वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (पंद्रह) : हजार समस्या का एक समाधान मुखिया जी

पर्ची बांटने के दौरान व्यक्ति और समाज दोनों के अलग-अलग रूप देखने को मिले। सबकी अपनी-अपनी समस्या, अपना-अपना दर्द। और सबका एकमात्र समाधान मुखिया जी। बेटा सम्मान नहीं देता है तो दिलाएं मुखिया जी। पड़ोसी ने नाली तोड़ दी है तो बनवाएं मुखिया जी। खेत में पानी नहीं आ रहा है तो पानी लाएं मुखिया जी। इंदिरा आवास नहीं मिला तो दिलवाएं मुखिया जी। स्कूल में मास्टर साहब नहीं आते हैं तो बुलवाएं मुखिया जी। हजार समस्या का एक समाधान मुखिया जी। पंचायत की हर समस्या के समाधान का जिम्मा है मुखिया जी के हवाले।

पूर्णाडीह में बुजुर्ग मिले। बुढ़ापा उन पर हावी था। बेटा सम्मान नहीं देता है। बीडीओ इंदिरा आवास नहीं देता है। वोट तो उसी को देंगे, जो इंदिरा आवास दिलवा दे। लोग वोट की कीमत नहीं मांग रहे थे, पर मुआवजे की उम्मीद जरूर कर रहे थे। कुराईपुर में कुछ लोग एक दुकान के पास बैठे थे। उनसे बातचीत की शुरुआत हुई। उसमें से एक व्यक्ति ने कहा कि दुकान के सामने चापाकल खराब पड़ा है, उसको बनवाने के लिए पैसा दे दीजिए। फिर उन्होंने इसको लेकर भूमिका बांधी। इसके साथ उन्होंने कहा कि सादिक जी से कहेंगे तो चापाकल बनवा देंगे। सादिक खान भी उसी गांव के रहने वाले उम्मीदवार थे। मैंने कहा कि तो आप चापाकल उन्हीं से बनवा लीजिए। और विडंबना कि मतदान के एक दिन पहले जब उस गांव में गया तो चापाकल खराब ही पड़ा था। पूर्णाडीह के रणजीत कुमार की दुकान कारा मोड़ पर है। उससे कहा कि चुनाव चिह्न मिल गया है। अब आप लोग जुट जाइए चुनाव में। उसने बड़े अधिकार के साथ कहा कि भैया, खरचवा भिजवा दीजिए ना।

भाजपा के एक कार्यकर्ता हैं सुरेंद्र सिंह। पार्टी के प्रति समर्पित हैं। उनसे जब मैं पहली बार मिला था तो उन्होंने कहा कि अभी माहौल देख रहे हैं। कई उम्मीदवार आएंगे। लेकिन जब दूसरी बार मिला तो उनका तेवर एकदम बदला हुआ था। जाति के कुशवाहा थे। एकदम कोइरी के देवता। उन्होंने बड़ी ईमानदारी से कहा कि नोमिनेशन के दिन अनिल मालाकर के साथ थे। पर्चा भरने के बाद उन्होंने सबको मिठाई के पैकेट दिये। और उस दौरान पहुंचे सभी कार्यकर्ताओं को खरचा-पानी के लिए दो-दो सौ रुपये भी दिए। भाई हमारा परिवार अब उनको ही वोट देगा। अब मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं बच गया था।

खरांटी पंचायत का सबसे बड़ा गांव है। इसमें चार बूथ हैं। प्रचार के दौरान ही एक गुमटी वाले से मुलाकात हुई। गुमटी पर बैठा। बातचीत हुई। यहीं एक चादर ओढ़े व्यक्ति भी बैठे हुए थे। चिलम फूंकने की तैयारी हो रही थी। फिर वही खरचा-पानी की मांग। मैंने कहा कि हम चंदा लेकर चुनाव लड़ रहे हैं और हमसे खर्चा मांग रहे हैं। आप लोग ही हमें कुछ चंदा दीजिए। वहां चादर ओढ़े व्यक्ति ने पूछा कि चंदा मिल रहा है। मैंने कहा कि जनता सहयोग मांगने पर देती ही है। शाम का समय था। अंधेरा गहराने लगा था। अब हम बस पकड़ने की हड़बड़ी में थे। चादर ओढ़े व्यक्ति ने कहा कि हमको पहचानते हैं। मैंने कहा कि नहीं। उन्होंने बताया कि मेरा नाम अजय लाल है और हम भी उम्मीदवार ही हैं। उनके नाम से परिचित ही था। मैंने कहा, चलिए आप से मुलाकात हो गयी। अब तो मिलते रहेंगे।

रामलगन बिगहा के लोगों की समस्या भी अपनी थी। एक साव जी के घर के पास पानी पीने के बहाने ठहरा। साव जी थे, इसलिए पानी के साथ गाजा भी आया। एक वृद्ध महिला आयीं और अपनी समस्याओं का पिटारा खोल दिया। सड़क ऊंची हो गई है। घर का पानी नहीं निकलता है। अगर नाली बन जाएगी तो घर से पानी निकलने लगेगा। लोग मुखिया बन जाते हैं और फिर भूल जाते हैं। हमारी समस्याओं की ओर ध्यान नहीं देते हैं। हर दरवाजे पर नयी समस्या स्वागत के लिए खड़ी मिलती थी। किसी को आंगनबाड़ी सेविका से शिकायत है तो किसी को शिक्षकों से। किसी को अपने पटीदार से भी शिकायत थी। झगड़ा गलियों का था, तो नालियों का भी। कई जगहों पर झगड़ा खड़ा कर न्याय के लिए लाठी के साथ तैनात भी मिले। इंदिरा आवास से लेकर सोलर लाइट तक की उम्मीद मुखिया जी से ही थी। अभी हम मुखिया बनने की प्रक्रिया में थे और लोग समाधान की अपेक्षा मुखिया के तरह कर रहे थे। लोगों की अपेक्षाओं की कोई सीमा नहीं थी और मेरे पास झूठा दिलासा देने का अलावा कोई विकल्प नहीं था।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क kumarbypatna@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा

‘प्रेस क्लब ऑफ मध्य प्रदेश’ की स्थापना हुई

इंदौर। मध्य प्रदेश के विभिन्न प्रेस क्लबों तथा पत्रकार संगठनों को एक सूत्र में पिरोने के उद्देश्य से ‘प्रेस क्लब ऑफ मध्य प्रदेश’ की स्थापना की गई है। प्रेस क्लब ऑफ मध्य प्रदेश में जिला स्तर पर सक्रिय एक प्रेस क्लब या जिला पत्रकार संगठन को सम्बद्धता प्रदान की जाएगी। प्रेस क्लब ऑफ मध्य प्रदेश का संचालन २१ सदस्यीय संचालन समिति करेगी, जिसमें प्रदेश के १० संभागों से दो-दो सदस्य शामिल रहेंगे। प्रत्येक जिले से सम्बद्ध क्लब या संगठन के अध्यक्ष/सचिव प्रेस क्लब ऑफ मध्यप्रदेश के सदस्य रहेंगे।

प्रेस क्लब ऑफ मध्य प्रदेश का मुख्यालय इंदौर प्रेस क्लब परिसर रहेगा। प्रेस क्लब ऑफ मध्य प्रदेश का संचालन २१ सदस्यीय संचालन समिति और संभागीय प्रभारियों द्वारा किया जाएगा। दो माह सदस्यता एवं सम्बद्धता अभियान के पश्चात प्रेस क्लब ऑफ मध्य प्रदेश का पहला अधिवेशन भोपाल में आयोजित किया जाएगा।

अरे बीबीसी! मत करो नुक़्ता का गलत यूज, लोग हो रहे हैं कंफ्यूज!

बीबीसी में उर्दू के नुक़्तों का भरपूर इस्तेमाल हो रहा है। ऐसे नुक़्ते जहां नहीं लगने चाहिए, वहां भी लगाए जा रहे हैं। फिलहाल बीबीसी के होमपेज की सबसे प्रमुख खबर में नुक़्ते के अराजक इस्तेमाल की बानगी देखिए।

प्रिंटशॉट में आप स्पष्ट देख सकते हैं कि हेडलाइन में ज़हर में नुक़्ते को लगाया है लेकिन नीचे रिलेटेड लिंक्स में बिना नुक़्ते का 'जहर' लिखा दिख रहा है। बीबीसी के होमपेज पर ध्यान से देखेंगे तो नुक़्ता लगाने का यह दीवानापन आपको अन्य सेक्शंस में भी दिख जाएंगे।

सवाल यह है कि उर्दू नुक़्ते का भरपूर इस्तेमाल कर बीबीसी अगर भाषा को शुद्ध रूप से लिखना चाहता है तो यह नेक बात है, लेकिन इस तरह के अराजक इस्तेमाल से तो लोग कंफ्यूज हो जाएंगे कि आखिर कहां नुक़्ता लगाएं, कहां नहीं? आशा है बीबीसी इस पर ध्यान देगी।

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

जनता टीवी से जुड़ीं नवजोत सिद्धू, राम मिलन समाचार प्‍लस पहुंचे

वरिष्‍ठ पत्रकार नवजोत सिद्धू के बारे में खबर है कि वो जनता टीवी से जुड़ गई हैं. नवजोत मल्‍टी टैलेंटेड पत्रकार मानी जाती हैं. उन्‍हें जनता टीवी में प्रोग्रामिंग हेड बनाया गया है. इसके अलावा वे एंकरिंग भी करेंगी. नवजोत इसके पहले आजतक, एएनआई, पीटीवी, हिंदुस्‍तान टाइम्‍स, प्रज्ञा, जैन टीवी, ट्रिब्‍यून के अलावा रेडियो को भी अपनी सेवाएं दे चुकी हैं. वे पिछले बारह सालों से मीडिया में सक्रिय हैं. माना जा रहा है कि नवजोत के आने से जनता टीवी को मजबूती मिलेगी.

ईटीवी, हैदराबाद से खबर है कि राम मिलन यादव ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर पैनल प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत थे. राम मिलन चार साल पहले ईटीवी से ही अपने करियर की शुरुआत की थी. इन्‍होंने अपनी नई पारी समाचार प्‍लस के साथ शुरू की है. इन्‍हें यहां पर सीनियर पैनल प्रोड्यूसर बनाया गया है.

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काश मैं भी संजय दत्त होता..!

फिल्म अभिनेता संजय दत्त के लिए राहत भरी खबर है… अरे भई सुप्रीम कोर्ट से सरेंडर करने के लिए चार सप्ताह की मोहलत जो मिल गई है। पांच साल की सजा के बचे हुए साढ़े तीन साल के लिए जेल में सजा काटनी थी… ऐसे में चार सप्ताह की मोहलत के बहाने साढ़े तीन साल की एडवांस कमाई करने का मौका जो मिल गया..! संजय दत्त ने भी तो यही दलील दी थी कि बॉलीवुड का 278 करोड़ रुपया उनकी फिल्मों में लगा है, लिहाजा फिल्मों को पूरा करने के लिए उन्हें 6 माह की मोहलत दी जाए। हालांकि कोर्ट ने संजय दत्त को 6 माह की तो नहीं लेकिन एक माह की मोहलत तो दे ही दी है।

एक दिन पहले ही कोर्ट ने जैबुनिस्सा अनवर काजी की अर्जी खारिज कर दी लेकिन संजय दत्त को 4 सप्ताह की मोहलत दे दी। हालांकि संजय को मोहलत मिलने की उम्मीद कम ही जतायी जा रही थी लेकिन कोर्ट का फैसला सबके सामने है। वैसे ये सिर्फ हिंदुस्तान में ही हो सकता है कि एक व्यक्ति को उसकी व्यवसायिक जिम्मेदारियां पूरी करने के लिए सरेंडर करने के लिए 4 सप्ताह की मोहलत दे दी जाती है, जबकि अलग-अलग मामलों में सजा पाए लोगों को एक घंटे की भी मोहलत नहीं दी जाती..!

हिंदुस्तान में विभिन्न अपराधों में जेल में बंद अपराधियों की भी व्यवसायिक जिम्मेदारियां होती होंगी..? व्यवसायिक न सही पारिवारिक जिम्मेदारियां तो होंगी ही..? कइयों की हालत तो ऐसी होती है कि उनके घर में परिवार के मुखिया के या किसी कमाऊ सदस्य के जेल जाने पर परिवार के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो जाता है..! बच्चों की स्कूल की फीस जमा करने की कोई व्यवस्था नहीं होती है..! जवान हो रही लड़की की शादी के इंतजाम के लिए पैसा उनके पास नहीं होता है, लेकिन किसी को अपनी इन जिम्मेदारियों को पूरा करने की मोहलत नहीं मिलती है..!

संजय दत्त व्यवसायिक जिम्मेदारियों का हवाला देते हैं। बॉलीवुड की 278 करोड़ की फिल्मों का काम अधूरा रहने की दलील देते हैं और उन्हें पैसा कमाने के लिए 4 सप्ताह की मोहलत मिल जाती है। एक तरह से देखें तो साढ़े तीन साल जेल में रहते हुए भी संजय दत्त की फिल्में रीलीज हो रही होंगी..! वे अपनी फिल्मों से जेल में रहते हुए भी पैसा कमा रहे होंगे और जेल से निकलने के बाद उनके पास कम से कम पैसे की तो कोई कमी नहीं होगी..! लेकिन लाखों लोग जो जेल में बंद रहते हैं तो उनके परिवार की क्या हालत होती होगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है..! वे भी आज यही सोच रहे होंगे कि काश हम भी संजय दत्त की तरह फिल्म अभिनेता होते..बड़े आदमी होते तो हमें भी अपनी व्यवसायिक या पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने की मोहलत मिल जाती..!

वे सोच रहे होंगे कि हमारे लिए भी कोई जस्टिस काटजू राष्ट्रपति के पास हमारी सजा माफ करने की अपील करते..! लेकिन अफसोस ये लाखों लोग न तो संजय दत्त हैं और न ही जस्टिस काटजू जैसे कोई सज्जन उनकी सजा माफी के लिए राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखने वाले हैं..! मैं न तो संजय दत्त को सरेंडर करने की मोहलत दिए जाने के समर्थन में हूं और न ही जेल में बंद लाखों अपराधियों के लिए मेरे मन में कोई नरम भाव है, लेकिन एक ही देश में कानून के अलग-अलग रूप कम से कम मुझे तो समझ में नहीं आते..! कानून सबके लिए समान होना चाहिए फिर चाहे वो कोई फिल्म अभिनेता संजय दत्त हो…कोई राजनेता हो…कोई उद्योगपति हो या फिर कोई दूसरा अपराधी..!

लेखक दीपक तिवारी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. उनसे संपर्क ई मेल deepaktiwari555@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

आरपी सिंह रायपुर में बने सन स्‍टार के संपादकीय प्रभारी

वरिष्‍ठ पत्रकार तथा द पायनियर, रायपुर के न्‍यूज को-आर्डिनेटर आरपी सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे लंबे समय से इस अखबार के साथ जुड़े हुए थे. आरपी सिंह ने अपनी नई पारी रायपुर में ही हिंदी दैनिक सन स्‍टार के साथ शुरू की है. उन्‍हें अखबार का संपादकीय प्रभारी बनाया गया है. आरपी सिंह ने अखबार के लिए अपनी टीम तैयार करना शुरू कर दिया है. सन स्‍टार का प्रकाशन रायपुर से जल्‍द ही होने जा रहा है. आरपी सिंह लंबे समय से छत्‍तीसगढ़ की पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

भड़ास तक सूचनाएं आप bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी हिमायत बेग को फांसी की सजा

पुणे। महाराष्ट्र के पुणे में तीन साल पहले हुए जर्मन बेकरी ब्लास्ट के मास्टरमाइंड हिमायत बेग को पुणे की सेशन कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई है। ये पहला मौका है जब इंडियन मुजाहिदीन के किसी आतंकी को सजा सुनाई गई है। जर्मन बेकरी धमाके में 17 लोगों की मौत हुई थी। पुणे के जर्मन बेकरी बम विस्फोट मामले में मिर्जा हिमायत बेग को अदालत ने दोषी ठहराया है। बेग इस मामले में इकलौता गिरफ्तार दोषी है। बेग को हत्या, हत्या की कोशिश, आपराधिक षड़यंत्र और विस्फोटक पदार्थ कानून जैसे मामलों के तहत दोषी ठहराया गया था।

13 फरवरी 2010 को जर्मन बेकरी बम विस्फोट में 5 विदेशियों समेत 17 लोगों की जान गई थी जबकि 60 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे। इंडियन मुजाहिद्दीन के आंतकी हिमायत बेग को जिन धाराओं के तहत दोषी करार दिया गया है। उसके मुताबिक आंतकी बेग को कम से कम आजीवन कारावास की सजा मिल सकती थी। लेकिन 17 परिवार को जिंदगी भर के दर्द में डुबोने वाले इंडियन मुजाहिद्दीन के इस आंतकी को मौत की सजा सुनाई गई।

धमाके के कुछ महीनों बाद ही पुणे के बस स्टैंड से पकड़ा गया हिमायत बेग फिलहाल येरवडा जेल में बंद है। पुलिस ने इस मामले में कतील सिद्दीकी नाम के एक और आरोपी को गिरफ्तार किया था, लेकिन येरवडा जेल में उसकी हत्या कर दी गई थी। इस मामले में दूसरे छह आरोपी फरार हैं, जिसमें बम रखनेवाले रियाज और यासीन भटकल भी शामिल है, बाकी चार जो कि धमाके के सूत्रधार हैं वो भी फरार हैं। (आईबीएन)

हिंदुस्तान अलीगढ़ में क्यों नहीं रुक पा रही हैं महिला रिपोर्टर?

: कानाफूसी : हिंदुस्तान, अलीगढ़ इन दिनों नई समस्या से जूझ रहा है। समस्या वहां महिला रिपोर्टरों के अधिक दिनों तक न रुक पाने की है। किसी की समझ में नहीं आ पा रहा है कि माजरा क्या है। वहीं कुछ महिला रिपोर्टरों का कहना है कि माहौल खराब होने के चलते उन्हें ऐसा करना पड़ रहा है। कुछ समय पूर्व यहां महिला रिपोर्टरों की संख्या पांच तक थी। इसके बाद संपादकीय में परिवर्तन हुआ और उसका असर इन महिला रिपोर्टरों की संख्या पर दिखने लगा। एक-एक कर सभी छोड़ती चली गई।

हालांकि सूत्रों का कहना है कि ज्यादातर को मानकों पर खरा न उतरने की बात कहकर मना कर दिया गया। यह मानक क्या थे, यह बात अभी खुलकर नहीं बताई जा रही है। हाल ही में एकमात्र रिपोर्टर ने हिंदुस्तान को बाय कह दिया। इसकी कई बाइलाइन फ्रंट पेज पर प्रकाशित हुई थी, मगर उसे किस वजह से छोड़ना पड़ा यह भी नहीं बताया जा रहा। एक महिला रिपोर्टर ने इतना जरूर कहा कि मीटिंग में जिस प्रकार से बातें की जाती हैं वह उसे पसंद नहीं था। मर्यादा और संसदीय भाषा को ताक पर रखकर वरिष्ठ बातें करते हैं।

जिस अखबार की चेयरपर्सन महिला हो उसमें यह सब हो रहा है, लोगों को यह काफी अचरज की बात लग रही है। खुद हिंदुस्तान ने हाल ही में महिलाओं के लिए अभियान शुरू किया है, जिसमें कहा जाता है कि असली मर्द सताते नहीं बचाते हैं…. मगर खुद हिंदुस्तान में महिलाओं को सताने का काम चल रहा है। ऐसे में काम करना बहुत मुश्किल है। हालांकि इस समस्या से जूझ रहे हिंदुस्तान ने अन्य महिला रिपोर्टरों को खोजने का जिम्मा हाल ही में आए एक अन्य नौसिखए पत्रकार को दे रखा है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

जागरण, रामगढ़ के प्रभारी बने तरुण बागी, महाराजगंज में भी होंगे बदलाव

दैनिक जागरण, रामगढ़ से खबर है कि तरुण बागी को फिर से ब्‍यूरोचीफ बना दिया गया है. जागरण के संपादक मुकेश भूषण ने सभी सहयोगियों की उपस्थिति में उनकी ताजपोशी की है. तरुण इसके पहले भी जागरण के रामगढ़ ब्‍यूरोचीफ रह चुके हैं. तत्‍कालीन संपादक संत शरण अवस्‍थी ने उन्‍हें 2007 में हटा दिया था. 2010 में अवस्‍थी ने ही उन्‍हें रामगढ़ रिपोर्टर के तौर पर बहाल कर दिया था. तरुण लंबे समय से जागरण से जुड़े हुए हैं.

दैनिक जागरण, महाराजगंज से खबर है कि यहां दो तहसील प्रभारियों को बदला जा रहा है. नौतनवा तहसील के प्रभारी केदारनाथ को निचलौल तथा निचलौल के प्रभारी विजय सिंह को आनंदनगर तथा आनंदनगर के प्रभारी विश्‍वदीपक मिश्र को नौतनवा भेजे जाने की तैयारी की जा रही है.

आजतक नम्‍बर वन, इंडिया न्‍यूज ने डीडी और तेज को पीछे छोड़ा

पंद्रहवें सप्‍ताह की टीआरपी आ गई है. पिछले सप्‍ताह के झटके से आईबीएन7 अब तक नहीं उबर पाया है. उसे इस सप्‍ताह भी नुकसान हुआ है. आजतक नम्‍बर वन बना हुआ है लेकिन इंडिया टीवी ने उससे अपनी दूरी कम कर ली है. पिछले सप्‍ताह आंशिक नुकसान में रहा इंडिया न्‍यूज इस सप्‍ताह फिर से बढ़त की राह पर लौट आया है. इंडिया न्‍यूज डीडी न्‍यूज, तेज को पीछे छोड़ दिया है, जो पिछले सप्‍ताह इसके ऊपर आ गए थे. दीपक चौरसिया और राणा यशवंत की जोड़ी एक बार फिर फार्म में आ गई है.

पिछली बार सबसे ज्‍यादा फायदा उठाने वाले डीडी न्‍यूज को इस बार झटका लगा है. इस बार डीडी के अलावा तेज को भी एक अंक से ज्‍यादा का नुकसान हुआ है. इस सप्‍ताह जी को सबसे ज्‍यादा फायदा हुआ है लेकिन उसके स्‍थान में कोई परिवर्तन नहीं आया है. पंद्रहवें सप्‍ताह की टीआरपी इस प्रकार है….

WK 15 2013, (0600-2400)

Tg CS 15+, HSM:

Aaj Tak 18.2 dn 0.2

India TV 17.4 up 0.5

ABP News 14.4 dn 0.6

ZN 11.1 up 1.1

News 24 9.0 up 0.9

NDTV 6.0 dn 0.4

IBN 5.7 dn 0.2

India news 5.4 up 0.8

Tez 4.9 dn 1.2

DD 3.8 dn 1.1

Samay 2.4 up 0.2

Live India 1.6 up 0.1

लिपिक का वेतन 20 वर्षों से एक हजार

अम्बेडकरनगर : उत्तर प्रदेश के जपनद अम्बेडकरनगर स्थित सहायक महानिरीक्षक निबंधन कार्यालय में एक शिविर सहायक पिछले दस वर्षों से भी अधिक समय से नियत वेतन पर सेवारत है, उसके साथ के नियुक्त सभी कर्मचारियों को तो नियमित शिविर सहायक के रूप में नियुक्त कर दिया गया है, किन्तु सभी औपचारिकताएं एवं अर्हताएं पूरी करने के बावजूद एक शिविर सहायक को विनियमितीकरण के लिए भटकना पड़ रहा है।

उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने 15 फरवरी 2000 को इस कर्मचारी को विनियमितीकरण करने एवं वेतनमान दिये जाने का आदेश पारित किया था, किन्तु उच्च न्यायालय के आदेशों का अनुपालन विभाग में नही हो रहा है, इस कर्मचारी ने थक हार कर एक बार फिर से महानिरीक्षक निबंधन उत्तर प्रदेश इलाहाबाद से विनियमितीकरण एवं शासन द्वारा मान्य वेतनमान देने की मांग की है। मामला अतुल कुमार द्विवेदी का है। वे वर्तमान में शिविर सहायक नियत वेतनमान पर कार्यालय सहायक महानिरीक्षक निबंधन अम्बेडकरनगर में तैनात है। उनकी नियुक्ति निबंधन विभाग में महानिररीक्षक निबंधन द्वारा दिनांक 3 नवम्बर 1990 को लिपिक के पद पर मुख्यालय इलाहाबाद में की गयी थी। नियुक्ति की तिथि से समाचार लिखे जाने तक द्विवेदी निरन्तर विभाग द्वारा दिये गए दायित्वों का उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से निर्वहन कर रहे है। दुर्भाग्यवश अभी तक उन्हें नियत वेतनमान एक हजार रू. मात्र मासिक वेतन विभाग द्वारा दिया जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि द्विवेदी को 23 नवम्बर 1990 को लिपिक पद पर तैनात किया गया था। आदेश थे कि द्विवेदी को लिपिक पद पर दिनांक 17 फरवरी 1991 या नियमित चयन तक जो भी पहले हो मुख्यालय में नियुक्त किया जाता है। इसी तिथि से वह समाचार लिखें जाने तक कार्य कर रहा था दिनांक 30 जुलाई 1991 को सहायक महानिरीक्षक निबंधन बाराबंकी के कार्यालय में शिविर सहायक के पद पर उन्हें 950/1500 के वेतनमान पर नियमित शिविर सहायक के रूप में कर दिया गया, किन्तु उनका नियमित चयन विभाग द्वारा नहीं किया गया। जबकि उसके साथी अभिनन्दन मिश्रा का चयन नियमित कर दिया गया जबकि द्विवेदी मिश्रा की ही भांति सभी अर्हताएं रखता था। अतुल कुमार द्विवेंदी की नियुक्ति की तरह ही विनोद कुमार श्रीवास्तव, कृपा सिन्धु मिश्र, धनेश्वर प्रसाद, प्रमोद नारायण शुक्ल एवं उपेन्द्र नाथ सिन्हा, मुरारी लाल शर्मा, द्विवेश प्रसाद तिवारी, राम अभिलाष तिवारी को तदर्थ वेतन पर छह माह अथवा एक वर्ष के लिए रखा गया। इनमें से सभी कर्मचारी महानिरीक्षक निबंधन द्वारा नियमित किये जा चुके है, किन्तु द्विवेदी को आज तक नियमित नहीं किया गया।

विनियमितीकरण न होने के कारण अतुल कुमार द्विवेदी ने एक रिट याचिका न्यायालय में योजित की जिस पर उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने द्विवेदी को हटाये जाने पर रोक लगा दी, जिसके आधार पर वह अभी भी सेवाएं दे रहा है। द्विवेदी वर्ष 1990 से आज तक निरंतर शिविर सहायक के पद पर कार्यकर रहा है, किन्तु विभाग द्वारा नियत वेतनमान मात्र एक हजार रुपये मात्र ही दिया जा रहा है, जबकि वह नियमित लिपिक के रूप में पूरा कार्य सम्पादित कर रहा है। मजेदार बात यह है। कि समय-समय पर महानिरीक्षक निबंधन द्वारा उसका स्थानान्तरण भी किया जाता रहा है। उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने 15 फरवरी 2000 को अतुल कुमार द्विवेदी को विनियमितीकरण करने एवं वेतनमान दिये जाने का आदेश पारित किया, किन्तु उच्च न्यायालय के आदेशों का अनुपालन विभाग में नहीं हो रहा है। आखिर यह कर्मचारी जाए तो जाए कहा?

इलाहाबाद से मोहित कुमार द्विवेदी की रिपोर्ट.

रीवां से लांच हुआ मध्‍य प्रदेश में पत्रिका का आठवां एडिशन

पत्रिका ने एमपी से अपना नया एडिशन रीवां से लांच कर दिया है. मध्‍य प्रदेश में पत्रिका का यह आठवां एडिशन होगा. कुछ दिन पहले ही पत्रिका ने सतना से अपना सातवां एडिशन लांच किया था. इसके बाद ही प्रबंधन ने घोषणा की थी कि अगला कदम रीवा में रखा जाएगा. रीवां में अखबार की शुरुआत 21 हजार कॉपियों के साथ की गई है.

प्रबंधन की योजना रीवां एडिशन के जरिए यूपी के भी सीमावर्ती इलाकों को कवर करने की है. रीवां में पत्रिका का मुकाबला दैनिक भास्‍कर के साथ दैनिक जागरण से भी होगा. ये दोनों अखबार पहले से ही प्रकाशित होते आ रहे हैं. पत्रिका एमपी में भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन, रतलाम और सतना से पहले ही प्रकाशित हो रहा है.

टीआरपी सिस्‍टम में पारदर्शिता के लिए ट्राई ने जा‍री किए दिशा-निर्देश

टीआरपी यानी टेलीविजन रेटिंग को लेकर लगातार मिल रही शिकायतों के बाद ट्राई ने टेलीविजन रेटिंग एजेंसियों के लिए दिशा-निर्देश जारी किया है. रेटिंग एजेंसियों में पारदर्शिता एवं जवाबदेही तय करने के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने ट्राई से दिशा-निर्देश तैयार करने के लिए कहा था. टीआरपी रेटिंग को लेकर हमेशा से ही सवाल खड़े होते रहे हैं. कई चैनलों ने सरकार से टैम की शिकायत भी कर चुकी हैं.

टीआरपी दर्शकों द्वारा देखे जाने वाले कार्यक्रमों के आधार पर तय की जाती है. कुछ खास शहरों में लगाए गए बाक्‍सों के जरिए टीआरपी की गणना की जाती है. इसके लिए जरिए ही विभिन्‍न चैनलों तथा कार्यक्रमों की रेटिंग तक की जाती है. इस प्रक्रिया में पारदर्शिता का भारी अभाव है. टीआरपी से विज्ञापनदाता, विज्ञापन एजेंसियों को मदद मिलती है. टीआरपी के आधार पर ही प्रसारणकर्ता कंपनी अपनी ब्रांडिंग करती है. इसलिए लंबे समय से पारदर्शी दर्शक संख्‍या बताने वाली रेटिंग प्रणाली की आवश्‍यकता महसूस की जा रही थी.

भारत में केवल एक टेलीविजन रेटिंग एजेंसी काम कर रही है, जिससे गड़बड़ी की आशंका ज्‍यादा बढ़ जाती है. इस क्षेत्र में प्रतियोगिता नहीं होने से अनेकों पर रेटिंग सेवाओं को लेकर सवाल उठाए गए हैं. भरोसेमंद टीआरपी प्रणाली नहीं होने से टीवी उद्योग का विाकस प्रभावित हो सकता है. इसलिए टीआरपी को भरोसेमंद और जवाबदेह बनाने के लिए ट्राई ने निम्‍नलिखित दिशा निर्देश जारी किए हैं.

– रेटिंग एजेंसियों के लिए मान्‍यता प्रणाली स्‍थापित करना

– दर्शकों की संख्‍या जांचने के लिए प्रणाली

– नमूने का आकार

– रेटिंग की बिक्री और प्रयोग

– सूचना और जानकारी देने की आवश्‍यकता

– लेखा परीक्षा

– रेटिंग सेवाओं में प्रतियोगिता

– नमूने वाले वाले घरों की गोपनीयता

– रेटिंग एजेंसियों और उनके प्रयोगकर्ताओं के बीच क्रास होल्डिंग

– शिकायतें दूर करने की प्रणाली

अरेस्‍ट आर्डर के बाद कोर्ट परिसर से भाग निकले परवेज मुशर्रफ

इस्लामाबाद: पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की जमानत अर्जी को इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने ठुकरा दिया है। जजों की नजरबंदी के मामले में हाईकोर्ट ने मुशर्रफ को झटका देते हुए उनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए हैं। स्थानीय मीडिया के मुताबिक कोर्ट का आदेश आते ही कथित रूप से उनके निजी सुरक्षाकर्मी उन्हें कोर्ट से बाहर ले आए, और वह अपनी बुलेटप्रूफ एसयूवी में सवार होकर चले गए। कोर्ट से मुशर्रफ चक शहजाद स्थित फॉर्म हाउस पहुंचे हैं।

इस बीच, जनरल परवेज मुशर्रफ के प्रवक्ता ने कहा है कि मुशर्रफ कानूनी रास्ते पर अमल करेंगे। प्रवक्ता रजा बुखारी के मुताबिक वह भागे नहीं हैं… यह सही तथ्य नहीं है। उन्हें पाकिस्तानी तंत्र की भारी सुरक्षा मिली हुई है… खतरा देखते हुए यह बढ़ा दी गई थी। गौरतलब है कि नवंबर 2007 में मुशर्रफ ने 60 जजों को नजरबंद किया था। 2009 में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। इसी मामले में अब उनकी जमानत रद्द की गई है।

इससे पहले, हाईकोर्ट ने गत शुक्रवार को मुशर्रफ की अग्रिम जमानत अवधि को छह दिन के लिए बढ़ा दिया था, जिसकी मियाद पूरी हो चुकी है। उल्लेखनीय है कि मुशर्रफ का संसद में पहुंचने का ख्वाब संसदीय चुनाव से करीब एक महीने पहले ही चकनाचूर हो चुका है। पाकिस्तान में 11 मई को होने जा रहे संसदीय चुनाव के लिए निर्वाचन न्यायाधीकरण ने चितराल सीट से मुशर्रफ के नामांकन को पिछले दिनों खारिज कर दिया था। सिर्फ इसी सीट से उनके नामांकन पत्र को स्वीकार किया गया था। (एनडीटीवी)

फारवर्ड प्रेस से जुड़े आशीष एवं कोमल ठाकुर

संवाददाताओं की दूसरे चरण की नियुक्तियों के आरंभ के साथ ही फारवर्ड प्रेस कोमल ठाकुर को कालका, दिल्‍ली संवाददाता नियुक्‍त किया है। सुश्री ठाकुर इससे पहले रफ्तार टाइम्‍स तथा आईबीएन 7 के लिए कुछ समय तक काम कर चुकी है। दूसरी तरफ आशीष फारवर्ड प्रेस गया (बिहार) संवाददाता बनाए गये हैं। वे इससे पहले नई दुनिया में बतौर संवाददाता तथा प्रभात खबर में बतौर ब्‍यूरो चीफ, सीवान काम कर चुके हैं।

गौरतलब है कि, फारवर्ड प्रेस ने जिला मुख्‍यालय स्‍तर के संवाददाता पद के अलावा अपने दिल्‍ली कार्यालय के लिए उपसंपादक (हिंदी), उप संपादक (बेब, बाईलिंगुल), टेली कॉलर, तथा विज्ञापन एक्‍सक्‍यूटिव के पदों के लिए भी 30 अप्रैल तक आवेदन मांगे हैं। इन पदों के लिए आवेदन इस ईमेल आईडी पर भेज जा सकते हैं – info@forwardmagazine.in

How Rajeev Shukla manages to keep everyone happy

: Minister of state for parliamentary affairs, IPL chairman, Congress spokesperson, Sonia Gandhi loyalist, Shah Rukh Khan’s BFF: Rajeev Shukla wears many hats with consummate ease. Kushan Mitra profiles the ultimate networker who has all the private numbers that matter :

An oft-repeated story about Rajeev Shukla goes like this. Sometime in the late 1980s, Rajiv Gandhi, the then prime minister of India, was returning from his South Block office when he saw Shukla walking down the road. Gandhi asked his driver to pull over and beckoned Shukla to get inside. Shukla was then a journalist with Ravivar, a weekly Hindi news magazine.

Today, Shukla, 53, is the minister of state for parliamentary affairs, a member of the Rajya Sabha (from Uttar Pradesh), a Congress spokesperson, the chairman of the Indian Premier League (IPL), a Sonia Gandhi loyalist, the most vociferous proponent of the ‘only Sachin Tendulkar will decide when he has to retire’ school of thought, and, among other things, secretary of the All India Congress Committee. “He is the ultimate networker, numero uno, the best India has ever seen,” says Chandan Mitra, a BJP Rajya Sabha MP and the editor of Pioneer. “He has the most powerful phonebook in the country – all the private numbers that matter.”

So, how did a journalist at a regional publication became so influential in national politics? Let us, again, turn back to the 1980s. Shukla started getting chummy with Rajiv Gandhi when Gandhi had just

राजीव शुक्‍ला
joined the Congress as its general secretary. Through his stories in Ravivar, Shukla tried to shield the Gandhi family from the taint of the Bofors scandal during VP Singh’s tenure as prime minister. “Shukla has one skill that many lack: he has the presence of mind to sense which way the political winds are blowing. Whether it was his decision to join the Congress, or to become friendly with Rajiv (Gandhi) – all this shows that skill”, says a colleague of Shukla from his Sunday Observer days. Shukla joined the Ambani-owned Sunday Observer as its executive editor in 1992 and held senior editorial positions at the now-defunct newspaper till 2000. “Most Observer journalists are closer to Anil Ambani, because Dhirubhai let Anil run this show,” says the former colleague. “Sure, Mukesh attended the occasional meeting and learnt a lot about media control, but Anil was the boss. But when the family division was taking place, Rajeev saw the writing on the wall, and chose the winner.”

Shukla’s formal political career began with the Loktantrik Congress (LCP), a short-lived offshoot of the Indian National Congress that was formed to prop up the Kalyan Singh-led BJP government in Uttar Pradesh. In the state’s Rajya Sabha elections, in 2000, Shukla became the only LCP candidate to win a seat. Even though the LCP had a total strength of 20, Shukla bagged a staggering 50 votes, thanks to cross-voting. According to the April 2000 edition of Frontline magazine, the “elections were marked by unprecedented cross-voting and horse-trading and the results upset all political calculations. Significantly, it was the BJP that was the worst affected… The two BJP candidates who won in the first round were union surface transport minister Rajnath Singh and former union minister Sushma Swaraj. However, these stalwarts were no match for Rajeev Shukla, a journalist-turned politician – they won fewer votes than Shukla. Shukla’s victory is all the more significant because a section of the 20 UPLC MLAs, led by minister Amar Mani Tripathi, had opposed his candidature.” The report went on to add: “The grapevine said, during the run-up to the elections, two powerful industrial groups backed Shukla.”

Here, then, you have a striking portrait of Shukla the consummate networker, Shukla the canny politician (fittingly, Shukla used to pen a column called ‘Power Play’, which, according to his infrequently updated official website, rajeevshukla.com, “appears in 14 newspapers in the country, including the Indian Express, Dainik Jagran, Sunday Magazine and Rediff on Net”).  After making his debut in the Rajya Sabha, Shukla would serve as a member of the NDA Coordination Committee, before joining the Congress, in 2003.

Why did Shukla shift to the Congress? One political journalist describes Shukla as “a native Congressman”. Shukla might not be one, but he is, at any rate, very close to Sonia Gandhi – and has been so for years. Shukla was among those who stood by Sonia when senior Congressmen eased out former Congress president Sitaram Kesri in the late 1990s. During the Atal Bihari Vajpayee government days, Shukla, says a senior BJP politician, was a conduit between the NDA and Sonia Gandhi. And today, he adds, Shukla is a conduit between the Congress and the BJP.

Shukla owes a lot of his success to his most conspicuous trait, geniality. Shukla, says Diwakar, political editor of The Times of India, has an extremely pleasant demeanour. “You will not hear him publicly say anything bad about anybody. He is always smiling. He is somebody people can trust, no matter what their political affiliations might be.” In a city that abounds with blabbermouths spreading political rumours, Shukla stands out. Politicians of all hues, when asked to describe the man, often simply answer, “Badiya aadmi hai!” (What a great guy!).

More than anything else, it’s Shukla’s discreetness that distinguishes him from that other great networker of Delhi, Amar Singh. “Shukla is a much nicer person than Amar Singh,” says a BJP leader.

But is Shukla a clean politician? Before we delve into the question, some facts must be put in order. In 2011, Shukla and his wife, Anuradha Prasad, who owns the news channel News 24, had a combined worth of Rs 16.56 crore, according to the declaration made by the prime minister’s office on the assets of all its union ministers. Last year, this figure shot up to Rs 29.25 crore – “the most meteoric rise”, said one media report. “Shukla’s wife alone is worth Rs 23.34 crore, including the value of shares she holds in her company. Shukla’s own assets have grown from Rs 1.8 crore in 2011 to Rs 5.9 crore in 2012 — that includes Rs 1.7 crore in fixed deposits,” the report continued.

Here’s what one BJP leader has to say on the subject. “Amar Singh was an industrialist in his own right, and there was the sense that he had enriched himself immensely. Now, while Shukla’s TV channel makes some money and the value of the channel has risen considerably, there is no sense that he has engorged himself.” But there are those who disagree. For instance, a senior political journalist with a leading news channel alleges that Shukla has made a “pretty penny” in his role as a conduit between a large industrial group and political circles in New Delhi.

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A rather hirsute Sourav Ganguly twirling his shirt in the air after India’s win over England in the 2002 Natwest series has got to be among the most iconic images of Indian cricket. But remember that figure in black next to Dada? It was none other than Shukla, then manager of the Indian team.

Shukla entered Indian cricket’s administration in the mid-1990s, and, over the years, his influence has steadily grown. The BCCI has 30 affiliated associations, and Shukla, as a representative of the Uttar Pradesh Cricket Association, has survived several tenures in the board, under vastly different dispensations – from Jagmohan Dalmiya’s to Sharad Pawar’s to N Srinivasan’s. It is said that Shukla has employed his connections to aid other politicians’ entry into cricket administration; rumour has it that he helped Narendra Modi become the Gujarat Cricket Association’s chief. Further, his ability to keep everyone happy means he has often played the role of a troubleshooter in an environment where egos are as bloated as they are in mainstream politics.

As a former vice president of the BCCI and the commissioner of the Indian Premier League, Shukla is certainly the second-most important personality in Indian cricket administration today. But, while Srinivasan’s term is fixed, Shukla is almost certain to carry on. “Why should he become the BCCI president?” says Indranil Basu, a sports writer with The Times of India. “What do you do after that? There is no post-retirement role for a former BCCI president.” That is the reason why some people want to amend the BCCI constitution — to allow for second terms; but until that happens, Shukla will prefer being the kingmaker rather than the king.

Shukla shares a great rapport with many Indian cricketers. And he’s also, through B.A.G Films’ (his wife’s production house) network of entertainment and radio channels, extremely close to Bollywood. Shukla is very adept at managing the heady cocktail of politics, cricket and Bollywood. “If you are an industrialist who wants a cricketer or a starlet at one of your functions, you must call Rajeev. He is what you might call a super-manager,” says a senior journalist.

To gauge Shukla’s Bollywood influence, one need only cite the much-hyped Shah Rukh Khan detention episode. When SRK got into trouble with the American authorities at Newark airport, in New Jersey, the first person he telephoned was Shukla, who, after doing what he could, promptly broke the news of the actor’s detention on his news channel, News 24. “There is seldom a reason to doubt the political news on News 24, as it usually comes straight from the horse’s mouth,” says a senior TV journalist.

The ambitious Shukla, however, is not content with running a Hindi channel. Almost everyone we spoke to believes that Shukla is itching to start an English news channel. It’s widely believed that more than one third of news channels in India are either owned by politicians or by builders affiliated to politicians. Shukla, says a senior TV journalist, has always felt that English channels have exercised a disproportionate influence on politics. “I will not be surprised if he starts an English news channel before the next general election,” adds the journalist.

The 2014 general election is going to be a very interesting affair; but there’s a consensus that, no matter who wins, Shukla will land on his feet.  And no matter what the outcome will be, we will continue to see Shukla entertain TV reporters.  As one journalist-turned-politician says, “He has a natural eye for publicity. He understands a photograph not from the subject’s point of view but from the lensman’s point of view. Before the TV era, he always managed to get himself clicked in the picture of the day. When the BJP-led NDA alliance was in power, Shukla always used to manage to stand behind Atalji.” (Courtesy : MW)

वो खुद को झुलसाता रहा और मंत्री जी बैठे तमाशा देखते रहे

चंदौली में अंधविश्वास के नाम पर आस्था का ऐसा खेल हुआ जिसके बारे में जानकर आपकी रुह कांप जाएगी. वो भी राज्‍य के एक मंत्री के सामने. विशेष पूजा के लिए भोले-भाले लोगों ने अपने ऊपर खौलता हुआ दूध डालकर खुद को आग झुलसा सा लिया. यही नहीं मंत्रीजी इसे जायज भी ठहरा रहे हैं. उनका कहना है कि इसमें कहीं कोई गलत बात नहीं है. यह दिखावा नहीं बल्कि श्रद्धा से जुड़ा मामला है. उन्‍होंने कहा, 'इस तरह के कार्यक्रमों से सबका उत्साह बढ़ता है. यह आस्था है और इसमें हम सभी को जब भी मौक़ा मिले शामिल होना चाहिए. हम यहां आए हैं क्‍योंकि हमारी भी इसमें श्रद्धा है. हमें बहुत अच्छा लगा.'

कहने को तो चंदौली में नवरात्र में होने वाली खास पूजा हो रही थी, लेकिन यहां पुजारी पूजा से ज्‍यादा स्टंट दिखाने में यकीन रखता है. धार्मिक अनुष्‍ठान के नाम पर पुजारी ने सैकड़ों लोगों के सामने अपना सिर अग्निकुंड में डाल दिया. और तो और राज्य के परिवहन मंत्री दुर्गा यादव इस स्‍टंटबाजी के मुरीद हैं. स्थानीय लोगों में पूजा की इस परंपरा को 'कराह' पूजा कहा जाता है और पुजारी का दावा है कि इसके लिए उसे मां दुर्गा ने खास शक्ति दी हुई है.

पुजारी लोगों को यकीन दिलाता है कि यहां जो कुछ भी होता है वो सब भगवान का चमत्कार है. लोगों को भी पुजारी पर भरोसा है और उन्हें लगता है कि इसी विशेष पूजा की वजह से गांव पर विपत्ति नहीं आती और खुशहाली बनी रहती है. हैरानी तब होती है जब सूबे के परिवहन मंत्री दुर्गा यादव भी अपने लाव-लश्‍कर के साथ बाबा का खेल देखने पहुंचते हैं. ऐसे ओहदेदार से यह उम्मीद की जाती है कि वो इस तरह के पाखंड पर लगाम लगाने की कोशिश करेंगे, लेकिन यहां तो उल्‍टे मंत्री महोदय ने कसीदे गढ़ दिए.

चंदौली से संतोष जायसवाल की रिपोर्ट.

दबंग दुनिया से अनिल धूपर का इस्‍तीफा

कुछ महीने पहले ही दबंग दुनिया में सलाहकार के रूप में ज्‍वाइन करने वाले अनिल धूपर ने संस्‍थान को अलविदा कह दिया है. हालांकि अनिल धूपर के इस्‍तीफा देने के कारणों का पता नहीं चल पाया है. वे कहां ज्‍वाइन करने वाले हैं इसकी भी जानकारी नहीं मिल पाई है. वे नईदुनिया से इस्‍तीफा देकर दबंग दुनिया से जुड़े थे लेकिन वे यहां भी ज्‍यादा दिन तक टिक नहीं पाए. किसी जमाने में दैनिक भास्‍कर के मार्केटिंग हेड रहे अनिल धूपर की मीडिया जगत में तूती बोलती थी.

अनिल धूपर सहारा समय, राज एक्‍सप्रेस से भी जुड़े रहे हैं. बताया जा रहा है कि दबंग दुनिया की लगातार खराब होती हालत के चलते ही अनिल धूपर ने इस्‍तीफा दिया है. संभावना है कि आने वाले दिनों में कई और लोग संस्‍थान को अलविदा कह सकते हैं. गुटखा पर पाबंदी लगने के बाद से ही दबंग दुनिया की हालत पतली हुई है.

नवरंग व रसरंग को बंद करना चाहता है भास्‍कर! दो लोग न्‍यूज सेक्‍शन में शिफ्ट

दैनिक भास्‍कर पंजाब से खबर मिली है कि पंजाब मैगजीन सेक्‍शन में बड़े स्‍तर पर बदलाव किए गए हैं। बुधावार को दैभा के चंडीगढ़-पंजाब के संपादक दीपक धीमान ने पंजाब मैगजीन हेड नव्‍यवेश नवराही से बात कर टीम में से दो सदस्‍य हटकार समाचार सेक्‍शन में शिफ्ट कर दिए। पंजाब मैगजीन सेक्शन अभी श्री नवराही ही देखेंगे। सूत्रों से यह जानकारी भी मिली है कि दैनिक भास्‍कर ग्रुप सभी एडिशनों में रसरंग और नवरंग को बंद करना चाहता है। इसकी जगह कोई और विकल्‍प ढूंढ़ा जा रहा है।

सूचना है कि रसरंग और नवरंग अब केवल पंजाब के लिए ही बनाए जाएंगे। अभी यह तय नहीं है कि पंजाब के लिए बनने वाला रसरंग जयपुर में डिज़ाइन किया जाएगा या फिर लुधियाना में। इससे पहले नवरंग को सेंटरलाइज किया गया था, जिसका डिजाइन जयपुर में किया जा रहा है, जबकि सारा मैटर और प्‍लान पंजाब टीम कर रही है। यह भी सूचना है कि एक सर्वे में जयपुर से पंजाब के लिए बनाया जाने वाला नवरंग प्रतिद्वंद्वी समाचार पत्रों के मैगजीनों से लगातार पिट रहा है।

उल्‍लेखनीय है कि शुरुआत में दैभा ने पाठकों से सातों दिन मैगजीन या फीचर पेज देने का वादा किया था, मगर अब धीरे-धीरे मैगजीन और फीचर पेज बंद किए जा रहे हैं। ऐसे में पाठकों का भरोसा तो भास्‍कर से उठ ही रहा है, दैनिक भास्‍कर की साख भी पंजाब में लगातार गिर रही है। सूत्रों से यह जानकारी भी मिली है कि दैभा लुधियाना से कार्य छोड़कर गए साथियों की जगह प्रबंधन नए लोगों को लाने का इच्‍छुक है। इस संबंध में गुपचुप तरीके से कई लोगों से बात की गई, मगर भास्‍कर मैनेजमेंट की अस्‍थिर नीतियों को देखते हुए कोई भी ज्‍वाइन करने को तैयार नहीं है।

सहारा से पहले ओसियान पर गिरी गाज, तीन महीने में लौटाने होंगे पैसे

मुंबई : नियामक से मंजूरी लिए बिना आम लोगों से धन जुटाने वाले कला कोषों के खिलाफ अपनी पहली कार्रवाई में बाजार नियामक सेबी ने ओसियान के आर्ट फंड को अपनी ‘सामूहिक निवेश योजना’ बंद करने और 3 महीने के भीतर निवेशकों को 10 प्रतिशत ब्याज के साथ पैसा लौटाने को कहा।

सेबी ने यह भी कहा कि अगर योजना बंद कर निवेशकों को तीन महीने के भीतर पैसा लौटाने की रिपोर्ट दाखिल नहीं की जाती है तो वह ‘संभावित धोखाधड़ी, ठगी, विश्वासघात और सार्वजनिक कोष के गलत इस्तेमाल’ के लिए ओसियान और उसके प्रवर्तकों, निदेशकों और अन्य शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही शुरू करेगा।

ओसियान के खिलाफ करीब छह साल तक चली जांच के बाद अपने अंतिम आदेश में सेबी ने सहारा मामले का भी जिक्र किया जिसमें सहारा समूह की दो गैर-सूचीबद्ध कंपनियों को उच्चतम न्यायालय द्वारा निवेशकों को 24,000 करोड़ रुपये से अधिक धन लौटाने का आदेश दिया गया। ओसियान की विभिन्न स्कीमों द्वारा जुटाई गई कुल राशि का पता नहीं लगाया जा सका। उल्लेखनीय है कि सेबी ने इस मामले में 2007 में जांच शुरू की थी। (एजेंसी)

शर्मसार दिल्‍ली महफूज नहीं! स्कूल जा रही छात्रा को अगवा कर गैंगरेप

: एक आरोपी अरेस्‍ट : नई दिल्ली। चार्टर्ड बस में नाबालिग से बलात्कार की वारदात के बाद दिल्ली में एक बार फिर गैंगरेप का मामला सामने आया है। दिल्ली के न्यू अशोक नगर में तीन लड़कों ने दसवीं की छात्रा को स्कूल जाते वक्त गाड़ी में अगवा कर लिया और उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है जो कि रिश्ते में लड़की का भाई लगता है, जबकि उसके दो दोस्त अभी फरार हैं। लड़की को मेडिकल जांच के लिए भेज दिया गया है। पुलिस मामले की छानबीन में जुट गई है।

पीड़ित के घरवालों का आरोप है कि तीनों आरोपियों ने 10वीं की छात्रा को दिनदहाड़े उस वक्त गाड़ी में अगवा किया जब वो अपनी सहेलियों के साथ स्कूल जा रही थी। एक स्कॉर्पियो पर सवार तीन युवकों ने एक छात्रा को जबरन गाड़ी में बिठा लिया और उसे सरोजनी नगर इलाके के एक फ्लैट में ले गए। पीड़िता के मुताबिक, युवकों ने उसके साथ गैंगरेप किया। इस घिनौनी वारदात को अंजाम देने के बाद तीनों बदमाशों ने लड़की को सरोजनी नगर में ही छोड़ दिया।

लड़की किसी तरह अपने घर पहुंची और फिर घरवालों को आपबीती सुनाई। बाद में मामला पुलिस के पास पहुंचा। मेडिकल जांच में रेप की पुष्टि होने के बाद पुलिस ने कई धाराओं में मामला दर्ज कर लिया। आनन-फानन में प्रदीप नाम के एक आरोपी की गिरफ्तारी भी हुई। पुलिस का कहना है कि गिरफ्तार आरोपी प्रदीप छात्रा का रिश्तेदार ही है। फिलहाल पुलिस को अब बाकी 2 आरोपियों की तलाश है। इस वारदात ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि राजधानी दिल्‍ली में में महिलाएं बिलकुल महफूज नहीं हैं।

EIILM Pharma और उमर मंजूर ने छात्रों से ठगे लाखों रुपये

This Education Scam/fraud in J&K at Ramban District which we hear and see happen ending year of 2011 when few members of EIILM Pharma, Kolkata (www.eiilmpharma.com), came in our college namely GDC, Ramban recognized by University of Jammu, Jammu and they (visiting members of EIILPharma) interact with students for their programme namely MBA in Pharma after the said interaction they assured us, college is UGC-AICTE recognized etc. but later stage all of these are fraud.

Besides this, they asked the students for registration of seats to which six students applied for registration namely Him Raj (M.No. 08285065624 Email id. himraj3@gmail.com), Sham Singh (M.No. 09419256995), Neeraj Singh (M.No. 09697597877), Ajeet Singh (M.No. 07298199293), Gurmeet Singh (M.No. 09622319826) and Atiq-Ur-Rehman (M.No. 09858555923) and we all of the above student paid Rs. 30,000/- (4 student) from two student (Gurmeet Singh and Atiq Ur-Rehman Each Rs. 50,000/- Total Rs. 2,20,000/- (two lacs twenty thousand) which are huge amount for us because our parents by profession are farmer/Labour and earning per month Rs. 5,000/- to Rs. 10,000/- our parents collect that amount from their neighbourer. We have bank slip which we deposit amount in his account No.

We all the students paid whole amount to one counselor/ representative person namely Umar Manzoor Shah, the counselor namely above assured us to he helped us in education loan and there is no interest on education loan but these are also fraud when two student pre-passed from GDC, Ramban, namely Sham Singh and Atiq-Ur-Rehman and both they get loan from JKBANK, Ramban, about Rs. 3,70,000/- (now they regularly paid interest) each when they reached at EIILM Pharama, Kolkata, they have seen there is no institute because they shifted their institute regularly one place to another place, this institute is on rent basis, both the students faces many problems there related to institute, hostel etc.

And the institute pursued degree under distance education, but they told before registration they can pursued courses regularly and there is about 60 student from J&K escaped from this institute without studying their degree because there is no education and they cheated/fraud with the students. Besides this both students cancel their admission and institute refunded the money by deducted Rs. 30,000/- each (two student) from the institute. But now till date the counselor has not paid back money to students and cheated the student every time. When these misshapen/Cheat (by institute/especially Counselor Umar Manzoor Shah) comes from the knowledge of two student to other four student they stopped to go Kolkata for further study.

Now all the students many time requested to Counselor namely Umar Manzoor Shah and many times he assured to us he will pay back whole amount but now he cannot paid any heed about the matter and ignores our phone calls etc. Now we all of the students does not studied further due to lack of money, if your help with us, we can make our future. Total Rs. 2,20,000? If counselor did not paid us Rs. 2,20,000/- (6 student money) the future of our goes in darkness because we cannot afford money to pursue another course. We request to yourself please help us for about the matter.

We have listen and sure about many other students who deposit the amount in his (Umar Manzooe Shah) account. These student are presently studying at KC Group of Institute, Nowshara Chandigarh, Punjab affiliated to Punjab Technical University, Jalandhar. And also he is cheated these student by way of money but he cannot deposit their fee in the institute.

Thanks

Him Raj, Sham Singh, Neeraj Singh, Ajeet Singh, Gurmeet Singh and Atiq-Ur-Rehman

महुआ छोड़कर आईबीएन7 से जुड़ीं स्‍नेहा, विवेक का तबादला

महुआ न्‍यूज से खबर है कि स्‍नेहा मिश्रा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे इनपुट से जुड़ी हुई थीं. स्‍नेहा महुआ को पिछले चार सालों से अपनी सेवाएं दे रही थीं. इन्‍होंने अपनी नई पारी आईबीएन7 के साथ शुरू की है. यहां भी इन्‍हें इनपुट में जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. बताया जा रहा है कि स्‍नेहा महुआ में अपने वरिष्‍ठों के व्‍यवहार से परेशान थीं. इसलिए मौका मिलते ही उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया.

अमर उजाला, गाजियाबाद से खबर है कि विवेक त्‍यागी का तबादला गोरखपुर के लिए कर दिया गया है. विवेक वैशाली में जूनियर रिपोर्टर के रूप में सेवाएं दे रहे थे. उनकी कुछ शिकायतें मिलने के बाद प्रबंधन ने उनका तबादला गोरखपुर के लिए कर दिया. हालांकि यह स्‍पष्‍ट नहीं है कि विवेक गोरखपुर जाएंगे या संस्‍थान से इस्‍तीफा दे देंगे.

नेशनल दुनिया में प्राण को सिगरेट पीते दिखाना निंदनीय है

महोदय, देश के एक राष्ट्रीय अख़बार ने वो किया जिससे उसे शर्म आनी चाहिए। मेरा 5 साल का भतीजा जब उसे देख कर प्रभावित हो सकता तो देश का कोई भी नौजवान टशन में इस रास्ते जा सकता है। दिल्‍ली के नेशनल दुनिया में 13 अप्रैल 2013 को अभिनेता प्राण का बड़ा पिक्चर सिगरेट पीते दिखाया गया। यहाँ कोई चेतावनी नहीं दी गई। आज फिल्मों और टीवी सीरियल्‍स तक में ऐसा नहीं दिखाया जाता है, अगर दिखाया जाता भी तो उससे ब्‍लर कर दिया जाता है।

आखिर पिक्‍चर का चुनाव करते हुए संपादकीय के लोगों द्वारा यह क्‍यों नहीं सोचा गया कि ऐसा नहीं होना चाहिए। ऐसा पिक्‍चर नहीं लगाया जाना चाहिए। इससे समाज में गलत संदेश जाएगा। मेरा तो मानना है कि ऐसे अख़बार का रजिस्ट्रेशन तुरंत रद्द कर देना चाहिए ताकि कोई और ऐसी हरकत ना कर सके।

एक पाठक द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. 

अश्‍लील कार्यक्रम दिखाने वाले चैनलों पर बीसीसीसी कसेगा शिकंजा

नई दिल्ली। इस देश में टीवी चैनलों पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों, विज्ञापनों में फूहडता, अश्लीलता को लेकर कई बार गंभीरता से सवाल खडे किए जाते हैं। लोकसभा में भी इस पर चिंता जताई जाती रही है। अब चैनलों की प्रसारण सामग्री पर नजर रखने वाली संस्था ब्रॉडकास्टिंग कंटेंट कम्पलेंट्स काउंसिल-बीसीसीसी ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। बीसीसीसी ने दो म्यूजिक चैनल्स के साथ कई सामान्य मनोरंजन कार्यक्रम प्रसारित करने वाले चैनलों को, उनके आपत्तिजनक कंटेंट को वयस्क टाइम स्लॉट में शिफ्ट करने को कहा है। इन चैनल्स को उसका आदेश ना मानने पर भारी जुर्माना भरने की भी चेतावनी दी गई है।

कहा जा रहा है कि बीसीसीसी ने यूटीवी-बिंदास पर प्रसारित हो रहे शो "इमोशनल अत्याचार" पर कडी आपत्ति लेकर चैनल के अधिकारियों को तलब किया था। दिल्ली में हुई इस मीटिंग में चैनल अधिकारियों को बीसीसीसी के अधिकारियों ने कंटेंट को लेकर फटकार लगाई। अधिकारियों ने उन्हें तुरंत शो का टाइम स्लॉट बदलने के आदेश दिए। इस पर जल्दी एक्शन लेते हुए बिंदास ने अपने शो के फॉर्मेट को चेंज कर दिया है। एमटीवी और चैनल वी को भी इसी तरह की चेतावनियां दी गई हैं।

बीसीसीसी को इन शो के बारे में कई शिकायतें मिली थीं। बीसीसीसी ने चैनल्स को रिएलिटी शो के नाम से प्रसारित किए जा रहे कुछ स्क्रिप्टेड शो को बंद करने के भी आदेश दिए हैं। जब एक टीवी कायक्रम के सीन और स्क्रिप्ट उसके निर्माताओं द्वारा तैयार किए गए हों तब उस शो को रिएलिटी शो नहीं कहा जा सकता। यह स्व नियामक संस्था आंखे बंद करके किसी शिकायत को नहीं सुनती। किसी भी अप्रिय कार्यवाही से पहले चैनल्स को तीन बार चेतावनियां दी जाती हैं, अगर वे इस पर अमल नहीं करते तो उन्हें जुर्माना भरने के आदेश दिया जाता है। जुर्माने की राशि फिलहाल तय नहीं की गई है। माना जाता है कि एक बार बीसीसीसी द्वारा चेतावनी मिल जाने के पश्‍चात निर्माताओं के पास अपने शो के कंटेंट को बदलने के अलावा कोई और चारा नहीं रह जाता है।

टीवी चैनल्स के प्रतिनिधि ने बताया कि चैनल्स को बीसीसीसी से ज्यादा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा लाइसेंस रद्द करने का डर रहता है। कई बार चैनल अधिकारियों को मंत्रालय द्वारा भी तलब कर लिया जाता है। मंत्रालय द्वारा सुनवाई का मौका दिया जाना केवल कहने की बात होती है। वे हमें अपनी बात रखने का मौका भी नहीं देते और पहले से ही यह निर्णय ले लेते हैं कि चैनल गलती पर है।

बादशाहपुर गैंगरेप मामले में चैनल के पत्रकार का बयान दर्ज

पटियाला के बादशाहपुर सामूहिक दुष्कर्मकांड के बर्खास्त सब इंस्पेक्टर नसीब सिंह सहित सभी आरोपी बुधवार को अतिरिक्त सेशन जज एनएस गिल की अदालत में पेश हुए। अदालती कार्यवाही के दौरान समाना निवासी एक चैनल के पत्रकार के भी बयान दर्ज हुए। बयान पूरे होने के बाद अदालत ने बादशाहपुर सामूहिक दुष्कर्मकांड की एफआईआर नंबर 96 और एफआइआर नंबर 187 की सुनवाई के लिए जारी रखते हुए 18 अप्रैल की तिथि निर्धारित कर दी है।

गौरतलब है कि एसआई नसीब सिंह पर सार्वजनिक जिम्मेदारी के पद पर रहते हुए जानबूझकर कानून के निर्देशों को अनदेखा करने, सरकारी दस्तावेजों से छेड़छाड़ करने और सबूतों को मिटाने का चार्ज लगाया था। सरकारी वकील संजीव बत्रा के अनुसार स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम (एसआइटी) द्वारा अदालत में दायर की गई चार्जशीट में कुल 33 गवाहों की सूची दी गई थी। इसी सूची के आधार पर आज की पेशी के दौरान इलेक्ट्रानिक मीडिया के एक कर्मी के बयान दर्ज किए गए।

लखनऊ में राजभवन कालोनी में पीटे गए श्रीन्यूज अखबार के जीएम पंकज वर्मा

लखनऊ की बेहद सुरक्षित कहने जाने वाली राजभवन कालोनी में रहने वाले एक पत्रकार ने खुद को पीटे जाने का मामला हजरतगंज थाने में दर्ज कराया है। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ लोगों ने इस पत्रकार के घर के सामने गालियां दीं, धमकी दी, फिर मारपीट की। राज्यपाल के आवास राजभवन से सटी कालोनी को राजभवन कालोनी के तौर पर पहचाना जाता है।

राज्य सम्पत्ति विभाग की यह कालोनी कड़ी सुरक्षा से घिरी हुई मानी जाती है। इसी कालोनी का मकान नंबर एक पंकज वर्मा को आवंटित है। पंकज वर्मा श्रीन्यूज नामक अखबार के महाप्रबंधक हैं। 13 अप्रैल को पंकज ने रिपोर्ट लिखायी कि उनकी कालोनी में कुछ असमाजिक तत्वों ने हंगामा किया और जब उन्होंने उस पर हस्तक्षेप किया तो उनके साथ इन्हीं गुंडों ने मारपीट भी की।

हजरतगंज थाना कोतवाली पुलिस ने इस मामले को केवल एनसीआर यानी नॉन कांग्नजेबुल रिपोर्ट के तौर पर दर्ज किया है। सूत्रों का कहना है कि पूरा मामला शराबखोरी और छेड़खानी से जुड़ा है। यहां रहने वाले एक आईएएस की पत्नी पर शराबियों ने अश्लील फिकरे कसे थे। इस अधिकारी की पत्नी ने लौट कर इस घटना की खबर जब अपने पति और उनके मित्रों को बतायी, तो वे लोग अपने सुरक्षाकर्मियों को लेकर पहुंचे और उन शराबियों को जमकर पीटा था।

Wrong favor of Sanjay Dutt, Don’t try to save him

Mr. Markandeya Katju, This mail is in connection with the letter you wrote to governor of Maharashtra state  Mr. K. Sankarnarayanan to pardon Sanjay Dutt and set him free under article 161. Sir, You are the chairman of Press council of India . I want to ask you  one question…

what do you mean by justice?

Sanjay Dutt found guilty in possession of a prohibited weapon AK 56. It was such an automatic gun which keeps firing until release of the pressure on the trigger.

Such kind of weapon is for the use of destruction and not for simple protection.

As per Mr. Dutt’s confession in 1994 , he received AK56 rifle from Mafia Don Abu Salem, Samir Hingora and Hanif Kadawala while their visit of Mr. Dutt’s house in 1993. . ( Keep in mind, his connections with Mafia Don Abu Salem!!!! ) .He claimed the rifle was to protect his family

A question,

if his family was needed protection why had he not approached Maharashtra police for police protection?

He also asked his friend Yusuf Nulwalla to destroy the rifle only after Samir Hingora and Hanif Kadawala’s arrest.

A question, why to destroy rifle ? why had he not informed police deptt.about the rifle and its source of receipt?

You, in your letter asked to pardon Sanjay Dutt by linking his case with the case of Mr. K.M.Nanavati and taking the base of his pardoned by Maharashtra Governor Vijyalaxmi Pandit.
I think you are very well aware of the case of Mr. K.M.Nanavati, if not go through the below link.

http://en.wikipedia.org/wiki/KM_Nanavati_v_State_of_Maharashtra

Mr. K.M.Nanavati  killed Mr. Prem Ahuja who cheated his wife and just took the benefits of his absenteeism.

Do you found any similarities between both the cases?

Mr. K.M.Nanavati was a naval commander and killed the person who was the cheater and misusing his absenteeism whereas Mr. Sanjay Dutt was a drug addict and keeping the company of terrorist and dons. He completely behaved as an anti social element.
You favored him by the characters of his parents. Laws are made for all. And one must obey the laws and no relaxations to be made for the criminals.
You favored him by his act in the film on Mahatma Gandhi but I want to draw your attention towards the roles he played as Kancha China in “Agneepath” and in movie “Khalnayak.”

Roles played on the reel life is different thing and the role played in real life is different thing.

You are mixing them.
And the fact is that he is criminal and must go to the jail.
Such kind of persons are role model to the society if they do the mistakes and be forgave by the laws, then the society will be going to follow them obviously. Sanjay Dutt made a crime so he must be punished so that the public will get the example from his case and will not repeat the mistake.
By your such kind of favoring you are going to settle the wrong trend. It does not suit you as you are the chairman of the PCI.
Have you have any intention to enter the politics afterwards? Or just the paying back to your congress supporters. Or just favoring as late Mr. Sunil Dutt was known to you.
Have you any prejudice with the decisions made by the courts of India ? In one case where Narendra Modi was given clean chit you are comparing him with Adolf Hitler and called him liar. And in 2nd case of Sanjay Dutt, where he was awarded 3.5 years of jail, you are favoring him and saving him.
Pls. take a note we, the citizens of India are not fools. We also understand everything. We are not going to tolerate such kind of double standards any more.
Take your appeal back as early as possible.

Thanking you in advance,

Citizen Of India .

durgesh tiwari

durgesh212119@gmail.com

”लखनऊ की पत्रिका ने कमाल खान, जगदीश शुक्ला और शरत प्रधान के खिलाफ भ्रामक खबरें प्रकाशित की”

लखनऊ की एक मासिक पत्रिका द्वारा लखनऊ के प्रतिष्ठित प्रत्रकारों श्री कमाल खान, जगदीश नरायन शुक्ला और शरत प्रधान के खिलाफ अनर्गल एवं भ्रामक खबरें प्रकाशित करना न सिर्फ निन्दनीय है बल्कि पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा का खुला उल्लंघन है। लखनऊ में दो दशकों से मुख्यधारा की पत्रकारिता कर रहे कमाल खान की ख्याति किसी परिचय की मोहताज नहीं है।

देश के राष्ट्रपति से दो-दो बार पुरस्कृत श्री कमाल खान और उनकी पत्नी श्रीमती रूचि कुमार इलेक्ट्रिानिक मीडिया के जाने माने चेहरे हैं और इन दोनों को अपने-अपने संस्थानों से इतना वेतन प्राप्त होता है कि अपनी कमाई से पूरा इनकम टैक्स अदा करने के बाद ये कोई प्लाट या बीघा-दो बीघा जमीन खरीदते हैं तो इस पर किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए। मालूम हो कि कमाल खान ने आज तक पत्रकार कोटे से कोई जमीन या प्लाट नहीं लिया है। अब अगर कुछ सिरफिरे इनकी सफलता से परेशान हो बेवजह अलाप कर रहे हों तो इसे उसका मानसिक दिवालियापन ही कहा जाएगा।

वहीं जगदीश नरायन शुक्ला और शरत प्रधान जैसे वरिष्ठतम पत्रकारों को किसी नौसिखिये से सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं है। पिछले तीस सालों से इन वरिष्ठ पत्रकारों ने अपनी कलम और लेखनी से जहां निरंकुश सरकारों और अफसरों पर लगाम लगाई वहीं लखनऊ में दर्जनों पत्रकारों को इस पेशे की एबीसीडी सिखाई है। जगदीष शुक्ला के निष्पक्ष प्रतिदिन समाचार पत्र को जब रजिस्ट्रार आफ न्यूज पेपर्स (आरएनआई) की विधिवत मान्यता है तो इन छुटभैये तथाकथित पत्रकारों के सर्टिफिकेट की उनको आवश्यकता नहीं है।

दूसरों के जीवन भर की मेहनत और संघर्ष को नजरअंदाज करके उनके विलासिता का झूठा प्रलाप करने वाला यह पत्रकार मात्र अपनी कुंठा का शिकार है और इसी कुंठा के चलते वह प्रतिष्ठित लोगों के चरित्र हनन जैसी ओछी हरकतों पर उतर आया है जो कि निन्दनीय है और इसकी जितनी भर्त्सना की जाए कम है।

सच्चिदानन्द (सच्चे)

पत्रकार
लखनऊ

सहारा के सभी आरई और एडिटोरियल हेड अब रणविजय सिंह को रिपोर्ट करेंगे (देखें सुर्कलर)

सहारा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट के हेड संदीप वाधवा ने एक सर्कुलर जारी कर रणविजय सिंह को नई जिम्मेदारी सौंपी है. रणविजय अब सहारा के सभी संपादकों के संपादक होंगे. सहारा के सभी रेजीडेंट एडिटर्स और एडिटोरियल हेड अब रणविजय सिंह को रिपोर्ट करेंगे. सभी यूनिटों के यूनिट हेड और गैर-संपादकीय अधिकारी पहले की तरह संदीप वाधवा को रिपोर्ट करते रहेंगे.

सहारा में इस सर्कुलर के कई मायने निकाले जा रहे हैं. इंटरनल सर्कुलर की एक प्रति भड़ास के पास भी है, जिसे आप नीचे देख पढ़ सकते हैं…

कैमरा लिया और बन गए टीवी रिपोर्टर

श्रीगंगानगर (राजस्थान)। जिले में इन दिनों टीवी रिपोर्टरों की बाढ़ सी आ गई है। ऐसे अनेक लोग हें, जो सिर्फ नाम के ही टीवी रिपोर्टर हैं। अपने आप को टीवी रिपोर्ट बताकर वे विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी कार्यक्रमों में पहुंचकर कवरेज करते हैं। जब इनसे कोई पूछता हे कि आप कौन से चैनल से हैं, तो वे ऐसे चैनलों के नाम लेते हैं, जिनका गंगानगर में प्रसारण ही नहीं होता। … और यदि प्रसारण होता भी है, तो उन पर रिपोर्ट नहीं दिखाई जाती। कुछ तथाकथित मीडिया कर्मियों की वजह से आज गंगानगर में सही मीडियाकर्मी भी बदनाम हो रहे हैं।

बिजनेस से संबंधित प्रेस कांफ्रेंसों में कैमरे लेकर पहुंचना ओर अपने आप को फलां न्यूज चैनल का रिपोर्ट बताकर अब आम बात हो गई है। राजस्थान सरकार ने मीडियाकर्मियों को रियायती दरों पर भूखंड देने की योजना चला रखी है और वर्तमान में नगर विकास न्यास की ओर से पत्रकारों के लिए दर्पण इन्कलेव कॉलोनी काट भी दी है।

हैरानी वाली बात यह है कि इस कॉलोनी में रियायती भूखंड लेने के लिए डेढ़ सौ से भी अधिक फार्म जमा हो चुके हैं, जबकि भूखंडों की संख्या 65 ही है। जिन व्यक्तियों को पत्रकारिता का क-ख-घ नहीं आता, उन्होंने भी फार्म जमा करवा दिए। कुछ तो ऐसे हैं, जिनको दर्पण कॉलोनी के कटने का पता चला, तभी कैमरा खरीद लिया और बन गए टीवी रिपोर्टर। इसका नुकसान उन लोगों को हो रहा है, जो वास्तव में पत्रकार हैं और उनकी आजीविका पत्रकारिता से ही चलती है।

खैर गंगानगर में स्थिति यह बन गई हैकि हर कोई अपने वाहनों के आगे 'प्रेस' लिखकर घूमते हैं। बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिनका पत्रकारिता से कोई संबंध नहीं है, परंतु अपनी धौंस और पुलिस कार्रवाई से बचने के लिए 'प्रैस' शब्द का इस्तेमाल करते हैं।

श्रीगंगानगर से जयप्रकाश मील की रिपोर्ट.

सीता पुरस्कार के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित, अंतिम तिथि- 15 मई, 2013

हिंदी साहित्य-लेखन के प्रोत्साहन व संवर्धन हेतु तृतीय सीता-पुरस्कार के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित की जाती हैं। राशि रुपये 1,00,001/- के इस पुरस्कार के लिए सर्वश्रेष्ठ लेखक का चयन उनकी पुस्तकों के आधार पर किया जाएगा। तद्नुसार देश-विदेश के हिन्दी-साहित्य में सृजनरत सभी विद्वत्जनों  से  प्रविष्टि  के  रूप  में वर्ष 2010 और 2011 में प्रकाशित रचना की 3 प्रतियाँ एक सहमति पत्र के साथ 15 मई, 2013 तक नीचे लिखे पते पर डाक द्वारा अथवा सीधे उपलब्ध कराने का अनुरोध है।

प्रविष्टियाँ स्वयं लेखकों, प्रकाशकों या अन्य किसी भी व्यक्ति द्वारा भेजी जा सकती हैं। हिन्दी साहित्य के वरिष्ठ और जाने-माने लेखकों की समिति सभी प्रविष्टियों में से एक सर्वश्रेष्ठ रचना का चयन इस पुरस्कार के लिए करेगी। प्रथम सीता पुरस्कार श्री दिनेश कुमार शुक्ल को उनकी रचना ‘ललमुनियां की दुनिया’ एवं द्वितीय सीता पुरस्कार श्रीमती ममता कालिया को उनकी पुस्तक ‘कितने शहरों में कितनी बार’ के लिए प्रदान किया गया। पुरस्कार  सम्बन्धी  सभी  विवरण www.sitapuraskar.com पर भी देखे जा सकते हैं।

संयोजक

सीता पुरस्कार

ए-75, शिवालिक (समीप मालवीय नगर), गीतांजलि रोड, नई दिल्ली-17

दूरभाष: 91 11 26680494

ईमेल: sitapuraskar@gmail.com

प्रेस रिलीज

बैल की मौत पर किसान को गांव निकाला

सीहोर (मध्य प्रदेश) । गलती से अपने हाथ से हुई मवेशी की मौत का खामियाजा किसान पुत्र को अब सवा महीने का वनवास काट कर झेलना पड़ेगा। यह वनवास गांव के उन दबंगों ने सुनाया है जिनके सामने बोलने की हिम्मत कोई नहीं करता। मामला जिला मुख्यालय के नजदीकी गांव सेवनिया में सामने आया है। जिला प्रशासन और पुलिस की नाक के नीचे पिछले दो दिनों से यह किसान पुत्र गांव के बाहर जंगल मे सोने-खाने को मजबूर है।

सीहोर जिले 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्राम सेवनिया में मवेशी की मौत हो जाने के बाद ग्रामीणों ने गांव के 30 वर्षीय निर्मल वर्मा पिता सेवाराम को सवा महीने के लिए गांव निकाला देकर हुक्का-पानी बंद कर दिया है। इस युवक के हाथों कुछ दिन पूर्व एक बैल की मौत हो गई थी, जिसके बाद गांव के दबंगों ने मिलकर उसे सवा महीने गांव निकाला देकर वनवास दे दिया। अब यह युवक पिछले दो दिनों से गांव के बाहर जंगल में रात गुजार रहा है।

पीड़ित की जुबानी : निर्मल वर्मा ने बताया कि लगभग एक सप्ताह पहले जब वह खेत में हल चला रहा था और पानी पीने चला गया था उस दौरान एक बैल की मौत हो गई थी। ग्रामीणों को जब इस बात की जानकारी मिली तो ग्राम वालों ने उसे शुक्रवार को यह सजा सुना दी। दबंगों ने धमकी दी है कि बात नहीं मानने पर जात से बंद कर दिया जाएगा और उसका हुक्का पानी भी बंद कर दिया जाएगा। इस डर के कारण निर्मल ग्राम के बाहर जंगल में एक पेड़ के नीचे रहने चला गया है जहां वो अब सवा महीने तक रहेगा।

सीहोर से आमिर खान की रिपोर्ट.

जनता और पत्रकारों के सामने रखूंगा खुद का लेखा-जोखा : जगदीश नारायण शुक्ला

: पत्रकारिता में भी सफाई हो : देश की आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता ने कई मापदण्ड स्थापित किये थे जिसमें भाषाई समाचार पत्रों की बहुत बड़ी भूमिका थी। इसीलिए न्यायपालिका, कार्यपालिका, संसदीय कार्य तथा पत्रकारिता क्षेत्र को चौथा स्तम्भ माना गया है। लेकिन आज जिस तरह से राजनीति और नौकरशाही में भ्रष्टाचार व अपराधीकरण बढ़ा है उससे पत्रकारिता भी अछूती नहीं बची।

एक तरफ हम जहां नौकरशाही व राजनीति से भ्रष्टाचार और अपराधीकरण को समाप्त करने की मुहिम चला रहे हैं वहीं पत्रकारिता क्षेत्र में भी तमाम अपराधी और भ्रष्ट तत्व प्रवेश करते जा रहे हैं।  रजिस्ट्रार न्यूज पेपर्स द्वारा जो पुरानी परम्परा चलाई जा रही है उसका अपराधी तत्व खुलकर लाभ उठा रहे हैं और छोटे-छोटे फर्जी पत्र निकालकर भयादोहन व दलाली तथा अपने कुकृत्यों को छुपाने का काम कर रहे हैं।

यह लोग सामाजिक बुराईयों से लड़ने वाले पत्रकारों के खिलाफ गंदी मुहिम चलाने से भी बाज नहीं आ रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम सभी पत्रकार अपने अंतर्मन में झांके और इन पत्रकाररूपी काले भेड़ियों की नकाब उतार फेंके। इसके लिए सबसे पहले यह जरूरी है कि हम स्वयं अपने चरित्र, सम्पत्ति को भी जनता के सामने उसी तरह रखे जिस तरह से चुनाव के समय प्रत्याशी घोषणा करते हैं। चूंकि इस मामले में मैं स्वयं लगभग 50 वर्षों से राजनीति व पत्रकारिता में अनवरत लगा रहा हूं और 'क्या खोया क्या पाया' को आम लोगों के सामने सर्वप्रथम लाना चाहता हूं। उसके साथ मेरा एक निवेदन है कि सभी पत्रकार बंधु अपने व अपनी सम्पत्ति के बारे में सार्वजनिक घोषणा करें और मुझे खुशी होगी कि मैं उनके विचारों को भी निरंतर छापता रहूंगा। आगामी अंक से मैं अपने बारे में स्वयं 50 वर्षों का लेखा-जोखा आप जनता जनार्दन व पत्रकार बंधुओं के समक्ष रखना प्रारंभ कर रहा हूं। आशा है कि आप लोग इसे अन्यथा न लें।

जगदीश नारायण शुक्ला

निदेशक और प्रधान संपादक
निष्पक्ष प्रतिदिन अखबार
लखनऊ

हंस, हंसिनी, उल्लू और पंच की कहानी

एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए उजड़े, वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये. हंसिनी ने हंस से कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ? यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं. यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा. भटकते २ शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज कि रात बिता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे.

रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे उस पर एक उल्लू बैठा था। वह जोर २ से चिल्लाने लगा।

हंसिनी ने हंस से कहा, अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते। ये उल्लू चिल्ला रहा है। हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ? ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही। पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों कि बात सुन रहा था। सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ कर दो। हंस ने कहा, कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद.

यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा, पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो। हंस चौंका, उसने कहा, आपकी पत्नी? अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है, मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है.

उल्लू ने कहा, खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है। दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग इक्कठा हो गये। कई गावों की जनता बैठी। पंचायत बुलाई गयी। पंच लोग भी आ गये. बोले, भाई किस बात का विवाद है ? लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है.

लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पञ्च लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे। हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है। इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना है. फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों कि जांच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है.

यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया। उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली. रोते- चीखते जब वहआगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई – ऐ मित्र हंस, रुको. हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ? पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे?

उल्लू ने कहा, नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी. लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है. मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है । यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं.

शायद ६५ साल कि आजादी के बाद भी हमारे देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि हमने हमेशा अपना फैसला उल्लुओं के ही पक्ष में सुनाया है। इस देश क़ी बदहाली और दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैं।

बैंक से बाहर निकलते ही पत्रकार की गोली मारकर हत्‍या

पुएब्ला। मेक्सिको में एक पत्रकार की गोली मारकर हत्या कर दी गई। अधिकारियों ने बताया कि मध्य मैक्सिको के शहर, प्यूब्ला में एक बैंक से निकलते ही पत्रकार की हत्या कर दी गई। समाचार एजेंसी ईएफई के अनुसार, दक्षिणी राज्य ग्युरेरो में एक टीवी शो के एंकर रहे अलोंसो डी ला कॉलिना सॉरडो की सोमवार को गोली मारकर हत्या कर दी गई।

ग्युरेरो, मैक्सिको के नशीले पदार्थो से जुड़े अपराधों से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में से एक है। पुलिस प्रमुख जुआन लुईस गालान ने कहा कि बंदूकधारी व्यक्ति ने उसे डराने के लिए दो बार हवा में गोली दागी और फिर उसने पत्रकार को मार दिया। जांचकर्ताओं ने बताया कि सुरक्षा गॉर्डों ने पत्रकार के प्राथमिक उपचार के लिए बंदोबस्त किया, लेकिन गोली मारे जाने के कुछ ही मिनट बाद उसकी मौत हो गई। अधिकारियों ने यह सुनिश्चित नहीं किया है कि हत्या की वजह लूटपाट है याडीला कॉलिना की रिपोर्टिंग से उपजे किसी विवाद के चलते उन्हें गोली मारी गई है। (एजेंसी)

Pak Hindus reaches UN office for rights, Inhuman nature of Pakistan exposed, submitted Memo after Demo

New Delhi. April 17, 2013. Inhuman nature of Pakistan today exposed before the world community when Pak Hindus narrated their heartfelt story of atrocities at the office of the United Nations in New Delhi. Pakistani Hindus in India lead by Vishwa Hindu Parishad(VHP) demonstrated before UN Office against violation of their human rights in Pakistan.

Addressing the silent demonstrators the VHP state president shri Swadesh Pal Gupta & the vice president shri Mahavir Prasad said that abduction, rapes, attacks on houses & temples and large scale forced religious conversions are the common atrocities being faced by Pak Hindus. They have been forced to live like an animal and brutally being killed at many places. They have only three options before them that either accept Islam or leave Pakistan otherwise killed, they added.

The demonstrators also submitted a memorandum to this effect to the UN secretary General to save the Hindu Human rights. Instead of living animal life in Pakistan, we would prefer to be killed at Indian soil, at least we will get last respect in Hindu way of life, which is not allowed in Pak, said shri Dharam Vir Bagari, the leader of Pak Hindus in Delhi.

According to the media chief of VHP Delhi shri Vinod Bansal, the memorandum addressed to the Secretary General UNO demanded immediate intervention to stop attacks and rehabilitate the members of the Hindu minority living in Pakistan, and those who have been forced out of their ancestral homeland from different provinces of Pakistan.

Giving figures, the memo also high lighted that the religious minority of Hindus in Pakistani that was around 23% of total population in 1947, is drastically reduced to less than 2% today due to continuous state sponsored terror acts like abductions, kidnaps, rapes, attacks on temples & lives etc. by Islamic zealots. Teenagers and temples are the soft targets of the Islamic fundamentals.

Shri Nahar Singh, the local warden of the Pak Hindus in Delhi and a social worker said that until the government give them proper facilities, I will continue to support all deprived refugees in Delhi like my family members. More then 200 Pak Hindus carrying play cards in their hands raised their voice and narrated their horrible stories to the media and the UN Human right watch about the persistent atrocities they faced in Pakistan. VHP state vice president shri Brij Mohan Sethi, Bajrang Dal’s state convener Shri Shiv Kumar & shri Neeraj Doneria, shri Rajeev Gupta and shri Vishnu Gupta were amongst the dignitaries addressed the demonstrators.

The 20 year old Jamuna said that we could not see any school in Pakistan because of bad elements and compulsory Islamic education. Recalling her old memories with tears, a 70 year old lady Mrs Laxmi Devi said ‘I could not recall that we have celebrated even Holi or Deepawali in last 40 years in Pakistan due to regular warnings & attacks by fundamentals’. We do not have the right even to cremate in Hindu ritual in PAK, she added.

REGARDS

VINOD BANSAL

(MEDIA CHIEF)

VISHWA HINDU PARISHAD

DELHI

Press Release

गहलोत से मिल रहे इन पत्रकारों की आंखों से कृतज्ञता टपक रही है! (देखें तस्वीर)

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत फेसबुक पर पूरी दमदारी के साथ मौजूद हैं. उनके नाम का जो पेज है, उस पर रोजाना कुछ न कुछ अपडेट किया जाता है. आज वहां पत्रकारों की एक फोटो और इससे जुड़ी खबर का प्रकाशन किया गया है. फोटो में पत्रकार लोग सीएम की ओर मुखातिब होकर और सीएम साब पत्रकारों की तरफ देखते हुए हाथ जोड़े हैं. यह हाथ जोड़ाई कार्यक्रम इसलिए चला क्योंकि सीएम ने पत्रकारों को प्लाट दे दिया.

यूपी के पत्रकार फ्री इलाज की सुविधा पाकर लहालोट होते हैं तो राजस्थान के पत्रकार प्लाट-भूखंड के चलते खुद को कृतज्ञ महसूस करते हैं. कृतज्ञता आंखों से टपक भी रही है, तस्वीर को जरा ध्यान से देखिए. इस तस्वीर को फेसबुक पर अशोक गहलोत ने डालकर ठीक किया है. इससे यह पता तो चल जाता है कि अफसरों, नेताओं, व्यापारियों की तरह पत्रकार भी पूरे समाज का नहीं, बल्कि खुद का हित चिंतक है. अच्छा है, जितना जल्दी भ्रम खत्म हो. लीजिए पढ़िए जो अशोक गहलोत ने अपने फेसबुक वॉल पर डाला है. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


Ashok Gehlot : मुख्यमंत्री का पिंकसिटी प्रेस क्लब ने भूखंड आवंटन के लिए आभार व्यक्त किया। मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत का बुधवार सायं यहां उनके राजकीय निवास पर जयपुर पिंकसिटी प्रेस क्लब से जुड़े पदाधिकारियों एवं पत्रकारों ने नायला में पत्रकारों के लिए नवसृजित पिंकसिटी प्रेस एनक्लेव में भूखंड आवंटन करने पर आभार व्यक्त किया। प्रेस क्लब अध्यक्ष श्री नीरज मेहरा के नेतृत्व में पत्रकार मुख्यमंत्री से मिले। श्री मेहरा ने बताया कि इस आवासीय योजना में पत्रकारों को 571 भूखंड लॉटरी के जरिए आवंटित किए गए हैं। इससे प्रदेश की राजधानी में पत्रकारों की आवासीय समस्या का निराकरण हुआ है। जिससे सभी के चेहरे खिले हुए हैं।

उन्होंने मुख्यमंत्री को बताया कि जेडीए में लॉटरी निकलने के बाद पत्रकारों ने पिंकसिटी प्रेस क्लब में उत्सव सरीखे माहौल के बीच अपनी खुशी बांटी तथा एक-दूसरे को बधाई दी। श्री मेहरा ने कहा कि राज्य सरकार ने पत्रकारों की आवासीय समस्या का समय पर निदान कर उन्हें राहत एवं खुशियां दी है। मुख्यमंत्री ने सभी पत्रकारों को अपनी ओर से बधाई देते हुए कहा कि हमने पट्टे पर भू स्वामी की पत्नी का नाम जुडवाने की पहल की जिससे आपके साथ-साथ आपके घर में भी इस खुशी का अनुभव हो सके। इस अवसर पर प्रेस क्लब के महासचिव श्री विकास शर्मा, पूर्व अध्यक्ष श्री एल.एल.शर्मा, कोषाध्यक्ष श्री मुकेश चौधरी, श्री विशाल शर्मा सहित प्रिंट एवं इलैक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े पत्रकार एवं फोटो पत्रकार उपस्थित थे।

अशोक गहलोत के फेसबुक वॉल से साभार

नवनीत गुर्जर ने जयपुर में जुगाड़े सब्सिडी वाले तीन प्‍लाट!

: अपडेट : कानाफूसी : दैनिक भास्‍कर, मध्‍य प्रदेश के स्‍टेट हेड हैं नवनीत गुर्जर. कल्‍पेश याज्ञनिक के खास माने जाते हैं. भड़ास के पास एक ई मेल आया है जिसमें बताया गया है कि नवनीत गुर्जर ने नियम-कानूनों से इतर जयपुर में पत्रकारों को सब्सिडी के रूप में मिलने वाले तीन प्‍लाट जुगाड़ लिए हैं. ये प्‍लाट इन्‍हें जयपुर विकास प्राधिकरण ने उपलब्‍ध करवाया है, जिसमें एक पर इन्‍होंने मकान बनवाया है तथा दूसरा अभी खाली पड़ा हुआ है. तीसरा हाल ही में विवादों के बीच इन्‍हें एलाट किया गया है.

पत्र में कहा गया है कि नवनीत लंबे समय से राजस्‍थान में नहीं रह रहे हैं, इसके बावजूद इनको प्‍लाट का लाभ प्रदान किया गया है. पत्र में यह भी कहा गया है कि नवनीत गुर्जर ने भोपाल में भी एक मकान खरीदा है इसलिए पाठक तय करें कि यूपी-बिहार के पत्रकार भ्रष्‍ट हैं या कहीं और के. नीचे आप भी पढि़ए पाठक द्वारा भेजे गए पत्र का अंश….

Navneet Gujjar has got three plots in Jaipur. All of them have been given to him by Rajasthan Government through Jaipur Development Authority on subsidized rates. He has built house on one, second one is lying vacant. Third plot which was allotted recently sparked off a controversy as Navneet is no more in Rajasthan. Still he was allotted a plot.  

Navneet got Om Gaur to file an affidavit in High Court saying Navneet was state editor of both Rajasthan and M.P. He lived in Jaipur half the time. Hence he needs a plot. And allotment to him is juistified. Now Navneet is buying a house in Bhopal. Not a flat but an independent House. He has already surveyed many colonies. Bhopal Bhaskar editor Anil Sharma and other employees and helping him in this. Now let readers decide whether journalists from Bihari and U.P. are more corrupt than Navneet Gujjar and his boss Kalpesh Yagnik, who knows of all land deals being made by Gujjar.

Another of Kalpesh Yagnik's chamcha Kuldeep Vyas, who is state editor Jharkhand, too is buying a house in Bhopal. Kuldeep and Navneet together went together looking for house a few days ago. Signal of things to come in future. Kuldeep too is being shifted. These r not rumours. Facts. You can verify and cross check. POnly then publish.

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

दूसरी तरफ एक अन्‍य सूचना मिली है कि नवनीत गुर्जर को दो प्‍लाट ही सब्सिडी वाले मिले हैं. उन्‍होंने मकान वाला प्‍लाट बिल्‍डर से खरीदा है. उनके पास जयपुर विकास प्राधिकरण द्वारा तीन सब्सिडी प्‍लाट उपलब्‍ध कराए जाने की सूचना पूर्ण रूप से सही नहीं है.

नोएडा से दिल्‍ली शिफ्ट हुआ डीएलए का ऑफिस, बढ़ेगी पेजों की संख्‍या

मिड डे अखबार डीएलए का आफिस नोएडा से आईएनएस बिल्डिंग, दिल्‍ली में शिफ्ट हो गया है. इसके अलावा गाजियाबाद में भी एक नया कार्यालय खोल दिया गया है. खबर थी कि आर्थिक दिक्‍कतों के कारण अखबार प्रबंधन अपने नोएडा आफिस को बंद कर रहा है. लेकिन सूत्रों का कहना है कि आर्थिक दिक्‍कत या घाटे के चलते नहीं बल्कि एग्रीमेंट पूरा हो जाने के चलते डीएलए को अपना ऑफिस बदलना पड़ा है. मालिक ने अपना एग्रीमेंट आगे नहीं बढ़ाया, जिसके चलते डीएलए को नोएडा से दिल्‍ली शिफ्ट होना पड़ा.

एनसीआर की रिपोर्टिंग को देखते हुए गाजियाबाद में भी डीएलए का एक कार्यालय खोला गया है. यहां पर रिपोर्टिंग के स्‍टाफ बैठेंगे. बाकी का काम आईएनएस बिल्डिंग से होगा. बताया जा रहा है कि डीएलए जल्‍द ही बीस पेज का होने जा रहा है. अब तक यह अखबार 16 पेज का प्रकाशित होता था, परन्‍तु खबरों के फ्लो और लोगों की मांग को देखते हुए प्रबंधन अब इसे बीस पेज करने जा रहा है. हालांकि यह भी खबर आ रही है कि डीएलए का कार्यालय दिल्‍ली शिफ्ट होने से कई लोगों ने संस्‍थान को अलविदा कह दिया है.

संघ के इशारे पर दिसंबर तक फैसला लेगी भाजपा

जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और भाजपा के बीच नरेंद्र मोदी के बहाने अब राजनीतिक अहम का टकराव शुरू हो गया है। जदयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की बैठक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश ने नरेंद्र मोदी की जमकर खबर ली थी। उन्होंने गुजरात के विकास मॉडल पर भी तमाम तीखे कटाक्ष कर डाले। इसी के साथ भाजपा नेतृत्व को मोदी के मुद्दे पर उन्होंने सीधे तौर पर खबरदार कर दिया था। साफ-साफ कहा था कि ‘पीएम इन वेटिंग’ के लिए कोई धर्म-निरपेक्ष चेहरा ही स्वीकार्य हो सकता है। यदि भाजपा ने बात नहीं मानी, तो उनकी पार्टी अपना रास्ता अलग करने के लिए स्वतंत्र होगी। जदयू के इन कड़े तेवरों से संघ का नेतृत्व काफी कुपित हो गया है। संघ के आकाओं का संकेत समझकर भाजपा की एक मजबूत लॉबी ने कड़ा रुख अपना लिया है।

इससे भाजपा और जदयू के रिश्तों में गहरी दरार पड़ने के संकेत हैं। भाजपा की मोदी समर्थक लॉबी ने दबाव बनाया कि पार्टी, मोदी के मुद्दे पर नीतीश एंड कंपनी को लगातार मुंह तोड़ जवाब दे। ताकि, यह संदेश जाए कि इस मुद्दे पर पार्टी जदयू के दबाव में नहीं आने जा रही है। शनिवार और रविवार को जदयू कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक यहां हुई थी। नीतीश ने अपने भाषण में बगैर नाम लिए हुए मोदी को जमकर कोसा था। उन्होंने गुजरात के विकास मॉडल के मुकाबले अपने बिहार के विकास की तमाम तरफदारी की। यह बताने की कोशिश कर डाली कि बदहाल राज्य को उन्होंने जिस तरह से उबारा है, वह वाकई में एक मिशाल है। उनके राज्य में सभी तबकों को खुशहाली मिली है। जबकि, कई राज्यों में विकास की गंगा में आम आदमी की भागीदारी नहीं हो पाई।
    
जदयू नेतृत्व ने इस साल दिसंबर तक की मोहलत भाजपा नेतृत्व को दी है। कह दिया है कि इस अवधि तक भाजपा ‘पीएम इन वेटिंग’ का ऐलान जरूर कर दे। हालांकि, चर्चा यही रही कि भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह और पार्टी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली के  तमाम प्रयासों के बाद ही जदयू ने आठ महीनों का समय देना गंवारा किया है। लेकिन, भाजपा नेतृत्व नीतीश की इस ‘उदारता’ से कतई संतुष्ट नहीं है। नीतीश सरकार में पशु-पालन मंत्री एवं बिहार भाजपा के चर्चित नेता गिरीराज सिंह कहते हैं कि जदयू सही ढंग से गठबंधन धर्म नहीं निभा रहा है। सबसे लोकप्रिय नेता मोदी के खिलाफ जदयू के लोग जिस तरह से प्रलाप कर रहे हैं, यह अब असहनीय हो रहा है। उन लोगों ने अपनी भावनाएं सोमवार को पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को बता दी हैं। अच्छी बात यही है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी जदयू के रवैए से काफी आहत है।
 
भाजपा प्रवक्ताओं ने जदयू के खिलाफ आक्रामक तेवरों का सिलसिला और तेज कर दिया है। पार्टी प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी ने सवाल खड़ा किया था कि गोधरा कांड के दौर में रेलमंत्री का प्रभार नीतीश कुमार संभाल रहे थे। उनकी नाकामी को लेकर भी तो सवाल बनते हैं। इस पर नीतीश कभी कोई जवाब क्यों नहीं देते? भाजपा प्रवक्ता के इस तेवर से दोनों दलों के बीच तकरार बढ़ी है। नीतीश कुमार ने इसका जवाब यही दिया है कि रेलमंत्री की भूमिका रेलवे की सुरक्षा तक होती है। बाकि, कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों की होती है। भाजपा नेताओं को इतनी बुनियादी समझ तो जरूर होनी चाहिए।
    
मीनाक्षी लेखी के पहले भाजपा की दूसरी प्रवक्ता निर्मला सीता रमण ने रविवार को ही जदयू की जमकर खबर ली थी। उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि नीतीश सहित उनकी पार्टी के तमाम नेता अपनी ऊर्जा भाजपा के मुख्यमंत्रियों की विवेचना में लगा रहे हैं। जबकि, उन्हें अपनी यह राजनीतिक ऊर्जा यूपीए सरकार के कुशासन पर लगानी चाहिए। यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। गठबंधन धर्म के भी खिलाफ है। भाजपा यह बर्दाश्त नहीं कर सकती कि कोई दूसरा दल उन्हें ‘पाठ’ पढ़ाने की कोशिश करे। क्योंकि, उनके यहां मोदी जी सहित सभी नेता धर्म-निरपेक्ष हैं।

जदयू के चर्चित नेता एवं बिहार सरकार के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह ने पूछा है कि उनके नेताओं ने आखिर क्या राजनीतिक गुनाह कर दिया है? जो कि भाजपा के तमाम प्रवक्ता अपने गुस्से को काबू में नहीं कर पा रहे? आखिर पार्टी के मंच से अपना   सैद्धांतिक नजरिया साफ-साफ बताना क्या कोई गुनाह हो गया है? नरेंद्र सिंह का दावा है कि उनकी पार्टी धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत से किसी कीमत पर समझौता नहीं कर सकती। उन लोगों को सत्ता की भी ज्यादा परवाह नहीं है।

जदयू प्रवक्ता शिवानंद तिवारी इस बात पर हैरानी जताते हैं कि भाजपा के लोग मोदी के संदर्भ में उनकी पार्टी के नजरिए से इतना क्यों परेशान हो गए हैं? जबकि, उन लोगों का यह कोई नया नजरिया नहीं है। हम लोग महीनों से अगाह कर रहे हैं कि विवादित छवि वाले नेता को हम प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार स्वीकार नहीं कर सकते। बताइए, इसमें गठबंधन धर्म का कहां गला दबा दिया गया? सिद्धांतों की राजनीति करना कोई गुनाह तो नहीं है? हमारे लोगों ने कभी नहीं कहा कि हम एनडीए से दूर होना चाहते हैं। हमने एक राजनीतिक लाइन ले ली है, तो ले ली है।

सूत्रों के अनुसार, पार्टी नेतृत्व ने यह समझ लिया है कि भाजपा के नेता जो आक्रामक तेवर अपनाए हैं, इसके पीछे सोची-समझी रणनीति है। जदयू के एक वरिष्ठ सांसद अनौपचारिक बातचीत में कहते हैं कि संघ के आकाओं के इशारे पर इस मुद्दे को तूल दिया जा रहा है। जबकि, जदयू नेतृत्व ने कई बार भाजपा के शीर्ष नेताओं को बता दिया है कि यदि वे लोग लालकृष्ण आडवाणी जैसे किसी समझदार नेता के नाम पर सहमति बनाते हैं, तो उनकी पार्टी को कोई ऐतराज नहीं होगा।
 
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौर में नीतीश कुमार ने यह साफ कर दिया था कि कहीं से इस मुगालते में नहीं हैं कि वे भी इतनी कम ताकत से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन सकते हैं। ऐसे में, इस आशय की तमाम कयासबाजी का कोई मतलब नहीं है। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव कह चुके हैं कि एनडीए में सबसे बड़ा घटक भाजपा है। ऐसे में, इसी पार्टी से ‘पीएम इन वेटिंग’ का चेहरा आएगा। गुजरात के दंगों में विवादित हो चुके मोदी के बारे में पार्टी ने बहुत पहले अपनी राय बता दी थी। इतना जरूर है कि धर्म-निरपेक्षता के मुद्दे पर हम समझौता नहीं करने वाले। हालांकि, आखिरी दम तक हमारी कोशिश होगी कि यूपीए की भ्रष्ट सरकार को उखाड़ फेंकने का काम एनडीए ही करे।

जदयू के प्रधान महासचिव के सी त्यागी कहते हैं कि इस तरह के कयासों में कोई दम नहीं है कि हमारी कोई राजनीतिक समझदारी कांग्रेस से बन रही है। हम लोग तो भ्रष्टाचारी सरकार को उखाड़ फेंकना चाहते हैं। अच्छा यही रहेगा कि भाजपा के लोग समझदारी से काम लें। जदयू ने प्राकांतर से आडवाणी का नाम आगे बढ़ाने की पहल की है। शरद और नीतीश दोनों ने कह दिया है कि यदि 2009 की तरह इस बार भी उन्हें ‘पीएम इन वेटिंग’ बनाया जाए, तो एनडीए की एकता और मजबूत हो सकती है। ऐसा होने पर कई और घटक उपयुक्त समय पर एनडीए से जुड़ सकते हैं।

भाजपा के अंदर भी मोदी मुद्दा गरम हो जाने से एक बार फिर आडवाणी का नाम नए सिरे से चर्चा में आ गया है। भाजपा की एक लॉबी ने जदयू के तेवरों के बहाने आडवाणी के लिए जोरदार लॉबिंग शुरू कर दी है। सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि इस पहल में वे लोग भी शामिल हो गए हैं, जो कि कल तक मोदी के पैरवीकार बने घूम रहे थे। ऐसे नेताओं में यशवंत सिन्हा का नाम भी जुड़ गया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने यह कहकर पार्टी के अंदर बहस छेड़ दी है कि यदि आडवाणी नेतृत्व के लिए तैयार हों, तो उनका नाम आगे करने में क्या दिक्कत है? क्योंकि, अनुभव व राजनीतिक कद आदि के मामलों में आडवाणी पूरे देश में बेजोड़ हैं। पार्टी को इस मामले में नए सिरे से जरूर विचार करना चाहिए।

सूत्रों के अनुसार, इस दौर में आडवाणी की पैरोकारी के लिए जिस तरह से पार्टी में हलचल तेज हो गई है, उससे संघ के कई बड़े नेताओं के कान खड़े हो गए हैं। उल्लेखनीय है कि 2009 का लोकसभा चुनाव एनडीए ने आडवाणी के नेतृत्व में लड़ा था। वही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी थे। लेकिन, इस चुनाव में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा था। संघ के कुछ नेताओं को आशंका हो रही है कि कहीं नीतीश के तेवरों के पीछे आडवाणी लॉबी की कोई ‘हिडेन’ भूमिका न हो। सूत्रों का दावा है कि संघ के एक कद्दावार नेता ने इशारा कर दिया है कि मोदी विरोधी अभियान तेज करने वालों की खबर ले ली जाए। चाहे भले जदयू से रिश्ता तुरंत टूट जाए। जदयू ने भी भाजपा के तेवर देखकर बिहार में अपने बूते पर चुनाव लड़ने की तैयारियां शुरू कराने का मन बनाया है।

यदि बात आगे निकली, तो राज्य में जदयू अपने बूते पर सरकार चलाने को भी तैयार है। उल्लेखनीय है कि बिहार के 243 विधानसभा सीटों में 115 पर जदयू की जीत हुई थी। जबकि भाजपा 91 सीटों पर जीती थी। इस तरह से जदयू साधारण बहुमत से महज सात सीट पीछे है। इस कमी का राजनीकि जुगाड़ पार्टी अच्छी तरह से कर सकती है। उसे लगता है कि धर्म-निरपेक्षता के सवाल पर भाजपा से नाता तोड़ा गया, तो पार्टी हर तरह से राजनीतिक फायदे में रहेगी। रणनीतिकार यह आकलन करने में लगे हैं कि आर-पार का फैसला कब लेना ज्यादा फायदे का सौदा होगा?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

जी न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर लाइव इंडिया में एडिटर बने प्रमोद राघवन

वरिष्‍ठ पत्रकार प्रमोद राघवन ने जी न्‍यूज से इस्‍तीफा दे दिया है. वे बंगलुरु में जी न्‍यूज के ब्‍यूरो के रूप में कार्यरत थे. वे पिछले आठ सालों से जी न्‍यूज को अपनी सेवाएं दे रहे थे. प्रमोद इसके पहले काफी समय तक इंदौर में भी कार्यरत रहे हैं. खबर है कि उन्‍होंने अपनी नई पारी लाइव इंडिया के साथ शुरू की है. उन्‍हें साउथ का एडिटर बनाया गया है. माना जा रहा है कि उन्‍हें सतीश के सिंह ने लाइव इंडिया के साथ जोड़ा है. प्रमोद राघवन इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

सूत्रों का यह भी कहना है कि वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद राघवन लाइव इंडिया के नये चैनल जो कि कन्नड़ में आने वाला है, उसके चैनल हेड बनाए गए हैं. इसके अलावा वो लाइव इंडिया – नेशनल हिंदी चैनल के लिए दक्षिण भारत की खबरों का जिम्मा भी संभालेगे.  प्रमोद राघवन ने 8 सालों तक ज़ी न्यूज़ को दिए अपने कार्यकाल में दक्षिण भारत से कई बड़ी खबरें दी है.

शौकीन मंत्री की जुबान फिसली तो खुद भी फिसले

शिवराज सिंह ने ठीक किया। विजय शाह को निकाल दिया। नहीं निकालते तो संदेश कुछ और ही जाता। वैसे, भी सीएम की पत्नी के बारे में कोई सपने पाले, उनको साफ साफ कहे कि भैया के साथ तो रोज ही जाती है, कभी देवर के साथ भी जाया करो… तो बवाल तो मचना ही था। पर, लगता है कि बीजेपी वालों की जुबान बिगड़ गई है। मध्य प्रदेश सरकार के आदिवासी कल्याण मंत्री विजय शाह को बिगड़ी जुबान के बाद घर बैठना पड़ा है। अब सब समझ में आ रहा है। माफी मांग रहे हैं। कह रहे हैं कि जुबान फिसल गई थी।

अरे भैया, आपकी जुबान फिसली… इसीलिए तो मंत्री की कुर्सी से भी फिसल गए। पर, अब पछताए क्या होत, जब चिड़िया चुग गई खेत। अच्छे खासे मंत्री थे। अभद्र, अश्लील और इसी किस्म की बक बक करने के चक्कर में सरकार से चलता कर दिया गय़ा। वैसे लगता है कि विजय शाह शाह कोई बहुत सुलझे हुए आदमी नहीं है। मन ही मन रोमांस करने वाले आदमी हैं। ठीक वैसे ही जैसे, ओसामा बिन लादेन था तो दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी, पर सनी लियोन के सेक्सी वीडो देखने का शौकीन था। चुपके चुपके वह सनी लियोन की ब्लू फिल्में देखा करता था। विजय शाह ने अपने ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पत्नी के बारे में भी कुछ का कुछ कह दिया। वे भाषण दे रहे थे। और देते देते इतना कुछ कह गए कि मत पूछो। किसी भी सभ्य इंसान के लिए शर्म की बात है।

शाह ने कहा कि एक बार उन्होंने मुख्यमंत्री चौहान की पत्नी से कहा, 'भइया के साथ तो रोज जाती हो, कभी देवर के साथ भी चली जाया करो।' यही नहीं उन्होंने महिलाओं पर अपने भाषण में बहुत 'अश्लील' टिप्पणी की थी। झाबुआ में एक कार्यक्रम में सैकड़ों छात्राएं थी, और बहुत सारी टीचर भी थीं, उनकी मौजूदगी में मंत्री ने खूब अश्लील भाषण दिया था। पहली पहली बार वाले मामले में खूब शरारती लहजे में छात्राओं से मजाक करते हुए अश्लील भाषण किया। कार्यक्रम में शाह ने पहले तो सरकार की आदिवासी तबके के लिए चलाई जा रही योजनाओं का जिक्र किया लेकिन फिर कुछ ही देर बाद मंच पर मौजूद एक नाम की दो महिला नेताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी।

उन्होंने कहा, लगता है कि झाबुआ में एक के साथ एक फ्री मिलता है। शाह यहीं नहीं रुके, उन्होंने शिविर में बैठी लड़कियों की ओर इशारा करते हुए यहां तक कह डाला, 'पहला-पहला जो मामला होता है, वह आदमी भूलता नहीं। फिर बच्चों से सवाल भी किया कि बोलो- भूलता है क्या? फिर यह भी बोले कि … बच्चे समझ गए होंगे।' मंत्री की इस बेवकूफी पर छात्राएं जब हंसने लगी तो ठहाके लगाते हुए मंत्री जी पर उनकी प्रतिक्रिया थी कि बच्चे भी बड़े समझदार हैं। शाह के इस बयान पर कांग्रेस ने हंगामा खड़ा किया था और शाह को बर्खास्त करने की मांग की थी। मंगलवार को पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने बयान को गंभीरता से लिया और शाह को तलब किया। बाद में मंगलवार देर रात शाह ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनके बयान को राज्य महिला आयोग ने भी गंभीरता से लिया है।

आयोग की अध्यक्ष उपमा राय का कहना है कि शाह जिस कार्यक्रम में शामिल हुए थे, उसकी सीडी आयोग ने मंगाई है, उसके बाद ही आयोग कोई कदम उठाएगा। शाह के बयान के खिलाफ कांग्रेस की महिला नेताओं ने मंगलवार को प्रदर्शन कर पुतला दहन भी किया। मध्य प्रदेश सरकार की जानकारी के मुताबिक विजय शाह का जन्म एक नवंबर 1962 को हुआ था। स्व. श्री देवीसिंह के पुत्र कुंवर विजय शाह एम.ए. तक पढ़े लिखे हैं और पेश में किसान होना बताया है। स्वीमिंग, टेकिंग, हार्स राइडिंग, जनकल्याण संबंधी कार्य, पर्यटन एवं भ्रमण में उनकी विशेष रूचि है। लेकिन सीएम की पत्नी पर अश्लील चिप्पणी करने और स्कूली बच्चियों के साथ पहली पहली बार के अनुभव की बात करने के बाद विजय शाह की विशेष रुचि किसमें है, यह सभी को समझ में आ गया है।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

प्रधानमंत्री के नाम की घोषणा में क्या रखा है?

सारे देश में यह माना जा रहा है कि जनता दल (यू) ने नरेंद्र मोदी के विरुद्ध शंखनाद कर दिया है| यदि भाजपा नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर देगी तो यह गठबंधन टूट जाएगा| यह सोच सतही है और तर्क की तुला पर खरा नहीं उतरता| सबसे पहला प्रश्न तो यही है कि जनता दल ने अपने प्रस्ताव में भावी प्रधानमंत्री की अर्हताएं गिनाने में कोई संकोच नहीं किया लेकिन मोदी का नाम लेकर उनको रद्द करने में उसकी कलम क्यों कांप गई? कलम से ज्यादा लचीली जुबान होती है| लेकिन जुबान भी मोदी के नाम पर नहीं हिल पाई?

नीतीश कुमार ने वे सब तर्क दिए जो मोदी पर तीर की तरह पड़े लेकिन उन्होंने नाम लेकर मोदी पर हमला क्यों नहीं किया? नाम लेकर वे मोदी पर हमला करते तो अपनी जगहंसाई करवाते| लोग कहते सूत न कपास और हवा में लठ्म-लट्ठा| अभी भाजपा ने ही मोदी का नाम घोषित नहीं किया तो जनता दल आ बैल सींग मार क्यों करे? जनता दल के अध्यक्ष शरद यादव ने इस निरर्थक बहस को नज़र अंदाज ही नहीं किया बल्कि उन्होंने गठबंधन को सुदृढ़ बनाने की वकालत भी की| नीतीश ने आक्रमण तो किया लेकिन ऐसी चतुराई दिखाई की सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे|

उन्होंने ऐसा तेवर दिखाया, जिससे बिहार में उनके अल्पसंख्यक वोट डिगें नहीं और गठबंधन भी बना रहे| उन्होंने अटलजी को आदर्श नेता बताया, पगड़ी के साथ 'टोपी' पहनना भी जरूरी माना और सर्वसमावेशी विकास का नारा लगाया लेकिन दिसंबर तक की मोहलत दे दी याने भाजपा से कहा कि इस वर्ष तक वह अपना प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दे| राजनीति में आठ माह का समय बहुत लंबा होता है| यदि चुनाव दिसंबर के पहले ही हो गए तो सारा झगड़ा खत्म! बिना किसी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के ही चुनाव लड़ लिया जा सकता है| यों भी भाजपा के दूरंदेशी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने पहले से ही भांप लिया था कि जनता दल (यू) मोदी का विरोध करने के लिए मजबूर है| इसीलिए उन्होंने पहले दिन ही प्रधानमंत्री के उम्मीदवार का नाम घोषित करने से मना कर दिया था| मोदी के नाम की घोषणा से गठबंधन में तनाव का डर तो था ही, कई अन्य आशंकाएं भी थीं| जब घोषणा के बिना ही सर्वत्र् उस नाम की तूती बोल रही हो तो उसकी घोषणा क्यों की जाए? यों भी घोषणा से क्या फायदा है?

लालकृष्ण आडवाणी का नाम पिछली बार जमकर घोषित किया गया था| क्या नतीजा निकला? वैसे भी संसदीय प्रणाली में भावी शासनाध्यक्ष के नाम की घोषणा करना कहां तक उचित है? ऐसी घोषणाएं तो अमेरिका-जैसी अध्यक्षात्मक (राष्ट्रपतीय) शासन-प्रणाली में होती है| संसदीय प्रणाली में चुनाव के बाद वही प्रधानमंत्री बनता है, जिसके नाम पर जीता हुआ संसदीय दल मुहर लगा देता है| कभी-कभी ऐसा भी होता है कि चुनाव-अभियान का नेता कोई होता है और चुनाव जीतने के बाद संसदीय दल का नेता (प्रधानमंत्री) कोई और बनता है| 1977 में जयप्रकाशजी के नाम पर चुनाव लड़ा गया और प्रधानमंत्री बने, मोरारजी और चरणसिंह| राम मंदिर आंदोलन के नेता आडवाणी थे और प्रधानमंत्री चुने गए, अटलबिहारी वाजपेयी| इसी प्रकार कांग्रेस के चुनाव-अभियान की नेता थीं, सोनिया गांधी लेकिन जीत के बाद सरकार के नेता बने, डॉ. मनमोहन सिंह! वोट डालनेवाली जनता प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करती| वह केवल सांसद को चुनती है या सामूहिक रुप से किसी पार्टी को चुनती है और फिर वह पार्टी अपने प्रधानमंत्री को चुनती या नामजद करती है| इसीलिए भारत-जैसे संसदीय प्रणाली वाले देशों में यदि हमें सच्चा लोकतंत्र् कायम करना है तो हमारा जोर प्रधानमंत्री पद के नाम पर चुनाव लड़ने की बजाय सिद्धातों, नीतियों और कार्यक्रमों पर चुनाव लड़ा जाना चाहिए| इसी आधार पर आशा की जाती है कि चुनाव के पहले किसी भी नाम की घोषणा नहीं की जाएगी| तो फिर गठबंधन के टूटने का सवाल ही कहां उठता है?

भाजपा तो इस गठबंधन को बिल्कुल नहीं तोड़ना चाहती| बल्कि वह इसे काफी बड़ा और मजबूत बनाना चाहती है| यदि वह नीतीश को जाने दे तो उसे ज्यादा नुकसान नहीं होगा| उसे लोकसभा में 20-25 सीटें कम मिलेंगी| जनता दल का अस्तित्व बिहार के बाहर कहां है? यह सब जानते हैं कि जनता-दल का मोदी-विरोध सिद्धांत पर आधारित नहीं है| यदि मोदी इतने ही अछूत हैं तो नीतीश उस समय भाजपा की सरकार में मंत्री क्यों बने रहे, जब गुजरात में रक्तपात हो रहा था? उस समय ही गठबंधन क्यों नहीं तोड़ दिया? सिद्धात से बड़ी सत्ता है| बिहार में सत्ता में बने रहना है| इसीलिए अल्पसंख्यकों की खुशामद जरूरी है| यदि मोदी या भाजपा की लहर उठ गई और उसे आशातीत बहुमत मिल गया तो जो गठबंधन से हट जाएंगे, वे भी चुनाव के बाद बिना बुलाए ही सत्ता की चाशनी चखने के लिए लौट आएंगे|

नीतीश ने भावी प्रधानमंत्री की जो अर्हताएं बताई हैं, वे सब सही हैं| उन पर वे तो खरे उतरते हैं लेकिन संयोग है कि वे भाजपा में नहीं हैं| वे होते तो उनके नाम पर चुनाव के बाद झटपट सहमति हो सकती थी लेकिन प्रश्न यह भी है कि जो अर्हताएं उन्होंने बताई हैं, क्या वे काफी हैं? भारत-जैसे विशाल राष्ट्र के संचालन के लिए क्या प्रांतीय अनुभव काफी है? इसके अलावा कोई भी पार्टी अपने राष्ट्रीय नेताओं और संसदीय दल के नेताओं को एक ही झटके में बुहारकर अलग कैसे कर सकती है| इसलिए अभी से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा अनावश्यक प्रतीत होती है| इसके अलावा अभी से किसी भी नेता के नाम की औपचारिक घोषणा पूरी पार्टी को ही पसोपेश में डाल सकती है, खासतौर से वह अगर किसी सरकारी पद पर विराजमान हो| आजकल हर पद सांसत में है| चाहे वह मंत्री का हो, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री का! कब कौनसा घोटाला गला घोंट दे और कौनसा अदालती फैसला फांसी का फंदा बन जाए, किसे भी पता नहीं| इसीलिए सत्ता की यह दुकान बिना नामपट के चलती रहे, इसी में सबका फायदा है| जिसके नाम से सबसे ज्यादा माल बिकेगा, उसी के नाम का नामपट चुनाव के बाद दुकान पर अपने आप टंग जाएगा|

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्‍ठ पत्रकार तथा स्‍तंभकार हैं.

परवेज अहमद जागरण एवं अंकुर तिवारी अमर उजाला पहुंचे

: अमर उजाला, अलीगढ़ में होगा बदलाव : हिंदुस्‍तान, लखनऊ से खबर है कि परवेज अहमद इस्‍तीफा देकर दैनिक जागरण से जुड़ने जा रहे हैं. परवेज हिंदुस्‍तान में लखनऊ के सिटी इंचार्ज भी रह चुके हैं. वे लंबे समय से हिंदुस्‍तान से जुड़े हुए थे. संभावना जताई जा रही है कि जल्‍द ही वे लखनऊ में अमर उजाला ज्‍वाइन कर लेंगे.

हिंदुस्‍तान, अलीगढ़ से खबर है कि अंकुर तिवारी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सीनियर रिपोर्टर थे. अंकुर ने अपनी नई पारी अमर उजाला, लखनऊ के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां भी सीनियर रिपोर्टर बनाया गया है. अंकुर अमर उजाला से इस्‍तीफा देकर ही हिंदुस्‍तान पहुंचे थे. जहां इन्‍हें प्रमोट करके सीनियर रिपोर्टर बनाया गया था.

अमर उजाला, अलीगढ़ से खबर आ रही है कि सिटी इंचार्ज की जिम्‍मेदारी निभा रहे कमल शर्मा का तबादला डेस्‍क पर होने वाला है. कमल लंबे समय से सिटी इंचार्ज की जिम्‍मेदारी निभा रहे हैं. चर्चा है कि उनकी जगह श्रीपाल शर्मा को नया सिटी इंचार्ज बनाया जा सकता है. प्रबंधन जल्‍द ही इन बदलावों को अंजाम देने वाला है.

भोपाल से इंदौर शिफ्ट होगा भास्‍कर का नेशनल न्‍यूज रूम!

दैनिक भास्‍कर, भोपाल से खबर है कि अब कल्‍पेश याज्ञनिक इंदौर में ही बैठेंगे. नवनीत गुर्जर भोपाल से जिम्‍मेदारी संभालेंगे. बताया जा रहा है कि इंदौर के भास्‍कर परिसर में ही एक नई बिल्डिंग बनकर तैयार हो रही है. नेशनल न्‍यूज रूम इसी नई बिल्डिंग में शिफ्ट होने जा रहा है. अब नेशनल न्‍यूज रूम भोपाल की बजाय इंदौर से संचालित होगा. कल्‍पेश याज्ञनिक इंदौर में ही महीनों से जमे हुए हैं तथा पूरी जिम्‍मेदारी देख रहे हैं.

हालांकि बीच में यह खबर आई थी कि कल्‍पेश याज्ञनिक को किनारे करने के लिए प्रबंधन ने उन्‍हें इंदौर भेज दिया है तथा वहीं उन्‍हें नेशनल आइडियेशन न्‍यूज रूम बनाकर जिम्‍मेदारी सौंप दी गई है. उनके पर कतरे जाने की तैयारी में उनके ही खास नवनीत गुर्जर को लगाया गया है, परन्‍तु जब इस तथ्‍य की जांच पड़ताल की गई तो पता चला कि प्रबंधन नेशनल न्‍यूज रूम को ही इंदौर शिफ्ट करने की तैयारी कर रहा है. इसलिए कल्‍पेश याज्ञनिक को इंदौर भेजा गया है.

समूह संपादक श्रवण गर्ग के नईदुनिया जाने के बाद कल्‍पेश याज्ञनिक का कद प्रबंधन ने अचानक बढ़ा दिया. हालांकि उनके रास्‍ते में कमलेश सिंह भी आ रहे थे, लिहाजा इस तरह की परिस्थितियां पैदा की गई कि कमलेश सिंह खुद ही इस्‍तीफा देकर इंडिया टुडे समूह से जुड़ गए. इसके बाद भास्‍कर समूह में कल्‍पेश याज्ञनिक और नवनीत गुर्जर की ही तूती बोल रही है.

पीपुल्‍स समाचार, इंदौर के संपादक बने देवी कुंडल, महेश कजोडिया को हटाया गया

पीपुल्‍स समाचार, इंदौर से खबर है कि प्रभारी संपादक के रूप में जिम्‍मेदारी देख रहे महेश कजोडिया को हटा दिया गया है. पीपुल्‍स समाचार के स्‍थानीय संपादक प्रवीण खारीवाल के इस्‍तीफा देने के बाद से इस पद पर किसी की नियुक्ति नहीं की गई थी. सेंट्रल डेस्‍क इंचार्ज तथा वरिष्‍ठ पत्रकार महेश कजोडिया ही इंदौर में पीपुल्‍स समाचार की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. बताया जा रहा है कि पिछले कई दिनों से लगातार रि‍पिटेशन के चलते महेश को हटाया गया है.

उनकी जगह इंदौर के सांध्‍य दैनिक अग्निमान के एडिटर देवी कुंडल को पीपुल्‍स समाचार, इंदौर का नया आरई बनाया गया है. देवी कुंडल लंबे समय से अग्निमान से जुड़े हुए थे. इसके पहले भी वे कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. देवी कुंडल की नियुक्ति प्रधान संपादक रामेंद्र सिन्‍हा ने की है.

”पीसीआई का अध्‍यक्ष रिटायर्ड जज की बजाय पत्रकार को बनाया जाए”

जस्टिस मार्केण्डय काटजू के इस कहे पर गौर करना चाहिए कि पत्रकार बनने के लिए किसी व्यक्ति के पास इसकी व्यावसायिक डिग्री जरूर हो। मुझे लगता है कि मौजूदा पत्रकारिता संस्थानों के पास इसका कोई निर्धारित पाठ्यक्रम भी नहीं है इसलिए प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) इसका कोर्स भी तय करे तथा पीसीआई एक दिखावटी संस्था होने की बजाय यह भी ठीक मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) या बार कौंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) की तरह सक्षम संवैधानिक संस्था होनी चाहिए।

पीसीआई में रजिस्ट्रेशन के बाद ही कोई व्यक्ति पत्रकारिता कर सकता है तो न सिर्फ पत्रकारिता का भविष्य संवरेगा वरन् एक पत्रकार के जीवन में भी स्थिरता और गंभीरता आएगी। आज मीडिया में जो अराजकता है वह भी इससे दूर होगी। इसके लिए जरूरी यह भी होगा कि पीसीआई का अध्यक्ष किसी रिटायर्ड जज को बनाने की बजाय किसी सीनियर पत्रकार को आमराय से बनाया जाए। लेकिन पीसीआई का अध्यक्ष हो किसी भारतीय भाषा का पत्रकार ही।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के फेसबुक वॉल से साभार.

इंदौर में नईदुनिया के नए ऑफिस के लिए भूमि पूजन, संजय गुप्‍ता भी पहुंचे

जागरण समूह अपने समूह के अखबार नईदुनिया के के लिए इंदौर में नया ऑफिस बनवा रहा है. इसके लिए इंदौर में आज भूमि पूजन हो रहा है. जागरण समूह के सीईओ और संपादक संजय गुप्‍त इसके लिए इंदौर में जमे हुए हैं. नईदुनिया का कारपोरेट तथा संपादकीय ऑफिस इसी नई बिल्डिंग में शिफ्ट होगा. उल्‍लेखनीय है कि जागरण समूह ने कुछ समय पहले ही विनय छजलानी से नईदुनिया को खरीदा है.

बेंगलुरु में बीजेपी कार्यालय के पास धमाका, 16 लोग घायल

बेंगलुरु : बेंगलुरु के मल्लेश्वरम इलाके में बीजेपी दफ्तर के समीप एक मोटरसाइकिल में हुए धमाके के बाद तीन गाड़ियां बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गई और कई मोटरसाइकिल और स्कूटर धमाके की चपेट में आ गए। कई गाड़ियों में आग लग गई। धमाके में वहां तैनात आठ पुलिसकर्मी और आठ अन्य नागरिक घायल हुए हैं, जिनमें दो नाबालिग लड़कियां भी शामिल हैं। इनमें से दो की हालत गंभीर है। बताया जा रहा है कि धमाके में आईईडी और छर्रों का इस्तेमाल हुआ।

कर्नाटक के गृहमंत्री आर अशोक ने इसे आतंकवादी कार्रवाई बताते हुए कहा कि बीजेपी कार्यकर्ता इस धमाके के निशाने थे। जिस बाइक में धमाका हुआ, उसका नंबर TN 22 R 3769 है। डीजीपी के मुताबिक दो घायलों को छोड़कर सभी की हालत खतरे से बाहर है। शुरुआती रिपोर्ट का हवाला देते हुए शहर के पुलिस आयुक्त राघवेंद्र औरादकर ने घटनास्थल पर संवाददाताओं से कहा, यह एक विस्फोट है। मोटरबाइक के जरिये एक बम का इस्तेमाल हुआ, जिसे कारों के बीच में लगाकर रखा गया था। पुलिस प्रमुख ने कहा, फिलहाल, विस्फोट की प्रकृति को लेकर कुछ भी कहना मुमकिन नहीं है।

जिस जगह धमाका हुआ है। उस जगह पर मारुति वैन खड़ी थी। पुलिस को इस वैन के मालिक की तलाश है। पुलिस को लगता है कि जिस तरह से मारुति कार मोटरसाइकिल के बगल में खड़ी थी उससे सवाल उठ रहे हैं। फिलहाल पुलिस वैन मालिक की तलाश कर रही है। सूत्रों का कहना है कि हो सकता है कि धमाके में टाइमर का भी इस्तेमाल किया गया हो। फिलहाल पुलिस जांच में जुटी है। मौके पर एनआईए की टीम मौजूद है और जांच में जुटी है। वहीं देश के गृहराज्य मंत्री आरपीएन सिंह ने कहा कि लोग अफवाहों पर ध्यान नहीं दें। वो शांति बनाए रखें। गृहमंत्रालय कर्नाटक पुलिस को हर मदद के लिए तैयार है। वहीं जख्मी लोगों को केसी जनरल अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

दमकल सेवा के निदेशक बीजी चेंगप्पा ने बताया कि विस्फोट में तीन कार और कुछ अन्य वाहनों को नुकसान पहुंचा हैं।  5 मई को होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए बीजेपी कार्यालय में बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों की आवाजाही हो रही है। नामांकन भरने का आज आखिरी दिन है। वहीं बीजेपी कार्यालय से मंदिर भी कुछ दूरी पर है। एक चश्मदीद राघवेंद्र के मुताबिक धमाके के बाद एकदम से आग लग गई।

दिल्‍ली प्रेस ने खरीदी बीएस समूह की ऑटोमोबाइल पत्रिका ‘बीएस मोटरिंग’

बिजनेस स्‍टैंडर्ड समूह के ऑटो मोबाइल मैगजीन 'बीएस मोटरिंग' अब दिल्‍ली प्रेस का हो चुका है. दिल्‍ली प्रेस ने इस पत्रिका को बिजनेस स्‍टैंडर्ड से खरीद लिया है. इसी साल जनवरी से दोनों समूहों में इसके सौदे के लिए बातचीत चल रही थी. यह डील दो दिनों पहले ही फाइनल हुई है. सूत्रों का कहना है कि इस मैगजीन के लिए दस करोड़ की डील फाइनल हुई है. अप्रैल इश्‍यू को बिजनेस स्‍टैंडर्ड ने प्रकाशित किया लेकिन मई का अंक दिल्‍ली प्रेस प्रकाशित करेगा. 

बिजनेस स्‍टैंडर्ड इस को 17 सालों से प्रकाशित करता चला आ रहा है. पहले यह बीएस के एक पेज पर ऑटोमोबाइल के रूप में 1995 में प्रकाशित होना शुरू हुआ. अच्‍छा रिस्‍पांस देखते हुए हुए 1998 में तैमासिक पत्रिका के रूप में प्रकाशित किया जाने लगा. इसके अगले ही साल यानी 1999 में इसे मासिक पत्रिका बना दिया गया. तब से ही इसे बीएस समूह प्रकाशित करता चला आ रहा था. बताया जा रहा है कि अखबार के चलते बीएस समूह के लोग इस मैगजीन पर फोकस नहीं कर पा रहे थे, इसलिए इसे बेचने का निर्णय लिया.

अमर उजाला में चीफ सब बने शरद मिश्र, अमित एवं रश्मि की नई पारी

दैनिक भास्‍कर, लुधियाना से खबर है कि शरद मिश्र ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर चीफ सब एडिटर थे. शरद ने अपनी नई पारी अमर उजाला, नोएडा के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां पर भी चीफ सब एडिटर बनाया गया है. भास्‍कर से पहले शरद दिल्‍ली में ही नेशनल न्‍यूज सर्विस, आज समाज, नईदुनिया और नेशनल दुनिया को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. पिछले तेरह सालों से पत्रकारिता में सक्रिय शरद की गिनती अच्‍छे और सुलझे हुए पत्रकारों में की जाती है. 

अमित मंडलोई ने पत्रिका, इंदौर से इस्‍तीफा देकर नईदुनिया ज्‍वाइन करने जा रहे हैं. वे इसके पहले इंदौर सिटी भास्‍कर में कार्यरत थे. अमित कई और संस्‍थानों को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. रश्मि प्रजापति ने नईदुनिया के साथ अपनी नई पारी शुरू करने जा रही हैं.

अखबार में नौकरी दिलावाने का झांसा देकर युवती का रेप करता रहा पत्रकार

गुड़गांव। एक नेशनल इंग्लिश न्यूज पेपर में काम करने वाले युवक पर पुलिस ने रेप और जान से मारने की धमकी देने का केस दर्ज किया है। आरोप है कि मीडियाकर्मी युवती को मीडिया हाउस में काम दिलवाने व शादी का झांसा देकर 2 साल से उसके साथ रेप कर रहा था। पुलिस को दी शिकायत में युवती ने युवक के साथ-साथ उसकी पत्नी को भी इस पूरी साजिश में शामिल बताया है। पुलिस ने इस दंपती के खिलाफ केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

डीएलएफ फेज टू के यू ब्लॉक निवासी 23 वर्षीय एक युवती ने सोमवार शाम डीएलएफ फेज टू थाना पुलिस में एक शिकायत दी। युवती ने इस शिकायत में कहा कि एक नेशनल इंग्लिश न्यूज पेपर में काम करने वाले एक युवक ने मीडिया हाउस में काम दिलवाने के अलावा शादी का झांसा देकर 2 साल तक उसके साथ रेप किया। इस युवक ने उसे यू ब्लॉक में किराये पर मकान भी दिलाया। जब युवक ने उसे काम नहीं दिलवाया और न ही उससे शादी की तो दोनों के बीच बहस शुरू हो गई। युवक ने उसे जान से मारने की धमकी देते हुए शादी करने से मना कर दिया। युवती ने पुलिस को बताया कि उसे बाद में पता चला कि युवक शादीशुदा है। डीएलएफ फेज टू थाना प्रभारी इंस्पेक्टर विकास कौशिक ने बताया कि पुलिस ने केस दर्ज कर आरोपी की गिरफ्तारी के लिए छापामारी शुरू कर दी है। (एनबीटी)

आकाशवाणी यौन शोषण मामले में दो अधिकारी बर्खास्‍त, एक निलंबित

आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र में महिला रेडियो जॉकी के यौन उत्पीड़न और उनसे अनुचित व्यवहार का मामले में प्रसार भारती ने दो कर्मचारियों को बर्खास्त और एक को निलंबित कर दिया है। इसके साथ ही केंद्र के निदेशक को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। पिछले महीने आकाशवाणी की 25 से ज्यादा महिला रेडियो जॉकी ने इस बात की शिकायत की थी कि उन्हें काम के बंटवारे एवं वेतन को लेकर भेदभाव का शिकार बनाया जा रहा है। साथ ही इन आरजे ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें पिछले दो वर्षों से संकेतिक रूप से यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

आरजे ने अपनी यूनियन एआईआरबीपीए के जरिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय एवं दिल्ली महिला आयोग से शिकायत की थी। इसके बाद प्रसार भारती एवं मंत्रालय ने आंतरिक जांच शुरू कर दी। मामले को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की गई है जिसकी सुनवाई मई में निर्धारित है। सोमवार को प्रसार भारती के सीईओ जवाहर सरकार द्वारा हस्ताक्षरित एक नोट में ड्यूटी ऑफिसर एनके वर्मा और शीले को तत्काल प्रभाव से पद से बर्खास्त कर दिया। जबकि एफएम गोल्ड के प्रोग्रामिंग एक्सीक्यूटिव दानिश इकबाल को जांच को प्रभावित करने के आरोप में निलंबित कर दिया गया है।

इसके साथ ही केंद्र के निदेशक एल एस वाजपेयी को मामले की शिकायत मिलने के बावजूद कोई कार्रवाई न करने के कारण नोटिस जारी किया गया है। प्रसार भारत के सदस्य (कार्मिक) बिग्रेडियर (सेवानिवृत्त) वीएएम हुसैन ने आदेश जारी करते हुए कहा कि मामला काफी गंभीर है और यह सार्वजनिक सेवा प्रसारणकर्ता की खराब छवि प्रस्तुत करता है। सूत्रों ने कहा कि प्रसार भारती की आंतरिक जांच अभी जारी है और जांच पूरी होने के बाद कुछ लोगों पर कार्रवाई हो सकती है।

भड़ास ने संदीप नागर द्वारा संपादक को भेजी गई लीगल नोटिस भी छापी थी

तमाम प्रतिक्रियाएं इस वाल पर आईं। इसीलिए मैंने इस वाल को पुन शेयर किया है। किसी विशाष दत्त ने लिखा कि आपने इस वाल पर यशवंत व्यास और अजय उपाध्याय का जिक्र क्यों नहीं किया क्या आप उन्हें पत्रकार नहीं मानते हैं। हालांकि बाद में पता नहीं क्यों उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया डीलिट कर दी। मैंने इस वाल में उन्हीं लोगों का जिक्र किया है जिन्होंने सन् २००० के बाद के दशक में हिंदी अखबारों को टीवी के मुकाबले मजबूती से खड़ा किया।

जहां तक शशि शेखर की बात है उनका कद बड़ा है। न्यूज की उन्हें समझ है। अखबार निकालना उन्हें आता है लेकिन उन्होंने अपने जिन सहयोगियों को संपादक के पद से नवाजा उनमें से ज्यादातर इसके लायक नहीं थे। अभी कुछ ही दिनों पहले उनके एक संपादक पर एक स्ट्रिंगर ने साढ़े पांच लाख रुपये लेकर वापस नहीं करने का आरोप लगाया है। यही नहीं जब उसने पैसे मांगे तो उसे हटा दिया। भड़ास फॉर मीडिया ने उन संपादक के बारे में उस स्ट्रिंगर संदीप नागर (मेरठ की तहसील मवाना के ब्यूरो चीफ) का पत्र और संपादक को भेजी गई लीगल नोटिस भी छापी थी। संदीप नागर एक अच्छे और समर्पित पत्रकार हैं। वे बहसूमा के उस गूजर राजवंश से हैं जिनका आजादी की लड़ाई में विशेष योगदान रहा है। पूरा मवाना क्षेत्र उनका सम्मान करता है और न्यूज की समझ भी उनमें अच्छी है।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के एफबी वॉल से साभार.

दुर्गा प्रसाद, ओमकार नाथ एवं प्रवीण की नई पारी

पिछले दिनों दैनिक जागरण, महराजगंज में हुए ताबड़तोड़ कार्रवाई में लगभग डेढ़ दर्जन लोगों को बाहर कर दिया गया था. इनमें से कई लोगों ने अपनी नई पारी शुरू कर दी है. लक्ष्मी पुर खुर्द के संवाद सूत्र दुर्गा प्रसाद गुप्त ने एनडीए व हिन्द मोर्चा तथा ठूठीबारी में प्रतिनिधि रहे डाक्टर ओमकार नाथ पाण्डेय ने निष्पक्ष प्रतिदिन ज्वाइन कर लिया है. वहीं एनडीए से निकाले गए प्रवीण मिश्रा अब ऑपरेटर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

भड़ास तक सूचनाएं आप bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

पत्रकार विनायक विजेता को धमकी देने वाले को गिरफ्तार करने का आदेश

अपने फेसबुक प्रोफाइल में कई पूर्व मंत्रियों के साथ की तस्वीर डालकर पहले फेसबुक पर युवतियों को फ्रेंड बनाने और बाद में उनके मैसेज बाक्स में गंदे संदेश भेजने, पीडित युवतियों द्वारा उसे फ्रेंड लिस्ट से हटाने पर उनके मोबाइल पर भद्दे और गंदे संदेश भेजने वाला सचिन मिश्रा के दुर्दिन के दिन आ गए। सचिवालय डीएसपी मनीष कुमार सिंह ने 16 अप्रैल को सचिन मिश्रा को गिरफ्तार करने का आदेश जारी कर दिया।

गौरतलब है कि मेरे द्वारा बनायी गई एक मुहबोली बहन सह फेसबुक फ्रेंड ने जब मुझसे इस बात की शिकायत की तो मैंने सचिन के नंबर पर फोन कर उसे ऐसा करने से मना किया तब भी उसने मुझे ही धमकी देते हुए फोन काट दिया। इसके कुछ दिन बाद उसने मुझे एक मैसेज भेजा जिसमें उसने मेरे चेहरे पर तेजाब फिकवाने की धमकी दी, जिसे मैं किसी सिरफीरे की करतूत समझ अन्यथा नहीं लिया। जब उसने बीते 19 और 20 मार्च की मध्यरात्रि मेरे मोबाइल नंबर 9973030693 पर तीन मैसेज 9334418981 से भेज मुझे गोली से उडा देने की धमकी दी तब इस सिरफीरे को सबक सिखाने के उद्देश्य से मैंने बीते 21 मार्च को गर्दनीबाग थाना में सचिन के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। 9334418981 नंबर से मुझे दी गई धमकी में यह चुनौती दी गई थी कि ‘यह नंबर (9334418981) उसके नाम से नहीं है इसलिए उसका कोई कुछ नहीं बिगाड सकता।’

पुलिस ने जब इस नंबर का सीडीआर और कॉल डिटेल खंगाला तो यह नंबर किसी रेहाना खातून के नाम का निकला पर सचिन मिश्रा के नाम और पते से 21 नवम्बर 2011 को निर्गत एक नंबर 9304107431 के सीडीआर और कॉल डिटेल की जांच की तो पता चला कि सचिन के नाम से निर्गत इस नंबर से रेहाना खातून के नाम से निर्गत नंबर पर अक्सर बात होती रहती है, जिसके आधार पर पुलिस ने इस मामले में सचिन पर 66 आईटी एक्ट सहित कई अजमानतीय धारा में मामला दर्ज किया था। मंगलवार को सचिवालय डीएसपी ने मामले का पर्यवेक्षण करते हुए सचिन की गिरफ्तारी का आदेश निकालते हुए गर्दनीबाग थाना को उसे जल्द गिरफ्तार करने का निर्देश दिया है।

पत्रकार विनायक विजेता के एफबी वॉल से साभार.

आगरा के नगर निगम ने हिंदुस्‍तान के चेहरे पर पोता रंग! (देखें तस्‍वीरें)

समाचार पत्र खुद को कानून और नियम के दायरे से ऊपर समझते हैं. इसकी बानगी देखने को मिली आगरा में. आगरा में एक पुल के दीवार पर बड़े शब्‍दों में हिंदुस्‍तान ने अपना प्रचार करने के लिए अपने नाम का पेंट करा रखा था. नगर निगम की तरफ से इसे मिटवाने को कहा गया था, पर हिंदुस्‍तान प्रबंधन ने इस पर कोई ध्‍यान नहीं दिया. बताया जा रहा है कि इसके बाद नगर निगम प्रबंधन ने हिंदुस्‍तान के प्रचार स्‍थान पर पेंट पुतवा कर उसका नाम मिटवा दिया गया.

सूत्रों का कहना है कि इस दौरान हिंदुस्‍तान की टीम ने अपना पूरा जोर लगा दिया. नगर निगम और उसके अधिकारियों तक को अर्दब में लेने की कोशिश की गई. कुछ गीदड़ भभकी भी दी गई, परन्‍तु इसके बाद भी नगर निगम ने नाम मिटवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. आखिरकार वे अपने अखबार के नाम पर पुतते रंग को रोक नहीं पाए. यानी नगर निगम ने उनके चेहरे पर कालिख पोत ही दी.

”सोशल मीडिया पर बंदिश नहीं लेकिन गाली देने वालों पर होगी कार्रवाई”

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया पर गाली गलौच करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी है। आईबीएन7 से खास बातचीत में गृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंह ने कहा कि सरकार सोशल मीडिया पर कोई सेंसरशिप नहीं चाहती, लेकिन उसका गैरवाज़िब इस्तेमाल करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। अगर आप ट्वीटर या फेसबुक पर बेबाकी से राय रखते हैं तो कई बार आपको इतनी गालियां पड़ सकती हैं कि आप निराश होकर सोशल मीडिया छोड़ने की बात सोचने लगें। लेकिन अब गाली गलौच करने वालों की खैर नहीं।

केंद्र सरकार ने बिगड़ैल ट्वीटरबाज़ों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी है। सबसे पहले इसका इशारा गृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंह के एक ट्वीट से मिला। अमरेश मिश्रा नाम के एक शख्स से जुड़े मामले में सिंह ने ट्वीट किया कि मुझे किसी अमरेश मिश्रा के अश्लील ट्वीट्स के बारे में कई शिकायतें मिल रही हैं। मुझे अंदाज़ा तक नहीं कि वो कौन है। एक और ट्वीट के ज़रिये गृह राज्य मंत्री ने कहा कि अगर कोई इंटरनेट पर हिंसा फैला रहा है तो उसकी शिकायत पुलिस से होनी चाहिए। अगर पुलिस कार्रवाई ना करे तो मेरे दफ्तर के ज़रिये मुझसे संपर्क करें।

आईबीएन7 से खास बातचीत में गृह राज्य मंत्री ने साफ किया कि सरकार सोशल मीडिया पर बंदिश लगाना नहीं चाहती लेकिन इसका गलत इस्तेमाल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। भारत में ट्वीटर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया को इस्तेमाल करने वालों की तादाद 7 करोड़ पार कर चुकी है। हाल में तर्क-वितर्क के दौरान शालीनता की हदें तोड़ देने का चलन लगातार बढ़ रहा है। हालांकि सरकार पर ये आरोप भी है कि वो सख्ती के ज़रिये अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोक लगाना चाहिती है। ऐसे में नए ज़माने के इस खेल के नियम सरकार को बेहद संजीदगी से तय करने होंगे। (आईबीएन)

हिंदुस्‍तान : बृजेश का इस्‍तीफा, सुधांशु की नई पारी

हिंदुस्‍तान, जालौन से खबर है कि प्रबंधन ने बृजेश मिश्रा से इस्‍तीफा ले लिया है. वे यहां पर प्रभारी थे. बृजेश लंबे समय तक हिंदुस्‍तान से जुड़े हुए थे. बृजेश से इस्‍तीफा मांगे जाने के कारणों का पता नहीं चल पाया है. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करने वाले हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

आई नेक्‍स्‍ट, गोरखपुर से इस्‍तीफा देने वाले फोटोग्राफर सुधांशु यादव ने अपनी नई पारी लखनऊ में हिंदुस्‍तान के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां सीनियर फोटो जर्नलिस्‍ट बनाया गया है. सुधांशु की हिंदुस्‍तान के साथ यह दूसरी पारी है. आई नेक्‍स्‍ट ज्‍वाइन करने से पहले वे गोरखपुर में हिंदुस्‍तान के साथ जुड़े हुए थे. 

कोडनानी, बाबू बजरंगी समेत 10 के लिए फांसी मांगेगी गुजरात सरकार

अहमदाबाद। गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार नरोडा पाटिया जनसंहार केस में दोषी अपनी पूर्व मंत्री माया कोडनानी और पूर्व वीएचपी नेता बाबू बजरंगी समेत 10 दोषियों को फांसी देने की अपील करने जा रही है। सरकार के पास स्पेशल कोर्ट के फैसले के इन दोनों को दी गई सजा के खिलाफ अपील करने के लिए तीन महीने का समय है। गौरतलब है कि कोडनानी एक समय मोदी की काफी खासमखास थीं। दंगों के दौरान कत्लेआम में नाम आने के बावजूद 2008 में कोडनानी महिला और बाल विकास मंत्री बनाया गया था।

अगस्त 2012 में अहमदाबाद के स्पेशल कोर्ट ने नरोडा पाटिया नरसंहार में 32 आरोपियों को दोषी करार दिया था, जबकि 29 को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। कोर्ट ने कोडनानी को 28 साल की सजा सुनाई थी। पूर्व वीएचपी नेता बाबू पटेल उर्फ बजरंगी को कोर्ट ने मरने तक जेल की सजा सुनाई थी। कोडनानी और बजरंगी नरोडा गाम दंगा केस में भी आरोपी हैं। इस केस में फैसला आना अभी बाकी है।

मोदी सरकार ने अन्य दोषियों की सजा बढ़वाने का भी मन बना लिया है। इसके लिए वह जल्द ही ऐसे 22 दोषियों की सजा 30 साल करवाने के लिए अपील करेगी, जिन्हें कोर्ट ने 14 साल की सजा सुनाई हुई है। इसके अलावा गुजरात सरकार सबूतों की कमी के आधार पर बरी कर दिए 29 आरोपियों में से 7 को सजा दिलाने के लिए अपील करेगी। मोदी सरकार को इन अपीलों के लिए हाई कोर्ट से परमिशन लेनी होगी। गुजरात हाई कोर्ट में प्रशांत देसाई, अल्पेश और गौरंग व्यास इन अपीलों पर जिरह करेंगे। गौरंग व्यास ने बताया कि 'सरकार के कानूनी विभाग ने अपील करने का फैसला पहले ही ले लिया था।' (एजेंसी)

मुलायम-आजम को अपने दर्द से प्‍यार है मुसलमानों के दर्द से नहीं

पिछले एक महीने से खुलकर भाजपा की शान में कसीदे गढ़ने वाले सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की इस राजनीति को कुछ लोग भले ही दूसरे चश्मे से देख रहे हों, मगर उनका भाजपा के प्रति प्रेम का इजहार का सिलसिला कल्याण सिंह के समय से ही चालू है। उत्तर प्रदेश में सपा और भाजपा में यह गठजोड़ था कि भाजपा हिन्दुओं की राजनीति करेगी तो सपा मुसलमानों की। दिन में दोनों राजनैतिक मंच से एक-दूसरे को पानी पी-पी कर कोसते जरूर थे, लेकिन शाम को मुलायम और कल्याण सिंह अमीनाबाद में एक साथ बैठकर लस्सी पीते थे।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अक्टूबर 1990 में उन्होंने कानून का सहारा लेकर बाबरी मस्जिद को शहीद होने से बचा लिया था। जिसकी वजह से मुलायम सिंह यादव को मौलाना मुलायम कहा जाने लगा और उत्तर प्रदेश का मुसलमान आंख मूंद कर सपा पर ईमान ले आया और मुलायम को सत्ता की चाबी सौंपने में अहम किरदार मुसलमानों का ही रहा। लेकिन यह शर्मनाक रहा कि मुसलमानों को मुलायम सिंह यादव ने केवल एक वोट बैंक समझकर उनकी अनदेखी की। वोट के बदले आजम खान सरीखे एक दो मुसलमानों को मंत्री बनाकर यह समझ लिया कि मुसलमानों को सत्ता में भागीदारी मिल गयी है। सरकारी नौकरियों में केवल अपनी जाति के लोगों को तरजीह दी। मुलायम सिंह यादव की सरकार एक तरह से यादवों की सरकार रही। मुसलमान केवल वोट देकर सरकार बनवाने तक ही सीमित रहे।

बात इतनी ही होती तो चल सकता था लेकिन मुलायम सिंह ने इस पर भी सब्र नहीं किया और देश को सांप्रदायिकता की आग में झोंकने वाली भाजपा की शान में कसीदे गढ़ने शुरू कर दिये इतना ही नहीं भाजपा की नेता सुषमा स्वराज ने भी पिछले दिनों लोकसभा में उनका भरपूर समर्थन किया था। दरअसल इससे संघ और सपा के जो छिपे रिश्ते थे अब वे खुले तौर पर सामने आगये हैं। वैसे इन रिश्तों की शुरुआत अमीनाबाद की कल्याण सिंह के साथ पीने वाली लस्सी से हुई थी। दोस्ती बढ़ती गई और ज्यादा गहराती गई जिसके फलस्वरूप मौलाना कहे जाने वाले मुलायम सिंह यादव ने बाबरी मस्जिद के विध्वसंक और जहरीली जुबान बोलने वाले साक्षी महाराज जिसने खुले आम एलान करके कहा था कि कि बाबरी मस्जिद पर सबसे पहला फावड़ा उसने चलाया था, इतना ही नहीं दीवारों पर नारे लिखे थे कि मुल्लाओं के दो स्थान कब्रस्तान या पाकिस्तान, एक नारा और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो, उस व्यक्ति को मुलायम सिंह यादव ने साल 2000 में राज्यसभा में भेजा। मुसलमानों ने इसे बर्दाश्त किया। फिर कल्याण सिंह के बेटे राजबीर सिंह को मंत्री बनाया। मुसलमानों ने इसे भी सहा।

सच यह भी है कि मुलायम सिंह यादव ने कल्याण सिंह को लोध वोटों के लालच में अपने साथ लिया था। लेकिन लोध वोट तो मिला नहीं, मुस्लिम भी छिटक गए। मुसलमान इस बात को नहीं पचा पाए कि जिस कल्याण सिंह को मुसलमान अपना दुश्मन मानते रहे हैं, उस आदमी को कैसे समाजवादी पार्टी में बर्दाश्त किया जा सकता है। हालांकि मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह को सपा से बाहर करके और मुसलमानों से अपनी गलती की माफी मांग ली बदले में मुसलमानों उन्हें फिर से उत्तर प्रदेश दे दिया। मगर सत्ता में आते ही उसने फिर से मुसलमानों को नजरअंदाज करना शुरु कर दिया है। उनके खिलाफ सुनियोजित तरीके से दंगे हो रहे हैं चुनावी घोषणा पत्र में किया गया 18 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा, उस पर तो विचार भी नहीं किया जा रहा है, उल्टे मुसलमानों को आरक्षण देने का खुले तौर से विरोध करने वाली भाजपा, और उसके नेताओं की शान में कसीदे गढ़े जा रहे हैं। जिनका मुस्लिमों की समस्या से कोई लेना देना ही नहीं है जिनकी नजर में मुसलमानों की परिभाषा बस इतनी सी है कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान जरूर होता है। उनसे हाथ मिलाकर उनकी तारीफें करके, समाजवाद को भूल कर हिंदुत्वाद की शरण में जाकर आप कौन – सा हित साधना चाहते हैं? अब कहां गया मुस्लिम प्रेम? और कहां गयी आजम खां जैसे खुद्दार नेता की मुस्लिम राजनीति जो कल्याण सिंह को सपा में लाते ही आग बबूला होने का ढोंग कर रहे थे।

दरअसल सच्चाई ये है कि आजम खां की लड़ाई कल्याण सिंह से नहीं थी, लड़ाई थी जयप्रदा के टिकट को लेकर। क्योंकि अगर आजम खां की लड़ाई कल्याण सिंह को लेकर होती तो न तो कल्याण सिंह के साहबजादे राजबीर सिंह मंत्री बनते और ना ही साक्षी महाराज को सपा से राज्यसभा में भेजा जा सकता था। और अगर आजम खां में कौम परस्ती होती तो इन लोगों का खुले तौर से बहिष्कार करते या खुद स्तीफा देकर पार्टी से अलग हो जाते। मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया उन्हें अपनी कुर्सी प्यारी है कौम नहीं। और यहां पर विभिन्न बुद्धिजीवियों द्वारा कही गई वे बातें सही साबित हो जाती हैं कि मुस्लिम नेताओं को सिर्फ अपने दर्द से प्यार है ना कि कौम के दर्द से। किसी शायर का ये शेर मेरे जेहन में बार बार आता है जब भी कोई इस तरह की इबारतें लिखी जाती हैं….

सब हमारी खैर ख्वाही के अलमबरदार थे
सबके दामन पर हमारे खून के छींटे मिले।

लेखक वसीम अकरम त्‍यागी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

ट्राई के दफ्तर के सामने केबल ऑपरेटरों का भूख हड़ताल

नई दिल्ली। राजधानी के केबल ऑपरेटर अपने कारोबार को बचाने तथा एमएसओ की मनमानी पर रोक लगाने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आये हैं। केबल ऑपरेटरों के संगठन 'ट्रांस यमुना केबल टीवी ऑपरेटर एसोसिएशन' के बैनर तले मंगलवार से केबल ऑपरेटरों ने ट्राई के दफ्तर के बाहर भूख हड़ताल भी शुरू कर दी है, जो बुधवार तक जारी रहेगी। इसके बाद भी अगर ट्राई की ओर से केबल ऑपरेटर और एमएसओ के बीच के विवाद को नहीं सुलझाया जाता है तो केबल ऑपरेटर 24 अप्रैल को जंतरमंतर पर सेट टॉप बाक्स की होली जलाकर अपना विरोध प्रदर्शन करेंगे।

एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक पंडित के नेतृत्व में मंगलवार से शुरू हुए भूख हड़ताल में दर्जनों केबल ऑपरेटर शामिल हुए। इस मौके पर श्री पंडित ने कहा कि उनकी लड़ाई एमएसओ से अपने लिए नहीं बल्कि इस उद्योग धंधे को बचाने और उपभोक्ताओं को महंगाई की मार से बचाने के लिए है। उन्होंने कहा कि हम उपभोक्ताओं को सस्ते में चैनल दिखाना चाहते हैं पर ट्राई के साथ मिल कर एमएसओ हमें महंगे पैकेज देने को मजबूर कर रहे हैं। हम जब उपभोक्ताओं को पहले की तुलना में ज्यादा शुल्क देने की बात करते हैं तो वह कनेक्शन कटवाने को कहता है। ऐसे में पिछले दो एक महीने में केबल उपभोक्ताओं की संख्या आधी रह गई है। इससे केबल ऑपरेटरों को भारी नुकसान हो रहा है।

उन्होंने कहा कि हमारी मांगों पर सरकार गौर नहीं करती है तो हम 24 अप्रैल को जंतर मंतर पर सेट टॉप बाक्स की होली जलाकर अपना विरोध व्यक्त करेंगे। इसके बाद भी हमारी मांगें नहीं मानी गई तो हम पूरी दिल्ली में केबल प्रसारण को ठप करेंगे। इस मौके पर एसोसिएशन से जुड़े केबल ऑपरेटर अखिलेश कुमार, प्रदीप शर्मा, तसमीरा, जय प्रकाश, जगजीत राय आदि मौजूद थे। (सहारा)

वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (चौदह) : नाम का छाप छोड़ने को था बेहाल

हमने लोगों तक पहुंचने का नया तरीका अपनाया था। इसके दो मकसद थे। पहला यह कि वोटरों से सीधा परिचय होगा और उन्हें उनके मतदान केंद्र तथा क्रम संख्या आसानी से मिल जाएगी। मेरा यह मानना था कि जिन लोगों तक हम यह सुविधा पहुंचाएंगे, वह मेरे प्रति एक सकारात्मक सोच बनाएंगे और हमारे पक्ष में मतदान भी करेंगे। चुनाव अभियान में मेरा एक सूत्री कार्यक्रम बन गया था घर-घर पर्ची पहुंचाना। यह अपने आप में नया अनुभव था।

कुल मिलाकर पांच गांव और करीब 43 सौ लोग। सबके घर पहुंचना संभव नहीं था, पर अपने उपलब्ध साधन और समय में अधिकतम लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहा था। मुंह अंधेरे में घर से निकलते थे और शाम ढलने के बाद पंचायत से बाहर निकलते थे। कभी किसी के खलिहान में पहुंच जाता था तो कभी किसी के दलान में। कहीं-कहीं चाय भी मिल जाती थी, तो कहीं छुछे चर्चा होती थी। ए फोर साइज के पेपर में चार पर्चे बने हुए थे। पन्ने को चार भागों में फाड़ देता था। यानी एक पन्ना में चार पर्चा बन जाता था। उस परचे में नाम व चुनाव चिह्न लिखा हुआ था और लोगों से वोट देने की अपील की गई थी। इसमें मैंने अपने को निर्विवाद उम्मीदवार बताया था। इसके साथ ही पर्चे में हर तरह से सहयोग की उम्मीद भी जतायी थी।

कंधे में एक बैग। बैग में पर्चा और हाथ में वोटर लिस्ट। पैर में फटा बेआर और काम चलाऊ चप्पल। ठंड से बचने के लिए शरीर पर जैकेट और कंधे पर मफलर। यही पहचान थी उम्मीदवार वीरेंद्र यादव की। किसी भी परिचित-अपरिचित के दरवाजे पर पहुंच जाना। नमस्कार से बातचीत से शुरुआत। चुनाव जीतने का कोई दावा नहीं। लेकिन वोट लेने के कई तर्क। जाति, मुखरता, कार्यों के लिए अधिकारियों से निबट लेने का दावा और योजनाओं को आम लोगों तक पहुंचाने का संकल्प। यही तर्क थे हमारे। तर्कों का आकार, प्रकार व स्वरूप वोटर की जाति, गांव और माहौल के हिसाब से बदल जाता था। पासवान के मुहल्ले में अहीर-दुसाध मौसरे भाई की लोकोक्ति का इस्तेमाल करता था तो भूमिहारों के मुहल्लों में यादव-भूमिहारों के वामपंथी आंदोलन में पूरक भूमिका की भी चर्चा करता था। ब्राह्मणों के दरवाजे पर यह भी कहा कि आपको चुनना किसी पिछड़े या दलित को ही है तो हमें ही चुनिए।

इस संबंध में मेरा अपना व्यक्तित्व एक सहायक की भूमिका में था और जाति को लेकर मुखरता एक ताकत थी। जिस आत्मीयता के साथ चमारों के साथ चटाई पर बैठ कर खाता था, उसी आत्मीयता के साथ ब्राह्मणों के साथ चौकी पर बैठ संभावना पर चर्चा किया करता था। बिंदा डोम के घर जब पानी मांगा तो कोई पानी देने को तैयार नहीं था। उन्हें यह भरोसा दिलाया कि पानी लाइए, प्यास लगी है। इसके बाद उनकी पत्नी एक ग्लास में पानी भर कर लाई।

जातिगत विविधता वाली इस पंचायत में जातीय समीकरण एक महत्वपूर्ण फैक्टर था। इस कारण उसकी महत्ता को नकार नहीं सकता था। जातियों के अंदर भी खेमेबंदी है। बनियों में कई खेमे थे। जैसे तेली बनिया, सिंदूरिया बनिया आदि। ब्राह्मणों में भी तिवारी टोला अलग है तो दूबे टोला अलग। हर टोले का अपना-अपना वोट विहैब (मतदान व्यवहार)। गांवों की बनावट भी काफी कुछ जातियों के आधार पर ही है। भूमिहार टोला में भूमिहारों की अधिकता है तो कुम्हार टोला में कुम्हारों की। यादव टोला में यादवों की बहुलता। हालांकि इस विभाजन की कोई सीमा रेखा नहीं थी।

मैं अपने पर्ची के साथ किसी के दरवाजे पर पहुंच जाता था। अपना परिचय देता था और उसके बाद चुनावी चर्चा शुरू। बातचीत के दौरान ही उनका वोटर लिस्ट में नाम देख लेता और फिर पर्ची बना देता। कभी-कभी किसी का नाम तलाशने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। यह सब मैं इस उम्मीद के साथ कर रहा था कि कम से कम हर घर में हमारा नाम व चुनाव चिह्न पहुंच जाएगा। इसमें वोट से संबंधित सूचना भी है। इस कारण लोग उसे संभाल कर भी रखेंगे। यह सिलसिला मतदान के एक दिन पहले यानी 19 दिसंबर तक चलता रहा। हमारी इस पहल की लोग सराहना भी कर रहे थे और इसे जागरूकता के लिए एक सार्थक अभियान भी मान रहे थे।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क kumarbypatna@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा

सुब्रत रॉय की गिरफ्तारी याचिका को टालने के लिए कोर्ट पहुंचा सहारा

नई दिल्ली : सहारा समूह ने सेबी की अपील पर 22 अप्रैल को होने वाली सुनवाई को टालने के लिये उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। सेबी ने न्यायालय से सहारा समूह के अध्यक्ष सुब्रत रॉय सहारा को हिरासत में लेने और उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरु करने के लिये अर्जी दायर की थी।

न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन के नेतृत्व में खंडपीठ ने कहा कि वह 22 अप्रैल को यह फैसला लेगी कि सहारा की याचिका पर विचार किया जाये या नहीं। 15 मार्च को सेबी ने उच्चतम न्यायालय का रुख कर सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत रॉय सहारा की गिरफ्तारी और उनके देश छोड़ने पर रोक लगाने की मांग की थी। सहारा समूह की दो कंपनियों ने अपने निवेशकों को 24 हजार करोड़ रुपये वापस करने के आदेश का पालन नहीं किया था।

सेबी ने अदालत से सहारा के मालिक सुब्रत सहारा को गिरफ्तार करने और हिरासत में रखने की अनुमति की मांग की थी। छह फरवरी को उच्चतम न्यायालय ने सहारा समूह को नोटिस जारी किया था और यह कहते हुये चार सप्ताह में जवाब मांगा था कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरु की जाये। न्यायालय ने यह भी कहा था कि सहारा समूह की दो कंपनियों के खाते और संपत्ति को जब्त करने के लिये सेबी स्वतंत्र है। यह दो कंपनियां हैं- सहारा इंडिया रियल एस्टेट कापरेरेशन और सहारा हाउसिंग इंवेस्टमेंट कॉपरेरेशन। (एजेंसी)

मीडिया ‘बड़े लोग’ या ‘आइकॉन’ बनाने का आदी हो चुका है

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब मीडिया की भूमिका, सरोकार और प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। देश के प्रधान न्यायाधीश ने भी इन सवालों पर चिंता व्यक्त की है। पहले भी यह सवाल उठते रहे हैं कि मीडिया किसका है, किसके लिए है, इसके सरोकार और देश के मुद्दे क्या हैं? न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर ने कोलकाता हाईकोर्ट के कार्यक्रम में मीडिया की भूमिका पर जो कुछ कहा, वह मीडिया के लिए आत्मचिंतन और आत्ममंथन का विषय होना ही चाहिए।

जस्टिस कबीर का यह कथन तथ्यों पर आधारित है कि 16 दिसंबर की गैंगरेप की घटना कोई अलग मामला नहीं है। यह ऐसे कई मामलों में से एक है। कुछ मायनों में यह प्रकरण असाधारण अवश्य था, किंतु अनूठा नहीं। फिर भी इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया, झकझोर दिया। चीफ जस्टिस की यह सामान्य-सी चिंता तब मीडिया के लिए ओर भी गंभीर बनती है और बननी भी चाहिए, जब वह कहते हैं, ‘अगले दिन के अखबारों में यह वारदात पहले पृष्ठ पर थी, लेकिन 10 साल उम्र की दलित लड़की से गैंगरेप और उसे जलाने की घटना अखबारों के भीतरी पृष्ठों पर मात्र पांच-दस लाइनों में सिमट कर रह गई। ‘निर्भया’ के परिवार को सरकार और दूसरों से आर्थिक मदद मिली, लेकिन उस दलित लड़की या उसके परिवार की सुध लेने वाला कोई नहीं।’ प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से मीडिया के लिए उनका यह कथन सामयिक और विचारणीय है कि समाज या मीडिया ‘बड़े लोग’ या ‘आइकॉन’ बनाने का आदी हो चुका है।

‘दामिनी’ या ‘निर्भया’ के गैंगरेप मामले ने समाज में जो हलचल पैदा की, उसके परिणाम सामने आने लगे हैं। जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सच्चाई बयान करते हैं कि ‘निर्भया’ मामले ने भारत में नया कानून बनाने के लिए हमें तैयार या विवश कर दिया, तब मीडिया के संबंध में चीफ जस्टिस के वक्तव्य की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। उस घटना को किसने मुद्दा बनाया? इस सवाल का सीधा-सा उत्तर है- मीडिया। इस विकासशील देश के जागृत मीडिया की इसमें अहम भूमिका थी। मीडिया के सरोकार क्या हों? इन्हें कौन तय करता है और किसे तय करना चाहिए? राष्ट्र के मुद्दे क्या हों, क्या न हों? इसे मीडिया के ‘विवेक’ पर छोड़ देने के खतरों से सतर्क रहना भी जरूरी है। मीडिया के विवेक के प्रश्न से रूबरू होते ही मीडिया-कर्म से जुड़े उत्तरदायित्व के सवाल कौंधते हैं।

अपने विचारों-वक्तव्यों के लिए चर्चित भारतीय प्रेस परिषद (प्रेस कौंसिल) के चेयरमैन जस्टिस मार्कण्डेय काटजू का हाल का वक्तव्य मीडिया-कर्म के ‘विवेक पक्ष’ के सामने अनेक सवाल खड़े करता है। जस्टिस काटजू मानते हैं कि मीडिया के क्षेत्र में आजकल बहुत से ओछे पत्रकार पहुंच गए हैं और इससे पत्रकारिता का स्तर बहुत गिर गया है। इनका स्तर सुधारना वह जरूरी मानते हैं। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर प्रेस काउंसिल ने अपने वरिष्ठ सदस्य श्रवण कुमार गर्ग की अध्यक्षता में स्वाधीन भारत में पहली बार एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है, जो पत्रकारों की योग्यताओं-अर्हताओं के संबंध में सुझाव देगी। ताकि आज बदलती परिस्थितियों में पत्रकारिता या मीडिया कर्म में विशेषज्ञता के जो नए-नए विशेषीकृत क्षेत्र हैं, उनके लिए पत्रकारों की न्यूनतम योग्यताओं का आवश्यक रूप से निर्धारण हो सके।

इस समिति के अध्यक्ष और भी आगे की सोच रखते हैं कि यह समिति प्रेस काउंसिल की ओर से इस बात की भी तहकीकात करेगी कि वर्तमान में पत्रकारिता प्रशिक्षण के जो भी संस्थान हैं, उनकी गुणवत्ता की परख हो क्योंकि अब तक उन पर भी कोई प्रभावी नियंत्रण या नियंत्रक निकाय देश में नहीं है। यद्यपि प्रेस काउंसिल के इस कदम पर मीडिया संस्थानों और मीडिया कर्मियों में तीखी प्रतिक्रिया हुई है और यह माना जा रहा है कि यह मीडिया के दमन का एक तरीका है। इसके विपरीत प्रेस परिषद अध्यक्ष जस्टिस काटजू कहते हैं कि यह केवल पत्रकारिता के स्तर में सुधार का एक प्रयास मात्र है। यह कदापि किसी प्रकार का दमनकारी कदम नहीं है। पढ़े-लिखे यानी डिग्री-डिप्लोमाधारी पत्रकारों की तादाद पिछले तीन-चार दशकों में काफी बढ़ी है किंतु पत्रकारिता के क्षेत्र में गुणात्मक सुधार या जिस मीडिया विवेक के प्रश्न उठाए जा रहे हैं, उन पर चिंतन और सार्थक निर्णय की कमी सचमुच चिंतित करती है। सवाल सतही और गैर मुद्दे को मुद्दा बनाने की मीडिया की होड़ का है।

‘जल्दबाजी में लिखे गए साहित्य’ को मीडिया की सामग्री माना जाता रहा है पर यह जल्दबाजी या ‘डेडलाइन की लटकती तलवार’ मीडियाकर्म के लिए हमेशा चुनौती रही है। इस आपाधापी या शीघ्रता में ही संपादकीय विवेक की परख होती रही है और जब बहुतेरे कथित पढ़े-लिखे पत्रकार संपादक नहीं होते थे, तब भी मीडिया ने धर्म और देश-काल, समाज के मार्गदर्शन (एजेंडा सेटिंग) की अपनी भूमिका का सार्थक निर्वाह किया है। कम से कम भारतीय पत्रकारिता में गांधी, पराड़कर से आज की नई पीढ़ी के संपादकों-पत्रकारों में भी ऐसे विवेकशील संपादक तो हैं ही। फिर भी हमें इस चूक के लिए आत्मनिरीक्षण करना ही होगा कि ‘निर्भया’ की तुलना में उस गरीब दलित 10 साल की बच्ची के साथ हुए सेक्स अपराध और उसकी मौत का राष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा न बन पाना सिर्फ हमारी यानी मीडिया की भूल थी या और कुछ।

वैसे हमें चीफ जस्टिस अल्मतस कबीर साहब का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने मीडिया कर्म की इस भयंकर भूल की ओर देश का ध्यान आकृष्ट किया। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर संपादक और संपादकीय विवेक को जिम्मेदार ठहराते हुए गुजराती दैनिक ‘संदेश’ के संपादक की यह अपील खारिज कर भारतीय पत्रकारिता के सामने एक नया यक्ष-प्रश्न खड़ा कर दिया है कि कोई भी संपादक सिर्फ इस आधार पर ‘अदालत की कार्रवाई से नहीं बच सकता कि कोई खबर बगैर उसकी इजाजत के ही प्रकाशित हो गई।’ न्यायमूर्ति सी के प्रसाद और वी जी गौड़ा की पीठ ने कहा कि संपादक ही उस सामग्री को नियंत्रित करता है, जो प्रकाशित होती है।

यह फैसला मीडिया की आत्मशुद्धि के लिए एक दिशानिर्देश जैसा है। ‘निर्भया’ या ‘दामिनी’ जैसी बड़ी समाचार-कथाओं की भीड़ में लीड या बैनर का विवेकपूर्ण चुनाव संपादक पर ही निर्भर है। बड़े-बड़े शीर्षकों के नीचे छपी छोटी या कम महत्वपूर्ण खबरों में भी जान फूंकने का काम यानी उन्हें मुद्दा बनाने का काम जहां संपादक का है, वहीं प्रश्न यह भी है कि असली मुद्दे कहीं गौण न हो जाएं। यह चुनौती आज की पत्रकारिता की असली चुनौती बन गई है।

लेखक राम मोहन पाठक महामना मदन मोहन पत्रकारिता संस्‍थान, काशी विद्यापीठ के पूर्व निदेशक हैं. उनका यह लेख हिंदुस्‍तान में प्रकाशित हो चुका है.

पूर्व सांसद साक्षी महाराज समेत पांच पर हत्‍या का मुकदमा

लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पूर्व सांसद साक्षी महाराज के उत्तर प्रदेश के एटा स्थित आश्रम से निकलते समय सोमवार रात कल्याण समिति की सदस्य सुजाता वर्मा की हत्या को लेकर सच्चिदानंद हरि साक्षी महाराज सहित पांच लोगों पर हत्या तथा आपराधिक षड्यंत्र रचने का मुकदमा मंगलवार को दर्ज किया गया।

पुलिस महानिदेशक देवराज नागर ने बताया कि मृत महिला सुजाता के पुत्र तथा साक्षी महाराज के दत्तक पुत्र संजीव कुमार ने साक्षी महाराज, राम सिंह, बदन सिंह, सत्यप्रकाश और विजय प्रकाश के खिलाफ 302, 506 तथा 120 बी के तहत मुकदमा दर्ज कराया है। तहरीर में आरोप लगाया गया है कि ये नामजद लोग आश्रम के छोटे गेट के पास बैठे थे। रात का खाना खाने के बाद जब उसकी मां सुजाता आश्रम के पास टहल रही थी, तब उन्होंने गोली चलाई और आश्रम में चले गए।

संजीव कुमार सुजाता का पुत्र तथा साक्षी महाराज का दत्तक पुत्र है। सुजाता और साक्षी महाराज के बीच संपत्ति को लेकर विवाद चल रहा था। एटा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय मोहन शर्मा ने बताया कि आश्रम के एक हिस्से में सुजाता और एक हिस्से में साक्षी महाराज रहते थे। इन दोनों के बीच संपत्ति को लेकर विवाद था। संजीव का कहना है कि हमलावर आश्रम की ओर भागे। इस घटना में साक्षी महाराज का नाम आने पर उन्होंने कहा कि मामले की जांच की जा रही है, सच्चाई जल्द सामने आ जाएगी। (एजेंसी)

कर्नाटक में पेड न्‍यूज रोकने के लिए जिला स्‍तर पर होगी कमेटी गठित

बेंगलुरु। कर्नाटक में आगामी पांच मई को होने वाले विधानसभा चुनाव के दौरान 'पेड न्यूज' पर निर्वाचन अधिकारियों की कड़ी नजर रहेगी। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी अनिल कुमार झा ने विधानसभा चुनाव के दौरान 'पेड न्यूज' की रोकथाम के लिए सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों (डीईओ) को जिला स्तर पर मीडिया प्रमाणन और निगरानी समिति गठन करने का निर्देश जारी किया है।

यहां जारी एक बयान में उन्होंने कहा कि प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 'पेड न्यूज' या छद्म विज्ञापन के मामलों में मुख्य निर्वाचन कार्यालय मौजूदा कानूनी प्रावधानों का उपयोग कर उस व्यक्ति को गिरफ्तार करेगा। झा ने कहा, ''चुनाव अवधि के दौरान जारी राजनीतिक विज्ञापनों की निगरानी के लिए सभी जिलों में मौजूद डीईओ वहां छापे या बांटे जा रहे सभी अखबारों की गहनता से समीक्षा करेंगे।'' उन्होंने कहा कि डीईओ जरूरत पड़ने पर उम्मीदवार या राजनीतिक पार्टी को नोटिस भेज सकते हैं, जिससे कि इस मद में हुए खर्चों को संबंधित उम्मीदवार या पार्टी के खातों में दर्शाया जा सके।

”दोनों पुरुष और दोनों महिला पत्रकार गेस्‍ट हाउस में संदिग्‍ध परिस्थितियों में मिले”

आज मोबाइल की घंटी ने जगाया। ख़बर सुन सुबह से चिंतन में पड़ गया हूँ। कुछ मित्र जो फील्ड रिपोर्टिंग में हैं फोन करके सुबह से एक जानकारी साझा कर रहे हैं। मिली जानकारी यह है कि 'एक ख्यातिनाम अंग्रेजी अखबार" के स्थानीय संस्करण में देर रात तकरीबन 12 बजे करीब पुलिस पहुंची। पुलिस के आने का कारण डेस्क की एक महिला का दिन भर गायब रह अपने स्वजनों का फ़ोन नहीं उठाना रहा। चिंतित परिवारजनों ने फ़ोन कर थाने में जानकारी दे खोजबीन की दरख्वास्त की।

चूँकि महिला मूलतः किसी अन्य प्रदेश एवं शहर से वास्ता रखती है, इस नाते पुलिस ने सघनता से खोजबीन शुरू की। देर रात हॉस्टल तलाशा, दफ़्तर में पूछताछ की। इस पुलिस पूछताछ में जब डेस्क प्रभारी ने अपने स्तर पर जांच में मदद की, तब और चौंकाने वाली जानकारी निकल कर आई। संस्था के ही एक वरिष्ठ पत्रकार भी घर नहीं पहुंचे थे। उनकी पत्नी को जब डेस्क प्रभारी ने फ़ोन मिलाया तो जानकारी मिली की साहब किसी रिपोर्टिंग पर डेम तरफ हैं, सुबह आयेंगे। बताये गए डेम पर स्थित गेस्ट हाउस पर खोज-पड़ताल की गयी तो वहां गुमशुदा महिला, वरिष्ठ पत्रकार तो मिले ही साथ ही संस्करण के पुल आउट की एक रिपोर्टर और डेस्क का ही एक पुरुष कॉपी-एडिटर भी मिले।

बताया जा है कि रात 2 बजे ये चारो संदिग्ध अवस्था में पुलिस को गेस्ट हाउस में मिले। महिला डेस्क कर्मचारी के घर वालों को जहाँ पुलिस ने सूचित कर उनकी पुत्री की कारगुजारियों से अवगत करवाया, वहीँ वरिष्ठ पत्रकार महोदय की बीवी को इस रिपोर्टिंग की जानकारी भी प्राप्त हो गई। अन्य दो खैर मना रहे हैं। यदि यह खबर सत्य है (6-7 फ़ोन कॉल्स आने पर संदेह कम ही हो गया) तो अब चिंतन का विषय यह है कि

-क्या इज्जत और साख रह जायेगी पत्रकारों की?

-पुलिस रंगे हाथ पत्रकारों को एकांत में रंग-रेलियां मनाते पकड़ रही है, किस मुंह से पत्रकार बिरादरी जवाब देगी?

-जिन पत्रकारों का दिमाग इन घटिया कृत्यों में लगा रहता है, वे क्या पत्रकारिता को अन्य तरीकों से कलंकित नहीं करते होंगे?

-खुले विचार के होने का मतलब क्या यही होता है कि आपके परिजन आपको पुलिस की मदद से खोजे और जानकारी लें?

खैर और भी सवाल उमड़ रहे है ….. और यह भी बताते चलें कि यह अंग्रेजी अखबार देश का एवं विश्व पटल पर सबसे बड़ा अखबार होने का दावा भी ठोंकता है।

वरिष्‍ठ पत्रकार राहुल चोकसी के फेसबुक वॉल से साभार.

पश्चिम बंगाल में 1300 मीडियाकर्मी हुए बेरोजगार

पश्चिम बंगाल में शारदा समूह ने अचानक अपने मीडिया संस्थानों को बंद करने की घोषणा कर दी जिससे तकरीबन 1,300 मीडियाकर्मियों को नौकरी चली गई। हालांकि इसके एक दिन के बाद राज्य सरकार ने मदद का हाथ बढ़ाते हुए इस मामले के समाधान के लिए बैठक बुलाने की पेशकश की है। राज्य के उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने कहा, 'हम कोशिश कर रहे हैं कि स्थिति कैसे बेहतर हो। इस मामले के समाधान के लिए एक या दो बैठक बुलाई जाएगी।' हालांकि चटर्जी की बात से कर्मचारियों को कोई खास राहत मिलती नहीं दिख रही है।

15 अप्रैल को बंगाली चैनल तारा म्यूजिक में जो कुछ हुआ वह प्राइम टाइम पर प्रसारित होने वाले किसी धारावाहिक की तरह था, लेकिन इसकी पटकथा पहले से तैयार नहीं थी। चैनल के करीब 850 कर्मचारियों को अचानक पता चला कि उनकी नौकरी चली गई है। दरअसल चैनल के मालिक शारदा समूह ने न केवल तारा म्यूजिक बल्कि अपने अन्य मीडिया संस्थानों बंगाल पोस्ट, सकल बेला, आजाद हिंद, तारा न्यूज और तारा बांग्ला को अचानक बंद कर दिया है। इसे राज्य में इन मीडिया संस्थानों में काम करने वाले तकरीबन 1,300 लोगों की नौकरी चली गई है।

तूणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत राय ने कहा, 'किसी न किसी को यह देखना होगा कि मीडिया संस्थानों को पैसा कहां से आता है। इस मामले में मीडिया समूह के चिट फंड कारोबार से पैसा आता है। लेकिन चिट फंड मॉडल हमेशा अस्थिर होता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि करीब 1,300 पत्रकार अब बेरोजगार हो गए हैं।' उन्होंने कहा कि जो कुछ भी हुआ वह बेहद दुखद है और हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आगे इस तरह की घटना नहीं हो। केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक और सेबी को संयुक्त रूप से इस मसले पर ध्यान देना चाहिए। इस मामले पर शारदा समूह के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक सुदीप्त सेन से प्रतिक्रिया के लिए उनसे संपर्क नहीं हो पाया।

हालांकि बाजार नियामक सेबी ने सामूहिक निवेश योजनाओं पर कठोर नीति शुरू की है। इसके पहले मई 2012 में सेबी ने एक आदेश जारी कर कोलकाता की एक कंपनी को निर्देश दिया था कि वह आम लोगों से पैसा नहीं उठाएं। दिसंबर 2012 में कंपनी के खिलाफ दूसरा आदेश जारी कर कंपनी के खिलाफ मुकदमा चलाने के बारे में चेताया गया था। उल्लेखनीय है कि इस साल 10 अप्रैल को सेबी ने एक आदेश जारी कर आलू बॉन्ड योजना को लेकर भी निवेशकों को सतर्क किया था। वर्ष 2010 के दौरान जब पूरे देश के मीडिया जगत में मंदी के बादल छाए थे तो बंगाल में मीडिया में अचानक तेजी देखी जा रही थी।

दरअसल बंगाल के मीडिया जगत में अब तक लगभग अनजान शारदा समूह ने एक के बाद एक कुल 6 मीडिया संस्थान शुरू कर पश्चिम बंगाल में सुस्त पड़े मीडिया बाजार में अचानक तेजी ला दी थी। दरअसल राज्य के ज्यादातर मीडिया संस्थानों की कमाई का मुख्य जरिया चिट फंड या बहुस्तरीय कंपनियां हैं। ऐसे में बाजार नियामक सेबी द्वारा उठाए गए कठोर कदमों से चिट फंड कारोबार को धक्का लगा और कई मीडिया संस्थानों की हालत पतली हो गई। (बीएस)

प्रिंसिपल और शिक्षकों ने की पत्रकार के साथ मारपीट, पुलिस से शिकायत

हरियाणा के बागपुर में सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल में मंगलवार बाद दोपहर एक मामले की कवरेज करने पहुंचे पत्रकार पर प्रिंसिपल सहित तमाम अध्यापक टूट पड़े। वे लोग अपनी पिछली गलतियों को छिपाने के लिए पत्रकार के साथ मारपीट की। कैमरे छीन लिए। रील को भी निकालकर खुर्द-बुर्द करने की कोशिश की तथा उन्होंने उसमें कैद स्कूल प्रबंधकों की ज्यादतियों को भी डिलीट करवा डाला। इस संबंध में पुलिस को शिकायत की गई है। घायल पत्रकार का मेडिकल भी कराया गया है। पत्रकार को कई स्‍थानों पर चोटें आई हैं।

पत्रकार कमल ने बताया कि वह मंगलवार को एक खबर के सिलसिले में स्कूल के प्रिंसिपल के पास गया था। उसने उनसे उनका पक्ष मांगा, लेकिन उन लोगों ने पक्ष देने के बजाय उससे बदतमीजी करने लगे। उसने जब विरोध किया तो उससे बदसलूकी की जाने लगी। इस दौरान उसका कैमरा ऑन ही था तथा प्रिंसिपल और अध्यापकों की हरकतें उनमें कैद हो गई थी। इस बात से तिलमिलाए प्रिंसिपल और 5-6 अध्यापकों ने उसके हाथ से कैमरा छीन लिया तथा उसमें से रील निकाल ली।

कमल ने बताया कि इस दौरान कुछ अध्यापक उसे एक कमरे में ले गए। वहां उन्होंने उसके साथ हाथापाई तथा मारपीट की। किसी तरह वह उनके चंगुल से छूटा और साथी पत्रकारों को फोन करके सारी घटना बताई। सूचना मिलते ही पत्रकार भाईचारा के सदस्‍य वहां पहुंच गए और थाना हरियाना पुलिस ने भी मौके पर पहुंच कर घटना संबंधी जानकारी हासिल की। इस दौरान स्कूल प्रबंधकों द्वारा पुलिस और पत्रकारों के समक्ष कमल का कैमरा वापस किया गया, जबकि कैसेट उसमें नहीं थी। कैसेट के बारे में पूछने पर प्रिंसिपल व अन्य अध्यापक टाल मटोल करने लगे कि कैसेट उनके पास नहीं है। 

इसी बीच बढ़ते तकरार को देखते हुए पुलिस ने दोनों पक्षों को थाने पर बुलाया। पत्रकारों द्वारा घायल पत्रकार का मेडिकल सिविल अस्पताल में करवाया गया तथा कमल द्वारा लिखित शिकायत पुलिस को दी गई। मामले की सूचना मिलते ही डीएसपी एचएस परमार भी थाना पहुंच गए थे। इसी दौरान प्रिंसिपल और अन्य अध्यापकों द्वारा कैसेट सौंपी गई तथा जब उसे चलाकर देखा गया तो उसके अंदर की रिकार्डिग वाशआउट करवा दी गई थी। डीएसपी परमार का कहना है कि शिकायत के आधार पर जांच कर कार्रवाई की जाएगी।

बच्‍चों की सुरक्षा के लिए प्राइमरी स्‍कूलों में बनेगी बाउंड्री वॉल

इलाहाबाद। सरकारी प्राइमरी स्कूल के छात्र-छात्राओं और उनके अभिभावकों के लिए खुशखबरी। पिछले साल डॉ. राम मनोहर लोहिया समग्र विकास गांव के लिए चयनित किए गए इलाहाबाद जिले के सभी प्राइमरी स्कूलों में अब बाउंड्रीवाल का निर्माण किया जाएगा। उम्मीद की जा रही है कि इससे स्कूल भवनों की सुरक्षा हो सकेगी। इसके अलावा पठन-पाठन का भी माहौल बनेगा। यह निर्णय जिला प्रशासन ने लिया है।

जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय से मिली जानकारी में बताया गया है कि इस आशय के आदेश संबंधित स्कूल के प्रधानाध्यापकों और एबीएसए को दे दिए गए हैं। बाउंड्रीवाल का निर्माण बेसिक शिक्षा विभाग की देखरेख में होना है। जिले में डॉ0 राम मनोहर लोहिया समग्र विकास योजना के अंतर्गत 35 गांवों का चयन किया जा चुका है।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

तलवार दंपति ने ही किया था आरुषि का मर्डर

नोएडा : देश के चर्चित आरुषि-हेमराज हत्याकांड में नया खुलासा हुआ है। आरुषि-हेमराज दोहरे हत्याकांड मामले में सीबीआई पुलिस अधीक्षक एजीएल कौल ने गाजियाबाद कोर्ट में कहा है कि उस समय बाहर से आकर कोई इस दोहरे हत्याकांड को अंजाम नहीं दे सकता था। यह हत्या राजेश और नुपुर तलवार द्वारा किया गया है। कौल गाजियाबाद कोर्ट में अपनी गवाही दे रहे थे।

बताते चलें कि इससे पहले सीबीआई ने इंस्टिट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस, गांधीनगर के डेप्युटी डायरेक्टर महेंद्र सिंह दहिया को बतौर गवाह अदालत में पेश किया था। उन्होंने भी अदालत को बताया कि आरुषि और हेमराज की हत्‍या में किसी बाहरी व्‍यक्ति का हाथ नहीं है। पूरा शक तलवार दंपती पर ही है।

डॉ. दहिया के मुताबिक, आरुषि-हेमराज दोनों पर हमला आरुषि के कमरे में हुआ था। बाद में हेमराज के शव को छत पर ले जाया गया था। 26 सितंबर 2009 को सीबीआई के जॉइंट डायरेक्टर ने ईमेल से उन्हें इस केस के बारे में निर्देश दिया था। इसके बाद वह 09 अक्‍टूबर 2009 को सीबीआई की जांच टीम के साथ घटनास्थल पर गए। तब तक मकान की पुताई हो गई थी। (एजेंसी)

पुरस्‍कार की राजनी‍ति से कविता के जनतंत्र को खतरा : प्रो.निर्मला जैन

इलाहाबाद। महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद क्षेत्रीय केंद्र द्वारा ‘कविता का जनतंत्र और जनतंत्र की कविता’ विषय पर गोष्‍ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता करते हुए हिंदी की सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि पुरस्‍कार की राजनी‍ति से कविता के जनतंत्र को खतरा है। कविता मनुष्‍य बनाने का काम करती है। तुलसीदास बड़े कवि इसलिए हैं कि वे पंडितों, चौक-चौराहों और विद्वानों के बीच भी पढ़े जाते हैं। कविता में लय की उपस्थिति अनिवार्य है और इसकी लय गद्य से बिल्‍कुल अलग होनी चाहिए।

उन्‍होंने कहा कि कविता की भाषा जितने अधिक लोगों की समझ में आएगी उसमें लोकतंत्र उतना ही ज्‍यादा होगा। जिस कविता में समाज की चिंता होगी, सही बातों को कहने की क्षमता होगी, वही जनतंत्र की कविता होगी। हमें यह कहने में गुरेज नहीं है कि जहां देश का जनतंत्र ही खतरे में है वहां कविता के जनतंत्र की बात नहीं की जा सकती है।

बतौर मुख्‍य अतिथि कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि उर्दू का कवि मुशायरों में जाता है जबकि हिंदी का बड़े से बड़ा कवि भी मंच पर जाने से कतराता है। कविता का अपना जनतंत्र होता है। ऐसा नहीं है कि बाहरी दुनिया का उसपर कोई असर नहीं होता है। उन्‍होंने कहा कि जनतंत्र का साहित्‍य अपने विपरीत बातों को भी बर्दाश्‍त करने का काम करता है। जनतंत्र का साहित्‍य उदारता और सहिष्‍णुता का पक्ष रखता है। अगर साहित्‍य में असहमति को जगह नहीं है तो उसे जनतंत्र का साहित्‍य नहीं कहा जा सकता है। साहित्‍य को जनपक्ष और जनतंत्र का साहित्‍य बनाने के लिए साहित्‍यकारों को साहस के साथ जनता का साथ देना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि अच्‍छी कविता वह है जो हमें मनुष्‍य बनाए, जिसमें जनपक्षधरता, उदारता व मानवीय गुण समाहित हो।

वरिष्‍ठ साहित्‍यकार प्रो.विजय बहादुर सिंह ने कहा कि साहित्‍य या कविता का जनतंत्र अनुभव का जनतंत्र है। इसे किसी खांचे में बांधने से जनतंत्र का स्‍वरूप समाप्‍त हो जाएगा। इसे पाठकों की समझ पर छोड़ दिया जाना चाहिए। कविता आधुनिकता या प्रगतिशीलता का ठेका नहीं लेती है बल्कि आम जन की अनुभूतियों और जीवन से प्रेरित होती है। जनता को, पाठक को मौका दिया जाना चाहिए कि वह अच्‍छी कविता व अच्‍छी साहित्‍य को चुन सकें। ‘पुस्‍तकवार्ता’ के संपादक भारत भारद्वाज ने कहा कि मनुष्‍य की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है। आज खराब कविता ने अच्‍छी कविता को ढ़क दिया है। कविता मनुष्‍य को मनुष्‍य बनाने का काम भलीभांति करती है तभी वही जनतंत्र की कविता है।

साहित्‍यकार उदभ्रांत ने कहा कि कविता में जीवन संघर्ष नहीं है तो वह जनतंत्र की कविता नहीं कही जा सकती है। कविता का सही रास्‍ता जन-जीवन से जुड़ा होना चाहिए। कविता में छंद को छोड़ना बड़ी दुर्घटना की तरह है। यह कमी पिछले एक दशक से म‍हसूस की जा रही है। अगर सामान्‍य जन को जोड़ना है तो लय को पहचानना होगा। कविता को यहां तक पहुंचाने में आलोचकों की भी महती भूमिका है। कविता का सही अर्थ सामान्‍य जनजीवन और जनतंत्र का भाव है। उन्‍होंने कविता के जनतंत्र पर सवाल उठाया और जनतंत्र की कविता को परिभाषित करने की कोशिश की।

इस अवसर पर हरिश्‍चन्‍द्र अग्रवाल की ताजा पुस्‍तक ‘सवाल यह है’ का विमोचन मंचस्‍थ अतिथियों द्वारा किया गया। गोष्‍ठी का संचालन एवं संयोजन इलाहाबाद केंद्र के प्रभारी प्रो.संतोष भदौरिया ने किया। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से डॉ.मनोज राय, राकेश श्रीमाल, नरेन्‍द्र पुण्‍डरीक, अमित विश्‍वास, विनय भूषण, हरिश्‍चन्‍द्र अग्रवाल, मीना राय, सुधीर सिंह, हिंमाशु रंजन, रमेश कुमार, अनुपम आनन्‍द, अविनाश मिश्रा, मीना राय, के.के. पांडेय, अशोक सिद्धार्थ, सुरेद्र राही, श्रीप्रकाश मिश्र, हरिश्‍चन्‍द्र पांडेय, असरार गांधी, फखरूल करीम, सालिहा जर्रीन, गुफरान अहमद खां, मनोज सिंह, असरफ अली बेग सहित बडी संख्‍या में साहित्‍य प्रेमी उपस्थित रहे।

पत्रकारों एवं साहित्यकारों का न्यूनतम वेतन निर्धारित हो

पत्रकारिता और साहित्य दोनों एक दूसरे के पूरक माने जाते हैं। दोनों के इतिहास पर गौर करें तो यह लगभग 150 साल पुराना है, तब से आज तक इसके महत्व एवं योगदान को किसी न किसी रूप में हमेशा स्वीकारा गया है। देश में जब चारों ओर औद्योगीकरण एवं निजीकरण का दौर चल रहा है, हर क्षेत्र प्रतिस्पर्धा से भरा हुआ है साहित्य एवं पत्रकारिता भी ऐसे क्षेत्र हैं जहॉं प्रतिस्पर्धा खूब फल- फूल रही है और इसी प्रतिस्पर्धा का असर है कि पत्रकारों और साहित्यकारों का निरन्तर शोषण किया जा रहा है। देश में हर साल हजारों की संख्या में कालेजों से पत्रकारिता के विद्यार्थी पास होकर बाहर निकलते हैं, जिनकी प्राथमिक जरूरत नौकरी पाना होता है।

पत्रकार के रूप में खुद को देखने की लालसा एवं सुनहरे भविष्य की कल्पना उन्हें संस्थान की कठपुतली बना देता है। अनुभव की चाहत उन्हें शोषित होने के लिए मजबूर करती है। आज एक सामान्य से मजदूर को एक दिन में 8 घण्टे काम करने के बाद 200-300 रुपये तक मेहनताना मिलता है, लेकिन एक पत्रकार को 24 घण्टे सजग और सर्तक रहने के बाद माह में महज 5000-8000 रुपये मिलते हैं, जो की मुंह चिढ़ाने जैसा लगता है। हाल ही में भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने पत्रकारों के प्रवेश के लिए मानदण्डों को निर्धारित किए जाने की बात कही। आगे क्या होगा यह तो कहा नहीं जा सकता। पर क्या मानदण्डों के निर्धारण मात्र से परिस्थितियॉं बदल जायेंगी? क्या मीडिया की स्थिति में कोई बदलाव आयेगा? इसका जवाब तो आने वाला वक्त ही देगा। परिषद को चाहिए कि वह पत्रकारों के न्यूनतम वेतन निर्धारण पर भी विचार करें साथ ही भारतीय श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम-1955 में वांछित संशोधन किए जाने चाहिए।

अब बात करते हैं साहित्य के क्षेत्र की, देश में हर साल नये युवा लेखक साहित्य के क्षेत्र से जुड़ते हैं। साथ ही प्रकाशकों की संख्या भी दिन प्रतिदिन बढ़ रही है, लेकिन लेखकों की पारिश्रमिक की बात करें तो यहां भी पत्रकारों के जैसी ही दयनीय स्थिति है। लेखकों को उनके प्रकाशन पर नाम मात्र की रॉयल्टी मिलती है, जिसका परिणाम यह होता है कि लेखक को जीवन यापन के लिए दूसरा रास्ता ढूंढना पडता है। एक लेखक जब लेखन के साथ दूसरे कार्यों में जुड़ जाता है तो निश्‍चय ही वह अपनी लेखनी पर उचित ध्यान नहीं दे पाता है, जिससे लेखन शैली और स्तर में गिरावट आती है। इन्हीं समस्याओं को देखते हुए देश के तमाम साहित्कार साहित्य अकादमी के नवनियुक्त अध्यक्ष विश्‍वनाथ तिवारी से अनेकों उम्मीद लगा के बैठे हैं। उनकी उम्मीदों पर वे कितना खरा उतरते हैं यह कहा नहीं जा सकता, लेकिन सिर्फ एक व्यक्ति के चाहने से कुछ होने वाला नहीं है। जरूरत है लेखकों को एकजुट होकर आगे आने की। बाजार में अपनी किताब को देखने की चाहत के लिए अपनी मेहनत से समझौता करना अपने आप का खुद शोषण करने जैसा है। इसलिए आवश्‍यक है कि लेखकों को इस विषय पर गम्भीर होकर सोचना होगा।

लेखिका माधुरी देवी कुशवाहा मीडिया स्‍टडीज में एमफिल कर रही हैं.

यादें (3) : वो जमाना जब दूध सस्ता और मनोरंजन महंगा था!

कभी इलेक्ट्रॉनिक्स चीजें ‘स्टेट्स सिम्बल’ हुआ करती थीं, जिन्हें पाने के लिए हर कोई तरसता था.आज ये सबकी जरूरत बन गई हैं. अधिकतर मिडिल क्लास के पास कलर टीवी, डीवीडी, लैपटॉप, मोबाइल, डीटीएच…, कहें तो सारी आधुनिक गैजेट्स उपलब्ध हैं. बस नहीं है…तो इनका लुत्फ़ उठाने के लिए किसी के पास फालतू समय. हम वैसे वक्त में जी रहे हैं, जिसमें तकनीकी सामान जुटाना किसी के भी बाएं हांथ का खेल है. पर दो वक्त की रोटी की जुगाड़ करने में सबको कठिन जद्दोजहद करनी पड़ रही है. पैसे खर्चने के बावजूद भी ग्वाले का पानी मिला दूध व सब्जीवाले से, रसायनिक खाद की बदौलत उपजाई गई सब्जियां खरीदना मजबूरी है.

शुद्ध दही व घी तो जैसे एंटिक हो चले हैं. और ‘सिंथेटिक मिठाइयों’ के बिना तो, स्वीट्स कॉर्नर के आस्तित्व ही ख़त्म हो जाएंगे. हर गली-कूचे के मोड़ पर पिज्जा, चौमिन, बर्गर बेंचने वाले फ़ास्ट फ़ूड के स्टाल खुल गए हैं. लेकिन अपना जिया तो छांछ वाली ‘लस्सी’ व सोंधी महक भरी ‘दही’ को याद कर अभी भी ललचता है. साथ ही याद आते हैं बचपन के वो दिन, जब आज की तुलना में मामला बिल्कुल उल्टा था. जब मैंने होश संभाला 5 साल की उम्र रही होगी, सन 88 का वर्ष था. वह दौर जब उदारीकरण की सुगबुगाहट में उनींदा भारत ‘इंडिया’ बनने की और अग्रसर था. यानी ‘भारत’ व ‘शाइनिंग इंडिया’ के बीच का वक्त. तब मनोरंजन के तौर पर लोगों के पास सीमित विकल्प थे. भले ही जिला मुख्यालय या बड़े शहरों में में रहने वाले सिनेमा घरों में बड़े परदे पर फिल्मों का लुत्फ़ उठाते, लेकिन गांवों में थियेटर, सर्कस, लौंडा नाच व मेरठ के लुग्दी उपन्यास का बोलबाला था. कुछ शौक़ीन लोग प्रदीप, आज अखबार व सारिका, धर्मयुग, कादंबनी, सरिता, मनोहर कहानियां, माया, इंडिया टुडे, मायापुरी जैसी पत्रिकाएं मंगाया करते. बच्चों में नंदन, चंदा मामा, लोटपोट, बालहंस व कॉमिक्स की धूम थी (इसकी जिक्र यादें (4) में). हां, इतना जरूर था कि कंप्यूटर व संचार क्रांति के आ जाने से गांवों में भी इक्के-दुक्के कुलीन घरों में टेलीफ़ोन की पैठ हो चुकी थी. यहां 18 इंच वाला सनमाईका का ‘श्वेत-श्याम टेलीविजन’ व ‘यूएचएफ’ एंटीना जिसके पास होता, वह आला दर्जे का समझा जाता. जो कि बिजली नहीं रहने पर बैट्री से भी चलता था.

मेरे गांव में वर्ष 84 में ही बिजली आ गई थी. पर सनमाईका ब्रांड टीवी बाद के दिनों में घर में आया. मैं जब इसे देखने-समझने लायक हुआ तब ‘काका जी कहिन’, डॉ. राही मासूम राजा के उपन्यास पर आधारित ‘नीम का पेड़’, ‘द सोर्ड ऑफ़ टीपू सुल्तान’, ‘तलाश’, ‘व्योमकेश बक्षी’ जैसे धारावाहिक सबकी जुबान पर थे. उन्हीं दिनों नेपाल के दूरदर्शन ने ‘महाभारत’ का प्रसारण शुरू किया. चूंकि मेरा गांव नेपाल की सीमा से नजदीक है. सो यहां का एंटीना भी इस चैनल को  साफ़-साफ़ पकड़ता. दिन में राष्ट्रीय चैनल की तस्वीर की गुणवता काफी घटिया रहती. लेकिन नेपाली चैनल की गुणवता उम्दा होने बावजूद इस पर हिंदी का एक मात्र यहीं कार्यक्रम आता. ‘महाभारत’ देखने के लिए एंटीना को उतर दिशा में यानी नेपाल की तरफ घुमाना पड़ता. हर सप्ताह सोमवार की शाम 7 बजे नेपाल से ‘महाभारत’ का प्रसारण होता. बिजली गुल होने पर कार्यक्रम बाधित ना हो, इसके लिए बाजार से बैट्री चार्ज करा लाकर रखी  जाती. लोगों की संख्या बढ़ने से कमरा छोटा पड़ने लगा तो टीवी ओसारे पर रखा जाने लगा. इस कालजयी धारावाहिक की महिमा कुछ ऐसी फैली कि इसे देखने के लिए करीब 5 किलोमीटर दूर के गांव से भी लोग मेरे दरवाजे पर आने लगे. इस कारण टीवी दरवाजे से बाहर दुआरे पर आ गया. एक बड़ा सा तिड़पाल बिछाया जाता और पूरा दुआर दर्शकों से भर जाता. महिलाओं को आगे की पंक्ति में बिठाया जाता. इस दौरान श्रद्धा व भक्ति के आगोश में लोगों की अलौकिक एकता देखते ही बनती. वे नत-मस्तक होकर टीवी देखने में लीन हो जाते. धारावाहिक में  पात्रों का इतना सजीव चित्रण था कि दोनों हाथ जोड़े कुछ महिलाएं, कभी-कभी भावुक दृश्यों को देख भाव-विह्वल हो आंखों से आंसू भी टपकाने लगतीं.

गांव में मवेशी पालना किसान अनिवार्य कर्तव्य मन जाता है. दादा ने भी दरवाजे पर दो-दो भैंस पाल रखे थे. इस लिहाज से कि एक दूध देना बंद कर देती तो दूसरी वाली ब्याती. इस तरह घर में दूध, दही व घी भरपूर मात्रा में मिलते. दादी मिट्टी के चूल्हे पर कड़ाही में दूध खौला कर पझाने लिए छोड़ देतीं. थोड़ी देर बाद ही उसमें मोटी छाली पड़ जाती. फिर एक बड़े ग्लास में छाली के साथ दूध भरके मुझे पीने को मिलता. उपले की मद्दिम आंच पर नदिया (हांड़ी) में मीठा दही जमाने की कला कोई दादी से सीखे. क्या सोंधी गंध रहती थी, अकेले ही चूड़े के साथ कोई भी एक-आध किलो दही गटक जाए! दादी सालों भर दही से निकलने वाली छाली को एक बर्तन में इकठ्ठा करती रहतीं. फिर ‘रही’ से मथकर उसमें से मक्खन निकालतीं. मक्खन को जब चूल्हे की आग पर खौला कर ठंडा किया जाता तो घी बन जाता. मक्खन गर्म करने के दौरान कड़ाही में पपड़ी जम जाती, जिसे हमलोग दाढ़ कहते. कमाल का स्वाद रहता इसका, घर के सारे बच्चे चटखारे लेकर खाते. दादा पुराने ख्यालात की महिला थीं, सो लड़कियों से ज्यादा लड़कों के प्रति अनुराग रखतीं. वह अक्सर कहां करतीं- ‘गाय के बछड़े व घर के बेटों को दूध पिलाना कभी भी नागा नहीं गुजरता.’ दरअसल इसके पीछे दादी की पारंपरिक सोच थी कि उक्त दोनों ही जीव कमाने वाले होते हैं, जिससे कि गृहस्थी चलती है. दादा ने चारा काटने, भैंसों को खिलाने व अन्य घरेलू कामों के लिए एक नौकर भी रखा था. लेकिन वे नौकर की बजाय खुद पर ज्यादा भरोसा करते थे. कभी-कभार अपने हाथों से ‘लेडीकट्टा मशीन’ से चारा काटने लगते और मैं डोंगे में पुआल व घास लगाता. मैं भी आंशिक रूप से मशीन चलाने में दादा का हाथ बंटा देता. मशीन क्या था बोले तो एक तरह से देहाती जिमखाना, जिस चलाते हुए शरीर का व्यायाम भी हो जाता.

दोपहर के बाद दादा भैसों को चराने के लिए नहर की तरफ ले जाते. वह कहते कि पशुओं को भी सरेह की सैर कराना जरूरी है. इसी बहाने भैंसे घूम-फिर कर लेती हैं व इन्हें खाने को ताजा घास भी मिल जाती है. जिसका सकारात्मक असर इनकी सेहत व दूध पर भी पड़ता है. मैं भी इसी फ़िराक में रहता कि कब दादा भैंस चराने निकले और मैं पीछे-पीछे हो लूं. मां को यह फूटे आंखों नहीं सुहाता था कि मैं गंवार लड़कों जैसा आंवारा घूमता फिरूं. इस बात पर गाहे-बगाहे मुझे डांट-फटकार तो कभी पिटाई भी मिल जाती. लेकिन वो कहते हैं ना कि- ‘जहां चाह होती है, वहां राह भी.’, आखिर मैं कहां मानने वाला था. एक आम देहाती बच्चे की तरह मुझे भी दादा से बेहद लगाव था. दूसरे, मैं चाहे लाख गलतियां कर लूं दादा अक्सर मेरी तरफदारी करने से बाज नहीं आते थे. मैं जैसे ही घर से भाग सरेह में पहुंचता, दादा मुझे भैंस के पीठ पर बैठा देते. भैस जब चरते हुए उबड़-खाबड़ रस्ते से गुजरती तो उसकी मांसल पीठ पर बैठे हुए काफी गुदगुदी होती. उस सुखद अनुभव को कलम से बयां करना नामुमकिन है. लिहाजा भैस की सवारी का यहीं तो आनंद था, जिसका लोभ संवार पाना मेरे लिए कठिन काम था. पर यह विडंबन ही है कि प्रकृति से किसी की ख़ुशी ज्यादा दिनों तक नहीं देखी जाती. कुछ ऐसा ही बुरा मेरे साथ भी हुआ. एक दिन भैंस पर सवार मैं अपनी धुन में मगन था कि उसे बगल की झाड़ियों में कुछ खुरखुराने की आवाज सुनाई दी. अब मुई भैंस ने आंव न देखा ताव और उछलते हुए भागने लगी. इसी चक्कर में उसके पगहा से मेरा हाथ छूट गया. मैं नीचे और भैंस का अगला पैर मेरे बदन पर. वो तो गनीमत था कि उसका पिछला पैर मेरे सीने पर नहीं पड़ा, वरना परलोक सिधारने में कोई हर्ज नहीं था. मामूली चोट व खरोच आने के साथ सही-सलामत बच गया, यहीं सोच भगवान को लाख-लाख बधाईयां दी. फिर तो दोनों कान पकड़ इस मटरगश्ती से तौबा ही कर ली.

समय अपनी रफ़्तार में भागता रहा. और वर्ष 91 में ‘रामायण’ धारावाहिक शुरू हुआ. तब तक देहात के भी अधिकांश घरों में टीवी आ चुका था. लेकिन रंगीन टीवी का ग्लैमर सबके सिर पर चढ़ा हुआ था, कई तरह की बातें सुनने को मिलतीं-  ‘क्या मजा आता है देखने में, सब कुछ असली दीखता है, साफ-साफ व रंगीन.’ मेरे पड़ोस के दादा  पुराने जमींदार थे …और काफी रईसाना मिजाज था उनका. वे जिंदगी को ऐशो-आराम से जीने में यकीन करते मतलब- ‘क्या लेकर आए हो, और क्या लेकर जाओगे.’ यह बात अलग थी कि ठाट-बाट को बरक़रार रखने में उनकी अच्छी-खासी जमीन बिक चुकी थी. सच बोलूं तो… उनकी माली हालत कुछ हद तक प्रेमचंद की ‘पर्दा’ कहानी वाली हो चली थी. उनके दो बेटे थे पर वे दोनों से अलग रहते. पत्नी से बेहद प्यार था उनको और इसी प्यार का वास्ता देकर ओनिडा कंपनी का कलर टीवी घर लाए. पूरे गांव में यह खबर फ़ैल गई. क्योंकि उस समय रंगीन टीवी खरीदना सबके वश की बात नहीं थी. पूरे 20 हजार रूपए खर्च करने पड़ते थे. मैं भी हमउम्र बच्चों के साथ रविवार को उनके घर ‘रामायण’ देखने चला जाता. एक दिन जाने क्या बात हुई कि वे दर्शकों की भीड़ से बेहद खफ़ा हो गए. बड़बड़ाते हुए बोलने लगे- ‘टीवी मैंने अपनी बीवी के लिए ख़रीदा है ना कि गांववालों के लिए.’ फिर उन्होंने बाबा आदम के जमाने की कठैया बंदूक निकाली और ऐसे ही चला दिए. हालांकि गोली भरवी थी और एक  कुत्तिया को जा लगी, बेचारी मौके पर ही बेमौत मारी गई. हम लोग तो वहां से ऐसे भागे कि घर आकर ही रुके.  

वर्ष 92 में डिश एंटीना की पहुंच से केबल चैनलों ने भी अंगड़ाई लेनी शुरू कर दी. वीसीपी, वीसीआर, फ्रीज, वाशिंग मशीन आदि का वजूद महज शहरों तक ही सीमित था. गांव में लोग इन्हें विलासिता की चीजे समझा जाता. तब दूरदर्शन पर हर शनिवार व रविवार को फिल्में आती थीं, इसलिए हम लोगों को बेसब्री से इस दिन का इंतजार रहता. शादी-ब्याह या अन्य शुभ आयोजनों में मनोरंजन के तौर पर नई फिल्में देखने के लिए वीसीपी व रंगीन टीवी भाड़े पर लाया जाता.

जारी…

लेखक श्रीकांत सौरभ पूर्वी चंपारण से हैं. वे सरोकारी पत्रकारिता व रचनात्मक लेखन के पक्षधर हैं. यह आलेख उनके ब्लॉग 'मेघवाणी' से साभार है. उनसे मो. न. 9473361087 या www.facebook.com/srikant.saurav पर संपर्क कर सकते हैं.


पहला और दूसरा भाग समेत श्रीकांत सौरभ का लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- श्रीकांत सौरभ

भारत में देसी-विदेशी फिल्‍मों की शूटिंग के लिए बनेगा सिंगल विंडो

भारत ने देसी-विदेशी फिल्‍मों की शूटिंग से संबंधित सारी जरूरतों को सिंगल विंडो पर हल करने की दिशा में कदम बढ़ाया है. इसके लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने वरिष्‍ठ अधिकारियों की एक समिति बनाने की घोषणा की है, जो सारी चीजों पर रिसर्च कर अपना रिपोर्ट देगी. इस समिति के अध्‍यक्ष सूचना एवं प्रसारण सचिव को बनाया जाएगा. जबकि संयुक्‍त सचिव इसके सदस्‍य होंगे. इस खबर को हिंदू ने भी प्रमुखता से प्रकाशित की है.

The Ministry of Information and Broadcasting (I&B) has set up an inter-ministerial committee for promoting and facilitating film production. It would serve as a ‘single-window’ for clearance for filmmakers who would otherwise have to seek permission from as many as 30 different agencies to shoot feature films, short films and television programmes.

The committee would be chaired by the secretary in the I&B Ministry and include joint-secretary level officers from the Ministries of Home, Tourism, External Affairs, Culture, Railways, Civil Aviation and Defence.

In a statement, the Ministry said the committee’s mandate would be two-fold: facilitate granting of permission for both foreign and domestic producers from relevant authorities of the Central and State governments; and meet regularly to ‘monitor’ the facilitation process and issue directions to the authorities concerned.

महाराष्‍ट्र में मीडिया से जुड़ा साप्‍ताहिक तथा पोर्टल लांच

महाराष्ट्र में पत्रकारों के उपर बढ़ते हमले आौर मीडियाकर्मियों की अन्य मांगों के तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित करने हेतु पत्रकार हमला विरोधी कृति समिती के मार्गदर्शन में 'उद्याचा बातमीदार' नामक एक वीकली शुरू किया गया है. इसके प्रत्‍येक अंक में मीडिया से संबंधित हर पहलू की जानकारी दी जाएगी. महाराष्ट्र में पत्रकार हमला विरोधी कृति समिती के नेतृत्व में पत्रकार संरक्षण कानून और वरिष्ठ पत्रकारों के लिए पेन्शन की मांग को लेकर मीडियाकर्मी आंदोलन कर रहे हैं.

इस आंदोलन की हर तरह की जानकारी 'उद्याचा बातमीदार' में दी जाएगी. इस के अलावा मीडिया में हो रहे तकनीकि बदलाव की भी जानकारी दी जायेगी. शोभना देशमुख इस अंक का संपादन कर रही हैं. सप्ताह के हर सोमवार को मुंबई-पुणे से प्रकाशित हो रहा यह अखबार इस प्रकार का पहला मराठी अखबार है, ऐसा दावा संपादक शोभना देशमुख ने किया है. बातमीदार नाम का एक ऑनलाइन अखबार भी शुरू किया गया है. महाराष्ट्र के पत्रकारों का इस पोर्टल को अच्छा सहयोग और रिस्‍पांस मिल रहा है.

जगदीश शर्मा बने पंचकूला के अध्‍यक्ष, बैठक में जनसंपर्क अधिकारी पर लगे कई आरोप

पंचकूला : हरियाणा यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स (रजि.) की बैठक किसान भवन सेक्टर-14 में हुई। इसकी अध्यक्षता एचयूजे के प्रदेशाध्यक्ष संजय राठी और मुख्य अतिथि प्रदेश उपाध्यक्ष संजय राय ने की। इसमें एचयूजे की जिला इकाई के एक दर्जन से ज्यादा सदस्य मौजूद थे। इस मौके पर पत्रकार जगदीप शर्मा को एचयूजे की पंचकूला इकाई का अध्यक्ष मनोनीत किया गया। शर्मा ने आभार जताते हुए कहा कि वह इस अहम जिम्मेवारी का बेहतर तरीके से निर्वहन करने का प्रयास करेंगे। संगठन की मजबूती के लिए नई रणनीति बनाएंगे और सदस्यता अभियान चलाकर ज्यादा लोगो को जोड़ने का प्रयास करेंगे।

उन्होंने कहा एचयूजे जैसे संगठन से जुड़ना ही बड़ी बात है उस पर अध्यक्ष जैसे पद की जिम्मेवारी मिलना उनके फख्र की बात है। उन्होंने सभी साथियों से सहयोग की अपील की। बैठक में जहां पत्रकारों की विभिन्न समस्याओं पर चर्चा हुई वहीं पंचकूला के जिला जनसंपर्क अधिकारी विनोद कश्यप के खिलाफ कई लोगों ने आरोप लगाए। इनमें कुछ आरोप काफी गंभीर किस्म के थे। कुछ महिला पत्रकारों ने उनकी अश्लील टिप्पणी को भी उनके पद के लिए अशोभनीय बताया। एक्रीडिशन के लिए पैसे मांगने जैसे आरोप भी बैठक में खुलकर सामने आए। कुछ पत्रकारों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि एक्रीडिशन के लिए उनसे पैसे की मांग की गई।

बैठक में फैसला लिया गया कि इस प्रकरण की जांच के लिए मुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव केके खंडेलवाल, सूचना और जनसंपर्क महानिदेशक सुधीर राजपाल और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को ज्ञापन दिया जाएगा। एचयूजे के प्रदेशाध्यक्ष और एनयूजे के राष्ट्रीय सचिव संजय राठी ने कहा कि यह बेहद गंभीर मामला है। इसे हलके में नहीं लिया जा सकता। उक्त अधिकारियों से जांच के अलावा प्रेस कौंसिल आफ इंडिया के अध्यक्ष जस्टिस मार्केडेय काटजू को भी इस बाबत ज्ञापन भेजा जाएगा। बैठक में जगदीप शर्मा, विनोद कुमार, विजय श्योराण, उमंग श्योराण, संजय राय, रमेश सचदेवा, अजय गुप्ता, कमल कलसी, शिव कुमार, रोहित शर्मा, मुकेश कुमार और एमएस राठौड़ समेत कई लोग मौजूद थे।

राष्‍ट्र खबर चैनल के मालिक ने दो महिलाकर्मियों को बनाया बंधक, की बदसलूकी

फरीदाबाद से संचालित राष्‍ट्र खबर चैनल में दो महिला कर्मचारियों के साथ चैनल मालिक महेश बैसोया के द्वारा बदसलूकी करने की सूचना है. महेश ने दो महिला कर्मचारियों को काफी समय तक बंधक भी बनाए रखा. किसी तरह महिला कर्मचारी वहां से निकलने में सफल रहीं. महिलाकर्मियों का आरोप है कि बैसोया ने धमकी दी है कि जो करना है कर लो तुम लोगों की सैलरी नहीं मिलेगी. 

आरोप है कि मालिक महेश बैसोया इन दोनों महिला कर्मचारियों को बिना वजह देर तक आफिस में रोके रखते थे. इन लोगों ने कई बार बिना काम से रोके जाने की शिकायत की तो उन लोगों को भला-बुरा भी कहा गया. एक महिलाकर्मी एचआर डिपार्टमेंट में कार्यरत थीं तो दूसरी एडमिनिस्‍ट्रेशन देखती थीं. भुक्‍तभोगी महिला कर्मचारी का आरोप है कि वे लोग दिल्‍ली के रोहिणी से फरीदाबाद नौकरी करने जाती थीं. प्रतिदिन पचास किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती थी, लिहाजा हमलोग काम करने के बाद घर निकलने की तैयारी करते, परन्‍तु मालिक बिना किसी कारण, बिना किसी काम के हमलोगों को रात के नौ बजे तक रोक लेते थे.

हम लोगों ने जब विरोध किया तो हमलोगों से बदतमीजी की गई. इसके बाद इन दोनों महिला कर्मचारियों ने इस्‍तीफा दे दिया. इसके बाद जब इन लोगों ने अपने बकाया सैलरी की मांग की तो इन लोगों से कहा गया कि ये सारे डाटा दे दें तो इन्‍हें इसकी सैलरी दे दी जाएगी. एक महिला कर्मचारी का आरोप है कि जब ये लोग सारी चीजें हैंडओवर करने पहुंची तो इन लोगों को एक केबिन में बैठाया गया तथा छह लोगों के अलावा एक बाउंसर को लगा दिया गया. इन लोगों को धमकी दी गई तथा इस तरह पूछताछ की गई जैसे ये लोग किसी आरोप में अरेस्‍ट करके लाई गई हैं तथा सीबीआई इनसे पूछताछ कर रही है.

बताया जा रहा है कि चैनल के राष्‍ट्र खबर का मालिक महेश बैसोया प्रापर्टी का धंधा करता है, लिहाजा चैनल के ऑफिस के ऊपर प्रापर्टी का कार्यालय भी खोल रखा है. इसने कई बाउंसर भी पाल रखे हैं, जिससे यह लोगों को धमकी दिलावाता है. सूत्रों का कहना है कि इसने इसके पहले एमडी राजीव को भी तमाम तरह की धमकी दी थी, जिसके बाद उन्‍होंने ऑफिस आना छोड़ दिया है. महिला कर्मचारियों का आरोप है कि उन लोगों की सैलरी अब तक नहीं मिली है. इन्‍हें धमकी दिया गया है कि काम करना है तो इसी तरीके से करना पड़ेगा. हम सैलरी नहीं देंगे, तुम्‍हें जो करना है, जहां जाना है, जिस कोर्ट जाना है, जिस पुलिस के पास जाना है जाओ. मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. 

पूर्वोत्‍तर के बाद दिल्‍ली समेत कई राज्‍यों में भूकंप के झटके

नई दिल्ली : राजधानी नई दिल्ली समेत उससे सटे एनसीआर और देश के कई हिस्‍सों में मंगलवार को शाम लगभग सवा चार बजे भूकंप के झटके महसूस किए गए। दिल्‍ली के अलावा, पंजाब, गुजरात, हरियाणा, यूपी के साथ पड़ोसी देश पाकिस्तान के कराची शहर से भी भूकंप के झटके लगने की खबरें हैं। देश में गुजरात के अहमदाबाद, सौराष्ट्र और भुज इलाकों समेत राजस्थान  के भी बड़े हिस्से में इन झटकों को महसूस किया गया। अभी किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है।

संभावना जताई जा रही है कि भूकंप की तीव्रता 7.8 के आसपास रही होगी। इसके पहले देश के पूर्वोत्तर हिस्से में भी मंगलवार की सुबह भूकंप का हल्का झटका महसूस किया गया। रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 4.6 मापी गई। सुबह तकरीबन 6.53 बजे यह झटका महसूस किया गया। यहां के क्षेत्रीय भूकंप केंद्र के मुताबिक भूकंप का केंद्र असम के दारांग जिले में था। मेघालय और असम के अलावा मणिपुर, नागालैंड व अरुणाचल प्रदेश में भी झटका महसूस किया गया। देश का पूर्वोत्तर हिस्सा दुनियाभर के सबसे अधिक भूकंप की आशंका वाले क्षेत्रों में छठे स्थान पर आता है। यहां से भी जानमाल के नुकसान की खबर नहीं है।

प्रेस क्लब टाइम्स का विमोचन 20 अप्रैल को

इंदौर। स्वर्ण जयंती वर्ष में इंदौर प्रेस क्लब ने राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ‘प्रेस क्लब टाइम्स’ का प्रकाशन आरंभ किया है। इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल एवं महासचिव अरविंद तिवारी ने बताया कि समसामयिक एवं राजनैतिक विषयों पर केंद्रित पत्रिका का विमोचन २० अप्रैल २०१३ को सायं ०४ बजे इंदौर प्रेस क्लब के राजेंद्र माथुर सभागृह में होगा। इस अवसर पर इंदौर की स्वर्णिम पत्रकारिता विषय पर परिसंवाद भी होगा।

समारोह के अतिथि वक्ता सर्वश्री अभय छजलानी, श्रवण गर्ग, कृष्णकुमार अष्ठाना, राजेश चेलावत और विमल झांझरी होंगे। वरिष्ठ पत्रकार रमण रावल प्रेस क्लब टाइम्स के संपादकीय सलाहकार है, जबकि इंदौर प्रेस क्लब कोषाध्यक्ष कमल कस्तूरी संपादक का दायित्व निभाएंगे। नौ सदस्यीय संपादकीय मंडल में सर्वश्री अमित सोनी, सुनील जोशी, संजय लाहोटी, अतुल लागू, रोहित तिवारी, डॉ. रजनी भंडारी, इस्माइल लहरी, प्रदीप जोशी, आदिल कुरैशी शरीक हैं। पत्रिका प्रतिमाह दूसरे सप्ताह में प्रकाशित होगी।

जगमोहन, अभिषेक, पीयूष एवं सुजीत हिंदुस्‍तान, बरेली से जुड़े

हिंदुस्‍तान, बरेली ने अमर उजाला को कई झटके दिए हैं. खबर है कि चार लोगों ने बरेली में हिंदुस्‍तान के साथ अपनी नई पारी शुरू की है, जिसमें तीन अमर उजाला से जुड़े रहे हैं. अमर उजाला, गाजियाबाद से जुड़े पिलखुआ ब्‍यूरोचीफ जगमोहन शर्मा ने इस्‍तीफा दे दिया है. उन्‍होंने बरेली में हिंदुस्‍तान के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें यहां पर सीनियर रिपोर्टर बनाया गया है. अमर उजाला, नोएडा के डिजिटल सेक्‍शन में कार्यरत अभिषेक कुमार ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. वे भी सब एडिटर के रूप में हिंदुस्‍तान, बरेली से जुड़ गए हैं. उन्‍हें सब एडिटर बनाया गया है.

अमर उजाला, बनारस के काम्‍पैक्‍ट में क्राइम रिपोर्टर की जिम्‍मेदारी निभा रहे पीयूष उपाध्‍याय ने भी अपनी नई पारी हिंदुस्‍तान के साथ बरेली में शुरू की है. इन्‍हें यहां भी रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. आज समाज, अंबाला में कार्यरत सुजीत कुमार उपाध्‍याय ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. वे भी अपनी नई पारी हिंदुस्‍तान, बरेली के साथ शुरू कर रहे हैं. उन्‍हें यहां पर सब एडिटर बनाया गया है. माना जा रहा है कि हिंदुस्‍तान, बरेली अमर उजाला को कई और झटके देने वाला है.

जगदीश नारायण शुक्ला और शरत प्रधान के खिलाफ ‘दृष्टांत’ मैग्जीन में कवर स्टोरी- ‘पत्रकारिता के रंगे सियार’

दिव्य संदेश मैग्जीन के बाद अब दृष्टांत मैग्जीन ने लखनऊ के दो पत्रकारों जगदीश नारायण शुक्ला और शरत प्रधान पर गहरी चोट की है. इन्हें ब्लैकमेलर, रंगा सियार, भ्रष्ट जैसे कई विशेषणों से नवाजा गया है. इन दोनों की संपत्ति और भ्रष्टाचार पर लंबी रोशनी फेंकी गई है. मैग्जीन के संपादक अनूप गुप्ता हैं. अनूप कोबरा पोस्ट से भी जुड़े हुए हैं. अनूप दावा करते  हैं कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं लिखा है. उनके पास ऐसे ऐसे सबूत हैं कि ये दोनों पत्रकार कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे. उन्होंने चुनौती दी कि अगर मैग्जीन में कुछ भी गलत छपा है तो दोनों पत्रकार कोर्ट जाएं.

मैग्जीन में शरत प्रधान और कमाल खान के बीच दोस्ती का भी उल्लेख किया गया है. कुछ ऐसे प्रमाण दिए गए हैं जिससे साबित होता है कि संपत्ति बनाने के अभियान में एनडीटीवी वाले कमाल खान और शरत प्रधान साथ-साथ चालें चलते हैं. करीब पच्चीस लाख की एक संपत्ति खरीदने में कमाल खान और शरत प्रधान ने साथ-साथ लाख रुपये से ज्यादा के स्टांप खरीदे हैं और स्टांप पेपर पर दस्तखत किए हैं. मैग्जीन की कवर स्टोरी का कंटेंट भड़ास के लिए मंगाया जा रहा है. फिलहाल आप मैग्जीन के कुछ पन्नों पर गौर फरमाएं.

मैग्जीन के संपादक अनूप गुप्ता से निवेदन है कि वे अपने मैग्जीन की कवर स्टोरी को यथाशीघ्र भड़ास के पास भेजें ताकि भड़ास के पाठक इन पत्रकारों के बारे में एक एक शब्द पढ़ सकें.

नईदुनिया में चीफ सब एडिटर बने महेश यादव

राजस्थान पत्रिका, सीकर से महेश यादव ने इस्तीफा देकर नई दुनिया, ग्वालियर ज्वाइन किया है। उन्हें चीफ सब एडिटर बनाया गया है। बांदा के करने वाले महेश की गिनती तेज तर्रार पत्रकारों में होती है। वह इससे पहले दिल्ली के कई अखबारों में काम करने के बाद जोधपुर भास्कर से जुड़े। यहीं से वह राजस्थान पत्रिका अजमेर गए और फिर वहां से अमर उजाला नोएडा होते हुए राजस्थान पत्रिका सीकर पहुंचे थे। अब नई दुनिया ग्वालियर के साथ है। 

भड़ास तक सूचनाएं आप bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

सिक्‍ता देव को स्‍व. वेद अग्रवाल पत्रकारिता/साहित्‍य सम्‍मान की घोषणा

उत्‍त्‍र प्रदेशीय महिला मंच अपने संस्‍थापक की स्‍मृति में दिया जाने वाला ‘स्‍व. वेद अग्रवाल पत्रकारिता/साहित्‍य सम्‍मान 2013’ इस बार तेज तर्रार महिला पत्रकार सिक्‍ता देव को प्रदान करेगा। उत्‍तर प्रदेशीय महिला मंच महिलाओं की एक गैर राजनैतिक संस्‍था है। मंच पिछले 28 वर्षों से महिलाओं में आत्‍मविश्‍वास जागृत करने, आत्‍मनिर्भर बनाने की दिशा में सजग है।

मंच की अध्‍यक्ष डा. अर्चना जैन और महासचिव ऋचा जोशी ने चयन समिति की संस्‍तुति के बाद आधिकारिक घोषणा करते हुए कहा कि सिक्‍ता देव को पहले भी कई सम्‍मान और पुरस्‍कार मिल चुके हैं लेकिन मंच उनके पत्रकारिता में दिए गए महत्‍वपूर्ण योगदान को सम्‍मानित कर स्‍वयं भी सम्‍मानित महसूस करेगा।

एनडीटीवी इंडिया की सीनियर एंकर सिक्ता देव ने टीवी मीडिया में अब तक एक लंबी और कामयाब पारी खेली है। जिन

सिक्ता देव
सिक्ता देव
दिनों समाचारों पर सिर्फ सरकारी दूरदर्शन का कब्जा था उन दिनों सिक्ता देव ने आज तक से पारी की शुरुआत की और अपनी रिपोर्टिंग और एंकरिंग से दूरदर्शन का तिलिस्म तोड़ा। दिल्ली के एक जानेमाने कॉलेज से पढ़ाई के बाद सिक्ता ने क्रिकेट मैच फिक्सिंग  से लेकर नाइन इलेवन, कंधार कांड, संसद  और अक्षरधाम पर आतंकवादी हमला, अबू सलेम की वापसी और समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट जैसे अहम मसलों की रिपोर्टिंग और एंकरिंग की।

सिक्ता देव देश की उन गिनी चुनी पत्रकारों में से एक हैं जिनका रिपोर्टिंग और एंकरिंग के साथ ही कलम पर भी पूरा अधिकार है। विषय की वो मोहताज नहीं हैं। राजनाति, क्रिकेट, पर्यावरण, क्राइम कुछ भी हो सिक्ता देव के वो सिर्फ खबर है। मध्य प्रदेश के एक पूर्व वरिष्ठ आईपीएस अफसर की बेटी और ओडिशा के एक राजघराने से ताल्लुक रखने वाली सिक्ता ने ये साबित किया है मीडिया में मौके मिलें तो महिलाएं किसी से पीछे नहीं हैं।

प्रेस रिलीज

मनरेगा घोटाले में 16 अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर

बड़वानी। बड़वानी जिला पंचायत के अधिकारियों की शिकायत पर जिले मे मनेरेगा के भ्रष्टाचार को लेकर दोषियो पर एफआईआर दर्ज हो गयी है। निवाली ब्लॉक में आर्थिक अनियमियता करने वाले 16 अधिकारियों पर गाज गिरी है। उल्लेखनीय है कि मनरेगा घोटाला को लेकर शासन स्तर से पूर्व में निवाली ब्लॉक के 16 अधिकारियों सहित 21 ग्राम पंचायत के सरपंच सचिव के खिलाफ 6 करोड रुपये वसूली के आदेश हुए थे। इसके तहत निवाली टीआई संजय रावत ने गबन व भ्रष्टाचार के विभिन्‍न धाराओं के तहत मामला र्दज किया है।

रिपोर्ट में तत्‍कालीन सीईओ आरएस तंवर, एमएस कुशवाह, बीके हिरवे, प्रदीप छलोत्रे सहित सहायक यंत्री केके शर्मा, मनोज वर्मा, आरसी जोशी, श्री राम कनखरे, उपयंत्री महेंन्द्र मंडलोई, मनोज र्वमा, राकेश उमरार व 5 संवीदायंत्री के नाम शामिल है। मनरेगा के तहत हो रही कार्रवाई के विरोध में जिला बड़वानी सरपंच सचिव संगठन चल रहा आंदोलन तेज हुआ है।  

प्रवीण सोनी की रिपोर्ट.

भारत में शिक्षा – ‘एक सिक्के के दो पहलू’

अंग्रेज़ कहते है भारत एक गरीब देश है और यहाँ के लोग अनपढ़-गंवार। क्या वो सही है? जवाब मिलेगा नहीं, क्योंकि उच्च शिक्षा के लिए पूरी दुनिया में भारत का एक अतुलनीय स्थान है। यहाँ से तकनीकी शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्र हर जगह अपनी पहचान बना रहे हैं। शिक्षा एक ऐसा धन है जिसे कोई चुरा नहीं सकता। मगर ये तो सिक्के का एक पहलू है। सिक्के का दूसरा पहलू ये भी है कि भारत में ही निरक्षरों की सबसे बड़ी आबादी है। आज भले ही गाँव में शिक्षा कि रोशनी दिखाई देने लगी है। स्कूल खुल गए हैं, टीचर्स भी पहुँच रहे हैं लेकिन उसके बाद भी हमारे देश में करोड़ों लोग अशिक्षित हैं, निरक्षर हैं।

कहा जाता है कि तुमने अगर एक मर्द को पढ़ाया तो सिर्फ एक इंसान को पढ़ाया लेकिन अगर एक औरत को पढ़ाया तो एक खानदान को एक नस्ल को पढ़ाया। आंकड़ों की माने तो भारत में 50% से ज्यादा लड़कियां स्कूल जा ही नहीं पाती। हाँ उच्च वर्ग के साथ ही मिडिल क्लास परिवारों में अब बेटियों की पढ़ाई-लिखाई पर पैरेंट्स रुपए खर्च करने लगे हैं और ये खुद में एक प्रशंसनीय बात है। लेकिन आज भी कुछ लोगों की सोच ऐसी बनी हुई है कि वो अपने बेटों को तो स्कूल पढ़ने भेज देते हैं मगर लड़कियों को नहीं। उन्हें लगता है वो पढ़-लिख कर क्या करेगी, आखिर करना तो उसे चूल्हा-चौका ही है न। इसी नासमझी के फेरे में ना जाने कितनी लड़कियां पढ़ने से चूक जाती है।

लम्बे अर्से से जारी सरकारी अभियानों के बावजूद भारत में स्त्री-शिक्षा का बुरा हाल है। सरकार लड़कियों के लिए कई स्कूल तो खोल देती है मगर कभी ये पता करने नहीं जाती कि गाँव में कितने माता-पिता अपनी बेटियों को स्कूल पढ़ने भेज रहें हैं। यूं तो भारत में आज एक बड़ा तबका पढ़ा-लिखा है, अच्छी तरक्की कर रहा है। बड़े संस्थानों से निकले भारतीय छात्रों कि मांग विदेशों में तेज़ी से बढ़ी है। एक से बढ़कर एक पब्लिक स्कूल में पैरेंट्स अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। सरकारी से ज्यादा प्राइवेट स्कूल बन रहे हैं। मगर उसके बावजूद भारत में बसा एक गरीब तबका पढ़ाई करना तो चाहता है लेकिन उसकी गरीबी इसके आड़े आ जाती है।

एक मजदूर का बच्चा प्राइवेट स्कूल की फीस नहीं भर पाता है। क्योंकि मजदूर की एक दिन की कमाई ही लगभग 100 रुपए होती है। वो अपने बच्चे को चाह कर भी स्कूल में नहीं पढ़ा पाता। सरकार कि नज़र शायद इन गरीबों पर जाती ही नहीं। जिनके लिए बच्चों को पढ़ाना तो दूर उनका पेट भरना भी मुश्किल काम है। सरकार इनके लिए सर्वशिक्षा अभियान छेड़ कर महज़ अपना फ़र्ज़ तो अदा कर देती है मगर ये भूल जाती है कि अभियान चलाना तो आसन बात है लेकिन उसे सही ढंग से आगे बढ़ाना मुश्किल। सिर्फ छोटे शहरों में ही नहीं, बड़े शहरों में भी छोटी-छोटी बस्तियों में बसे लोग गरीबी के चलते अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते। उन्हें शिक्षा मिलती तो है, मगर किताबों कि नहीं बल्कि सिग्नल और स्टेशन पर खड़े होकर भीख मांगने की। शायद इन्हें ही देखकर अंग्रेजों ने भारत को एक गरीब देश की संज्ञा दी है।

लेखिका सुप्रिया श्रीवास्‍तव पत्रकारिता से जुड़ी हुई हैं.

वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (तेरह) : दिन भर में चंदा में मिला 30 रुपये

चंदा के सहारे घरों में अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रहा था। इस काम में रिश्तेदारी भी एक बड़ा फैक्टर साबित हो रही थी। हमारे गांव की एक लड़की की शादी कुराईपुर में हुई है। उसका बड़ा परिवार है। उस परिवार का ओबरा में परिचय था शेरवाला घर। ओबरा की मुख्य सड़क पर एक पुराना मकान है। इसके दरवाजे की दीवार पर एक शेर की आकृति बनी हुई है। यह घर उन्हीं लोगों का है। यह परिवार भी धनी माना जाता है। सुरेंद्र जी से मेरा परिचय पहले भी हो चुका था। चंदा मांगने के क्रम में उनके घर भी पहुंच गया। वह घर पर ही थे। छत पर धूप का आनंद ले रहे थे।

मैं भी छत पर पहुंच गया। उनसे चुनाव को लेकर चर्चा हुई। उनसे कहा कि हम एक गिलास अनाज के लिए आए हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आर्थिक मदद ले लीजिए। मैंने कहा कि आर्थिक मदद हम बाद में ले लेंगे, लेकिन एक गिलास अनाज हमें आज ही चाहिए। उन्होंने अपने घर से एक गिलास अनाज दिलवाया। उनके घर से निकलकर उनके छोटे भाई के घर पहुंचा। उनकी ससुराल हमारे गांव में है। मैं अपने गांव की लड़की का नाम नहीं जानता था, पर चेहरे से पहचानता था। दरवाजा खटखटाया। हमारे साथ आयी एक महिला ने उससे मेरा परिचय कराया कि यह तुम्हारे गांव के ही हैं। वह मुझे पहचान नहीं रही थी। फिर मैंने पहचान के लिए अपनी बहन के नाम का सहारा लिया। उसे बताया कि हम तेतरी के भाई हैं। मेरी बहन का नाम तेतरी है। तब वह पहचानी और अपने आंगन में ले गयी। वहां एक कुर्सी पर बैठा। उसके पति खेत पर गए हुए थे। उसने खाना खिलाया। गांव-घर का हालचाल लिया। परिवार के बारे में जानकारी प्राप्त की। उससे वोट देने का आग्रह करते हुए दूसरी गली में प्रवेश किया। वह मुसलमानों का मुहल्ला था। वहां एक डाक्टर अपनी क्लिनिक में बैठे थे। उनसे बात की और चुनाव के संबंध में चर्चा की।

वहां से निकलकर गौरीशंकर सिंह के घर पहुंचा। वहां पर उनके लड़के से मुलाकात हुई। उससे बातचीत कर दूसरे घर के लिए निकला। इस तरह एक-एक घर, एक-एक गली में छाक छान रहा था। हर घर में चंदा मांगने का हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, लेकिन वोट मांगने में भी संकोच नहीं करता था। इस बीच दोपहर हो गया था। कुराईपुर से ओबरा चला गया और कुछ लोगों से मुलाकात की। वहां से मैं पंचायत के दूसरे छोर पूर्णाडीह चला गया। पूर्णाडीह में एक मकान है शिवनारायण सिंह का। कुशवाहा जाति के हैं। इस गांव में कुशवाहों की संख्या काफी है। वहां के लोग मूलत: कृषि आधारित हैं। कुछ लोग पशुपालन भी करते हैं और दूध का कारोबार भी करते हैं।

कुशवाहा गांवों की विशेषता है कि उस गांव में सब्जी की खेती भी खूब होती है। उस समय धान की फसल पक रही थी और कटनी भी लगी हुई थी। साथ में आलू व अन्य सब्जी के पैदावार भी दिख रहे थे। शिवनारायण सिंह के मकान के पास ही बैठा। उनका एक लड़का अजीत पटना में रहकर पढ़ाई करता है। वह घर आया हुआ था। उससे मैंने बताया कि मुझे चंदा से चुनाव लड़ना है। उसने अनाज के बदले 10 रुपये दिए। जहां बैठा था, उस मकान के सामने एक कुआं भी था। कुआं का इस्तेमाल कम होता था। अब हर घर में चापाकल लग जाने के कारण लोग कुआं पर पानी भरने कम ही आते हैं। फिर भी सामुदायिकता का बोध कराने के लिए कुआं आज भी गवाह का काम कर रहा है।

इस गांव में झोला लेकर घूमते और जनसंपर्क करते हुए शाम हो गयी थी। वहां से कारामोड़ आया। मन में विचार आया कि चावल बेच दें। लेकिन साहस नहीं हुआ। वजह यह थी कि इन गलियों का काफी खाक छाना था और लोग भी पहचानने लगे थे कि यह मुखिया का उम्मीदवार है। वहां से बस पकड़ कर जिनोरिया आया। तब तक ढेर शाम हो गयी थी। अंधेरिया रात थी। पैदल ही मायापुर की ओर चल दिया। रास्ते में चुनाव, जनभावना और अपनी मेहनत को लेकर विभिन्न तरह की सोच दिमाग में चलती रही। सोच-विचार करते हुए घर मायापुर पहुंच गया। हाथ में चावल का झोला भी था। मायापुर मेरी ससुराल है। एक छोटा साला है अविनाश। उसे कहा कि जाओ यह चावल बेचकर आओ। वह दुकान पर गया और चावल बेचकर लौटा। उसने बताया कि चावल 20 रुपये का हुआ। दस रुपया चंदा में मिला था। दिन भर में जनसहयोग के नाम पर मिले कुल 30 रुपये। इसी समय मन में यह विचार आया कि चंदा मांगने में काफी समय निकल जाता है और लोगों से जनसंपर्क में भी बाधा आ रही है। इस कारण मैंने तय कि अब लोगों से चंदा नहीं लेना है।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क kumarbypatna@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


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वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (बारह) : ब्रह्मस्थान से आशीर्वाद लेकर मांगने निकला वोट

नामांकन पत्र की जांच और उम्मीदवारी पक्का होने के बाद चुनाव को लेकर हर तहर की आशंका किनारे हो गई थी। अब सिर्फ अधिकतम लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का प्रयास करना था। मैंने पंचायत के वोटरों से वायदा किया था कि जनता से प्राप्त चंदा से चुनाव लड़ूंगा। अब इसकी शुरुआत का समय आ गया था। उम्मीदवारी वैध होने के अगले दिन एक झोला लेकर मैदान में उतरा। कुराईपुर का बिगहा है ब्रह्म स्थान। पंचायत के दक्खिनवारी छोर पर नहर किनारे बसा है। यहां रहने वाला परिवार कुराईपुर से आकर बसा है। उनके अन्य गोतिया परिवार गांव में ही रहते हैं।

सुबह-सुबह इसी परिवार के दरवाजे पर पहुंचा। सूरज धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगा था। इस कारण ठंड से राहत मिलने लगी थी। हम अभी अपना परिचय-पाती कर ही रहे थे कि एक दूसरे उम्मीदवार सुरेंद्र पासवान भी पहुंच गए। आखिर वोट उन्हें भी चाहिए था। थोड़ी देर बातचीत कर के वह वापस लौट गए। उनके जाने के बाद इसी परिवार के एक सदस्य सुरेंद्र सिंह से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। लगातार जनसंपर्क के कारण लोग मेरा नाम, जाति, गांव, पेशा आदि से अवगत हो चुके थे।

उन्हें मैंने बताया कि आज से हम चुनाव प्रचार में निकले हैं। शुरुआत आपके घर से कर रहे हैं। आपके यहां से ही भात खाकर प्रचार के आगे बढ़ेंगे। धान कटनी का समय होने के कारण सुबह में ही खाना बन जाता था। उन्हें यह भी बताया कि यह चुनाव आप लोगों से प्राप्त चंदा से लड़ना है। चंदा में सिर्फ एक गिलास चावल चाहिए। उन्होंने खाना खिलाया। गरम-गरम भात, आलू की सब्जी और धनिया की चटनी से मन गदगद हो गया। धान के बोझों के बीच खुली हवा में खाने का आनंद ही कुछ और था। उनकी छोटी बच्ची खाना खिला रही थी। इस दौरान बच्चों की संख्या, पढ़ाई, स्कूल आदि के संबंध में बातचीत भी होती रही। परिवार, आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक आदि विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई।

पंचायत की राजनीतिक बनावट और वोटों का झुकाव भी इससे अछूते नहीं थे। चलते-चलते बच्चों ने एक गिलास चावल चंदा में दिया। गांव में नकद चंदा के बजाय अनाज मांगना ज्यादा सुविधाजनक था। बिगहा की दक्षिण ओर ब्रह्म स्थान था। दो-तीन वेदियां बनी हुईं थी। वहां से निकलते हुए उन वेदियों पर जाकर मत्था टेका। आशीर्वाद भी मांगा, पर वोट नहीं। क्योंकि वह वोटर नहीं थे। वहां से निकल कर करीब आधा किलोमीटर दूर कुराईपुर गांव में आया। गांव के किनारे एक घर बना था। उस घर के परिजनों से मैं पहले भी मिल चुका था। इस बार दुबारा आया था। उनकी हालत देखकर उनसे चंदा मांगने का हिम्मत नहीं जुटा सका। उनसे वोट देने का आग्रह कर के दूसरे घर की ओर चला। तेली परिवार का घर था। उनके घर कई वोट थे। उनसे वोट, उम्मीदवार, जाति आदि की चर्चा की। उनसे वोट मांगा और आगे बढ़ लिया।

उनके यहां से एक यादव परिवार के घर पहुंचा। वहां अपना परिचय दिया। वे किसी काम से औरंगाबाद निकलने वाले थे। उन्होंने दालान में बैठाया। पानी पीने के लिए तिलकूट भेजवाया। इस बीच अपनी बात मैंने उनके समक्ष रखी। यह मुहल्ला इसी गांव के उम्मीदवार मनोज सिंह के घर के आसपास का था। इस कारण कोई उनके खिलाफ समीकरण बनाने को कोई तैयार नहीं था। वहां से बगल के घर में पहुंचा। उस घर के पुरुष खेत पर गए हुए थे। एक महिला भैंस के नाद में पानी डाल रही थीं। उनके पहनावे से लग रहा था कि परिवार खुशहाल और खाता-पीता है। चुनाव की चर्चा की। उनसे मैंने कहा कि चुनाव हमें जनता से प्राप्त चंदा से ही लड़ना है। हर घर से एक गिलास अनाज चाहिए। बात करते-करते उनके दरवाजे तक पहुंच गया। वहां उनकी बेटी से मिल गयी। उससे बातचीत करने लगा। उसकी शिक्षा के बारे में जानकारी ली। इस बीच उन्होंने एक गिलास चावल लाया और मेरे झोले में डाल दिया।

अगली गली में मिले एक साव जी। उनसे बातचीत की। इस दौरान घर के आगे दरवाजे पर बने चरअछिया चूल्हा (धान उबालने के लिए चार मुंह वाला मिट्टी का बना चूल्हा) पर बैठ गया। कुछ और लोग जमा हो गए। बात का सिलसिला कभी राजनीतिक तो कभी पारिवारिक पर चलता रहा। इस दौरान फिर चंदा की चर्चा हुई। कई परिवारों ने एक-एक गिलास चावल लाकर दिया। यहां एक लड़का मिल गया। उसके साथ उसके घर चला। रास्ते में लोगों से वोट भी मांग रहा था और चंदा भी। लेकिन न वोट को लेकर उत्साह दिख रहा था और न चंदा को लेकर उत्सुकता दिख रही थी। वहां से फिर दूसरी गली में पहुंचा। इस दौरान बातचीत करने के लिए लोगों से पानी मांग कर पीने का क्रम चलता रहा।

(जारी)

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क kumarbypatna@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


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आडवाणी ने मोदी से कहा- ”कहीं फेंकू बनकर ही मत रह जाना” (देखें कार्टून)

मशहूर कार्टूनिस्ट इरफान का एक कार्टून आडवाणी और मोदी पर…

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(देखें कार्टून)

साक्षी मीडिया के चेयरमैन जगन ने की सभी आरोपों पर एक साथ सुनवाई की मांग

हैदराबाद। साक्षी मीडिया के चेयरमैन एवं वाईएसआर कांग्रेस के प्रमुख जगनमोहन रेड्डी ने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के सभी मामलों में एक साथ सुनवाई के लिए विशेष सीबीआई अदालत में याचिका दाखिल की है। जगन ने यह भी मांग की है कि सीबीआई द्वारा अंतिम चार्जशीट दाखिल करने के बाद ही सभी मामलों में सुनवाई शुरू हो। जबकि सीबीआई हर आरोप पत्र पर अलग-अलग सुनवाई पर जोर दिया है। दोनों पक्षों की जिरह सुनने के बाद अदालत ने सुनवाई 24 अप्रैल तक स्थगित कर दी है।

सीबीआई अदालत ने सोमवार को दवा कंपनियों द्वारा दो अप्रैल को दायर एक पूरक आरोप पत्र पर संज्ञान लिया। निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाले सरकारी आदेशों और उन कंपनियों द्वारा जगन की कंपनियों में करोड़ों रुपये के निवेश के मामले में सीबीआई अब तक पांच चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। हाल में सीबीआई द्वारा दाखिल चार्जशीट में आंध्र प्रदेश की गृह मंत्री सबिता रेड्डी का नाम भी बतौर आरोपी शामिल किया गया है।

चंचलगुड़ा जेल में बंद जगन ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका भी दाखिल की है। अपनी याचिका में कडप्‍पा सांसद ने कहा है कि सीबीआई की चार्जशीट सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है क्योंकि सर्वोच्च अदालत ने अक्टूबर के अपने आदेश में जांच एजेंसी को सभी बाकी मामले समाहित करते हुए आरोपपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया था, लेकिन सीबीआई ने कोर्ट के आदेश के तहत काम नहीं किया। जमानत के लिए जगन दूसरी बार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं।

दिनेश कुमार एवं दिनेश वशी की नई पारी

दिनेश कुमार ने अपनी नई पारी वैवाहिक चैनल शगुन के साथ शुरू की है। वे यहां पर कॉपी डेस्‍क की जिम्‍मेदारी संभालेंगे। 2001 में आईआईएमसी पॉस आउट शगुन में कॉपी डेस्‍क की जिम्‍मेदारी संभालेंगे। दिनेश इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं।

दैनिक भास्कर, भटिंडा से दिनेश वशी ने इस्‍तीफा दे दिया है। वे रिपोर्टिंग से जुड़े हुए थे। वे अपनी नई पारी की शुरुआत भटिंडा में देल्‍ही पोस्‍ट के साथ रिपोर्टर के रूप में शुरू करने जा रहे हैं। माना जा रहा है कि दिनेश अखबार के अंदर की राजनीतिक उथल-पुथल से परेशान थे।

पत्रकार गणेश रावत ने किया निकाय चुनाव में नामांकन

हल्द्वानी। उत्तराखंड में हो रहे निकाय चुनावों से राजनीतिक सरगर्मियां काफी बढ़ी हुई हैं। सभी राजनैतिक पार्टियां अपने प्रत्याशी को धनबल के साथ चुनाव लड़ा रही है। रामनगर नगरपालिका चुनाव में श्रमजीवी पत्रकार यूनियन अध्यक्ष व पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष गणेश रावत भी किस्मत आजमा रहे हैं। गणेश ने सैकड़ों समर्थकों के साथ शहर में शक्ति प्रदर्शन कर बतौर निर्दलीय नामांकन दाखिल किया है। परिवर्तन के नारे के साथ चुनाव मैदान में उतरे गणेश छात्र संघ में भी सफल पारी खेल चुके हैं।

दो बार छात्र संघ पदाधिकारी रहे गणेश की छवि बेहद साफ रही है। वह वर्तमान में पंपापुरी लोक कल्याण समिति के अध्यक्ष भी रहे हैं। रामनगर में पिछले 25 सालों से चुनाव दो परिवारों के बीच लड़े जा रहे हैं। भाजपा व कांग्रेस से दोनों प्रत्याशी के बीच अक्सर जंग होती रही है। लेकिन गणेश के मैदान में उतरने व ताकत का प्रदर्शन करने के बाद उक्त दावेदारों की नींद उड़ गई है। गणेश को हर वर्ग का समर्थन मिल रहा है। 28 अप्रैल को मतदान होना है। गणेश की कोशिश है कि नगर की मूलभूत सुविधाओं को बहाल करने के साथ ही शहर के समुचित विकास के लिए ब्लूप्रिंट तैयार करना। सभी पत्रकार व जनपक्षधर भाइयों से अनुरोध है कि वे गणेश को जीत दिलाने के लिए हरसंभव मदद करें।

सड़क पर बीबी-बच्‍ची के शव के पास वो मदद को चिल्‍लाता रहा, लोग आते जाते रहे

जयपुर। यहां संवेदनहीनता का वो नजारा देखने को मिला जो बेहद दर्दनाक और दिल दहला देने वाला था। जब सोमवार दोपहर सड़क हादसे के बाद एक व्यक्ति अपनी पत्नी और आठ माह की बच्ची की लाश के साथ सड़क पर मदद के लिए चिल्ला रहा था लेकिन किसी ने उसकी एक नहीं सुनी। इस वाक्ये ने एक बार फिर से ये साबित कर दिया कि लोगों के भीतर से इंसानियत खत्म हो गई है। जब वो असहाय पति अपनी पत्नी और बच्ची को बचाने के लिए करीब पौन घंटे तक दौड़-दौड़कर लोगों से मदद की गुहार लगाता रहा। लेकिन लोग रुकते, देखते और आगे बढ़ते रहे। किसी ने भी उन्हें अस्पताल पहुंचाने की जहमत नहीं उठाई।

सीसीटीवी फुटेज से पता चला कि कन्हैया लाल अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ बाइक पर ससुराल जा रहा था। तभी जयपुर के घाट की गुणी सुंरग से गुजरते वक्त एक ट्रक ने उनकी बाइक को टक्कर मार दी थी। बच्ची और उसकी पत्नी को काफी चोटें आई थी। लेकिन कन्हैया कम घायल हुआ था। सुरंग में नेटवर्क न होने की वजह से मदद के लिए वह किसी को फोन भी नहीं कर सका। समय पर इलाज न मिल पाने के कारण पत्नी और बच्ची की मौत हो गई। घटना के बाद ट्रक चालक ट्रक लेकर फरार हो गया। उस पर हरियाणा का नंबर था। कन्हैया इतना बेबस हो गया कि न तो वो इस हालत में था कि अपनी बच्ची और पत्नी का शव उठा कर ले जा सके और ना ही अपने बेटे और खुद का इलाज कराने के लिए अस्पताल जा सका।

वह कभी पत्नी गुड्डी और बेटी आरुषि के शव से लिपटकर रो रहा था तो कभी घायल बेटे तनीष को साहस बांध रहा था। आखिरकार वो बेहोश हो गया। 40 मिनट बाद टोल बूथ पर तैनात कर्मी ने सीसीटीवी कैमरे में यह दृश्य देखा तो सभी को उठाकर अस्पताल पहुंचाया। जहां महिला और उसकी बच्ची को मृत घोषित कर दिया और कन्हैया लाल अपने बेटे के साथ इलाज कराकर वापस लौट गया। गौरतलब है कि घाट की गुणी सुरंग में आम लोगों का दुपहिया वाहन लेकर आना जाना मना है, लेकिन इसके बाद भी कन्हैया ने ये जोखिम उठाया। (जागरण)

लखनऊ के मान्‍यता प्राप्‍त पत्रकारों को हाउस टैक्‍स में मिलेगी छूट

लखनऊ। लखनऊ के मेयर दिनेश शर्मा ने राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त संवाददाताओं को उनके स्वामित्व वाले मकानों के हाउस टैक्स में छूट देने तथा उनसे वाहन पार्किंग शुल्क नहीं लेने का ऐलान किया है। शर्मा ने बताया कि उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति की मांग पर नगर निगम प्रशासन ने राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त संवाददाताओं को उनके स्वामित्व वाले मकान के हाउस टैक्स में छूट देने का फैसला किया है।

मेयर ने बताया कि पूर्व में राष्ट्रीय स्तर के पत्रकारों के हाउस टैक्स में छूट का प्रस्ताव पारित किया गया था। लेकिन उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमन्त तिवारी तथा सचिव सिद्धार्थ कलहंस की मांग पर इस सिलसिले में पारित पूर्व प्रस्ताव में संशोधन करके अब राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त पत्रकारों को भी इस छूट के दायरे में लाया जाएगा। मेयर ने कहा कि राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त संवाददाताओं की नगर निगम की पार्किंग में शुल्क भी माफ कर दिया गया है। इस सिलसिले में औपचारिकताएं जल्द ही पूरी कर ली जाएंगी।

इस बीच, उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमन्त तिवारी तथा सचिव सिद्धार्थ कलहंस ने मेयर की इस घोषणा का स्वागत करते हुए कहा कि इससे बड़ी संख्या में मीडियाकर्मियों को राहत मिलेगी। (भाषा)

छायाकार एवं आपरेटर ने जागरण छोड़ा, सुधाकर शर्मा की अमर उजाला में वापसी

दैनिक जागरण के बदायूं कार्यालय में तैनात ब्यूरो चीफ लोकेश प्रताप सिंह के दुर्व्यवहार से तंग आकर छायाकार कुलदीप शर्मा, कंप्यूटर आपरेटर दिनेश यादव और चपरासी ललित ने जागरण को छोड़ दिया, लेकिन पुलिस की मदद से ब्यूरो चीफ़ ने चपरासी को वापस बुला लिया, जबकि कुलदीप शर्मा ने अमर उजाला ज्वाइन कर लिया है। वहीं कंप्यूटर आपरेटर ने जिला उद्यान कार्यालय में निजी तौर पर काम शुरू कर दिया है। इसके अलावा अमर उजाला में ब्राह्मणों के साथ बरती जा रही उदारता चर्चा का विषय बनी हुई है।

बदायूं जिले की तहसील बिसौली पर तैनात संवाददाता सुधाकर शर्मा को संस्थान ने तमाम गंभीर शिकायतों के चलते बर्खास्त कर दिया था और उनकी जगह तेजतर्रार अखिलेश पाठक को नियुक्त किया गया था। अखिलेश ने कंप्यूटर के साथ फैक्स मशीन खरीद ली थी, साथ ही काम भी सही तरीके से कर रहे थे, इसी बीच सुधाकर शर्मा की पुनः वापसी कर दी गई। सूत्रों का कहना है कि मुरादाबाद (वर्तमान संभल) जनपद के गाँव पवांसा निवासी शंकराचार्य राजराजेश्वाश्रम का एक मकान चंदौसी में भी हैं, उनसे परिचय निकाल कर सुधाकर ने राजुल माहेश्वरी को फोन कराया था। सूत्रों का कहना है कि राजुल माहेश्वरी शंकराचार्य की बात टालते नहीं है, इसलिए सुधाकर की वापसी हो गई, लेकिन इस सबके चलते अखिलेश पाठक का कई हजार का नुकसान हो गया, वहीं वह सुधाकर शर्मा के सीधे निशाने पर भी आ गए हैं।

‘बदायूं अमर प्रभात’ ने बना दिया है खबरों को चुटकुला

बदायूं जनपद से 'बदायूं अमर प्रभात' नाम का एक अखबार प्रकाशित होता है, जो खबरों का पोस्टमार्टम करने के लिए कुख्यात हो चुका है। ऐसी ही एक खबर नीचे दी जा रही है, जिसका शीर्षक पढ़ कर खुद ही अंदाज़ा लग जाएगा कि अखबार क्या स्तर है। इस अखबार को लोग चुटकुलों की जगह पढ़ कर खूब मनोरंजन करते देखे जा सकते हैं। यह अखबार पत्रकारिता का भला करने की बजाय उसकी हत्‍या करता दिख रहा है। आप भी देखिए 'बदायूं अमर प्रभात' का चुटकुला…

लखनऊ में एक लड़की की अकेली लड़ाई

लखनऊ में एक ऐसी लड़की है जो पिछले दो महीने से अपने खोये हुए मान सम्मान के लिए उत्तर प्रदेश की भ्रष्ट पुलिस और और भ्रष्ट कानून व्यवस्था से लड़ रही है. दर दर की ठोकरें खाने के बाद कल १२.४.१३ को मेरे ऑफिस आयी और उनकी कहानी सुनने के बाद मैं और मेरे वरिष्ठ पत्रकार मित्र पवन कुमार सिंह जी ने उसको इसाफ दिलाने का निर्णय लिया और इसके बाद जब नाका थाना के एसआई से बात की गई तो उसका एकतरफ़ा रुख देखकर दुःख हुआ.

कहानी ये है कि लड़की अनामिका (नाम बदला हुआ) एक बड़ी दवा कंपनी में एरिया मैनेजर के पद पर थी. उसे अपनी ही कंपनी के एमआर नरेंद्र कुमार त्रिपाठी से प्यार हो गया. दोनों १ जनवरी २०१० से १ दिसंबर २०१२ तक साथ रहे. इस बीच नरेन्द्र लड़की का शारीरिक शोषण करता रहा. उससे पैसे ऐंठ कर अपने नाम जमीन भी खरीदी. इसी बीच मैहर देवी मंदिर में जा कर झूठी शादी भी रचा ली. अनामिका के पैरो तले जमीन ही खिसक गई जब उसे पता चला कि वह दरिंदा मई में किसी और से शादी रचा रहा है. उसने 1090 महिला सेवा हेल्प लाइन पर भी अपनी शिकायत दर्ज कराई लेकिन अभी तक कोई सुनवाई नहीं हुई है.

उधर, उस लड़की के पिता लीवर सिरोसिस से जीवन और मौत की लड़ाई लड़ रहे हैं. डॉक्टर ने जवाब दे दिया है. ऐसे में लड़की दोहरी लड़ाई लड़ रही है. एक तो उसकी नौकरी जा चुकी है. पिता मौत से जूझ रहे हैं. यह लड़की अकेले इस भ्रष्ट पुलिस और और भ्रष्ट कानून व्यवस्था से लड़ रही है. वह लड़की पिछले दो दिने से डीआईजी नवनीत सिकेरा जी को फ़ोन मिला रही है लेकिन संपर्क नहीं हो सका.

हम लोग महिला संगठनों के संपर्क में आ चुके हैं और न्यूज़ चैनेल से बात हो चुकी है. हम लोग ये गुजारिश करते हैं कि हमारे पत्रकार साथी व आम लोग हमारी इस मुहिम का हिस्सा बनें ताकि यह दरिंदा अपने दबंग भाई के साथ मिलकर किसी और लड़की की जिंदगी बर्बाद न कर सके. लड़की ने FIR फरवरी माह में करा दिया है. पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही.

तमन्ना फरीदी
लखनऊ

एक न्यूज चैनल में भड़ैती के कुछ सीन (पार्ट एक)

'चांपना न्यूज' में यूं तो न्यूज के नाम पर भड़ैती का नंगा नाच संपादक के रूप में कार्यरत सिंह साहब की विदाई और सीईओ शर्मा जी (आदमी कम भांड़ जादा) की एंट्री के साथ शुरू हो गया था। लोग जानने और समझने भी लगे थे। लेकिन आपसी गुटबाजी, टॉप मैनेजमेंट के तलवे चाट कर अपने समकक्ष की छीलने का अधिकार हासिल करने का लालच ने उन सबकी समझ पर पर्दा डाल दिया। नए संपादक के आने के बाद लगा था कि ब्लैकमेलिंग की डगर पर बढ़ रहे चैनल को अब नई राह मिलेगी, लेकिन ऐसा क्यों नहीं हुआ। यह समझ से परे की बात है क्योंकि नए संपादक, जो वरिष्ठ पत्रकार के रूप में विख्यात हैं, ब्लैकमेलिंग के धंधे में तो शामिल नहीं हो सकते। चलिए, नए संपादक की ज्वाइनिंग से पहले और बाद की कुछ बैठकों और 'चांपना न्यूज' चैनल के भीतरी दृश्यों का कोलाज यहां दिखाते हैं….

पहली मीटिंगः

“एमपी-छत्तीसगढ, बिहार-झारखण्ड और यूपी-उत्तराखण्ड तीनों ही चैनलों की मॉर्निंग मीटिग्स का मुद्दा कंटेंट क्वालिटी से बदल कर करैंसी क्वांटिटी हो गया। मीटिंगो में सारी बातें सुनने के बाद सीईओ शर्मा कहता है- …यू सी रमेश, सॉरी महेश, ऐसी स्टोरीज को चलाने से क्या फायदा जिनका असर बड़ी मछलियों पर होगा ही नहीं… हम चैनल चला रहे हैं कोई एनजीओ नहीं चला रहे हैं…और एनजीओ का भी चलाने के लिए पैसा जरूरी होता है…वो पैसा सरकार ही देती है…कम से कम ऐसा तो हो सरकार हमें वो पैसा तो दे…रमेश, नीतीश कुमार को खींचो…खींचो नीतीश कुमार को…जम कर चलाओ साल्ले के खिलाफ…कुछ भी मिले ठांस के दिखाओ…स्टिंग करवाओ…हम पटना गए तो उसने हमें भाव ही नहीं दिया…साल्ले दूध के धुले नहीं हैं…एक दो स्टोरी चलेगी खुद साले नीचे आएंगे…फिर भी देंगे सरकारी भी देंगे और गैर सरकारी भी, क्यों रीता (उत्तरप्रदेश-उत्तराखण्ड का एसाइनमेंट देखती हैं) उत्तराखण्ड के बारे मे बताया करो यार…इनको ये भी वैसा की फॉलो करें…।

सीईओ शर्मा फिर सभी को एक साथ सम्बोधित करते हुए कहता- देखो मेडिकल पर स्टोरीज करो सब लोग, स्ट्रिंगरों को अपने रिपोर्टर्स को मेल करो कि अपने नजंदीक के सरकारी अस्पतालों का स्टिंग करें, स्टोरी मंगा लो….बैंक करलो…ये सभी चैनल करेंगे। सभी हेड्स यह श्योर करेंगे कि मेडिकल की स्टोरी़ज आएं…मेडिकल में बहुत पैसा है…मोबाइल वैन्स, मोबाइल हॉस्पीटल्स के लिए हजारों करोड़ रुपया दिया गया है…अंजू तुम उत्तराखण्ड पर लगो…ठांस के मंगाओ..ठांस के दिखाओ। यू सी दिग्विजय जी, जब मैं भोपाल में शिवराज जी के साथ था, उन्होंने मुझे यह सब बताया…सैकड़ों-हजारों करोड़ रुपया आया है…हमारी हैल्थ मोबाइल वैन्स चलती हैं न उनके वनवासी कल्याण कार्यक्रम में…तो हम सारे स्टेट्स में एक साथ स्टोरीज चलाएंगे…इसका एक प्रोग्राम बनालो सभी चैनलों में एक साथ दिखाओ…क्यों रमेश क्या टेक्स्ट दोगे…जी दावों की हकीकत…

दावों की हकीकत से कुछ क्लियर नहीं हुआ…

अर्रे सर्र हम दिखाएंगे करोरों रुपया हजम कड गए और हेल्थ सुविधाएं जसकी तस हैं..पहले स्टिंग कराएंगे फिर बाइट लेंगे…साला सीएमओ कडेगा जैसा आप कहिएगा…

नहीं…नहीं रमेश…इसमें हेल्थ मिनिस्टर को इनवॉल्व  करो…चीफ मिनिस्टर को इनवॉल्व  करो पहले कुछ सप्लायर्स को पकड़ो, कॉन्ट्रैक्टर्स को पकड़ो,सारे स्टिंग वो करा देंगे…

सर, कॉन्ट्रैक्टर्स कैसे हमें स्टोरी देगा जब वो खुद खा रहा है…

कर दी न रमेश तुमने भी वोई बात…

अरे, अपने रिपोर्टर को बोलो, उसे पकड़े जिसे कॉंन्ट्रैक्ट नहीं मिला… जिसे सप्लाई नहीं मिली…सब बताएंगे कि कब कहां रासलीला मनाई जा रही है…कहां शबाब-कबाब का खेल चल रहा है…मैं आपको बता रहा हूं रमेश जी अस्पतालों और गंदगी के विजुवल्स दिखा कर आपको रेवेन्यू नहीं मिलेगा…

सर…ये दिखा देंगे  तो, रेव्हेन्यू क्यों देगा…साला गोली मारेगा या केस ठोंक देगा..

ट्टट्टट्टट…टट्टट्टट…रमेश-रमेश तुम तो वेबकूफों जैसी बातें  कर रहे हो…स्टिंग तो करवाओ…स्टिंग हुआ है… यह सिर्फ जानकारी पहुंचानी है उन तक चलाना किसे है, तभी तो वो दिस वे ऑर दैट वे रेवेन्यू देंगे और हमारी स्टोरी को जस्टीफाई करते हुए बाइट भी देंगे… अभी नहीं समझे तो फिर से समझाऊं…

मगर्र सर्र स्टिंगर्स-रिपोर्टर्स पूछेगा तो क्या कहेंगे..

बोलो, उसको जब ठीक समय  आ जाएगा, चला देंगे…देखो यार रमेश तुम भी जानते हो, सब जानते हैं ये कि स्टिंगर्स-रिपोर्टर्स क्या करते हैं फील्ड में, बस इस सिस्टम को सिस्टेमाइज करना है।…और जादा कुछ है तो स्टिंगर्स-रिपोर्टर्स का कमीशन फिक्स्ड कर देते हैं रेवेन्यू पर…

ठीक सर्र…ये ठीक रहेगा…स्टिंगर्स-रिपोर्टर्स को कमीशन मिलेगा तो वो कर देगा…और सर्र टेक्स्ट तो दावों की हकीकत बिल्कुल  फिट है…पहले बाइट लेंगे कितना पैसा आया कितना खड्च हुआ, कहां खड्च हुआ…फिर अस्पतालों की व्हिजुअल्स-बाइट…स्टिंग…फिर मंत्री-मुख्य मंत्री की बाइट…

ओके…रमेश टेक्स्ट तुम जैसा समझो…या सभी हेड्स मिल कर डिसाइड करलो। इसका प्रोमो, स्टिंग जैकेट बनाकर  मुझे मेल करो कब से ऑन एयर  कर रहे हो…और हां ध्यान  रखना डीलिंग में स्टिंगर्स-रिपोर्टर्स इनवॉल्व न रहें, वो हम अपने स्तर से करेंगे..एमआई राइट मयंक जी…

मयंक जी सिर हिला कर मंजूरी दे देते हैं”

 

दूसरी मीटिंग

तीनों चैनल्स के सभी हेड्स, लौंडा मालिक मयंक कुमार, भांड (सीईओ) शर्मा और विजय सिंह

न्यूज स्टोरी की बातें खत्म होने के बाद- भांड उवाच-

“ मे आय से समथिंग मयंक जी ….

जी, यस्स प्लीज

सबसे पहले मैं आप लोगों को एपरीशिएट करूंगा कि आप लोग मैनेजमेंट के निर्देशों को बहुत अच्छी तरह से इम्पलीमेंट और एक्जीक्यूट कर रहे हैं बावजूद इसके अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है…हमारे स्टिंगर्स-रिपोर्टर्स से आने वाला मंथली रेवेन्यु लगातार कम होता जा रहा है और स्टिंगर्स-रिपोर्टर्स के खर्चे लगातार बढ़ रहे हैं जो चैनल पर एक अन-नेसेसरी बोझ है, मैं आप लोगों से यह जानना चाहता हूं कि ये बोझ भी कम हो जाए और चैनल भी स्मूथली चलता रहे…

बीच में बात काट कर लौंडा मालिक मयंक कुमार कहते हैं- शर्मा जी, भोपाल वाला झकास तिवारी का फार्मूला सभी जगह लागू नहीं कर सकते क्या..

जी…जी मैं उसी पर आ रहा  हूं, तो बात ये है कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ में हम लोगों  ने पुरानी व्यवस्था की जगह एक नया सिस्टम लागू किया है। सभी जिलों-तहसीलों के रिपोर्टर और स्टिंगर्स से कहा गया है कि अक्टूबर ऑनवर्डस न्यूज कलेक्शन की मद में कोई एक्सपेंसेज नहीं दिए जाएंगे सभी स्टिंगर्स-रिपोर्टर्स को मंथली रेवेन्यू टारगेट भी पूरा करना होगा। इसी रेवेन्यू से वो अपने खर्चे निकालेंगे और चैनल को भी पैसा देंगे। इसके अलावा एक फिक्स्ड अमाउंट हर स्टिंगर्स-रिपोर्टर्स को डिपोजिट करनी होगी। मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में ये मिनिमम फिफ्टी थाउजेंड फिक्स्ड है। झकास तिवारी ने सब जगह मीटिंग ली है, बहुत अच्छा रेस्पॉंस मिल रहा है। लोग डिपॉजिट करवा रहे हैं। क्यों यूपी-बिहार के लिए कितना रखा जाए…मिनिमम वन लैख…

मीटिंग में सन्नाटा  फिर एक दूसरे की तरफ देख  कर सभी बोले नहीं सर…बहुत जादा हो जाएगा…

तो 75 फिक्स्ड किया जाए…

नहीं सर ये भी जादा है- उत्तरप्रदेश-उत्तराखण्ड में कुछ दिन पहले शामिल चोटी-दाढ़ी शर्मा ने कहा…

तो बताइये फिफ्टी फिक्स्ड किया जाये। रमेश और महेश ने सिर हिला दिया। सीईओ शर्मा ने चोटी-दाढ़ी शर्मा से बोला- आपसे कुछ नए लोगो को अपाइंट करने के लिए कहा गया था, कहां-कहां अपाइंट हो गए, उन्हें कब बुलाया है नोएडा। बीच में लौंडा मालिक मयंक कुमार ने फिर टोका, और बोले, अगर फिफ्टी थाउजेंड भी जादा हैं तो, चोटी-दाढ़ी शर्मा आप भी नोट कर लीजिये डिस्ट्रिक हेड क्वार्टर फिफ्टी, बडी तहसील 35 और 25 छोटी तहसील। इससे कम कुछ नहीं होगा।

भाँड शर्मा ने फिर बोलना शुरु किया- अब इससे कम कुछ नहीं होगा। मयंक जी ने जो कह दिया वो आखिरी शब्द हैं। अब कोई कहता है कि क्या करेगा, कैसे लाएगा, ब्लैक मेलिंग करेगा नहीं करेगा, हमें नहीं मालूम, हमारे पास बस कम्प्लेन्ट नहीं आनी चाहिए। हमे हर महीने टारगेट अचीव्ड चाहिए। जो नहीं कर सकते हैं उनसे आईडी वापस मंगा लीजिए। नए लोग अपाइंट करिए। आईडी जमा नहीं करें तो एफआईआर दर्ज करवाने के लिए बोलिए नए लोगों से उनके खिलाफ। पुराने लोग पैसा मांगे तो कह दीजिए हिसाब-किताब देखा जा रहा है। फायनल होने पर चेक से पेमेंट पहुंच जाएगा एकाउंट में। नए लोगों को अपाइंट करना और उनसे रेवेन्यू डिपॉजिट करवाना ये आप सभी हेड्स की जिम्मेदारी है। अगर आप भी ये काम नहीं कर सकते हैं तो बताइये आप की जगह ये काम करने वालों को हायर किया जाए।”

तीसरी मीटिंग

न्यूज की सारी बातें हो चुकी थीं…. मध्यप्रदेश के एक साथी ने बताया कि कैलाश विजयवर्गीज के खिलाफ- भाँड बोला…. किसने रोका उनके खिलाफ खबर चलाने से- मामला जादा बडा हो तो स्टिंग भी करवालो…”  शेष अगले अंक में…

चैनल का नाम और चैनल के चरित्रों का नाम बदल दिया गया है. घटनाक्रम पूरी तरह सही है.

बदायूं के प्रधानाचार्यों ने दी हिंदुस्तान के बहिष्कार की चेतावनी

बदायूं के हिंदुस्तान कार्यालय में अमर उजाला के बर्खास्त लोगों को भर्ती किया गया  है, तब से हिंदुस्तान अखबार पंपलेट बन गया है। किसी न किसी खबर को लेकर आए दिन बवाल होता रहता है। खुद लिखी खबरों की तो बात ही छोड़िए, सूचना कार्यालय के प्रेस नोट पर भी बवाल हो गया है। शहर के प्राचीन हाफ़िज़ सिद्दीकी इसलामिया इंटर कालेज के प्रधानाचार्य खिजर अहमद के अपमान को लेकर जिले भर के प्रधानाचार्यों में रोष व्याप्त है।

खिजर अहमद ने जिलाधिकारी को पत्र देकर खबर का खंडन प्रकाशित कराने की मांग की है। गौरतलब है कि शनिवार को जिलाधिकारी ने कालेज का निरीक्षण किया था, जिसका सूचना कार्यालय ने प्रेस नोट जारी किया। प्रेस नोट में प्रधानाचार्य को फटकार लगाने का जिक्र तक नहीं किया गया, पर हिंदुस्तान ने प्रधानाचार्य को फटकार लगाने का ही शीर्षक लगाया, जिससे खिजर अहमद बेहद नाराज हैं, वह यूनियन के जिलाध्यक्ष भी हैं, सो उनके साथ जिले सभी प्रधानाचार्य खड़े हैं, उनका कहना है कि खंडन प्रकाशित नहीं किया गया, तो वह जिले भर में हिंदुस्तान का बहिष्कार कराएंगे।

तुम्हारे इस अमल से इस्लाम की तौहीन होती है

पिछले दो चार सालों से मीडिया में बार ये खबर  आ रही हैं कि पाकिस्तान  में अल्पसंख्यकों के साथ  दौगला व्यवहार किया जा रहा है. अमर उजाला में 15.4.2013 को प्रकाशित फोकस पृष्ठ पर सुभाष कश्यप, विवेक गोयल, और कमल खत्री जैसे बुद्धीजीवी लोगों ने इस मुद्दे पर महत्वपूरण लेख लिखे हैं. उन्होंने पाकिस्तान से आये लोगों की पीड़ा को महसूस किया, और अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुऐ अपनी कलम चलायी है. विवेक गोयल ने कई लोगों की दास्तानें सुनाईं हैं.

एक पांच साल की बच्ची दिव्या से बातचीत का उल्लेख उन्होंने कुछ इस तरह किया है. यहां क्यों आई हो ? दिव्या कहती है क्योंकि यहां अच्छा है. ये कौनसी जगह है ? दिव्या – इंडिया है. यहां रहकर क्या करोगी ? दिव्या – पढ़ूंगी. वहां क्यों नहीं पढ़ती ? दिव्या – वहां पर स्कूल में कलमा पढ़ाया जाता है. कलमा पढ़ने से क्या होता है ? दिव्या – कलमा पढ़ूंगी तो मुसलमान हो जाऊंगी। एक पांचवर्षीय बच्ची के इस तरह से बात करने से साफ जाहिर हो रहा है कि उनकी घरेलू शिक्षा ने उनकी मानसिकता को गुलाम बना दिया है।

जाहिर ये बातें पांच वर्षीय दिव्या को किसी स्कूली टीचर ने तो सिखाई ही नहीं होंगी दरअस्ल इस तरह की बातें उसे घर पर सिखाई गईं। और अब इन्हीं बातों से मीडिया को इमोशनली बलैक मेल किया जा रहा है। जिस देश के ये नागरिक हैं वह एसा देश है जहां पर अल्पसंख्यक ही नहीं बहुसंख्य भी खतरे में हैं खुद वह देश बारूद के ढ़ेर पर बैठा अपनी तबाही का इंताजार कर रहा है वहां पर इस तरह की घटनाएं हर खास ओ आम के साथ होती हैं।

जिस दिव्या ने स्कूल ना जाने की वजह  कलिमा बताया है उस बच्ची  की मानसिकता को अभी से ही गुलाम बनाने वाले उसके अभिभावक शायद भूल गये  कि जिस तरह पाकिस्तान में स्कूलों में इस्लामी कलमा पढ़ाया जाता है उसी तरह भारत में भी स्कूलों में हिंदू धर्म का कलिमा पढ़ाया जाता है जो इस तरह है ॐ भूर्भव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्। ये मंत्र प्रारथमिक विद्यालयों में हर रोज प्रार्थना के दौरान पढ़ाया जाता है।

लेकिन कभी किसी मुसलमान ने पाकिस्तान सरकार से ये शिकायत नहीं की कि वे स्कूल इसलिये नहीं जाते कि वहां पर हिंदू धर्म का कलिमा पढ़ाया जाता है. राम को लक्ष्मण को , दशरथ को, रामायण को महाभारत को यहां के पाठ्यक्रमों में शामिल किया गया है उसके पढ़ने पर तो किसी ने आपत्ती नहीं जताई. फिर इस तरह का हौवा क्यों खड़ा किया जा रहा है. भारत के अल्पसंख्यकों को जो भी समस्याएं होती हैं उन्हें वे भारत सरकार से कहते हैं ना कि पाकिस्तान की सरकार से फिर पाकिस्तान से आये ये लोग भारत से क्यों गुहार लगा रहे हैं.

पाकिस्तान सरकार से कहें वहां प्रदर्शन करें अपनी आजादी के लिये अपने अधिकारों के लिये. यहां इस तरह की बातें करके यहां की सांप्रदायकि ताकतों को क्यों काद पानी दिया जा रहा है ? अगर उनके साथ में जबरन धर्म परिवर्तन करने जैसी घटनायें हुई हैं तो ये गैर इस्लामी है. इस्लाम का तो अर्थ ही शान्ति है उसमें बलात धर्म परिवर्तन के लिये कोई जगह नहीं है। वह तो यहां तक कह देता है कि धर्म के बारे में कोई जोर जबरदस्ती मत करो उनका धर्म उनके लिये तुम्हारा धर्म तुम्हारे लिये।

इसके बाद भी इस्लाम दोषी. इसके बाद भी तरह तरह के भद्दे आरोप शान्ति के धर्म पर क्यों लगाये जा रहे हैं ? जिस देश के सरकार के सामने आकर ये अपनी समस्याओं का रोना रो रहे हैं उस देश में भी लोगों पर जुल्म होता है. 1947 के दंगों से लेकर आज तक दंगों के जख्म हरे हैं दलितों पर आज भी अत्याचार हो रहे हैं. मगर क्या इन शोषित लोगों ने किसी विदेशी सरकार से ये अपील की कि वह उसका समाधान करे. पाकिस्तान से आये लोग ये क्यों भूल गये कि भारत उनका शत्रू देश है. और उसके गुणगान करना उन्हें गद्दार बना सकता है जैसा यहां पर होता है. अगर कोई मुस्लिम पाकिस्तान का नाम भी अपनी जुबान पर लेआता है तो उसे यहां के तथाकथित देशभक्त गद्दारी के तमगे से नवाज देते हैं।

तो क्या ये अपने देश के गद्दार नहीं हुऐ. और जिस मीडिया का कलेजा इनके लिये फटा जा रहा है, और जो बुद्धीजी इनको भारत की नागरिकता दिलाने के लिये एडीचोटी का जोर लगा रहे हैं उन्होंने पिछले वर्ष उस 80 पाकिस्तानी को भारत की नागरिकता दिलाने के लिये क्यों जुबान नहीं चलाई जिसका पूरा परिवार भारत में है और वह अकेला पाकिस्तान में जो जिंदगी के आखरी पड़ाव में बस यह चाहता था कि वह अपने परिवार के बीच आखरी सांस लेना चाहता है ना कि पाकिस्तान में. उसके लिये इन्होंने आवाज क्यों नहीं उठाई ? क्या केवल इसलिये कि उसका धर्म दूसरा था ?

खैर जो भी हो …….. पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय के साथ बहुसंख्यक समुदाय असुरक्षा और भय के माहौल में जी रहा है जिसका इलाज पाक सरकार के पास है ना कि भारत के पास। और जो लोग जबरन शादी, बलात धर्म, लूट पाट, हत्या आदी कर रहे हैं वह निंदनीय है और उसका इस्लाम से कोई संबंध नहीं है. लेकिन इस्लाम का नाम लेकर ये लोग उसकी छवी को बट्टा लगा रहे हैं। इससे किसी और की नहीं बल्कि खुद इस्लाम की तौहीन हो रही है. अल्लाम इकबाल ने कहा था कि

खुदा के बंदे तो हैं हजारों वनों में फिरते हैं मारे मारे
मगर मैं उसका बंदा बनुंगा जिसे खुदा के बंदों से प्यार होगा।

लेखक वसीम अकरम त्यागी युवा पत्रकार और एक्टिविस्ट हैं.

अति उत्साह में किरकिरी करा बैठा आगरा का हिंदुस्तान

आगरा स्थित दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट में शोध छात्रा नेहा शर्मा की सनसनीखेज मौत के बाद वाहवाही बटोरने के फेर में आगरा के हिंदुस्तान ने जमकर अपनी किरकिरी करवा ली। एक के बाद एक गलत खबरों की बदौलत दयालबाग क्षेत्र में पाठकों को जोड़ने की बजाय यह रहे-सहे पाठक भी खोने को बैठा है। असल में मार्च में हुई इस घटना के बाद हिंदुस्तान ने प्रथम पृष्ठ पर हेडिंग में रेप होने की बात लिखी थी। अन्य किसी अखबार ने इतनी गंभीरता के साथ इस बात को नहीं उठाया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद रेप की बात गलत साबित हुई। इससे आगरा हिंदुस्तान की काफी फजीहत हुई।

बात यहीं खत्म नहीं हुई। मामले पर नंबर बढ़वाने में लगे नौसिखए पत्रकारों ने फिर एक और कारनामा किया। उसने एक लैब असिस्टेंट की गिरफ्तारी को फिर प्रमुखता से उछालते हुए उसके नाम के साथ उसे मुख्य आरोपी होने का तमगा भी दे दिया। बाद में खुद पुलिस ने माना कि वह आरोपी नहीं है। हिंदुस्तान ने उस कर्मचारी को खलनायक बनाकर शहर में उसका रहना दूभर कर दिया। दयालबाग के लोगों को समझ में नहीं आ पा रहा है कि आखिर यह किस प्रकार की पत्रकारिता हिंदुस्तान के अंदर ‘पुष्पित’ हो रही है। ‘रीडर कनेक्ट’ के नाम पर वरिष्ठ संपादकीय कर्मचारी गली-मोहल्लों के कार्यक्रमों में उपस्थिति दर्ज कराते हैं वहीं इतने संवेदनशील मामलों पर संवेदनहीनता के साथ खबरें लिख दी जाती हैं। आखिर क्यों? इस पूरे प्रकरण में दैनिक जागरण और अमर उजाला ने सूझ-बूझ का परिचय दिया।

एक पत्र पर आधारित.

पी7 के एमपी-सीजी न्यूज चैनल से जुड़ेंगे रजनीश झा

टीवी टु़डे ग्रुप के दिल्ली आजतक में बतौर प्रोड्यूसर काम करनेवाले रजनीश झा ने संस्थान से इस्तीफा दे दिया है. फिलहाल वे नोटिस पीरियड पर चल रहे हैं. रजनीश झा सीनियर प्रोड्यूसर के तौर पर पी 7 एमपी-सीजी से जुड़ने जा रहे हैं. झा 12 वर्षों से देश के विभिन्न रीजनल न्यूज चैनल में सक्रिय हैं.

1999 में देवी अहिल्या विवि, इंदौर से बीजेएमसी और 2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल से एमजे करने के बाद झा ने कुछ समय तक प्रोडक्शन हाउस में काम किया. उसके बाद अजित जोगी के न्यूज चैनल अभी-अभी से करियर की शुरुआत की. बाद में वे ईटीवी न्यूज के एमपी-सीजी चैनल से जुडे. ईटीवी के बाद सहारा समय एमपी-सीजी में काम किया. 2008 में वे टीवी टुडे ग्रुप से जुड़े.

दैनिक भास्कर, गुड़गांव छोड़कर हिंदुस्तान पहुंचे जतिन जैन

दैनिक भास्कर गुडगाँव को एक और झटका लगा है. पत्रकार जतिन जैन ने हिंदुस्तान ज्वाइन कर लिया है. जतिन जैन सोनीपत के निवासी हैं. गुडगाँव से पहले वे सोनीपत भास्कर के साथ रहे. कुछ दिन पंजाब केसरी के साथ भी काम किया था. जतिन से पहले भास्कर गुडगाँव चीफ राजीव दत्त पाण्डेय ने भी भास्कर को छोड़ दिया था. वे इन दिनों हिंदुस्तान के साथ है.

अब है स्मार्टफोन पत्रकारिता का जमाना

एक पत्रकार के लिए स्मार्टफोन विलासिता नहीं वरन एक जरूरत है। मुझे भारत में मोबाइल टेलीफोनी के शुरुआती दिनों की याद आती है। नब्बे के दशक की शुरुआत में मुझे एक नोकिया हैंडसेट दिया गया था जो कि एक ईंट जैसा दिखाई देता था और इसका वजन करीब 400 ग्राम रहा होगा। तब मैं स्थानीय न्यायालयों की खबरों को कवर करता था और मुझे याद है कि मोबाइल फोन के आने से पहले मैं कोर्टरूम से भागकर एक लैंडलाइन कनेक्शन के लिए दौड़ लगाता था ताकि ब्रेकिंग न्यूज के बारे में ऑफिस से सम्पर्क कर सकूं। उस समय भारत में मोबाइल सर्विसेज बहुत महंगी होती थीं।

एक आउटगोइंग कॉल का प्रति मिनट मूल्य 18 भारतीय रुपए (0.33 अमेरिकी डॉलर) होता था और इनकमिंग कॉल्स का मूल्य इससे आधा हुआ करता था। इसलिए मेरे वरिष्ठों का कहना था कि मैं फोन का इस्तेमाल तब तक ना करूं जब तक कि समाचार बहुत बड़ा न हो, लेकिन अब वे दिन बीत चुके हैं और भारत में मोबाइल कॉल की दरें संभवत: दुनिया में सबसे कम हैं। एक स्मार्टफोन के साथ मेरी शुरुआत एक ब्लैकबेरी से हुई थी। शुरुआत में यह मुख्य रूप से ऑफिस ईमेल को एक्सेस करने के लिए होता था। इससे मैं अपडेट्‍स भेजता और मेरी स्टोरीज फाइल करता था। इसके बाद ब्लैकबेरी मैसेंजर आया लेकिन इस एप्लीकेशन की हम लोगों को जानकारी नहीं थी। तब ब्लैकबेरी और भारत सरकार के सर्वर की एक्सेस को लेकर कोई विवाद था। इसी बीच में मुझे ऑफिस की ओर से आईफोन दिया गया और इसके बाद में हमेशा के लिए भूल गया कि मैं कभी ब्लैकबेरी भी इस्तेमाल करता था।

अब मेरी पत्रकारिता की दुनिया आईफोन के चारों ओर ही घूमती है। मैं इससे ईमेल भेजता हूं और हिंदी में अपने समाचारों को भेजता हूं। आईफोन पर एप्लीकेशन्स से बहुत मदद मिलती है। मेरे पास एक डिक्शनरी है और क्विक जैसे एप्लीकेशन वी‍डियो रिकॉर्ड करने और इसे ऑफिस भेजने में मदद करते हैं। इसे लाइव रिपोर्टिंग के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। आईफोन का कैमरा बहुत ही अच्छा है। मेरे एक सहयोगी ने संसद के अंदर प्रधानमंत्री का एक संक्ष‍िप्त इंटरव्यू आईफोन पर रिकॉर्ड किया और इसे ऑफिस के लिए भेज दिया। कुछ जगहों पर सामान्य टीवी कैमरे इस्तेमाल नहीं करने दिए जाते हैं, लेकिन आप मोबाइल फोन्स का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह हमारे लिए एक एक्सक्लूजिव और स्कूप था।

सोशल मीडिया : सोशल मीडिया एप्लीकेशन्स जैसे फेसबुक, ट्‍विट्‍र और यू-ट्‍यूब मेरी रिपोर्टिंग किट (सामग्री) के एक अनिवार्य भाग हैं। एक राजनीतिक संवाददाता होने के कारण इनसे मुझे बहुत मदद मिलती है क्योंकि इन दिनों बहुत सारे राजनीतिज्ञ सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके साथ ही मैं स्थानीय ब्रॉडकास्टर्स और समाचार-पत्रों की एप्लीकेशंस रखता हूं जिससे कि जब और जहां ब्रेकिंग न्यूज होती है, मुझे इनसे एक एलर्ट मिल जाता है।

गूगल मैप्स जैसे एप्लीकेशंस ने मेरे नेवीगेशन को और अधिक आसान बना दिया है। इसके अलावा एक वॉयस रिकॉर्डर है। कई अवसरों पर मैंने अपना वॉयसओवर इसी पर रिकॉर्ड करवाया है और इसे ऑफिस को मेल कर दिया है। इसकी साउंड क्वालिटी भी बहुत अच्छी है।

आईफोन जैसे स्मार्टफोन्स 16 जीबी या इससे ज्यादा की इन बिल्ट मेमोरी के साथ आते हैं। इसलिए किसी को भी चिंता नहीं होनी चाहिए कि उसके कॉन्टेक्ट्‍स कितने हैं, या इसमें‍ कितने वीडियो हैं अथवा फोन में कितने फोटो स्टोर किए गए हैं। इसकी एक और खास बात यह है कि आपके कॉन्टेक्ट्‍स का आपके मेल बॉक्स से तालमेल बना रहता है। इसलिए अगर आपका फोन खो भी जाता है तो भी आपके कॉन्टेक्ट्‍स सुरक्षित बने रहते हैं।

और वास्तव में, इसके साथ एंग्री बर्ड्‍स और टेम्पल रन भी हैं लेकिन इन एप्लीकेशन्स का मतलब यह होता है कि जैसे ही मैं घर पहुंचता हूं कि बच्चे मुझसे फोन ले लेते हैं और इसे पाने के लिए उनमें जोर आजमाइश शुरु हो जाती है। एक स्मार्टफोन में कितना अधिक उपयोग करने को है।

लेखक अखिलेश शर्मा एनडीटीवी के वरिष्ठ राजनीतिक संपादक हैं.  साभार : थॉम्सन फाउंडेशन

शशि शेखर ने छुटभैये और विचार शून्य लोगों को संपादक बना दिया : शंभूनाथ शुक्ला

Shambhunath Shukla : 2000 के बाद के दशक में टीवी अखबारों पर हावी होने लगा लेकिन किसी स्पष्ट नीति के अभाव में टीवी चैनलों में खबर कम भूत प्रेत की कहानियां, ज्योतिष तथा सिनेमा और क्रिकेट इस कदर हावी रहा कि टीवी कभी भी गंभीर न्यूज स्रोत नहीं बन सका न शुरू में और न अब। उलटे अखबार भी टीवी फोबिया के शिकार हो गए। गंभीर लेखन, रपटें अखबारों से गायब हो गईं। इसमें एक हद तक जनसत्ता ने अपने को साहित्य और उम्दा संपादकीय लेखों से बचाए तो रखा लेकिन बतौर अखबार उसकी भूमिका समाप्त हो गई क्योंकि जो अखबार अपनी खबरों व रपटों के कारण रोज लोकसभा में हंगामा करवाता था वह महज एक इतवारी पत्रिका बन कर रह गया। चूंकि आम अखबारी पाठकों के लिए उसमें कुछ भी नहीं बचा इसलिए २००० आते-आते जनसत्ता बाजार से गायब हो गया।

यही हाल धीरे धीरे नवभारत टाइम्स का हुआ। लेकिन इस दौर में अमर उजाला, भास्कर और दैनिक जागरण ने अपने को बचाया और खबरों से अखबार को इस तरह भर दिया कि यही अखबार बाजार के मुख्य अखबार बन गए। इसमें काफी हद तक भूमिका पत्रकारों की नहीं इनके मालिकों की व्यावसायिक समझ की रही। अतुल माहेश्वरी, नरेंद्र मोहन और सुधीर अग्रवाल ने पाठकों की रुचि को ज्यादा करीब से समझा। यह वह दौर था जब संपादकों का दौर खत्म हो गया। संपादक बौने हो गए और अखबार अपने मालिकों के कारण जाने जाने लगे। टीवी से टक्कर भी इन्हीं अखबारों ने ली।

फिर 2005 से एक नया दौर शुरू हुआ। हिंदुस्तान में मृणाल पांडे ने इस अखबार का विस्तार किया और अमर उजाला में शशिशेखर ने तमाम कौतुक किए। अखबार का प्रसार तो उनके कार्यकाल में बढ़ा लेकिन अखबार से पत्रकार रूपी संस्था को कमजोर कर दिया। कोई पत्रकार बराबरी पर न आ सके इसलिए शशि शेखर ने छुटभैये और कमजोर व लेखन तथा विचार में शून्य पत्रकारों को संपादक बना दिया। नतीजा यह हुआ कि अखबार एक व्यक्ति की संस्था बन गया। यह सभी जगह हुआ कहीं अधिक कहीं कम। लेकिन अमर उजाला के मालिकों की अपनी न्यूज की समझ थी यही कारण है कि आज भी यह अखबार बाजार में सबसे ताकतवर अखबार है। हालांकि अतुलजी की मृत्यु के बाद लोगबाग कयास लगाते रहे कि अमर उजाला अब गया कि तब गया लेकिन श्री राजुल माहेश्वरी ने इसकी कमान इतनी कुशलतापूर्वक संभाली कि अमर उजाला आज भी हिंदी बेल्ट का सर्वोत्तम अखबार है। आज वहां आशुतोष चतुर्वेदी कमान संभाले हैं और मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आशुतोष जी ने अमर उजाला के संपादकीय विभाग को नई मजबूती दी है।

दैनिक जागरण में खुद संजय जी और प्रशांत मिश्र जी ने इसे एक मजबूत राजनीतिक सोच समझ वाला अखबार साबित किया है। हालांकि भास्कर ने संपादक रूपी संस्था को पत्रकार कम मैनेजर अधिक बनाया है लेकिन इसके मालिक खुद सुधीरजी एक सफल पत्रकारीय समझ वाले व्यक्ति हैं। अन्य क्षेत्रीय अखबारों में ट्रिब्यून के समूह संपादक संतोष तिवारी एक कुशल और बेहतर पत्रकार हैं इसलिए उन्होंने इसे एक नई दिशा देने में पहल की है। हरिभूमि हरियाणा का एक बेहतर अखबार है और इसकी वजह उसके संपादक ओंकार चौधरी हैं। इसी तरह बिहार में प्रभात खबर को हरिवंश जी तथा संपादक राजेंद्र तिवारी ने उसे और अधिक पाठकोन्मुख बनाया है।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से साभार.

नाबालिग से शादी रचाने में छत्तीसगढ़ में तैनात डिप्टी एसपी यूपी में अरेस्ट, जेल गया (देखें तस्वीरें)

उत्तर प्रदेश के चंदौली में एक अधेड़ पुलिस अफसर ने नाबालिग लड़की से मंदिर में शादी रचा लिया. सूचना पर पुलिस पहुंची. पुलिस दूल्हा दुल्हन सहित उनके परिजनों को भी थाने ले आयी.  अधेड़ पुलिस अफसर चंदौली के बलुआ थाना क्षेत्र का रहने वाला है और छत्तीसगढ के बिलासपुर में डिप्टी एसपी के पद पर कार्यरत है. दूल्हे की उम्र पचास साल के करीब है. दुल्हन महज तेरह साल की है.

दूल्हे राजा चंदौली के बलुआ के रहने वाले हैं और छत्तीसगढ में पुलिस विभाग में डिप्टी एसपी के पद पर तैनात हैं. इनकी पहली पत्नी की मौत बहुत पहले हो गयी थी. जनाब ने दूसरी शादी अपने गांव के बगल के गांव में तय की.

नियत समय पर दूल्हे राजा दुल्हन और उसके परिजनो के साथ मंदिर में पहुंचे. शादी की रस्म शुरू हुई. फेरे भी हो गये. तभी पुलिस को खबर लग गयी. पुलिस के मौके पर पहुंचते ही दूल्हा डिप्टी एसपी साहब गले में पड़ी वरमाला और टोपी फेंक कर भागने लगे. मंदिर के बाहर मीडिया वालों ने जब डिप्टी एसपी को रोका तो वह गर्मी लगने का बहाना बनाने लगे.  दूल्हे ने खुद को बेगुनाह बताया. लड़की को बालिग करार दिया.

बाद में लोकल पुलिस ने जब गहराई से छानबीन की तो पता चला कि लड़की दसवीं पास है और नाबालिग है. दुल्हन के पिता का कहना है कि उसने अपनी गरीबी से तंग आकर अपनी बेटी की शादी अधेड़ पुलिस अफसर के साथ तय की. पुलिस ने आरोपी पुलिस अधिकारी, लड़की के पिता, शादी करने वाले पंडित… तीनों के खिलाफ बाल विवाह अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया है. आरोपी को गिरफ्तार कर पुलिस आगे की कार्यवाही में जुट गयी है. इस मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस ने छत्तीसगढ़ पुलिस से भी सम्पर्क साधा है.

चंदौली से संतोष जायसवाल की रिपोर्ट.

कुमार विश्वास ने तो किसी को नहीं छोड़ा… धन्य हैं.. जय हो! (सुनें टेप)

किसी मित्र ने मुझे मेरठ में यह सुनाया. लगभग एक घंटे के आसपास का यह टेप है. मैं सुना तो सुनता ही गया. हंसता गया. मुस्कराता रहा. तब सोचा था कि इसे भड़ास पर अपलोड करके सभी को सुनाउंगा. पर काम के दबाव और अन्य चिरकुट उलझनों के कारण भूल गया.

इन दिनों जब लखनऊ आया तो संयोग से यह रिकार्डिंग मेरे मोबाइल में थी और एक लंबी यात्रा के दौरान कार के आडियो से अपना मोबाइल ब्लूटूथ के जरिए कनेक्ट किया और इसे फिर से सुना और सुनाया. रास्ते भर हंसते रहे हम लोग. तो, मैंने तय किया कि अब इसे भड़ास पर अपलोड कर ही दिया जाए.

क्या खूब हैं कुमार विश्वास. सब सुनने के बाद समझ में आया कि आखिर क्यों पब्लिक कुमार विश्वास को पसंद करती है, प्यार करती है. यह रिकार्डिंग एक कवि सम्मेलन की है. कुमार विश्वास माइक पकड़ते हैं तो फिर बोलते-गाते-हंसाते-सुनाते रहते हैं. गद्य में ज्यादा बातें कहीं, पद्य दाल में तड़के की तरह है.

जो मजेदार मजेदार जोक सुनाए, उसे सुनकर आप भी कह पड़ेंगे कि यार, इस बंदे ने तो किसी को नहीं छोड़ा. क्या अटल बिहारी वाजपेयी और क्या मायावती.. मुलायम सिंह यादव हों या लालू यादव…  सबकी चुटकी ली. मनमोहन सिंह और सोनिया की खूब बैंड बजाई…. आप सुनेंगे तो सुनते चले जाएंगे और बिना हंसे मुस्कराए रह ना सकेंगे. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


अन्य टेपों, गानों, गालियों, स्टिंग आदि के लिए यहां क्लिक करें- MP3

जिंदगी-मौत के बीच संघर्ष कर रहे ‘इंडिया टीवी’ चैनल के ओवी इंजीनियर की सुध लेने वाला कोई नहीं

एक दुखद समाचार इंडिया टीवी न्यूज चैनल से है. यहां आरएस इंजीनियर / ओवी इंजीनियर के रूप में काम करने वाले 35 वर्षीय चित्रपाल सिंह पिछले चार दिनों से जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं. पर इंडिया टीवी से उनकी खैर खबर लेने कोई भी वरिष्ठ अधिकारी अस्पताल नहीं पहुंचा. चित्रपाल सिंह नोएडा के सेक्टर 27 स्थित कैलाश अस्पताल में भर्ती हैं.

चार दिन पहले वे जब घर से ड्यूटी जा रहे थे तो उनका एक्सीडेंट हो गया. वे बाइक पर थे और किसी गाड़ी ने उन्हें टक्कर मार दी. चित्रपाल की ड्यूटी उस दिन विजय चौक पर ओवी पर लगाई गई थी. उन्हें विजय चौक जाकर वहां ओवी पर कार्यरत साथी को रिलीव करना था. मयूर विहार फेज थ्री के पास उन्हें किसी गाड़ी ने भयानक रूप से टक्कर मार दी. उनके चारो पसली में फ्रैक्चर है, कंधे में फ्रैक्चर है, सर में चोट है. कैलाश अस्पताल में वे चार दिन से जिंदगी मौत के बीच झूल रहे हैं. इंडिया टीवी की तरफ से रजत शर्मा को तो छोड़िए, दूसरा कोई डिपार्टमेंटल हेड तक उन्हें देखने नहीं गया.
 

जनसंदेश टाइम्‍स, संतकबीर नगर के ब्‍यूरोचीफ बने मुकेश पांडेय

: विज्ञापन प्रभारी ने दिया इस्‍तीफा : जनसंदेश टाइम्स गोरखपुर युनिट से जुड़े संतकबीरनगर जिले के ब्यूरो कार्यालय में फेरबदल किया गया है। गोरखपुर में कार्यरत मुकेश पाण्डेय को ब्‍यूरो प्रभारी बनाकर संत कबीर नगर भेजा गया है। उन्‍होंने अपनी जिम्‍मेदारी संभाल ली है। अब तक ब्‍यूरो प्रमुख की भूमिका जय प्रकाश ओझा संभाल रहे थे। अब वह सेकेंड मैन के रूप में काम करेंगे। हालांकि माना जा रहा है कि यहां जल्‍द ही जनसंदेश टाइम्‍स को बड़ा झटका लग सकता है।

जय प्रकाश एक टीम लीडर की तरह काम करते हैं। वे अमर उजाला छोड़कर अपने तेरह साथियों के साथ हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन किया था। जब हिंदुस्‍तान से इस्‍तीफा देकर जनसंदेश टाइम्‍स पहुंचे तो उनके साथियों की संख्‍या 18 पहुंच गई थी। अब संभावना जताई जा रही है कि प्रबंधन के निर्णय से नाखुश जय प्रकाश अपने कई साथियों के साथ इस्‍तीफा देकर किसी और संस्‍थान से जुड़ सकते हैं। खबर है कि मुकेश के आने के साथ ही विज्ञापन प्रभारी आनंद तिवारी ने काम छोड़ दिया है।

सरफराज सैफी को सहाना मीडिया में मिला ठौर

पिछले कुछ समय से लगातार यहां वहां जुड़ते उखड़ते रहने वाले सरफराज सैफी ने नया ठिकाना सहाना मीडिया को बनाया है. उन्होंने वाइस प्रेसीडेंट (आपरेशन) पद पर ज्वाइन किया है. सहाना मीडिया कंपनी का मालिक मुंबई का बिल्डर सुधाकर शेट्टी है. उसकी रियल इस्टेट कंपनी का नाम है सहाना.

सहाना ग्रुप की मीडिया कंपनी का नाम है सहाना फिल्म्स. इस ग्रुप के दो चैनल हैं. जय महाराष्ट्रा और सहाना न्यूज. मुंबई बेस्ड इन चैनलों के लिए सरफराज दिल्ली में बैठकर कामधाम देखेंगे. सरफराज सैफी कई छोटे चैनलों के साथ एंकर के बतौर जुड़े रहे हैं. यह पता नहीं चल पाया है कि वे सहारा मीडिया में पत्रकारिता का काम करेंगे या मार्केटिंग का.

”सहारा ने गुजरात-महाराष्‍ट्र चैनल के स्ट्रिंगरों के पैसों का भुगतान नहीं किया”

यशवंत जी, नमस्‍कार, सर जी आप हमारी बात यदि आप के पोर्टल पर रखोग तो शायद हमें न्याय मिल सके. बात कुछ ऐसी है कि सहारा समय न्यूज ने 15 अगस्त 2012 को गुजरात में नया रीजनल चैनल शुरू किया गुजरात-महाराष्‍ट्र. गुजरात चुनाव के ठीक पहले शुरू हुए इस न्यूज चैनल में गुजरात के सभी स्ट्रिंगर ने खूब जी लगा के काम किया. खुद का कैमरा खुद का नेट और सारी खबर न्यूज़ के लिए भेजी.

सर, उसके बाद हुआ यह कि चैनल भी बंद हो गया और किसी को रुपए भी नहीं मिले. किसी को मिले तो 10% या 20%. पूरे अभी तक के बिल का वैसे न्यूज चैनल तो चल रहा है, मगर गुजरात में कहीं दिख नहीं रहा है। और न ही कोई अब गुजरात से न्यूज भेज रहा है. अब आप ही बताएं कि यह बात सहारा श्री को पता होगी. हम इतना चाहते हैं कि आप अब हमारी आवाज बनें और हमें न्याय दिलायें.

एक दुखी संवाददाता.

हिंदी आलोचना में जिस साध्‍य की जरूरत है वह विरल होती जा रही है : नामवर सिंह

जोकहरा। जोकहरा स्थित श्री रामानन्‍द सरस्‍वती पुस्‍तकालय में ‘गोष्‍ठी : इतिहास और आलोचना’ विषय पर आयोजित एक भव्‍य समारोह में हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने प्रो.प्रदीप सक्‍सेना को शॉल, प्रशस्ति पत्र, नगद राशि प्रदान कर वर्ष 2012 का डॉ. रामविलास शर्मा आलोचना सम्‍मान से सम्‍मानित किया। श्री रामानन्‍द सरस्‍वती पुस्‍तकालय, जोकहरा, केदार शोध पीठ (न्‍यास), बॉंदा, डॉ. रामविलास शर्मा आलोचना सम्‍मान आयोजन समिति की ओर से प्रदान किए जाने वाले सम्‍मान समारोह के दौरान महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय, वरिष्‍ठ साहित्‍यकार प्रो. निर्मला जैन, प्रो. चौथीराम यादव, भारत भारद्वाज, दिनेश कुशवाह, प्रदीप सक्‍सेना, रमेश कुमार मंचस्‍थ थे।

अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि हिंदी आलोचना में जिस तरह के साध्‍य की जरूरत है वह हिंदी में विरल होती जा रही है। रामविलास शर्मा ने जो श्रम और साधना की हिंदी आलोचना के लिए, उस परंपरा में एक मात्र हिंदी आलोचक प्रदीप सक्‍सेना दिखाई देते हैं। प्रदीप सक्‍सेना ने अपने इतिहास लेखन और आलोचना का कार्य रामविलास शर्मा की परंपरा का निर्वहन करते हुए किया है, वह इस सम्‍मान के हकदार हैं।  

स्‍वागत वक्‍तव्‍य में विभूति नारायण राय ने कहा कि प्रदीप सक्‍सेना आलोचना के महत्‍वपूर्ण हस्‍ताक्षर हैं। ‘अठारह सौ सत्‍तावन और भारतीय नवजागरण’ में इन्‍होंने मार्क्‍सवादी इतिहास-विज्ञान की तत्‍वमीमांसा को भारतीय परिवेश में ज्ञानमीमांसा में परिवर्तित कर उसका सार्थक उपयोग किया है। उन्‍होंने कहा कि इस वर्ष डॉ.रामविलास शर्मा जी का जन्‍म शताब्‍दी वर्ष है। विश्‍वविद्यालय में उनके नाम पर बने सड़क व साहित्‍य विद्यापीठ में लगाई गई प्रतिमा का अनावरण उनके सुपुत्र द्वारा किया गया। इस वर्ष प्रदीप सक्‍सेना जैसे मार्क्‍सवादी आलोचक को यह सम्‍मान दिया गया, इसके लिए उन्‍हें बधाई।

सुप्रसिद्ध साहि‍त्‍यकार प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि रामविलास जी ने हिंदी इतिहास लेखन की परंपरा का नए सिरे से मूल्‍यांकन किया है। उनके इतिहास लेखन में जो अंतर्विरोध हैं, उस पर बातचीत होनी चाहिए, किंतु इस बातचीत में हमें यह सावधानी बरतनी होगी कि हिंदी साहित्‍य में जो उन्‍होंने नई आलोचना दृष्टि दी है इस ओर भी हमें ध्‍यान देने की जरूरत है। वरिष्‍ठ साहित्‍यकार चौथीराम यादव ने कहा कि रामविलास शर्मा ने भाषा वैज्ञानिकों के परंपरागत भाषा संबंधी चिंतन से अलग हटकर क्षेत्रीय भाषा के महत्‍व को स्‍थापित किया। रामविलास जी के लेखन में हाशिए का समाज व चिंतन अनुपस्थित रहा है, इस पर पुर्नमूल्‍यांकन किए जाने की जरूरत है। 

अलीगढ़ विश्‍वविद्यालय से आए वक्‍ता रमेश कुमार ने कहा कि समकालीन हिंदी आलोचना में प्रदीप सक्‍सेना, अपनी निर्भ्रांत इतिहास चेतना और आलोचकीय विवेक से समय, समाज और संस्‍कृति के जन-विरोधी चिंतन का प्रतिपक्ष रचते हैं। प्रतिपक्ष की इस सर्जना में जो सौंदर्यशास्‍त्र निर्मित होता है, वह अपनी प्रकृति में बहुआयामी है। इस दौरान प्रदीप सक्‍सेना ने कहा कि स्‍वतंत्रता के समय राष्‍ट्रीय आंदोलन का जो स्‍वरूप था उसकी एक झलक यहां दिखाई पड़ती है। यह पुस्‍तकालय सांस्‍कृतिक नवजागरण का एक महत्‍वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है। आज पूरी दुनिया एक ध्रुवीय हो गई है। अमेरिका को दुनिया में जहां भी लाभ दिखता है, वहां वह सभी तरह की नीतियों में हस्तक्षेप कर अपनी बात मनवाता है। पहले हम साम्राज्‍यवादी ताकतों के सामने लड़ने को तत्‍पर रहते थे पर आज नव साम्राज्‍यवाद में कुछ छिपी ताकतें हमारे दिलों पर राज करती हैं। हरेक गांव में एक ऐसा ही सांस्‍कृ‍तिक केंद्र हो ताकि नव औपनिवेशिक ताकतों से मुकाबला किया जा सके।

साहित्‍यकार भारत भारद्वाज ने कहा कि राम विलास जी का मूल्‍यांकन होना बाकी है, पुर्नमूल्‍यांकन होना चाहिए। आलोचना साहित्‍य का विवेक है, आलोचक को विवेक का सम्‍मान करना चाहिए। रामविलास सम्‍मान प्रदीप जी को मिला है, आशा है कि आपनी आलोचकीय दृष्टि में साहित्‍य के विवेक को बनाए रखेंगे। महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी व आयोजक प्रो. संतोष भदौरिया ने प्रदीप सक्‍सेना के व्‍यक्तित्‍व एवं कृतित्‍व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इनके लेखन में विचार की प्रधानता है जो इनकी आलोचनात्‍मक सर्जना में अंतर्धारा की तरह प्रवहमान है।

डॉ. रामविलास शर्मा आलोचना सम्‍मान के संयोजक नरेन्‍द्र पुण्‍डरीक ने कहा कि यह सम्‍मान हिंदी के ऐसे ओलाचक को उत्‍साहित करने के लिए दिया जाता है, जिसकी आलोचना सामर्थ्‍य एक तरफ विभिन्‍न प्रकाशनों से पहचान में आयी है और दूसरी तरफ उसके पास अभी इतना समय बचा है जिससे वह पूरी तरह से विकसित कर सके। प्रगतिशील लेखक संघ, उ.प्र. के महासचिव संजय श्रीवास्‍तव ने संचालन किया और श्रीप्रकाश मिश्र ने आभार व्‍यक्‍त किया। इस अवसर पर हिना देसाई, सुधीर शर्मा, कांति लाल शर्मा, राकेश श्रीमाल, प्रो. बद्री प्रसाद, राम शकल पटेल, हरि मंदर पांडेय, डॉ. बी.के.पांडेय, अमित विश्‍वास, विनय भूषण, मनोज सिंह, डॉ.गुफरान अहमद खान, उदभ्रांत, हीरा लाल, ए.के.सिंह सहित बड़ी संख्‍या में पुस्‍तकालय के विद्यार्थी व हिंदी के सुधी जन उपस्थित रहे।

देखिए, ये है यूपी पुलिस का असली चेहरा

अखबार में प्रकाशित इस खबर को पढ़ जाइए…  यूपी पुलिस की बर्बरता और असंवेदनशीलता को खुद ब खुद जान जाएंगे…

सोचिए, कब सुधरेगी यूपी पुलिस? राज चाहें मायावती का हो या मुलायम का. सपा का हो या बसपा का. अखिलेश सीएम बनें या मायावती रहें. पुलिस वाले नहीं सुधरते तो नहीं सुधरते.

उपजा मुगलसराय ईकाई का गठन, वरिष्‍ठ पत्रकार सीबी सिंह बने संरक्षक

मुगलसराय : उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन मुगलसराय इकाई के अध्यक्ष राजेन्द्र प्रकाश यादव ने सोमवार को अपने इकाई का विस्तार करते हुए नई समिति गठित की। उन्‍होंने नवगठित इकाई के सदस्यों से उपजा के संविधान में दिये गये परिभाषा के अन्तर्गत कार्य करने की उम्मीद जताते हुए नगर इकाई का गठन किया। गठित इकाई में वरिष्‍ठ पत्रकार सीबी सिंह को संरक्षक बनाया गया है।

कमेटी में घनश्याम पाण्डेय उर्फ नन्हे, चन्द्रमौली केशरी, महेन्द्र कुमार प्रजापति, नितिन गोस्वामी को उपाध्यक्ष, राजेश शर्मा को महामंत्री, बृजेश कुमार, ललित पाण्डेय को मन्त्री, आशाराम यादव को प्रवक्ता, सुनील सिंह को संगठन मंत्री, सरदार रोशन सिंह को कोषाध्यक्ष व कृष्णा गोड़ मीडिया प्रभारी बनाया गया है। राजेंद्र यादव ने कहा कि उपजा के सदस्‍य पत्रकार हितों की रक्षा करने के साथ जनहित में भी कार्य करेंगे। उन्‍होंने बताया कि भीषण गर्मी में नगर के वीआईपी गेट के पास उपजा के सौजन्‍य से प्याउ केन्द्र लगाया जाएगा ताकि गर्मी में प्‍यासे लोगों को राहत मिल सके। उन्होंने कहा कि आगामी पत्रकारिता दिवस से लगायत नगर में सामाजिक कार्यों मे भी संगठन अपनी सहभागिता निभायेगी।

लखनऊ के पत्रकार संजय शर्मा ने यूं खोली मुख्यमंत्री के सचिव आलोक कुमार की पोल

केंद्र की प्रमुख योजना राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना में गरीबों को इलाज देने में किये गए भ्रष्टाचार को लेकर जिस तरह यूपी के मुख्यमंत्री के सचिव आलोक कुमार की वीकएंड टाइम्स के सम्पादक संजय शर्मा ने धुलाई की उसके लिए संजय शर्मा की जितनी भी तारीफ़ की जाये उतनी कम है. साथ ही लखनऊ की मीडिया भी बधाई की पात्र है कि उसने मुख्यमंत्री के सचिव का गरूर पल भर में ही निकाल दिया. इससे एक बात और साफ़ हो गई कि अगर पत्रकार किसी योजना की गहराई से पड़ताल करे तो अफसरों और नेताओ की पोल खुलते देर नहीं लगती. इस योजना में फर्जीवाड़े के खुलासे से यह भी साफ़ हो गया कि बड़े अफसर गरीबो के लिए आये रुपयों से अपना महल बनाने की कोई कोशिश नहीं छोड़ते.

इस योजना में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने बाले लोगों के इलाज के लिए केंद्र सरकार तीस हजार रूपया प्रति वर्ष देती है. मतलब अगर किसी गरीब के परिवार में कोई बीमार हो गया तो उसके तीस हजार रूपया तक का खर्च केंद्र सरकार उठाएगी. इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है. इसके लिए प्रदेश सरकार ने बीमा कंपनियों से टेंडर मांगे. प्रत्येक परिवार का कार्ड बनाने की दर 470 तय की गई. मतलब जो बीमा कंपनी जितने कार्ड बनाएगी उसे इसी दर से भुगतान दे दिया जायेगा. इसके लिए प्रत्येक परिवार को 30 रुपया देने होते है. इस कार्ड को दिखाने पर उसे तीस हजार तक का इलाज मुफ्त में मिल जाता है. इसके लिए अस्पतालों का चयन किया जाता है और यहीं से कमाई का खेल शुरू हो जाता है. बीमा कंपनी चाहती है कि कम से कम अस्पताल सूचीबद्ध हो जिससे उन्हें इलाज का पैसा अस्पतालों को नहीं देना पड़े. इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहती है.

यूपी के अफसरों ने इस साल फर्जीवाड़े के नए तरीके खोज लिये. प्रदेश में गरीबी रेखा से नीचे एक करोड़ से अधिक लोग रहते है. सरकार ने आंकड़े दे दिए कि उसने लगभग पचास लाख लोगों के कार्ड बना दिए. इस मेहनत के चलते यूपी को पिछले दिनों केरल में एवार्ड भी दिया गया. प्रदेश में इस योजना के प्रभारी आलोक कुमार है जो मुख्यमंत्री के सचिव भी है. उन्होंने अपनी वाहवाही लूटने के लिए स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन से कहा कि वह मीडिया के सामने इस एवार्ड को दे दें जिससे उनकी भी वाहवाही हो जाएगी. बेचारे आलोक कुमार ने सपने में भी नहीं सोचा था कि शाबासी की जगह उनकी जिंदगी भर की सबसे बड़ी किरकिरी होने जा रही है.

एनेक्सी में सभी मीडिया के लोगों को बुलाया गया. मंच पर स्वास्थ्य मंत्री के अलावा मुख्यमंत्री के सचिव आलोक कुमार, कृषि उत्पादन आयुक्त आलोक रंजन और प्रमुख सचिव स्वास्थ्य बैठे थे. शुरुआत में मंत्री जी ने पिछली सरकार को कोसा कि उस सरकार में योजना ठप्प हो गई थी, इस सरकार में आलोक कुमार जैसे अफसरों के कारण 48 लाख कार्ड बन गए. फिर एवार्ड लेते हुए फोटो खिंचवाये गए कि अगले दिन सभी अखबारों में यह फोटो छपे.

यहां तक सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था पर जैसे ही मंत्री जी चुप हुए, संजय शर्मा ने मानों बम फोड़ दिया. उन्होंने कहा कि आपको एवार्ड इसलिए मिला है क्योंकि आपने 48 लाख कार्ड बना दिए पर मेरी जानकारी में है कि एवार्ड पाने के लिए बड़ी संख्या में फर्जी कार्ड बनाये गए. हड़बड़ाये आलोक कुमार ने जैसे ही ऐसा कुछ होने से मना किया, संजय अपनी सीट से उठे और स्वास्थ्य मंत्री को ले जाकर सबूत दे दिया कि एक ही फोटो से एक ही आदमी के दस कार्ड बने हुए थे. पूरे हाल में सन्नाटा छा गया. आलोक कुमार और स्वास्थ्य मंत्री यह देख कर हैरत में पड़ गए.

घबराये आलोक कुमार ने बिना कागज देखे कहना शुरू कर दिया कि कुछ जगह इस तरह की शिकायत मिली है. बेचारे आलोक कुमार यहां तक कह गए कि राशन कार्ड भी पूरी तरह से सही नहीं बनाये जा सकते. उन्होंने अपनी तारीफ़ करते हुए कहा कि उन्होंने धांधली रोकने के लिए बहुत काम किया. बनारस में एक सौ पचास अस्पतालों में से एक सौ बीस अस्पतालों की सूचीबद्धता समाप्त कर दी जबकि पहले यह अस्पताल फर्जी क्लेम ले लेते थे. आलोक कुमार को अंदाजा नहीं था कि उनकी धज्जियाँ उड़ाने का सारा सामान संजय शर्मा के पास मौजूद है. संजय ने कहा कि आपने अपने दफ्तर की सज्जा पर बिना टेंडर के 2 करोड़ खर्च कर दिए और सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने पर कहते हैं कि ठेकेदार से ले लो. साथ ही संजय ने वो कागज भी पेश कर दिए जिसमे सूचना आयुक्त ने जानकारी न देने पर बीस हजार रुपया का दंड लगते हुए जिलाधिकारी को इसकी वसूली को लिखा था.

संजय ने कहा कि बीमा कंपनी तो इस बात के लिए करोड़ों रुपया खर्च करने को तैयार रहती है कि कम से कम अस्पताल सूचीबद्ध हों जिससे लोग इलाज न करा पाए और बीमा कंपनियों को करोड़ों का फायदा हो जाये. संजय ने कहा कि मुख्यमंत्री के भाई धर्मेन्द्र यादव बदायूं से सांसद है. इस जिले से एक भी प्राइवेट अस्पताल को इस साल सूचीबद्ध नहीं किया गया जबकि पिछले साल दस अस्पताल सूचीबद्ध थे.

संजय ने बाराबंकी के दो अस्पतालों का नाम बताते हुए कहा कि पहले इन अस्पतालों की सूचीबद्धता ख़त्म की गई और फिर उनसे पांच लाख लेकर एक महीने के भीतर उन्हें फिर सूचीबद्ध कर लिया गया. इन नामों को सुनकर आलोक कुमार तमतमा गए और बोले गलत बात है यह.

इस पर संजय ने पूछा कि आप बनारस समेत इतनी जगह धांधलियों की बात कर रहे हैं तो फिर कहीं भी एफ़आईआर क्यों नहीं लिखवाई? अब आलोक कुमार का धैर्य साथ छोड़ गया उन्होंने संजय से कहा- मैंने नहीं लिखवाई तो आप लिखा दो. यह सुनते ही संजय ने इसका कड़ा विरोध किया और कहा कि आपको ऐसे बोलने का हक़ नहीं है ..आईबीएन 7 के सत्यवीर सिंह, वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार, पीटीआई के चीफ प्रमोद गोस्वामी समेत बड़ी संख्या में पत्रकार उठ खड़े हुए और आलोक कुमार से कहा हम आपके स्टेनो नहीं हैं. अहमद हसन ने बीच बचाव का रास्ता निकालते हुए कहा कि आपको भी हमारी बात सुननी पड़ेगी तो पत्रकारों ने कहा कि हमारी ऐसी कोई मज़बूरी नहीं है. गर्मागर्मी इतनी बढ़ गई कि अहमद हसन के गनर भी अन्दर आ गए और इसके बाद पत्रकार वार्ता ख़त्म हो गई.

मगर इस घटना ने लखनऊ की मीडिया का नया चेहरा सामने ला दिया. अब तक मुख्यमंत्री के अफसरों को यह गुमान रहता था कि मीडिया उनके आगे पीछे घूमेगी मगर इस घटना ने उनका यह भ्रम तोड़ दिया. साथ ही यह भी दिखा दिया कि यूपी के अफसर इतने बेलगाम हो गए हैं कि मंत्री के सामने वह घोटाले खोलने वाले पत्रकार से कह सकते हैं कि एफआईआर पत्रकार लिखवा दे. मगर संजय ने जिस तरह इस स्कीम के दस्तावेज इकट्ठे किये वह इस बात का सबूत है कि थोड़ी सी मेहनत करके अफसर को उनकी औकात बताई जा सकती है भले वह मुख्यमंत्री का सचिव क्यों न हो.

प्रेस कांफ्रेंस से संबंधित वीडियो यहां क्लिक कर देख सकते हैं..

http://www.bhadas4media.com/video/viewvideo/700/society-concern/ias-alok-ki-pc-aur-journalist-sanjay-ke-sawaal.html

पत्‍नी को पहले मारकर अधमरा किया, फिर फांसी पर लटका दिया

हमीरपुर के थाना जलालपुर ग्राम कुरैनी में पति ने महिला को इतना मारा कि उसकी हालात मरणासन्न जैसी हो गई। फिर लोगों की डर से उसे फांसी पर लटका फरार हो गया। सूचना पाकर मौके पर पहुँची पुलिस व महिला के मायके के पक्ष के लोगों ने शव को नीचे उतरवाया। इसके बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया। महिला के मायके के लोगों ने उसके पति विनोद पर उसे जान से मारने का आरोप लगाया है।

उन्होंने बताया कि विनोद उसे कई दिनों से दहेज के लिए प्रताडि़त कर एक लाख रुपये व एक मोटरसाइकिल की माँग कर रहा था। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। विनोद की गिरफ्तारी के लिए कई स्‍थानों पर छापेमारी की जा रही है।

Print media not making money online, says expert

Kolkata :   Jawhar Sircar, CEO, Prasar Bharati on Saturday expressed concern over the news media industry’s prospects of revenue generation via the internet platform. According to him, even as the industry was looking to the online and digital platform for sustainability, online content accounted for less than five per cent of the total advertisement revenues.

“The print media organisations are not making money online. It is the morning newspaper that is still giving them money,” Sircar said here.

He, however, pointed out that the film industry has found a way out by way of selling rights on the digital platform. Sircar was addressing a seminar on the future of the print and electronic media, organised by the Indian Chamber of Commerce.

According to him, the non-mobile online advertisement revenue stood at nearly Rs 2,000 crore in 2011-12. Citing examples of increasing online and digital access for news, he said the number of internet users would touch 873 million in the country by 2017, as against a TV viewership of 496 million.

By then, Sircar added, there would be approximately 241 million internet-enabled smartphones. He was of the view that the next major shift of viewership would be from fixed TV to hand-held devices.

साभार : द हिंदू

प्रसार भारती वसूलेगी निजी चैनलों से शुल्‍क

नई दिल्ली. प्रसार भारती निजी चैनलों पर शुल्क लगाने और घरों में इस्तेमाल होने वाले टीवी सेटों पर लाइसेंस फीस वसूलने पर विचार कर रही है. गांवों में टेलीफोन उपलब्ध कराने के लिए सरकार टेलीकॉम सेक्टर पर यूएसओ यानि सार्वभौमिक सेवा दायित्व कोष शुल्क की तरह प्रसार भारती को घाटे से उबारने के लिए निजी चैनलों पर शुल्क लगाने और घरों में इस्तेमाल होने वाले टीवी सेटों पर लाइसेंस फीस वसूलने पर विचार कर रही है.

विचार यह भी है कि दूरदर्शन के जो चैनल नहीं दिखाई दे रहे हैं, उन्हें बंद कर दिया जाए और दूरदर्शन और आकाशवाणी के प्रमुख स्थानों की संपत्ति का व्यावसायिक उपयोग किया जाए. दूरदर्शन के टैरेस्ट्रियल ट्रांसमिशन को बंद करने का भी प्रस्ताव है. प्रसार भारती के पुनगर्ठन को लेकर प्रधानंमत्री ने सैम पित्रोदा की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ कमेटी का गठन किया है. कमेटी की पहली बैठक हो चुकी है. बैठक में जिन प्रस्तावों पर चर्चा हुई है, उन पर शिवराज पाटिल के समय भी चर्चा थी. गृह मंत्री रहते हुए पाटिल को जीओएम का प्रमुख बनाया गया था, लेकिन उन्होंने कोई निर्णय नहीं लिया.

प्रस्ताव के अनुसार जिस तरह से ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीकॉम सेवा उपलब्ध कराने के लिए यूएसओ फंड एकट्ठा किया जाता है, उसी तरह से दूरदर्शन और आकाशवाणी को दूरदराज के इलाकों में पंहुचाने के लिए प्रसारण क्षेत्र पर शुल्क लगाया जाए यानि पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग शुल्क वसूला जाए. दूरदर्शन के छह राष्ट्रीय चैनलों के अलावा 11 क्षेत्रीय चैनल हैं. ये सभी घाटे में चल रहे हैं. प्रसार भारती को स्वायत्त बनाने के बावजूद इन्हें केंद्र सरकार के खजाने से मदद देनी पड़ती है.

दूसरा प्रस्ताव है कि दूरदर्शन के उन चैनलों का प्रसारण बंद किया जाए जिन्हें देखने वाला कोई नहीं. डीडी न्यूज, डीडी भारती, डीडी इंटरनेशनल व डीडी स्पोर्ट्स के बारे में दोबारा सोचे जाने की जरूरत है. तीसरा प्रस्ताव है कि दूरदर्शन की संपत्ति का व्यावसायिकरण किया जाए. दूरदर्शन के पास करोड़ों रुपए की जमीन है. इस पर लोगों की नजर लगी हुई है. सैम पित्रोदा ने इसी तरह का सुझाव रेलवे को दिया था, जिस पर काम शुरू हो गया है.

एक प्रस्ताव है कि दूरदर्शन के टैरेस्ट्रियल ट्रांसमिशन को बंद किया जाए. एक जमाने में घरों की छत्तों पर टीवी के एंटीना देखे जाते थे. दूरदराज के इलाकों में इन्हें अब भी देखा जा सकता है. चूंकि अब डिजिटलीकरण अनिवार्य हो गया है और हर घर में टीवी देखने लिए सेटटॉप बाक्स की जरूरत है, ऐसे में टैरेस्ट्रियल ट्रांसमिशन बेकार हो गया है. (पीपीआई)

अनुरंजन झा का शादी-बियाह वाला चैनल इसी 26 तारीख को लांच होगा

कभी पत्रकार रहे और आजकल एक शादी-बियाह वाले चैनल शगुन के हेड अनुरंजन झा ने शगुन टीवी को 26 अप्रैल को लांच करने की घोषणा कर दी है. चैनल में मैट्रीमोनियल और लाइफ स्टाइल कॉन्सेप्ट पर खास फोसक रहेगा. बाद में देश भर में ब्रांच स्थापित किया जाएगा.

अनुरंजन झा ने बताया कि उनकी कोशिश है कि शादी नामक संस्कार को मनोरंजन से जोड़कर देखा जाए. चैनल के बाद जल्द ही शगुन नाम से मैग्जीन भी शुरू करेंगे. चैनल का डीटीएच पर वीडियोकान के साथ करार हो चुका है.

पीसीआई अध्यक्ष के बतौर काटजू के नाकारापन का सुबूत ये रहा

आरटीआई एक्टिविस्ट सुभाष अग्रवाल ने आरटीआई से पूछा कि प्रेस काउंसिल के पास पेड न्यूज की जो शिकायतें आती हैं, काउंसिल उन पर क्या ऐक्शन लेता है? इसके जवाब में काउंसिल की तरफ से कहा गया है कि ज्यादातर शिकायतों पर काउंसिल की तरफ से काम होता है, लेकिन उन्हें लंबे समय तक अनुसरण नहीं किया जाता इसलिए शिकायतों पर कोई कार्यवाही नहीं हो पाती.  भ्रामित करने वाले विज्ञापनों की शिकायतों पर एक्शन के सवाल पर जवाब दिया गया कि ऐसे मामलों को कुछ सेटेलमेंट के बाद बंद कर दिया जाता है.

आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल कहते हैं कि यह दोनों ही स्थितियां मीडिया और समाज के लिए खतरनाक है. प्रेस काउंसिल अध्यक्ष खुद को लोगों को क्षमादान दिलाने में व्यस्त रख रहे हैं. आरटीआई से पता चलता है कि काउंसिल अपने महत्वपूर्ण कामों को नजरअंदाज कर रही है. तो ये है काटजू का असली चेहरा. उनके बारे में अब कहा जा सकता है कि काटजू के खाने के दांत और दिखाने के दांत अलग अलग हैं. यानि वे सिर्फ बयान वीर और विवाद वीर हैं. वे ठोस काम करना पसंद नहीं करते. यही कारण है कि वे प्रेस काउंसिल का अध्यक्ष बनने के बाद से मीडिया फील्ड में कोई खास सक्रियता नहीं दिखा पाए. बस, बयानों के जरिए वह सुर्खियां बटोरते रहे.

भोपाल श्रमजीवी पत्रकार संघ भोपाल इकाई का गठन

मध्य प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष साथी शलभ भदौरिया के निर्देश पर और प्रांतीय उपाध्यक्ष साथी के.के.अग्निहोत्री की अनुशंसा पर भोपाल संभाग इकाई के अध्यक्ष साथी आशीष दुबे की सहमति से भोपाल श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष अरशद अली खान ने नवगठित कार्यकारिणी की घोषणा इस प्रकार की है।

कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष सर्वश्री के.सी.दुबे, श्रीमती अंजना गुप्ता, जी.पी.अधिकारी, इदरीस अहमद, बनालाल सिंह राजपूत, डॉ.एन.बी.राज, जे.के.शुक्ला, महासचिव श्री अपिर्त सिकरवार, सचिव श्रीमती शशिकांता नामदेव, संयुक्त सचिव ओ.पी.चौरसिया, कैलाश मालवीय, अशोक चौरसिया, नीरज पांडे, नवीन शर्मा, ए.के.भदौरिया और कोषाध्यक्ष प्रेम कुशवाह तथा कार्यसमिति सदस्य श्री दिलीप मालवीय, रमेश कुमार निगम, डॉ.एम शाहिद, अमित डेनियल, राकेश व्यास,परिक्षित निर्भय, इज़हार हसन, सुनील सिंह, नाथूसिंह सोमवंशी शामिल हैं। 

अरशद अली खान
अध्यक्ष

हिंदुस्तान में तो यह खबर छप गई, दैनिक जागरण व अमर उजाला में नहीं, आखिर क्यों?

यशवंत जी नमस्कार , आज हिंदुस्तान बरेली में प्रष्ठ तीन पर एक खबर प्रकाशित हुई है 'जांच में फेल हुई किप्स की बर्फी '. ये खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्यूंकि 'किप्स ' बरेली शहर का एक बड़ा हलवाई ब्रांड है . इनकी दो या इससे अधिक मिष्टान्न की दुकाने हैं , एक बड़ी क़िराने  की दुकान है जिसे ये सुपर मार्केट  कहते हैं , अपने नाम का बिस्कुट नमकीन आदि भी बेचते हैं, कुल मिला के बड़े हलवाई हैं .

गत वर्ष नवम्बर में इनकी हलवाई की दूकान से सैम्पल भर लिया गए थे , अब उनकी रिपोर्ट आई है . रिपोर्ट कहती है के किप्स हलवाई अपने ग्राहकों को बर्फी पे एल्युमिनियम की वर्क लगा के बेचते / खिलाते हैं और झूठ बोलते हैं के वर्क चांदी की है . दूसरा इनकी बनाई बर्फी में सिंथेटिक रंग भी पाया गया . मतलब काम गैर कानूनी हैं बरेलीवासियों के विश्वास से छल कर रहे हैं किप्स हलवाई .

अब मसला ये है के उपरोक्त खबर हिंदुस्तान में तो छप गयी . दैनिक जागरण व अमर उजाला में नहीं छपी. शहर के इतने बड़े हलवाई की कारगुजारी की खबर और शहर के दो प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में न छपे इसके कारण मामूली नहीं हो सकते . कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है .

खबर प्रमादवश छूट गयी या के किसी अन्य कारणवश नहीं छापी गयी…….गोया के खबर मैनेज कर ली गयी .  इस प्रकार खबरों का मैनेजमेंट भी 'पेड न्यूज़ ' का एक प्रकार है . जैसे के जिला स्तर पे जब कोई पत्रकार किसी स्वास्थ्य सम्बन्धी खबर में किसी डाक्टर का नाम डालता है तो इसका अर्थ है के उस डाक्टर के क्लीनिक / अस्पताल में उस पत्रकार को उत्तर प्रदेश मंत्री-मण्डल के 8 अप्रैल के फैसले के अनुरूप PGI सामान फ्री सुविधाएं मिलेंगी . इसी प्रकार यदि किसी खबर में जहां नाम आना चाहिए वहां नाम न डाला जाए इसका भी फल उपरोक्तानुसार होगा . कहने का अर्थ ये के पत्रकार का लिखा तो निष्फल होता ही नहीं उसका अन-लिखा भी निष्फल नहीं होता …….

मैं जानता हूँ ये एक ऐसा रोग है जो फिलहाल लाइलाज है. लेकिन ऐसे नंग-सहफियों का नाम उजागर होते रहना चाहिए ……..पता हो तो बताइएगा …..कौन हैं  और कितने में बिके ….एक लड्डू में या के एक किलो में या के…….

खबर संलग्न है…

एक आम पाठक हूं…..अपना नाम  ज़ाहिर करनें का इच्छुक नहीं. आप प्रकरण वेरीफाई करा लें.


भड़ास4मीडिया के पास भेजे गए एक पत्र पर आधारित.

सजायाफ्ता मुलजिमों के पक्ष में खड़े काटजू को पीसीआई अध्‍यक्ष पद से हटाया जाए

प्रेस काउन्सिल अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू के कई लोमहर्षक और गंभीर अपराधों के सजायाफ्ता मुज्लिमों के पक्ष में खड़े होने के बाद लखनऊ स्थित सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर और देवेन्द्र कुमार दीक्षित ने भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री को प्रत्यावेदन भेज कर उन्हें तत्काल पद से हटाये जाने की मांग की है.

अपने प्रत्यावेदन में उन्होंने कहा है कि प्रेस काउन्सिल अध्यक्ष को सरकार द्वारा निश्चित वेतन दिया जाता है और प्रेस काउन्सिल एक्ट की धारा 24 के अनुसार वह लोक सेवक है. .इसके विपरीत काटजू लगातार अपने पद का दुरुपयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा अत्यंत गंभीर राष्ट्रविरोधी और आतंकी अपराधों से जुड़े मामलों में सजायाफ्ता लोगों के पक्ष में खड़े हो रहे हैं.

याचीगण के अनुसार यद्यपि उन्हें एक नागरिक के रूप में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है पर एक लोक सेवक के रूप में उन पर बंदिशें भी हैं. उनका कृत्य और भी अधिक गंभीर है क्योंकि वे पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज हैं और अकसर अपने नाम के साथ जस्टिस शब्द लगाए दिखते हैं. प्रेस काउन्सिल के वेबसाईट और उनके ब्लॉग “सत्यम ब्रूयात” पर भी जस्टिस काटजू शब्द का प्रयोग होता है. अतः उनके द्वारा 1993 दिल्ली बम विस्फोट, जिसमे 9 लोग मारे गए थे और 17 घायल हुए थे, के अभियुक्त देविंदर पाल सिंह भुल्लर और 1993 के मुंबई बम कांड के दोषी संजय दत्त और जैबुन्निसा काजी के पक्ष में खडा होना और उनका पक्ष लेना एक लोक सेवक के रूप में कदाचरण है.

नूतन और दीक्षित ने निवेदन किया है कि यदि काटजू इस प्रकार के जघन्य अपराधों के दोषी लोगों के लिए लड़ना चाहते हैं तो उन्हें प्रेस काउन्सिल से मुक्त कर देना चाहिए ताकि वे बिना सरकारी पद का लाभ उठाये और बिना जस्टिस शब्द का प्रयोग किये देश के नागरिक के रूप में ऐसा करें.

नीतीश ने कर दिया मोदी को ‘रेस’ से बाहर करने का खेल!

अंतत: नीतीश कुमार ने वही कर डाला, जिसकी तैयारी वे महीनों से कर रहे थे। यहां जदयू के दो दिवसीय सम्मेलन में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पूरी तरह छाए रहे। उन्होंने बड़ी राजनीतिक होशियारी से भाजपा नेता नरेंद्र मोदी की राह में निर्णायक अंडगा लगाने का खेल कर दिया है। मोदी का बगैर नाम लिए हुए उन्होंने कह दिया है कि प्रधानमंत्री पद के लिए ऐसा ही उम्मीदवार उनकी पार्टी को स्वीकार्य होगा, जिसका चाल-चरित्र सेक्यूलर हो और वह पूरे देश को जोड़े रखने की कूवत रखता हो। भाजपा नेतृत्व को थोड़ी राहत देते हुए जदयू नेतृत्व ने पीएम उम्मीदवार के फैसले के लिए पर्याप्त समय दे दिया है। ऐलान कर दिया है कि भाजपा नेतृत्व इस साल दिसंबर तक यह बता दे कि ‘पीएम इन वेटिंग’ के लिए उनका चेहरा कौन होगा?

मोदी का बगैर नाम लिए हुए नीतीश ने तमाम राजनीतिक तीर चला डाले। जिन मुद्दों को लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सफलताओं का ढिंढोरा पीटते घूम रहे हैं, उन्हीं को लेकर नीतीश ने एक-एक करके धुनाई कर डाली। कह दिया कि देश को ऐसा प्रधानमंत्री चाहिए, जो कि समावेशी विकास का पैरवीकार हो और पूरे देश को एकता के सूत्र में बांधने की काबिलियत रखता हो। सभी धर्मों के लोग उस पर विश्वास कर सकें। इसके साथ ही वह अपने चरित्र में पूरी तरह से धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांतों को मानने वाला हो। जाहिर है, मोदी ने पीएम उम्मीदवारी के लिए जो कसौटियां सामने रख दी हैं, उनमें मोदी खरे नहीं उतर सकते। जबकि, भाजपा में पीएम उम्मीदवारी के लिए मोदी एक बड़े दावेदार बनकर उभरे हैं। संघ का नेतृत्व भी उन्हें ताकत देने में लगा है। कोशिश हो रही है कि मोदी को आगे करके एक बार फिर हिंदुत्व से जुड़े मुद्दे आगे कर दिए जाएं। ताकि, भाजपा के पक्ष में राजनीतिक माहौल बन जाए।

इस राजनीतिक अभियान में मोदी भी जुट गए हैं। वे देश के अलग-अलग हिस्सों में दौरा करके यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके गुजरात का विकास मॉडल देशभर में नायाब है। पिछले 10 सालों में उनकी सरकार ने गुजरात में जिस तरह का विकास किया है। इस मॉडल से पूरे देश का भाग्य बदला जा सकता है। पिछले दिनों मोदी ने उद्योगपतियों के मंचों से भी अपने विकास मॉडल को लेकर बड़े-बड़े दावे किए थे। यह बताने की कोशिश की थी कि उनके पास पूरे देश का विकास कर देने की कूवत है। क्योंकि, अपने विकास मंत्र की कामयाबी वे गुजरात में देख चुके हैं।

भाजपा के अंदर मोदी का कद काफी बढ़ गया है। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह लगातार घोषणा कर रहे हैं कि मोदी देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं। ऐसे में, भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति में उनकी बड़ी भूमिका जरूर रहेगी। जाहिर है कि वे संकेत दे रहे हैं कि ‘पीएम इन वेटिंग’ के लिए मोदी सबसे मजबूत दावेदार हैं। हालांकि, वे यह भी कहने से नहीं चूकते कि इस मुद्दे पर सही समय पर संसदीय बोर्ड ही फैसला लेगा। लेकिन मोदी के सवाल पर भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए में रार खड़ी हो गई है। खास तौर पर जदयू ने मोदी के नाम पर दबाव बढ़ा दिया है। भाजपा नेतृत्व को अगाह कर दिया है कि उन्हें किसी कीमत पर मोदी का नाम हजम नहीं हो सकता।

मोदी को लेकर जदयू और भाजपा के बीच पिछले छह महीने से रस्साकसी तेज है। शनिवार और रविवार को जदयू की कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की यहां बैठक हुई। इस बैठक में मोदी का मुद्दा ही छाया रहा। कयास लगाए जा रहे थे कि नीतीश की लॉबी राजनीतिक प्रस्ताव में मोदी का नाम लेकर एक दम रास्ता रोकने की पहल कर देगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इतना जरूर है कि मोदी का नाम लिए बगैर नीतीश ने अपने भाषण में मोदी की खिलाफत पर जमकर निशाने साधे। यह बताने की कोशिश कर डाली, कि गुजरात का विकास मॉडल जरूरी नहीं है कि पूरे देश के लिए उपयुक्त बैठे। उन्होंने बातों-बातों में ही कह दिया कि बिहार का विकास मॉडल कई मायनों में बेहतर है। देश के जितने पिछड़े राज्य है, वे बिहार के विकास मॉडल से काफी सबक ले सकते हैं। जबकि, गुजरात का मॉडल कई मायनों में एकांगी है।

नीतीश ने मोदी की कार्यशैली पर जमकर कटाक्ष कर डाले। कह दिया कि देशभर में घूम-घूम कर हवा बनाने से कोई काबिल नेता नहीं बन जाता।   उल्लेखनीय है कि पिछले साल गुजरात में सद्भावना यात्रा के दौरान मोदी को एक मौलाना ने सम्मान के रूप में इस्लामी गोल टोपी पहनाने की कोशिश की थी, तो मोदी ने टोपी पहनने से इनकार कर दिया था। यह दृश्य टीवी की लाइव कवरेज से पूरे देश ने देखा था। इसको लेकर यह चर्चा भी हुई थी कि भले दिखावे के लिए मोदी यह कहते हों कि वे मुसलमानों को भी साथ लेकर चलने की राजनीति करते हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने टोपी का तिस्कार किया, उससे कुछ और ही संदेश जाता है। इसी वाकये की याद दिलाते हुए नीतीश ने कल कटाक्ष कर दिया कि देश को जोड़ने की राजनीति के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है। जरूरत पड़ने पर टोपी भी पहननी पड़ती है।

दरअसल, जदयू के नेताओं की चिंता अपने मुसलिम वोट बैंक की है। बिहार में भाजपा और जदयू की गठबंधन सरकार है। दोनों पार्टियों के बीच पिछले 17 सालों से राजनीतिक गठबंधन है। भाजपा का साथ निभाने के बावजूद जदयू के नेता यह दावा करते रहते हैं कि उन्होंने धर्म-निरपेक्षता के मुद्दों पर कोई समझौता नहीं किया और न आगे करेंगे। नीतीश ने यह भी याद दिलाया कि देश के लिए अटल बिहारी वाजपेयी जैसी उदार राजनीतिक दृष्टि जरूरी है। अटल जी हमेशा राजधर्म का पालन होने पर जोर देते थे। उल्लेखनीय है कि 2002 में गुजरात में हुए भयानक दंगों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को कहा था कि उन्हें राजधर्म का पालन करना चाहिए। उनका यह जुमला बहुचर्चित हुआ था। इसी की याद नीतीश दिला गए। उन्होंने परोक्ष रूप से इशारा कर दिया कि वाजपेयी की नजर में भी मोदी राजधर्म का पालन करने वाले नेता नहीं रहे हैं।

नीतीश ने साफ तौर पर पाला खींचते हुए कह दिया कि अभी तक एनडीए गठबंधन का रास्ता ठीक-ठाक रहा है। क्योंकि, भाजपा नेतृत्व अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं के रास्ते पर चलती रही है। लेकिन, अब कुछ लोग रास्ता बदलने की कोशिश कर रहे हैं। यदि रास्ता बदल गया, तो गठबंधन में कठिनाई जरूर बढेÞगी। नीतीश के अलावा कई और नेताओं ने मोदी के मुद्दे पर कड़े तेवर दिखाए। पार्टी अध्यक्ष शरद यादव ने जो कुछ कहा, उसका लब्बोलुआब यही रहा कि उन्हें भाजपा तो स्वीकार है, लेकिन मोदी का नेतृत्व नहीं। शरद ने साफ-साफ कह दिया कि उनकी पार्टी किसी कीमत पर धर्म-निरपेक्षता से समझौता नहीं करेगी। यह कोशिश अंतिम समय तक करेगी कि गठबंधन न टूटे। लेकिन, बात सिद्धांत की आ जाएगी, तो उनकी पार्टी झुककर कोई समझौता नहीं करेगी।

बीच-बीच में इस तरह की राजनीतिक कयासबाजी होती रही है कि नीतीश कुमार भी अपने को पीएम उम्मीदवार मानकर चलते हैं, इस संदर्भ में भी नीतीश ने खुलकर चुटकी ली। कह दिया कि वे मुगालते में रहने वाले नेता नहीं है। अच्छी तरह जानते हैं कि अपनी छोटी राजनीतिक ताकत से वे देश के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। यदि ऐसी कोशिश करेंगे, तो उनका भी वही हाल होगा, जो देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, चौ. चरण सिंह व चंद्र शेखर जैसों का हुआ था। उन्होंने साफ कर दिया कि वे पीएम की रेस में नहीं हैं। लेकिन, पीएम बनाने में अपनी भूमिका निभाना जरूर चाहते हैं। उनकी कोशिश रहेगी कि इस पद के लिए कोई गैर-सेक्यूलर चेहरा रेस में आगे न आ पाए।

जदयू के नेता एवं बिहार सरकार में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह कहते हैं कि उनकी पार्टी ने दो दिन की बैठक में यह साफ-साफ संदेश दे दिया है कि उसको मोदी जैसा विवादित शख्स ‘पीएम इन वेटिंग’ के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता। भाजपा में लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे कई दिग्गज नेता हैं। इनके सामने मोदी वैसे भी पांचवें-छठवें नंबर के नेता हैं। गठबंधन धर्म निभाने के लिए सभी घटकों को एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना पड़ता है। उन्हें उम्मीद है कि भाजपा नेतृत्व उनकी पार्टी की भावनाओं का सम्मान करेगा। ऐसे में ही एनडीए की एकता बरकरार रह सकती है।
बिहार भाजपा के नेता एवं नीतीश सरकार में कैबिनेट मंत्री गिरीराज सिंह कहते हैं कि उनकी पार्टी को नीतीश कुमार से मोदी के लिए किसी सर्टिफिकेट की दरकार नहीं है। मोदी, सेक्यूलर थे और सेक्यूलर हैं। अब यह बात जदयू के नेताओं को समझ में नहीं आ रही है, तो इसमें भाजपा का क्या कसूर है? भाजपा नेताओं की कोशिश थी कि जदयू की बैठक में जो राजनीतिक प्रस्ताव आए, उसमें मोदी प्रकरण की चर्चा न हो। शनिवार की रात नीतीश कुमार और भाजपा नेता अरुण जेटली की मुलाकात हुई थी। इसके बाद नीतीश ने भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह से भी मुलाकात की थी। समझा जाता है कि इन मुलाकातों के बाद नीतीश ने मोदी के मुद्दे पर रणनीतिक रूप से अपना रुख कुछ नरम कर लिया। इसी के चलते रविवार को जब पार्टी का राजनीतिक प्रस्ताव आया, तो इसमें साफ तौर पर मोदी का जिक्र नहीं किया गया। बस, इतना ही कहा गया कि पार्टी को ‘पीएम इन वेटिंग’ के लिए सेक्यूलर नजरिए वाला शख्स ही स्वीकार्य होगा। यानी, बगैर नाम लिए हुए मोदी को रेस से हटाने का पूरा इंतजाम जदयू नेतृत्व ने कर डाला है।

सहयोगी घटक की इस पहल को लेकर मोदी के समर्थकों में अंदर ही अंदर काफी उबाल है। पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सीपी ठाकुर कहते हैं कि जदयू के कुछ नेता जिस तरह से मोदी के मामले में अनावश्यक बखेड़ा खड़ा कर रहे   हैं, यह गठबंधन धर्म के अनुकूल नहीं है। इसके जवाब में जदयू के सांसद साबिर अली कहते हैं कि सिद्धांत के आगे गठबंधन धर्म की कोई कीमत नहीं है। हमारी पार्टी को ‘पीएम इन वेटिंग’ के लिए मोदी का नाम कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता। यह बात हम लोग डंके की चोट पर कह रहे हैं। इसमें अब कुछ छिपा-लुका नहीं है। भाजपा नेतृत्व के पास दिसंबर तक का समय है वे अपना फैसला सोच-समझ कर बता दें। हमने तो अपनी बात रख दी है।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

कोर्ट ने सुनाया फैसला – विदेशी पत्रकारों के लिए मिलेंगी सीटें

एनएसयू मुकदमे में विदेशी पत्रकारों के लिए सीट रखने पर हफ्तों के विवाद के बाद अब जर्मन संवैधानिक अदालत ने फैसला सुनाया है और तुर्की के पत्रकारों के लिए जगह रखने का आदेश दिया है. म्यूनिख के हाईकोर्ट और मीडिया के बीच हफ्तों चले विवाद के बाद जर्मनी में अपनी तरह के इस अनोखे मामले का अंत हो गया है. तुर्क दैनिक सबह ने संवैधानिक अदालत में अपील की थी. संवैधानिक अदालत ने फैसला सुनाया है कि एनएसयू मुकदमे के दौरान तुर्की और ग्रीस के पत्रकारों को उचित संख्या में जगह दी जानी चाहिए.

अदालत का कहना था कि ऐसा नहीं होने पर मीडिया संस्थानों के बराबरी के अधिकार का हनन होगा. जर्मनी के तकरीबन सभी राजनीतिक दलों के प्रमुख नेताओं ने इस फैसले का स्वागत किया है. बॉन यूनिवर्सिटी के राजनीतिशास्त्री टिलमन मायर कहते हैं, "जर्मनी ने कानून सम्मत राज्य के रूप में अच्छा प्रभाव छोड़ा है, एक समस्या थी और कानूनी राज्य ने उसका हल निकाला." इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा, "निश्चय ही यह एक समस्या है कि फैसले में इतना वक्त लगा."

काफी नहीं पचास कुर्सियां : इसके पहले तुर्की और ग्रीस के पत्रकारों को मुकदमा देखने की अनुमति नहीं मिली थी क्योंकि उन्होंने फटाफट इसके लिए अर्जी नहीं दी थी. तुर्की की मीडिया की इस मुकदमे में काफी दिलचस्पी है क्योंकि एनएसयू के आतंकवादियों के हाथों मारे गए दस लोगों में 8 तुर्क मूल के थे. म्यूनिख हाईकोर्ट, जहां संदिग्ध आतंकवादी बेआटे चैपे और उसके चार साथियों के खिलाफ मुकदमा चलेगा, तुर्की या ग्रीस के पत्रकारों को अदालत में कुर्सी देने को तैयार नहीं था. चैपे पर उग्रदक्षिणपंथी आतंकी गिरोह नेशनल सोशलिस्ट अंडरग्राउंड (एनएसयू) के हाथों हुई हत्याओं में शामिल होने का आरोप है.

अदालत में 100 कुर्सियां हैं जिनमें से 50 को हाईकोर्ट ने मीडिया के प्रतिनिधियों को बांटा था. अदालत के अनुसार कुर्सियां का बंटवारा अर्जियों के आने के आधार पर किया गया. पहले अर्जी देने वाले पत्रकारों को पहली 50 कुर्सियां मिल गई, जिंहोने बाद में अर्जी दी उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा. कुर्सी पाने में सफल रहने वाले मीजिया संस्थानों में तकरीबन सभी जर्मन मीडिया के थे. उनमें सार्वजनिक रेडियो स्टेशनों के ही छह लोग थे.

अदालत में सीटों का बंटवारा करने के लिए विंडहुंड सिद्धांत अपनाया गया. टिलमन मायर का कहना है कि इस सिद्धांत के अनुसार पहले आओ पहले पाओ के आधार पर जो पहले आता है, उसे पहले सीट मिली. यह जर्मन अदालतों में पत्रकारों के लिए सीट बांटने की सामान्य प्रक्रिया है. मायर कहते हैं, "इसकी शर्त यह है कि सबके लिए शुरुआती परिस्थितियां एक हों, लेकिन इस मामले में लगता है कि ऐसा नहीं था."

तुर्की के पत्रकार समय से अर्जी नहीं दे पाए, लेकिन ऐसा हुआ कैसे कि विंडहुंड सिद्धांत का उन्हें नुकसान उठाना पड़ा? मायर कहते हैं कि तुर्क पत्रकारों ने बार बार अदालत के प्रेस ऑफिस से पूछा कि अर्जी लेने की शुरुआत कब से होगी और उन्हें बताया गया कि अभी उसका समय नहीं आया है. जब अर्जी लेने की शुरुआत की गई तो इसका सभी पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को पता नहीं था.

अपील का डर : मुकदमे में हिस्सा लेने की अर्जी देने में देरी के बावजूद अब तुर्की के पत्रकार मुकदमे को करीब से देख पाएंगे और उस पर रिपोर्ट कर पाएंगे. मायर इससे सहमत नहीं हैं कि सीटों के बदले बंटवारे के कारण मुकदमे को चुनौती दी जा सकती है, "दरअसल उल्टा है, क्योंकि इसका आधार रखा गया है कि मुकदमे को चुनौती देने वाली याचिका सफल नहीं होगी." उनका कहना है कि संवैधानिक अदालत ने निगरानी की अपनी भूमिका निभाई है और पूरी तरह साफ है कि एक निष्पक्ष मुकदमा चलेगा.

मायर कहते हैं, "उसके पीछे स्वाभाविक रूप से प्रतिष्ठा का सवाल है. कहा जा सकता है कि जर्मनी यहां विश्व के सामने खराब परिस्थिति में होगा यदि वह निष्पक्षता की गारंटी नहीं देगा. इसलिए राजनीतिक रूप से भी संवैधानिक अदालत से अपेक्षाएं थीं और वह इस मामले में फैसला लेने वाला अंतिम संस्थान था."

मुकदमे की शुरुआत इस हफ्ते बुधवार को होने वाली थी. क्या सचमुच उस दिन मुकदमा शुरू हो पाएगा, यह साफ नहीं है. मायर का कहना है कि यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि बाकी की जगहें कैसे बांटी जाएंगी. संवैधानिक अदालत ने अपने फैसले में हाईकोर्ट को सीटों के बंटवारे पर ठोस निर्देश नहीं दिए हैं. इसलिए संभव है कि विदेशी पत्रकारों को तीन अतिरिक्त जगहें दी जाएं. इसका फैसला हाई कोर्ट को करना होगा. अतिरिक्त सीटों को लॉटरी के जरिए बांटा जा सकता है या फिर पहले अपनाए गए विंडहुंड सिद्धांत के आधार पर.

मायर कहते हैं कि यदि सुनवाई वाले कमरे में तीन अतिरिक्त सीटें लगा दी जाएं तो कोई समस्या नहीं होगी. "लेकिन यदि सभी सीटों का फिर से बंटवारा किया जाएगा तो मुझे संदेह है कि यह थोड़े समय में संभव होगा." वैसी स्थिति वे पत्रकार अपील कर सकते हैं जिन्हें पिछले बंटवारे में जगह मिली थी, लेकिन नए बंटवारे में उन्हें खाली हाथ रहना पड़ेगा. (डीडब्‍ल्‍यू)

मासिक पत्रिका केपी एस्‍ट्रो साइंस लांच

केपी एस्ट्रो साइंस (मासिक हिंदी पत्रिका) आज रविवार को लॉन्च हो गयी. आज से यह मार्केट में उपलब्ध है. पहले अंक में कई खास बात हैं और यह काफी आकर्षक बन पड़ा है. इस अंक में कई शोध परक लेख हैं और सोनिया गाँधी, राजनाथ सिंह, परवेज मुशर्रफ के बारे में चौंकाने वाली जानकारियां हैं. सोनिया गाँधी भारतीय राजनीति में आगे क्या गुल खिलाएंगी, यह उनकी कुंडली पर रिसर्च करके बताया गया है तो क्या राजनाथ सिंह आने वाले चुनाव में नरेन्द्र मोदी की राह का रोड़ा बनेगे, यह भी है.

प्रख्यात केपी ज्योतिषी कनक बोस्मिया की परवेज मुशर्रफ के पाकिस्तान लौटने की घटना पर रिसर्च है तो प्रख्यात केपी ज्योतिषी व्योमेश दीपांकर का मौत के बारे में पता लगाने पर शोध लेख भी है. जो लोग हर तरफ से निराश हो जाते हैं, उनके लिए मेहंदीपुर बालाजी की अर्जी लगाने का विधान दिया है. और भी कुछ है. आज ही अपने नजदीकी बुक स्टाल से मांगिये या हमें अपनी कॉपी मंगाने के लिए मेल कीजिये. Mail ID-ssp313@gmail.com, familypandit@yahoo.com

Shaalini Dwivedi Sherry के एफबी वॉल से साभार.

पिता दस सालों से कर रहा था नाबालिग बेटी का रेप

नई दिल्ली। ग्रेटर कैलाश के जमरुदपुर में पिता द्वारा 17 साल की बेटी के साथ रेप करने का मामला प्रकाश में आया है। पिता दस सालों से बेटी को हवस का शिकार बना रहा था। लेकिन डर व लोकलाज के भय से किशोरी किसी को आपबीती नहीं बता पा रही थी। उसने हिम्मत कर जब स्कूल के एक शिक्षक से आपबीती बताई तब जाकर चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के पास पेश करने पर सारा भेद खुल गया। किशोरी की शिकायत पर ग्रेटर कैलाश थाना पुलिस ने पिता सीताराम के खिलाफ रेप का मामला दर्ज कर शनिवार को गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस अधिकारी के मुताबिक सीताराम, जमरुदपुर गांव में किराए पर घर लेकर परिवार के साथ रहता है और पेशे से ठेकेदार है। पीड़ित किशोरी लाजपत नगर स्थित सरकारी स्कूल में 11वीं कक्षा में पढ़ती है। पुलिस को दिए बयान में किशोरी ने कहा है कि पिता उसे 10 सालों से हवस का शिकार बना रहा था। लोकलाज व डर के कारण वह किसी से भी आपबीती नहीं बता पा रही थी। जब वह पिता की हरकतों से तंग आ गई तब तीन दिन पूर्व उसने यह बात स्कूल के एक शिक्षक को बता दी।

पिता के बारे में घिनौनी बात सुनकर शिक्षक हैरान रह गए। उन्होंने तुरंत किशोरी के बारे में एक एनजीओ को सूचना दे दी। सूचना मिलते ही एनजीओ के कर्मी किशोरी के घर पहुंच गए और उसे लाजपत नगर स्थित चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के पास पेश कर दिया। कमेटी ने किशोरी का बयान दर्ज कर ग्रेटर कैलाश थाना पुलिस को उसके पिता के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के निर्देश दिए। (जागरण)

डिप्‍टी कलेक्‍टर कर रहा था बेटी से रेप, बीबी ने पकड़ कर भिजवाया जेल

पटना। बेटी से रेप के मामले में बिहार के वरिष्ठ डिप्टी कलेक्टर फंस गए हैं। प्रारंभिक जांच के बाद शनिवार को पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। मामले में उनकी पत्नी ने शुक्रवार को तहरीर दी थी। इस घटना के बाद बिहार की नौकरशाही में तरह तरह की चर्चा है। हालांकि आरोपी डिप्‍टी कलेक्‍टर ने अपने पत्‍नी को मानसिक रूप से विक्षिप्‍त बताते हुए आरोपों को गलत करार दिया है। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है।

प्रशासनिक अधिकारी की पत्नी का कहना है कि वह शुक्रवार को बेटे को स्कूल छोड़कर घर लौटी तो पति को बेटी के साथ रेप करते देखा। इसके बाद उन्होंने पुलिस को तहरीर दी। मामले में आला पुलिस अधिकारियों ने बेटी से पूछताछ की तो उसने भी आरोप की पुष्टि की। एसएसपी मनु महाराज ने बताया कि मां-बेटी के आरोप, प्रारंभिक मेडिकल रिपोर्ट व साक्ष्यों के आधार पर आरोपी अधिकारी को शनिवार को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने आरोपी को कोर्ट में पेश किया, जहां से न्यायिक हिरासत में उन्हें जेल भेज दिया गया। एसएसपी ने बताया कि पूरे मामले की वैज्ञानिक तरीके से जांच होगी। आरोप सही साबित हुए तो मामले का अदालत में स्पीडी ट्रायल कराया जाएगा।

पी7 न्‍यूज में एसोसिएट प्रोड्यूसर बने वृजनंदन चौबे

पी7 न्‍यूज से वृजनंदन चौबे ने अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें यहां पर एसोसिएट प्रोड्यूसर बनाया गया है. इसके पहले वे सोनी इंटरटेनमेंट चैनल पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम 'कौन बनेगा करोड़पति' से जुड़े हुए थे. वृजनंदन इसके पहले मेडिटेक प्रोडक्‍शन हाउस, आईबीएन7 एवं डीडी न्‍यूज को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उनकी गिनती अच्‍छे पत्रकारों में की जाती है.

भड़ास तक सूचनाएं आप bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

इटली के अपहृत चारों पत्रकार सुरक्षित वापस लौटे

इटली के प्रधानमंत्री मारियो मोंटी ने कहा कि एक सप्ताह से अधिक समय तक सीरिया में बंधक बनाकर रखे गए इटली के चार पत्रकार मुक्त होने के बाद घर लौट आए हैं। इटली की मीडिया ने खबर दी है कि चारों पत्रकार एक छोटे सरकारी जेट विमान से रोम पहुंचे। मोंटी ने इससे पहले उनके मुक्त होने का बयान जारी किया था, लेकिन उन्होंने कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी थी।

उत्तरी सीरिया में इन चारों पत्रकारों को उस समय अपह्रत कर लिया गया था जब वे वीडियोग्राफी कर रहे थे। इनमें तीन स्वतंत्र पत्रकार और एक आरएआई का रिपोर्टर था। (एजेंसी)

क्‍या जदयू नरेंद्र मोदी के बहाने आत्‍मघाती कदम उठाएगी!

बिहार में एनडीए की बहुमत की सरकार चला रहे जेडीयू के नितीश कुमार को कुछ अधिक ही छटपटाहट सी लगी हुई जान पड़ती है. वैसे यह कोई नई बात नहीं है. समाजवादियों के लिए किसी भी दल या गठबंधन में अधिक दिन तक बने रहना बहुत ही कठिन है. इनका पूर्व का इतिहास इस बात का गवाह है कि यह अपनी छटपटाहट के कारण ठीक-ठाक चल रही सरकार की बलि देने से भी गुरेज नहीं करते. दोहरी सदस्यता के नाम पर जयप्रकाश के सपनों को साकार करने के लिए चार मुख्य दलों को मिला कर बनाई गई जनतापार्टी का विघटन और मोरारजी भाई देसाई के नेतृत्व में जनतापार्टी की सरकार को गिराने का कारण प्रमुख रूप से यही पूर्व के समाजवादी ही थे.

जनता पार्टी के विघटन के पश्चात इनका इतना बिखराव हुआ कि जनता पार्टी या जनतादल के नाम से तमाम नए दल बने और लुप्त होते गए. बिहार में जेडीयू और आरजेडी, कर्नाटक में देवगौड़ा का जनता दल या सुब्रामनियम की जनता पार्टी पारे के समान बिखरे या शेष रहे जनतापार्टी के ही अंश हैं. बिखराव की इसी राजनीति के नए अवतार बन कर उभर रहे हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार. सेक्‍युलरिज्‍म के नाम पर नरेन्द्र मोदी के विरोध के पीछे असल वजह क्या है यह राजनीतिक विश्लेषकों से यह छुपा नहीं है. इस विरोद्द के पीछे असल वजह है अपनी राजनीति और वोट बैंक को बचाने के साथ-साथ भाजपा का भय दोहन करना. समय-समय पर अलग-अलग कारणों से जेडीयू पूर्व में भी कुछ ऐसा ही कर चुकी है जिसका लाभ भी उसे मिला है. वर्ष २०००, २००५ और २०१० के बिहार विधानसभा के चुनावों में जेडीयू व भाजपा द्वारा लड़ी गई सीटों पर यदि एक नजर दौड़ाई जाये तो स्थिति स्वतः ही स्पष्ट हो जाती है. स्वयं की गलतियों और कमजोरियों के कारण निरंतर कमजोर हो रही भाजपा पर प्रधानमंत्री पद के अघोषित दावेदार नरेन्द्र मोदी और सेक्‍युलरिज्म के नाम पर नित नए हमले करने वाली जेडीयू के लिए बिहार में भाजपा के बगैर और कांग्रेस की मदद से सरकार चलाने की सोचना कितना आत्मघाती है यह जेडीयू के नेता भी जानते हैं. इसलिए राजनीति के मंजे हुये खिलाड़ी नीतीश या शरद यादव कोई बड़ा ख़तरा नहीं उठाना चाहते हैं.

वैसे यह सभी जानते हैं कि २०१४ के लोकसभा के चुनावों में एक ओर जहाँ कांग्रेस की सीटें कम होने का अंदेशा और भाजपा की सीटें बढ़ने की आशा है, परन्तु इतनी नहीं कि भाजपा अपने बूते या एनडीए के सहारे केंद्र में सरकार बना सके. ऐसे में एनडीए को नए मित्रों के रूप में कुछ बड़े दलों के समर्थन की आवश्यकता पड़ेगी. कमोबेश कुछ ऐसी ही परिस्थिति से निपटने के मार्ग कांग्रेस भी तलाश रही है. जेडीयू भी उत्तर प्रदेश, जहाँ माया और मुलायम प्रदेश में विरोध के बावजूद केंद्र में कांग्रेस को समर्थन दे रही हैं, बिहार में लालू और पासवान के विरोध के बावजूद कांग्रेस से सहयोग करने का प्रयोग करना चाह रही है. ऐसा लगता नहीं कि जेडीयू के अतिउत्साही नेता बिहार और देश की वास्तविक परिस्थिति से अनभिज्ञ हों. साम्प्रदायिकता के नाम पर राजनीतिक विरोद्द या सहयोग आज एक ठुस्स-पटाखे की मानिंद नाकारा साबित हो चुका है. तुष्टिकरण की राजनीति करनेवाले यह भली-भांति समझ चुके हैं कि एक जाति या संप्रदाय को लाभान्वित करने के चक्कर में दूसरों का स्वतः ही ध्रुवीकरण हो जाता है. २०१२ के चुनावों में उत्तरप्रदेश में माया की सरकार का जाना और समाजवादी पार्टी का पुनः सत्ता में लौटने के पीछे इसी प्रकार का ध्रुवीकरण मुख्य कारण रहा था.

एनडीए का मुख्य घटक होने के नाते जहाँ एक ओर भाजपा के लिए भी यह एक बड़ी चिंता का विषय है कि २४ दलों से घटकर शेष बचे ४ दलों को किस प्रकार गठबंधन में बनाये रखा जाये, वहीँ उसे बिहार की सरकार के जाने की चिंता नहीं है. २४३ सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में जेडीयू के ११५ और भाजपा के ९१ विधायकों को मिलाकर ही नीतीश के नेतृत्व में एनडीए की सरकार चल रही है. मोदी के नाम पर यदि जेडीयू ने गैरवाजिब विरोध और भयदोहन जारी रखा तो संभव है कि बिहार में एनडीए गठबंधन टूट जाये. ऐसे में जादुई आंकड़े को पार करने के लिए जेडीयू को मात्र ७ सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता पड़ेगी जो उसे काँग्रेस के ४ व अन्य ३ सरलता से मिल जायेंगे. परन्तु व सरकार कितनी टिकाऊ होगी इस पर संशय रहेगा. दूसरी ओर २०१४ के लोकसभा व २०१५ के बिहार विधानसभा के होनेवाले चुनावों में भाजपा के बिना जेडीयू का प्रदर्शन कैसा रहेगा यह भी जेडीयू के नेताओं से छुपा नहीं है. निसंदेह जेडीयू अर्श से फर्श पर आ जायेगी और भाजपा उस दशा में भी अपने शहरी और केडर वोट के सहारे सम्मानजनक प्रदर्शन करने में सफल रहेगी. हाँ, बड़ी बात यह रहेगी कि नीतीश से छत्तीस का आंकड़ा रखनेवाले लालू यादव की आरजेडी को आशातीत लाभ मिलेगी और संभव है कि वह कांग्रेस व पासवान के सहारे बिहार की सत्ता पर काबिज भी हो जायें.

जेडीयू बिहार में भाजपा के सहारे ही दूसरी पारी के सत्ता का सुख भोग रहा है. कुछेक को छोड़ अधिकतर जेडीयू नेता इस गठबंधन को चलाये रखने के पक्षधर हैं व इसे तोड़ना तो कतई नहीं चाहते हैं. ऐसा भी संभव है कि मोदी के नाम का विरोध और भाजपा से नाता तोड़ने के चक्कर में कहीं जेडीयू का ही विघटन ना हो जाये. राजनीति में ना कोई दुश्मन होता है और ना ही कोई दोस्त. भविष्य की रणनीति तय करते समय निज या दलहित में लाभ-हानि की गणना करने का सभी को बराबर का अधिकार है. ऐसे में किसी को भी इतना भी ऐंठना नहीं चाहिए कि वह टूटने के कगार पर पहुँच जाए. और राजनीति भी इस मूल मंत्र से अछूती नहीं कही जा सकती, यह जेडीयू के नेताओं को समझना होगा.

लेखक विनायक शर्मा मंडी से प्रकाशित साप्‍ताहिक 'अमर ज्‍वाला' के संपादक हैं.

हिंदुस्‍तान के संपादक सूर्यकांत द्विवेदी ने हड़पे अपने रिपोर्टर के साढ़े पांच लाख रुपये

: रिपोर्टर ने भिजवाया नोटिस : हिन्दुस्तान, मेरठ के स्थानीय सम्पादक सूर्यकान्त द्विवेदी ने मवाना तहसील के अपने ही रिपोर्टर संदीप मवाना के साढे पाँच लाख रुपये हड़प लिये हैं। संदीप ने सूर्यकांत द्विवेदी को यह पैसे उधार दिए थे, पर वे पैसे वापस नहीं कर रहे हैं। जब रिपोर्टर ने तकादा किया तो रिपोर्टर संदीप नागर को पुलिस से धमकी दिलाने का प्रयास किया गया। लेकिन रिपोर्टर सम्पादक की धमकी में आने की बजाय सूर्यकांत को अपने अधिवक्ता मो. शरीफ वजीर से नोटिस भिजवाया है।

नोटिस में कहा गया है कि मेरठ में मकान खरीदने हेतु दिनांक 13-02-2012 को अंकन साढ़े पाँच लाख रुपये 10 दिन में वापस करने के वादे से उधार लिये थे तथा भरोसा दिलाया था कि जैसे ही 10-12 दिन में बैंक से होम लोन हो जायेगा, पैसा वापिस कर दिया जायेगा। लेकिन लगातार पैसा मांगने पर, सम्पादक ने वापिस नहीं लौटाया। यही नहीं जब संदीप नागर ने 06-04-2013 को सुबह से शाम तक कई बार फोन किया तो उन्‍होंने फोन भी नहीं उठाया। जब दूसरे नम्‍बर से फोन किया गया तो, सूर्यकांत द्विवेदी ने फोन सुना, जिस पर संदीप नागर ने अपने साढे पाँच लाख रुपये मांगे तो सम्पादक उत्तेजित हो गये तथा डांट-डपट की। कहा कि जब भी बन्दोबस्त हो जायेगा, रुपया लौटा दूँगा। आइंन्दा मुझे कोई टेलीफोन मत करना और न ही तकादा।

इसके बाद दिनांक 07-04-2013 सुबह से शाम तक संदीप नागर ने सूर्यकांत को कई बार फोन किया और पैसा लौटाने की समय सीमा निर्धारित करने की बात करनी चाही, तो उन्‍होंने फोन ही नहीं उठाया तथा रात्रि करीब दस बजे थानाध्यक्ष मवाना तेजसिंह यादव सरकारी जीप एवं पुलिस फोर्स के साथा संदीप नागर के घर पहुँचे तथा कहा कि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक का आदेश है कि आप सूर्यकान्त द्विवेदी के फोन पर फोन न कर के लेन-देन के मामले को कानूनी कार्रवाई से निपटायें।

हालांकि संदीप अपने संपादक के बदले रवैये और पैसे हड़पने की नीयत से हतप्रभ है। संदीप नागर का कहना है कि वह अब कानूनी कार्रवाई कर के संपादक से ब्याज सहित अपने पैसे वसूल करेगा। चाहे अब उसे सुप्रीम कोर्ट तक क्यों न जाना पड़े। इधर इस मामले में हिंदुस्‍तान के संपादक सूर्यकांत द्विवेदी का पक्ष लेने के लिए फोन किया और एसएमएस भी किया गया, परन्‍तु उन्‍होंने न तो फोन पिक किया और ना ही एसएमएस का कोई जवाब दिया। नीचे वकील द्वारा भेजा गया नोटिस….

वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (ग्यारह) : सिंबल के लिए तीन दिनों का इंतजार

दस दिसंबर, 12 को नाम वापसी की तिथि समाप्त होने के बाद सभी उम्मीदवारों को चुनाव चिह्न का इंतजार था। जनसंपर्क में सभी उम्मीदवार जुटे हुए थे। लेकिन चुनाव चिह्न के साथ जनता के बीच जाना हर कोई चाह रहा था। वोटर चुनाव चिह्न के आधार पर ही वोट डालता है। चुनाव के दौरान वही पहचान बन जाता है उम्मीदवार की। सिंबल को लेकर चुनाव में नारे भी बन जाते हैं और कई बार ये नारे चुनाव के माहौल को बदल देते हैं। नाम वापसी के दिन सिंबल का वितरण नहीं किया। सबको अपने सिंबल और क्रम संख्या का इंतजार था।

राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायत चुनाव में पद के हिसाब से क्रमानुगत रूप से चुनाव चिह्नों का निर्धारण किया है। इसका मकसद है कि एक साथ होने वाले विभिन्न पदों के चुनाव में सिंबल पहचानने में वोटरों को दिक्कत नहीं हो। सिंबल का निर्धारण क्रम के अनुसार तय है। कुछ लोग उम्मीदवारों के वर्णानुसार क्रम के आधार सिंबल का अनुमान लगा रहे थे। प्रखंड कार्यालय में चुनाव का काम देख रहे संजय कुमार किसी काम से 11 दिसंबर, 12 को कार्यालय में नहीं थे। इस कारण सिंबल का आवंटन नहीं हो सका। 12 दिसंबर को वह कार्यालय में पहुंचे। मैंने उनको फोन किया। उन्होंने कहा कि आप अपना प्रचार कीजिए, शाम तक सिंबल मिल जाएगा। शाम को फिर फोन किया। उन्होंने कहा कि आपका क्रम संख्या 10 और चुनाव चिह्न मोमबतियां हैं। मैंने सोचा अब बिजली विहीन पंचायत में मोमबत्तियां जलाने का मौका आ गया है। करीब तीन दिनों का इंतजार समाप्त हो चुका था।

अगले दिन सुबह प्रखंड कार्यालय पहुंचा। वहां से चुनाव चिह्न लिया। सिंबल एक परची पर बना हुआ था। उसे पॉकेट में रखा। अपना पर्चा बनवाने के लिए ओबरा से दाउदनगर प्रस्थान किया। दाउदनगर में साथी हैं ओम प्रकाश। उनसे मैंने पूछा कि पोस्टर, पर्चा कहां बनता है। हालांकि ओम प्रकाश से इस संबंध में कोई मदद नहीं मिली। मैंने पोस्टर छपवाने के बदले पर्चा बनवाना ही बढ़िया और सस्ता समझा। इस संबंध में मैंने एक अन्य साथी शंकर जी से संपर्क किया। उनका छपाई का कारोबार भी है। उन्होंने एक कंप्यूटर इंस्टीट्यूट का नाम बताया। यह गर्ल्स हाइ स्कूल के पास था। वहां पहुंचा और परचा छपवाने के बात हुई। दाम भी तय हो गया। ए फोर साइज में चार पर्चा बनवाया और घर चला आया।

(जारी )

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं.


इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा

सरकार आकाशवाणी पर शुरू करेगी 24 घंटे का न्‍यूज चैनल

केंद्रीय सूचना व प्रसारण सचिव उदय कुमार वर्मा ने कहा कि सरकार डीडी न्यूज की तरह आकाशवाणी पर 24 घंटे चलने वाले एक न्यूज चैनल को शुरू करेगी। शनिवार को श्री वर्मा अमृतसर में सूचना व प्रसारण मंत्रालय विभाग के पंजाब में अलग-अलग मीडिया संस्थानों के मुखियों के एक बैठक को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आकाशवाणी पर 24 घंटे समाचार प्रसारित करने वाले एक न्यूज चैनल को शुरू किए जाने की संभावनाओं का पता लगाने के लिए मंत्रालय द्वारा अलग-अलग सुझाव व विकल्पों पर विचार किया जा रहा है।

उन्‍होंने कहा कि ऐसा चैनल शुरू किए जाने के तकनीकी पहलुओं की जांच की जा रही है। वर्मा ने आकाशवाणी, दूरदर्शन, फील्ड पब्लिसिटी व पत्र सूचना कार्यालय के उच्चाधिकारियों से मीटिंग के दौरान सीमावर्ती इलाकों में आकाशवाणी व दूरदर्शन के प्रोग्रामों की पहुंच संबंधी मौजूदा स्थिति की समीक्षा की। सीमावर्ती इलाकों व सरहद पार आकाशवाणी व दूरदर्शन के प्रोग्रामों के प्रसारण की पहुंच यकीनी बनाने के लिए 12वीं पंचवर्षीय योजना में राशि रखी गई है। आकाशवाणी व दूरदर्शन में चल रहे डिजिटलकरण की समीक्षा करते हुए वर्मा ने कहा कि इस काम के मुकम्मल होने से प्रसारण के क्षेत्र में अगले दो सालों के दौरान कायाकल्प हो जाएगी। वर्मा ने आकाशवाणी व दूरदर्शन के अधिकारियों को अपने प्रोग्रामों के स्तर व विषय वस्तु में सुधार करने की सलाह दी है।

वर्मा ने कहा कि प्राइवेट केबल आपरेटरों की किसी खास इलाके में प्रभुत्व खत्म करने के लिए यह मामला भारतीय दूरसंचार नेमबंदी अथारिटी ट्राई के हवाले किया गया है। प्रसार भारती की बात करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार व प्रसार भारती के मध्य रिश्तों को तय करने के लिए सैम पित्रोदा की अगवाई में एक कमेटी गठित की गई है। प्रसार भारती में खाली आसामी के लिए भर्ती का अमल शुरू हो गया है। सरकार पहले की तरह प्रसार भारती के मौजूदा अमले को सरकारी खजाने से तनख्वाह देने के लिए अगले पांच सालों तक पूरी राशि देती रहेगी।

नन्‍हें प्रधान के बेटे ने मारी थी डीएसपी को गोली!

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के कुंडा में तिहरे हत्याकांड की जांच कर रही केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने पुलिस उपाधीक्षक जिया उल हक की हत्या में शामिल होने के आरोप में शनिवार को बबलू यादव को गिरफ्तार किया। बबलू मृत ग्राम प्रधान नन्हें यादव का बेटा है। पुलिस उपाधीक्षक की हत्या के संबंध में सीबीआई की तरफ से की गई यह पहली गिरफ्तारी है। सीबीआई सूत्रों का कहना है कि अरेस्‍ट बबलू (20 वर्ष) की निशानदेही पर जिया उल हक का लापता मोबाइल भी बरामद कर लिया गया है।

सीबीआई सूत्रों का कहना है कि डीएसपी की हत्‍या बबलू ने की थी। बबलू की गिरफ्तारी के बाद सीबीआई तिहरे हत्याकांड का खुलासा करने के एकदम करीब पहुंच गई है। सीबीआई बबलू को जिया उल हक की हत्या का मुख्य आरोपी मान रही है। हालांकि डीएसपी हत्‍याकांड में राजा भैया की संलिप्‍ता को लेकर अभी कुछ भी स्‍पष्‍ट नहीं है। सीबीआई अधिकारी इस बारे में मुंह खोलने को तैयार नहीं हैं। राजा भैया का नाम अब तक भले ही डीएसपी हत्‍याकांड में न आया हो, लेकिन वो अभी भी सीबीआई की राडार से बाहर नहीं हुए हैं।

सीबीआई सूत्रों के मुताबिक अपने पिता नन्हें यादव की हत्या से नाराज बबलू ने कुंडा सीओ के पद पर तैनात रहे जिया उल हक की गोली मारकर हत्या कर दी। बबलू घटना के बाद से फरार चल रहा था। सीबीआई अब तक पूरे मामले में कुल तीन गिरफ्तारियां कर चुकी है। पिछले सप्ताह सीबीआई ने प्रधान नन्हें यादव की हत्या के संबंध में उसके विरोधी कामता पाल के दो बेटों अजय और विजय को गिरफ्तार किया था। उल्‍लेखीनय है कि कुंडा क्षेत्र के वलीपुर गांव में विगत दो मार्च को ग्राम प्रधान नन्हें यादव की हत्या के बाद हुई हिंसा में उसके भाई सुरेश यादव और डीएसपी जिया उल हक की हत्या कर दी गई थी।

धर्मेंद्र सिंह एवं विकास पाठक ने करा दिया बनारस की पत्रकारिता में दो फाड़!

गिलट बाजार में पिछले दिनों वाराणसी पत्रकारपुरम आवासीय योजना के लोकर्पण समारोह को लेकर स्थानीय पत्रकारों के बीच उपजी वैमनस्यता और गुटबाजी की गरमी अभी शांत भी नहीं हुई थी कि एक बार फिर यहां का पत्रकार समुदाय दो फाड़ हो गया है। इस बार इसका सबब बना है पत्रकारपुरम में आयोजित स्वर्गीय ईश्वरदेव मिश्र स्मृति सामुदायिक भवन शिलान्यास समारोह। पत्रकारपुरम आवासीय समिति की ओर से रविवार सात अप्रैल को आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आये सपा के मुखिया एवं पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने उक्त सामुदायिक भवन के निर्माण के लिए 60 लाख रुपये देने की घोषणा कर पत्रकारों का दिल खुश कर दिया।

इस घोषणा से एक ओर जहां पत्रकारपुरम आवासीय समिति को पत्रकार हित के लिए एक महत्वपूर्ण काम करने का श्रेय मिला वहीं दूसरी ओर पत्रकारों का एक खेमा अंदर ही अंदर काफी खिन्न है। इस खेमे से जुड़े काशी पत्रकार संघ के कुछ पदाधिकारियों के अलावा कुछ अन्य पत्रकारों का कहना है कि इस आयोजन का उद्देश्य खुद के लिए वाहवाही बटोरना ज्यादा और पत्रकार हित कम था। इस शिलान्यास समारोह में काशी पत्रकार सघ के पदाधिकारियों की गैरमौजूदगी के चलते पत्रकारपुरम के प्लॉट आवंटी पत्रकारों ने संघ के उद्देश्य पर ही सवाल खड़े कर दिये हैं। उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन (उपजा) की स्थानीय इकाई के अध्यक्ष विनोद सिंह बागी, जिनका नाम स्वर्गीय ईश्वरदेव मिश्र स्मृति सामुदायिक भवन शिलान्यास समारोह के इन्विटेशन कार्ड पर छपा हुआ था, ने भी इस आयोजन पर अपनी खिन्नता व्यक्त की है।

उनका कहना है कि इस समारोह के आयोजन से पहले मुझे विश्वास में नहीं लिया गया। सब कुछ समारोह के संयोजकद्वय धर्मेंद्र सिंह और विकास पाठक ने अपने मन से किया। उनके अनुसार उक्त सामुदायिक भवन स्वर्गीय ईश्वरचंद सिन्हा या स्वर्गीय पं. कमलापति त्रिपाठी के नाम पर बनना चाहिये क्योंकि उनका यहां की पत्रकारिता में अहम योगदान रहा है। उन्होंने स्वर्गीय ईश्वरदेव मिश्र के नाम पर सामुदायिक भवन के निर्माण पर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि शिलान्यास समारोह के एक संयोजक धर्मेंद्र सिंह पत्रकार होने के साथ-साथ एक कांग्रेसी नेता भी हैं। यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि श्री बागी खुद भी पत्रकार होने के साथ-साथ पुराने भाजपाई भी हैं। यही वजह है कि वह पिछले दिनों पत्रकारपुरम में आयोजित पत्रकारपुरम आवासीय योजना लोकार्पण समारोह में भाजपा सांसद एवं लोक लेखा समिति के अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी को बुलाने में कामयाब रहे। उस कार्यक्रम का पूरा श्रेय श्री बागी को ही गया था।

हालांकि उस आयोजन से पूर्व पत्रकारपुरम के प्लॉट आवंटी पत्रकारों को विश्वास में न लिये जाने के कारण उनमें काफी नाराजगी थी जिसका असर कार्यक्रम में खाली पड़ी कुर्सियों के रूप में दिखाई दिया था। उस कार्यक्रम के बाद सात अप्रैल को जब पत्रकारपुरम में सामुदायिक भवन शिलान्यास समारोह हुआ तो यहां का पत्रकार समुदाय एक बार फिर बंट गया। इस कार्यक्रम में काशी पत्रकार संघ के प्रमुख पदाधिकारियों के अलावा उनके समर्थक अनुपस्थित थे। यह बात अलग है कि पहले के मुकाबले इस कार्यक्रम में ज्यादा भीड़ थी। लेकिन यह कार्यक्रम संपन्न हो जाने के बाद मुख्य अतिथि मुलायम सिंह यादव कार्यक्रम संयोजक धर्मेंद्र सिंह के आवास पर आयोजित पार्टी में नहीं गये। इस बात को लेकर पत्रकार समुदाय में सुगबुगाहट रही। जब इस बारे में क्लाउन टाइम्स ने सपा के स्थानीय मीडिया प्रभारी गणेश यादव से बात की तो उन्होंने कहा कि चूंकि धर्मेंद्र सिंह एक कांग्रेसी नेता हैं इसलिए हमारे नेता मुलायम सिंह यादव उनके आवास पर