के साथ कैमरामैन को पीटना शुरू कर दिया। पुलिस वाले इतने पर ही नहीं रूके इन्‍होंने मोटरसाइकिल भी तोड़ दी।

चंडीगढ़ के टैगोर थिएटर में पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के कार्यक्रम के दौरान कवरेज के लिए पहुचे न्यूज चैनल एमएच1 के कैमरामैन तारा ठाकुर के साथ पुलिसकर्मियों ने बदसलूकी और मारपीट भी की। तारा सिंह ने बड़ी मुश्किल से अपना कैमरा बचाया, अन्‍यथा वह भी पुलिसकर्मियों के मारपीट की बलि चढ़ जाता। तारा ठाकुर ने बताया कि वह टैगोर थिएटर में कवरेज के लिए जा रहा था। वह जैसे ही गेट से अंदर जा रहा था तभी एक पुलिस कर्मी ने अंदर जाने से रोका। जब उसने रोके जाने का कारण पूछा तो उसके साथ बदतमीजी करते हुए मारपीट की गई। रिपोर्टर मनमोहन सिंह उसे बचाने पहुंचे तो उनके साथ भी मारपीट की गई।

रिपोर्टर महमोहन सिंह ने बताया कि कार्यक्रम के लिए आमंत्रण भेजा था, जिसके बाद वे लोग वहां पहुंचे थे। घटना की जानकारी मिलते ही मौके पर पहुंचे डीएसपी विजय कुमार ने दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए और मामले की जानकारी एसएसपी को दी। उन्होंने भी आवश्‍यक कार्रवाई के आदेश दिए। हालांकि इस मामले में जब पुलिस इंस्पेक्टर हरजिंद्र कौर से जब पूछा गया तो उन्होंने कोई भी बात करने से इनकार कर दिया। घायल कैमरामैन मेडिकल जांच भी करवाई गई।

आदेश श्रीवास्तव ने बनाया आजतक की मुहिम के लिए गाना

: आजतक के ही आलोक श्रीवास्तव ने लिखा गीत : दिल्ली में पांच साल की गुड़िया के साथ हुए दुष्कर्म से आहत संगीतकार आदेश श्रीवास्तव ने आजतक की मुहिम के लिए एक ख़ास गीत बनाया है। ‘एक अजन्मी बेटी का डर’ बयां करते इस गीत को आजतक से ही जुड़े पत्रकार और कवि आलोक श्रीवास्तव ने लिखा है।

नज़र आता है डर ही डर तेरे घर-बार में अम्मा,
नहीं आना मुझे इतने बुरे संसार में अम्मा।

आदेश श्रीवास्तव की मार्मिक धुन में ढले इस गीत को जल्द ही एक ख़ास कार्यक्रम के ज़रिए आजतक की मुहिम के तौर पर देखा-सुना जा सकेगा। इससे पहले दिल्ली में निर्भया के साथ हुए दुष्कर्म के बाद भी आजतक ने ऐसा ही एक गीत तैयार किया था, जिसे प्रख्यात शास्त्रीय गायिका शुभा मुदगल ने गाया था। संगीत औनिंदो बोस ने दिया था और आलोक श्रीवास्तव ने लिखा था।

यूपी में सस्पेंडेड दो आईपीएस और दस पीपीएस दोषमुक्त पाए गए

लखनऊ स्थित आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा प्राप्त सूचना के अनुसार पिछले लगभग चार सालों (01 जनवरी 2009 से 13 फ़रवरी 2013) में उत्तर प्रदेश में आईपीएस तथा 24 पीपीएस अधिकारी राज्य सरकार द्वारा निलंबित किये गए. निलंबित आईपीएस अधिकारियों हैं- अजय कुमार मिश्रा, तत्कालीन एसएसपी इटावा (24 मई 2009), ओपी सागर, एसपी प्रतापगढ़ (26 जून 2012), डी के राय, एसपी खीरी (14 जून 2011), जेएन सिंह, डीआईजी मेरठ (26 अप्रैल 2011) और आरपी चतुर्वेदी, एसपी जालौन (01 दिसंबर 2012).

इन पांच में से दो अधिकारियों की बाद में गलती नहीं पायी गयी और वे पूर्णतया दोषमुक्त हुए. इनमें जेएन सिंह दो महीने से भी कम समय में बहाल हो गए और उन्हें कोई आरोपपत्र तक नहीं दिया गया. अजय मिश्रा करीब पन्द्रह महीने निलंबित तो रहे पर वे भी विभागीय कार्यवाही में दोषमुक्त पाए गए. अन्य अधिकारियों की कार्यवाही अभी प्रचलित है.

पीपीएस अधिकारियों में 8 एडिशनल एसपी और 16 डिप्टी एसपी हैं. इनमें भी दस बाद में दोषी नहीं पाए गए. दोषमुक्त अधिकारियों में एडिशनल एसपी कुशहर, केके अस्थाना, अशोक कुमार वर्मा और डॉ. बीएन तिवारी और डिप्टी एसपी जालिम सिंह, अशोक कुमार सिंह, राम शंकर द्विवेदी, संतोष कुमार सिंह और मुकुल द्विवेदी शामिल हैं. यह भी ज्ञातव्य हो कि डॉ. बीएन तिवारी 25 सितम्बर 2012 को एसपी ट्रैफिक के रूप में एक पुलिस कॉन्स्टेबल से जूता बंधवाने के आरोप में निलंबित हुए और 19 अक्टूबर को बहाल भी हो गए, जब उनके विरुद्ध सभी आरोप प्रारंभिक जांच में ही गलत पाए गए. इन 29 मामलों में अब तक कोई भी अधिकारी दोषी सिद्ध नहीं हुआ है.

निलंबन का क़ानून यह है कि एक अधिकारी को तभी निलंबित किया जाए जब उसके खिलाफ गंभीर कार्यवाही अपेक्षित हो पर डॉ. ठाकुर द्वरा प्राप्त सूचनाओं से यही बात साबित होती दिखती है कि उत्तर प्रदेश में ताकतवर नेता मनमर्जी पुलिस अधिकारियों को निलंबित किया करते हैं.

वरिष्‍ठ पत्रकार अंबादत्‍त को सीएम स्‍वेच्‍छानुदान से मिला 50 हजार रुपये

सीहोर : वरिष्ठ पत्रकार श्री अंबादत्त भारतीय के उपचार हेतु मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान मद से 50 हजार रुपये की राशि मंजूर की गई है। इस राशि का चेक जिला पंचायत सीईओ श्री बीएस जामौद ने आज जिला चिकित्सालय में भर्ती श्री अंबादत्त भारतीय को प्रदान किया।

जिला चिकित्सालय के प्रायवेट वार्ड क्रमांक तीन में भर्ती वरिष्ठ पत्रकार श्री अंबादत्त भारतीय का हाल जानने कलेक्टर श्री कवीन्द्र कियावत अस्पताल पहुंचे। उन्होंने श्री भारतीय से चर्चा कर स्वास्थ्य संबंधी जानकारी हासिल की। कलेक्टर ने बताया कि मुख्यमंत्री स्वैच्छानुदान मद से 50 हजार रुपये की राशि उपचार हेतु उपलब्ध कराई गई है। श्री भारतीय ने बताया कि चिकित्सकों द्वारा किए जा रहे उपचार से वे पूर्णत: संतुष्ट हैं। कलेक्टर श्री कियावत एवं सीईओ जिला पंचायत श्री जामौद ने श्री भारतीय के शीध्र स्वस्थ्य होने की कामना की। इस मौके पर सिविल सर्जन डॉ. टी.एन. चतुर्वेदी, डॉ. बी.के.चतुर्वेदी, पत्रकार प्रदीप चौहान, पत्रकार आमिर खान, पत्रकार राजकुमार गुप्ता, पत्रकार बलजीत सिंह ठाकुर, पत्रकार रघुवर दयाल गोहिया आदि मौजूद थे।

पुलिस की पिटाई से युवक की मौत, आक्रोशित लोगों ने पुलिस चौकी फूंकी

गाजीपुर पुलिस की पिटाई से हुई युवक की मौत से आक्रोशित ग्रामीणों ने सोमवार को शादियाबाद थाना क्षेत्र मे जमकर प्रदर्शन किया। आक्रोशित ग्रामीणों ने पुलिस पर युवक की बर्बर पिटाई का आरोप लगाते हुये, हंसराजपुर पुलिस चौकी पर जमकर पथराव, तोड़फोड़ और आगजनी की। मामला पुलिस हिरासत मे पुलिस पिटाई से छात्र की संदिग्ध मौत से जुड़ा हुआ है। घटना क्षेत्र के हंसराजपुर की है। जहां के रहने वाले छात्र घनश्याम राम को पुलिस ने एक लड़की भगाने के मुकदमे मे पूछतांछ के लिए हिरासत मे लिया था। ग्रामीणों का आरोप है कि पुलिस हिरासत से रिहा होने के बाद कल शाम छात्र की अचानक तबियत बिगड़ने लगी और इलाज के लिए ले जाते समय उसकी मौत हो गई। छात्र की मौत के बाद क्षेत्रीय ग्रामीणों के बीच रोष व्याप्त हो गया। सुबह बड़ी संख्या मे लोग सड़क पर उतर आये और छात्र के शव के साथ हंसराजपुर चौराहे पर प्रदर्शन करने लगे। इसी दौरान ग्रामीणों ने दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ तत्काल कार्यवाही की मांग करते हुये रोड जाम कर दी। प्रदर्शन के कई घंटे गुजर जाने के बाद भी मौके पर किसी जिम्मेदार अधिकारी के न पहुंचने पर गुस्साये लोगों ने हंसराजपुर चौकी पर धावा बोल दिया। आक्रोशित लोगों ने पुलिस चौकी पर जमकर पथराव और तोड़फोड़ की। ग्रामीणों के गुस्से को देखते हुये चौकी पर तैनात पुलिस कर्मी जान बचाकर भाग निकले। जिसके बाद आक्रोशित ग्रामीणों ने पुलिस चौकी मे आग लगा दी। इतना ही नही मौके पर पहुंचे दुल्लहपुर थानाध्यक्ष की सरकारी जीप को भी आग के हवाले कर दिया। पुलिस पिटाई मे युवक की मौत पर बढ़ते जनाक्रोश के बाद अब पुलिस अधिकारी पूरे मामले की निष्पक्ष जांच का दावा कर रहे हैं। घटना के बाद मौके पर पहुंचे डीआईजी वाराणसी रेंज सतीश ए.गणेश ने आक्रोशित भीड़ द्वारा जलाई गयी पुलिस चौकी का मुआयना किया। उन्होने स्थानीय पुलिस और ग्रामीणों से पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली। डीआईजी ने घटना स्थल के निरीक्षण के दौरान मृतक युवक के परिजनों से पूछतांछ की। फिलहाल पुलिस ने युवक के शव को पीएम के लिए भेज दिया है,और पुलिस अधिकारी पूरे मामले की निष्पक्ष जांच का दम भर रहें है। — गाजीपुर से केके की रिपोर्ट 9415280945

इंदौर में केबल वार के चलते बड़े पैमाने पर केबल कटिंग

: शहर में केबल कटिंग का दौर जारी हजारों उपभोक्ता परेशान : इंदौर। केबल वार के चलते जिला प्रशासन द्वारा लगाई गई धारा १४४ को धत्ता बताते हुए बीती रात शहर में बड़े पैमाने पर केबल कटिंग हुई। पिछले छह माह से शहर में केबल कटिंग का दौर चल रहा है, जो इस वक्त चरम पर है। जिला प्रशासन ने शनिवार को धारा १४४ के अंतर्गत केबल कटिंग रोकने के कड़े आदेश जारी किए थे। आदेश के अंतर्गत केबल लाइन पर काम करने वाले कर्मचारियों को पहचान-पत्र, ड्रेस कोड और देर रात को काम नहीं करने की बात कही गई थी। एडीएम आलोक सिंह ने सभी मल्टी सिस्टम ऑपरेटर (एमएसओ) को इस आदेश का सख्ती से पालने करने के आदेश दिए गए थे।

शनिवार देर रात शहर के स्कीम नं. ५४, ७४, ७८, ७१, विजय नगर, श्रीनगर, साकेत, शास्त्री ब्रिज, इंडस्ट्री हाउस, तिलक नगर, खजराना, सपना-संगीता रोड, एमआईजी, एचआईजी, महालक्ष्मी नगर, जंजीरवाला चौराहा, सीआरपी लाइन, जावरा वंâपाउंड, छावनी, रेसीडेंसी एरिया, मूसाखेड़ी, आजाद नगर, बड़ा गणपति, सदर बाजार, इमली बाजार, महावर नगर, सुखलिया, गौरीनगर, लाड़काना नगर, छत्रीपुरा, बंबई बाजार आदि इलाकों से केबल काट दी गई। केबल काटने वालों ने न केवल एमएसओ की केबल काटी, बल्कि कई स्थानों से ज्वाइंट बॉक्स, कपलर आदि भी ले उड़े। बीते कुछ माह में इन्हीं इलाकों में कई मर्तबा केबल काटी जा चुकी है।
    
पिछले छह माह से चल रही केबल कटिंग से शहर के हजारों उपभोक्ता परेशान हो गए हैं। इस दरम्यिान बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं ने केबल कनेक्शनों को बाय-बाय कर डीटीएच सिस्टम (डायरेक्ट टू होम) अपना लिया है। परेशान उपभोक्ता अपने केबल ऑपरेटर से संपर्क करते हैं, लेकिन केबल ऑपरेटर शहर के पांच एमएसओ हाथों की कटपुतलियां बनकर रह गए हैं। उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा कि व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के चलते केबल कटिंग से क्या हासिल होता है। डीजी केबल नेटवर्क के वाइस प्रेसीडेंट समीर प्रभाकर का कहना है-‘बीते छह माह में प्रतिस्पर्धी एमएसओ डीजी केबल का लाखों रुपए का नुकसान कर चुके हैं। करीब १०० किलोमीटर फाइबर केबल नष्ट की जा चुकी है और १००० से अधिक ज्वाइंट क्लोजर बॉक्स व ५०० से अधिक कपलर गायब करवाए जा चुके हैं।’
    
दरअसल, शहर में आमद दे रहे नए एमएसओ बाजार में अपने पैर जमाने और केबल ऑपरेटर को अपने साथ जोड़ने के चक्कर में केबल कटिंग का रास्ता अपना रहे हैं, ताकि पुराने एमएसओ की बार-बार केबल कटिंग से निजात पाने के लिए वे मजबूरन नए एमएसओ से जुड़ जाए। इंदौर लोकल केबल ऑपरेटर्स एसोसिएशन के समन्वयक शरद चौकसे ने कहा कि जब भी शहर में कोई नया एमएसओ आता है वो स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के बजाय केबल कटिंग के माध्यम से केबल ऑपरेटर और उपभोक्ताओं को परेशान करता है, ताकि पुराने एमएसओ से वे नाता तोड़ ले। इन दिनों आईपीएल का दौर चल रहा है ऐसे में रोजाना हमें हजारों उपभोक्ताओं की खरी-खोटी सुनना पड़ती है। दुर्भाग्य है कि इंदौर का जिला-पुलिस प्रशासन तमाम शिकायतों के बावजूद केबल कटिंग रोकने में नाकामयाब रहा है।
   
   एमएसओ               नेटवर्क         ऑपरेटर्स    सेटटॉप बॉक्स कीमत
 
डीजी केबल नेटवर्क         ३० प्रतिशत       १३०        ०६००
 
हेथवे केबल एंड डाटाकॉम     ४० प्रतिशत       १८०        १०००   
 
सिटी केबल                २० प्रतिशत       ११०        १०००
 
एसीटी नेटवर्क             ०५ प्रतिशत        ०३०        १०००

रेड टीवी                   ०५ प्रतिशत       ०२०        १००० (रु.)

विवाद की असली वजह सेटटॉप बाक्स

केबल कटिंग के माध्यम से उपभोक्ता और केबल ऑपरेटर को परेशान करने की असली वजह सेटटॉप बॉक्स है। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने ३१ मार्च तक इंदौर शहर के केबल उपभोक्ताओं को अनिवार्य रूप से सेटटॉप बॉक्स लगाने के निर्देश दिए थे, हालांकि अभी उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से इस समय सीमा को बढ़ा दिया गया है। शहर के सभी एमएसओ केबल ऑपरेटर के माध्यम से पांच लाख उपभोक्ताओं को सेटटॉप बॉक्स उपलब्ध कराने में व्यस्त है। दो नए एमएसओ सिटी केबल और हेथवे (पुराना बीटीवी) ने सेटटॉप बॉक्स के रेट अधिक रखे हैं, इस वजह से केबल ऑपरेटर इनसे जुड़ने में गुरैज कर रहे हैं।
    
डीजी केबल नेटवर्क के एसोसिएट वाइस प्रेसीडेंट दुष्यंत झामनानी ने आशंका जताई की नए एमएसओ से जुड़ने के बाद डीजी केबल नेटवर्क के पुराने स्टाफ को केबल कटिंग के काम में लगाया गया है। इस स्टाफ को पूरे केबल नेटवर्क की बारीक जानकारियां हैं, इसलिए ये हर संभव नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऐसे लोगों को खिलाफ नामजद पुलिस रिपोर्ट की जा रही है।
    
छह माह पूर्व शहर में सिटी केबल ने आमद दी थी और हेथवे अपने पैर पसार रहा है। ऐसे में पुराने एमएसओ से स्टाफ की अदला-बदली भी जोर-शोर से चल रही है। इस समय एमएसओ के सीनियर ऑफिसर्स के सामने सिर्फ एक लक्ष्य है अपने सेटटॉप बॉक्स अधिक से अधिक संख्या में लगवाए जाए। सेटटॉप बॉक्स कनेक्शन के मामले में सिटी केबल और हेथवे केबल एंड डाटाकॉम ने हाथ मिलाकर डीजी केबल नेटवर्क को चुनौती पेश की है। इसके उलट शहर के केबल ऑपरेटर नए एमएसओ से जुड़ने में रुचि नहीं दिखाई रहे, क्योंकि उनके सेटटॉप बॉक्स लगभग ४० प्रतिशत अधिक कीमत के हैं। इस बीच, शहर के अधिकांश एमएसओ ने केबल ऑपरेटर को अपनी तरफ आकर्षित करने के चक्कर में बिलिंग भी बंद कर रखी है। उपभोक्ताओं की जेब से जाने वाला प्रतिमाह का किराया अभी सिर्फ केबल ऑपरेटर की जेब में जा रहा है।

उपभोक्ताओं में रोष

– पहले हमें लगता था कि सेटटॉप बॉक्स की अनिवार्यता के चलते केबल बंद हो रही है, लेकिन अब मामला समझ में आया। शहर के एमएसओ आपसी प्रतिस्पर्धा के चलते उपभोक्ताओं की सेवाओं को बाधित कर रहे हैं। सुमित जैन, सेक्टर सी, स्कीम नं. ७१

– पिछले छह महीने से हम केबल कटिंग से दुःखी है। हमारी कॉलोनी के आधे से अधिक उपभोक्ताओं ने  केबल कनेक्शन से तौबा कर ली है और डीटीएच कनेक्शन ले लिए हैं। अब हमें २४ घंटे टेलीविजन देखने को मिल रहा है। सुनील जोशी, बजरंग नगर

– समझ में नहीं आ रहा इंदौर का प्रशासन क्या कर रहा है। रोजाना केबल कट रही है और विवाद हो रहे हैं। केबल ऑपरेटर सेटटॉप बॉक्स लगाने के नाम पर १५०० रुपए तक ले जा रहे हैं, उसके बावजूद घटिया सेवाएं दी जा रही है। जयश्री होलकर, मराठी मोहल्ला, सदर बाजार

– जब से आईपीएल मैच चालू हुए हैं तभी से केबल कटिंग जोरों पर है। केबल ऑपरेटर फोन उठाने तक को तैयार नहीं। इस बार किराया लेने आएंगे तो खूब खरी-खोटी सुनाएंगे। प्रशासन को त्वरित हस्तक्षेप कर व्यवस्था सुधारना चाहिए। तेजकुमार सेठी, साधना नगर, एरोड्रम रोड

हत्या तक हो चुकी है

शहर में पांच साल पहले भी केबलवार शुरु हुआ था, उस वक्त बीटीवी और नए एमएसओ डीजी केबल नेटवर्वâ के बीच तगड़े विवाद हुए थे। दोनों एमएसओ ने खुलेआम शहर के कई नामचीन दबंगों को अपने केम्पस में मुकाबले के लिए रख छोड़ा था। विवाद इतने बड़े की उस वक्त कई हत्या के प्रयास हुए और मानवता नगर में एक निर्दोष कर्मचारी की हत्या भी कर दी गई। शहर में एक बार फिर ऐसा ही माहौल नजर आ रहा है। दो नए एमएसओ ने मिलकर कुछ अपराधिक तत्वों के माध्यम से केबल कटिंग का काम चला रखा है। केबल व्यावसाय में कम समय में मिलने वाली ज्यादा पूंजी सारे विवादों की जड़ है।

इंदौर से वरिष्‍ठ पत्रकार प्रवीण कुमार खारीवाल की रिपोर्ट। इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष खारीवाल डीजी न्यूज में न्यूज को-ऑर्डिनेटर के पद पर कार्यरत हैं।

प्रधानाध्‍यापिका से मारपीट करने के मामले में राष्‍ट्रीय सहारा का पत्रकार अरेस्‍ट

मिर्जापुर जिले के पड़री से खबर है कि एक प्रधानाध्‍यापिका से मारपीट करने की शिकायत पर पुलिस ने राष्‍ट्रीय सहारा के एक संवाददाता को गिरफ्तार किया है जबकि आरोपी ग्राम प्रधान भाग निकाला. जानकारी के अनुसार बेलवन ग्राम निवासी राष्‍ट्रीय सहारा के पत्रकार अवनीश कुमार उर्फ सुरेंद्र कुमार पांडेय ग्राम प्रधान सर्वेश कुमार उर्फ चिंटू पांडेय के साथ प्राथमिक विद्यालय चंडिका पहुंचे तथा प्रधानाध्‍यापिका सोनी गुप्‍ता से एमडीएम और अन्‍य जानकारियां लेने लगे.

प्रधानाध्‍यापिका का आरोप है कि कोई गड़बड़ी न मिलने पर ये लोग प्रधानाध्‍यापिका से उलझ गए. इसी बीच प्रधानाध्‍यापिका का पति गोपाल गुप्‍ता भी स्‍कूल पर आ पहुंचे. इन दोनों लोगों ने उसके साथ मारपीट की. प्रधानाध्‍यापिका ने अपने साथ छेड़खानी तथा पति के साथ मारपीट की शिकायत पड़री थाने में की, जिसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर पत्रकार को अरेस्‍ट कर लिया, जबकि ग्राम प्रधान भाग निकला. बताया जा रहा है कि राष्‍ट्रीय सहारा के ब्‍यूरोचीफ ने पत्रकार को छुड़ाने की बहुत कोशिश की परन्‍तु सफलता नहीं मिल पाई. बताया जा रहा है कि पत्रकार पर इसके पहले भी एक किशोरी के अपहरण तथा बलात्‍कार का आरोप लग चुका है.

आईबीसी24 ने बंसल न्‍यूज की कमर तोड़ी, एक दर्जन से ज्‍यादा लोगों का इस्‍तीफा

बंसल न्यूज से एक दर्जन से ज्यादा लोगों ने इस्तीफा दे दिया है. एक हफ्ते इतने लोगों के इस्तीफे से प्रबंधन सकते की हालत में है. सबसे बड़ा झटका प्रोग्रामिंग टीम से लगा है. बंसल न्यूज में प्रोग्रामिंग हेड दिलीप कापसे के साथ पूरी टीम ने इस्तीफा दे दिया है. दिलीप ई-24 में गए हैं. इसके साथ प्रोग्रामिंग टीम के विनायक दुबे ने भी बंसल छोड़ दिया. प्रोग्रामिंग से ही शोभित शर्मा और पूजा साहू पहले ही बंसल न्यूज छोड़ चुके हैं. अब प्रोग्रामिंग टीम के बाकी लोग भी चले गए.

बताया जा रहा है कि दिलीप कापसे चैनल में जातीवाद से परेशान थे. कई बार कहने के बाद भी दो साल में उनकी सैलरी भी नहीं बढ़ाई गई.जबकि न्यूज हेड के रिश्तेदारों की सैलरी कई बार बढ़ाई जा चुकी है. चैनल के रिपोर्टर गौरव शर्मा ने इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने जी न्यूज के मध्य प्रदेश चैनल को ज्वाइन किया है. इसके साथ ही एक और रिपोर्टर शरद बाघेला ने भी बंसल न्‍यूज छोड़कर साधना न्यूज मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ के साथ नई पारी शुरू की है.

बंसल न्यूज को सबसे बड़ा झटका गोयल ग्रुप के आईबीसी24 चैनल ने दिया है. बंसल न्यूज से 6 लोगों ने इस्तीफा देकर आईबीसी ज्वाइन कर लिया है. इनमें छत्तीसगढ़ डेस्क के राजेश सेन, न्यूज डेस्क की पूनम जोशी, इनपुट डेस्क के मनोज, एंकर शैलेंद्र द्विवेदी के साथ आऊपुट डेस्क के दो और लोग शामिल है. साथ ही जून में आने वाले आईबीसी मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ में चल रही भर्ती में बंसल से कई लोग यहां इन्टव्यू दे चुके है और बाकी का सिलसिला भी जारी है. ऐसे में आने वाले समय में कुछ और विकेट गिर सकत हैं.

बंसल न्यूज के लगभग सभी पुराने कर्मचारी एक एक करके चैनल छोड़ रहे हैं, जिसका मुख्य कारण वर्ग विशेष के तवज्जो देना और सैलरी स्लिप बगैरह न देना है. एक एक करके लोग जा रहे हैं पर न्यूज हेड के साले और रिश्तेदार बिना काम के भी टिके हुए हैं और प्रबंधन ने आंखें बंद कर रखी है. चैनल में वर्ग विशेष दिया जा रहा बढ़ाया लोगों का असंतोष बढ़ाता जा रहा है. संभावना है कि जल्‍द ही बंसल न्‍यूज से कई और विकेट गिरेंगे.

वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (छब्बीस) : चर्चा में बने रहे थे सोमप्रकाश व जूली सिन्हा

पंचायत उपचुनाव में विधायक सोम प्रकाश सिंह और जिला परिषद सदस्य जूली सिन्हा की भी खूब चर्चा होती थी। इसके अलग-अलग कारण थे। बाहरी उम्मीदवार को लेकर भी चर्चा होती थी। खरांटी के तिवारी टोला में लोगों से बातचीत कर रहा था। एक व्यक्ति ने कहा कि ओबरा के विधायक बाहरी हैं, जिला परिषद की सदस्य बाहरी हैं तो मुखिया बाहरी होगा, तो क्या हो जाएगा।

ओबरा विधायक सोमप्रकाश सिंह डेहरी विधान सभा क्षेत्र (जिला रोहतास) के निवासी हैं। पहले वे ओबरा के थानाध्यक्ष थे। इस दौरान उनकी छवि ईमानदार दारोगा की थी। उन्होंने अपने कार्यकाल में कई सामाजिक व शैक्षणिक कार्यक्रमों को भी चलावाये। इस कारण उनकी लोकप्रियता बढ़ती गयी। वे दारोगा की नौकरी छोड़कर विधानसभा चुनाव में उतरे तो उनकी यही छवि ताकत बन गयी। उन्होंने चुनाव में खर्चों के लिए लोगों से चंदा भी मांगा। उनकी छवि का असर था कि लोगों में चंदा भी दिया। चावल, गेहूं से लेकर पैसे तक चंदा के रूप में मिले। मैंने शुरुआती दौर में लोगों से अपील की थी कि जनता से चंदा लेकर ही चुनाव लड़ना है। इस कारण लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि आप भी सोमप्रकाश जी के तरह चंदा से चुनाव लड़ेंगे।

जिला परिषद सदस्य जूली सिन्हा ओबरा पश्चिमी से जिला परिषद सदस्य हैं। इस क्षेत्र में तेजपुरा, कंचनपुर, डिहरा, कारा, बभनडीहा व इमलौना पंचायतें आती हैं। लेकिन उनका अपना गांव इस क्षेत्र से बाहर पड़ता है। उनका चुनाव जीतना आश्चर्यजनक था। इस क्षेत्र में कायस्थों की संख्या नाममात्र की है। पूरे छह पंचायतों में दो दर्जन से अधिक घर कायस्थों के नहीं होंगे। वोटों की संख्या बमुश्किल दो सौ के आपपास होगी। पूरे चुनाव में जूली सिन्हा की प्रचार शैली की चर्चा भी होती रही थी।

प्रचार के दौरान कई बार रोचक घटनाएं भी हुर्इं। नहर से होते हुए मैं खरांटी से कुराईपुर जा रहा था। एक मोटर साइकिल वाले उसी रास्ते से जा रहे थे। मैंने हाथ दिया तो उन्होंने रोक दिया। मैं गाड़ी पर बैठ गया। गाड़ी चालू हुई। कुराईपुर की ओर बढ़े जा रहे थे। उन्होंने कहा कि कहां जाना है। मैंने कहा कि बस इसी गांव में। इतना सुनते ही वे नाराज हो गए। उन्होंने कहा कि इतनी दूरी आप पैदल नहीं चल सकते हैं। हमें लगा कि दूर जाना है, इसलिए मोटरसाइकिल पर बैठा लिया। तब तक गांव आ चुका था। मैं मोटरसाइकिल रुकवाकर उतरा और धन्यवाद कह कर आगे बढ़ लिया।

एक दिन मैं खरांटी प्राथमिक विद्यालय में चला गया। दोपहर का समय था। शिक्षक और शिक्षिकाएं कक्षा लेने में व्यस्त थीं। मैंने कहा कि मैं मुखिया का उम्मीदवार हूं। आप लोगों से मिलने आया हूं। इस पर एक शिक्षिका ने कहा कि अभी क्लास चल रहा है। बाद में आइएगा। फिर वहां दूसरे मुहल्ले में चला गया।

राजनीति के मुहावरे में एक और शब्द गढ़ लिया गया है प्रतिनिधि पति। जैसे मुखिया पति, सरपंच पति, अध्यक्ष पति आदि। शिक्षा भी इस मुहावरे से अलग नहीं है। पंचायत के एक स्कूल में प्रभारी शिक्षिका हैं। बच्चों के लिए विभिन्न मदों में पैसे आए थे। उनका वितरण किया जाना था। पारदर्शिता के लिए जनप्रतिनिधियों को भी बुला लिया गया था। पैसे वितरण की तैयारी चल रही थी कि मैं वहां पहुंच गया। वहां प्रभारी शिक्षिका के पुत्र मौजूद थे। मैंने अपना परिचय दिया तो उन्होंने बताया कि आपसे मेरी बात मोबाइल पर हुई थी। बातचीत के क्रम में पता चला कि वह प्रभारी शिक्षिका के पुत्र हैं। पैसा वितरण करने और उसका हिसाब-किताब रखने में शिक्षिका को परेशानी नहीं हो रही थी। इसलिए मदद के लिए अपने पुत्र को बुलवा लिया था।

उधर पारदर्शिता पर जनप्रतिनिधियों की सहमति के लिए वार्ड पार्षद के पति मौजूद थे। थोड़ी देर बाद वहां बच्चों को बुलाकर राशि का वितरण शुरू हुआ। उसके बाद मैं स्कूल से बाहर निकलकर लोगों से संपर्क के लिए गांव की ओर बढ़ गया।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क kumarbypatna@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा

वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (पचीस) : हर सूचना के लिए रिसोर्स पर्सन

पंचायतवासियों के साथ निकटमत व बेहतर संबंध बनाए रखने के लिए मैंने एक रणनीति बना रखी थी। पंचायत को जाननेवाले या बभनडीहा पंचायत के चुनाव में रुचि रखने वाले लोगों की एक टीम भी बना रखी थी। इसके साथ चुनावी प्रक्रिया को लेकर जानकारी रखने वाले लोगों को जोड़े रखा था। ऐसे लोगों में कई लोग ओबरा के थे तो कुछ आपसपास के गांवों के भी। इस संबंध में सबसे अधिक जानकार और पुराने राजनीतिज्ञ थे राजीव रंजन सिन्हा। ओबरा के निवासी हैं। वे लोकसभा और विधान सभा के चुनाव भी कई बार लड़ चुके हैं। 1974 आंदोलन के दौरान कर्पूरी ठाकुर के करीबी लोगों में थे और औरंगाबाद की राजनीति में अपनी खास पकड़ रखते थे।

समय ने उनका साथ नहीं दिया। इस कारण लोकसभा या विधान सभा तक नहीं पहुंच पाए। हालांकि औरंगाबाद जिला परिषद में प्रतिनिधित्व करने का उन्हें मौका मिला। जनता के इस विश्वास को वह अपनी पूंजी मानते हैं। बभनडीहा पंचायत से चुनाव लड़ने की रुचि के संबंध में उन्हें मैंने जानकारी दी थी और उन्होंने इस संबंध में उचित व सार्थक सुझाव व मार्गदर्शन भी दिए।

ओबरा की राजनीति में सक्रिय हैं इंदल यादव। राजद के कार्यकर्ता हैं। राजद का प्रखंड कार्यालय भी उनके ही मकान में है। उनकी स्थानीय राजनीति में अच्छी पकड़ भी है। कुराईपुर के यादवों का भी उनके घर पर आना-जाना था। इंदल यादव से हमें स्थानीय व ग्रामीण समीकरणों के संबंध में काफी जानकारी मिल जाती थी। दाउदनगर के रहने वाले हैं ओम प्रकाश। पत्रकार हैं। इस कारण प्रखंड व अनुमंडल कार्यालय के अधिकारियों व कर्मचारियों के साथ अच्छा संबंध है। चुनाव से जुड़ी किसी भी प्रशासनिक जानकारी के सोर्स वही थे।

चुनाव को लेकर कई मामलों में दुविधा बनी रहती थी। चुनाव से जुड़ा एक शब्द था एनआर। एनआर कटवाना पड़ता था। लेकिन एनआर होता है, यह मुझे जानकारी नहीं थी। इस संबंध में ओम प्रकाश को फोन किया। उन्होंने एसडीओ से पता कर बताया कि एनआर का मतलब है नाजिर रसीद। चुनाव लड़ने के लिए एक राशि निर्धारित होती है। सामान्य वर्ग के लिए एक हजार रुपया है। महिला, अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए अलग-अलग निर्धारित है। इस निर्धारित राशि को नाजिर के पास जमा करके रसीद कटवाना पड़ता है। इसे ही नाजिर रसीद कहते हैं। नामांकन पत्र के साथ नाजिर रसीद भी जमा संलग्न करना पड़ता है। मतदान को लेकर भी दुविधा थी कि इवीएम से होगा या बैलेट पेपर पर। हमारा प्रखंड कार्यालय इन जानकारियों को लेकर बहुत अपडेट नहीं रहता था। इस कारण दाउदनगर के अनुमंडल कार्यालय से जानकारी लेनी पड़ती थी और इसके लिए ओम प्रकाश का सहारा लेना पड़ता था।

ओबरा में रिसोर्स पर्सन थे ब्रजेश द्विवेदी। वह पत्रकार हैं। प्रखंड कार्यालयों की सूचनाओं के लिए मुझे उनकी मदद लेनी पड़ती थी। प्रखंड स्तरीय पदाधिकारियों से संपर्क कराने में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी। प्रखंड कार्यालय के बाहर एक फोटो स्टेट मशीन की दुकान है। उपचुनाव के दौरान वह ही चुनाव कार्यालय का कैंप कार्यालय बन गया था। चुनाव से जुड़ी हर सामग्री का वही सप्लायर था। वोटर लिस्ट की कॉपी, नामांकन पत्र की कॉपी, शपथ पत्र की कॉपी, पोलिंग एजेंट के लिए फार्म की कॉपी सब उसके पास उपलब्ध रहती थी। इसका एक बड़ा फायदा उम्मीदवारों को था। सब तरह की चुनावी सामग्री वहां मिल जाती थी। चुनाव से जुड़ी जानकारी भी वह रखता था। चुनावी प्रक्रिया के बारे में भी वह जानकार था। उसकी सक्रियता का फायदा चुनाव कार्यालय को भी था। चुनाव से जुड़े अधिकारी कहते थे कि फोटो स्टेट मशीन की दुकान पर चले जाइए, वहां मिल जाएगा। व्यवहार में यह संभव नहीं था कि हर सामग्री चुनाव कार्यालय उम्मीदवारों को उपलब्ध कराए। इस कारण अधिकतर काम फोटो स्टेट मशीन के संचालक को सौंप दिया था। कई उम्मीदवारों से हमारा परिचय भी उसी फोटो स्टेट मशीन की दुकान पर हुई।

इसके अलावा ओबरा में गोपी रेडियो के संचालक, उपप्रमुख मुनारिक राम, सामाजिक कार्यकर्ता गुड्डू, पैक्स अध्यक्ष गौरी सिंह, बभनडीहा के दुर्गा प्रसाद गुप्ता, पूर्णाडीह के जर्नादन प्रसाद, खरांटी के वार्ड पार्षद शत्रुघ्न प्रजापति, तिवारी टोला के कुछ लोग थे, जो हमारे के लिए सूचनाओं के संकलन के आधार थे और उनसे काफी कुछ मदद भी मिलती थी।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क kumarbypatna@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा

नेता बनने की जगह बन गए पत्रकार!

किसी भी घटना की रिपोर्टिंग करते समय रिपोर्टर ऐसे प्वाइंट पर रहता है, जहां से उसकी हर जगह नज़र रहे, पर दैनिक जागरण बदायूं के ब्यूरो चीफ लोकेश प्रताप सिंह अधिकारियों और नेताओं की बैठकों में भी सबसे आगे बैठते देखे गए हैं। सामने होने पर लोग माइक पर बुला लेते हैं, तो भाषण देने से भी नहीं चूकते, इसी तरह कोई जुलूस वगैरह हो, तो भी लोकेश खुद को सबसे आगे रखते हैं।

हनुमान जयंती के अवसर पर क़स्बा उझानी में बवाल हो गया, यहाँ पुलिस फ्लैग मार्च करने पहुंची, तो यहाँ भी पुलिस टीम के आगे ऐसे चल रहे थे, जैसे यही नेतृत्व कर रहे हैं। हालांकि इससे किसी आम आदमी को कोई परेशानी हो ऐसी बात नहीं है, हां अन्‍य अखबार वाले जरूर लोकेश की इस आदत से परेशान हैं, क्योंकि उनके हर फोटो में लोकेश प्रताप सिंह आ गए थे, सो फोटो छापने को लेकर उन्हें काफी दिमाग खफाना पड़ा। इसी तरह टीवी चैनल वालों की फिल्म से तो उन्हें क्राप भी नहीं किया जा सकता। लोकेश की इन्‍हीं हरकतों की वजह से पत्रकार कहने लगे हैं कि इन्हें पत्रकार की जगह नेता होना चाहिए था। काफी आगे जाते।

सबसे आगे चलते लोकेश प्रताप

पत्रकार बीपी गौतम की रिपोर्ट.

हिंदुस्‍तान के क्राइम रिपोर्टर तारिक एक सप्‍ताह से नहीं आ रहे कार्यालय

भ्रष्ट, लापरवाह और गुणवत्ता विहीन लोगों को अमर उजाला बाहर का रास्ता दिखा रहा है। नोटिस पीरियड पर चल रहे ऐसे लोगों को लेकर हिंदुस्तान यह प्रचारित कर रहा है कि उसने अमर उजाला के रिपोर्टर तोड़ कर बहुत बड़ी जंग जीत ली। हिदुस्तान, बरेली के साथ हाल ही में कुछ नए लोग जुड़े हैं, तभी पुराने लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। हालांकि कुछ लोगों को हिंदुस्तान से आउट करने पर संपादक की प्रशंसा भी हुई है। फिलहाल पीलीभीत के ब्यूरो चीफ संदीप सिंह और यहीं के तेजतर्रार क्राइम रिपोर्टर तारिक अंसारी को लेकर हिन्दुस्तान के अन्दर की राजनीति गर्म है।

बताया जाता है कि पिछले सप्ताह पूरनपुर स्टेशन की देवर संग भाभी के भागने की एक खबर को लेकर कार्यालय बंद होने के बाद डेस्क प्रभारी ने फोन किया और कई गलतियाँ बताईं, इस पर तारिक अंसारी ने यह कह कर फोन काट दिया कि फाइल सामने नहीं है, इसलिए वह कुछ नहीं बता सकते हैं, इसी बात को लेकर डेस्क प्रभारी, समाचार संपादक वगैरह ने ईगो इश्‍यू बना लिया और अपनी गलती छुपा कर आधी-अधूरी जानकारी देते हुये दोनों के विरुद्ध संपादक से चुगली कर दी। इसके बाद संपादक कुमार अभिमन्यु ने संदीप सिंह और तारिक अंसारी को बरेली बुलाया, तो संदीप सिंह तो आ गए, पर उस दिन के बाद से तारिक अंसारी कार्यालय नहीं आये हैं और न ही बरेली आकर मिले हैं, वहीं संदीप सिंह के बारे में भी अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है। सूत्रों के अनुसार जगमोहन शर्मा को पीलीभीत का ब्यूरो चीफ शीघ ही बनाए जाने की चर्चा जोरों पर है।

पत्रकार बीपी गौतम की रिपोर्ट.

डॉ. मनोज मिश्र बने पूविवि के मीडिया प्रभारी

वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर के जनसंचार विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. मनोज मिश्र को कुलपति प्रो. सुंदर लाल ने पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय का नया मीडिया प्रभारी नियुक्त किया है। इसके पूर्व डॉ. मिश्र जनसंपर्क समिति के अध्यक्ष बनाये गए थे। इस टीम में डॉ. मिश्र के साथ डॉ दिग्विजय सिंह राठौर, डॉ. संदीप सिंह और डॉ. केएस तोमर भी शामिल हैं। इसी क्रम में मीडिया सम्बंधित कार्य देखने के लिए भी डॉ. मनोज मिश्र को तत्काल प्रभाव से मीडिया प्रभारी बनाया गया है। उक्त आशय का आदेश आज विश्वविद्यालय के कुलसचिव वीके सिन्हा द्वारा जारी किया गया है।

‘आम आदमी पार्टी’ की खास विवेचना

‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान मेरे हाथ में है, जो मुझे आम आदमी पार्टी की अजमेर (राजस्थान) की महिला कार्यकर्ता (या पदाधिकारी) मैडम कीर्ति पाठक जी ने मेल के जरिये ये दिखाने के लिये भेजा है, कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ सच में ‘‘आम आदमी’’ की पार्टी है। मैडम कीर्ति जी ने मेरे किसी लेख को पढकर पहले तो बड़े ही संयमित तथा शिष्ट तरीके से मुझसे मोबाइल पर बात की और फिर कहा कि अन्याय के खिलाफ संघर्षरत हम सभी लोगों को एक-दूसरे की कमियों को दिखाने के बजाय ‘‘आम आदमी’’ की परेशानियों के लिये मिलकर आम आदमी की लड़ाई में शामिल होना चाहिये। मैडम कीर्ति जी का कहना था कि इसके लिये ‘‘आम आदमी पार्टी’’ अरविन्द केजरीवाल जी के नेतृत्व में देशभर में अन्याय के खिलाफ संघर्षरत लोगों को एकजुट करके और साथ लेकर आम आदमी की समस्याओं के लिये संघर्ष कर रही है।

मुझे मैडम कीर्ति जी से मोबाइल पर बात करके अच्छा लगा और जब उनकी ओर से मेल के जरिये ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान और ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संकल्प पत्र (विजन डॉक्यूमेंट) मिला तो इस बात की प्रसन्नता हुई कि मैडम कीर्ति जी ने जो वायदा किया उसे पूरा किया। स्वाभावत: मैंने दोनों ही दस्तावेजों को अद्योपान्त पढ़ा। जिस पर विस्तृत प्रतिक्रिया तो फिर कभी, लेकिन फिलवक्त तो देश की राजधानी नयी दिल्ली में बलात्कार के खिलाफ लोगों के गुस्से के संदर्भ में लिखना असल मकसद है।

नयी दिल्ली में बलात्कार की घटनाओं के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों के दौरान भीड़ में अधिकतर लोगों में ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की टोपी पहनने वाले और भाजपा या भाजपा से सम्बद्ध संगठनों का झंडा हाथ में लिये लोगों का टीवी पर दिखना आम बात है। जिससे लगता है कि बलात्कार की सर्वाधिक चिन्ता इन्हीं दो राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं को है। इसके अलावा टेलीवीजन पर खबरों को बेचने वालों को तो बलात्कार की सर्वाधिक चिन्ता सता ही रही है।

आम आदमी पार्टी की टोपी पहने लोग, जिस पर लिखा होता है-‘‘मैं हूँ आम आदमी’’ नयी दिल्ली में बलात्कार के खिलाफ संघर्ष करते नजर आते हैं। जो अपने इस संघर्ष को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिये देशभर के लोगों का गुस्सा दिखलाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते हैं। जिससे टीवी देखने वाला आम आदमी इस भ्रम में पड़ जाता है कि भारत की राजधानी महिलाओं के लिये सुरक्षित नहीं है और महिलाओं की सुरक्षा की सर्वाधिक चिन्ता यदि किसी को है तो ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को है। पहले इस मामले में भाजपा प्रथम स्थान पर हुआ करती थी। अब ‘‘आम आदमी पार्टी’’ ने प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है। यही नहीं ‘‘आम आदमी पार्टी’’ हर उस मामले में आम आदमी के साथ दिखना चाहती है, जिससे वो ये दिखा सके कि वास्तव में आम आदमी की चिन्ता केवल और केवल ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को ही है।

संयोग से ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के सभी बड़े कर्ताधर्ता नयी दिल्ली में या आसपास में रहते हैं और छनछन कर प्राप्त होने वाली खबरों के मुताबिक इस समय देश को अस्थिर करने वाली ताकतें भारत के मीडिया को खरीद चुकी हैं। इसलिये मीडिया फासिस्टवादी और कमजोर लोगों के खिलाफ षड़यन्त्र करने वाली ताकतों का जमकर गुणगान कर रहा है। इन्हीं ताकतों में, ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को शामिल करना मेरी बाध्यता है, क्योंकि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के मुखिया दिल्लीवासियों से बिजली का बिल जमा नहीं करने का आह्वान करते हैं और स्वयं अपने बिजली के बिल सही समय पर जमा करवाते हैं। इस प्रकार आम लोगों को सरकार से लड़ाने का काम करते हैं। यह आम आदमी के साथ ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का खुला षड़यंत्र है।

द्वितीय ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के संविधान में इस बात को स्वीकार किया गया है कि-‘‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति, पिछड़े और अल्पसंख्यक’’ वर्गों में शामिल लोग सामाजिक रूप से वंचित समूह हैं। इन वर्गों की आबादी देश की कुल आबादी का पिच्यासी फीसदी बतायी जाती है। अर्थात् इन वंचित समूहों के लोग ही इस देश में असली वंचित और आम आदमी हैं। अत: देश की पहली प्राथमिकता इन वंचित वर्गों का उत्थान करना होनी चाहिये। ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की नजर में भी स्वाभाविक रूप से इन्हीं वंचित समूहों के लोगों को इस देश का ‘‘आम आदमी’’ होना चाहिये और ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के ‘‘नीति-नियन्ता अर्थात् असली कर्ताधर्ता’’ पदों पर भी इन्हीं वंचित समूहों और वर्गों के लोगों का संवैधानिक अधिकार होना चाहिये। अर्थात् ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के संविधान में ऐसी सुस्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिये, जिससे कि देश की पिच्यासी फीसदी आबादी के वंचित समूहों, जो हकीकत में देश के ‘‘आम आदमी’’ हैं के हाथों में ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की कमान होनी हो।

लेकिन इस देश के आम आदमी का दुर्भाग्य यहॉं भी उसका साथ नहीं छोड़ता है और आम आदमी के नाम पर बनायी गयी ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान कहता है कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कुल तीस सदस्य होंगे और इन तीस पदों पर पदस्थ राष्ट्रीय कार्यकारिणी द्वारा ही देशभर में ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की नीतियों का निर्धारण, नीतियों का संचालन एवं क्रियान्वयन किया जायेगा, लेकिन ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान दूसरी बात यह कहता है कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की नीतियों का निर्धारण करने में इस देश के वंचित समूहों में शामिल ‘‘आम आदमी’’ की कोई निर्णायक भूमिका नहीं होगी। अर्थात् ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के संविधान के अनुसार देश के पिच्यासी फीसदी वंचित समूहों अर्थात् ‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति, पिछड़े और अल्पसंख्यक’’ के अधिकतम केवल पांच लोग ही ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का हिस्सा हो सकेंगे।

अर्थात् ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के कुल तीस पदों में से पच्चीस पद उन ताकतवर वर्गों के लोगों के पास होंगे, जिनके अन्याय के और शोषण के कारण ‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति, पिछड़े और अल्पसंख्यक’’ वर्गों के लोग सामाजिक रूप से वंचित बनाये जा चुके हैं। अर्थात् जो 15 फीसदी शोषक वर्ग पिच्यासी फीसदी लोगों के पिछड़ेपन का कारण हैं, उसी वर्ग के शोषक और अन्यायी लोग आम आदमी के नाम पर ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संचालन करेंगे। केवल यही नहीं, बल्कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का संविधान वंचित वर्गों के विरुद्ध यहॉं तक नकारात्मक प्रावधान भी करता है कि ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में सामाजिक रूप से वंचित उक्त समूहों अर्थात् के देश के 85 फीसदी लोगों का अधिकतम प्रतिनिधित्व 16 फीसदी से अधिक नहीं हो सकेगा और देश की 85 फीसदी आबादी को सामाजिक रूप से वंचित बनाये रखने, उनका शोषण एवं अन्याय करने वाले 15 फीसदी लोगों को ‘‘आम आदमी पार्टी’’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 84 फीसदी से भी अधिक पदों पर पदस्थ होने का संवैधानिक अधिकार होगा।

इन तथ्यों से इस बात को प्रमाणित करने की जरूरत नहीं रह जाती है कि इस देश की 85 फीसदी आबादी को असमानता, भेदभाव, शोषण और अन्याय का शिकार बनाने के लिये, शेष 15 फीसदी लोग ही जिम्मेदार हैं। जिसमें स्वयं अपने वर्गों की महिलाओं के साथ किये जाने वाले बलात्कारी भी शामिल हैं।

इससे भी बड़ी सच्चाई तो यह भी है कि देश की 84 फीसदी आबादी के मान-सम्मान, संवैधानिक, आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और जीने के अधिकार का हजारों सालों से बलात्कार करने वाले 15 फीसदी लोगों की जैसी मानसिकता वाले लोगों द्वारा इस देश में आम आदमी के नाम पर ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का गठन किया गया है, जो महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कारों के विरुद्ध दिल्ली में घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। जिन्हें न तो आम आदमी के दु:ख दर्दों से कोई सारोकार है और न हीं आम आदमी के दु:ख दर्दों की कोई पीड़ा है।

सच तो ये है कि भारत का मतलब है भारत के असली मालिक, जो आज हर क्षेत्र में सबसे निचले पायदान पर वंचित वर्गों में शामिल हैं और इन्हीं वंचित वर्गों के हकों और स्वाभिमान का, हर क्षेत्र में दिनरात बेरोकटोक बलात्कार होता रहता है, जो वास्तव में भारत के साथ बलात्कार है। लेकिन भारत के साथ हजारों सालों से बलात्कार करने वाले इन 15 फीसदी वर्ग के लोगों में शामिल कुछ चालाक और षड़यंत्रकारी आज खुद आम आदमी की टोपी पहनकर और भगवा वस्त्र धारण करके बलात्कार के खिलाफ संघर्ष करने का नाटक खेल रहे हैं। इस  षड़यंत्र में कॉंग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भी बुरी तरह से फंस चुकी है, क्योंकि कॉंग्रेस पार्टी में भी, कॉंग्रेसी चोला धारण किये हुए, इन फासिस्ट और देशद्रोहियों के ऐजेंट नीति-नियन्ता पदों पर पदस्थ हैं।

लेखक डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ होम्योपैथ चिकित्सक, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), नेशनल चेयरमैन-जर्नलिसट्स, मीडिया एण्ड रायटर्स वेलफेयर एसारिएशन और भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) से राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में जुड़े हुए हैं.

पुलिस उत्पीड़न से त्रस्त गाजीपुर की जनता ने थानेदार की गाड़ी और पुलिस चौकी को आग के हवाले किया

Braj Bhushan Dubey : आज एक बडी परीक्षा से गुजरना हुआ है मुझे। गाजीपुर जनपद के जंगीपुर थानान्‍तर्गत नसीरपुर गांव के एक दलित युवक को पुलिस ले गयी थी, 20 वर्षीय घनश्‍याम थाने से आया और आज सुबह उसकी तबीयत खराब हुयी। 108 नम्‍बर की गाड़ी से हास्‍पीटल जाते वक्‍त उसकी रास्‍ते में मौत हो गयी। गुस्‍साई भीड ने घनश्‍याम की लाश नसीरपुर चौराहे पर रखकर जाम लगाया। थानाध्‍यक्ष दुल्‍लहपुर की गाड़ी फूंक दी गयी और हंसराजपुर पुलिस चौकी में भी आग लगा दी गयी।

मैं पहुंचा तो थाने की गाड़ी धू-धू कर जल रही थी। मोर्चा सम्‍भाला और गुस्‍साये लोगों को समझाना शुरू किया। आक्रोशित लोग लग रहा था कि हमें भी पीट देंगे या गाली गलौज करेंगे किन्‍तु अधिकांश हमारी बात से सहमत थे। भीड़ मांग कर रही थी कि दोषी थानाध्‍यक्ष को सामने लाया जाय। कई पुलिस क्षेत्राधिकारी, एसपी सिटी, उप जिलाधिकारी आदि सहमे हुये थे किन्‍तु जखनियां के युवा उप जिलाधिकारी अमित सिंह साहस और संयम के साथ डटे हुये थे। मौके पर जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक भी पहुंचे। काफी प्रयास के बाद लाश पोस्‍टमार्टम के लिये गयी। एसपी ने थानाध्‍यक्ष को तत्काल निलम्बित कर दिया।

गाजीपुर के आम आदमी पार्टी के जिलाध्यक्ष ब्रज भूषण दुबे के फेसबुक वॉल से.

प्यार के लिए प्राण देने वालों की दुखदायी तस्वीरें

यूं तो प्‍यार में जान देने और जीने-मरने की कसमें खानें वालों के किस्‍से तो बहुत सुने होंगे, लेकिन जान देने वाले कम ही देखें होंगे. लेकिन जब यह प्‍यार पागलपन की हद में बदल जाए तो इसका अंजाम कितना भयानक होता है यह देखने को मिला उत्‍तर प्रदेश के चंदौली जिले में, जहां प्रेमी युगल का शव नीम के पेड़ से लटकते हुए मिला. एक साथ जीने की उम्‍मीद पूरी नहीं होने पर दोनों ने एक साथ मरने का निर्णय ले लिया और फंदे पर झूल गए. पुलिस ने दोनों शवों को कब्‍जे में लेकर पोस्‍ट मार्टम के लिए भेज दिया है.

जानकारी के अनुसार सकलडीहा कोतवाली क्षेत्र के बिसुनपुरा गांव में रहने वाले सूबेदार की पुत्री बिंदू का प्रेम अपने पड़ोसी युवक देवदत्‍त के साथ चल रहा था. रविवार को बिदू का गौना होने वाला था. बारात उसके घर आई हुई थी. इसी बीच मौका देखकर बिंदू घर से भाग निकली. रात भर बिंदू की खोज हुई लेकिन उसका कहीं पता नहीं चला. सुबह बारात बैरंग वापस चली गई. सुबह बिंदू और देवदत्‍त का शव एक नीम के पेड़ से लटकता मिला तो लोगों के होश उड़ गए.

दरअसल बिंदू और देवदत्‍त दोनों एक दूसरे से प्रेम करते थे, लेकिन बिंदू की शादी कहीं और हो गई. रविवार को ससुराल के लिए उसकी विदाई होनी थी. इधर दोनों प्रेमी इस बिछड़ने की घड़ी को सहन नहीं कर सके. वे एक साथ जी भले ही ना सके परन्‍तु दोनों ने एक साथ मरने की कसमें जरूर पूरी कर लीं. सुबह दोनों का शव सीवान में स्थित एक नीम के पेड़ से लटकता मिला. बिंदू ने जहां अपने साड़ी को फंदा बनाया तो देवदत्‍त ने गमछा से लटककर अपनी जान दे दी.

सूचना मिलने पर पहुंची पुलिस ने दोनों शवों को पेड़ से नीचे उतरवाया तथा पोस्‍टमार्टम के लिए भेज दिया. हालांकि पुलिस इस मामले के जांच की बात कर रही है लेकिन प्रथम दृष्‍टया उसे यह मामला प्रेम प्रसंग का लग रहा  है. दोनों के जान देने की घटना की चर्चा पूरे क्षेत्र में फैली हई है.

संतोष जायवाल की रिपोर्ट.

सरकारी एडवाइजरी के बाद चीनी घुसपैठ पर अब नहीं बोलेंगे न्यूज चैनल वाले!

Shravan Kumar Shukla : चीन की सेना अपने भारत देश में घुसकर 20 किलोमीटर अन्दर आकर बैठ गई है. मीडिया चैनेल्स को सरकार की ऐडवायजरी नोटिस मिली हुई है कि चीनी घुसपैठ से सम्बंधित कोई खबर ना दिखाई जाए. अब मैं आप लोगों से पूछना चाहता हूं कि क्या ऐसी कोई एडवायजरी नोटिस हम फेसबुकियो को भी मिली है जो हम शांत होकर बैठे हैं, और शेरो-शायरी पोस्ट व शेयर कर रहे हैं?  माना कि हमारी पहुंच सीमित है और हम बार्डर पर लड़ने नहीं जा सकते पर अपनी कलम में तो बारूद भर सकते हैं…

मित्रों प्यार के अफ़साने भी गायेंगे, श्रृंगार और प्रेम रस के तराने भी गायेंगे… मगर आज देश मुश्किल में है… जरूरत है कलम में बारूद भरने की… अपनी वाल से लेकर मीडियाकर्मियों तक की वाल तक तेज़ाब भर दो… ऐसी हुंकार लगाओ कि गद्दी हिल जाए… सोते हुए की नींद टूट जाए… क्योंकि हमारी मां खतरे में हैं… चंद्रशेखर और भगत सिंह की कुरबानिया खतरे में है… लगाओ नारा— ''या तो चीनी फौज भगाओ या तो अपनी गद्दी छोड़ो''. मां भारती बहुत आशापूर्ण नेत्रों से अपनी करुण गाथा सुना रही हैं अपनी संतानों को… क्या अब हमसे इतना भी नहीं हो पायेगा की सरकार को हम मजबूर करें कि वो हमें जवाब दे कि वो हमारी मां की आजादी के लिए क्या कर रही है?

युवा पत्रकार श्रवण कुमार शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

कुलीन गुप्ता की बकवास चुपचाप सुनती रहीं टीवी100 में कार्यरत लड़कियां

: कानाफूसी : बीते दिन टीवी100 में अजीबोगरीब वाकया पेश आया। वहां सभी लड़कियो को टीवी100 के एडिटर इन चीफ और मालिक कुलीन गुप्ता ने अपने केबिन में बुलाकर जलील किया। सभी महिलाओं को आधे घंटे अपमानित किया गया। उन्हें उनकी औकात बताई गई। कुलीन गुप्ता का कहना था कि चैनल के खिलाफ अगर किसी ने कहीं मुंह खोला तो उसका बुरा हश्र किया जाएगा।

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि सभी लड़कियों को चैनल से निकालकर बाहर कर दूंगा और ऐसी व्यवस्था करूंगा कि उन्हें पूरी जिंदगी मीडिया में नौकरी न मिले। कुलीन गुप्ता यहीं नहीं रुके। उन्होंने  ये भी कहा कि मैं बड़ी हस्ती हूं और तुम सब एक-एक लड़कियां। मैं खुद में एक संस्था हूं। उन्होंने कहा कि एक तो तुम सबको जाब दूं, उस पर तुम लोग मेरी बदनामी करवाओ! इस दौरान उन्होंने एक एक लड़की से पूछा कि क्या मैंने तुम्हें छेड़ा है?

सारी लड़कियां चुप्पी साधे उनकी बकवास सुनती रहीं। मजे की बात तो यह है कि भड़ास के नाम पर किसी ने कुलीन गुप्ता को फेक काल की और कहा कि तुम्हारे यहां से फोन आया है कि तुम लड़कियों को जाब के लिए 'एडजस्ट' करने की बात कहते हो। कुलीन गुप्ता का कहना था कि उन्होंने भड़ास वाले को जमकर डांट लगाई है और अब उसे जेल भिजवाएंगे। ज्ञात हो कि अगर कुलीन गुप्ता के पास इतनी पावर होती तो वह पता लगा चुके होते कि यह फेक काल थी लेकिन उन्होंने यह करने के बजाय वही किया जो अमूमन तथाकथित पावरफुल लोग करते हैं। उन्होंने लड़कियों को धमकाया डराया और चेतावनी देकर छोड़ दिया। अब इस खबर के छपने से कुलीन गुप्ता के भीतर कितनी खलबली मचेगी और वह क्या कदम उठाएंगे, यह देखने वाली बात होगी। शायद अब टीवी100 बिना लड़कियों के चलेगा क्योंकि अब कुलीन गुप्ता के अनुसार- ''करे चाहे जो, लेकिन भरेगा हर कोई''।

((सूचना- भड़ास या भड़ास4मीडिया की तरफ से किसी भी संपादक, मालिक, रिपोर्टर या किसी अन्य से बात करने के लिए सिर्फ दो लोग अधिकृत हैं, एडिटर यशवंत सिंह और कंटेंट एडिटर अनिल सिंह. इन दोनों के अलावा अगर कोई भड़ास की तरफ से किसी को काल कर कोई जानकारी ले या धमकाए तो इसे फेक काल समझा जाए और समुचित कार्रवाई की जाए. कुलीन गुप्ता को भड़ास की तरफ से कोई फोन नहीं किया गया. जिस लैंडलाइन नंबर से उनको फोन किया गया, उसके खिलाफ कुलीन गुप्ता कार्रवाई करा सकते हैं. टीवी100 के बारे में उपर जो खबर प्रकाशित हुई है, वह उत्तराखंड के एक मीडियाकर्मी द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित है. इस मीडियाकर्मी को टीवी100 में कार्यरत किसी पत्रकार ने फोन कर पूरे प्रकरण की सूचना दी थी. अगर उपरोक्त खबर पर टीवी100 की तरफ से कोई सफाई या पक्ष पेश किया जाता है तो उसे भड़ास पर ससम्मान प्रकाशित किया जाएगा. यशवंत सिंह, एडिटर, भड़ास4मीडिया))

Dubai bans Mumbai journalist who has never travelled abroad

: City-based journalist who has never been out of India was denied a visa to Dubai due to a lifetime ban against his name : Mumbai : Imagine the shock Mumbai-based journalist Vijay Kumar Singh experienced when he was refused visa for Dubai on grounds that he has a life-long ban against his name. This, when the man has never travelled out of the country.  Singh, 35, and a resident of Santacruz has been covering the Mantralaya since several years for a national Hindi newspaper.

Recently, a Dubai-based company, Al Adeel, had invited Singh and 21 others journalist to cover a press conference in Dubai on April 29. Amongst other invitees was playback singer Sonu Nigam and his 27 crew members.

विजय सिंह
विजय सिंह
On April 7, the company’s PR agency, Inspiration, collected Singh’s documents to process his visa. The agency then handed them over to Dubai’s Signature PR agency. On April 16, Signature submitted Singh’s documents to the General Directorate of Residency and Foreigner’s Affairs, Dubai.

On April 23, Inspiration informed Singh that the Dubai Immigration Department had rejected his visa application because he is blacklisted and has a lifetime ban when it comes to visiting Dubai. “I have never been out of the country. I have a clean record and was shocked to hear that the Immigration Department has rejected my visa application stating that I have lifetime ban against my name,” said Singh.

On Friday, Singh wrote a letter (the copy is available with Sunday MiD DAY) to the Dubai Consulate demanding a clarification for the mistake.

“Let me check the matter,” is all the officer of the intelligence agency replied.

“I don’t know what happened,” said Singh. “I am very surprised. We tried hard but the officials in Dubai refused to entertain our queries stating that the “chapter is closed”.

Usha Karnani, Director of the PR agency, Signature, said, “I am going to Dubai. I will try to know actually what happened.”

साभार- मिडडे

पत्रकार की सेलरी का 14 हजार का चेक बांउस, 18 हजार देकर मामला सेटल किया

बीपीएन टाइम्स में काम करने वाले एक पत्रकार हरिशंकर सिंह की सेलरी का 14 हजार का चेक बाउंस करना बीपीएन टाइम्स मैनेजमेंट को काफी भारी पड़ा। मामला कोर्ट में जाने के बाद आखिरकार प्रबंधन ने 14 के बदले 18 हजार देकर मामले का निपटारा किया। जानकारी के मुताबिक, हरिशंकर सिंह बीपीएन टाइम्स के दिल्ली ऑफिस में बतौर उपसंपादक काम करते थे। उन्होंने जब अपनी नौकरी छोड़ी तो उन्हें मैनेजमेंट की ओर से 14 हजार का चेक बतौर फाइनल सेटलमेंट के तौर पर दिया गया था। जब उन्होंने चेक अपने अकाउंट में डाला तो स्टॉप पेमेंट करके उनका भुगतान रोक दिया गया।

इसके बाद श्री सिंह अपने पत्रकार से वकील बने पीयूष जैन के माध्यम से कड़कड़डूमा कोर्ट चले गए। वहां पर तेज तर्रार मजिस्ट्रेट राकेश कुमार रामपुरी की कोर्ट में मामला चला गया। मजिस्ट्रेट ने बीपीएन टाइम्स की ओर से चेक बाउंस के लिए जिम्मेदार डायरेक्टर को पेश होने के लिए कहा। इतना सुनने के बाद अखबार प्रबंधन अपने पत्रकार से समझौता करने को तैयार हो गया। उसे बतौरा मुआवजा चार हजार रुपये अधिक दिए गए हैं। हालांकि प्रबंधन ने अपने लिखित बयान में श्री सिंह की शिकायत को सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि वह कानूनी पचड़ों में पडऩा नहीं चाहते, इसलिए चेक अमाउंट से अधिक का भुगतान कर रहे हैं।

पत्रकार हरिशंकर सिंह का केस लड़ने वाले वकील पीयूष जैन पहले खुद भी मुख्यधारा की पत्रकारिता में लंबे समय तक सक्रिय रहे हैं. उन्होंने नवभारत टाइम्स से लेकर आज समाज तक में वरिष्ठ पदों पर काम किया है. पिछले पांच साल से वह कड़कड़डूमा कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे हैं. एडवोकेट पीयूष जैन ने बताया कि मीडिया के कई लोग समय समय पर उनसे मीडिया हाउसों के मसलों को लेकर संपर्क करते रहते हैं और जो लोग मुकदमा करने की हिम्मत दिखाते हैं, वे उनका सदा सक्रिय सहयोग करते हैं.

जनसंदेश टाइम्‍स के एडिटर एचआर को मालिक की विज्ञप्ति से छेड़छाड़ महंगी पड़ी

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस से खबर है कि इस अखबार को प्रकाशित करने वाली मुख्‍य कंपनी की एक विज्ञप्ति में छेड़छाड़ करवाना एचआर एडिटर को महंगी पड़ गयी. कंपनी प्रबंधन ने इस बदलाव पर नोटिस जारी कर संपादक से जानकारी मांगी. संपादक ने जांच के बाद अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें एडिटर एचआर विजय विनीत का नाम सामने आया. सूत्रों का कहना है कि अपनी गलती के लिए विजय विनीत ने भी माफी मांगी.

जानकारी के अनुसार बीते 21 को बनारस में जनसंदेश अखबार का प्रकाशन करने वाले अनुराग कुशवाहा की मूल कंपनी संरचना इंफ्रा प्रोजेक्‍ट प्राइवेट लिमिटेड ने बनारस में पहाडि़या बलुआ रोड पर अपना एक प्रोजेक्‍ट लांच किया. इससे जुड़ी खबर कंपनी की तरफ से मेल करके अखबार को भी भेजी गई. मामला मालिक से जुड़ा हुआ था, लिहाजा अखबार ने प्रमुखता से इस खबर को अपने पहले पेज का लीड बनाया. खबर ठीक छपी. पर खबर छपने के बाद ही बवाल शुरू हो गया.

कंपनी की तरफ से भेजी गई खबर में ''मॉडल फ्लैट की आंतरिक साज सज्‍जा संरचना की वरिष्‍ठ इंटीरियर डिजाइनर दीपशिखा सिंह ने की है और उनके इस वर्क की सबने सराहना की'' जैसी अतिरिक्‍त लाइनें जोड़ दी गई थी, जिस पर सरंचना की तरफ से नोटिस जारी करके 48 घंटे में जवाब देने को कहा गया. जब इसकी जांच की गई तो पता चला कि एडिटर एचआर विजय विनीत के आदेश के बाद यह लाइन जोड़ी गई है. चूंकि दीपशिखा सिंह विजय विनीत की पुत्री हैं और कुछ समय पहले ही संरचना में उनकी नौकरी लगी है, लिहाजा अपनी पुत्री को माइलेज दिलाने के लिए विजय विनीत ने निर्देश देकर दीपशिखा सिंह को वरिष्‍ठ इंटीरियर डिजाइर लिखवा दिया. गलती यह भी कर दी कि दीपशिखा सिंह का नाम अनुराग कुशवाहा से भी उपर लिख दिया गया.

अमूमन अखबार के किसी मामले में हस्‍तक्षेप नहीं करने वाले अनुराग कुशवाहा अपने खबर में हुए हस्‍तक्षेप के बाद नाराज हो गए. इसके बाद उनकी कंपनी की तरफ से नोटिस जारी करके मामले की जानकारी मांगी गई. जांच के बाद सबने अपने अपने कवर नोट के साथ जानकादी दी कि यह बदलाव विजय विनीत के निर्देशानुसार किया गया है. इसके  बाद संपादक ने भी सभी तथ्‍यों से संरचना के अधिकारियों के नोटिस का जवाब दिया.  वैसे अपुष्‍ट सूत्रों से यह भी खबर आ रही है कि पहले से ही विवादों से जूझ रहे विजय विनीत ने भी माफी मांग कर मामले को रफा दफा किया.

मूल रूप से रिपोर्टर का दायित्‍व संभालने वाले विजय विनीत को पहले ही एचआर में भेजकर किनारे कर दिया गया है. कंटेंट और पहले पेज में कोई सुधार नहीं दिखने के बाद प्रबंधन ने प्रमोशन के बहाने विजय विनीत को लिखा-पढ़ी से हटाकर पहले ही एचआर में भेज दिया है. संपादकीय में अब उनका हस्‍तक्षेप भी लगभग खतम कर दिया गया है. माना जा रहा है कि प्रबंधन ने लगातार मिल रही शिकायतों के बाद उन्‍हें किनारे किया था. अब एचआर में आने के बाद भी उन पर आरोप लग रहे हैं कि मिर्जापुर और सोनभद्र में नियुक्तियां डिलिंग होने के बाद की गई हैं. माना जा रहा है कि अगर स्थिति नहीं सुधरी तो देर सबेर उन्‍हें एचआर से भी किनारे लगाया जा सकता है.

AXN चैनल का प्रसारण रोके जाने के मामले में हाई कोर्ट का स्‍टे

'ए' सर्टिफिकेट की एक फिल्‍म का प्रसारण किए जाने के मामले में फंसे AXN को दिल्‍ली हाई कोर्ट से राहत मिली है. हाई कोर्ट ने चैनल को इस मामे में स्‍टे दे दिया है. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सितम्‍बर में एक नोटिस जारी करके आदेश प्रोग्राम कोड का उल्‍लंघन करने पर एक दिन के लिए AXN चैनल के सभी कार्यक्रमों के प्रसारण पर रोक लगाने का आदेश दिया था, जिसके खिलाफ मल्‍टी स्‍क्रीम मीडिया ने एक पीआईएल दाखिल की थी. 

AXN चैनल पर अंग्रेजी फिल्म 'डार्कनेस फाइल्स’ का प्रसारण 12 जुलाई 2012 को किया गया था. इसी पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक दिन के प्रतिबंध का निर्देश चैनल को दिया था. हालांकि प्रबंधन की तरफ से कहा गया है कि पूरी तरह से एडिटिंग के बाद ही इस फिल्म का प्रसारण किया था. इसे यू/ए सर्टिफिकेट मिला था, लेकिन एडिटिंग की गलतियों के चलते यह 'ए' सर्टिफिकेट के साथ ही प्रसारित हो गया. पर इस फिल्‍म का कंटेंट दर्शकों के लिए बिल्‍कुल सही था. इस मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई 2013 को होगी.

सी न्‍यूज का हाल बेहाल, एनई और सब एडिटर में भिडंत

आगरा से प्रकाशित होने वाले दैनिक अख़बार 'द सी एक्सप्रेस' की हालत खराब चल रही है. कर्मचारियों को अभी तक मार्च के वेतन का भुगतान नहीं किया गया है, जिससे क़ि वो इस्तीफे देने के लिए तैयार हैं. ऐसा ही एडिटोरियल डिपार्टमेंट में २७ अप्रैल को कुछ देखने को मिला जब तनख्वाह न मिलने की वजह से डाक देखने वाले एक सब एडिटर ने नौकरी छोड़ने की बात अपने एनई से की. सब एडिटर का इस्तीफा तो एनई ने स्वीकार कर लिया लेकिन सिटी एनई भानु प्रताप सिंह इस बात पर बिगड़ गए कि सी न्‍यूज में कर्मचारियों की कमी है और तुम इस्‍तीफा दे रहे हो.

उनकी नाराजगी दिखाने के बाद सब एडिटर भी नाराज हो गया. दोनों लोगों में विवाद होने लगा. बात जब ज्‍यादा बढ़ गई तो सब एडिटर के दूसरे सहयोगी भी काम छोड़कर जाने की धमकी देने लगे. सैलरी टाइम से नहीं मिलने से कर्मियों में पहले से ही काफी रोष था. उसके बाद साथी के साथ सही बर्ताव नहीं किए जाने से वे और नाराज हो गए. सभी कर्मचारियों को जाते देख भानू प्रताप सिंह ने खुद पर काबू किया तथा सब एडिटर को सॉरी बोलकर मामले को रफा दफा किया.

हालांकि इस संबंध में जब एनई भानू प्रताप सिंह से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है. यहां सब कुछ ठीक ठाक है. कहीं कोई विवाद नहीं है. सैलरी भी मिल रही है. थोड़ी लेट हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है. तमाम संस्‍थान इस तरह की स्थितियों से जूझ रहे हैं.

आई नेक्‍स्‍ट, आगरा के संपादकीय प्रभारी बने सचिन

तमाम प्रयासों के बावजूद दैनिक जागरण समूह का बच्‍चा अखबार अपनी पहचान नहीं बना पा रहा है. हिंदी और अंग्रेजी के दो नावों की सवारी इस अखबार को महंगी पड़ रही है. अमर उजाला का बच्‍चा अखबार काम्‍पैक्‍ट इसे लगभग सभी जगहों पर भारी अंतर से पीछे छोड़ चुका है. प्रबंधन के लाख प्रयास के बावजूद यह अखबार युवाओं की पसंद नहीं बन पाया है, जबकि अन्‍य लोग तो आधी हिंदी-आधी अंग्रेजी के चक्‍कर में इसे पढ़ना ही पसंद नहीं करते हैं.

इस अखबार को कर्मचारी मिलने मुश्किल होते हैं. गोरखपुर से कई लोग इस्‍तीफा देकर गए तो आगरा में मुकुंद मिश्रा से प्रबंधन ने इस्‍तीफा मांग लिया था. मुकुंद के जाने के बाद आई नेक्‍स्‍ट, देहरादून के संपादकीय प्रभारी कुणाल वर्मा को आगरा आई नेक्‍स्‍ट की अतिरिक्‍त जिम्‍मेदारी भी सौंप दी गई. अब खबर आ रही है कि सचिन को आगरा में आई नेक्‍स्‍ट का नया संपादकीय प्रभारी बना दिया गया है. हाल फिलहाल तक सचिन टीवी मीडिया से जुड़े हुए थे. इसके पहले आई नेक्‍स्‍ट, रांची में सुमन सौरभ दुबारा वापस आए हैं, जिन्‍हें संपादकीय प्रभारी बनाया गया है. सौरभ आई नेक्‍स्‍ट से इस्‍तीफा देकर प्रभात खबर चले गए थे.

एनडीटीवी, मुंबई में छंटनी की तैयारी, कर्मचारियों को दिए गए तीन विकल्‍प

एनडीटीवी के मीडियाकर्मियों के लिए अच्छी खबर नहीं है. एनडीटीवी प्रबंधन मुंबई में कास्‍ट कटिंग की तैयारी कर रहा है. पिछले दोनों दिनों से सीईओ और एक्‍जीक्‍यूटिव डाइरेक्‍टर विक्रम चंद्रा, एक्‍जीक्‍यूटिव वाइस चेयरपर्सन केएलवी नारायण राव तथा एचआर हेड गगन भार्गव मुंबई में डेरा डाले हुए हैं. ये लोग शनिवार को दिल्‍ली से मुंबई पहुंचे थे. कर्मचारियों की छंटनी करके कंपनी का खर्च करने की कोशिश की जा रही है. रविवार को मीटिंग करके इन लोगों ने कर्मचारियों को तीन विकल्‍प सुझाए हैं.

पहला विकल्‍प यह है कि कर्मचारियों का तबादला दिल्‍ली में एनडीटीवी के कनवर्जिस में कर दिया जाए. हालांकि यहां इन लोगों का कद और पद क्‍या होगा, सैलरी क्‍या होगा इसकी जानकारी नहीं दी गई है. दूसरा सुझाव है कि आप एनडीटीवी के साथ जितने सालों से कार्यरत हैं उतने महीने तक आपको सैलरी दी जाएगी, लेकिन आपको इस्‍तीफा देना पड़ेगा. यानी जो कर्मचारी एनडीटीवी से आठ साल तक जुड़ा रहा है कंपनी उसे आठ महीनों तक सैलरी देगी. तथा अगर इस दौरान दूसरी कंपनी से किसी जांच के लिए कॉल वगैरह आई तो एनडीटीवी उनके अपने साथ जुड़े रहने की जानकारी देगा.

कर्मचारियों को तीसरा विकल्‍प दिया गया है कि वे एक मुश्‍त पांच महीने की सैलरी लेकर एनडीटीवी को अलविदा कह सकते हैं. खबर है कि सोमवार को भी इस मामले में चर्चा चल रही है. कुछ चुनिंदा कर्मचारियों को इन तीनों विकल्‍पों में से किसी एक को चुनने का निर्देश भी दे दिया गया है. अभी तक खबर नहीं मिल पाई है कि कितने कर्मचारी इन विकल्‍पों को चुनने को तैयार हैं. एक तरफ कंपनी कास्‍ट कटिंग के नाम पर कर्मचारियों की बलि लेने की तैयारी कर रही है तो दूसरी तरफ कंपनी के अधिकारी बिजनेस क्‍लास की सवारी के बाद ताज जैसे महंगे होटल में कंपनी के पैसे पर रुके हुए हैं. साथ ही उन्‍होंने आईपीएल का भी जमकर आनंद लिया.

सहारा की मुश्किल बढ़ी : सेबी ने सभी मामले सुप्रीम कोर्ट में सुनने की याचिका दायर की

सेबी सहारा समूह की मुश्किलें कम नहीं होने दे रहा है. इसकी टोपी उसके सिर पहनाकर अरबों का साम्राज्‍य खड़ा करने वाले सुब्रत रॉय और उनका सहारा समूह पहली बार बुरी तरह मुश्किलों में घिरा है. अपनी दो कंपनियों में निवेशकों से रकम जमा कराने से पहले सेबी के आदेश को हलके में लेना उसक हलक की हड्डी बन गया है. अब न निगलते बन रहा है और ना ही उगलते. सहारा की साम, दाम, दंड और भेद जैसी सारी कवायदें फेल हो रही हैं.

सेबी ने सहारा समूह को एक और बड़ा झटका दिया है. सेबी ने सुप्रीम कोर्ट में सहारा के खिलाफ एक और याचिका दायर कर दी है. सेबी ने अपील की है कि अलग-अलग अदालतों में चल रहे मामलों को सुप्रीम कोर्ट में सुना जाए. सेबी ने सहारा हाउसिंग और सहारा रियल एस्टेट से जुड़े सभी मामले सुप्रीम कोर्ट में सुनने की अपील की है. सेबी ने इलाहाबाद और लखनऊ कोर्ट के मामले को सुप्रीम कोर्ट में सुनने की अपील की है.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को अपना फैसला सुनाना है. अगर फैसला सेबी के पक्ष में आ गया तो सुब्रत रॉय और सहारा समूह की मुश्किल और बढ़ सकती है. सेबी और सुप्रीम कोर्ट में बुरी तरह फंस चुका सहारा गिरोह तमाम जगहों पर याचिकाएं दायर करके मामले को लटकाए और उलझाए रणनीति पर काम कर रहा है. सहारा की इस रणनीति को समझते हुए ही सेबी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके उसके सारे मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में ही करने की अनुमति देने की मांग की है.

पत्रकार की हत्‍या में पांच पुलिस अधिकारी अरेस्‍ट

समाचार एजेंसी ईएफई के मुताबिक शनिवार को एक पत्रकार की हत्‍या में पांच पुलिस अधिकारियों को अरेस्‍ट किया गया है। दैनिक समाचार पत्र 'फोल्हा डी साओ पाउलो' ने बताया कि पकड़े गए सभी पुलिस अधिकारी मिनस गेरैस राज्य के मध्यवर्ती प्रांत वेल डो आवो की सिविल पुलिस के सदस्य हैं जिनका सम्बंध क्षेत्रीय उग्रवादी समूहों के साथ होने का संदेह जाहिर किया गया है।

ज्ञात हो कि 'वेल डो आवो' समाचापत्र के लिए काम करने वाले रॉड्रिगो नेटो नौ मार्च को अपने घर के दरवाजे पर मृत पाए गए थे। उन दिनों वह उग्रवादी समूहों की गतिविधियों के बारे में एक गुप्त रिपोर्ट पर काम कर रहे थे। जबकि कार्वाल्हो को 14 अप्रैल को एक रेस्तरां में गोली मारी गई थी। फ्रांस के प्रेस निगरानी समूह 'रिपोर्ट्स विदआउट बॉर्डर' ने पत्रकारों की हत्या की आलोचना करते हुए ब्राजील के अधिकारियों से इस मामले में पुलिस की संभावित संलिप्तता की जांच करने की मांग की है।

साधना न्‍यूज में एसएन विनोद के खिलाफ रची जा रही है साजिश!

पैसा कमाने के लिए साधना न्‍यूज की आईडी बेचे जाने से लेकर रिपोर्टरों को टार्गेट दिए जाने की खबरें तो पहले भी आती रही हैं, लेकिन इस समूह से जुड़े लोगों पर जब ब्‍लैकमेलिंग और भ्रष्‍टाचार के आरोप लगने लगे तो समूह संपादक एसएन विनोद ने इसकी जांच शुरू करा दी. जांच शुरू होते ही प्रबंधन समेत इस से जुड़े वरिष्‍ठ लोगों में खलबली और बेचैनी मच गई. इसके बाद ये लोग एसएन विनोद के खिलाफ षणयंत्र और साजिश रचने लगे.

एसएन विनोद के कुछ शुभचिंतकों को जानकारी मिली कि एसएन विनोद के खिलाफ काफी निम्‍न स्‍तर का षणयंत्र तथा साजिश रचा जा रहा है. कुछ महिलाकर्मियों के माध्‍यम से उन पर आरोप लगाए जाने की तैयारी की जा रही है. इन लोगों ने एसएन विनोद को प्रबंधन समेत भ्रष्‍टाचार-ब्‍लैकमेलिंग शामिल लोगों की साजिश से अवगत कराने के साथ उन्‍हें आगाह भी कर दिया था. अब खबर आ रही है कि साधना में एसएन विनोद के खिलाफ साजिश को अंजाम दिए जाने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं.

प्रबंधन से जुड़े लोग हाल ही में एक महिला कर्मचारी को प्रोड्यूसर के पद पर ज्‍वाइन कराया है. लेकिन इस महिलाकर्मी को पॉवर चैनल हेड वाला दे दिया गया है. खबर आ रही है कि इस महिलाकर्मी को चैनल में लेकर आए लोग इसका इस्‍तेमाल एसएन विनोद के खिलाफ करने की तैयारी कर रहे हैं. इसमें उच्‍च प्रबंधन से जुड़े लोगों की मौन सहमति बताई जा रही है. सूत्रों का कहना है कि कई दशकों से अपनी जनसरोकारी पत्रकारिता और छवि के लिए पहचाने जाने वाले एसएन विनोद का भ्रष्‍टाचार के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान प्रबंधन के लोगों को भी रास नहीं आ रहा है.

इसके पहले इस समूह के संपादक रहे एनके सिंह भी ऐसी परिस्थितियों से आजिज आकर इस्‍तीफा दे दिया था. एनके सिंह भी अपने तरीके से काम करने वाले संपादक माने जाते हैं. स्‍पष्‍टवादी एनके सिंह को जब समूह में चलने वाली गतिविधियां रास नहीं आईं तो उन्‍होंने समूह को लात मारने में एक मिनट की भी देरी नहीं लगाई. नए दौर के पत्रकार जहां सरोकारी पत्रकारिता की बजाय जल्‍द से जल्‍द अमीर बनने तथा मालिकों को भी ज्‍यादा पैसा कमवाने का सपना दिखाते हैं तो पुराने पत्रकार जनसरोकारी पत्रकारिता को इसके ऊपर मानते हैं. और यहीं से शुरू होती है साधना न्‍यूज में विचारों की टकराहट. 

साधना समूह में जल्‍द से जल्‍द पैसा कमाने के चक्‍कर में कई राज्‍यों में चैनल को ठेके पर दे दिया गया है. उत्‍तराखंड में इस चैनल के नहीं दिखने के बावजूद सेटिंग गेटिंग से जमकर विज्ञापनों की वसूली की जा रही है. पत्रकारिता को ठेकेदारी बनाने वाले साधना समूह में एसएन विनोद के खिलाफ रची जा रही सजिशें कितनी सफल होती हैं यह देखने वाली बात होगी. हालांकि इन खबरों के बाहर आने के बाद से साधना न्‍यूज में तनाव की स्थिति बनी हुई है.

National Interest : Mere paas media hai

: The fixer-businessman's new badge of honour — and disgrace : Besides political connections, there is one equally significant common thread linking the owners of chit fund companies currently under the scanner in the east. They are all media owners as well. Many have a footprint across media and languages. Further, there are other common factors within their media businesses. For none of them, is media a major or core activity.

Most of them make losses in their media businesses. For all of them, media has also been an afterthought, after they had made their money in other businesses, mainly chit funds, mining, real estate or simply politics. They obviously saw media as a small investment relative to the size of their businesses. What is more important to the people of India, and for us, a small but expanding community of Indian journalists, they also saw media as a force multiplier. A mere adjunct to their businesses, a small hole in their balance sheets, but an investment that was monetised in other ways. It secured you political patronage, protected you from the police and regulators, helped you fix your rivals and, as in the case of the head of the media ventures owned by the Saradha group, got you a seat in Rajya Sabha. One thing it rarely made you was old-fashioned profits.

The Saradha group set up several news channels, besides newspapers in Bengali, English, Hindi and Urdu. The group in the Northeast it was looking to invest in belonged to another unconventional owner, an occasional politician, Matang Singh, who appeared from nowhere to become a minister in Narasimha Rao’s cabinet in Chandraswami’s heyday and disappeared equally mysteriously. If he and his wife Manoranjana Singh made any money running the media business, we do not know, but it seems unlikely. Rose Valley, Tower Group, Shine Group, Rahul Group, Chakra Group and G Group, all under the scanner now in Bengal, have the same basket of interests: chit funds, real estate and media. In resource-rich east-central India, where a mining lease is the ticket to status, clout and a private Cessna Citation, even an Embraer, a media appendage has now become a necessity.

THE political class was the first to understand what a tiny business the media was financially, and how out of proportion its clout. The first “non-traditional” media entrepreneurs in this current phase were thus politicians, particularly in the states. Y.S. Rajasekhara Reddy’s Sakshi group is the most visible, but there are many others, some in almost every state. Of these two sets of new entrants in the media, entrepreneurs who work on the cusp of politics and resources (mining, real estate) and regulation (non-banking finance), and the politicians, the latter have been cleverer. If it was clout they were after, the better way, some of them figured, was to control access for others rather than go through the “jhanjhat” (messiness) of setting up channels and newspapers and paying salaries to ungrateful, insufferable journalists. Go over the map of India, state by state, and see how politicians have taken control of television channel distribution. Punjab and Tamil Nadu are two of the starkest examples where powerful political leaders or families control distribution, and anybody critical of them is routinely taken off air. You are also less likely to lose money in this business. Distribution has guaranteed incomes, and political clout ensures your monopoly anyway.

But why are we complaining? Why are we being so protective of what only we see as our turf? There is nothing in the law to stop anybody from owning media. And sure enough, the biggest business houses in India have tried their hand with the media and retreated with burnt fingers and singed balance sheets. The Ambanis (Observer Group), Vijaypat Singhania (Indian Post), L.M. Thapar (The Pioneer), Sanjay Dalmia (Sunday Mail), Lalit Suri (Delhi Midday), are like a rollcall of the captains of Indian industry who failed in the media business. They failed, you’d say, because they did not, deep down, respect the media, or journalists. Many of them saw themselves as victims of poorly paid, dimwit journalists employed by people who called themselves media barons but were barons of what was a boutique business compared to theirs.

But there is a difference between then and now, and between them and the state-level businessmen investing in the media now. They failed because they did not respect journalism. The current lot are setting up or buying up media mainly because they do not respect journalism, because they think all journalists are available, if not for sale then for hire, as lawfully paid employees. If you have a couple of news channels and newspapers, a few well known (and well connected) journalists as your employees, give them a fat pay cheque, a Merc, and they solve your problem of access and power. They also get you respect, as you get to speak to, and rub shoulders with top politicians, even intellectuals, at awards and events organised by your media group. It is the cheapest ticket to clout, protection and a competitive edge. A bit like, to steal the immortal line Shashi Kapoor spoke to his wayward “brother” Amitabh Bachchan in Yash Chopra’s Deewar (mere paas maa hai), tere paas police, SEBI, RBI, CBI, kuchch bhi ho, mere paas media hai. Remember how Gopal Kanda defied Delhi Police to arrest him rather than have him present himself grandly for surrender? The police put up scores of checkpoints to look for him, but he arrived in style, riding an OB van of STV, a channel known to be “close” to him. Which cop would dare to look inside an OB van?

Most of us, particularly senior citizens in the profession, have stories of cash-rich businessmen promising “blank cheques” to set up new media companies. My favourite is of a well known and, frankly, well respected and clean real-estate baron coming in to see me once, in evident distress, and asking if I would set up a TV channel for him, whatever the cost, Rs 300, 400 crore. I asked him why. Almost every news TV channel in India was losing money. He said he had spent all of the previous day waiting for his turn at a land allotment meeting in Noida. Nobody asked him even for a glass of water, while all those who owned some media were ushered in with respect as soon as they arrived. And of course, the deal would have cost them much less. He had walked out with the resolve to set up his own media. I did explain to him that, in that case, he had come to the wrong people, but he isn’t the only one of his kind you would come across lately.

WE are complaining, and we should be worried, because this new phenomenon destroys two things. One, it damages our markets by distorting wages and corrupting terms of engagement with advertisers, sponsors and government. Second, it wrecks the very bedrock of our profession: respect that is built over years and decades of honesty, integrity and professional competence. Journalism, in so many ways, is like medicine, a very special, even noble profession with its own equivalent of the Hippocratic oath. This new invasion has contributed to the declining respect for the journalistic class, a point I had tried to make in an earlier article (‘Noose Media’, IE, April 3, 2010, goo.gl/MwgzW), provoked to see how often journalists were being mocked or caricatured in popular culture and Hindi cinema. And that was five months before Peepli Live.

So what can we do about it? Any suggestion that gives the government, or any regulator, a say in who can own the media would be disastrous. Esoteric ideas cannot work. You’d remember how venerable Justice P.B. Sawant, as press council chairman in the ’90s (he would have hit more headlines than Justice Katju if there was much news TV then), used to say that journalists’ cooperatives should run newspapers. I had humbly pleaded with him that such a thing would never work: I was a member of a housing cooperative run by journalists and it was a disaster. You will, therefore, need entrepreneurs to run the media.

Maybe we should begin by learning to talk more about ourselves, and more openly. There is no bar on who owns media, but disclosure and discussion of conflicts of interest should be widespread and open. Print, at least, has an annual disclosure of its shareholders. This should be extended to news TV. But, more than that, we need to cover and investigate each other. How many of us knew this web of conflicting media-chit fund-real estate-political interests in Bengal before lakhs had lost their life-savings and the media hundreds of jobs and a bit of credibility?

We in the mainstream media have to get over that old-fashioned queasiness. Because we cannot escape scrutiny now, and not only should we not try avoiding it, we should become part of it. It is not the usual, silly cry for naming and shaming, but for opening ourselves up to peer review and scrutiny.

शारदा समूह की कंपनियों के बीच हुए जटिल ट्रांजैक्‍शन

नई दिल्ली। कोलकाता के शारदा ग्रुप के अकाउंट्स की जांच में जटिल ट्रांजैक्शन स्ट्रक्चर का खुलासा हुआ है। कई ग्रुप कंपनियों के बीच बड़े पैमाने पर ट्रांजैक्शन हुए हैं, ऐसे में पैसों की लेन-देन को पूरी तरह सामने लाने में कई दिन लग सकते हैं। रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (आरओसी) की जांच में शारदा रियल्टी, शारदा कंस्ट्रक्शन कंपनी, देवकृपा व्यापार प्राइवेट लिमिटेड, बंगाल मीडिया प्राइवेट लिमिटेड और बंगाल अवधूत एग्रो के बीच 2011-12 में कई तरह के क्रॉस लोन का मामला सामने आया है।

जांच से जुड़े एक सीनियर सरकारी अधिकारी ने ईटी को बताया, 'आरओसी को लगता है कि जानबूझकर फाइनैंशल गड़बड़ियों को छिपाने के लिए बड़े पैमाने पर ग्रुप कंपनियों के बीच फाइनैंशल ट्रांजैक्शन किए गए हैं।' आरओसी ने 23 अप्रैल को मिनिस्ट्री ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स को दाखिल रिपोर्ट में कहा है, 'शारदा कंस्ट्रक्शन को 2011-12 में शारदा रियल्टी से 40 करोड़ रुपए का लॉन्ग टर्म लोन मिला, लेकिन बाद में 30 करोड़ रुपए का कई बार ट्रांजैक्शन हुआ और अंत में यह 10 करोड़ रुपए रह गया।' कंपनी ने इस पैसे का इस्तेमाल कोई एसेट तैयार करने में नहीं किया। इसकी जगह इसने कई दूसरी ग्रुप कंपनियों को लोन दिया और वे कंपनियां किसी बिजनस गतिविधियों में शामिल नहीं थीं।

बचे हुए 10 करोड़ रुपए में से शारदा कंस्ट्रक्शन ने 2.9 करोड़ रुपए का कर्ज अपनी सब्सिडियरी देवकृपा व्यापार को दिया। शारदा कंस्टक्शन ने 3.5 करोड़ रुपए हिस्सेदारी खरीदने में खर्च की। इस कंपनी ने 2.31 करोड़ रुपए का कर्ज बंगाल मीडिया प्राइवेट लिमिटेड को दिया। इसने 36 लाख रुपए का कर्ज एक अन्य ग्रुप कंपनी वेस्ट बंगाल अवधूत एग्रो प्राइवेट लिमिटेड को दिया। इन कंपनियों में देवकृपा व्यापार किसी भी उल्लेखनीय बिजनस ऐक्टिविटी में शामिल नहीं थी। कंपनी का फाइनैंशल स्टेटमेंट कहता है कि इसने टीवी स्टूडियो को बनाने में पैसा खर्च किया, जबकि स्टूडियो अभी भी पूरा नहीं बना है।

शारदा कंस्ट्रक्शन से बंगाल मीडिया प्राइवेट लिमिटेड को कर्ज मिला, लेकिन इसके पास भी कोई बिजनस मॉडल नहीं है। कंपनी का 43 करोड़ रुपए का नेगेटिव नेट वर्थ है और इसने 2011-12 में 14 करोड़ रुपए का लॉस झेला है। इन सब तथ्यों का खुलासा आरओसी की रिपोर्ट में हुआ है।

तीसरी कंपनी वेस्ट बंगाल अवधूत एग्रो प्राइवेट लिमिटेड का मामला भी पूरी तरह संदिग्ध है। रिपोर्ट के अनुसार कंपनी के बुक्स पर भारी-भरकम ऐसेट होने के बावजूद इसने इस्तेमाल के लिए कोई फंड नहीं रखा है। कंपनी के अकाउंट के अनुसार इसके पास 1.78 करोड़ रुपए की जमीन है, बिल्डिंग की वैल्यू 1.35 करोड़ रुपए है। कंपनी के पास 70 लाख रुपए की मशीनरी है, लेकिन इन ऐसेट्स से कंपनी को किसी तरह की आय नहीं हुई है।

आरओसी की हालिया रिपोर्ट शारदा ग्रुप कंपनियों के अकाउंट्स में अनियमितताओं के सामने आने के 10 महीने बाद आई है। आरओसी ने कंपनी के मामलों में जांच के सुझाव दिए हैं। कॉरपोरेट मिनिस्ट्री के एक अधिकारी ने कहा, 'हमने राज्य सरकार को उनके जांच को समझने के लिए लिखा है। हम अभी तक क्या किया है और आगे क्या करने की योजना है, इन सब को राज्य सरकार को समझना चाहिए।' (ईटी)

स्‍वतंत्र मिश्रा ने सहारा मीडिया से इस्‍तीफा दिया

सहारा मीडिया में कई दशकों तक प्रमुख पदों पर कार्यरत रहे स्‍वतंत्र मिश्रा ने इस्‍तीफा दे दिया है. हाल-फिलहाल तक स्‍वतंत्र मिश्रा यूपी-उत्‍तराखंड हेड की जिम्‍मेदारी निभा रहे थे. स्‍वतंत्र मिश्रा सहारा मीडिया समूह के हेड की जिम्‍मेदारी भी निभा चुके हैं. सहारा से जुड़े उच्‍च प्रबंधन के लोगों ने स्‍वतंत्र मिश्रा की विदाई यानी इस्‍तीफा को निजी कारणों के चलते दिया जाना बताया है. वहीं दूसरी तरफ स्‍वतंत्र मिश्रा को टर्मिनेट करने की भी खबरें आ रही थीं, लेकिन इसके लिए कोई सर्कुलर जारी नहीं किया गया है और ना ही इस बात की आधिकारिक पुष्टि हुई है.

बताया जा रहा है उन्‍हें एसएमएस के माध्‍यम से सहारा से विदाई की जानकारी दी गई है. वहीं दूसरी तरफ कयास यह भी लगाया जा रहा है कि स्‍वतंत्र मिश्रा के खिलाफ कार्रवाई क्रेडिट कार्ड मामले में की गई है. इस मामले को लेकर पिछले दिनों सहारा मीडिया में बहुत जबर्दस्‍त उठा-पटक मची थी. जबकि सहारा से जुड़े उच्‍च प्रबंधन का कहना है कि स्‍वतंत्र मिश्रा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है, उन्‍होंने निजी कारणों के चलते इस्‍तीफा दिया है.  

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस में नहीं मिली सैलरी, कर्मचारी परेशान

जनसंदेश टाइम्‍स, वाराणसी से खबर है कि यहां काम करने वाले कर्मियों को अब तक मार्च महीने की सैलरी नहीं मिली है. कर्मचारी सैलरी को लेकर परेशान हैं. बच्‍चों की फीस ए‍डमिशन समेत कई जिम्‍मेदारियां इसी महीने उनके ऊपर है लेकिन प्रबंधन ने अब तक उनको सैलरी नहीं दी है, जबकि अप्रैल माह भी बीतने वाला है. कर्मचारियों को स्‍पष्‍ट बताया भी नहीं जा रहा है कि उन्‍हें किस तारीख को सैलरी दी जाएगी.

पिछले कई महीनों से जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस में सैलरी लेट-लतीफ आ रही है, जिससे कर्मचारी परेशान हैं. उधार-नगद लेकर वे अपने खर्च मैनेज कर रहे हैं. बनारस में अवसर कम होने के चलते कर्मचारी चाह कर भी अखबार छोड़ नहीं पा रहे हैं. पिछले दिनों जनसंदेश टाइम्‍स प्रबंधन ने ब्रांडिंग के नाम पर नाच-गाना कराने के लिए कई लाख रुपये खर्च किए लेकिन कर्मचारियों को सैलरी नहीं दी. इस वजह से भी मीडियाकर्मी नाराज हैं.

मीडियाकर्मियों का कहना है कि प्रबंधन के पास नाच-गाना में फूंकने के लिए पैसे हैं लेकिन कर्मचारियों को सैलरी देने के नाम पर उनके पास पैसे का अभाव है. बताया जा रहा है कि जनसंदेश टाइम्‍स लगातार घाटे में चल रहा है, जिसके चलते प्रबंधन इसमें पैसा इनवेस्‍ट करने में ज्‍यादा दिलचस्‍पी भी नहीं ले रहा है. कंटेंट को लेकर भी यह अखबार अपनी कोई अलग छवि नहीं बना पाया है, जिसका सीधा असर रिवेन्‍यू पर पड़ रहा है. सूत्रों का कहना है कि इस अखबार के अन्‍य यूनिटों का हाल भी ऐसा ही है.

नेशनल दुनिया में सिटी एडिटर बने राकेश राय, बृजेश का तबादला

आई नेक्‍स्‍ट, मेरठ से खबर है कि राकेश राय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे अखबार में एडिटोरियल हेड थे. राकेश अपनी नई पारी मेरठ में ही नेशनल दुनिया के साथ शुरू कर रहे हैं. उन्‍हें यहां पर सिटी एडिटर बनाया गया है. राकेश ने अपने करियर की शुरुआत कानपुर में अमर उजाला के साथ की थी. वे लंबे समय तक अमर उजाला से जुड़े रहे. उन्‍होंने अमर उजाला को कानपुर के अलावा हरियाणा तथा जम्‍मू में भी अपनी सेवाएं दी हैं. 2003 में वे दैनिक जागरण, मेरठ के साथ जुड़ गए. पांच साले पहले वे आई नेक्‍स्‍ट के साथ सीनियर रिपोर्टर के रूप में जुड़े तथा अपनी काबिलियत के बल पर एडिटोरियल हेड बने.

अमर उजाला, आगरा से खबर है कि बृजेश कुमार का तबादला वाराणसी के लिए कर दिया गया है. वे पिछले चार सालों से आगरा में अखबार को अपनी सेवाएं दे रहे थे. बृजेश का तबादला अमर उजाला की पॉलिसी के तहत किया गया है. संभावना है कि एक मई को वो बनारस में अपनी जिम्‍मेदारी संभाल लेंगे.  

अमर उजाला, बरेली से अजित का तबादला, विपुलराज का इस्‍तीफा

अमर उजाला, बरेली से खबर है कि सिटी इंचार्ज अजित बिसारिया का तबादला लखनऊ के लिए कर दिया गया है. वे चीफ सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे. अजित 1 मई को लखनऊ में अपना कार्यभार संभाल लेंगे. संभावना जताई जा रही है कि उनकी जगह अमर उजाला, मेरठ से बरेली भेजे गए पंकज सिंह को बरेली में सिटी इंचार्ज बनाया जा सकता है. हालांकि इसकी अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है. पंकज इसके पहले भी हिंदुस्‍तान, बरेली के साथ काम कर चुके हैं.

अमर उजाला, बरेली से दूसरी खबर है कि विपुल राज सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर लंबे समय से सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे. विपुलराज अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

पत्रकार जितेंद्र सिंह की हत्‍या की निंदा, परिजनों को मुआवजा देने की मांग

रांची : झारखंड यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट और प्रेस क्लब की बैठक रविवार को यूनियन कार्यालय में हुई। बैठक में खूंटी जिला के पत्रकार जितेंद्र सिंह की नक्सलियों द्वारा की गई हत्या की कड़ी शब्दों में निंदा की गई। इसके अलावा पत्रकार के परिवार को सरकारी प्रावधान के मुताबिक मुआवजा और एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने, मामले की सीआईडी जांच कराने और दोषियों को सजा देने की मांग की गई। बैठक शिव कुमार अग्रवाल प्रताप सिंह, चंद्रकांत गिरी, उदय सिंह, हेमंत झा, प्रदीप अग्रवाल, मनोज मिश्र, धीरेंद्र चौबे, सुदीप सिंह अन्य मौजूद थे।

दूसरी तरफ मनोहरपुर व चक्रधरपुर के पत्रकारों ने जितेंद्र सिंह के हत्‍या की निंदा की है। पत्रकार की आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखा गया। बैठक में पत्रकार के परिजनों को प्रावधान के तहत मुआवजा तथा आश्रित को नौकरी, घटना की सीआईडी जांच तथा राज्‍य में पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की मांग की है। बैठक में रमेश सिंह, राजकुमार सिंह, अमित राज, राधेश सिंह, प्रफुल्ल कुमार भंज, प्रमोद मिश्रा, नारायण रवानी समेत अन्य पत्रकार उपस्थित थे।

रंजिशन कुछ पत्रकारों ने संतोष उपाध्‍याय के खिलाफ अफवाह फैलाई

बरहज तहसील में हिंदुस्‍तान के पत्रकार संतोष उपाध्‍याय के साथ हुई मारपीट की घटना पत्रकारों के आपसी रंजिश का परिणाम है. संतोष उपाध्‍याय बरहज से सटे जयनगर में एक व्‍यक्ति को कुछ रुपये देने गए थे. संतोष जिस व्‍यक्ति को रुपये देने गए थे उसका अपने पट्टीदारों से जमीन का विवाद चल रहा है. जब वे रुपये देकर वापस जा रहे थे तो दूसरे पक्ष के लोगों ने उनकी बाइक रोक ली तथा पूछताछ करने लगे.

संतोष ने उन लोगों को बताया कि वे अपने एक मित्र का पैसा बकाया था, जिसे वे देकर आ रहे हैं. इतने में दूसरे पक्ष के लोग भी आ गए तथा उनके बीच आपस में ही विवाद शुरू हो गया. फिर मारपीट भी हो गई, जिसकी चपेट में संतोष उपाध्‍याय भी आ गए. इसी मामले को रंजिशन कुछ पत्रकारों ने बढ़ा चढ़ाकर तथा रंगरेलियां मनाने में मारपीट का मामला बना दिया, जो सरासर गलत है. हिंदुस्‍तान के वरिष्‍ठ लोगों ने भी मौके पर जाकर इस मामले की जांच की, जिसके बाद संतोष उपाध्‍याय को क्‍लीन चिट दिया गया है.

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

गाजीपुर गौरव से नवाजे गए विजय बाबू

वरिष्‍ठ पत्रकार विजय कुमार को साहित्‍य चेतना समाज ने गाजीपुर गौरव के सम्‍मान से नवाजा। हजारों लोगों की भीड ने उस समय तालियों की गडगडाहट से 81 वर्षीय विजय बाबू के प्रति सम्‍मान का इजहार किया जब यशभारती पुरस्‍कार से सम्‍मानित मूर्धन्‍य साहित्यकार डा0 विवेकी राय, पूर्व कुलपति डा0 अच्‍युतानन्‍द मिश्र एवं प्रो0 सत्‍यमित्र दूबे ने उन्‍हें अंगवस्‍त्रम, माला व प्रशस्ति पत्र दिया। साहित्‍य चेतना समाज का यह वार्षिक सम्‍मेलन गाजीपुर में आयोजित किया गया । कार्यक्रम के मुख्‍य अतिथि माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा0 अच्‍युतानन्‍द मिश्र थे। जिन्‍होने अपने सम्‍बोधन में विजय कुमार को पूर्वान्‍चल व प्रदेश के यशस्‍वी पत्रकारों में से एक बताया और कहा कि इनकी कलम तो हमेशा भ्रष्‍टाचार के खिलाफ व उत्‍थान-प्रगति के लिये चली है। इनमें मैं हमेशा एक युवा की तस्‍वीर देखता हूं। अध्‍यक्षता कर रहे डा0 विवेकी राय ने कहा कि विजय बाबू चक्रवर्ती हैं और आज सैकडों हाथों ने इन्‍हें सम्‍पूर्ण आदर के साथ माला पहनाकर यह खिताब दिया है। उ०प्र० के अतिरिक्‍त उर्जा राज्‍य मंत्री स्‍वतंत्र प्रभार विजय मिश्र ने कहा कि विजय बाबू को गाजीपुर गौरव का पुरस्‍कार देने से गाजीपुर का गौरव बढा है। गाजीपुर गौरव से सम्‍मानित प्रसन्‍नता से अविभूत विजय बाबू ने कहा कि हम वैसे भी गाजीपुर के लोगों के ए‍हसान से दबे थे और आज पुन: जो एहसान लाद दिया गया है, मैं प्रयास करूंगा कि उसे उतार पाऊं । कार्यक्रम में दूर-दूर से आये तमाम पत्रकारों व साहित्यकारों के साथ साथ संस्था के पदाधिकारी और गण मान्य लोग शामिल हुए। – गाजीपुर से केके की रिपोर्ट, 9415280945

मीडिया हाउसों के टॉप टेन पत्रकारों में ज्‍यादातर ब्राह्मण और कायस्‍थ ही हैं

मेरे एक मित्र हैं उर्मिलेश। मैं उन्हें १९८३-८४ से जानता हूं। धीर गंभीर पत्रकारों मे उनकी गिनती होती है। उर्मिलेश का कहना है कि हिंदी पत्रकारिता में दलित और पिछड़ी जाति के लोगों पर अघोषित रोक सी लगी है। आप किसी भी मीडिया हाउस के टॉप टेन लोगों में दलित और पिछड़ी जाति के लोगों के नाम नहीं बता पाएंगे। पर मुझे लगता है कि मीडिया हाउसेज के टॉप टेन में ब्राह्मण और कायस्थ के अलावा अन्य अगड़ी जाति के लोग भी नहीं के बराबर हैं।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के एफबी वॉल से साभार.

एमआर मिश्रा, पूनम पांडेय समेत 24 पत्रकारों को मातृश्री पुरस्‍कार मिला

नई दिल्ली : पत्रकारों और कलाकारों को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित करने की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए रविवार को यहां 38वां मातृश्री मीडिया पुरस्कार प्रदान किया गया। पीटीआई के खेल संपादक एमआर मिश्रा एवं भाषा के कवीन्द्र नारायण श्रीवास्तव सहित 26 पत्रकारों को इस वर्ष पुरस्कृत किया गया।

सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का सम्मान इस वर्ष रणवीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा के अभिनय से सजी ‘बर्फी’ के नाम रहा। चांदनी चौक के अभिषेक सिनेप्लेक्स में एक समारोह में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने पत्रकारों को पुरस्कार प्रदान किया और अवसर पर पंजाब केसरी समाचारपत्र के संपादक अश्वनी कुमार और मातृश्री मीडिया पुरस्कार समारोह समिति के संयोजन दिनेश शर्मा भी उपस्थित थे। समाचार एजेंसियों में पीटीआई के खेल संपादक एमआर मिश्रा, भाषा के समाचार संपादक कवीन्द्र नारायण श्रीवास्तव, यूएनआई के सुनील कुमार और यूनीवार्ता के श्रवण कुमार को यह पुरस्कार दिया जाएगा।

पुरस्कार प्राप्त करने वाले अन्य पत्रकारों में राष्ट्रीय सहारा दिल्ली के संपादक राजीव सक्सेना, पायनियर के उत्तम कुमार, पंजाब केसरी के मनोज पंत, नवभारत टाइम्स की पूनम पांडेय, दैनिक हिन्दुस्तान के अमित झा, हिन्दुस्तान टाइम्स के जतिन आनंद, दैनिक जागरण के कबिलेश मिश्रा, अमर उजाला के हरीश चंद्र लखेड़ा, जनसत्ता की पारूल शर्मा, दैनिक भास्कर के सुजीत ठाकुर और राजस्थान पत्रिका के संजय मिश्रा शामिल हैं। इसके अलावा, शाह टाइम्स के प्रमोद कुमार, महामेधा के धर्मेन्द्र कुमार, वीर अर्जुन के विजय शर्मा, सांध्य टाइम्स के सुशील कुमार त्रिपाठी और डीएलए के संतोष पाठक को भी पुरस्कार प्रदान किया गया।

इलेक्ट्रानिक मीडिया में एमएच-1 के विक्की जैन, सीसीएन की चेतना, टोटल टीवी के कैमरामैन गंगा सिंह, एनएनआई के भूपाल सिंह, साधना टीवी की मंजीत कौर और 4रियल न्यूज के सोनू कुमार को मातृश्री पुरस्कार दिया गया। (एजेंसी)

सड़क हादसे में ‘मिस’ पत्रिका की पूर्व संपादक मैरी का निधन

न्यूयॉर्क। प्रखर नारीवादी और मशहूर पत्रकार मैरी थॉम का एक सड़क हादसे में निधन हो गया है। वे 68 साल की थीं। मोटरसाइकलें चलाने की शौकीन मैरी बीते शुक्रवार की शाम उत्तरी न्यूयॉर्क के एक राजमार्ग पर अपनी होंडा मागना-750 चला रही थी और उसी दौरान हादसे का शिकार हो गईं। उनके एक रिश्तेदार ने यह जानकारी दी। वे ‘मिस’ पत्रिका की पूर्व संपादक थीं। (भाषा)

अमर उजाला, लखनऊ के दो पत्रकार आपस में ही भिड़े

अमर उजाला, लखनऊ से खबर है कि संपादकीय विभाग में कार्यरत दो सहकर्मियों ने शनिवार की दोपहर जमकर तू-तू-मैं-मैं तथा गाली-ग्‍लौज हुई. नौबत हाथापाई तक भी पहुंच गई परन्‍तु अन्‍य साथियों ने दोनों को अलग करके मारपीट होने से बचा लिया. संपादक इंदुशेखर पंचोली लखनऊ में नहीं है, लिहाजा उन्‍हें मोबाइल के जरिए सूचना दी गई है. संभावना है कि उनके लखनऊ आने के बाद कोई निर्णय लिया जाएगा.

बताया जा रहा है कि संपादक की अनुपस्थिति में ही संपादकीय विभाग के लोगों की रुटीन मीटिंग ग्‍यारह बजे के आसपास हो रही थी. इसी में किसी खबर को लेकर आशीष त्रिपाठी तथा सैफ के बीच बहस हो गई. बात अपशब्‍दों और गाली-ग्‍लौज से बढ़ते-बढ़ते हाथापाई तक पहुंच गई. हालांकि इसकी नौबत आती उसके पहले ही वहां मौजूद सहकर्मियों ने बीच बचाव कर मामले को बहुत ज्‍यादा बिगड़ने से बचा लिया. बताया जा रहा है कि यह सब लखनऊ यूनिट में मौजूद तनाव के चलते हुआ है. इस मामले की सूचना संपादक तक पहुंचा दी गई है.

अमर उजाला, लखनऊ में जूनियरों को डेस्‍क इंचार्ज बनाया गया है, जबकि सीनियर लोगों को मजबूरी में उनके अंडर में काम करना पड़ रहा है. इसका असर यह हो रहा है कि सीनियर साथी कुंठा के साथ काम कर रहे हैं. इसके बाद छोटी-छोटी बातों पर भी मौका मिलते ही आपस में उलझ जाते हैं. अमर उजाला, लखनऊ में यह पहली घटना नहीं है. इसके पहले भी इस तरह की गई घटनाएं हो चुकी हैं. खुद संपादक भी अपने सहयोगियों पर कई बार बुरी तरह भड़क चुके हैं.

महुआ इंटरटेनमेंट के डिजिटल प्‍लेटफार्म पर 24 घंटे का बैन

महुआ समूह के चैनल महुआ इंटरटेनमेंट पर 24 घंटे के लिए बैन लगाया गया है. यह बैन चैनल के डिजिटल प्‍लेटफार्म पर लगाया गया है. सूत्रों का कहना है कि महुआ प्रबंधन संबंधित विभाग द्वारा मांगे गए कुछ कागजातों को उपलब्‍ध नहीं करा पाया, जिसके बाद चैनल के डिजिटल प्‍लेटफार्म पर चौबीस घंटे का बैन लगा दिया गया है.

सूत्रों का कहना है कि अगर इन कागजातों को महुआ प्रबंधन उपलब्‍ध करवा पाने में असफल रहता है तो यह बैन लंबा खिंच सकता है. गौरतलब है कि महुआ समूह का इंटरटेनमेंट चैनल लाभ में चलने वाला चैनल है. यूपी-बिहार समेत कई हिंदी भाषी राज्‍यों में इस चैनल की अच्‍छी टीआरपी है.

दैनिक जागरण में जगमाल चौधरी एवं रामवीर का तबादला

दैनिक जागरण, पानीपत से खबर है कि जगमाल चौधरी का तबादला जालंधर के लिए कर दिया गया है. वे प्रोडक्‍शन मैनेजर के पद पर कार्यरत थे. जगमाल चौधरी एक साल बाद ही रिटायर होने वाले थे लेकिन प्रबंधन ने जानबूझकर उनका तबादला जालंधर के लिए कर दिया. वे अपने करियर की शुरुआत से ही जागरण से जुड़े हुए थे. जगमाल ने अपने रिटायरमेंट की दुहाई देकर तबादला रोकने का निवेदन नोएडा एवं कानपुर में प्रबंधन से किया था, परन्‍तु प्रबंधन ने उनकी बातों पर कोई ध्‍यान नहीं दिया. संवेदनहीनता दिखाते हुए उन्‍हें पानीपत से जालंधर भेज दिया गया.

वहीं उनकी जगह जालंधर में तैनात रामवीर को पानीपत भेज दिया गया. रामवीर भी पानीपत में प्रोडक्‍शन मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं. इनका तबादला भी इनकी इच्‍छा के विपरीत किया गया. बताया जा रहा है कि प्रबंधन ने जानबूझ कर और परेशान करने के उद्देश्‍य से दोनों लोगों को तबादला किया है.

बंगाल में चिटफंड कंपनी का एक और अखबार बंद

बंगाल में एक और चिटफंड कंपनी का अखबार बंद हो गया है. टावर ग्रुप के मालिक रामेंदु चटर्जी ने समूह के अखबार 'प्रात्यिकी' को बंद कर दिया. इस अखबार के कर्मचारियों को पिछले चार महीने से वेतन नहीं दिया गया है. लगभग एक साल पहले चटर्जी के टावर ग्रुप ने प्रात्यिकी को लांच किया था, लेकिन कुछ महीने बाद ही अखबार की हालत खराब हो गई.

शारदा समूह पर शिकंजा कसने के बाद रामेंदु चटर्जी ने कोलकाता प्रेस क्‍लब में एक पत्रकारवार्ता भी करने की कोशिश की, परन्‍तु उनके समूह से जुड़े पत्रकारों ने उनका विरोध करना शुरू कर दिया. पत्रकारों ने आरोप लगाया कि रामेंदु ने उनके चार माह का वेतन हड़प लिया है. अखबार के मीडियाकर्मियों ने रामेंदु को घेर लिया और बंधक बनाने की भी कोशिश की, लेकिन पुलिस एवं अन्‍य लोगों के सहयोग से वे बच पाने में सफल रहे.

खुर्शीद के इशारे पर अमेरिका में मेरा अपमान किया गया : आजम खान

न्यूयार्क : उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री आजम खान ने अमेरिका के एक हवाई अड्डे पर खुद को थोड़े समय के लिए रोके रखने के मामले में आरोप लगाया है कि विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने उन्हें भारत के बाहर ‘बदनाम करने’ की साजिश रची। खान ने यह भी दावा किया कि भारत लौटने पर उनके और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का पक्ष सुनने के बाद समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव केंद्र की संप्रग सरकार को समर्थन जारी रखने को लेकर विचार करेंगे।

उन्होंने भारत रवाना होने से पहले कहा, ‘‘हमारे नेता जानते हैं कि क्या हुआ और इसके पीछे कौन है। वह संप्रग सरकार को समर्थन जारी रखने पर जल्द विचार करेंगे।’’ चेन्नई में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता के साथ अखिलेश की मुलाकात के संदर्भ में खान ने कहा कि अन्नाद्रमुक और पट्टाली मक्कल काची (पीएमके) के साथ तीसरा मोर्चा गठित करने की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि ऐसा मोर्चा बनने पर मुलायम सिंह इसका नेतृत्व करेंगे और वह देश के अगले प्रधानमंत्री बनेंगे।

आजम खान ने इस बात पर जोर दिया कि हवाई अड्डे पर रोके जाने के मामले में उनकी स्थिति की तुलना कलाम, शाहरूख, संयुक्त राष्ट्र में भारतीय दूत हरदीप सिंह पुरी और वाशिंगटन में पूर्व राजदूत मीरा शंकर की स्थितियों से नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा, ‘‘यह एक साजिश का नतीजा था क्योंकि मैं भारत का एक गैर कांग्रेसी ताकतवर मुस्लिम नेता हूं और उन्होंने (खुर्शीद) भारतीय कैबिनेट मंत्री के अपने रूतबे का इस्तेमाल करके बड़ी चालाकी से आंतरिक सुरक्षा विभाग की मदद से योजना बनाई।’’

आजम खान ने कहा, ‘‘बोस्टन लोगान अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर मुझे रोके जाने की तुलना पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और अभिनेता शाहरूख खान के मामलों से नहीं की जा सकती क्योंकि मुझे खुर्शीद और उनकी मंडली ने निशाना बनाया है जिनके पास मुझे भारतीय सरजमीं पर चुनौती देने की हिम्मत नहीं है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘जब हवाई अड्डे के अंदर मुझे रोका गया, तो भारतीय महावाणिज्य दूत के प्रोटोकॉल अधिकारी वहां बिल्कुल मूकदर्शक बने हुए थे। वे हमें वहां लेने आए थे। मुझे लगता है कि उन्हें उनके वरिष्ठ लोगों ने दूर बने रहने की हिदायत दे रखी थी।’’

खान ने कहा, ‘‘45 मिनटों तक मुझे राके रखने के दौरान प्रोटोकॉल अधिकारी न्यूयार्क स्थित महावाणिज्य दूत और राजदूत निरूपमा राव से संपर्क कर सकते थे। परंतु किसी ने मुझे परेशानी से बाहर निकालने के लिए एक शब्द भी नहीं बोला। मुझे खुद ही इस समस्या से लड़ना पड़ा।’’ उन्होंने कहा, ‘‘सलमान खुर्शीद के विदेश मंत्री रहते आप कैसे यह उम्मीद कर सकते हैं कि भारत सरकार इस मामले पर विरोध दर्ज कराएगी? अगर आप नहीं जानते हैं कि खुर्शीद क्या हैं तो मुझे माफ करिए.. उन्होंने मुझे अपने राज्य में बदनाम करने का प्रयास किया और बुरी तरह नाकाम रहे। वह भारत के विदेश मंत्री होने के लायक नहीं हैं।’’

आजम खान ने कहा, ‘‘मुझे 45 मिनटों तक एक बेंच पर बैठाये रखा गया। मैंने सवाल किया कि 12 लोगों के प्रतिनिधिमंडल में से सिर्फ मेरे साथ ऐसा क्यों किया गया, लेकिन इसका कोई जवाब नहीं मिला। मैंने उनसे पूछा कि मैं मुसलमान हूं इसलिए आप मुझ पर संदेह कर रहे हैं। मुझे एक कमरे में ले जाया गया, जबकि दूसरे लोगों को जाने दिया गया जिससे मैंने बहुत अपमानित महसूस किया। मुझसे इस मामले पर माफी भी नहीं मांगी गई।’’ खान ने कहा कि उनके पास मौजूद राजनयिक पासपोर्ट भी काम नहीं आया और आव्रजन अधिकारियों ने इसका सम्मान नहीं किया। उन्होंने कहा कि उनके बाहर आने तक मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने हवाई अड्डे पर उनका इंतजार किया। (एजेंसी)

चिटफंड कंपनियों ने 2450 मीडियाकर्मियों को कर दिया बेरोजगार

इंडिया टुडे समूह के अंग्रेजी अखबार मेल टुडे ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि चिटफंडियों के तूफान की चपेट में आकर पश्चिम बंगाल में कम से कम 2450 मीडियाकर्मी अपनी नौकरी गंवा चुके हैं, जिसमें पत्रकार तथा गैर पत्रकार दोनों शामिल हैं. इसमें सुदीप्‍तो सेन के मीडिया समूह के अलावा एक और चिटफंड कंपनी टॉवर समूह भी शामिल है.

टॉवर समूह का अखबार प्रात्यिकी को भी बंद कर दिया गया है. इस समूह के भी कई पत्रकार बेरोजगार हो गए हैं. इन मामलों पर इंडियन एक्‍सप्रेस के एडिटर इन चीफ शेखर गुप्‍ता लिखते हैं….

“But why are we complaining? Why are we being so protective of what only we see as our turf? There is nothing in the law to stop anybody from owning media. And sure enough, the biggest business houses in India have tried their hand with the media and retreated with burnt fingers and singed balance sheets.

“The Ambanis (Observer Group), Vijaypat Singhania (The Indian Post), L.M. Thapar (The Pioneer), Sanjay Dalmia (Sunday Mail), Lalit Suri (Delhi Midday), are like a rollcall of the captains of Indian industry who failed in the media business.

“They failed, you’d say, because they did not, deep down, respect the media, or journalists. Many of them saw themselves as victims of poorly paid, dimwit journalists employed by people who called themselves media barons but were barons of what was a boutique business compared to theirs.

“But there is a difference between then and now, and between them and the state-level businessmen investing in the media now. They failed because they did not respect journalism. The current lot are setting up or buying up media mainly because they do not respect journalism, because they think all journalists are available, if not for sale then for hire, as lawfully paid employees.

“If you have a couple of news channels and newspapers, a few well known (and well connected) journalists as your employees, give them a fat pay cheque, a Merc, and they solve your problem of access and power. They also get you respect, as you get to speak to, and rub shoulders with top politicians, even intellectuals, at awards and events organised by your media group.

“It is the cheapest ticket to clout, protection and a competitive edge.

“A bit like, to steal the immortal line Shashi Kapoor spoke to his wayward “brother” Amitabh Bachchan in Yash Chopra‘s Deewar (mere paas maa hai), tere paas police, SEBI, RBI, CBI, kuchch bhi ho, mere paas media hai.

“Remember how Gopal Kanda defied Delhi Police to arrest him rather than have him present himself grandly for surrender? The police put up scores of checkpoints to look for him, but he arrived in style, riding an OB van of STV, a channel known to be “close” to him. Which cop would dare to look inside an OB van?”

मेरठ में मीडियाकर्मियों पर हमला करने वाले जेल भेजे गए

प्रेमिका को धोखा देकर सगाई रचाने वाले युवक तथा मीडियाकर्मियों के साथ मारपीट करने वाले उसके साथियों को पुलिस ने जेल भेज दिया। यौन शोषण की शिकार युवती ने सीएम को पत्र भेजकर इंसाफ की मांग की है। मेडिकल थाने के कालियागढ़ी निवासी युवती के प्रेमी अमित कुमार को दुष्कर्म और दोस्तों प्रदीप कुमार, संजीव कुमार, अंकित और आशीष को मारपीट की धाराओं में पुलिस ने मेडिकल कराने के बाद जेल भेज दिया।

शिकायत में कहा गया है कि पुलिस युवती के साथ सगाई समारोह में जाती तो मारपीट को रोका जा सकता था। उल्‍लेखनीय है कि शुक्रवार को जागृति विहार के सेक्टर 5 स्थित आदर्श पैलेस में गढ़मुक्तेश्वर के मूल और हाल निवासी जागृति विहार के अमित पुत्र नवल सिंह की सगाई चल रही थी। जिसमें युवती ने पहुंचकर अमित के खिलाफ दर्ज एफआदग्‍आर की फोटोप्रति उसकी मंगेतर युवती के परिजनों को दी। जिसके बाद युवक पक्ष के लोगों ने युवती और मीडियाकर्मियों के साथ मारपीट की थी। इस हमले में समाचार प्‍लस का कैमरामैन शकील और हिंदुस्‍तान के फोटोग्राफर विजय स्‍वामी घायल हो गए थे। आरोपियों ने इन लोगों का कैमरा भी तोड़ दिया था।

विषयहीन हो चुका है आज का भारतीय सिनेमा

'ये कहाँ आ गए हैं हम' लता जी की मीठी आवाज़ में गाया गया ये गाना आज भारतीय सिनेमा के १०० साल की यात्रा पर बिल्कुल फिट बैठता है क्योंकि अपने उदगम से लेकर आज तक भारतीय सिनेमा में इतने ज्यादा बदलाव आये हैं कि कोई भी अब ये नहीं कह सकता कि आज की दौर में बनने वाली फिल्में उसी भारतीय सिनेमा का अंग है, जो हमेशा भारतीय समाज में चेतना को जाग्रत करता आया है। कहा जाता है कि किसी भी समाज को सही राह दिखाने के लिए सबसे सशक्त माध्यम सिनेमा है, क्योंकि सिनेमा दृश्य और श्रव्य दोनों का मिला जुला रूप है और ये सीधे मनुष्य के दिल पर प्रभाव डालता है।

हमारे भारतीय सिनेमा ने अपने गौरवमयी १०० साल पूरे कर लिये हैं, पर इन १०० सालों की यात्रा भारतीय सिनेमा कहा से कहाँ पंहुचा यह सोचनीय विषय है या फिर यूँ कहा जाए कि इन १०० सालों की यात्रा में भारतीय सिनेमा ने समाज को क्या दिया? ये सच है कि फिल्में समाज का आईना हैं और समाज के सशक्‍त निर्माण में फिल्मों की अहम् भूमिका होती है और इसीलिए ८० की दशक की फिल्में जमींदारी, स्त्री शोषण सहित उन सभी मुद्दों पर आधारित होती थीं, जो समाज को प्रभावित करते थे। तब जो फिल्में बनती थी उनका उद्देश्य व्यावसयिक न होकर सामजिक कल्याण होता था। पर ९० की दशक में फिल्मों में व्यापक बदलाव आये।

ये वो दौर था जब भारत में उदारीकरण की प्रक्रिया को अपनाया गया, भारत ने भी वैश्विक गांव में शामिल होने की दिशा में कदम बढ़ाए और दुनिया भर के देशों में वीजा नियमों में ढील देने की प्रक्रिया शुरू हुई। तब इन भौतिक बदलावों से प्रेरित होकर प्रवासी भारतीयों का स्वदेश प्रेम मुखर हुआ। इसके दर्शन हर क्षेत्र में होने लगे। एक तरह से उन्होंने अपने देश की घटनाओं में आक्रामक हस्तक्षेप शुरू किया। बिल्कुल उसी समय भारत में एक बड़ा मध्यवर्ग जन्म ले रहा था, जिसकी रूचियां काफी हद तक विदेशों में बस गए भारतीयों की तरह बन रही थीं। इसका श्रेय उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारत आने और स्थानीय जरूरत के हिसाब से खुद को बदलने की प्रक्रिया को दिया जा सकता है। नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध में वैश्विक गांव बनने की प्रक्रिया का पहला चरण पूरा हो चुका था। भारत का मध्यवर्ग और विदेश में बसा प्रवासी भारतीय खान-पान, पहनावे, रहन-सहन आदि में समान स्तर पर आ चुका था।

दोनों जगह एक ही कोक-पेप्सी पी जाने लगी, पिज्जा और बर्गर खाया जाने लगा और ली-लेवाइस की जीन्स पहनी जाने लगी। भारत की मुख्यधारा के फिल्मकार इस बदलाव को बहुत करीब से देख रहे थे। इसलिए उन्होंने अपनी सोच को इस आधार पर बदला। मशहूर फिल्मकार यश चोपड़ा के बेटे आदित्य चोपड़ा ने स्वीकार भी किया कि वे घरेलू और विदेशी दोनों जगह के भारतीयों के पसंद की फिल्म बनाते हैं। यहां घरेलू भारतीय दर्शक का मतलब भारतीय मध्यवर्ग से लगाया जा सकता है। भारतीय फिल्मकारों की इस सोच में आए बदलाव ने फिल्मों की कथा-पटकथा को पूरी तरह से बदल दिया, खास कर बड़े फिल्मकारों की। उन्होंने ऐसे विषय चुनने शुरू कर दिए, जो बहुत ही सीमित वर्ग की पसंद के थे, लेकिन बदले में उन्हें चूंकि डॉलर में कमाई होने वाली थी इसलिए व्यावसायिक हितों को कोई नुकसान नहीं होने वाला था। और ये वही दौर था जब फिल्में समाज हित से हटकर पूरी तरह से व्यावासिक हित में रम गयी। फिल्में बनाने वाले निर्देशकों और निर्माताओं का उदेश्य फिल्म में वास्तविकता डालने को बजाय उन चीजों को डालने का होता है जो दर्शक को मनोरंजन कराये, जिसका आज समाज पर नकरात्मक प्रभाव पड़ने लगा।

आज भारतीय समाज जो आधुनिकता की नंगी दौड़ में दौड़ उसका श्रेय बहुत हद आज के दौर निर्मित होने वाली फिल्मों को ही जाता है। अगर उदाहरण से समझना हो तो नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध में बनी फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, से शुरू करके ‘नील और निक्की’ तक की कहानी में इस बदलाव को देखा जा सकता है। इस बदलाव को दो रूपों में देखने की जरूरत है। एक रूप है भारत के घरेलू फिल्मकारों का और दूसरा प्रवासी भारतीय फिल्मकारों का। दोनों की फिल्मों का कथानक आश्चर्यजनक रूप से एक जैसा है। इनमें से जो लोग पारिवारिक ड्रामा नहीं बना रहे हैं वे या तो औसत दर्जे की सस्पेंस थ्रिलर और अपराध कथा पर फिल्म बना रहे हैं या संपन्न घरों के युवाओं व महानगरों के युवाओं के जीवन में उपभोक्तावादी संस्कृति की अनिवार्य खामी के रूप में आए तनावों पर फिल्म बना रहे हैं। घरेलू फिल्मकारों में यश चोपड़ा, आदित्य चोपड़ा, करण जौहर, राकेश रोशन, रामगोपाल वर्मा, फरहान अख्तर जैसे सफल फिल्मकारों के नाम लिए जा सकते हैं और दूसरी श्रेणी में गुरिन्दर चड्ढा (बेंड इट लाइक बेकहम), नागेश कुकुनूर (हैदराबाद ब्लूज), विवेक रंजन बाल्ड (म्यूटिनी : एशियन स्टार्म म्यूजिक), बेनी मैथ्यू (ह्नेयर द पार्टी यार), निशा पाहूजा (बालीवुड बाउंड), महेश दत्तानी (मैंगो सौफल), मीरा नायर (मानसून वेडिंग), शेखर कपूर (द गुरु), दीपा मेहता आदि के नाम लिए जा सकते हैं, जो अनिवार्य रूप से प्रवासियों के लिए फिल्में बनाते हैं।

वास्तव में यही वो कारण जिनके कारण आज भारतीय सिनेमा के कथानक में गिरावट आती जा रही है जिसका सीधा असर आज समाज पर रहा है। ये कहना गलत न होगा कि इन १०० सालों की यात्रा भारतीय सिनेमा ने जितने मुकाम हासिल किये उतना ही इसने समाज को गलत दिशा भी दी। आज हमारी बॉलीवुड की फिल्में सेक्स, थ्रिल, धोखे के काकटेल पर बन रही हैं। ऐसी फिल्में हिट भी हो रही हैं, लेकिन यही फिल्में जब अस्कार जैसे प्रतिष्ठित आवार्ड के लिए जाती हैं तो औंधे मुंह गिर पड़ती हैं। इसके विपरीत स्लमडाग जैसी फिल्में जो कि सामजिक मुद्दों पर बनती है, वो आस्कर जैसे अवार्ड को ला पाने में सफल होती है। कहने का तात्पर्य यह कि विदेशों में भी अब ऐसी ही फिल्मों को पसंद किया जा रहा है, जो किसी सामाजिक सरोकारों से जुडी हो।

आज ये वक़्त की जरूरत है कि फिल्में सेक्स, थ्रिल, धोखे के काकटेल से बाहर निकले और और ऐसे मुद्दों पर बनें जो समाजिक मुद्दों से जुड़ी हो। हो सकता है कि ऐसी फिल्में बाक्स ऑफिस पर हिट न हो पर लगातार अगर सामाजिक मुद्दों पर फिल्में बनना शुरू होंगी तो कुछ दिन बाद ऐसी फिल्में बॉक्स आफिस पर हिट होना शुरू हो जायेंगी, क्योंकि सिनेमा समाज को जो देता समाज उसी को लेता है और इसका सीधा सा उद्धरण ८० की दशक की फिल्में हैं, जो उस दौर में काफी पसंद की गयीं। वैसे भी जब इंसान किसी विषय से सालों दूर होता है तो निश्चित तौर पर उस विषय से उसकी दूरी बन जाती है, पर अगर उसी विषय पर उसको वापस लाया जाये तो देर जरूर होती है पर अंततः रूचि जाग्रति होती है। इसलिए भारतीय सिनेमा के गौरवमयी इतिहास को बचाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि फिल्में सामाजिक सरोकार से जुडी हों न की सेक्स, थ्रिल, धोखे जैसे मुद्दे से, जिसका समाज पर नकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है।

लेखक अनुराग मिश्र लखनऊ के स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

माखनलाल पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय के चार कर्मचारी सस्‍पेंड

भोपाल। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलसचिव ने चार कर्मचारियों को सस्पेंड करने के आदेश जारी कर दिए हैं। निलंबन के बाद इन कर्मचारियों में से दो को नोएडा और दो को खंडवा क्षेत्रीय कार्यालयों में अटैच कर दिया है। इन कर्मचारियों का कहना है कि कुलपति ने उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के सामने किए गए समझौते का उल्लंघन कर निलंबन की कार्रवाई की।

कुलसचिव चंदर सोनाने ने शुक्रवार शाम हड़ताल करने वाले कर्मचारी यूनियन के पदाधिकारियों अध्यक्ष अर्जुन डोहरे, उपाध्यक्ष यदुनाथ नापित, चमन सिंह आर्य और सह सचिव चंद्रमोहन गुर्जर को सस्पेंड कर दिया है। समर्थन में आगे आए कर्मचारी संगठन: विवि प्रशासन द्वारा कर्मचारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई से नाराज कर्मचारी संगठन भी पत्रकारिता विवि के कर्मचारियों के समर्थन में आ गए हैं। मप्र तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ, संविदा कर्मचारी अधिकारी महासंघ ने आंदोलन करने की चेतावनी दी है।

प्रभात खबर के संवाददाता जितेंद्र सिंह की गोली मारकर हत्या

: पीएलएफआई ने ली है हत्या की जिम्मेवारी : खूंटी : प्रभात खबर के मुरहू प्रतिनिधि जितेंद्र कुमार सिंह की आज मुरहू थाना क्षेत्र में हत्या कर दी गयी. मृतक की जेब में हत्यारों ने एक परचा छोड़ी है. जिसके मुताबिक उसकी हत्या पीएलएफआई ने की है. हालांकि पुलिस का कहना है कि अनुसंधान के बाद ही हत्यारों का खुलासा हो सकता है.

क्या है घटना : सूत्रों के मुताबिक मुरहू एवं अड़की थाना क्षेत्र के सीमान स्थित पसराबेड़ा-खटंगा पथ का निर्माण हो रहा है. निर्माण कार्य जितेंद्र सिंह के अलावा, हीरा महतो, नरेश महतो एवं जगदीश महतो (तीनों गनालोया निवासी) मिलकर करा रहे है. प्रत्येक दिन की भांति आज भी चारों युवक साईट पर कार्य करा रहे थे. अपराहन चार बजे के करीब दस की संख्या में हथियाबंद लोग वहां पहुंचे. फिर वे लोग जितेंद्र सिंह को कुछ दूर ले जाकर लाठी से पिटाई की, फिर सीने व सिर में सटाकर गोलियां दाग दी. मौके पर जितेंद्र की मृत्यु हो गयी.

इसी बीच उसके तीन साथी हीरा महतो, नरेश महतो एवं जगदीश महतो वहां से भाग निकले. समाचार लिखे जाने तक हीरा महतो का पता नही चला है. नरेश महतो भागकर समीप एक गांव जिवरी में जा छुपा जिसे देर रात पुलिस सुरक्षित ले लायी. इससे पूर्व जगदीश महतो घटनास्थल से पैदल भागकर मुरहू पहुंचा फिर घटना की जानकारी पुलिस को दी. सूचना पाते ही एसडीपीओ अश्विनी कुमार सिंहा, मुरहू ओसी प्रवीण झा सदलबल घटनास्थल पर गये और जितेंद्र के शव को अपने कब्जे में कर देर रात थाना लाये. मुरहू थाना में मामला दर्ज है. शव का पोस्टमार्टम 28 अप्रेल को सदर अस्पताल खूंटी में होगा.

घटना की जिम्मेवारी : जितेंद्र की शर्ट की जेब से पीएलएफआई के जोनल कमांडर इकबाल पूर्ति के नाम से जारी एक परचा मिला है. जिसमें जिक्र है कि संगठन की अनुमति के बगैर निर्माण कार्य करने की सजा मौत दी जा रही है. जितेंद्र सिंह अपने पीछे माता पिता सहित पत्नी व दो मासूम बच्चों को छोड़ गये हैं. पूरा मुरहू घटना के बाद शोक में डूबी है. देर रात एसपी डॉ वानन भी मुरहू थाना पहुंचे है. (प्रभातखबर)

दरअसल, खबर बिकने की शुरुआत यहीं से हुई

 : चिट फंड कंपनियों के असल संरक्षक हैं, इस देश की व्यवस्था के बड़े लोग. परदे के पीछे रह कर उन्हें बढ़ानेवाले या पालने-पोसनेवाले. बंगाल में भी बड़े-बड़े नेताओं के नाम आ रहे हैं. एक ताकतवर केंद्रीय मंत्री की पत्नी का नाम भी उछला है. एक मामले में वकील की भूमिका का निर्वाह करने के संबंध में. जेवीजी से लेकर सारधा ग्रुप तक, सारी कंपनियों के पीछे या इस तरह के धंधे में डूबी कंपनियों के असल प्राणदाता, समाज और व्यवस्था के प्रहरी हैं :

असल मुजरिम!

सारधा ग्रुप चिट फंड कंपनी प्रकरण का असली मुजरिम कौन है? सुदीप्त सेन या इस देश की व्यवस्था? सुदीप्त सेन तो महज एक मोहरा या पात्र है. असल मुजरिम तो इस देश के शासक हैं. याद करिए, उदारीकरण के तुरंत बाद शेयर बाजार में घोटालों और चिट फंड घपलों की बाढ़ आ गयी. हर्षद मेहदा प्रकरण, फिर केतन पारीख प्रकरण. उसी दौर में चिट फंड कंपनियों और पारा-बैंकिंग कंपनियों की भी बाढ़ आयी.

याद करिए, जेवीजी, हेलियस, कुबेर और न जाने कितनी ही चिट फंड कंपनियों का रातोंरात उदय हुआ. कुछेक ने हेलीकाप्टर से डिपॉजिट मोबलाइजेशन (जमा संग्रह अभियान) शुरू किया. इन्हें बड़े-बड़े नेताओं का संरक्षण था. इनके हेलीकाप्टरों में बड़े-बड़े नेता यात्रा करते थे. इन कंपनियों के पक्ष में अखबारों में बड़े-बड़े एडवरटोरियल (दरअसल, खबर बिकने की शुरुआत यहीं से हुई) छपते थे. तब प्रभात खबर ने सवाल उठाया कि अर्थशास्त्र का वह कौन-सा फामरूला या चमत्कार है कि तीन वर्ष में धन दोगुना हो जायेगा? यह सरासर ठगी है.

प्रभात खबर पर मुकदमे हुए. पर हमने लगातार रपटें छापीं. देशज मान्यता है कि लोभी के गांव में ठग उपास नहीं रहते. यही हुआ. लाखों लोग तबाह हुए. आत्महत्याएं हुईं. जेवीजी, हेलियस, कुबेर वगैरह के लोगों पर शुरू में कुछ कार्रवाई हुई, फिर कुछ पता नहीं. न धन उगाहनेवाली कंपनियों का और न ठगे गये लोगों का. जमशेदपुर में चंडीगढ़ की एक कंपनी ने 33 हजार निवेशकों को ठगा. वर्ष 2000 में. लगभग सौ करोड़ रुपये. 2007 में गोल्डन फारेस्ट प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने झारखंड में 85 हजार लोगों को ठगा. 250 करोड़ रुपये उगाहे और गायब. झारखंड, बिहार और बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में न जाने कितनी चिट फंड कंपनियां, लोगों को ठगने का काम कर रही हैं. पर यह सिलसिला बंद नहीं हुआ. अब नया प्रकरण सामने है.

पूर्वी सिंहभूम के इलाके में सारधा ग्रुप के दो सौ एजेंट थे और लगभग पांच सौ निवेशक. दरअसल, मूल प्रश्न यह है कि 1994 के बाद बार-बार ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति क्यों हो रही है? आज सारधा ग्रुप है. पहले जेवीजी, हेलियस, कुबेर वगैरह थे. फिर कोई चंडीगढ़ की कंपनी थी. फिर कोई गोल्डन फारेस्ट प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन गयी. यानी 1994 के बाद से ठगी का यह धंधा लगातार चल रहा है. पात्र बदल रहे हैं. कंपनियों के नाम बदल रहे हैं. लेकिन ठगने का यह धंधा अबाध चल रहा है. पर यह तो सिर्फ और सिर्फ कानून-व्यवस्था से ही रुक सकता है.

एक चौकस व्यवस्था ही इस तरह की गतिविधियों पर पाबंदी लगा सकती है. पर यह क्यों नहीं हो रहा? यह काम तो इस देश की सरकार या राज्य सरकारें या राजनीति ही कर सकती है. संसद कर सकती है. विधानमंडल कर सकता है. उन फोरमों पर क्यों ऐसे कानून नहीं बने, जिनके होने से दोबारा कोई चिट फंड कंपनी इस तरह ठगी का काम नहीं कर सकती? लोगों के अरबों लुट जाने के बाद अब केंद्र सरकार की नींद खुली है. कारपोरेट मामलों के मंत्री सचिन पायलट ने 73 कंपनियों की जांच के आदेश दिये हैं. बंगाल विधानसभा अब इस विषय पर दो दिन बहस करनेवाली है. पर चाहे केंद्र सरकार हो या संबंधित राज्य सरकार, अब किस चीज का पोस्टमार्टम होगा? पहले ही सख्त कानून बने होते, तो आज यह नहीं होता.

हद तो तब हो गयी, जब ममता बनर्जी ने सारधा ग्रुप द्वारा ठगे गये लोगों के लिए पांच सौ करोड़ के राहत कोष की घोषणा की. वह भी दस फीसदी जनता पर टैक्स लगा कर. जब ऐसी कंपनियां लोगों को ठग रही थीं, तो ममता बनर्जी की सरकार या अन्य संबंधित सरकारें क्या कर रहीं थी? केंद्र सरकार क्यों खामोश रही? अब जो जनता ठगी गयी, उसी पर दोबारा टैक्स लगा कर, उसी से पैसे वसूल कर, उसे ही राहत दी जायेगी. दुनिया की कोई समझदार व्यवस्था ऐसा कदम नहीं उठा सकती. तंबाकू खानेवालों ने क्या अपराध किया है कि उन्हें पुन: कर देकर अपनी जेब खाली करनी होगी. वह भी शासकों की गलती के कारण. नेता-अफसर या शासक, जो इसके असल मुजरिम हैं, वे क्यों नहीं अपनी तनख्वाह-सुविधाओं से इस लूट की भरपाई करते?

दरअसल, माजरा कुछ और है. ऐसी चिट फंड कंपनियों के असल संरक्षक हैं, इस देश की व्यवस्था के बड़े लोग. परदे के पीछे रह कर उन्हें बढ़ानेवाले या पालने-पोसनेवाले. बंगाल में भी बड़े-बड़े नेताओं के नाम आ रहे हैं. एक ताकतवर केंद्रीय मंत्री की पत्नी का नाम भी उछला है. एक मामले में वकील की भूमिका का निर्वाह करने के संबंध में. जेवीजी से लेकर सारधा ग्रुप तक, सारी कंपनियों के पीछे या इस तरह के धंधे में डूबी कंपनियों के असल प्राणदाता, समाज और व्यवस्था के प्रहरी हैं. इन धंधेबाजों की पार्टियों में बड़े-बड़े नेताओं की उपस्थिति देखिए. दरअसल, जब तक यह जाल नहीं टूटेगा, तब तक ठगी का यह धंधा नहीं रुकनेवाला. एक कंपनी जायेगी, दूसरी आयेगी. यह सिलसिला चलता रहेगा.

वोट के लिए!

इस देश में स्वस्थ बहस बंद है. असल सवाल उठाने के लिए कोई जोखिम लेने या सच कहने को तैयार नहीं. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने आतंकवादी हमलों के अनेक आरोपियों के खिलाफ दायर मामले उठा लिये हैं. निर्दोष लोग चाहे किसी भी जाति, धर्म के हों, उनके खिलाफ ऐसा अभियान चले, तो व्यवस्था का मानवीय चेहरा दिखता है. पर वोट बैंक के लिए, जिन लोगों पर गंभीर आरोप हैं, उन्हें पूरी छानबीन के बगैर मुक्त कर देना कैसे सही है? देश में लाखों की संख्या में अंडरट्रायल बंदी हैं, उनके लिए कहीं आवाज नहीं. समाजवादी सरकार ने हूजी (हरकत-उल-जिहाद अल-इसलामी) के उग्रवादी तारी कासमी के खिलाफ आतंकवादी हमले के कई मामले वापस कर लिये हैं.

22.05.2007 को गोरखपुर में सीरियल विस्फोट हुए. आधा दर्जन से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए. फिर लखनऊ, फैजाबाद और बनारस के अदालत प्रांगणों में सीरियल विस्फोट हुए. इन सब मामलों में कासमी आरोपी है. मान लिया जाये कि कासमी निर्दोष है, पर गोरखपुर, लखनऊ, फैजाबाद और बनारस में जो सीरियल विस्फोट हुए, उनके लिए कोई न कोई तो गुनहगार है. दोषी है. उनमें जो घायल हुए या मारे गये या जो क्षति हुई, उसके लिए कोई न कोई तो मुजरिम है? फिर सरकार ने ‘निर्दोष’ कासमी को रिहा किया, तो इन घटनाओं के मुजरिमों को क्यों नहीं पकड़ा? यह किसका फर्ज है? आज अमेरिका में कोई आतंकवादी घटना होती है, तो अमेरिका कहता है कि हम घंटों में नहीं, घंटे में दोषी की पहचान कर लेते हैं.

हमारे यहां कई गंभीर देशतोड़क घटनाओं को हुए वर्षो गुजर गये, कोई गुनहगार ही नहीं पकड़ा गया. इसके अतिरिक्त हूजी के लगभग आधा दर्जन से अधिक लोगों के खिलाफ देशद्रोह या राजद्रोह या विश्वासघात के मामले दर्ज थे, वे भी वापस ले लिये गये हैं. यह घोषणा उत्तर प्रदेश के गृह सचिव ने की है. दरअसल, कानून-व्यवस्था या न्याय को हम जाति, धर्म और समुदाय की नजर में देखेंगे, वोट के पलड़े में तौलेंगे, तो इससे सबका अहित होगा. देश एक नहीं रहेगा. कानून का धर्म है, अपराध देखना. वह चाहे किसी का हो. अगर कोई बेकसूर है, तो राजधर्म से उसे संरक्षण मिलना जायज है. पर यदि घटनाएं हुई हैं, तो घटनाओं के मुजरिम या दोषी तो कोई हैं, उन्हें पकड़ने और सजा दिलाने का राजधर्म किसका है?

नहीं सीखेंगे!

हमारा दावा है कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं. पर लोकतंत्र की सर्वश्रेष्ठ खूबियों, मर्यादाओं, आत्मानुशासन के अनुपालन में हम कहां खड़े हैं? प्रसंग पुराना है. 2012 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान की बात. मित्र रवि वाजपेयी अच्छी-अच्छी चीजें पढ़ाते रहते हैं. उन्होंने ही यह प्रसंग आस्ट्रेलिया से भेजा है. घटना 2012 की है. राष्ट्रपति ओबामा मतदान के पहले शिकागो में अपना वोट डालने गये. शाम का समय था. तय चुनाव दिन से पहले वोट डालनेवाले वह पहले अमेरिकी राष्ट्रपति थे. जहां वह वोट देने गये, वहां एक महिला अधिकारी थी. वोट डालने के पहले उसने राष्ट्रपति ओबामा से उनका पहचान पत्र मांगा. ओबामा ने अपना ड्राइविंग लाइसेंस दिखाया और मजाक में कहा भी कि इस तसवीर को इग्नोर (नजरअंदाज) करें, क्योंकि इसमें सिर पर कोई सफेद या भूरा बाल नहीं है. यानी पहचान पत्र में लगी तसवीर थोड़ी पुरानी है.

इस घटना के संदर्भ में हम अपनी व्यवस्था का चेहरा देखें. आकलन करें. हवाई अड्डों पर बड़े-बड़े लोगों की सूची लगी है, जो बगैर सुरक्षा जांच के हवाई जहाज तक आते-जाते हैं. अपवाद छोड़ दें. भारत के किसी जिले में कोई ट्रैफिक सिपाही किसी डीसी, एसपी या किसी आइपीएस-आइएएस से ड्राइविंग लाइसेंस मांग सकता है? विधायक, सांसद या मंत्री से उनका पहचानपत्र पूछ सकता है? दरअसल, कहने को यह लोकतंत्र है.

असल में यह नेताओं का राजतंत्र है. मित्र रवि वाजपेयी ने यह भी लिखा कि 1996 में आस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री जान हावर्ड को सिडनी में दोपहर के भोजन अवकाश में अकेले सड़क पर पैदल चलते मैंने देखा था. 11 सितंबर की घटना के बाद उनके साथ कुछ सुरक्षाकर्मी होते थे. आज भी यही हाल इंग्लैंड, अमेरिका, आस्ट्रेलिया के राजप्रमुखों की सुरक्षा का है. पर भारत अद्भुत देश है. यहां के नेताओं की सुरक्षा, राजशाही शैली देखिए. जब इनके काफिले सड़क से गुजरते हैं, सामान्य लोगों को हटना पड़ता है. ऐसी अनेक चीजें हैं, जो हम दुनिया की अन्य लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं से सीख सकते हैं.

यह भी सही है कि कुछ बड़े नेताओं पर खतरे हैं, पर जिन्हें खतरा है, उन्हें सुरक्षा मिले. सभी को क्यों? सुरक्षा जांच में भेदभाव क्यों? सुरक्षा स्टेटस सिंबल क्यों? जो पद पर हैं, उन्हें विशेष लाभ क्यों? कानून तो सबके लिए एक है. लोकतंत्र को भारत में मजबूत बनना है, तो बिना समय खोये हमें ऐसे मौलिक सुधारों के बारे में सोचना चाहिए.

अगर अमेरिका में एक ही स्कूल में सब बच्चे पढ़ सकते हैं, तो भारत में गरीबों के बच्चों और अमीरों के बच्चों के लिए अलग-अलग स्कूल क्यों? समाज में भेद की शुरुआत की बुनियाद तो यहां से है. पहले राजनीतिक दल व्यवस्था में सुधार की लड़ाई लड़ते थे. सत्ता पाना उनका पहला या सर्वोपरि मकसद नहीं होता था, बल्कि समतापूर्ण समाज कायम करना, मानवीय व्यवस्था के लिए संघर्ष करना उनका प्राथमिक धर्म होता था. पर आज के भारत में सत्ता, धन-दौलत और भोग की बाढ़ में राजनीतिक दल अपने मूल फर्ज भूल गये हैं. उन्हें सिर्फ और सिर्फ सत्ता चाहिए, इसके लिए वह कोई भी कीमत चुका सकते हैं.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा कुछ समय पहले प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है.

शारदा समूह के एक और निवेशक ने की आत्‍महत्‍या

पुरुलिया : चिटफंड कम्पनी शारदा समूह में चार लाख रुपये निवेश करने वाले एक धन संग्रहकर्ता एजेंट ने पुरुलिया जिले में आत्महत्या कर ली। पुरुलिया शहर से 50 किलोमीटर दूर बलरामपुर में अपने घर में स्वपन कुमार दास (36) छत से लटकता मिला। पुलिस ने कहा कि उसने अपने निजी बचत से चार लाख रुपये शारदा समूह में जमा कराए थे और घोटाले की खबर फैलने के बाद से काफी तनाव में था।

उल्‍लेखनीय है कि इसके पहले भी शारदा समूह की एक महिला निवेशक ने आत्‍मदाह कर ली थी। सुदीप्‍तो सेन की चिटफंड कंपनी पर तीन हजार करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का आरोप हैं।

सुधाकर शेट्टी जल्दी ही हिन्दी न्यूज़ चैनल भी लाँच करनेवाले हैं

दीपा बार के मालिक सुधाकर शेट्टी ने मराठी न्यूज़ चैनल 'जय महाराष्ट्र' लाँच किया! बड़े- बड़े राजनेता शरद पवार, पृथ्वीराज चव्हाण, सुशील कुमार शिन्दे और गीतकार जावेद अख़्तर, प्रियंका चोपड़ा समेत तमाम फ़िल्मी हस्तियाँ मौजूद थीं. ये मुम्बई का वही दीपा बार है, जो करोड़पति बार डान्सर तब्बसुम के कारण मशहूर था और मैच फ़िक्सिंग के सन्देह में तबस्सुम गिरफ़्तार भी हुई थी. इस मामले में सुधाकर शेट्टी से भी पूछताछ हुई थी, जिसका कहना था कि बार को उसने किसी को लीज़ पर दे रखा है और उसे नहीं मालूम कि वहाँ क्या चल रहा है!

इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक़ दिलचस्प बात यह है कि सुधाकर शेट्टी ने बाबा रामदेव के पतंजलि योगपीठ को 8000 वर्ग फुट ज़मीन दी है. बाबा रामदेव जी आजकल भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जंग छेड़े हुए हैं और नरेन्द्र मोदी के भोंपू बने हुए हैं. सुधाकर शेट्टी जल्दी ही हिन्दी न्यूज़ चैनल भी लाँच करनेवाले हैं!!!

वरिष्‍ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी के एफबी वॉल से साभार.

Deepa Bar owner starts TV news channel, stars and politicians throng launch party

Seven years after Mumbai’s infamous Deepa Bar — which was caught in a major cricket betting scandal in 2005 — shut down, Sudhakar Shetty, the owner of the bar, has turned television entrepreneur.

A party to launch Shetty’s Marathi news channel, Jai Maharashtra, at Mumbai’s Grand Hyatt hotel on Saturday was attended by top politicians including Chief Minister Prithviraj Chavan, union Home Minister Sushil Kumar Shinde and Agriculture Minister Sharad Pawar, besides several Bollywood stars.

Before it downed its shutters in 2006, the high-end dance bar in suburban Vile Parle was a favourite meeting spot for politicians, bureaucrats, businessmen, film industry personalities and cricket bookies, and had the “crorepati bar dancer” Tarannum Khan as its main attraction.

Shetty is the chairman of the real estate company Sahana Group, and the launch of the channel adds to the long list of builders and chit funds players who have floated media organisations, allegedly because of the political clout and patronage they bring. Shetty is learnt to be planning a Hindi news channel after the Marathi channel takes off.

“While he was still in the hotel business, Shetty part-financed a couple of Bollywood films,” said a Maharashtra Police officer who declined to be identified. “In September 2011, the income-tax department raided his Andheri office in connection with alleged tax evasion by the Darshan Group of developers, in which he allegedly had some stake,” the officer said. Shetty, the officer said, had cultivated close ties with Maharashtra politicians and Bollywood actors since his Deepa Bar days.

Guests at the launch party on Saturday included, besides Chavan, Shinde and Pawar, BJP leaders Nitin Gadkari and Gopinath Munde, Maharashtra ministers Narayan Rane, Chhagan Bhujbal and Babanrao Pachpute, Bollywood actors Priyanka Chopra, Suniel Shetty, Dharmendra, Sridevi and Om Puri, lyricist Javed Akhtar and producer Boney Kapoor.

The Sahana Group entered the real estate and infrastructure market in 2004, and is involved in Slum Rehabilitation Authority (SRA) and redevelopment projects in prime central Mumbai locations like Parel, Worli and Sion Koliwada. The group has built malls and shopping complexes in the western suburbs of Bandra and Malad, and operates a helicopter charter company. The television business is under Sahana Films, a subsidiary of the Sahana Group.

In September 2005, Deepa Bar was at the centre of a match-fixing investigation during which Sri Lankan cricketer Muttiah Muralitharan was questioned by the police about his alleged liaisons with bar dancer Tarannum after he was allegedly introduced to her by actor Aditya Pancholi.

Following a tip-off from the International Cricket Council about a large hawala transfer from Sri Lanka and the involvement of a prominent bar dancer and bookie in a cricket betting racket, Tarannum was arrested on September 16, 2005 for her alleged links with bookies and the underworld.

Two bookies, Milind Dheeraj Nandu alias DJ and Pradip Kumar, too were arrested. During a raid at Tarannum’s Versova bungalow, income-tax officials found a massive stash of cash. The numbers of 27 bookies were found stored in her mobile phone.

Shetty himself was questioned by the Mumbai Police Crime Branch. He told investigators that he had leased the bar to someone else to run, and was unaware of the goings-on there.

The bar also witnessed gangland violence. On March 14, 2005, seven persons opened fire at Shetty’s partner Humayun Chandiwal who, however, escaped unhurt. A watchman of the bar was shot in the back. Four days later, the police arrested seven alleged members of fugitive gangster Ravi Pujari’s gang, and charged them under the stringent MCOCA.

In March 2011, two men claiming to be Ravi Pujari aides shot dead two of Shetty’s employees at his office in Andheri.

Shetty has close ties with yoga guru Baba Ramdev. In 2009, a trust set up by Shetty in the memory of his parents handed over the 8,000-sq ft Deepa Bar property to Ramdev’s Patanjali Yog Peeth for conducting yoga classes.

A spokesperson for the Ministry of Information and Broadcasting explained the process by which licences to start television channels are given: “Permission is given to a company, not to a person. We forward the company’s application to the Ministry of Home Affairs for verification of antecedents towards a security clearance. Once the MHA and Department of Space clear the application, we cannot deny permission to the company simply because it is engaged in some other business.

“In fact, in December 2011, TRAI had clarified that we should encourage pluralism of channels to prevent monopolies. It stated that since there is no lack of transponder space, multiplicity of channels should be encouraged so that people across the country have access to as many channels as possible,” the spokesperson said. (इंडियन एक्‍सप्रेस)

प्रेस फोटोग्राफर पर हमला कर चेन-नगदी लूटी, कैमरा तोड़ा

धर्मशाला के समीप दाडऩू में प्रेस फोटोग्राफर श्‍याम शर्मा से कुछ लोगों ने मारपीट कर उनकी सोने की चेन व नकदी छीन ली और कैमरा तोड़ डाला। एक दैनिक समाचार पत्र का प्रेस फोटोग्राफर खनियारा निवासी श्याम कुमार शुक्रवार रात्रि काम खतम करने के बाद घर वापस लौट रहा थे। दाडऩू के समीप बीड़ निवासी सुनील कुमार, देशराज और सुभाष सहित अन्य युवकों ने उसका मोटरसाइकिल रोक लिया। युवकों ने प्रेस फोटोग्राफर से मारपीट की तथा उसकी सोने की चेन, चांदी का ब्रेसलेट छीन लिया तथा कैमरा तोड़ दिया।

पुलिस ने श्याम शर्मा की शिकायत पर मामला दर्ज करके जांच शुरू कर दी है। वहीं धर्मशाला के पत्रकारों ने इस घटना की निंदा करते हुए आईजी नॉर्थ जोन राकेश अग्रवाल से मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों को कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने की मांग की है। श्‍याम शर्मा पर हुए हमले के विरोध में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की धर्मशाला इकाई ने भी डीसी को ज्ञापन सौंपकर हमलावरों को अरेस्‍ट करने की मांग की है।

गूगल वालों के पास अब यही काम बचा है, समलैंगिकों को मिलवाया और शादी करा दी!

''गूगल लंदन'' वाले समलैंगिकों को मिलवाने के काम में भी जुट गए हैं. लंदन स्थित गूगल के आफिस वालों ने अपने यहां काम करने वाले एक शख्स को उसके गे फ्रेंड से समारोहपूर्वक मिलवा दिया. शान आकलैंड ने पिछले शुक्रवार को यूट्यूब के जरिए यह बात उजागर की कि उनका पि‍छले दो वर्षों से अपने ब्‍वॉयफ्रेंड माइकल से अफेयर चल रहा है. शान आकलैंड सैन फ्रांसि‍स्‍को में रहते हैं और वहीं के गूगल ऑफि‍स में काम करते हैं. माइकल गूगल के लंदन आफिस में काम करते हैं और लंदन में ही रहते हैं.

गूगल के लंदन आफि‍स में आने जाने के दौरान दोनों में दोस्‍ती हुई. इस बार जब आकलैंड लंदन आए तो उन्‍होंने माइकल को गूगल के आफि‍स में बने लंच रूम में लंच के लि‍ए बुलाया. आकलैंड ने यहां पर माइकल को प्रपोज करने के लि‍ए पहले से ही इंतजाम कर रखा था, पर माकइल को इस बारे में कुछ भी नहीं पता था. लंच के लि‍ए माइकल अपनी बहन के साथ पहुंचे. वह माइकल के साथ ही लंच रूम में बैठे सैकड़ों लोगों को सरप्राइज देना चाहते थे.

जैसे ही आकलैंड माइकल और उनकी बहन के साथ लंच के लिए टेबल पर आए, वहां लंच कर रहे लोगों में से दो युवति‍यों ने शादी का गाना गाना शुरू कर दि‍या. वे 'मुझसे शादी कर लो' गा रही थीं. उनके गाने के साथ ही लंच रूम में बैठे कई लोग उनके पास आ गए और तालि‍यां बजाकर गाने में उनका साथ देने लगे.

जब दोनों युवति‍यों ने गाना बंद कि‍या तो आकलैंड बाकायदा अपने घुटनों पर बैठ गए और माइकल को शादी के लि‍ए प्रपोज कि‍या. वह अपने साथ अंगूठी भी लाए थे और उन्‍होंने माइकल को अंगूठी पहनाई. इसके बाद दोनों ने कि‍स कि‍या. आकलैंड ने बताया कि तीन वर्ष पहले उन्‍होंने माइकल को एक चि‍ट्ठी भेजी थी जि‍समें उन्‍होंने कहा था कि वह माइकल को पसंद करते हैं. उन्‍होंने माइकल से पूछा था कि क्‍या वह उनके साथ सैन फ्रांसि‍स्‍कों में आकर रहना पसंद करेंगे.

माइकल को प्रपोज करते हुए ऑकलैंड ने उनसे कहा कि पि‍छले कई वर्षों से उनके साथ के दौरान उन्‍हें लगता है कि वह साथ-साथ कई सारी चीजें कर सकते हैं. उन्‍होंने अपने साथ काम करने वालों को धन्‍यवाद देते हुए माइकल से आई लव यू कहा और पूछा कि क्‍या वह उनके साथ सैन फ्रांसि‍स्‍को जाकर शादी करेंगे.

ऑकलैंड के शादी के प्रस्‍ताव पर माइकल ने तुरंत हां कर दी. ऑकलैंड ने बताया कि वह चाहते थे कि अमेरि‍का की नागरि‍कता के लि‍ए वह माइकल को स्‍पांसर करें पर डि‍फेंस ऑफ मैरि‍ज एक्‍ट के प्रावधानों के चलते वह ऐसा नहीं कर सकते हैं. उन्‍होंने आशा व्‍यक्‍त की कि जल्‍द ही सुप्रीम कोर्ट इस बारे में फैसला सुनाने वाला है जि‍सके बाद माइकल उनके साथ हमेशा रह सकते हैं. (भास्कर)

स्कूल संचालक ने दो छात्राओं से रेप किया, फिर जहर देकर मार डाला

राजस्थान से एक स्तब्ध करने वाली खबर है। बीकानेर जिले के खाजूवाला थाना क्षेत्र में आठवीं क्लास की दो छात्राओं से रेप कर जहर देकर हत्या करने के आरोप में प्राइवेट स्कूल के संचालक राजेश धाकड़ को शुक्रवार रात अरेस्ट कर लिया गया। खाजूवाला थाना अधिकारी रामचन्द्र चौधरी ने बताया कि खाजूवाला क्षेत्र की दोनों छात्राओं ने पिछले 11 अप्रैल को रेप के बाद जहर खाकर जान दे दी थी। एक छात्रा ने स्कूल कैंपस में ही जहर खा लिया था, जबकि दूसरी छात्रा ने घर में जहर खाया था। उन्होंने बताया कि पीड़िता के पिता ने निजी स्कूल के संचालक राजेश धाकड़ के खिलाफ मामला दर्ज कराया है। स्कूल संचालक दोनों छात्राओं और अपने बेटे को जीप से स्कूल ले गया था। इसके बाद बेटे को उसने बाजार में फल लेने के लिए भेज दिया और बाद में संचालक ने दोनों छात्राओं से रेप किया।

रेप के दौरान एक छात्रा बेहोश हो गई, जिसे आरोपी हॉस्पिटल ले गया। वहां छात्रा ने अपने मामा और भाई को बताया कि स्कूल संचालक कई दिनों से उससे और उसकी सहेली के साथ रेप कर रहा है और उसने ही जहर पिलाया है। पुलिस के मुताबिक हॉस्पिटल में हालत बिगड़ने पर बीकानेर के पीबीएम हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। स्कूल संचालक ने दूसरी छात्रा को फोन करके कहा कि उसे जो गोली दी है वह भी खा ले, वरना उसकी सहेली की मौत का आरोप उसके ऊपर आ जाएगा। इससे दूसरी छात्रा ने भी गोली खा ली, जिससे उसकी भी मौत हो गई। पुलिस ने बताया कि राजेश धाकड़ (35) के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है। (भाषा)

‘सकालबेला’ के पत्रकारों ने भी दर्ज कराई कुणाल घोष के खिलाफ शिकायत

कोलकाता : कोलकाता के भवानीपुर थाने में तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद कुणाल घोष के खिलाफ एक और शिकायत दर्ज कराई गई है। शारदा समूह के 'सकालबेला' नाम के अखबार के कर्मचारियों ने कुणाल घोष के खिलाफ यह शिकायत दर्ज कराई है। कुणाल घोष पर जिन धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है, इनमें से दो गैर जमानती हैं।

इससे पहले कुणाल घोष, सारदा समूह के अध्यक्ष सुदीप्त सेन और दो अन्य के खिलाफ चिटफंड कंपनी द्वारा संचालित टेलीविजन चैनल के कर्मचारियों को वेतन का भुगतान नहीं करने के लिए भी एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी। वहीं कुणाल घोष ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को एक चिट्ठी लिखकर कहा है कि वह किसी भी जांच के लिए तैयार हैं। साथ उन्होंने यह भी कहा है कि इस विवाद में उनका नाम उछाला जा रहा है और इसकी वजह से पार्टी को मुश्किलों का सामना करना पड़ा है, इसलिए अगर ममता बनर्जी कहेंगी, तो वह इस्तीफ़ा देने के लिए भी तैयार हैं। (एनडीटीवी)

सेबी जोड़तोड़ में लिप्त चिटफंड और फाइनेंस कंपनियों से सख्ती से निपटे : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने बाजार नियामक सेबी से कहा है कि देश में बाजार व्यवस्था का दुरपयोग बर्दाश्त नहीं करने का स्पष्ट संदेश देने के लिये जोड़ तोड़ और भ्रामक आचरण में लिप्त कंपनियों से सख्ती से निपटा जाये। न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की खंडपीठ ने कहा, ‘बाजार नियामक सेबी को जोड़ तोड़, कपटपूर्ण तरीके और भेदिया कारोबार जैसी गतिविधियों में लिप्त कंपनियों और उनके निदेशकों से सख्ती से पेश आना होगा। अन्यथा वे प्रतिभूति बाजार के सुव्यवस्थित और स्वस्थ्य विकास को बढावा देने के अपने कर्तव्य को निभाने में असफल रहेंगे।’

शीर्ष अदालत का यह निणर्य काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ऐसे समय में आया है जब जनता से गैरकानूनी तरीके से धन एकत्र करने के मामले में चिट फंड कंपनियां और सहारा समूह सुखिर्यों में हैं। यह फैसला ऐसी कंपनियों से सख्ती से निपटने के लिये बाजार नियामक का हौसला बढ़ायेगा। न्यायालय ने कहा, ‘यह संदेश जाना चाहिए कि हमारा देश बाजार से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करेगा और हम कानून के शासन से संचालित होते हैं। सेबी को सुनिश्चित करना चाहिए कि देश के प्रतिभूति कारोबार में छल, कपट, ठगी और बनावट के लिये कोई जगह नहीं है और बाजार की सुरक्षा हमारा ध्येय है।’

न्यायालय ने कहा कि धनी, ताकतवर और कंपनियों के प्रबंधन में बैठे लोगों को कंपनियों के निवेशकों और उसमें योगदान करने वालों के बजाय आमतौर पर समाज में ज्यादा सम्मान मिलता है। न्यायालय ने कहा, ‘निवेशकों के योगदान से कंपनियां फल फूल रही हैं लेकिन ये निवेशक फैले हुये हैं। इसलिए सूचीबद्ध कंपनियों के निदेशकों के मौकापरस्त व्यवहार और अंदरूनी लोगों से निवेशकों को संरक्षण प्रदान करना सेबी का कर्तव्य है ताकि बाजार की समग्रता बनी रहे।

न्यायालय ने मीडिया से भी कहा है कि प्रतिभूति बाजार के बारे में जारी अनुमानों से जनता को गुमराह न किया जाये। ‘प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया का यह गंभीर कर्तव्य है कि वर्तमान और भविष्य की संभावित निवेशक जनता को प्रतिभूति बाजार पर अपने अनुमानों से भ्रमित नहीं करें। हालांकि, किसी कंपनी की बाजार स्थिति के बारे में वास्तविक और ईमानदार जानकारी का स्वागत किया जाना चाहिये। लेकिन किसी प्रतिभूति की स्थिति विशेष से लाभ उठाने के लिये प्रतिभूति बाजार में कंपनी की स्थिति को लेकर मीडिया में अनुमान व्यक्त करना बाजार का दुरपयोग और कृत्रिम परिवेश बनाने के समान माना जायेगा।’

न्यायालय ने कहा है कि भारत में बाजार का दुरपयोग करना आम चलन हो गया है और ऐसी स्थिति में सही निवेशकों को संरक्षण प्रदान करना सेबी का कर्तव्य है। शीर्ष अदालत ने कहा कि आर्थिक अपराध देश के आर्थिक विकास को ही प्रभावित नहीं करते बल्कि ईमानदार निवेशकों के विदेशी निवेश को भी बाधित करते हैं और भारत के प्रतिभूति बाजार को भी कलंकित करते हैं।

शीर्ष अदालत ने सेबी के आदेश के खिलाफ मेसर्स पिरामिड साइमीरा थिएटर लि के प्रवर्तक और पूर्णकालीन निदेशक एन नारायण की अपील खारिज करते हुये यह व्यवस्था दी। सेबी ने 28 जुलाई, 2011 को नारायण पर 50 लाख रूपए का जुर्माना लगाने के साथ ही उस पर प्रतिभूतियों की खरीद फरोख्त का कारोबार करने पर दो साल के लिये प्रतिबंध भी लगा दिया था। सेबी ने शेयर बाजार को गलत सूचना देने और खातों का रखरखाव नहीं रखने के कारण यह कार्रवाई की थी।

इस कंपनी ने शेयर बाजार को 30 जनवरी, 2009 को सूचित किया था कि उसका 30 जून, 2008 की स्थिति के अनुसार 802 थिएटरों से समझौता हुआ था। इन 802 समझौतों में से कंपनी सिर्फ 257 मूल समझौते ही सेबी को दिखा सकी थी जिसकी वजह से यह निष्कर्ष निकाला गया कि 545 समझौते कभी अस्तित्व में थे ही नहीं। नतीजतन सेबी ने निष्कर्ष निकाला कि कंपनी ने उसे गलत जानकारी दी। (एजेंसी)

वरिष्‍ठ पत्रकार मनोज दुबे मेरठ में नेशनल दुनिया के यूनिट हेड बने

सहारा मीडिया में लंबे समय तक रहे वरिष्‍ठ पत्रकार मनोज दुबे अब नेशनल दुनिया से जुड़ गए हैं. वे नेशनल दुनिया, मेरठ के यूनिट हेड होंगे. अखबार के लांच कराने की जिम्‍मेदारी श्रीकांत अस्‍थाना और मनोज दुबे की होगी. लगभग 28 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय मनोज दुबे नेशनल दुनिया से जुड़ने से पहले सी न्‍यूज के यूपी हेड थे. मनोज दुबे ने अपने करियर की शुरुआत अस्‍सी के दशक में लखनऊ से प्रकाशित विश्‍वामित्र के साथ की थी.

काफी समय यहां काम करने के पश्‍चात ये जून 1992 में लखनऊ सहारा के साथ जुड़ गए. यहां लंबे समय तक रहे. जब कानपुर में राष्‍ट्रीय सहारा अखबार की लांचिंग हुई तो मनोज दुबे को ब्‍यूरोचीफ बनाकर भेजा गया. लंबे समय तक ये कानपुर में रहे. इसके बाद इन्‍हें विशेष संवाददाता बनाकर लखनऊ भेजा गया. यहां से इन्‍हें सहारा टीवी में वरिष्‍ठ पद पर नोएडा बुला लिया गया. लंबे समय तक नोएडा में काम करने के बाद सहारा की आंतरिक राजनीति से तंग होकर इन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया तथा साधना न्‍यूज के साथ दिल्‍ली ब्‍यूरोचीफ के रूप में जुड़ गए. बाद में सहारा में इनकी वापसी कराई गई तथा इन्‍हें सहारा में एसएनबी का ऑल इंडिया हेड बनाया गया.

फिर सहारा की राजनीति इन्‍हें रास नहीं आई और इन्‍होंने यहां से इस्‍तीफा देकर आगरा से संचालित न्‍यूज चैनल सी न्‍यूज के साथ यूपी हेड के रूप में जुड़ गए. वे लखनऊ में बैठकर सारी जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. मनोज दुबे की यूपी तथा दिल्‍ली के राजनीतिक तथा प्रशासनिक गलियारे में अच्‍छी पकड़ मानी जाती है. 

FB Yash (5) : स्वामी भड़ासानंद के फेसबुकी प्रवचन

Yashwant Singh : अगर आपको फेसबुक पर सच्चे साथी की तलाश हो तो बस इतना कीजै कि एक दिन संघियों उर्फ हाफपैंटियों, एक दिन कम्युनिस्टों उर्फ लालझंडा वालों, एक दिन इस्लामिक कट्टरपंथियों और एक दिन कट्टर हिंदूवादियों के खिलाफ टाइट वाला स्टेटस डाल दीजिए… जो जो विरोध करे, उन्हें ब्लाक करिए… बाकी जो बच जाएं, उनमें से परम मूर्ख और परम ज्ञानी की तलाश आसानी से कर लेंगे 🙂

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Yashwant Singh : विचार शून्य हो जाना सबसे बड़ी उपलब्धि है पर इसका रास्ता विचारधाराओं को जानने समझने और फिर उनसे उपर उठने से होकर जाता है.. शब्दों के तह तक पहुंच कर शब्दों से परे हो जाना बहुत बड़ा काम होता है… इस प्रक्रिया को वही समझ सकता है जो सच्चा साधक हो, खुले दिल दिमाग वाला हो, दिल-दिमाग और मजबूरियों से आजाद हो और अतिशय संवेदनशील हो… एक अन्य तरह की विचार शून्यता भी है जो किसी भी विचारधारा को जानने की जगह एक ही विचार धारा को या सामाजिक-परिवेशगत पनपी धारणाओं को कट्टर तरीके से कसकर पकड़ के उसके लिए जीने मरने मारने की बात करे और बाकियों को विरोधी माने… फिलहाल जो स्थिति है उसमें कट्टरपन हावी है… डेमोक्रेटिक होना और रेशनल होना, ये पहली सीढ़ी है विचारवान बनने की ओर बढ़ने का.. उसके बाद ग्लोबल यूनिवर्सल नजरिया डेवलप करते हुए सूक्ष्मतम से लेकर दीर्घतम तक को अपने हिसाब से एनालाइज करना और साइंस व स्प्रिचुवल्टी के अब तक खोजों के प्रकाश में देखते हुए आगे राह तलाशना बड़ा चुनौतीपूर्ण काम है… इस राह पर चल चुके ज्यादातर लोग मौन को प्रीफर करते हैं, बंद आंखों से दुनिया देखते हैं, बिना बोले सब कुछ समझते कहते रहते हैं…

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Yashwant Singh : लताजी जब आती हैं तो एसपी बालासुब्रमण्यम उनका पैर छूते हैं.. फिर शुरू हो जाते हैं दोनों गायक… तू कहे तो, नाम तेरे, कर दूं सारी जवानी… गज़ब जिद है प्यार में.. तू कहे तो नाम तेरे कर दूं सारी जवानी… हर उम्र की एक तड़प होती है… बचपन की अलग, किशोर उम्र की अलग, युवा दिनों की अलग, अधेड़ उम्र की अलग औरर बुजुर्ग अवस्था की अलग… मुश्किल ये है कि …बाजार, मार्केट, पैसा, बिजनेस, कारोबार… ने सिर्फ प्यार और सेक्स को इस कदर एक्सपोज कर रखा है कि हर कोई हर दौर हर उम्र में इसी से चार्ज्ड है या चार्ज्ड होने को अभिशप्त है… इस कारण वह इससे बड़ी और जरूरी कई तड़पों की तरफ ध्यान, दिल, दिमाग नहीं ले जा पाता है…

खैर, प्रवचन लंबा हो जाएगा.. फिलहाल ये कहना है कि ये वीडियो इसलिए जरूर देखें कि वही गाना जो आप फिल्म में हीरो-हीरोइन को मुंह हिलाते सुनते हैं और जब इसे इसके ओरीजनल गायकों की जुबान से सुनते हैं तो कितना फर्क महसूस होता है.. मुझे इन दोनों लताजी और एसपीबी को गाते हुए सुनने में ज्यादा आनंद आया…

एक लाइव कनसर्ट की रिकार्डिंग है. पुराना है.

एसपीबी ने लताजी का पैर छुवा और दोनों ने क्या खूब गाया…

ये दोनों सामान्य मनुष्य नहीं, ये अपने फन अपने पैशन को इतना गहरे डूबकर जीते हैं कि एक पल को या गाते हुए ये खुद के होने ना होने के एहसास से उपर उठ जाते हैं..

ऐसी ही तड़प होनी चाहिए… किसी भी चीज के प्रति… चाहे वो बुरा हो या अच्छा हो… क्योंकि दुनिया में सही गलत अच्छा बुरा कुछ नहीं होता…

सही गलत अच्छा बुरा खराब ठीक… ये सब औसत मनुष्यों द्वारा औसत मनुष्यों के लिए बनाई गई स्थूल किस्म की गाइडलाइन है, साथ ही, हमारा आपका परसेप्शन भी, जो परंपरागत परिवेश व परंपरागत समाज से तोहफे में मिला है और हम दूसरों को देते चले जाते हैं ….

एक उलटबांसी देखिए… खराब और अच्छा के गलबंहिया डालने की परिघटना देखिए कि सभ्यता को सभ्य बनाते-बनाते हमने जंगली जानवरों पर काबू कर लिया या उनका खात्मा कर दिया लेकिन बनती बढ़ती संवरती जा रही सभ्यता की असभ्यता की हद ये कि जंगली आदमियों की तादाद दिन प्रतिदिन बढ़ती चली गई.. आज जंगली जानवरों से मनुष्यता-सभ्यता को खतरा बिलकुल नहीं, जंगली आदमियों से हर कोई हलकान, परेशान, हैरान है… आजकल जो कुछ हो रहा है, इसी संदर्भ में देखिए और सोचिए…

खैर, नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करिए और आनंद लीजिए इस गाने का… सुन बेलिया… शुक्रिया… मेहरबानी… तू कहे तो, नाम तेरे, कर दूं सारी जवानी… लताजी और एसपीबी की आवाज में…

http://www.bhadas4media.com/video/viewvideo/706/media-music/lataji-and-spb-live-in-concert.html


भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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सोनभद्र में सपा नेता के खदान में हुए हादसे में एक श्रमिक की जान गई, मीडिया-प्रशासन सब चुप

सरकार किसी की भी हो पूरे उत्‍तर प्रदेश में अवैध खनन बदस्‍तूर जारी रहता है. जिसकी सत्‍ता होती है खनन राज भी उसी का शुरू हो जाता है. सोनभद्र में खनन माफियाओं का चौतरफा राज है. यहां मीडिया भी इन खनन माफियाओं की रखैल हो गई तो तमाम मीडियाकर्मी खुद खनन माफिया बन चुके हैं. शुक्रवार को सोनभद्र के बिल्‍ली पहाड़ी पर एक बार फिर अवैध खनन में एक मजदूर की जान चली गई तथा कई घायल हो गए, लेकिन यह खबर सुर्खियां नहीं बन पाई क्‍यों कि मामला न केवल सत्‍ता पक्ष से जुड़ा हुआ था बल्कि तमाम पत्रकार भी इस अवैध काम में लाभ पाते रहते हैं.

बिल्‍ली पहाड़ी पर सपा के व्‍यापार प्रकोष्‍ठ के प्रदेश कोषाध्‍यक्ष रमेश वैश्‍य का खादान है. इस खादान में जितनी जगह इनको आवंटित है उससे कहीं ज्‍यादा खनन हो रहा है. परन्‍तु कोई रोकने टोकने वाला नहीं है क्‍योंकि कहीं पर सत्‍ता का दबाव है तो कहीं पर पैसों से मुंह बंद रखने की हिदायत. अगर इससे भी बात नहीं बनती है तो बाहुबल तो है ही. यानी साम, दाम, दंड और भेद सारे उपाय अपनाकर यहां रमेश वैश्‍य ही नहीं तमाम लोग निर्गत इलाके से ज्‍यादा में खनन कर रहे हैं यानी अवैध खनन कर रहे हैं.

कल सपा से जुड़े रमेश वैश्‍य के खादान में हादसे में ओबरा के टेढ़ीसेन गांव के आदिवासी मान सिंह की मौत हो गई. मंधार और बबलू नाम के दो श्रमिक घायल हो गए. पर इस हादसे की गूंज कहीं नहीं हुई, जबकि शुक्रवार को ही खनन से जुड़े विभाग के मंत्री ने सपा राज में अवैध खनन रुकने तथा मायावती राज में हुए अवैध खनन की जांच कराने की बात कही थी, पर सारी बातें पहले ही दिन टांय-टांय फिस्‍स हो गईं. इसके पहले जब 2012 में हुए एक बड़े हादसे में कई श्रमिकों की जान गई तो शासन प्रशासन दोनों ने अवैध खनन रोकने का ढिंढोरा पीटा था, परन्‍तु जमीनी स्‍तर पर कुछ भी नहीं हुआ.

एडीएम मणिलाल यादव को अवैध खनन रोकने की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है, परन्‍तु अवैध खनन रुकने की बजाय लगातार बढ़ता ही जा रहा है. खनन क्षेत्र में पोकलैन से खनन कराने की मनाही है बावजूद इसके पोकलैन से खनन कराए जाते हैं. तमाम लोगों ने अवैध खनन की शिकायतें पुलिस, प्रशासन, सरकार, नेता सभी से कीं, परन्‍तु अरबों का यह खनन व्‍यवसाय सभी को संतुष्‍ट करके रखता है, जिससे इसके खिलाफ कहीं भी आवाज नहीं उठी. इस बारे में अखबारों में भी एक सामान्‍य सी घटना बताकर छाप दिया गया है. अवैध खनन को लेकर कोई भी अखबार अभियान तभी चलाता है जब उसकी वसूली प्रभावित होती है.

शुक्रवार को हुए हादसे में मान सिंह की जान चली गई. एक गरीब परिवार का सहारा छीन गया लेकिन अखबारों के नैतिक एवं समाजिक चरित्र पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. जागरण में खदान मालिक के सपा नेता होने के बादे में कोई जानकारी ही नहीं दी गई है. पुलिस ने भी कोई सक्रियता नहीं दिखाई. मामले में रमेश वैश्‍य सहित दो लोगों के खिलाफ मामूली धाराओं में मुकदमा दर्ज करके इतीश्री कर ली गई.

एक न्यूज चैनल में भड़ैती के कुछ सीन (पार्ट दो)

तीसरी मीटिंग : न्यूज की सारी बातें हो चुकी थीं मध्यप्रदेश के एक साथी ने बताया कि कैलाश विजयवर्गीज के खिलाफ…. तभी भांड़ बोल पड़ा- किसने रोका उनके खिलाफ खबर चलाने से- मामला जादा बडा हो तो स्टिंग भी करवालो…

विजय सिंह बोले- लोग क्या कहेगा, अपने ही पार्टनर के खिलाफ स्टिंग करवा रहे हैं चांपना न्यूज वाले, और फिर कैलाश जी को पता चलेगा तो छोड़ देंगे आपको…

भांड़ बोला-ट्ट्ट्टट्ट विजय सिंह जी, इससे हमारी क्रिडेबिलिटी लोगों के दिल में और ज्यादा बढ़ेगी…सब कहेंगे कि जब ये साले अपने ही लोगों के खिलाफ प्रोग्राम चला सकते हैं तो फिर बाकी लोगों का क्या हाल कर सकते हैं।

बहरहाल एमपी से यूपी और फिर यूपी से बिहार होते हुए मीटिंग अपने अवसान की ओर थी, लेकिन बाकी था तो अभी भांड का प्रवचन। भांड के प्रवचन सुनते वक्त ऐसा लगता है कि उसने पैसा कमाओ पत्रकारिता पर व्यापक शोध कर रखा है। पैसा और पत्रकारिता के बीच 'प्यारी' को कैसे इस्तेमाल किया जाना चाहिए, इस विषय पर भी उसे महारत हासिल है। इस विशेष विशेषता को भाँड अपने कृपा पात्र चिरकुटों और लौंडा मालिक मयंक के सामने एक खास तरीके से बयान करता है। भाँड की इस विशेष विशेषता का विवरण आगे दिया जाएगा। फिल्हाल तीसरी मीटिंग के पटाक्षेप से पहले भाँड ने अपनी डायरी खोली, आदतन बांये हाथ से चेहरे के दायें हिस्से को नीचे खींच कर सीधा करने की कोशिश करते हुए दाढ़ी-चोटी शर्मा से पूछा- आपने मोबाइल हॉस्पीटल वाली स्टोरी़ज़ आ गई उत्तराखण्ड से…

दाढ़ी चोटी शर्मा ने थोड़ा से अनइजी लहजे में दिया- सर, वो संदीप गया था सुरेंद्र सिंह नेगी से मिला था, उनका टिक-टैक भी लाया है।  देहरादून में मोबाइल हॉस्पीटल नहीं है सर। वो रूरल एरिया में चल रहे हैं, स्ट्रिंगरों को बोल दिया है एक दो दिन में स्टोरी भेजने के लिए बोल रहे हैं…

भांड़- आपने पिछले हफ्ते कहा था सोमवार को स्टोरी फाइल हो जाएगी, कब चलाओगे स्टोरी, तब जब वो सारे फण्ड्स का यूटिलायजेशन शो कर देंगे। हमारे पास मोबाइल हॉस्पीटल और मेडिकल वैन्स रन करने की एक्सपर्टीज है, और हम यहां बैठकर कद्दी छील रहे हैं…मजबूर करो उन्हें हमसे बैठ कर कम्प्रोमाइज करने के लिए…बोलो- देहरादून के ब्यूरो चीफ से स्टोरी भेजें, स्टिंग भेजें… नहीं भेज सकते हैं तो कहीं और जा करें चित्रकारिता…और आप भी सुन लीजिए शर्मा जी, साधना न्यूज की स्क्रीन पर सुलेख कम्पटीशन नहीं करवाने की जिम्मेदारी नहीं दी गई है आपको, पाण्डेय जी को समझा दो और आप भी समझ लो अच्छी तरह से जीटीएम के नाइंटी थाउज़ेंड से चैनल की लीज नहीं हो गई है आप लोगों के नाम…यार, अंजू…जरा तुम आज बात करो निशंक से, जो भी रेसपॉंस मिले मुझे फोन पर बताना…. फिर मुकेश की ओर मुखातिब होकर, तुम्हारा क्या चल रहा है हीरो…सब्ब आपका आशीर्वाद सर्ररर…

….जारी….

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एक न्यूज चैनल में भड़ैती के कुछ सीन

माधुरी सिंह और प्रवीण बागी ने साधना न्यूज ज्वाइन किया

ब्लैकमेलिंग और दलाली के लिए कुख्यात न्यूज चैनल साधना न्यूज से खबर आ रही है कि माधुरी सिंह और प्रवीण बागी ने इस चैनल के साथ नई पारी शुरू की है. माधुरी इसके पहले फोकस टीवी में कार्यरत रही हैं. चर्चा है कि साधना न्यूज यूपी उत्तराखंड हेड पद से बृजमोहन की विदाई होने वाली है. उन्हीं की जगह नया हेड बनाकर माधुरी को लाया गया है. साधना न्यूज चैनल के मालिकान हमेशा पत्ते फेंटते रहते हैं और जो जब तक किसी भी काम में उपयोगी नजर आता है, तब तक उसे बनाए रखते हैं और जैसे ही उन्हें लगता है कि अब मार्केट से उगाह पाना निकाल पाना इसके वश की बात नहीं तो उसे दूध की मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंकते हैं.

बृजमोहन सिंह के साथ भी यही हो रहा है. साधना के कई धंधों को यूपी शासन के जरिए फायदा पहुंचाने वाले बृजमोहन की बेइज्जती साधना के मालिकों ने भरी मीटिंग में करनी शुरू कर दी है. उन्हें तरह तरह के संबोधनों से नवाजा जाने लगा है. उधर चर्चा है कि बृजमोहन जल्द ही उस चैनल में ज्वाइन करने वाले हैं जहां से वह इस्तीफा देकर साधना न्यूज आए थे. हालांकि इसकी पुष्टि अभी आधिकारिक तौर पर नहीं हो सकी है. साधना न्यूज यूपी उत्तराखंड में कार्यरत राजीव शर्मा को भी साधना न्यूज से हटाए जाने की कानाफूसी हो रही है. कुछ लोगों का कहना है कि राजीव शर्मा को चैनल से जाने को कह दिया गया है. वहीं कुछ का कहना है कि वे चैनल के साथ बने हुए हैं.

एक अन्य सूचना के मुताबिक पत्रकार प्रवीण बागी ने साधना न्यूज़ बिहार झारखण्ड के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. उन्हें चैनल का स्टेट हेड बनाया गया है. इसके पहले वे श्री न्यूज़ के बिहार ब्यूरो चीफ थे. वे ईटीवी बिहार-झारखंड के डिप्टी न्यूज़ कोआरडिनेटर और महुआ न्यूज़ के एडिटर इनपुट के रूप में काम कर चुके हैं. बागी का पत्रकारिता का करीब 28 वर्षों का अनुभव  है. वे नवभारत टाइम्स, नई दुनिया, दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान जैसे अखबारों में भी काम कर चुके हैं. देखना है कि साधना न्यूज में आने के बाद बागी के अंदर का विद्रोही कितना जिंदा रह पाता है.

वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (चौबीस) : कम आबादी वाली जातियों का बड़ा मोल

मतदाताओं को मतदान के दिन वोट देने के लिए प्रेरित करने की भी अपनी रणनीति बनायी थी। प्रचार के दौरान ही इस बात की पूरी कोशिश करता था कि वोटरों से लगातार सीधा संबंध बना रहे। इसके दो रास्ते थे। पहला था उनके साथ लगातार मिलते रहना और दूसरा था मोबाइल से संबंध। जनसंपर्क के दौरान वोटरों का पर्चा काटने का काम करता था। उसी दौरान उनका मोबाइल नंबर वोटर लिस्ट उनके नाम के सामने लिख लेता था। कभी-कभार उनको फोन करके बातचीत भी कर लेता था और अपनी उपस्थिति का अहसास करता था।

नंबर लिखने के दौरान संबंधित व्यक्ति के बारे में अधिकाधिक जानकारी लेने का प्रयास करता था। इस दौरान उनकी जाति, पारिवारिक स्थिति, राजनीतिक झुकाव, पंचायत का समीकरण समझने का प्रयास करता था। इससे कई चीजों को समझने में काफी सहूलियत होती थी। कुछ जातियों के बारे जानकारी सामान्य तौर सबको होती थी। ऐसी जातियां बहुसंख्यक भी हैं। लेकिन कुछ जातियां ऐसी भी हैं, जिनकी संख्या काफी कम है। उनके सामाजिक संगठन के संबंध में जानकारी नहीं थी। इसी में एक जाति है खत्री। यह ब्राह्मण है, भूमिहार है या राजपूत। इसको लेकर अवधारणा स्पष्ट नहीं थी। एक वोटर मिल गए। उनका सरनेम खत्री था। हमें लगा कि क्षत्रिय कह रहे हैं। मैंने उनसे जानना चाहा कि यह कौन जाति है, इसका सामाजिक चरित्र क्या है, इसका पंरपरागत पेशा क्या है। उन्होंने बहुत कुछ इस संबंध में नहीं बताया। लेकिन इतना जरूर बताया कि हसपुरा में पत्रकार हैं वीरेंद्र खत्री। वह हमारे रिश्तेदार हैं। इस जाति की संख्या काफी कम है। उनके वोटरों की संख्या भी कम है। एक जाति है सिंदुरिया बनिया। बस एक परिवार खरांटी में बसा है।

कम आबादी वाली जातियों का वोट विहेवियर को समझना भी जटिल काम था। उनका कोई अपना राजनीतिक एजेंड नहीं होता है। वह पास-पड़ोस व स्थानीय हवा के अनुकूल अपनी रणनीति तय करते हैं। वह चुनाव को लेकर आक्रमक भी नहीं होते हैं और न कोई उन्हें गंभीरता से लेता है। लेकिन कुछ मतों से हार-जीत होने वाले चुनाव में उनकी महत्ता को सिरे नकारा नहीं जा सकता है। यही कारण था कि कम संख्या वाली जातियों तक भी पहुंचने का प्रयास कर रहा था। पूरी पंचायत में संभवत: खरांटी का बिंदा डोम ही अकेला डोम परिवार है। हालांकि उनका बड़ा परिवार था, जिसमें कम से कम 20 वोट अकेले उस परिवार का था। उनमें से कई वोटर बाहर कमाने के लिए भी चले गए थे। इस परिवार में शिक्षा नाममात्र की ही थी।

खरांटी में मेहतरों के कई घर हैं। सब एक ही परिवार से फैले हैं। उनकी भी संख्या अच्छी-खासी है। उस परिवार का एक व्यक्ति हमारा पोलिंग एजेंट बनना चाहता था। मैंने जब पोलिंग एजेंट बनाने से मना दिया तो वह किसी दूसरे उम्मीदवार का पोलिंग एजेंट बन गया था। वोटरों के नाम के साथ मोबाइल नंबर का यह फायदा हो रहा था कि किसी भी समय किसी भी व्यक्ति से बातचीत करना आसान हो गया था। लोग भी कभी-कभार फोन कर लिया करते थे। मैं वोटरों को प्रभावित करने के ओबरा और आसपास के लोगों से उम्मीद कर रखा था। दूबे वोटों के लिए ओबरा के दूबे जी, चौधरी वोटों के लिए ओबरा की चौधरी जाति की एक महिला, भूमिहारों के लिए बालेश्वर सिंह आदि ने अपने स्वजातीय वोटों को दिलाने का आश्वासन दिया था। लेकिन उन लोगों ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की। उनको लगता था कि मेरे पक्ष में प्रचार करना उचित नहीं होगा।

चुनाव में अपने पक्ष में हवा बनाने के लिए मैंने हरसंभव प्रयास किया। गांव-गांव, गली-गली घूम रहा था। संपर्क को मजबूत बनाने की पूरी भी की। अपने स्तर पर कोई कसर नहीं छोड़ रखा था, लेकिन किसी भी स्तर पर प्रलोभन का सहारा नहीं लिया। लेकिन वोटरों को उचित सम्मान हर संभव देता रहा था।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क kumarbypatna@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


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हादसे में एक ही परिवार के चार लोगों की मौत

: घायलों में भी एक परिवार के नौ लोग : इलाहाबाद। कौशांबी जिले के कड़ाधाम मंदिर में दर्शन करने जा रहे लोग सड़क हादसे की चपेट में आ गए। इलाहाबाद-लखनऊ राजमार्ग पर तेज स्पीड में आ रही डीसीएम से बोलेरो की भीषण टक्कर हो गई, जिसमें एक ही परिवार के चार सदस्यों की मौत हो गई। मरने वालों में तीन सगे भाई-बहन हैं। जबकि, तेरह घायलों में एक ही परिवार के नौ लोग शामिल हैं।

हादसा प्रतापगढ़ जिले के कुंडा कस्बा के पास बरई में 25 अप्रैल को हुआ। पूरनपुर खास में रहने वाले भइयाराम सरोज अपने परिवार के साथ कड़ाधाम स्थित शीतला मंदिर में दर्शन करने जा रहे थे। किराये की बोलेरो में छोटी उम्र के बच्चों समेत कुल सत्रह लोग सवार थे। बोलेरो बरई के पास पहुंची तभी लखनऊ की ओर से आ रही डीसीएम की टक्कर बोलेरो से हो गई। टक्कर इतनी तेज थी कि बोलेरो के परखच्चे उड़ गए। उसका अगला हिस्सा पिचक गया। टक्कर होते ही वहां चीख पुकार मच गई। आसपास के ग्रामीणों ने मौके पर पहुंच कर बोलेरो में फंसे लोगों को बाहर निकालने में मदद की। तब तक चार लोगों की मौत हो चुकी थी।

भइयाराम की दो नातिन प्रिया (5), प्राची (8) और नाती प्रिंस (3) समेत लाखूपुर के राकेश कुमार की बेटी सरिता ने भी दम तोड़ दिया। इसके अलावा भइयाराम (45) उनकी पत्नी निर्मला (40) बेटी सुमन (28) बेटा सुरेंद्र कुमार (20), बहू सुशीला (22), बेटी मिथिलेश (35), रिया (8) अंश (6), शिवम (4) के अलावा लाखूपुर के ही रहने वाले गया प्रसाद की बेटी सुषमा (20), व लाल बहादुर (35) घायल हो गए। घायलों में मिथिलेश और लाल बहादुर की दशा गंभीर बनी हुई है।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

गरीबों के अरमानों की लाश पर खड़ा लखनऊ का ‘सहारा शहर’

लखनऊ। अपट्रॉन की जमीन की नीलामी को लेकर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है, लेकिन गोमती नगर स्थित नगर निगम की अरबों रुपए की बेशकीमती 170 एकड़ सरकारी जमीन पर काबिज सहारा इंडिया हाउसिंग पर नगर निगम और नौकरशाही ने चुप्पी साध रखी है। सहारा इंडिया हाउसिंग को 1994 में इस भूमि पर गरीबों को आवास बनाने के लिए आवंटित की गई थी। गरीबों का अशियाना इस बेशकीमती भूमि पर नहीं बन पाया, लेकिन सुब्रत राय सहारा श्री का अशियाना 'सहारा शहर' जरूर जनता को चिढ़ा रहा है। इस भूमि के बारे में नगर निगम और शासन के आला अफसर मुंह खोलने को तैयार नहीं हैं।

21 सितम्बर 1994 को लखनऊ विकास प्राधिकरण ने नगर निगम की गोमती नगर स्थित उजरियांव और जियामऊ गांव की 170 एकड़ जमीन को अधिग्रहण किया था। इस जमीन का अधिग्रहण आवासीय और कार्मिशयल प्रयोजन के लिए किया गया था। लेकिन नगर निगम ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 15 और 17 का उपयोग करते हुए इस भूमि को सहारा इंडिया हाउसिंग के पक्ष में 30 साल के लिए लीज पर दे दिया। इसके साथ ही 30-30 साल के लिए दो बार लीज करार बढ़ाए जाने का प्रावधान किया गया था।

नगर निगम और सहारा इंडिया हाउसिंग के बीच इस जमीन को विकसित करने के लिए एग्रीमेंट के तहत कई शर्तों के साथ 22 अक्टूबर 1994 में करार हुआ था। करार के तहत 170 एकड़ भूमि में ग्रीन बेल्ट विकसित करना था। बाकी बची हुई जमीन पर गरीबों के लिए मकान, प्लॉट, व्यवसायिक भवन, पार्क, अस्पताल, कम्युनिटी हाल विकसित करना था। भूमि को विकसित करने में नगर निगम द्वारा तय किए गए नियमों के तहत कार्य होगा। इस करार में सबसे खास बात यह रही कि सहारा इंडिया हाउसिंग मकान, प्लॉट, व्यवसायिक भवन, पार्क, अस्पताल, कम्युनिटी हाल तो जरूर कराएगा, लेकिन आवासों, प्लाटों और व्यवसायिक भवनों की रजिस्ट्री करने का अधिकार नगर निगम को होगा। इसके साथ ही अगर सहारा इंडिया हाउसिंग किसी भी शर्तों का उल्लंघन करती है तो इस करार निरस्त करने का अधिकार मुख्य नगर अधिकारी (नगर आयुक्त) को होगा। नगर निगम और सहारा इंडिया हाउसिंग के बीच हुए लगभग 23 साल पहले हुए इस करार के तहत अभी तक न तो कोई मकान, प्लॉट, व्यवसायिक भवन, पार्क, अस्पताल, कम्युनिटी हाल का निर्माण करवाया है और न ही नगर निगम  द्वारा निर्धारित किसी भी शर्त का अनुपालन किया है।

नगर निगम और नगर विकास विभाग के सूत्रों का कहना है कि भले ही सहारा इंडिया हाउसिंग ने करार के तहत किसी भी शर्त का अनुपालन नहीं किया है, लेकिन नगर विकास विभाग और नगर निगम के किसी भी अफसर की हैसियत नहीं है कि उस जमीन के बारे में कोई कार्रवाई कर सके। सहारा ग्रुप के मालिकानों के रिश्ते सरकार से काफी प्रगाढ़ हैं। इसके साथ ही तमाम नेता और नौकरशाह भी सहारा ग्रुप के आगे भीगी बिल्ली बने रहते हैं। ऐसे में गरीबों के साथ हुई धोखाधड़ी पर न्याय मिलने की उम्मीद कम है।

नगर आयुक्त राकेश कुमार सिंह ने इस संबंध में कहा कि उन्हें इस मसले की जानकारी नहीं है, सूचना प्राप्त करने के बाद ही कोई प्रतिक्रिया दी जा सकती है। प्रमुख सचिव नगर विकास पी.वी. पालीवाल ने भी इससे पल्ला झाड़ते हुए कहा कि उन्हें इस मामले की कोई जानकारी नहीं है। सहारा ग्रुप के प्रवक्ता अभिजीत सरकार से सम्पर्क किए जाने पर प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई है।

त्रिनाथ के शर्मा की रिपोर्ट. दिव्‍य संदेश से साभार.

प्रवीण भाई और कस्तूरी जी को इतना विचलित नहीं होना चाहिए

आप मुझे प्रकाश पुरोहित का अंधभक्त कह सकते हैं। मगर प्रवीण खारीवाल और कमल कस्तूरी ने जो लिखा है, उसे पढ़ कर मेरे मन में भी कुछ बातें आई हैं। जब-जब प्रकाश जी ने अपने बेटे सुधांशु को पर्यटन के लिए भेजा, तब-तब मेरे भी मन में सवाल उठे। मगर जो सुधांशु ने रिपोर्टिंग की, उसे पढ़ कर सारे सवाल मिट गए। सुधांशु भले ही प्रकाश जी का बेटा है, मगर लिखता अच्छा है और प्रकाश जी को इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। उनकी प्राथमिकता होती है पठनीय अखबार निकालना। इसके बाद या इसके पहले वे कुछ नहीं जानते।

सुधांशु अगर अच्छा लिख सकता है, तो सुधांशु क्यों नहीं? एक तरह से सुधांशु मुफ्त रिपोर्टिंग करता है। उसी तरह 'सूर्यासन' को हर हफ्ते फिल्म समीक्षा लिखने का कुछ नहीं मिलता। उसके अपने पाठक हैं और अपना नज़रिया है। सो प्रकाश जी के बेटे अगर लिखते हैं, तो प्रभातकिरण का फायदा नहीं उठाते बल्कि प्रभात किरण को फायदा पहुंचाते हैं। रही बात प्रकाश जी के विदेश जाने की, तो यह मैनजमैंट जानता है कि अपनी विदेश यात्राओं का कितना बोझ प्रकाश जी ने मैनेजमेंट पर डाला और कितना खुद उ़ठाया। फिर उनसे बेहतर कौन लिख सकता था? इसलिए उनका जाना कुछ गलत भी नहीं रहा। मैंने तो जब-जब जहाँ-जहाँ जाने की अनुमति चाही, मुझे मिली और पूरे खर्च के साथ मिली। विदेश भी मैं जाता मगर मेरे पास पासपोर्ट नहीं था और अब तक नहीं है।

मैं भी प्रभात किरण का अंग रहा हूँ। अब भी हूँ। प्रभात किरण ने २२ बरसों में शहर की पत्रकारिता को बदला है। उसकी भाषा बदली है। प्रभात किरण सरल हिंदी का हिमायती है। इसलिए उसमें नकली हिंदी नहीं मिलती। मुख्य अभियंता, कनिष्ठ अभियंता जैसी सरकारी हिंदी का प्रभातकिरण ने मजाक उड़ाया है। प्रभात किरण ने हिंदी पत्रकारिता को दिलचस्प और अनौपचारिक भी बनाया है। मेरी अपनी नज़र में प्रभात किरण से दिलचस्प अखबार कोई सा नहीं है, जिसमें खूब सारी समीक्षाएं होती हैं, ताजातरीन लेख होते हैं। बकाया सब अखबार लगभग एक जैसे हैं। जो रचनात्मकता कभी नईदुनिया में थी, वो अब प्रभात किऱण में है। प्रभात किरण में ज़मीनों के दलाल और स्कूल मास्टर आकर पत्रकार हो जाते हैं। मगर शहर में कुछ जगहें ऐसी भी हैं जहाँ जाकर पत्रकार दलाल हो जाते हैं। सत्ता के दलाल…जो रिश्वतें ले लेते हैं और लोगों के काम भी नहीं करते। लोग चक्कर लगाया करते हैं। २२ बरसों में प्रभात किरण पत्रकारों की नर्सरी रहा है। मगर इंदौर एक ऐसा शहर है, जहाँ प्राइमरी स्कूल ही नहीं है।

खैर… मुद्‌दा यह है कि क्या आदिल सईद ने कुछ ग़लत लिखा है? मुझे तो नहीं लगता कि उन्होंने कुछ आपत्तिजनक लिखा है। कोई भी सामान्य आयोजक इस रिपोर्टिंग को पढ़ कर दरगुज़र कर सकता है। मगर चूंकि आयोजक सामान्य लोग न होकर पत्रकार थे, सो उन्हें बात बुरी लग गई। उनका घमंड चोटिल हो गया। हम पत्रकार हैं और कोई हम पर भी उंगली उठा सकता है? ऐसी रिपोर्टिंग प्रभात किरण में ३६५ दिन छपती हैं। पत्रकारिता के सच्चे समर्थक होने के नाते प्रवीण खारीवाल को रोजाना तकलीफ होनी चाहिए कि गलत रिपोर्टिंग हो रही है। मगर उन्होंने विरोध तब किया, जब प्रेस क्लब के आयोजन की वैसी ही रिपोर्टिंग हो गई। आदिल सईद ने जो सवाल उठाए हैं, सब सामान्य सवाल हैं। किसी पर व्यक्तिगत आरोप तो बिल्कुल नहीं लगाए गए हैं। इस लेख का जवाब लिखने में हालांकि प्रवीण खारीवाल और कस्तूरी जी इतनी सावधानी नहीं रख पाए हैं। आदिल सईद पूछ रहे हैं कि पत्रिका क्यों निकाली? मन हो तो जवाब दीजिए वरना मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाइये। आदिल सईद के लेख पर अगर सवाल उठाने ही थे, तो केवल रिपोर्टिंग पर सवाल होने थे। बात प्रज्ञा मिश्रा तक नहीं जानी चाहिए थी। प्रज्ञा मिश्रा को भी प्रभात किरण कोई भुगतान नहीं करता। वे भी केवल इसीलिए छपती हैं कि अच्छा लिखती हैं।

और हां काटजू जी की बात शायद ठीक है, मगर यदि उस पर अमल किया गया तो सोचिए कितने लोग बेरोज़गार हो जाएंगे। आईने में एक आईना और होता है। फिर उस आईने में एक और आईना होता है। देखते चले जाइये आईना दिखता चला जाता है। मेरा सुझाव यह है कि प्रवीण भाई और कस्तूरी जी को इतना विचलित नहीं होना चाहिए। एक अखबार ने यदि कुछ अनचाहा भी लिख दिया, तो लिख दिया होगा। बाकी दस तो तारीफ कर ही रहे हैं। उनकी तारीफ बड़ी है या एक की आलोचना? क्या तारीफ करने वाले सभी संपादकों को भी प्रवीण खारीवाल और कस्तूरी ने इतने ही बड़े-बड़े पत्र लिखे हैं?

दीपक असीम

deepakaseem1@gmail.com


इस मामले की मूल खबर पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें – 22 बरस से अखबार निकाल रहे हैं, आपने कितना समाज सुधार कर लिया?

लोन के विज्ञापन के बहाने जनता को लुटवा रहे हैं अखबार

ऐसा लगता है मानो सरकार ने भोले-भाले जरूरतमंदों को लूटने का लाइसेंस कुछ लोगों को दे दिया है. इस गोरखधंधे में बड़े अखबारों, न्यूज़ चैनलों की भी हिस्सेदारी नज़र आती है. भोले-भाले गरीब इनकी चाल में फंसते जा रहे है. दुःख तो इस बात का है कि इनकी फ़रियाद तक सुनने वाला कोई नहीं है. उल्टा उपदेश दिया जाता है कि जैसा किया है वैसा भोगो… मध्यप्रदेश में ऐसे 'ज्वेलथीफ' अमीर होते जा रहे हैं और जनता गरीब. सरकार मौन है. मीडिया की मिलीभगत के चलते कोई लगाम की सोच भी नहीं सकता.

मध्यप्रदेश के अधिकांश इलाके में कम पढ़े लिखे लोग हैं. यहाँ आदिवासियों की आबादी ज्यादा होने से लूटने वालों के लिए यह इलाका 'प्रोटेंशियल' वाला लगता है. एक तो कम पढ़े- लिखे, उपर से भोले. सो लूट की छूट जारी है. कुछ ताज़ा घटनाओं की तरफ आपका ध्यान लाना जरूरी है-

१- मोबाइल टावर में लूट : नामी न्यूज़ पेपर में विज्ञापन छपता है. अपनी खाली जमीन और खेत में मोबाइल कम्पनियों के टावर लगवाएं. बदले में ७ लाख नगद और परिवार के एक सदस्य की नौकरी पायें. इस विज्ञापन का असर ये हुआ कि लोगों ने अपनी कमाई लूटा दी. टावर लगाने की प्रोसेस की शुरुआत में ही पार्टी से ५ हजार रुपये स्टेट बैंक के खाते में जमा करवा लिए. कुछ दिनों में टावर लगाने वाले रफूचक्कर हो गये. उनके मोबाइल नम्बर बंद हो गये. चूँकि यह सारा खेल मोबाइल पर चल रहा था, इसलिए लोग इन 'नटवरलालों' को कैसे खोजे? यह भी एक समस्या है. पुलिस में सुनवाई नहीं होती. ठगे गये अभी तक भटक रहे हैं.

२- गरीब महिला शकीला लोन से अपनी और अपने दो बच्चों की किस्मत बदलना चाहती थी. वह उजाला फाईनेंस, चंडीगढ़ के फेर में आ गयी. बकौल शकीला, मैंने सोनू वर्मा नाम के व्यक्ति के खाते क्रमांक ३२७२६३५५२३७, जो स्टेट बैंक में है, में पहले ३६००/- फिर २०००/- जमा कराए. लोन १ लाख रुपये का चाहा था, इसलिए सोनू ने फीस के नाम पर ये रकम जमा करा ली. (देखें रसीद) शकीला की आर्थिक स्तिथि ठीक नहीं है. उसका सोच था कि लोन के रुपयों से कुछ काम हो जायेगा किन्तु उसे चपत लग गयी.

३- इन दिनों रकम दुगना करने का फंडा खूब चल रहा है. ५ हजार के १५ दिन में १० हजार बनाने का मन्त्र देकर लूट की दुकानें जम गयी है. पुलिस के पास इनकी खबर लेने की फुर्सत नही है.

दिलीप सिकरवार

09425002916

”पूरे देश के सम्पादक उदय जी तक मेरी पहुंच है, कोई कुछ नहीं कर सकता”

सेवा में, श्रीमान यशवंत जी। सादर नमस्कार। महोदय, मेरा नाम मुश्ताक अहमद है। मैं अमर उजाला के बिल्हौर ब्यूरो कार्यालय में विज्ञापन प्रतिनिधि के रूप में पिछले दो सालों से काम कर रहा हूं। मैं ब्यूरो चीफ श्री सत्येंद्र मिश्रा के साथ मिलकर विज्ञापन और खबरों दोनों का काम करता हूं। पहले मेरे पास अमर उजाला अखबार की एजेंसी थी, जिसके कारण मिश्रा जी के सम्पर्क में आया। मिश्रा जी ने मुझको पत्रकार बनाने के लिए कहा तो मैं उनके साथ घूमने लगा।

साल भर बाद उन्होंने मेरी नियुक्ति विज्ञापन प्रतिनिधि के रूप में करवा दी। जिसमें विज्ञापन का लक्ष्य पूरा होने पर मुझको प्रति महीने तीन हजार रुपए मिलने थे। लेकिन दो साल में न तो कभी लक्ष्य पूरा हुआ और न ही मुझको तीन हजार रुपए मिले। ब्यूरो चीफ को मैं अपनी मोटर साइकिल में पेट्रोल डलवाकर घूमाता रहा। कभी उन्होंने पेट्रोल डलवाने की जरूरत नहीं समझी। शराब पीने के लिए भी हमसे पैसे लिए जाते रहे। बिल्हौर के हर ठीक-ठाक आदमी से सत्येन्द्र ने किसी न किसी बहाने से रुपए उधार ले रखे हैं, मांगने पर टका सा जवाब दिया जाता है। विज्ञापन में मिले कमीशन से भी बंटवारा किया गया। हमने विज्ञापन छापे तो उसके पैसे ब्यूरो चीफ या उनका चेला चपरासी केशव वसूल लाया। वह खुद को क्राइम रिपोर्टर भी बताता है।

विज्ञापन में निकले विज्ञापनदाताओं के फ्रिज, वाशिंग मशीन, कूलर आदि इनाम भी ब्यूरो चीफ हजम कर गया। इधर कई दिनों से ब्यूरो चीफ का आतंक बहुत बढ़ गया तो हमने कानपुर कार्यालय में दो बार शिकायत की। वहां से बराबर कहा जा रहा है कि जांच की जा रही है, तुम्हें न्याय मिलेगा। लेकिन जिस तरह से ब्यूरो चीफ सड़क पर शराब पीकर चिल्लाते घूम रहे हैं कि किसी की औकात नहीं है मुझे अमर उजाला से निकलवाने की। पांच साल से बिल्हौर में हूं सात साल तक और रहूंगा। दिनेश जुयाल दो बार औरैया भेज चुके हैं, औरैया में मेरा घर है, मैं नहीं गया अब किसी की हिम्मत भी नहीं है। पूरे देश के सम्पादक उदय जी तक मेरी पहुंच है, कोई कुछ नहीं कर सकता।

भाई मैं एचआर हेड श्री सतीश द्विवेदी और जीएम साहब श्री भूपेन्दर दुबे को अपना शिकायती पत्र दे चुका हूं। जिसको उन्होंने नोएडा भेजने की बात कही थी। इसके बाद क्या हुआ नहीं पता। इस बीच मैंने कार्यालय जाना बंद कर दिया है, कानपुर से कहा गया है कि तुम अपना काम करते रहो, तुम्हें न्याय मिलेगा। लेकिन जिस तरह जांच लंबी खिंच रही है उससे लग रहा है कि ब्यूरो चीफ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी और मेरा हजारों रुपया डूब जाएगा, नौकरी भी चली जाएगी। अपने एक दोस्त की सलाह पर आपको इस उम्मीद के साथ पत्र लिख रहा हूं कि शायद मेरी बात संस्थान के ऊंचे पदों पर बैठे लोगों तक पहुंचे जिससे सच्चाई सामने आए और मुझे न्याय मिले।

जीएम साहब को दिए गए पत्र को भी साथ में भेज रहा हूं।

मुश्ताक अहमद

बिल्हौर- प्रतिनिधि

मोबाइल नं0- 8859108096, 9919812445 

बोर्ड कॉपी के मूल्‍यांकन का विरोध कर रहे शिक्षकों को पुलिस ने बलपूर्वक खदेड़ा

चंदौली जनपद के मुगलसराय में नगर पालिका इंटर कॉलेज में बनाए बोर्ड परीक्षा मूल्‍यांकन केंद्र पर मूल्‍यांकन का विरोध करते हुए धरना दे रहे वित्‍तविहीन विद्यालयों के शिक्षकों को पुलिस ने बल प्रयोग करते हुए धरना स्‍थल से खदेड़ दिया. पुलिस ने महिला शिक्षकों को भी नहीं बख्‍शा, उसके साथ भी धक्‍का-मुक्‍की और जोर-जबरदस्‍ती की गई. उल्‍लेखनीय है कि प्रदेश भर के वित्‍त विहीन विद्यालयों के शिक्षक अपनी 14 सूत्रीय मांगों को लेकर धरना दे रहे हैं तथा मूल्‍याकंन का विरोध कर रहे हैं.

बताया जा रहा है कि मुगलसराय में भी मूल्‍यांकन केंद्र के बाहर शिक्षक शांतिपूर्ण ढंग से धरना दे रहे थे लेकिन पुलिस ने उन्‍हें बलपूर्वक खदेड़ दिया. शिक्षक उसी कमरे के सामने बैठकर धरना दे रहे थे, जिस कमरे में कॉपियां रखी गई हैं. हालांकि ताला खोलने को लेकर पुलिस और शिक्षकों में नोंकझोंक शुरू हो गई जिसके बाद पुलिस ने बल प्रयोग करते हुए शिक्षकों को जबरदस्‍ती खदेड़ दिया. महिलाओं के साथ भी अभ्रदता की गई. गौरतलब है कि अध्‍यापकों का एक समूह मूल्‍यांकन का विरोध कर रहा है तो दूसरा समूह कॉपी जांचने के लिए तैयार बैठा है.

चंदौली से महेंद्र प्रजापति की रिपोर्ट.

…एक और सानंद की आस में प्रदूषण से लदी आदि गंगा गोमती

जौनपुर। आदि गंगा कही जाने वाली गोमती नदी को यदि जनपद की जीवन रेखा कहा जाय तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहां के भूभाग को संमृद्ध बनाने और सांस्कृतिक गौरव दिलाने में इस आदि गंगा गोमती की अहम भूमिका रही है, जिसके कारण जनपद में विकास और हरियाली की गंगा बहने लगी। लेकिन मौजूदा परिवेश में जहां राष्ट्रीय नदी घोषित गंगा हमारेपाप धोते-धोते आज अपने वजूद को बचाने में संघर्षरत है तो कमोवेश वही हाल गंगा की छोटी बहन गोमती का भी हुआ जा रहा है। गंगा के अस्तित्व को बचाने को लेकर जहां संत समाज उद्वेलित है तो वहीं गोमती आज भी स्वामी सानंद जैसा पुत्र ढूंढ रही है।

पीलीभीत के माधोटाण्डा से उदगमित यह आदि गंगा लगभग 900 किमी का सफर तय कर वाराणसी के पास सैदपुर में गंगा से मिलकर अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को समर्पित कर देती है। अपने इस सफर में गोमती का 138 किमी लम्बा व्यापक स्वरूप जौनपुर में देखने को मिलता है, जहां यह जनपद को दो बराबर भागों में विभाजित करती है। लेकिन दुखद है कि गोमती संकट प्राचीन समय में जिस गोमती के निर्मल जल को लोग पीते थे। कालान्तर में बढ़ती जनसंख्या के कारण लोगों के शौचालय व दैनिक उपयोग का गन्दा जल सरकारी व्यवस्था के अन्तर्गत नदी में बहाया जाने लगा।

औद्योगिक युग की शुरुआत होते ही कारखानों का रासायनिक तथा हानिकारक जल भी गोमती में छोड़ा जाने लगा, जिसका परिणाम यह हुआ कि गोमती जल की निर्मलता प्रदूषित व विषैली होने लगी है, जिसके कारण जल में दुर्गन्ध व गन्दगी के कारण हाथ मुंह धोने लायक भी नहीं बचा है। लेकिन इस तथ्य की ओर प्रशासन, नगर पालिका, जल निगम व प्रदूषण विभाग का ध्यान नहीं जाता है।

जौनपुर से राजेश मौर्य की रिपोर्ट. 

ग्रामीण अभियंत्रण विभाग में 1400 करोड़ का घोटाला, पर नहीं हो रही कार्रवाई

समाजिक कार्यकर्ता डा. नूतन ठाकुर ने ग्रामीण अभियंत्रण विभाग, यूपी में लगभग 1401.37 करोड रुपये सरकारी धन के अपव्यय के संबंध में वर्ष 2007-12 की अवधि में सभी स्थापित मापकों, मानकों, नियमों का मनमर्जी से खुला उल्लंघन करने, ज्यादातर मामलों में टेंडर (निविदा) की स्थापित प्रक्रियाओं तथा नियमों का खुला उल्लंघन होने और भौतिक सत्यापन में कैग द्वारा कई सारी कमियां, खामियां और अनियमितताएं दिखने के बारे में थाना गोमतीनगर में एफआईआर दिया. एफआईआर दर्ज नहीं होने पर उन्‍होंने एसएसपी लखनऊ को प्रार्थनापत्र दिया.

एसएसपी के यहां से भी कोई कार्रवाई नहीं होने पर उन्‍होंने सीजेएम कोर्ट में वाद दायर किया था. सीजेएम ने प्रस्तुत प्रार्थनापत्र को कैग रिपोर्ट पर आधारित होने और अधीनस्थ न्यायालयों को कैग रिपोर्ट के आधार पर मुक़दमा दर्ज करने का अधिकार नहीं होने के आधार पर यह याचिका खारिज कर दिया. कोर्ट के अनुसार कैग रिपोर्ट पर कार्यवाही करने का अधिकार केन्द्र और राज्य सरकार को ही है.

इसके बाद डा. नूतन ठाकुर ने श्री पी एन श्रीवास्तव, अपर सत्र न्यायाधीश, लखनऊ के सामने पुनरीक्षण याचिका दायर किया. अपर सत्र न्यायाधीश अब ने आदेशित किया है कि प्रार्थनापत्र के अनुसार ग्रामीण अभियंत्रण विभाग में 1401.37 करोड रुपये का घोटाला हुआ दिखता है, अतः इसकी तफ्तीश आर्थिक अनुसन्धान शाखा (ईओडब्ल्यू), उत्तर प्रदेश द्वारा की जानी चाहिए. लेकिन चूँकि उन्हें ईओडब्ल्यू को विवेचना करने के आदेश देने का अधिकार नहीं है, अतः इस सम्बन्ध में कोई आदेश पारित नहीं किया जा रहा है.

इस प्रकार थाने से लेकर अपर सत्र न्यायाधीश तक सभी मान रहे हैं कि रु० 1401.37 करोड का घोटाला हुआ है, पर पिछले चार महीने में किसी स्तर पर एफआईआर अथवा अग्रिम कार्यवाही नहीं हुई है. अब डा. नूतन ठाकुर इस प्रकरण को लेकर हाई कोर्ट जाने की तैयारी कर रही हैं. उनका कहना है कि जब कोई इस घोटाले से इनकार नहीं कर रहा है तो फिर कोई कार्रवाई क्‍यों नहीं की जा रही है.

अमेरिकी वेबसाइट का दावा – महिलाओं के साथ नग्‍न सोते थे महात्‍मा गांधी

नयी दिल्‍ली। भारत के राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी जिन्‍हें पूरा देश व कई अन्‍य देशों के लोग अहिंसा के पुजारी एवं आध्‍यात्‍मिक गुरु के रूप में पूजते हैं, उनके बारे में एक वेबसाइट ने दावा किया है कि वो महिलाओं के साथ नंगे सोते और नंगे नहाते थे। दावा करने वाली अमेरिकी वेबसाइट का नाम www.cracked.com/ है।

इस अमेरिकी वेबसाइट ने महात्‍मा गांधी, बेंजामिन फ्रैंकलिन, विंस्‍टन चर्चिल और चार्ली चैपलिन सहित छह महान लोगों को विकृत मानसिकता वाला व्‍यक्ति बताया है। वेबसाइट ने इन महान लोगों के सकारात्‍मक पक्ष को बताने के साथ ही साथ उनके व्‍यक्तिगत जीवन के कुछ कथित काले अध्‍याय को भी पेश किया है। वेबसाइट का दावा है कि उसने सभी महापुरुषों के बारे में पड़ताल करने के बाद ये तथ्‍य खोजे हैं। वेबसाइट ने अपने लेख की हेडिंग 'विकृत मानसिकता वाले छह प्रसिद्ध प्रतिभाशाली व्यक्ति' दी है। इस लेख में सबसे चौकाने वाली बात महात्‍मा गांधी के बारे में लिखे गये तथ्‍य हैं।

उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी के सेक्स-जीवन को केंद्र बनाकर लिखी गई किताब 'गांधीः नैक्ड ऐंबिशन' में एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री के हवाले से कहा गया है कि गांधी नग्न होकर लड़कियों और महिलाओं के साथ सोते ही नहीं थे बल्कि उनके साथ बाथरूम में नग्न स्नान भी करते थे। राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी असामान्य सेक्स बी-हैवियर वाले अर्द्ध-दमित सेक्स मैनियॉक थे। ब्रिटिश इतिहासकार जैड ऐडम्स ने पंद्रह साल के अध्ययन और शोध के बाद 'गांधीः नैक्ड ऐंबिशन' को किताब का रूप दिया है।

किताब की शुरुआत ही गांधी की उस स्वीकारोक्ति से हुई है जिसमें गांधी ख़ुद लिखा या कहा करते थे कि उनके अंदर सेक्स-ऑब्सेशन का बीजारोपण किशोरावस्था में हुआ और वह बहुत कामुक हो गए थे। 13 साल की उम्र में 12 साल की कस्तूरबा से विवाह होने के बाद गांधी अक्सर बेडरूम में होते थे। यहां तक कि उनके पिता कर्मचंद उर्फ कबा गांधी जब मृत्यु-शैया पर पड़े मौत से जूझ रहे थे, उस समय किशोर मोहनदास पत्नी कस्तूरबा के साथ अपने बेडरूम में सेक्स का आनंद ले रहे थे। गांधी की सहयोगी सुशीला नायर गांधी के साथ निर्वस्त्र होकर सोती थीं और उनके साथ निर्वस्त्र होकर नहाती भी थीं। किताब में गांधी के ही वक्तव्य को उद्धरित किया गया है। मसलन इस बारे में गांधी ने ख़ुद लिखा है, ''नहाते समय जब सुशीला निर्वस्त्र मेरे सामने होती हैं तो मेरी आंखें कसकर बंद हो जाती हैं, मुझे कुछ भी नज़र नहीं आता, मुझे बस केवल साबुन लगाने की आहट सुनाई देती है''।

इस बार अमेरिकी वेबसाइट ने महात्मा गांधी, बेंजामिन फ्रैंकलिन, विंस्टन चर्चिल और चार्ली चैपलिन समेत छह महान लोगों को विकृत मानसिकता वाला व्यक्ति बताया है। वेबसाइट ने अपने एक लेख 'विकृत मानसिकता वाले छह प्रसिद्ध प्रतिभाशाली व्यक्ति' (6 Famous Geniuses You Won't Believe Were Perverts) में इन सभी महान लोगों के सकारात्‍मक पक्ष को बताने के साथ-साथ उनके व्यक्तिगत जीवन के कुछ स्याह पहलुओं को पेश किया है।

लेख के अनुसार, भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने में गांधी की अहम भूमिका रही है और वह निर्विवादित रूप से एक प्रसिद्ध आध्यात्मिक नेता हैं। यह भी सत्य है कि 37 साल की उम्र तक उन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया। हालांकि बाद में वह युवतियों के साथ सोने लगे और यह सिलसिला 70 साल की उम्र तक जारी रहा। लेख कहता है, गांधी जी का मानना था कि युवतियों के साथ सोना ब्रह्मचर्य के विस्तार का अगला चरण है। वह इससे खुद को नियंत्रित करने का अभ्यास करते हैं। लेख के मुताबिक, गांधी आश्रम के कड़े नियम कायदों के अनुसार उन युवतियों को अपने पति के साथ सोने की इजाजत नहीं थी। वे गांधी की सभाओं में शामिल होती थीं। वे युवतियां न केवल गांधी के साथ नग्नावस्‍था में सोती थीं बल्कि उनके साथ नहाती भी थीं। इतना ही नहीं, वे उनके सामने ही अपने एक-एक कपड़े उतारती थीं क्योंकि मोह माया से मुक्त जीवन का रास्‍ता यहीं से जाता है।

लेख के मुताबिक, गांधी अपने 18 साल की नातिन को बंगाल की यात्रा पर साथ ले गए। उन्होंने पूरे बंगाल यात्रा के दौरान उसे नग्न होकर साथ सोने को कहा। उन्होंने तब नातिन से कहा था कि बंगाल के कुछ क्रोधित मुसलमान उन दोनों की हत्या कर सकते हैं। यह सत्य है, गांधी ने अपनी एक भतीजी को नग्न होकर अपने साथ सोने के लिए कहा ‌था क्योंकि उस समय उन्होंने दोनों की अचानक हत्या की आशंका जताई थी।

लेख के अनुसार, 'हम यह नहीं कहते कि व‌ह छिप कर हर रात नंगी युवतियों के साथ सोते थे, हमें इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। हमारा यह कहना है कि गांधी का युवतियों के साथ नग्न होकर सोने का मकसद सेक्स करना नहीं था ‌बल्कि यह एक प्रकार की विकृति थी।

बेंजामिन फ्रैंकलिन– वेबसाइट आगे लिखती है कि बेंजामिन फ्रैंकलिन अमेरिका के निर्माणकर्ताओं में से एक व्यक्ति थे। लेख के अनुसार, 1745 में एक सहयोगी को लिखे पत्र में फ्रैंकलिन ने सुझाव दिया था कि उम्रदराज महिलाओं को पत्नी बनाना एक अच्छी पसंद है क्योंकि वे बढ़ती उम्र के कारण स्वयं को चाहने वाले पुरूष को खोना नहीं चाहती हैं। उनका मानना था कि उम्रदराज महिलाएं बुद्धिमान और अनुभवी होती हैं साथ ही वह गर्भवती होने में कम ही रूचि लेती हैं। उनकी यह बात बच्चों के झमेले से दूर रखता है।

विंस्टन चर्चिल– लेख के अनुसार, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल निर्विवादित रूप से इतिहास के प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेताओं में से एक थे। लेकिन नंगे होकर घूमना च‌र्चिल की सबसे खराब आदत थी। उनका व्यक्तिगत स्टाफ ही नहीं बल्कि फ्रैं‌कलिन डी रूजवेल्ट और उनके बेटे इलियट भी इसके गवाह रहे हैं। एक बार इलियट जब उनसे मिलने गए थे तब चर्चिल नंगे होकर सिगार पीते हुए अपनी महिला सचिव को एक पत्र लिखा रहे थे।

चार्ली चैपलिन– यह बेवसाइट मूक फिल्मों के हास्य कलाकार चार्ली चैपलिन के बारे में लिखती है कि उन्होंने हर उस सिंगल महिला के साथ सेक्स करने की कोशिश की थी जो पहली बार उनसे मिली थी और उनसे उसका पहले कोई संबंध नहीं रहा हो। वह अपने सह कला‌कार फैटी अर्बुकल के साथ भोग विलास वाली पार्टियां आयोजित किए थे। कथित तौर पर चैपलिन ने ही प‌हली बार कास्टिंग काउच की शुरुआत की थी।

लॉर्ड विरॉन– यूरोप के स्वच्छंदतावाद आंदोलन के अग्रणी लोगों में लॉर्ड विरॉन का भी नाम आता ‌है। लेख में कहा गया है कि उनमें अपनी सौतेली बहन के साथ-साथ दुनिया के किसी भी व्यक्ति के साथ सेक्स करने की प्रवृत्ति थी।


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गांधीजी की सेक्स लाइफ

साधना से मुकेश कुमार का इस्‍तीफा, लोकमत में अमित का प्रमोशन

साधना न्‍यूज से खबर है कि प्रबंधन ने मुकेश कुमार से इस्‍तीफा मांग लिया है. वे प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत थे. मुकेश पर अनुशासनहीनता का आरोप था. बताया जा रहा है कि मुकेश चैनल में अक्‍सर अन्‍य सहकर्मियों के बात-बात में लड़ाई-झगड़ा करते थे. न्‍यूज रूम में भी तेज आवाज में बात करने की शिकायतें थीं. इसके पहले भी ऐसी ही शिकायतों को लेकर मुकेश कुमार को प्रबंधन ने निलंबित कर दिया था. इसके बावजूद जब उनके व्‍यवहार में कोई बदलाव नहीं आया तो मैनेजमेंट ने उनसे इस्‍तीफा मांग लिया.

लोकमत, लखनऊ से खबर है कि अमित त्रिपाठी को प्रमोट करके सीनियर सब एडिटर बना दिया गया है. अमित अखबार की लांचिंग के समय से ही कार्यरत हैं. तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद लोकमत से जुड़े रहने का ईनाम उन्‍हें मिला है. अमित पिछले तेरह सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

शेखपुरा के पत्रकार करेंगे भाजपा की खबरों का बहिष्‍कार

श्रमजीवी पत्रकार यूनियन ने एक आपातकालीन बैठक शेखपुरा जिला भाजपा के खबर के बहिष्कार का निर्णय लिया है। यह भाजपा जिला अध्यक्ष के खिलाफ न्यूज छापने पर प्रभात खबर के पत्रकार  निरंजन कुमार को हटाने के विरोध में किया गया। नगर विकास मंत्री प्रेम कुमार से मीडिया ने पूछा था कि कई मामले के आरोपी तथा वारंटी जिलाध्यक्ष संजीत प्रभाकर किस तरह उनके साथ हैं तथा मंच पर स्पीच देने के साथ मंत्री जी के साथ वाहन में बैठे थे।

परन्‍तु मंत्री प्रेम कुमार ने यह कह बात को टाल दिया था कि मुझे जानकारी नहीं है और बीच रास्ते में ही उसे अपने वाहन से उतार दिया था। इसी बात को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने प्रमुखता से चलाया था और कई अखबार के पत्रकारों ने भी इस खबर को छपने के लिए भेजा था, लेकिन किसी करणवश प्रभात खबर के अलावा किसी भी अखबार ने इस खबर को प्रकाशित नहीं किया। इसी बात को लेकर संजीत प्रभाकर ने नवादा सांसद भोला सिंह से पैरवी करवा कर प्रभात खबर के रिपोर्टर निरंजन कुमार को अखबार से बाहर निकलावा दिया। इसी कारण बैठक में बहिष्‍कार का निर्णय लिया गया है। साथ ही एक डेलिगेशन सम्पादक से मुलाक़ात कर उन्‍हें सही तथ्यों से अवगत कराएगा।

रंगरेलिया मना रहे हिंदुस्‍तान के पत्रकार को नागरिकों ने पीटा, नाली में डाला

कुछ पत्रकारों की हरकत पूरे समूह को शर्मसार कर देती है, ऐसा ही एक वाकया लगभग एक सप्‍ताह पहले देवरिया जिले के बरहज में हुआ है. हिंदुस्‍तान अखबार के क्षेत्रीय पत्रकार संतोष उपाध्‍याय को रंगरेलिया मनाना भारी पड़ गया. स्‍थानीय लोगों ने उन्‍हें जमकर मारने पीटने के बाद नाली में डूबोया, चेहरे पर गंदगी तक मल दी. सूचना पर पहुंची पुलिस ने उन्‍हें लोगों के चंगुल से बाहर निकाला. इस घटना के बाद से हिंदुस्‍तान की जमकर थू-थू हो रही है. 

जानकारी के अनुसार हिंदुस्‍तान के लिए बरहज में काम करने वाले पत्रकार संतोष उपाध्‍याय का बरहज के जयनगर मुहल्‍ले में स्थित सोनकर ब‍स्‍ती के एक महिला से चक्‍कर चल रहा है. संतोष अक्‍सर उसके घर आया जाया करते थे. दो सालों से यह क्रम चल रहा था. कई बार स्‍थानीय लोगों ने उनको ऐसी हरकत करने से रोक था, परन्‍तु पत्रकार होने के रौब में संतोष सबको हड़का देते थे. बीते 19 अप्रैल की रात एक बार फिर रंगरेलिया मनाने सं‍तोष अपनी महिला मित्र के घर पहुंचे.

मुहल्‍ले की बदनामी से नाराज स्‍थानीय लोग भी संतोष के भीतर जाने के बाद महिला के घर के सामने इकट्ठे हो गए. संतोष को महिला के साथ आपत्तिजनक हालत में देखकर स्‍थानीय लोगों ने आपा खो दिया तथा उनकी जमकर पिटाई की गई. इतना ही नहीं उन्‍हें नाली में भी गिराकर मारा गया. किसी ने एक पत्रकार को पीटे जाने की सूचना पुलिस को दी. मौके पर पहुंची पुलिस ने किसी तरह आक्रोशित भीड़ के हाथों पीट रहे संतोष को बचाकर बाहर निकाला. इसके बाद से ही बरहज में पत्रकार शर्मसार हैं.

हालांकि इस संबंध में संतोष उपाध्‍याय का कहना है कि उन्‍हें गलत तरीके से बदनाम किया जा रहा है. दो पट्टीदारों की लड़ाई के बीच वे फंस गए हैं. वे एक परिवार को पैसे देने गए थे तो दूसरे परिवार ने कुछ लोगों के उकसाने पर उनके साथ मारपीट की. रंगरेलियां जैसे आरोप बिल्‍कुल गलत और निराधार हैं.

उत्तराखंड में अवैध निर्माण पर राज्यपाल और मुख्यमंत्री को पत्र

To, Hon’ble Governor of Uttarakhand, Governor House , Dehradun/Nainital, Chief Minister of Uttarakhand, Dehradun, Uttarakhand :Subject: Construction is being done in the river bed of Saru River, from Saru Pul to PWD Tirha Bageshwar, Uttarakhand appears prima facie illegal construction that can destroy the river bed that is not allowed as per (M.C. Mehta v. Kamal Nath, WP 182/1996 (2002.03.15) (Beas River Case: Imposition of Exemplary Damages)

Sir, I would like to draw your kind attention towards a serious issue regarding destruction of river bed due to construction on river saru, Bageshwar, from Saru Pul to PWD Tirha. The construction on river bed appears prima facie illegal (as per photo attached with petition) or without taking any permission from District administration. This is matter of investigation from District Administration whether this construction is going on with proper permission or without permission at once in order to save the river bed of Saru River and prevent more encroachment on river bed if it is illegal or encroachment.
 
As per the famous verdict of (M.C. Mehta v. Kamal Nath, WP 182/1996 (2002.03.15) (Beas River Case: Imposition of Exemplary Damages) nobody allows to encroach river bed in India. The verdict concludes,  “The Motel shall not encroach/cover/utilise any part of the river basin. The boundary wall shall separate the Motel building from the river basin. The river bank and the river basin shall be left open for the public use. 6. The Motel shall not discharge untreated effluents into the river. We direct the Himachal Pradesh Pollution Control Board to inspect the pollution control devices/treatment plants set up by the Motel. If the effluent/waste discharged by the Motel is not conforming to the prescribed standards, action in accordance with law be taken against the Motel. 7. The Himachal Pradesh Pollution Control Board shall not permit the discharge of untreated effluent into river Beas. The Board shall inspect all the hotels/institutions/factories in Kullu-Manali area and in case any of them are discharging untreated effluent/waste into the river, the Board shall take action in accordance with law.”
 
We may request you to give direction to District Administration to investigate this matter and all other similar matter where river bed is encroached or destroyed without taking any permission from appropriate authority. If the above activity is found illegal after the investigation, we may further request to take stern action against the authority responsible such an illegal act openly in Bageshwar District and set an example to punish them under the rules. Nobody whether belongs to higher stature of society, is allowed to destroy the natural resources and pollute the river of our country. It is our moral and constitutional duty to save river and its bed and stop all pollutant discharge in the river.
I do hope you may look into this matter seriously as soon as possible and save the river saru.
 
Thanking you,
 
 Ramesh Kumar ‘Mumukshu’
RTI Activist & Chairman
Parvatiya Lokvikas Samiti

शरद तिवारी बने दबंग दुनिया के मार्केटिंग हेड

शरद तिवारी ने दबंग दुनिया, इंदौर के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍होंने अखबार में मार्केटिंग हेड के पद पर ज्‍वाइन किया है. प्रबंधन उन्‍हें अनिल धूपर के जाने के बाद खाली पड़े पद पर ज्‍वाइन कराया है. उल्‍लेखनीय है कि मार्केटिंग हेड कम सलाहकार के पद पर कार्यरत रहे अनिल धूपर ने पिछले दिनों इस्‍तीफा दे दिया था. शरद तिवारी दबंग दुनिया के मार्केटिंग तथा विज्ञापन की जिम्‍मेदारी संभालेंगे. वे इसके पहले दैनिक भास्‍कर तथा नवभारत के साथ लंबे समय तक कार्यरत रहे हैं.

भास्‍कर से इस्‍तीफा देकर अमर उजाला, मेरठ पहुंचे गिरिजेश, पंकज का तबादला

दैनिक भास्‍कर, रांची से खबर है कि गिरिजेश मिश्रा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर चीफ रिपोर्टर के पद पर कार्यरत थे तथा सिटी इंचार्ज की जिम्‍मेदारी निभा रहे थे. गिरिजेश ने अपनी नई पारी मेरठ में अमर उजाला के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां भी चीफ रिपोर्टर के पद पर लाया गया है.

सूत्रों का कहना है कि वे मेरठ में पहले पेज की जिम्‍मेदारी संभालेंगे. बताया जा रहा है कि गिरिजेश का इस्‍तीफा भास्‍कर के लिए बड़ा झटका है. अमर उजाला के स्‍थानीय संपादक राजीव सिंह एवं एनई नवीन गुप्‍ता लंबे समय तक भास्‍कर में रहे हैं लिहाजा संभावना जताई जा रही है कि भास्‍कर को कई और बड़े झटके लग सकते हैं.

अमर उजाला, गाजियाबाद से खबर है कि पंकज वत्‍स का तबादला मेरठ के लिए कर दिया गया है. पंकज सीनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. उन्‍हें मेरठ में सिटी टीम को मजबूत करने के लिए लाया गया है. राजीव सिंह के नेतृत्‍व में लांच हुए माई सिटी ने मेरठ में अन्‍य अखबारों को कड़ी टक्‍कर दी है. इसलिए सिटी टीम को मजबूत करने के लिए पंकज को मेरठ भेजा गया है.

दबंग दुनिया से पंकज मुकाती का इस्‍तीफा, महेश लिलोरिया बने नए संपादक

इंदौर से प्रकाशित दबंग दुनिया से खबर है कि समूह संपादक पंकज मुकाती ने इस्‍तीफा दे दिया है. पंकज प्रबंधन के अनाश्‍वयक दबाव और अनप्रोफेशनल रवैये से खुश नहीं थे. काफी समय से उनके इस्‍तीफा दिए जाने की खबरें आ रही थीं. पंकज मुकाती की जगह महेश लिलोरिया ने संपादक के रूप में दबंग दुनिया ज्‍वाइन किया है. महेश लिलोरिया संदेश से इस्‍तीफा देकर दबंग दुनिया पहुंचे हैं. इसके पहले वे दैनिक भास्‍कर में भी रह चुके हैं.

पहले चर्चा थी कि पिछले दिनों दैनिक भास्‍कर से इस्‍तीफा देने वाले कमलेश सिंह दबंग दुनिया के संपादक बनने वाले हैं, लेकिन उन्‍होंने पहले ही ऐसी किसी संभावना से इनकार कर दिया था. सूत्रों का कहना है कि दबंग दुनिया के मालिक किशोर वाधवानी ने कमलेश सिंह को अखबार से जोड़ कर इसे ब्रांड बनाने के लिए काफी जुगत लगाई परन्‍तु अखबार में मौजूद परिस्थितियों के चलते  कमलेश सिंह ने इनकार कर दिया. कमलेश सिंह अब एक मई को इंडिया टुडे ग्रुप ज्‍वाइन करेंगे. इधर, पंकज मुकाती के अमर उजाला में वापसी किए जाने की खबरें आ रही हैं. हालांकि यह पूरी तरह पुष्‍ट नहीं है. दूसरी सूचना है कि पंकज बीबीसी हिंदी के साथ भी जा सकते हैं. इसके लिए बीबीसी में उनकी एक दौर का इंटरव्‍यू हो जाने की खबर है. अगर सब कुछ ठीक रहा तो पंकज मुकाती जून में बीबीसी हिंदी के साथ जुड़ सकते हैं.

वरिष्‍ठ महिला पत्रकार जय चंदीराम को लाइफटाइम अचीवमेंट

नई दिल्ली : दूरदर्शन की पूर्व उपमहानिदेशक और जानी मानी मीडियाकर्मी जय चंदीराम को इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ वूमन इन रेडियो एंड टेलीविजन (आईएडब्ल्यूआरटी) ने लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया।

जय चंदीराम को यहां उनके भाई के निवास पर यह पुरस्कार प्रदान किया गया। वह कैंसर से पीड़ित हैं। महिला अधिकारियों के लिए अपने योगदान से जाने जानी वाली जय चंदीराम आईएडब्ल्यूआरटी की पहली एशियाई अध्यक्ष रह चुकी हैं। वह कई अहम पदों पर रह चुकी हैं। (एजेंसी)

हमले के बाद वेंटिलेटर पर सरबजीत सिंह, हालत अत्‍यंत गंभीर

इस्लामाबाद। पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में 22 सालों से बंद भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह पर जानलेवा हमला हुआ है। कैदियों के हमले में सरबजीत के सिर में गंभीर चोटें आईं हैं। जेल अधिकारियों ने सरबजीत को लाहौर के जिन्ना अस्पताल में भर्ती कराया है जहां उसकी हालत गंभीर बनी हुई है। सरबजीत को वेंटिलेटर पर रखा गया है। उसकी हालत कोमा जैसी है। डॉक्टरों के मुताबिक सरबजीत के लिए अगले 24 घंटे बेहद अहम हैं।

सरबजीत पर हमले की खबर से पंजाब के तरनतारन में रह रहे उनके परिवार को लोग बेहत चिंतित हैं। सरबजीत की रिहाई के लिए वर्षों से मुहिम चला रही उनकी बहन दलबीर कौर ने हमले के पीछे साजिश की आशंका जताई है। उनका आरोप है कि जानबूझकर सरबजीत पर हमला करवाया गया है। लाहौर की कोट लखपत जेल में बंद सरबजीत सिंह पर जेल के ही दो कैदियों ने हमला किया। कैदियों ने सरबजीत पर ईंटों और ब्लेड से हमला किया और उसकी जमकर पिटाई की। इस हमले में सरबजीत के सिर में गंभीर चोटें आईं।

सरबजीत पर जेल में यह हमला उस वक्त हुआ जब कैदियों को एक घंटे के ब्रेक के लिए बंदी कोठरी से बाहर लाया गया था। जेल अधिकारियों ने सरबजीत को गंभीर हालत में लाहौर के जिन्ना अस्पताल में आईसीयू में भर्ती कराया, जहां उसे वेंटिलेटर पर रखा गया है। सरबजीत की हालत इतनी गंभीर है कि अस्पताल में उसकी सर्जरी की तैयारी चल रही है। लेकिन खून ज्यादा बहने की वजह से डॉक्टर फिलहाल सर्जरी नहीं कर पा रहे। अगले 24 घंटे सरबजीत के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं।

भारत में मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब तथा संसद पर आतंकी हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी की सजा के बाद से ही कोट लखपत जेल में सरबजीत की सुरक्षा बढ़ा दी गई थी। लेकिन इसके बावजूद सरबजीत पर ये हमला हो गया। भारत ने इस हमले को गंभीरता से लेते हुए पाकिस्‍तान से नाराजगी जताई है। पाकिस्तान में भारतीय उच्चायोग ने अपने दो अधिकारियों को सरबजीत का हाल जानने के लिए मौके पर भेजा है। भारत ने पाकिस्तान से कहा है कि सरबजीत को हर संभव इलाज दिया जाए और उसकी हर संभव मदद की जाए।

आजम चचा के अपमान से खफा अखिलेश नहीं देंगे हार्वड में लेक्चर

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राज्य के नगर विकास मंत्री आजम खान के साथ अमेरिका के एयरपोर्ट पर सुरक्षा अधिकारियों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार से आहत हो कर हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अपने लेक्चर का बहिष्कार कर दिया। अखिलेश को शुक्रवार देर रात हार्वर्ड विश्वविद्यालय में इलाहाबाद महाकुंभ मेले के सफल आयोजन के विषय पर लेक्चर देना था। लेकिन आजम के साथ हुए दुर्व्यवहार से नाराज होकर उन्होंने यह फैसला किया।

माना जा रहा है कि उन्होंने अपने पिता मुलायम सिंह यादव के साथ फोन पर हुई बातचीत के बाद यह फैसला लिया। इस बीच, राज्य के मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने अखिलेश और आजम की जगह विश्वविद्यालय के साउथ एशिया इंस्टीट्यूट द्वारा आयोजित परिचर्चा 'हार्वर्ड विदाउट बॉर्डर : मैपिंग द कुंभ मेला' में हिस्सा लिया। एसएआई ने अपनी वेबसाइट पर शुक्रवार को लिखा, कि आकस्मिक घटना की वजह से आज अखिलेश और आजम की जगह पैनल के प्रवक्ता जावेद उस्मानी होंगे।

वेबसाइट में हांलाकि, इस आकस्मिक फैसले का संबंध बोस्टन के लोगान अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे पर बुधवार को हुई घटना से नहीं दर्शाया गया है। गौरतलब है कि आजम ने गुरुवार को यह आरोप लगाया था कि उनके मुसलमान होने की वजह से अमेरिकी हवाईअड्डे पर उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया जिसके बाद एसपी ने संसद में शुक्रवार को इस मुद्दे को उठाया और केंद्र सरकार ने इस व्यवहार पर अमेरिकी सरकार से कड़ी नाराजगी जताई। (आईबीएन)

शारदा मीडिया के पूर्व सीईओ कुणाल घोष राज्‍यसभा से इस्‍तीफा देने को तैयार

कोलकाता : तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य तथा शारदा मीडिया समूह के पूर्व ग्रुप सीईओ कुणाल घोष ने आज कहा कि चिटफंड घोटाले में यदि उनके खिलाफ आरोप साबित हो जाते हैं तो वह राज्यसभा से इस्तीफा देने को तैयार हैं। शारदा ग्रुप के अध्यक्ष सुदीप्त सेन ने सीबीआई को पत्र लिखकर घोष के खिलाफ आरोप लगाया है।

पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी को लिखे छह पन्नों के पत्र में घोष ने कहा, ‘मैं किसी भी जांच का सामना करने और सहयोग करने को तैयार हूं। मैं शारदा के धन की बाजार गतिविधियों से नहीं जुड़ा हूं। यदि जांच में घोटाले में मेरी संलिप्तता उजागर हो जाती है तो मैं राज्यसभा सदस्य के रूप में इस्तीफा देने को तैयार हूं।’ उन्होंने कहा कि तृणमूल में शामिल होने से पहले वह शारदा ग्रुप की मीडिया इकाई से जुड़े थे।

उन्होंने कहा, ‘मैं सितंबर, 2010 में शारदा मीडिया ग्रुप से जुड़ा और मार्च 2012 में तृणमूल सदस्य तथा सांसद बना।’ तृणमूल कांग्रेस सांसद डेरेक ओ ब्रायन के अनुसार घोष ने कहा, ‘यदि नेता कहती हैं तो वह इस्तीफा दे देंगे।’ इससे पहले घोष, सुदीप्त सेन और छह अन्य के खिलाफ चिटफंड कंपनी द्वारा संचालित टेलीविजन चैनल के कर्मचारियों को वेतन का भुगतान नहीं करने को लेकर एक प्राथमिकी दर्ज की गई।

संयुक्त पुलिस आयुक्त (अपराध) पल्लब कांति घोष ने बताया कि यह प्राथमिकी पार्क स्ट्रीट थाने में चैनल 10 के 21 कर्मचारियों ने यह कहते हुए दर्ज कराई कि कंपनी ने न तो उनके वेतन का भुगतान किया है और न ही उसने भविष्य निधि में उनका बकाया जमा किया है। यह पूछे जाने पर कि क्या सांसद को गिरफ्तार किया जाएगा तो घोष ने कहा, ‘हमने जांच शुरू कर दी है। जांच के लिए जिस चीज की भी आवश्यकता होगी, वह की जाएगी।’

तृणमूल सांसद कुणाल घोष ने अपनी तरफ से कहा कि वह सिर्फ कर्मचारी थे जिन पर चैनल की संपादकीय सामग्री की जिम्मेदारी थी। उन्होंने कहा, ‘मैं किसी भी जांच का सामना करने को तैयार हूं।’ शारदा मीडिया ग्रुप के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी कुणाल घोष ने कहा, ‘मैं मालिक नहीं था। वित्त और लेखा विभाग मेरे पास नहीं थे। मेरे पास चैक पर हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं था। मेरी छवि को धूमिल करने के प्रयास किए जा रहे हैं।’ उन्होंने बताया कि शारदा समूह के अध्यक्ष सुदीप्त सेन चैनल 10 के मालिक हैं। (एजेंसी)

”पेड न्यूज का काम भी स्थानीय संपादक उन्हीं के जरिए करवाता है”

अखबारों की रीढ़ होते हैं रिमोट एरिया में काम करने वाले स्ट्रिंगर। यही वे खबरें लाते हैं जिनके बूते एक अखबार स्थापित होता है। यह आज से नहीं वरन् जब से हिंदी अखबारों ने सांस्थानिक रूप लिया तब से ही है। स्वर्गीय गणेश शंकर विद्यार्थी जी अपने प्रताप में सबसे अधिक ध्यान इन्हीं स्ट्रिंगर्स का ही रखते थे और प्रताप इन स्ट्रिंगर्स की खबरों के बूते ही धूम मचाए थे। खासकर तमाम रजवाड़ों में तो प्रताप पर प्रतिबंध था।

आज भी अखबार इन्हीं स्ट्रिंगर्स के दम पर ही फलते फूलते हैं। मैं जहां-जहां संपादक रहा मेरी वरीयता में स्ट्रिंगर्स का मानदेय बढ़ाना पहला काम रहा। दूसरे हर जाति के लोगों को अपनी सूची में रखा। मैंने दलित, मुसलमान और यादवों को खूब बढ़ावा दिया ताकि वे अपने समाज की ज्यादा से ज्यादा खबरें दे सकें और अखबार एलीट क्लास की पाकेट से निकल सकें। मैंने उनके मानदेय बढ़ाए ताकि वे अपने काम का एक सम्मानजनक पैसा पा सकें। पर मैंने पाया कि वे बेचारे पीडि़त ही रहे। वजह संपादक सब जगह तो ध्यान नहीं दे पाता। स्ट्रिंगर्स एक तरफ तो अपनी-अपनी डेस्क के प्रभारी से पीडि़त रहते हैं।

प्रभारी उन्हें हुक्म देता है कि जब भी अपने यहां से आओ वहां की कुछ मशहूर चीज लेकर आओ और कभी भी उन्हें इसके बदले में पैसा नहीं दिया जाता। और अगर मुख्यालय का स्ट्रिंगर हुआ तो उसे चीफ रिपोर्टर तंग करता रहता है। हर जोखिम के काम में स्ट्रिंगर को लगाएगा और जहां कुछ मिलने के आसार हुए खुद जाएगा। उसके बाद स्थानीय संपादक अपने काम करवाएगा, अपनी पत्नी की जरूरतों का सामान मंगवाएगा, पेड न्यूज का काम भी स्थानीय संपादक उन्हीं के जरिए करवाता है। और जरा भी हीला हवाली की तो सबसे पहले स्ट्रिंगर को हटाएगा। हिंदी पत्रकारिता की इस सड़ांध को दूर करने के लिए भी कोई एजेंसी होनी चाहिए।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के एफबी वॉल से साभार.

1 मई से ‘शगुन’ चैनल पर उठा पाएंगे शादियों का लुत्‍फ

नई दिल्ली : नोएडा स्थित वरटैंट मीडिया ने पहला मैट्रीमोनियल टीवी चैनल ‘शगुन’ लॉन्च किया है। प्रबंध निदेशक अनुरंजन झा, चेयरमैन चक्रधर धौंढियाल समेत रिचा सोनी, उत्कर्ष नाइक जैसे टेलीविजन सेलेब्रिटी शगुन चैनल के लॉन्च और प्रोमो के अवसर पर उपस्थित थे। शगुन चैनल 24×7 मैट्रीमोनियल टीवी चैनल है। झा ने इसके शो और चैनल की अवधारणा के बारे में विस्तार से बताया। इसे वीडियोकॉन जैसे डीटीएच प्लेटफॉर्मो के जरिये दिखाया जाएगा। लोग 1 मई से टेलीविजन पर शो का लुत्फ उठा सकेंगे।

अनुरंजन झा ने कहा, ‘भारत में शादियों को ध्यान में रखते हुए भारत का पहला मैट्रीमोनियल टीवी चैनल ‘शगुन’ शादी की पूरी नई अवधारणा के साथ आगे आया है। यह चैनल शादी, ज्योतिष, संबंध, खरीदारी से संबद्ध ‘तो बात पक्की’, ‘गोल्ड एंड ब्यूटीफुल’, ‘जनम जनम का साथ’, ‘कुंडली बोले’, ‘जिंदगी शादी से पहले शादी के बाद’ आदि जैसे शो प्रस्तुत करेगा।’

‘तो बात पक्की’ और ‘जिंदगी शादी से पहले शादी के बाद’ जैसे प्राइम टाइम शो को टीवी कलाकार मानिनी मिश्रा, रिचा सोनी और आरजे प्रियांक दुबे द्वारा होस्ट किया जा रहा है।

वरटैंट मीडिया के चेयरमैन चक्रधर धौंढियाल ने कहा, ‘जब झा ने मेरे साथ इस मुद्दे पर विचार किया तो मैंने इस परियोजना पर आगे बढ़ने का तुरंत फैसला ले लिया। मैं भारत के पहले मैट्रीमोनियल टीवी चैनल के लॉन्च की घोशषा कर बेहद उत्साहित हूं। मुझे भरोसा है कि शगुन चैनल दर्शकों को एक श्रेष्‍ठ एवं संपूर्ण अनुभव मुहैया कराएगा। यह चैनल ताजा कंटेंट से परिपूर्ण है और दर्शक आने वाले दिनों में उत्सुकता के साथ इसे देखेंगे।’

चैनल के अलावा, शगुन की मैट्रीमोनियल वेबसाइट भी शुरू की गई है। वेबसाइट आपके लिए एक उपयुक्त जीवनसाथी की तलाश और शादी की योजना के लिए भी वन स्टॉप डेस्टिनेशन है। यह उन सभी दुल्हनों और दूल्हों के लिए एक उपयुक्त अवसर और मंच है जो न सिर्फ शादी का सपना पूरा करना चाहते हैं बल्कि अपने विवाह को राष्‍ट्रीय टीवी चैनल पर प्रसारित होते भी देखना चाहते हैं। शगुन चैनल शुरू में डीटीएच प्लेटफॉर्म वीडियोकॉन पर लांच किया जाएगा और फिर बाद में इसे अन्य डीटीएच कंपनियों द्वारा भी दिखाया जाएगा। केबल प्लेटफॉर्म पर यह 15 शहरों में उपलब्ध होगा जिनमें दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, चंडीगढ़, अहमदाबाद और जयपुर प्रमुख रूप से शामिल हैं।

यह नया चैनल आपकी शादी के अनुभव को अनोखे तरीके से यादगार बनाए जाने के मकसद से शुरू किया गया है। इसलिए अपने टेलीविजन को ऑन कर दीजिए और शगुन चैनल के साथ श्रेष्‍ठ मैट्रीमोनी के लिए तैयार रहिए।

अजित वडनेरकर ने अमर उजाला ज्‍वाइन किया, बनेंगे बनारस के संपादक

: निशीथ जोशी जाएंगे नोएडा : पिछले दिनों दैनिक भास्‍कर समूह के अखबार दिव्‍य भास्‍कर के एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर पद से इस्‍तीफा देने वाले वरिष्‍ठ पत्रकार अजित वडनेरकर ने अमर उजाला ज्‍वाइन कर लिया है. उन्‍हें बनारस यूनिट का संपादक बनाया जा रहा है. खबर है कि वे एक मई को बनारस में स्‍थानीय संपादक के रूप में अपना पदभार ग्रहण कर लेंगे. लगभग तीन दशक से प्रिंट और इलेक्‍ट्रानिक दोनों माध्‍यमों पर जबर्दस्‍त पकड़ रखने वाले वडनेरकर हिंदी पत्रकारिता के जाने माने नाम हैं.

सन 1985 में नवभारत टाइम्‍स से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अजित वडनेरकर दस सालों तक इस अखबार के साथ जोधपुर, जयपुर समेत कई जगहों पर कार्यरत रहे. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद ये जी न्‍यूज की शुरुआती टीम का हिस्‍सा बने. आज तक, स्‍टार न्‍यूज, दूरदर्शन होते हुए सन 2000 में दैनिक भास्‍कर के साथ जुड़ गए. तीन साल भास्‍कर में रहने के दौरान इन्‍होंने राजस्‍थान, मध्‍य प्रदेश समेत कई राज्‍यों में अखबार को अपनी सेवाएं दीं. इसके बाद 2003 में ये स्‍टार न्‍यूज के साथ जुड़े. स्‍टार न्‍यूज के लिए कई राज्‍यों में रिपोर्टिंग की. 2005 में दुबारा दैनिक भास्‍कर से जुड़े. इस्‍तीफा देने से पहले इस समूह के मराठी अखबार दिव्‍य भास्‍कर में कार्यकारी संपादक (महाराष्‍ट्र) के रूप में कार्यरत थे.

हिंदी, मराठी, अंग्रेजी भाषा पर अच्‍छी पकड़ रखने वाले अजित वडनेरकर की पहचान पत्रकारिता से अलग उनके द्वारा लिखे गए 'शब्‍दों के सफर' से बनी है. हिंदी भाषा में शब्‍दों को लेकर लिखे गए इस किताब के दो खंड प्रकाशित हो चुके हैं. .  इसका तीसरा भाग भी जल्‍द ही राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित होने वाला है. मूल रूप से मध्‍य प्रदेश के रहने वाले अजित वडनेरकर मध्‍य प्रदेश, यूपी, उत्‍तराखंड, राजस्‍थान, पंजाब, महाराष्‍ट्र जैसे राज्‍यों में पत्रकारिता करते हुए यहां की आबोहवा से अच्‍छी तरह परिचित हैं. अजित वडनेरकर मुखर पत्रकार हैं और फेसबुक पर भी सक्रिय रहते हैं.

इधर, बनारस में अब तक स्‍थानीय संपादक की भूमिका निभा रहे निशीथ जोशी को नोएडा बुलाया जा रहा है. संभावना जताई जा रही है कि अजित वडनेरकर के ज्‍वाइन करने के बाद निशीथ जोशी नोएडा यूनिट में ज्‍वाइन करेंगे. डा. तीरविजय सिंह के हिंदुस्‍तान से जुड़ने के बाद निशीथ जोशी को बनारस का संपादक बनाकर भेजा गया था.

पत्रकार के होटल में देह व्‍यापार करवाने वाले रैकेट की सरगना अरेस्‍ट

ज्वालामुखी के बहुचर्चित देह व्यापार कांड की मुख्य आरोपी शालू उर्फ सरला को पुलिस ने पकड़ने में सफलता हासिल कर ली है। जिससे इस नापाक धंधे को यहां पर अंजाम देने वाले लोगों के जल्द ही चेहरे बेनकाब होने की संभावना नजर आने लगी है। गौरतलब है कि दो दिन पहले पुलिस ने थाना प्रभारी ज्वालामुखी सुरेन्द्र ठाकुर के नेतृत्‍व में शहर के एक निजी होटल में रेड मार कर चार युवतियों व एक व्यक्ति को हिरासत में लिया था।

गौरतलब है कि पंकज होटल का मालिक पंजाब के फगवाड़ा इलाके का नामी गिरामी शख्स है, जो भारतीय जनता पार्टी का नेता है। उसने ज्वालामुखी में गैरकानूनी तरीके से हिमाचल में अपने बेटे के नाम होटल खरीदा। उसका बेटा जालंधर से छपने वाले एक अखबार का पत्रकार है। यही वजह है कि आज तक पुलिस इस पर हाथ नहीं डाल सकी। पुलिस ने होटल के मालिक व मैनेजर को पार्टी बनाकर अदालत में पेश किया था, जहां पर उन्हें दो दिन के रिमांड के बाद जमानत मिल गयी थी, परंतु पुलिस इस मामले की मुख्य आरोपी व उसके सहयोगियों की तलाश में थी, ताकि इस गोरखधंधे को क्षेत्र से जड़ मूल नाश कर दिया जाये।

थाना प्रभारी सुरेन्द्र ठाकुर ने कहा कि इस मामले की सरगना शालू उर्फ सरला ने धर्मशाला की अदालत में जमानत के लिये आवेदन किया था। वहां पर उसकी जमानत खारिज होने के बाद पुलिस ने उसे धर्मशाला में ही हिरासत में ले लिया है। थाना प्रभारी सुरेन्द्र ठाकुर ने कहा कि अनैतिक देह व्यापार अधिनियम की उप धारा 3, 4, 5, 7, 8 तहत आरोपियों को हिरासत में लिया गया है। मुख्य सरगना सरला उर्फ शालू के सहयोगियों मोक्ष व जोनी, जो पठानकोट के बताये जा रहे हैं, को पुलिस हिरासत में लेने के लिये रवाना हो गयी है। उन्होंने कहा कि इस गिरोह के तार चंडीगढ़-लुधियाना-पठानकोट व अन्य बड़े शहरों से जुड़े होने की आशंका लग रही है।

इस संदर्भ में डीएसपी देहरा बीडी भाटिया का कहना है कि पुलिस इस मामले की तह तक जायेगी तथा इस धंधे के पीछे कौन लोग जिम्मेवार है उन सब के विरूद्ध  कार्यवाही की जायेगी। पुलिस सूत्रों से पता चला है कि मुख्य आरोपी ने क्षेत्र में चल रहे इस धंधे में उसको सहयोग करने वाले कुछ लोगों के नाम भी सार्वजनिक किये है। अब देखना है कि पुलिस इस मामले में क्या करती है फिलहाल पुलिस इस मामले में किसी भी जांच पड़ताल से पीछे नहीं रहेगी और तह तक जायेगी ताकि क्षेत्र में इस प्रकार के धंधे से क्षेत्र की छवि को व आने वाली पीढ़ी को बचाया जा सके। स्थानीय विधायक संजय रतन ने भी निर्देश दिये है कि शहर की पवित्रता मर्यादा को बचाने के लिये इस प्रकार के अनैतिक कार्य समाज में नहीं होने चाहिये। प्रशासन इस प्रकार के कार्यों को जड़ से उखाड़ कर लोगों को राहत प्रदान करे।

ज्वालामुखी से विजयेन्दर शर्मा की रिपोर्ट.

चीन ने आखिरकार यह घुसपैठ क्‍यों की है?

चीन गज़ब का पैंतरेबाज मुल्क है| एक ओर वह भव्य और गरिमामय महाशक्ति का आचरण करते हुए दिखाई देना चाहता है और दूसरी ओर वह ओछी छेड़खनियों से बाज नहीं आता| अभी 15 अप्रैल को उसकी फौज ने सीमांत के दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में घुसकर अपने तंबू खड़े कर दिए हैं| वे ​नियंत्रण-रेखा के पार भारतीय सीमा में 10 किमी तक अंदर घुस आए हैं| लगभग ऐसा ही उन्होंने जून 1986 में सोमदोरोंग चू में किया था| वहां से उन्होंने 1995 में अपने आप वापसी करके भारत को प्रसन्न कर दिया था|

वास्तव में भारत-चीन सीमा चार हजार कि.मी. से भी ज्यादा लंबी है| उसमें जंगल, पहाड़, झरने नदियां, झीलें तथा अनेक अबूझ क्षेत्र हैं| यह पता ही नहीं चलता कि कौनसी जगह चीनी है और कौनसी भारतीय? नियंत्रण-रेखा भी अनेक स्थानों पर अंदाज से ही जानी और मानी जाती है| ऐसी स्थिति में दोनों ओर से नियत्रंण-रेखा का उल्लंघन आसानी से होता रहता है| जान-बूझकर भी होता ही होगा लेकिन अक्सर दूसरे पक्ष को आपत्ति होने पर पहला पक्ष अपनी जगह वापस लौट जाता है लेकिन इस बार चीनी फौज पिछले 10-12 दिनों से भारतीय सीमा क्षेत्र में ऐसे जम गई है, जैसे कि वह सोमदोरोंग चू में जम गई थी| दो बार दोनों पक्षों के अफसरों की बैठक भी हो गई है लेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला| चीनी सरकार के प्रवक्ता का कहना है कि उन्होंने नियंत्रण-रेखा का कहीं कोई उल्लंघन नहीं किया है| उनके तंबू उनकी सीमा में लगाए गए हैं| उन्हें हटाने का प्रश्न ही नहीं उठता|

चीनी फौज या सरकार के प्रवक्ता यह बताने की स्थिति में नहीं है कि आखिर यह घुसपैठ उन्होंने क्यों की है? यह घुसपैठ बड़े नाजुक वक्त में की गई है| हमारे रक्षा मंत्री ए के एंटनी की चीन-यात्रा और चीनी प्रधानमंत्री सी केकियांग की भारत-यात्रा की तैयारियां जोरों से चल रही हैं| यदि घुसपैठ का यह मामला तूल पकड़ ले तो दोनों यात्राएं रद्द हो सकती हैं और दोनों देशों के बीच मनमुटाव हो सकता है| चीन को इसी वक्त ऐसी क्या आ पड़ी थी कि उसने यह उत्तेजक कार्रवाई कर डाली?

चीनी फौज यों तो चीनी कम्युनिष्ट पार्टी के नियंत्रण में रहती है| वह पाकिस्तानी फौज की तरह पूर्ण स्वायत्त नहीं है लेकिन फिर भी वह भारतीय फौज की तरह आज्ञाकारी भी नहीं है| चीनी फौज शायद अपने नए प्रधानमंत्री को चीनी कूटनीति का पुराना पैतरा सिखाना चाहती है याने किसी पराए देश के साथ दोस्ती जरूर बघारिए लेकिन उसके गले मिलते वक्त उसकी चिकौटी जरुर काट लीजिए| उसे बता दीजिए कि आपके मुंह में राम है लेकिन बगल में छुरी भी है| चीनी प्रधानमंत्री की भारत-यात्रा के पहले फेंके गए इस पासे से तय हो जाएगा कि भारत को चीन की कितनी गर्ज है? अगर भारत को गर्ज है तो वह इस बदसलूकी को भी बर्दाश्त कर लेगा|

चीनी फौज का दूसरा मंतव्य अपने नये और अपेक्षाकृत युवा प्रधानमंत्री को यह संकेत देना भी हो सकता है कि पड़ोसियों के साथ बहुत नरमी से पेश आना भी ठीक नहीं है| चीनी नेतृत्व साम्यवादी है लेकिन चीनी फौज तो उग्र राष्ट्रवादी है| उसने भारत से ही नहीं, अपने लगभग दर्जन भर पड़ोसी देशों से पंजे भिड़ा रखे हैं| जापान, वियतनाम, फिलीपींस, ताइवान, कोरिया, मलेशिया, रुस आदि कौनसा ऐसा देश है, जिससे उसका सीमा-विवाद नहीं है? सिर्फ दो देशों से उसके सीमा विवाद सुलझे हुए हैं पाकिस्तान और बर्मा! क्योंकि ये भारत के पड़ोसी हैं|

यह ठीक है कि चीन साम्यवादी देश होते हुए भी तंग श्याओ फिंग के नेतृत्व में एक महाजन राष्ट्र बन गया है और महाजनों का ध्यान पैसा बनाने में लगा होता है| वे लड़ाई-झगड़ों में विश्वास नहीं करते लेकिन चीनी फौज महाजन नहीं है| उसने जितने लंबे युद्ध लड़े हैं, दुनिया की किसी फौज ने भी नहीं लड़े हैं| फौज की नीति की उपेक्षा करना चीनी नेताओं के बस की बात नहीं है| चीनी फौज और चीनी कूटनीति का चोली-दामन का साथ है| इसीलिए हम देखते हैं कि जब 2006 में चीनी राष्ट्रपति हू जिनताओ भारत आए तो उसके पहले चीनी राजदूत ने कह दिया कि सारा अरुणाचाल प्रदेश ही चीन का है| इसी प्रकार 2010 में प्रधानमंत्री विन च्या पाओ की भारत-यात्र के पहले चीन ने वीज़ा-विवाद खड़ा कर दिया था| भारत के कश्मीरी नागरिकों को उनके पासपोर्ट पर नहीं, अलग कागज़ पर वीज़ा दिया जाने लगा था| यह विवाद भी बाद में चीन ने स्वत: हल कर लिया|

इस तरह से अचानक विवाद खड़े करना और उन्हें सुलझाने के प्रपंच को क्या कहा जाए? यह किसी सोची समझी नीति के अन्तर्गत किया जाता है या यह सब प्रशासनिक अराजकता का परिणाम है? इसे प्रशासनिक अराजकता तो हम तब कह सकते थे जबकि चीन की केंद्रीय सरकार या फौज के प्रवक्ता इन मामलों से अपनी अनभिज्ञता प्रकट करते| वे तो उल्टे इन अटपटे कदमों का पेइचिंग से समर्थन करते हैं| अभी-अभी पेइचिंग ने कहा है कि दौलत बेग ओल्डी में चीन ने तंबू इसलिए गाड़े हैं कि भारत ने पूर्वी लद्दाख के विवादित क्षेत्र् में सीमेंट-कांक्रीट के स्थायी बंकर बना लिये हैं| हटें तो दोनों साथ हटें|

इसमें शक नहीं है कि इन तात्कालिक उत्तेजनाओं को विस्फोटक रुप देना उचित नहीं है लेकिन भारत को जरुरत से ज्यादा नरमी दिखाने की भी जरुरत नहीं है| यदि आज चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है तो गर्ज उसकी भी है और कम नहीं है| भारत से ज्यादा सस्ता कच्चा लोहा उसे और कहां से मिल सकता है? चीन को यह भी समझना चाहिए कि भारत कितना जिम्मेदार देश है कि वह अमेरिका की चीन-विरोधी किलेबंदी में शामिल नहीं हो रहा है| अफगानिस्तान से अगले साल अमेरिका की वापसी के बाद की स्थिति पर आखिर भारत चीन से बात क्यों कर रहा है? एशिया की राजनीति में चीन को भारत उचित महत्व दे रहा है| ऐसी स्थिति में चीन भारत के साथ गरिमापूर्ण बर्ताव करने में बार-बार क्यों चूक जाता है? डर यही है कि भारत-चीन संबंधों के सहज विकास पर ये छोटी-मोटी चिकौटियां कभी भारी न पड़ जाएं| चीन एक स्वयंसिद्ध महाशक्ति है और एक महान सभ्यता का संवाहक राष्ट्र है| तुच्छ पैंतरेबाजियां उसे शोभा नहीं देतीं|

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्‍ठ पत्रकार तथा स्‍तंभकार हैं.

हिंदुस्‍तान की सफलता के बाद अमर उजाला ने सालिड बेस्‍ट प्‍लांट को बनाया मुद्दा

पिछले कुछ वर्षों से पत्रकारिता की रेल भटक हुई सी नज़र आ रही है, जो आश्चर्य की बात इसलिए है कि रेल का निश्चित मार्ग होता है, फिर भी भटक जाये, तो बड़ी बात होनी ही चाहिए। अधिकांश तौर पर पत्रकारों के बीच इस बात का कंपटीशन होने लगा है कि अमुक तीन वर्ष में करोड़पति हो गया है, तो मैं दो वर्ष में ही बन कर दिखाऊँगा। अमुक को शराब फ्री मिलती है, पर मैं इतनी दहशत बैठाऊंगा कि मेरे घर पहुंचाने आयेगा। अमुक को पुलिस गाड़ी मुहैया करा रही है, तो मुझे तेल भर कर देनी होगी, ऐसे कंपटीशन पिछले कुछ दिनों से आम तौर पर दिख रहे हैं, लेकिन बहुत दिनों बाद बदायूं में हिंदुस्तान और अमर उजाला के बीच जनहित में कंपटीशन होता नज़र आ रहा है।

पिछले दिनों हिंदुस्तान ने ओवर ब्रिज को लेकर अभियान चलाया, जिससे सांसद धर्मेंद्र यादव पर इतना दबाव बना कि सार्वजनिक सभा में हिंदुस्तान का नाम लेकर उन्हें ओवर ब्रिज के निर्माण कराने की घोषणा करनी पड़ी। मंजूरी के बाद धन भी आ गया है, जिससे जनता को बड़ा लाभ होगा। इस मुद्दे से हिंदुस्तान की पाठकों के बीच गिरी साख भी सुधरी है। सर्कुलेशन भी बढ़ा है, तो अमर उजाला को भी यह आइडिया पसंद आ गया।

अब अमर उजाला बदायूं में सालिड बेस्ट प्लांट की स्थापना के लिए अभियान चला रहा है। अगर, वह सफल रहा, तो निश्चित ही जनता को लाभ होगा, इसी तरह अधिकारियों और कांग्रेसियों की चमचागीरी छोड़ दैनिक जागरण भी सीवर लाइन का मुद्दा पकड़ ले, तो जनता को एक बड़ी समस्या से निजात मिल सकती है। लोकसभा चुनाव को लेकर सांसद पर दबाव है, जिसका लाभ जनता को दिलाया जा सकता है, पर डर है कि मुद्दों को बेच न दिया जाये।

बीपी गौतम की रिपोर्ट.

आखिर यह हमारा कैसा चेहरा है?

मैं पाँच वर्षीय बेटी का पिता, एक अच्छी पत्नी का पति और बचपन में माँ की गोद से वंचित इसी समाज का एक पुरुष हूँ जो आम आदमी की भाँति बेचैन है। डरा सहमा अपने समाज के नित नए चेहरे और कारनामों को देखकर डरता रहता है। सहमता रहता है। अपनी बिटिया की सुरक्षा के साथ गुजरते दिनों की दरिन्दगी, बहशीपन और अमानवता से परेशान हूँ। कभी समाचार पत्रों और खबरों के चैनलों के एक कोने में सिमटी यह भयावह खबरें आज समाचार पत्रों की मुख्य पृष्ठ और चैनलों की ब्रेक्रिंग समाचार बन रही हैं।

अपहरण, बलात्कार, बलात्कार का प्रयास और बलात्कार के पश्चात हैवानियत ने सब को परेशान और हैरान कर दिया है। अब तो दरिन्दगी और हैवानियत के लिऐ प्रतिस्पर्धा का दौर चल रहा है कि कौन कितना हैवानियत और क्रूरता करता है और इस क्रूरता और दरिंदगी में हमने अबोध और फरिश्‍ते समान नादान को भी नहीं बख्शा है। आखिर यह हमारा कौन सा चेहरा है? और यह दरिंदगी कहां जा कर रूकेगी? इसका जिम्मेवार कौन है? सरकार, कानून, पुलिस या फिर हमारा समाज?

निस्संदेह यह भारत में हो रहे क्रांतिकारी बदलाव से पूर्व की उथलपुथल है और परिवर्तन के पूर्व का हलचल और कोलाहल है। आर्थिक उन्नति और विकास के साथ समाज, व्यवस्था ही नहीं अर्थात हम सब वर्तमान परिस्थिति के लिए जिम्मेवार हैं और सभी को अपनी भूल स्वीकारनी चाहिऐ। संसद में रोने से, संवदेना प्रकट करने और भावुक होने से! व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश व्यक्त करने से समस्याओं का समाधन नहीं निकलने वाला। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सत्यता को स्वीकार करना चाहिऐ। सरकार, समाज और मीडिया का रोल निष्ठावन और कर्तव्‍य के पालन करने वाला होना चाहिऐ। साथ ही साथ इन्हें गंभीरता ओर परिपक्वता अब दिखनी चाहिए।

सरकार ने भविष्य के दूरगामी योजनाओं पर समझारों, जानकारों और पढ़े लिखों की टीम नहीं बनाई। शोध का विस्तार सभी स्तरों पर नहीं हुआ। सरकार ने प्रगति के सभी मार्गों पर संतुलन बनाने का काम नहीं किया। अगर कुछ कदम उठाऐ भी गऐ तो पक्षपात और भेदभाव ने संवेदना और प्रतिभाओं को पीछे छोड़ दिया। देश और समाज उफंच-नीच, असमानताओं के भँवर में फंसता गया। अमीरी और गरीबी में खाई बढ़ती गई। अमीर और अमीर और गरीब और गरीब होते गऐ। कम होते रोजगार, रोजगार के लिऐ पलायन, पेट पालने के लिए परिवार और अपनों से जुदा होने मानसिक तनाव। बदलते परिवेश में एक वर्ग विशेष के रहन सहन ओर पहनावा ने दूसरे वर्ग में कुंठा को जन्म दिया है। साथ ही साथ हमारे राजनीति दलों का रवैया। पुलिस और नौकरशाही की कम होती जिम्मेवादी और बढ़ते भ्रष्टाचार की ओर कदम ने हमें आज इस मुकाम तक पहुंचा दिया है।

महिलाओं, बच्चों और कमजोरों पर हो रहे अत्याचार का यह कोई पहला और आखरी वारदात नहीं है। कभी इसका अनुपात बढ़ता और कभी घटता दिखाई पड़ता है। कहीं इसके विरोध में अधिक आवाज तो कहीं अनेकों ओर से आवाज सुनाई पड़ती है। कहीं इस प्रकार के बर्बरता की कोई सुध लेने वाला नहीं और संसाधन और पिछड़ा इलाका होने, मीडिया और स्वयंसेवकों की कमी में दर्द की आवाज मंद मंद की गुहार लगाता लगाता शांत हो जाता है।

दिल्ली में दो दर्द मिले! यूं तो प्रतिदिन और प्रति घण्टा मिलने वाला यह दर्द दुखद और असहनीय है। कोई दर्द अधिक विचलित कर देने वाला है तो कोई मन को कष्ट देने वाला होता है। मगर इस कष्ट की घड़ी में पुलिस और व्यवस्था की ओर से बेरूखी और अध्कि असंतोष पैदा करने वाला और अपनी व्यवस्था और सरकार के उपर से भरोसा उठाने वाला है। दुख और विलाप के इस क्षण में मरहम के बदले बेइंतहाई दुख के इस घाव को और गहरा कर देता है। तब संसद, न्यायालय, राजनीति दलों और पुलिस की ओर से किया गया हर वादा धोखा लगने लगता है और इसी जख्म को न सहते हुए पिछली घटनाओं पर रिपोर्ट सौंपने वाले पूर्व न्यायाधीश इस जालिम समाज और व्यवस्था के सामने हार मान लेते हैं। वह जालिमों से जिस सजा की उम्मीद ओर आशा लगाए बैठे थे। शायद उन्हें अब उसमें उन्हें जरा भी विश्वास नहीं रहा और वह निराश होकर दुनिया छोड़ गये।

मैंने कभी अपने माँ के ममता की आँचल का सुख नहीं भोगा। उनकी पालने वाली गोद में मिट्ठी नींद का मजा तक नहीं लिया। उनके कलेजे से चिपट कर माँ की ओर से प्राकृति स्पर्श का एहसास नहीं महसूस किया। वही एहसास जो पांच वर्षीय फरीश्‍ता को सीने से चिपटा कर उस कामकाजी परिवार को होता होगा। आज जीवन के लिऐ संघर्ष कर रही नन्हीं आखिर किसी समाज वर्ग अथवा क्षेत्र वालों का क्या बिगाड़ा था? हवस और शराब की दरिन्दगी ने उसे इतना अंधा न किया होता और अपनों की भाँति, अपनों की तरह उस परी को बाप की तरह, भाई की तरह मानव की तरह अपने सीने से लगाया होता। राक्षस तुम्हें और तुम्हारे मन को एक ऐसा एहसास और कभी न भुलाने वाला सुख देता। जो तुम्हारे आत्मा और शरीर को पाप का नहीं शुद्धी का मरहम देता।

कठिन फैसले और कठोर कदम तो उठाने ही होंगे। कानून बनाने से लेकर कानून का पालन। कानून का दुरुपयोग! पुलिस और न्यायालय का रोल भी सामने रखना होगा। पिछली घटनाओं के बाद जो कदम उठाने चाहिऐ थे। वह नहीं उठाऐ गऐ। आलोचनाओं से डर कर, घबराकर सरकार ने एक कदम आगे बढ़ा कर दो कदम पीछे हट गई। आलोचकों और विरोध उत्पन्न करने वालों के साथ विपक्ष का रवैया भी मौजूदा परिस्थति को जन्म देने में सहायक और घटना को पुनरावृत्ति करने से न रोकने वाला रहा। पिछली घटना के बाद महिलाओं के लिए आन्दोलन, महिलाओं के हक में आवाज बुलंद करने, महिलाओं के नाम पर व्यापार चलाने। महिलाओं की रक्षा करने पर हवा बनाने का प्रयास ही हुआ। महिला बैकिंग, महिलाओं के लिऐ सुरक्षित राजधनी और समस्त देश कम से कम अभी तो नहीं दिखाई पड़ता। जब मैं लेख लिख रहा हूं। मेरे मन में एक चिंता और डर है कि मेरी बेटी के स्कूल जाने और घर लौटने पर, बस के चालक और सहचालक के नीयत पर। उसके स्कूल के कर्मचारियों और वापस घर की चौखट से पहले कालोनी में बैठे लोगों और उनकी गतिविधियों पर नजरें जमाऐ है। मैं तो कम से कम बेखौफ देश की राजधनी में नहीं हूँ। जैसे देश के प्रधनमंत्री, दिल्ली की मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के घर में भी पुत्री हैं और पहली घटना पर उन्होंने भी अपना डर हमें बता दिया था। अब भय और सभ्य समाज के नवनिर्माण की जिम्मेवादी और गारन्टी आखिर कौन लेगा?

लेखक फखरे आलम पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. इनसे संपर्क मोबाइल नम्‍बर 9910921624 के जरिए किया जा सकता है. 

वह अपनी उम्र के लड़कों के साथ सेक्स करना चाहती है, न कि बड़े उम्र के मर्दों के साथ

आज 26 अप्रेल, 2013 को मैं अपने परिचत के यहॉं पर बैठा था। कुछ पल के लिये मैं वहॉं पर अकेला हुआ तो एक लड़की मेरे पास आयी। मुझ से नमस्ते किया। पूछा ‘‘सर क्या आप डॉक्टर हैं?’’ मैंने कहा ‘‘हॉं’’, वह बोली ‘‘सर मेरी बीमारी का इलाज करें। मैं बहुत परेशान हूँ।’’

इतने में वे महाशय जिनके यहॉं पर मैं गया था, प्रकट हो गये। मैंने उनसे पूछा कि ‘‘ये बच्ची किसकी है? ये बच्ची अपनी किसी बीमारी के बारे में बात कर रही है। इसे क्या तकलीफ है?’’ इस पर उन्होंने बताया कि ‘‘पड़ोस के मकान में रहने वाले किरायेदार की बेटी है, लेकिन मुझे नहीं पता इसे क्या तकलीफ है……।’’

इतना कहने के बाद वे उस लड़की की ओर मुखातिब होकर बोले, ‘‘क्यों बेटी तुम्हें क्या तकलीफ है, तुम्हारे पापा को बुला लाओ डॉक्टर साहब को दिखा देंगे।’’ इस पर लड़की ने कहा, ‘‘नहीं अंकल नहीं, कोई बात नहीं….!’’ लड़की के चेहरे के हावभाव देखकर मुझे कुछ संशय हुआ तो मैंने अपने मित्र से इशारे में अन्दर जाने को कहा।

उनके जाते ही लड़की बोली, ‘‘डॉक्टर साहब आपने तो मरवाया होता, अंकल से बोलने की क्या जरूरत थी। मेरी ऐसी व्यक्तिगत समस्या है, जिसके बारे में, मैं मेरे पापा और इन अंकल के सामने आपको कुछ नहीं बता सकती। यदि आप मेरा इलाज कर सकते हैं और मेरी तकलीफ के बारे में किसी को कुछ नहीं बतलायें तो मैं आपका बतलाऊं, नहीं तो रहने दो…।’’

लड़की की बात सुनकर मुझे चिन्ता हुई कि लड़की कहीं कोई मुसीबत में तो नहीं है, सो मैंने उसे विश्‍वास दिलाया और अपनी समस्या बताने को कहा, लेकिन जो कुछ उसने बताया, वह एक सदमें से कम नहीं था। विशेषकर इसलिये कि लड़की की शक्ल-ओ-सूरत देखकर कोई सोच भी नहीं सकता कि वह लड़की किसी से ऐसी बात कह सकती है।

लड़की का वजन मुश्किल से 30-35 किलो, लम्बाई करीब पौने पांच फिट, रंग एकदम गौरा, बदन बहुत पतला, नाक-नक्श औसत से अच्छे और दिखने में बेहद कमजोर और कक्षा आठ की छात्रा है। लड़की ने अपनी समस्या के बारे में जो कुछ बतलाया, उसका सार संक्षेप इस प्रकार है-

सर मैं हैल्दी होना चाहती हूँ। मैं 14 साल की हो गयी, लेकिन अभी भी मैं बच्ची जैसी दिखती हूँ, जबकि मेरे साथ पढने वाली दूसरी लड़कियॉं अच्छी-खासी दिखती हैं। आगे से मुझसे कोई बात ही नहीं करता। जब मैं किसी लड़के से बात करती हूँ तो वो मुझे बच्ची समझकर इगनोर-अनदेखा कर देता है और उम्र में मुझसे छोटी और काले रंग की दूसरी हैल्दी लड़कियों में इंट्रेस्ट लेने लगता है।

सर मैं चाहती हूँ कि मेरे स्तन इतने बड़े-बड़े हों जायें कि कोई भी लड़का देखते ही मेरी ओर झट से आकर्षित हो जाये। मैंने उसे कहा कि वह सच में ही अभी बच्ची ही तो है और 14 वर्ष की उम्र में तुम खुद को इतनी बड़ी क्यों समझती हो?

इस पर उसने बताया कि उसके स्कूल की 12 साल से 14 साल तक की तकरीबन सभी लड़कियॉं अपनी-अपनी कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों या अपने पड़ोस के किसी न किसी लड़के से सेक्स करती हैं। सबके अनेक बॉय फ्रेंड हैं। कुछ तो अपने टीचर या किसी रिश्तेदार के साथ ही सेक्स करती हैं। उसने बताया कि उसके भी दो-तीन बॉय फ्रेंड हैं, लेकिन वे उसके बजाय दूसरी लड़कियों में अधिक रुचि लेने लगे हैं। इसलिये वो अच्छी तन्दुरुस्त और ताजा दिखना चाहती है। जिससे कोई भी लड़का देखते ही उसकी ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रहे। विशेषकर वह चाहती है कि उसके स्तनों का आकार इतना बड़ा हो जाये कि कोई भी लड़का उसे देखते ही लट्टू हो जाये।

मैंने उससे फिर से पूछा कि ऐसा वह क्यों चाहती है। उसने उल्टा मुझसे ही सवाल किया कि जब सारी लड़कियॉं मजे लेती हैं तो मैं ऐसा क्यों नहीं करूँ? उसने बताया कि दो वर्ष पहले उसके साथ सबसे पहले उसके चाचा ने सेक्स किया, जो अब नौकरी पर दूसरे शहर में रहते हैं। ऐसे में उसकी सेक्स करने की तेज इच्छा होती है। पड़ोस के लड़के और साथ पढने वाले लड़के उसे घास नहीं डालते। ऐसे में वह एक 50-55 साल के अपने पास के मकान में रहने वाले किरायेदार के साथ सेक्स करके अपना काम चलाती है।

उसने बताया कि वह अपनी उम्र के लड़कों के साथ सेक्स करने की तमन्ना रखती है, न कि अपने पिता से बड़ी उम्र के मर्दों के साथ, लेकिन उसे अपनी उम्र के लड़के बच्ची समझते हैं। लड़कों की नजर में बड़ी दिखने के लिये वह दो-दो ब्रा पहनती है, लेकिन फिर भी कुछ मतलब नहीं निकलता….!

सारी बात जानकर मैं स्तब्ध रह गया। एक ओर तो देश सेक्स जनित मामलों के विकृततम रूप बलात्कार की विभीषिका से जूझ रहा है, दूसरी ओर हमारे देश की कमशिन-किशारियों की ये मनोदशा है! क्या यह स्थिति हम सबके लिये अत्यधिक चिन्ताजनक नहीं है? इस विषय पर अपने विचार अधिक प्रकट करने के बजाय मैं समाज के इस कड़वे सच को प्रबुद्ध लोगों के सामने रखना अधिक उचित समझता हूँ। जिससे कि हम समाज के इस रूप को भी ध्यान में रखें और इस बारे में समुचित निर्णय ले सकें।

लेखक डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ होम्योपैथ डॉक्टर, संपादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), नेशनल चेयरमैन-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एंड रायटर्स वेलफेयर एशोसिएशन और राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) से जुड़े हुए हैं.

पाई पाई के लिए तरस रहे जनसंदेश टाइम्स कर्मी

जनसंदेश टाइम्स, गोरखपुर यूनिट में वेतन को लेकर खलबली है। हाल यह है कि पिछले फरवरी महीने से अधिकांश कर्मियों को वेतन नहीं मिल पाया है।गोरखपुर में प्रसार से लेकर सभी विभागों के कर्मी वेतन के लिए परेशान हैं। ब्यूरो कार्यालयों का हाल है कि प्रबंधन को अपनी कार्यकुशलता दिखाने के लिए गोरखपुर यूनिट के कर्ताधर्ताओं ने उनके बकाया विज्ञापनों का भुगतान दिखा कर उसी पैसे को वेतन मद में एजस्ट कर दिया है।

अब हाल यह है कि कर्मी वेतन के लिए विज्ञापन का बकाया मांगने में परेशान हैं। जिन लोगों ने शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी के वादे पर अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड दी थी अब उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा है। दूसरी कहानी यह है कि जिन कर्मियों के वेतन से ग्रेच्युटी का पैसा काटा गया था वह पैसा उनके ग्रेच्युटी खातों में आज तक नहीं भेजा गया है। आज कल कह कर सभी कर्मियों को टरकाया जा रहा है। इसी के साथ अब प्रबंधन एक एक कर ब्यूरो कार्यालयों को बंद कर वहां जिला प्रतिनिधि बना कर काम कराने की तैयारी में है। इस नीति का पहला परीक्षण संतकबीरनगर में जारी है जहां से इंवर्टर और इंटरनेट तक की सुविधा हटा ली गई है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

अमर उजाला, मुरादाबाद से पुनीत शर्मा का तबादला, आसित नाथ जी न्‍यूज से जुड़े

अमर उजाला, मुरादाबाद से खबर है कि पुनीत शर्मा का तबादला बनारस के लिए कर दिया गया है. वे यहां पर चीफ रिपोर्टर के पद पर कार्यरत थे. पुनीत लंबे समय से मुरादाबाद में थे. बनारस में भी उन्‍हें चीफ रिपोर्टर के पद पर भेजा गया है. पुनीत का तबादला अमर उजाला की की पॉलिसी के तहत किया गया है.

पटना से खबर है कि आसित नाथ तिवारी ने अपनी नई पारी जी न्‍यूज के साथ शुरू की है. आसित को रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. वे इसके पहले भी कई चैनलों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. इनकी गिनती अच्‍छे पत्रकारों में की जाती है.

नक्‍सली हमले में लापता जवान का शव पत्रकारों ने खोज निकाला

नक्सली मुठभेड़ में लापता एक जवान के शव को सुरक्षा बल न तलाश कर सका, उसे आखिरकार मीडियाकर्मियों ने खोज निकाला. आंध्र प्रदेश से लगे बीजापुर और सुकमा जिले के सीमा पर स्थित पुर्वती में 17 अप्रैल को पुलिस नक्सली मुठभेड़ हुई थी. इस घटना में नौ नक्सली मारे गये थे. इस आपरेशन में गये जवानों को लेने आंध्र प्रदेश से बीएसएफ की हेलीकाप्‍टर आया था. इस दौरान नक्सलियों ने हेलीकाप्‍टर पर हमला कर दिया.

इस हमले के बाद आंध्र प्रदेश के ग्राउण्ड फोर्स के पांच जवान लापता हो गये थे, जिनमें से चार जवान सकुशल आंध्र के चेरला पहुंचे किन्तु एक जवान लापता था. जिसे लेकर अपहरण और हत्या जैसी अपवाहें फैल रही थी. लापता जवान की तलाश करने में छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश की पुलिस के लिए चुनौती बनी हुई थी. फोर्स के आला अधिकारियों ने जवान की तलाश करने के लिए मीडिया से अपील करने के बाद बीजापुर से पत्रकार गणेश मिश्रा और आंध्र के मीडिया के लोग घटनास्थल पहुंचकर जवान को तलाशने में सफल हुए.

मीडिया के लोगों ने देखा कि जवान का शव कंवरगट्टा के तालाब के पास पड़ा हुआ है. इस घटना की सूचना आंध्र पुलिस को देते हुए जवान के शव की तस्वीर दिखाई. आंध्र पुलिस के आला अधिकारियों ने जवान के शव को लाने के लिए बीजापुर के गणेश मिश्रा से अनुरोध किया. अधिकारियों के अनुरोध पर गणेश ने ग्रामीणों के सहयोंग से ग्राउण्ड फोर्स सर्किल इन्सपेक्टर शिवाजी प्रकाश राव के शव को भरी बारिश के बीच पगडंडियों से ट्रैक्टर के माध्यम से चेरला तक पहुंचा कर पुलिस के हवाले कर दिया.

भास्‍कर के पत्रकारों पर हमला करने वाले गिरफ्त से बाहर, मीडियाकर्मियों ने दिया अल्‍टीमेटम

बरनाला में भास्‍कर के दो पत्रकारों जितेंद्र देवगन तथा हिमांशु दुआ पर भाजपा नेता तथा उसके सहयोगियों द्वारा किए गए जानलेवा हमले में अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है. इस मामले से निपटने के लिए बनाई गई एक्‍शन कमेटी की मीटिंग में सभी आरोपियों को तत्‍काल अरेस्‍ट करने की मांग की गई. एक्‍शन कमेटी ने चेतावनी दी है कि अगर 48 घंटों के भीतर आरोपी पुलिस गिरफ्त में नहीं आए तो पत्रकार संगठन और सामाजिक ईकाइयां पुलिस और राज्‍य सरकार के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंक देंगे.

गौरतलब है कि भास्‍कर के दोनों पत्रकारों को धोखे से बुलाकर भाजपा नेता ने अपने साथियों के साथ जमकर पिटवाया. इसके बाद इन लोगों का हाथ-पैर बांधकर एक दुकान में बंद कर दिया तथा उस पर ताला लगाकर भाग गए. किसी तरह इन लोगों ने इसकी सूचना पुलिस को दी. पुलिस ने ताला तोड़कर दोनों लोगों को बाहर निकाला तथा अस्‍पताल में भर्ती कराया. एक्‍शन कमेटी की बैठक में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जिलाध्यक्ष अशीश पालको, चेयरमैन सुखचरनप्रीत सिंह सुक्खी, संदीप जिंदल, मनीश शर्मा, मनोज शर्मा, कुलदीप ग्रेवाल, कमल संधू, जगदेव सेखों, राजमहेंदर बरनाला, जगसीर सिंह संधू, हरिंदरपाल सिंह निक्का, रविंदर रवि, सतीश सिंधवानी, अकेश कुमार, नीलकमल, अमित मित्तर आदि मौजूद थे.

यूपी में मां के सामने बेटी से गैंगरेप

बुलंदशहर जिले के एक गांव में मां के साथ घर लौट रही युवती को बाग में खींच कर तीन दबंगों ने गैंगरेप किया। बुधवार को दिनदहाड़े हुई वारदात से लोग सकते में हैं। पीड़ित की मां ने गुरुवार को छतारी थाने में दो लोगों को नामजद कर तीन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई है। पुलिस ने युवती का मेडिकल कराकर मामले की जांच शुरू कर दी है।

पीड़ित की मां ने जिस युवक को मुख्य आरोपी बताकर नामजद किया है, उसकी बहन के साथ फरवरी 2012 में गैंगरेप हुआ था। उस मामले में शिकायतकर्ता महिला का बेटा मुख्य आरोपी है। मां-बेटी बुधवार दोपहर रिश्तेदारी से घर लौट रही थीं तब यह घटना हुई। दहशत के मारे बुधवार को परिवार सहमा रहा और पुलिस में शिकायत कराने की हिम्मत नहीं हुई। बृहस्पतिवार को पीड़ित बेटी को लेकर मां छतारी थाने पहुंची और तहरीर देकर कार्रवाई की गुहार लगाई। पुलिस ने दो नामजद समेत तीन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है।

यूपी में बीडीसी की हत्या के बाद भडकी हिंसा, एसपी को बंधक बनाया

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के गौरीबाजार थाना क्षेत्र में कल रात एक पंचायत सदस्य की हत्या से गुस्साई भीड़ ने कई घरों और दुकानों को जलाकर राख कर दिया और पुलिस अधीक्षक उमेश श्रीवास्तव समेत अन्य पुलिसकर्मियों को बंधक बना लिया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, गौरीबाजार थाना क्षेत्र के गांव पथरहर के निवासी पंचायत सदस्य अरण सिंह की कल शाम मठिया चौराहे पर अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी।

हत्या के बाद गुस्साई भीड़ ने पथरहर गांव को घेर लिया और पुलिस अधिकारियों के सामने ही आरोपियों के घर को आग लगा दिया जिसके कारण कई घर और दुकानें जलकर राख हो गईं। आग से घिरे एक म‌हिला और तीन बच्चों को पुलिस ने किसी तरह बचाया। उग्र भीड़ ने मीडियाकर्मियों पर हमला कर उनके कैमरे और वाहन तोड़ डाले। गौरीबाजार थाने को घेरकर उस पर पथराव किया जिसे देखकर थानाध्यक्ष अशोक यादव थाना छोड़कर भाग गए।

हत्या के विरोध में आक्रोशित भीड़ गौरीबाजार चौराहे पर गोरखपुर मार्ग को देर रात तक जाम किये रही। मामले को गंभीर होते देख कल देर रात गोरखपुर परिक्षेत्र के पुलिस उपमहानिरीक्षक नवीन अरोरा पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे और भीड़ को नियंत्रित करने का प्रयास किया।

बंधक बनाए गए देवरिया के पुलिस अधीक्षक उमेश श्रीवास्तव को भीड़ ने देर रात रिहा कर दिया। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है तथा शव का पोस्टमार्टम कराया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अराजक तत्वों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। (अमर उजाला)

नैनीताल की महिला जर्नलिस्ट ने आईपीएस पर लगाया यौन शोषण का आरोप, जांच टीम गठित

नैनीताल से एक सूचना आ रही है कि एक महिला जर्नलिस्ट कम माडल ने उत्तराखंड के एक आईपीएस अफसर पर यौन शोषण का आरोप लगाया है. इस बाबत उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक को दी गई लिखित कंप्लेन में महिला पत्रकार ने आरोप लगाया है कि आईपीएस अधिकारी ने उसके साथ सेक्स रिलेशन बनाकर उसका शोषण किया.

डीजीपी ने इस कंप्लेन के बाद मामले की छानबनी के लिए जांच बिठा दी है. आरोप लगाने वाली महिला जर्नलिस्ट की प्रोफाइल फेसबुक पर भी मौजूद है जिसमें उसने खुद को न्यूज रिपोर्टर और माडल बताया है.

मेरठ में मीडियाकर्मियों पर हमला, कई पत्रकार घायल

: कैमरे भी तोड़े गए : मेरठ के जागृति विहार में यौन उत्‍पीड़न के आरोपी दुल्‍हे के रिश्‍तेदारों ने मीडियाकर्मियों पर हमला बोल दिया. मीडियाकर्मी यौन शोषण की शिकार लड़की के साथ शादी समारोह में पहुंचे थे. मीडियाकर्मियों को देखकर आरोपी दुल्‍हे के रिश्‍तेदार इतना भड़के कि पत्रकारों तथा फोटोग्राफरों पर टूट पड़े. पत्रकारों को जमकर मारा पीटा गया. कई पत्रकार हमले में घायल हुए. कुछ पत्रकारों का कैमरा तोड़ दिया गया. सूचना के काफी देर बाद पुलिस पहुंची. इधर, काफी संख्‍या में पहुंचे मीडियाकर्मियों खुद ही अपना बदला ले लिया. दुल्‍हे के रिश्‍तेदारों को जमकर धोया.

जानकारी के अनुसार जागृति विहार में अमित नाम के लड़के की शादी की रस्‍में चल रही थीं. इसी बीच एक लड़की ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि अमित उसको शादी का झांसा देकर उसका यौन शोषण करता रहा. पुलिस ने शिकायत दर्ज करने के बाद लड़की को अकेले भेज दिया. पीडि़त लड़की अपने साथ कुछ मीडियाकर्मियों को लेकर जागृति विहार पहुंच गई. लड़की के साथ मीडियाकर्मियों को देखते ही अमित के रिश्‍तेदार लड़की को मारने के लिए दौड़ पड़े.

मीडियाकर्मियों ने जब लड़की को बचाने के साथ कवरेज शुरू की तो अमित के रिश्‍तेदार मीडियाकर्मियों पर भी टूट पड़े. इस हमले में समाचार प्‍लस का कैमरामैन शकील और हिंदुस्‍तान के फोटोग्राफर विजय स्‍वामी घायल हो गए. कई मीडियाकर्मियों के कैमरे भी तोड़ डाले गए. इस बीच इसकी सूचना पत्रकारों ने अपने साथियों तथा पुलिस को दी. तमाम पत्रकार जागृति विहार पहुंच गए. इस दौरान भी अमित के परिजन हो हल्‍ला करते हुए मीडियाकर्मियों को धमकी देते रहे.

लगातार हमले से नाराज मीडियाकर्मियों ने पहली बार खुद ही अपना बदला चुकाने की कोशिश की और अमित के रिश्‍तेदारों को धुनना शुरू कर दिया. बाद में पहुंची पुलिस ने दोनों पक्षों को अलग किया. घायल मीडियाकर्मियों का चिकित्‍सालय में इलाज चल रहा है. अभी तक किसी पक्ष की तरफ से मामला दर्ज कराने की सूचना नहीं आई है.

रामदेव, मोदी और सहारा की पार्टनरशिप शायद कोई गुल खिला दे!

Sanjay Sharma : हरिद्वार में बाबा रामदेव के मंच पर नरेन्द्र मोदी और सहारा के ओपी श्रीवास्तव मौजूद.. अब तो मोदी को प्रधानमंत्री बन जाना चाहिये सहारा के चौबीस हजार करोड़ का सवाल है… रामदेव की और सहारा की पार्टनरशिप शायद कोई गुल खिला दे…

Yashwant Singh रामदेव और मोदी के साथ मंच पर सहारा के ओपी श्रीवास्तव मौजूद!!! चलो, भाजपा सरकार केंद्र में आई तो सहारा का संकट दूर हो जाएगा.. सही कहा संजय भाई आपने.. सहमत… कांग्रेस आए या भाजपा, चोरों को सहयोग चारों ओर से मिलता रहेगा…

Shambhu Dayal Vajpayee : सहारा में रामदेव के टृस्‍ट का पैसा है। रामदेव और ओपी श्रीवास्‍तव की नजदीकी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि देहरादून में राष्‍टृीय सहारा के एक संपादक की नियुक्ति बाबा रामदेव के कहने पर हुई थी।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार संजय शर्मा के फेसबुक वॉल से.

शादी का झांसा देकर सिपाही ने महिला खिलाड़ी से किया वर्षों दुराचार

देवरिया। एक युवती ने पुलिस विभाग के एक सिपाही पर झांसा देकर कई वर्षों तक दुराचार करने का आरोप लगया है। इस सम्बन्ध में पुलिस अधीक्षक उमेश कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि इस सम्बन्ध में बलात्कार एवं दलित उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई की जा रही है।

घटना के सम्बन्ध में उन्होंने बताया कि कोतवाली थाना अन्तर्गत मुहल्ला नाथ नगर की रहने वाली एक महिला खिलाड़ी ने वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के राजकीय रेलवे पुलिस में तैनात कान्सटेबिल राजनारायन यादव पर आरोप लगाया है कि जब वह देवरिया में तैनात था तो पुलिस लाईन के पास स्थित स्पोर्टस स्टेडियम में दोनों की अक्सर मुलाकात हो जाया करती थी। इस दौरान पुलिस कर्मी ने उसके साथ शादी करने का झांसा देकर कई वर्षों तक शारीरिक सम्बन्ध बनाया। अब वह शादी करने से मुकर रहा है।

देवरिया से ओपी श्रीवास्‍तव की रिपोर्ट.

जरा आप रामदेव, मोदी, संघ और बीजेपी के खिलाफ कुछ लिखकर देखिये!

Swami Balendu : मुझे आजतक ईश्वर से कोई परेशानी नहीं हुई और न ही उसने कभी माँ की… बहन की…. मेरे साथ करी, परन्तु जरा आप रामदेव, मोदी, संघ और बीजेपी के खिलाफ कुछ लिखकर देखिये! सारे ईश्वर के भक्त, हिंदुत्व के रक्षक 'जय श्री राम' के नारे के साथ माँ बहनों के यौनांगों का स्मरण करते हुए अपने धर्म की रक्षा के लिए खड़े हो जाते हैं| इससे उनकी धार्मिकता और संस्कारों का पता चलता है और पता पड़ जाता है कि धर्म आखिर किस प्रकार की प्रवृत्ति लोगों में पैदा करता है|

धर्म कितना दूषित हो चुका है ये तो अभी देख ही लिया टीवी पर जब रामदेव के मंच से बड़े बड़े धार्मिक गुरु कैसे मोदी का गुणगान करते हुए मस्का लगा रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे कि धर्म राजनीति के तलवे चाट रहा हो| देखना कुछ दिनों में लोगों को खुद को धार्मिक कहलवाने में शर्म आने लगेगी|

मुझे इस प्रकार के परम धार्मिक लोगों का अनुभव पहले भी हो चुका है और आज भी 09166373869 नंबर से धर्म की रक्षा के खातिर माँ बहन को याद करते हुए जान से मारने की धमकी मिली है| खैर इन्हें जो करना है वो करें परन्तु इस प्रकरण के चलते मैंने कई लोगों को ब्लाक किया है और मुझे गंभीरता से सोचना पड़ेगा और प्रोफाइल देखनी पड़ेगी कि मैं किन लोगों को अपनी मित्र सूची में रखूं|

वैसे इन सभी बातों और अनुभवों से यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि धर्म किसी और के मारे नहीं बल्कि इन धार्मिकों के मारे ही मरेगा| मेरी कामना है कि दुनिया के सभी संगठित धर्मों तथा धार्मिकों की दुर्भावना का नाश हो और इस धरती पर प्रेम, सद्भाव और इंसानियत की स्थापना हो, जोकि धर्म के रहते कभी नहीं हो सकता|

(बीजेपी के चमचों और मोदी, रामदेव के भक्तों ये जान लो कि मैं किसी भी पार्टी और धर्म का समर्थन नहीं करता, और किसी ने भी फोन किया तो पुलिस रिपोर्ट और यहाँ कुछ उलजुलूल लिखा तो सीधे ब्लाक)

स्वामी बालेंदु के फेसबुक वॉल से.

बसपा के पूर्व विधायक प्रमोद सिंह समेत आठ के खिलाफ हत्‍या का मामला दर्ज

: गौरी बाजार हत्या काण्ड : देवरिया। गौरीबाजार थानाक्षेत्र के ग्राम पथरहट के पूर्व ग्राम प्रधान तथा वर्तमान क्षेत्र पंचायत सदस्य अरुण सिंह की हत्या के मामले में गौरीबाजार से बसपा के पूर्व विधायक प्रमोद सिंह सहित कुल आठ लोगों के खिलाफ हत्या एवं अन्य विभिन्न धाराओं में नामजद मुकदमा दर्ज कराया गया है। पुलिस ने इस मामले में एक अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया है। क्षेत्र में अभी भी तनाव व्याप्त है जिसके मद्देनजर पुलिस एवं पीएसी तैनात कर दी गई है।

इस मामले में पुलिस अधीक्षक उमेश कुमार श्रीवास्तव ने वादी शम्भू सिंह पुत्र शंकर सिंह द्वारा दिए गए तहरीर के आधार पर जानकारी दी कि गुरुवार को शाम करीब सात बजे पूर्व प्रधान एवं वर्तमान क्षेत्र पंचायत सदस्य अपने निजी ईंट भट्ठे से अपने गांव जा रहे थे तो मठियामाठी गांव के पास असलहों से लैस हमलावरों ने गोली मारकर अरुण कुमार सिंह की हत्या कर दी और फरार हो गए। उन्होंने बताया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में मालती देवी पत्नी राजेन्द्र सिंह, राजेन्द्र सिंह पुत्र राजबली सिंह, सुदीप सिंह पुत्र राजेन्द्र सिंह, दिनेश सिंह पुत्र भीम बली सिंह, डब्लू सिंह पुत्र कामेश्वर सिंह, दीप नारायन सिंह पुत्र बैजनाथ सिंह, प्रमोद सिंह पुत्र शिव प्रताप सिंह जो बसपा के पूर्व विधायक है और इन्दल सिंह पुत्र बैजनाथ सिंह का नाम शामिल है। प्रथम सूचना रिपोर्ट में बसपा के पूर्व विधायक पर हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया गया है। इस मामले में सुदीप सिंह पुत्र राजेन्द्र सिंह के पास पुलिस ने एक लाईसेन्सी रिवाल्वर भी बरामद किया है और उसे जेल भेज दिया है।

श्री श्रीवास्तव ने बताया कि मृतक अरुण कुमार सिंह अपराधी प्रवृत्ति का व्यक्ति था, जिसके विरूद्ध डकैती, अपहरण, हत्या एवं गैंगेस्टर एक्ट जैसे गम्भीर धाराओं के 17 अभियोग विभिन्न न्यायालयों मे विचाराधीन हैं। उन्होंने बताया कि मुकदमा अपराध संख्या 502/2013 अन्तर्गत धारा 147, 148, 149, 302 एवं 120 बी भारतीय दण्ड संहिता के तहत उक्त मामला पंजीकृत किया गया है। जिसकी विवेचना गौरी बाजार थाने के एस ओ अशोक यादव द्वारा किया जा रहा है।

देवरिया से ओपी श्रीवास्‍तव की रिपोर्ट.

वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (तेईस) : अकेला चला था, अकेला रह गया

नामांकन के दिन घर से अकेला निकला था। उम्मीद थी कारवां बनता जाएगा। लेकिन मतगणना तक अकेला ही रह गया। इसे हम अपनी मजबूरी कह सकते हैं। राजनीतिक विवशता कह सकते हैं। भीड़ का भय कह सकते हैं। खर्चे को सीमित करने का प्रयास कह सकते हैं।

नामांकन के पहले से ही जनसंपर्क का सिलसिला शुरू था। हम सोचते थे कि नामांकन के दिन खरांटी के जगतपति के शहीद स्थल पर एक सभा करेंगे और वहीं से लोगों के साथ नामांकन के लिए प्रखंड कार्यालय तक जाएंगे। लेकिन सभा करने का साहस मैं नहीं जुटा पाया। इसकी कई वजह थी। पहली वजह यह थी कि सप्ताह में मैं सिर्फ एक ही दिन जनसंपर्क कर पाता था, जबकि किसी भी सभा के लिए जमकर लोगों के बीच अभियान चलाना पड़ता। फिर सभा के लिए खर्चे यानी कुर्सी, दरी, माईक के साथ नाश्ता-पानी का खर्चा भी उठाना पड़ता। इस तरह के किसी खर्चे के लिए मैं तैयार नहीं था। ऐसे काम के लिए कार्यकर्ताओं की एक टीम चाहिए थी, जो मेरे पास नहीं थी। इस कारण नामांकन के पहले सभा की सोच को कल्पना से आगे नहीं बढ़ने दिया।

चुनाव प्रचार के दौरान भीड़ इकट्ठा नहीं कर पाता था। साथ घूमने और प्रचार करने वालों के लिए दिन भर के खर्चे पानी की भी व्यवस्था उम्मीदवार को ही करनी पड़ती है। शाम को पीने-खाने के लिए भी इंतजाम करना पड़ता है। मैं तो खुद दूसरों के घर खाना मांग कर खाता था, तो प्रचारकों को कहां से खाने-पीने और पीने-खाने की व्यवस्था करता। अकेले घूमने की एक वहज और थी। अकेले किसी के दरवाजे पर पहुंच जाता था। अगर घर में पुरुष हैं तो उनसे बातचीत की और यदि पुरुष नहीं हैं तो महिलाओं को भी दरवाजे पर बुलाकर अपना परिचय देकर वोट देने का आग्रह कर लेता था। महिलाओं से नाश्ता-पानी या खाना मांगने में भी कोई कोताही नहीं करता था।

मेरा मानना था कि जहां भूख लगे, वहीं मांग कर खा लो। इस का एक बढ़िया असर हुआ कि वोटरों से घरेलू संबंध बन जाता था। वोट मिले या न मिले, सम्मान भाव जरूर मिल जाता था। किसी भी घर के दरवाजे पर ओटा पर बैठ कर, कुर्सी मंगाकर या खड़े-खड़े भी पर्ची काटने का काम शुरू कर देता था। कई बार महिलाएं ही दूसरे घरों में जाकर मेरा परिचय कराती थीं। आसपास के घरों का पर्चा भी कटवा लेती थीं। इस दौरान पारिवारिक स्थिति का भी पता चल जाता था।

साधन विहीन उम्मीदवार के साथ भीड़ होने के अपने खतरे भी हैं। साथ चलने वाला हर आदमी आपसे हर जगह पर उम्मीद रखता है। पान से लेकर सिगरेट आपके ही कोटे में डालना चाहता है। गांजा का दम भरने वाले भी पुड़िया की व्यवस्था चाहते हैं। साथ चलने वाला हर व्यक्ति आपके ऊपर बोझ होता है। हालांकि वोटरों पर उसका असर भी पड़ता है। कुछ उम्मीदवार थे, जिनके साथ छह-आठ लोग जरूर होते थे। कुछ ऐसे भी थे, जो हमारे समान अकेले ही प्रचार में जुटे हुए थे। समर्थकों के बोझ ढोने वाले उम्मीदवारों की कमी नहीं थी।

कई बार वोटरों ने मुझसे पूछा भी कि आप अकेले ही क्यों घूम रहे हैं। मैं उन्हें बतलाया कि इसके कई फायदे हैं। साथ घूमने वाले आपके लिए वोट की गारंटी नहीं दे सकते थे। अकेले होने के कारण किसी के दरवाजे पर भी जाकर आप बातचीत कर सकते हैं। लेकिन आपके साथ भीड़ होगी तो कोई महिला आप से बात करने के लिए दरवाजे से बाहर नहीं आएगी। इसके साथ ही अनावश्यक खर्चे भी नहीं उठाना पड़ता है।

मतगणना के दिन भी हम अकेले ही थे। मतगणना केंद्र दाउदनगर ट्रेनिंग कॉलेज के परिसर में सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था थी। तीन पंचायतों की मतगणना हो रही थी। पहली मतगणना करमा पंचायत की हुई। दूसरी बारी बभनडीहा की थी और अंतिम बारी सोनहथु  पंचायत की थी। उम्मीदवारों के साथ उनके समर्थकों की भीड़ दाउदनगर-गया रोड पर लगी थी। हर उम्मीदवार के साथ उनके समर्थक थे। मतगणना हॉल में भी हम अकेले ही थे। एक उम्मीदवार के साथ एक मतगणना एजेंट रखने की व्यवस्था थी। लेकिन मैंने कोई एजेंट नहीं रखा था।

पूरे चुनाव के दौरान मैंने यह कोशिश की कि जिस मुहल्ले में जाएं, वहीं के किसी व्यक्ति को साथ लें और लोगों से जनसंपर्क करें। यह प्रयास भी सार्थक नहीं हुआ। कहीं-कहीं कोई युवक मिल गया तो ठीक है, अन्यथा इस दरवाजे से उसे दरवाजे, इस गांव से उस गांव अकेले ही दौड़ता रहा। यदाकदा बस का भी सहारा लिया और किसी मोटरसाइकिल वाले से लिफ्ट भी ली। कभी-कभार अपने साला संजय को साथ रखता था, वह भी तब, जब मोटरसाइकिल की आवश्यकता महसूस करता था। चुनाव को लेकर कारवां बनने की उम्मीद थी, लेकिन अकेला ही रह गया।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क kumarbypatna@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


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पूर्व सांसद का वक्तव्य- ”फीस नहीं दे सकते तो बच्चे क्यों पैदा किए?” (सुनें टेप)

पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर शहर के न्यू कालोनी के रहने वाले जावेद अपने दोनो बच्चों नाजिया जावेद और यासिर को तालीम दिला रहे थे. स्कूल की एक महीने की फीस जमा करने में देर क्या हुई, स्कूल के प्रबंधक पूर्व सांसद जगदीश कुशवाहा ने उनके बच्चों का बैग छीन कर स्कूल से बाहर का रास्ता दिखा दिया। वाकये से घबराकर जावेद अपनी पत्नी को लेकर स्कूल पहुंचे और फीस न दे पाने में अपनी असमर्थता जताते हुए कुछ मोहलत मांगी तो पूर्व सांसद ने वक्तव्य दिया- ''अबे साले तुम फीस नहीं दे सकते तो बच्चे क्यों पैदा किए? किसी खैराती स्कूल या मदरसे में बच्चों को क्यों नहीं पढ़ाते? अबे क्या हमने गरीब बच्चों को पढ़ाने का ठेका ले रखा है।''

जावेद ने जब शिक्षा का अधिकार अधिनियम का ज्रिक किया तो पूर्व सांसद आपे से बाहर हो गए। बकौल जावेद उन्होंने कहा अबे तू मुझे कानून सिखाएगा। जलालत और अपमानित होने का एहसास लिए जावेद साल भर से अर्जिया लिख-लिखकर और फरियाद लगाकर बेसिक शिक्षा अधिकारी, जिलाधिकारी, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, केन्द्रीय माध्ययमिक शिक्षा बोर्ड के समक्ष उनके बच्चों के साथ हुए अन्याय और भेदभाव के बारे में जानकारी देते हुए इंसाफ की गुहार लगाते चले आ रहे हैं।

इंसाफ पाने की उम्मीद लिए जावेद लखनउ पहुंचकर मंत्रियों से भी अपनी आपबीती कह चुके हैं। पर कहीं कुछ नहीं हुआ। सरकारी अधिकारियों की ओर से तो जावेद को साफ कहा गया कि जिनके खिलाफ आप शिकायत लेकर आए हैं वो पूर्व सांसद और रसूख वाले हैं और उनके बेटे राजेश कुशवाहा वर्तमान में सपा के जिला महासचिव हैं। ऐसे में हम कुछ नहीं कर सकते। थक हारकर जावेद ने न्यायलय का सहारा लेकर पूर्व सांसद के खिलाफ 156 (3) के तहत मुकदमा चलाए जाने का वाद दाखिल किया। इस पर मजिस्ट्रेट ने विगत 25 फरवरी को पुलिस को मुकदमा दर्ज कर विवेचना करने का आदेश भी दे दिया। विवेचना की शुरुआत कुछ इस तरह से हुई की जावेद के घर पहुंचे कोतवाल ने जावेद को ही समझाना शुरू कर दिया कि वो पूर्व सांसद हैं, तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम खामोश रहो।

जावेद के मानसिक उत्पीड़न और उसके बच्चों के मूल अधिकारों के हनन की अर्जी को गंभीरता से लेते हुए राष्ट्रीय बालक अधिकार संरक्षण आयोग अब तक तीन बार पत्र लिखकर उत्तर प्रदेश के प्रधान शिक्षा सचिव को इस मामले की जांच करने को कह चुकी है लेकिन आयोग के पत्र का जबाव अब तक नहीं दिया गया। जावेद आज भी मानसिक आघातों के साथ अपने बच्चों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। दोनों बच्चे स्कूल से निकाले जाने के बाद 6 महीने तक यूं ही घर पर बैठे रहे। बाद में राष्ट्रीय बालक संरक्षण आयोग के हस्तक्षेप पर बीते नम्बवर में गाजीपुर के जे.के.बी पब्लिक स्कूल में बच्चों का दाखिला हुआ। जावेद का फोन नंबर 07398602313 है।

जावेद की पीड़ा को इस आडियो टेप के जरिए भी सुन सकते हैं..

 

भास्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क- 09415354828

मर्डर के एक मामले में इंदु शेखर पंचोली पर बड़ा अहसान किया था वकील भगवान सिंह चौहान ने

अजमेर अदालत लिपिक भर्ती भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे वकील भगवान सिंह चौहान का लखनउ अमर उजाला के संपादक इंदु शेखर पंचोली पर बहुत भारी अहसान है। चौहान की मदद से ही पंचोली हत्या के आरोप से बरी हो पाए थे। नब्बे के दशक की शुरुआत की बात है। पंचोली उन दिनों दैनिक नवज्योति, अजमेर में रिपोर्टर थे। कुछ ठेकेदार दोस्तों के साथ बजरी की ठेकेदारी में पार्टनर बन गए थे। सभी की मौजूदगी में एक दिन काम और हिसाब को लेकर विवाद हुआ और एक मजदूर की जान चली गई।

पंचोली ने अपने रसूखात का इस्तेमाल किया। आदर्श नगर थाना पुलिस ने ना तो एफआईआर में नाम दर्ज किया और ना ही चार्जशीट मे नाम आने दिया। अदालत में मुकदमा चलता रहा। हत्या के इस मुकदमे का फैसला लिखाते समय सेशन जज कन्हैया लाल व्यास ने पाया कि गवाह घटनास्थल पर पंचोली के होने, मृतक को धमकाने, उसे धक्का देने की बात कहते हैं परंतु पंचोली मुकदमे में ना अभियुक्त है और ना ही गवाह? आखिर यह पंचोली है कौन? और उन्होंने फैसला सुनाने की जगह अदालत के सामने आई साक्ष्य के आधार पर पंचोली को हत्या का संदिग्ध अभियुक्त मानते हुए उनके गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए।

उन दिनों अजमेर नगर परिषद के सभापति थे वीर कुमार। युवा थे। पेशे से वकील थे और बहुत व्यवहारकुशल थे। पत्रकारों से स्वाभाविक रूप से काफी प्रेम रखते थे। इतना कि कई पत्रकारों के बच्चों की स्कूल फीस, घर का राशन, मकान निर्माण तक में जी खोलकर मदद किया करते थे। पंचोली ने सारा मामला उन्हें बताया। वीर कुमार ने सबसे पहले जिला जज से मुलाकात की। वीर कुमार के व्यवहार के चलते अदालत ने पंचोली को गिरफ्तार करने की जगह अदालत में समर्पण करने पर जमानत मंजूर कर ली। पंचोली के खिलाफ अदालत ने हत्या का प्रसंज्ञान लिया और मुकदमे की दुबारा सुनवाई शुरू की।

इस मुकदमे में भगवान सिंह चौहान एक अभियुक्त के वकील थे। वीर कुमार ने भगवान सिंह चौहान से मदद मांगी। मृतक के परिवारजनों से भी बात की गई। कुल मिलाकर तय हुआ कि पंचोली रूपए दे तो परिवादी और बाकी अभियुक्त अपने बयान बदल देंगे। वीर कुमार का साफ कहना था कि मामला पत्रकार का है इसलिए जो भी रूपए दिए जाएंगे वे पंचोली नहीं बल्कि वीर कुमार को ही भुगतने होंगे। लिहाजा कम से कम रूपयों में सौदेबाजी हुई। रूपए दिए गए। तय हुआ उस हिसाब से वकील चौहान ने ऐसे बयान कराए जिससे पंचोली को मदद मिल गई और अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। इसके बाद भी वीर कुमार और भगवान सिंह चौहान ने पंचोली की मदद की और फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील नहीं होने दी। इस फैसले के एक-आध साल बाद ही हार्ट अटैक से वीर कुमार का निधन हो गया। 

उपरोक्त पत्र भड़ास के पास किसी सज्जन ने मेल के जरिए भेजा है. इससे संबंधित आर्टिकल ये है–

अजमेर की अदालत में बाबू भर्ती में भ्रष्टाचार, दो वकीलों समेत 5 शामिल, जिला जज को हटाया

प्रश्न ये है कि अब तक सेबी, कॉरपोरेट मंत्रालय, ईडी समेत अन्य जांच एजेंसियां, केंद्र सरकार और ममता दीदी की हुकूमत सोई क्यों रही?

Nadim S. Akhter : घोटाला कहीं भी हो, कांग्रेस का नाम आ ही जाता है…अब शारदा चिट फंड घोटाला कहने को तो वेस्ट बंगाल में हुआ लेकिन चिदंबरम साहब की बीवी और कांग्रेसी नेता चौधरी का नाम सामने आ गया…लेफ्ट पार्टीज की तो बल्ले-बल्ले….आम के आम और गुठली के भी दाम…टीएमसी और कांग्रेस, दोनों एक साथ लपेटे में और वो भी एक ऐसे मुद्दे पर, जिससे बंगाल की गरीब जनता का वास्ता है…अगर कभी बंगाल गए हों तो जानिएगा कि एक-एक पैसे की बंगाली भद्र समाज में कितनी कीमत है…चार आना क्या, एक पैसा भी नहीं छोड़ेगा कोई आपके पास…

तो बिल्ली के भाग्य से छीका फूट गया है और लेफ्ट पार्टीज के दोनों हाथ में लड्डू हैं….लगता है अगले लोकसभा चुनाव में बंगाल में लेफ्ट वालों की चांदी होने वाली है…ठीक भी है…जब सोने का भाव गिर रहा हो और पब्लिक का पैसा खुलेआम लूटा जा रहा हो, तो किसी न किसी पॉलिटिकल पार्टी को चांदी काटने का हक तो बनता ही है….सवाल ये नहीं है कि कितना पैसा किसने और क्यों खाया…प्रश्न ये है कि अब तक सेबी, कॉरपोरेट मंत्रालय, ईडी समेत अन्य जांच एजेंसियां, केंद्र सरकार और ममता दीदी की हुकूमत सोई क्यों रही….क्या ये इंतजार कर रहे थे कि पहले गरीब निवेशक लुट जाएं, फिर ये लोग सरकारी फीता निकाल कर नपाई करेंगे कि कितने इंच का चूना लगा है….वैसे रंगाई-पुताई होती रहनी चाहिए…घर में हो तो सफाई बनी रहती है और अर्थव्यवस्था में हो तो तरलता यानी liquidity बनी रहती है…तरलता नहीं समझे आप…अरे भई, कैश-कैश…शान से गिनिए और हर फिक्र को सिगरेट का कश मारकर धुएं में उड़ा दीजिए.

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

पुलिसवालों ने कहा- ”इन औरतों का इलाज कर दो”… इसके बाद गुंडे रेप करने पीटने में जुट गए

Himanshu Kumar : कल रात अस्पताल से मैं और वीणा देर से लौटे . हम दो दलित महिलाओं को अस्पताल में भर्ती करा कर लौटे थे. इन महिलाओं के साथ बलात्कार करने के बाद इनकी बुरी तरह पिटाई की गई है. इन्होने अपनी मजदूरी का पैसा हिसाब से मांगने की जुर्रत करी थी . उत्तर प्रदेश के दो दलित परिवार हरियाणा के भिवानी के ईंट भट्टा पर काम करने आये थे . काम करने के बाद मजदूरी ना मिलने पर इन्होने अपने घर वापिस लौटने की कोशिश करी . ईंट भट्टा मालिक ने इन सबको बुरी तरह मारा और इन्हें बंधक बना लिया . इन्हें एक गड्ढे में डाल कर रखा गया .

महिलाओं को शौच के लिये जाने पर ईंट भट्टा मालिक के गुन्डे साथ में जाते थे जो इन महिलाओं पर टार्च से रोशनी डाल कर नज़र रखते थे . इनके परिवार के एक सदस्य ने किसी तरह नज़दीकी मुंढाल पुलिस चौकी में सूचना दी . पुलिस वालों ने आकर कहा कि ' तुम चमार लोग इसी लायक हो ये औरतें बहुत ज़्यादा बात कर रही हैं इनका इलाज कर दो '. इसके बाद ईंट भट्टा मालिक और उसके गुंडों ने इन महिलाओं से बलात्कार किया . दोनों की बुरी तरह पिटाई करी गई . इनमे से एक महिला के शरीर पर पिटाई के नीले निशान पड़े हुए हैं .

किसी तरह खबर हमारे साथी तरुण और निर्मल गोराणा के पास पहुँची उन्होंने ईंट भट्टा मालिक को फोन पर दिल्ली से कानूनी कार्यवाही की चेतावनी दी . ईंट भट्टा मालिक ने इस परिवार के तीन किशोर बच्चों को अपने पास बंधुआ बना कर रख लिया और इन महिलाओं को जाने दिया . इन महिलाओं को चेतावनी दी गई कि यदि इन्होने मूंह खोला तो इनके बच्चों को मार डाला जाएगा . कल रात को स्वामी अग्निवेश ने भिवानी के पुलिस अधीक्षक से इस पूरी घटना के बारे में बात करी और बंधुआ बना कर रखे गये तीनों बच्चों को की जान बचाने की प्रार्थना करी . दो दिन पहले भी पुलिस अधीक्षक के कार्यालय को इस घटना के बारे में फैक्स किया गया था .लेकिन उधर से फोन पर जवाब दिया गया कि कार्यालय की फैक्स मशीन की स्याही खत्म हो गई है इसलिये फैक्स नहीं पढ़ा जा सकता .

हिमांशु कुमार के फेसबुक वॉल से.

क्या फारवर्ड प्रेस मैग्जीन में लड़कियों और पत्रकारों का शोषण होता है?

Wasim Akram Tyagi : हमारे एक सहपाठी और खांटी संघ परस्त मित्र हैं Jitendra Kumar Jyoti. शॉट फोर्म में हम उन्हें जेजे बुलाते हैं. फॉरवर्ड प्रेस मासिक पत्रिका में काम करते थे. बकौल जितेन्द्र ज्योति, उन्हें केवल इसलिये नौकरी से हटा दिया गया क्योंकि उन्होंने मीडिया द्वारा किये जा रहे लड़कियों और नौजवान पत्रकारों के शोषण के खिलाफ आवज उठाई थी. उन्होंने स्टाफ पर कई गंभीर आरोप भी लगाये थे जिसकी कीमत उन्हें इस्तीफा देकर चुकानी पड़ी.

जेजे कह रहे थे कि मीडिया रोज कोई ना कोई घोटाला, घूस खोरी, बलात्कार, उत्पीड़न की खबरें छापता है. मगर खुद जो भ्रष्ट और बुराईयों के समुद्र में डूबा पड़ा है, उन खबरों को कौन छापेगा. उनका यह कहना काफी हद तक सही है कि मीडिया पूंजीपतियों के हाथों की कठपुतली बन चुका है. बंग्लादेश में इमारत के गिरने से मरने वालों की संख्या 200 के पार पहुंच चुकी है लेकिन अखबारों ने इसे एक कोने में जगह दी है जबकि अमेरिका के बॉस्टन में हुऐ बम धमाके की कवरेज से अखबारों के पन्ने भरे पड़े थे और टीवी चैनल भी लगातार कई दिन तक चीख रहे थे लेकिन पड़ोस क