संजय कुमार सिंह
आज की बड़ी खबर है, भारत पर कुल 50% ट्रम्प टैरिफ आज से लागू होगा। आज ही एक खबर है – प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है, स्वदेशी सबका जीवन मंत्र बने। कहने की जरूरत नहीं है कि यह अमेरिकी टैरिफ को ध्यान में रखकर दिया गया बयान है और अखबारों में खबर की प्रस्तुति पर इसका ध्यान रखा गया है। वैसे यह मानना पड़ेगा और कहा जा सकता है कि टैरिफ का असर निर्यात पर (ही) पड़ेगा और इससे आयात करने वालों के लिए भारतीय सामान महंगे हो जायेंगे। उदाहरण के लिए भारत के किसी सामान की कीमत 100 रुपये हो तो 50% टैरिफ के बाद उसकी कीमत 150 रुपये होगी और अगर किसी देश के उत्पाद पर टैरिफ 25 प्रतिशत हो और उसकी भी कीमत 100 रुपये ही हो तो वह वहां 125 रुपये की होगी। ऐसे में उत्पाद वही से खरीदे जायेंगे या वहीं के बिकेंगे जिनकी कीमत कम होगी। कम या शून्य टैक्स वालों से बराबरी के लिए भारतीय उत्पादकों को अपने उत्पादों की कीमत कम रखनी होगी और इसमें उनका मुनाफा कम होगा या खत्म हो जायेगा। इसलिये सामान्य तौर पर आज टैरिफ लागू होने के साथ यह खबर होनी चाहिये थी कि देश के फलां उत्पाद इसकी चपेट में आयेंगे और ये इन देशों के उत्पादों और इन उत्पादों से मुकाबले में पिट जायेंगे या महंगे हो जायेंगे और देश के इन शहरों में, इन उत्पादों पर टैरिफ का असर होगा। इससे इतने लोग प्रभावित होंगे आदि आदि। पर मोदी जी ने स्वदेशी की बात करके मुद्दे को बदलने की कोशिश की है और एक हद तक कामयाब रहे हैं। स्वदेशी अपनाने का मतलब यह नहीं है कि हम निर्यात न करें और अपने सभी उत्पादों की खपत की व्यवस्था देश में करें। यह हँसुआ के ब्याह में खुरपी के गीत जैसा मामला है। उदाहरण के लिये, मुरादाबाद से पीतल के जो उत्पाद निर्यात होते थे, विदेशों में महंगे बिकते थे उनकी खपत देश में कैसे होगी या स्वदेशी अपनाने से क्या फर्क पड़ेगा।
इसी तरह, कश्मीर के कालीन आम भारतीय घरों के लिए महंगे हैं और विदेशों में उनकी अच्छी कीमत मिलती है। स्वदेशी अपनाकर मैं उन कालीनों को खरीद नहीं सकता हूं और बिना कालीन रह लूंगा पर अमेरिका में एक लाख की कालीन डेढ़ लाख की हो जायेगी तो कम बिकेगी या नहीं बिकेगी। इसमें स्वदेशी से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है और अगर अमेरिका वाले भी हमारी तरह स्वदेशी अपना लें तो भी हमारे कालीन या पीतल के उत्पाद वहां नहीं बिकेंगे और देसी उद्योग के समक्ष जो संकट है वो रहेगा। इससे प्रधानमंत्री के वेतन-भत्तों, सुख सुविधाओं पर अंतर नहीं पड़ेगा लेकिन देसी उद्योग और उनमें काम करने वाले प्रभावित होंगे। सरकार को इसके लिए कुछ करना चाहिये पर सरकार हेडलाइन मैनेजमेंट करती है, वही कर रही है। दैनिक भास्कर ने टैरिफ टेरर की बात तो की है लेकिन मूल सूचना के साथ प्रधानमंत्री के मंत्र को भी मुख्य शीर्षक में जोड़ दिया है। जाहिर है, दोनों पक्ष है इसलिए वह आदर्श पत्रकारिता भी कही जा सकती है लेकिन इसका नतीजा यह निकला कि, 48.2 अरब के निर्यात पर असर, सबसे ज्यादा प्रभावित टेक्सटाइल्स और जेम्स जुलरी सेक्टर होंगे खबर छोटी हो गई शीर्षक छोटा है आदि आदि। वरना लीड का शीर्षक यह भी हो सकता था कि 50 प्रतिशत ट्रम्प टैरिफ से 48.2 अरब डॉलर के निर्यात पर असर होगा। समझने वाली बात है कि इसमें कितनों की नौकरी जायेगी, कितनों का मुनाफा कम होगा और कितनों को टैक्स नहीं मिलेगा। जो टैक्स चोरी और रिश्वत से कमाते हैं, रिश्वत देकर कमाई वाली जगहों पर तैनाती कराई होगी वो भी प्रभावित होंगे। स्वदेशी जीवन मंत्र हो तो खबर यह सब होनी चाहिये थी। लेकिन यह सूचना पूरी खबर में एक लाइन में निपट गई है कि, फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन ने कहा है कि तिरुपुर, नोएडा और सूरत में कपड़ा उद्योगों ने उत्पादन रोक दिया है। आप समझ सकते हैं कि इन कारखानों में काम करने वाले और इनपर आश्रित स्वदेशियों की क्या स्थिति होगी। आज उनकी खबर, फोटो छपती लेकिन प्रधानमंत्री की छपी है।
हेडलाइन मैनेजमेंट की आज की दूसरी खबर आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज के यहां ईडी का छापा है। खबरों के अनुसार, 5590 करोड़ की परियोजनाओं में गड़बड़ी का आरोप है। यहां यह दिलचस्प है कि अव्वल तो भाजपा जनहित के काम नहीं करती और जो काम करती है उससे संबंधित शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होती है। आम आदमी पार्टी की सरकार ने काम किया है तो जांच के नाम पर उसके नेताओं को परेशान किया जा रहा है। सत्येंद्र जैन का मामला 10 साल बाद अब बंद किये जाने के बाद दूसरे मामले में हाथ डालने (या डालने देने) से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये था कि पक्के सबूत हाथ लग जायें तब कार्रवाई शुरू या सार्वजनिक की जाये। लेकिन वह सब छोड़कर छापा पड़ गया और पार्टी ने कहा है कि यह मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए है। ट्रम्प टैरिफ से आज सेंसेक्स 8.49 अंक टूटने की खबर है। भारी गिरावट के कारण निवेशकों के 5.41 लाख करोड़ रुपये डूब जाने की खबर है लेकिन सरकार की प्राथमिकता उन मामलों की जांच है जिसमें विपक्ष के नेता घेरे जा सकें। हालांकि आज ही खबर है कि भारी बारिश के कारण जम्मू में चौथे तवी पुल का हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया है। भाजपा शासित राज्यों में पुल गिरने और सड़कें क्षतिग्रस्त होने के ढेरों मामले हैं। उनकी जांच और उनसे संबंधित कार्रवाई की खबर नहीं दिखती है। भाजपा राज में बड़े पैमाने पर टोल सड़कें बनवाये जाने के बारे में यह भी कहा जाता है कि कमीशन लेकर सड़क बनाने और टोल वसलूने की इजाजत दे दी गई है। इलेक्टोरल बांड खरीदने वालों के नाम सार्वजनिक होने के बाद भी ऐसी आशंका हुई थी। लेकिन जांच की कोई खबर नहीं है। दूसरी ओर, जनहित के काम में घोटाले की जांच हो रही है। हो सकता है यह मेरा पूर्वग्रह हो लेकिन मुझे याद नहीं है कि 2014 से पहले पुल टूटने और सड़कें धंसने की खबरें इतनी आम थीं।
आपको याद होगा 2016 में कोलकाता में एक निर्माणाधीन पुल गिर गया था। नरेन्द्र मोदी के आरोपों के जवाब में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा था कि यह ऐक्ट ऑफ गॉड यानी ईश्वर का किया हुआ है। मोदी जी ने उसे ऐक्ट ऑफ फ्रॉड कहा था और उसका खूब मजाक उड़ाया था। 15 मई 2018 को, वाराणसी में कैंट रेलवे स्टेशन के सामने एक निर्माणाधीन फ्लाइओवर का हिस्सा अचानक गिर गया था। इस हादसे में कम से कम 18 लोग मारे गए और कई गंभीर रूप से घायल हुए थे। विशेषज्ञों की रिपोर्ट में बताया गया था कि स्लैब को संभालने वाले क्रॉस बीम्स नहीं लगाए गए थे, जिससे संरचना कमजोर हो गई थी। लगातार ट्रैफिक के कंपन और हाल की बवंडर/तूफानी हवाओं ने अंततः स्लैब को धकेल दिया। आप जानते हैं कि 2014 से यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र रहा है। इस हादसे पर उन्होंने दुःख व्यक्त किया था और प्रभावितों को तत्काल सहायता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था। पुल गिरने के इन दो मामलों के बाद तो कई पुल गिरे लेकिन 2014 से पहले और 2014 से पहले बने पुल गिरने के मामले बहुत कम हैं। जम्मू के तवी पुल का उद्घाटन मई 2013 में हुआ था। इस पुल का निर्माण करीब ₹147 करोड़ की लागत से किया गया था। सितंबर 2014 में भारी बाढ़ के कारण पुल का एक हिस्सा, विशेषकर सड़क की एप्रोच रोड और एम्बैंकमेंट बह गया था। इसे करीब एक महीने के लिए बंद करना पड़ा और मरम्मत के बाद यातायात के लिए खोला गया था। जून 2016 में एक बार फिर पुल का हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया। इस दौरान मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती ने पुल की संरचना और निर्माण कार्य की जांच के आदेश भी दिए थे। प्रधानमंत्री यह कहते रहते हैं कि उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं हैं क्योंकि उनसे पूछा नहीं जाता है कि ये मामले क्या हैं?
इसलिये वे जो चाहे दावा करते हैं और वह अखबारों में छप जाता है। वैसे आज अमर उजाला का शीर्षक स्वदेशी है और प्रधानमंत्री का स्वदेशी पहले पन्ने पर लीड के शीर्षक में नहीं है। यह अलग बात है कि दैनिक भास्कर में लीड के अलावा ऐसी कोई और सरकारी खबर अलग से नहीं है और अमर उजाला में लीड का शीर्षक लगभग वह है जो दैनिक भास्कर में छोटे फौन्ट में छोटी खबर का शीर्षक है। दूसरी ओर, अमर उजाला में पहले पन्ने पर सरकारी प्रचार की कई खबरें हैं। अखबार और सरकार पर यकीन करें तो खबर इस प्रकार है, अमेरिका के मनमाने टैरिफ से निपटने के लिए भारत ने रणनीति तैयार कर ली है। गौरतलब है कि अभी रणनीति तैयार की है। इसे लागू होने और इसका असर होने में जो समय लगेगा और इस बीच जो नुकसान होगा उसकी भरपाई वर्षों बाद वैसे ही की जायेगी जैसे जीएसटी का स्लैब अब कम करने का प्रचार करके किया जा रहा है। अमर उजाला की आज की प्रचार वाली खबरों का शीर्षक है, सौ देशों में निर्यात होंगे भारत में तैयार ई-वाहन। यह खबर दो कॉलम में है और चार कॉलम का शीर्षक है, निर्यातकों-कामगारों के लिए सरकारी राहत का पैकेज जल्द। मेरा मानना है कि नरेन्द्र मोदी, उनकी सरकार और उनके समर्थन में उनके प्रचारक और मीडिया का बड़ा हिस्सा हेडलाइन मैनेजमेंट से न सिर्फ उनकी छवि निखारने में लगा है बल्कि लोगों की याद्दाश्त को भी चुनौती दे रहा है और वे जब जैसी जरूरत होती है वैसा कहकर अच्छे बने रहते हैं। अखबारों में प्रधानमंत्री या राजनेता के पुराने बयानों का उल्लेख करने का रिवाज नहीं है लेकिन यू ट्यूबर अब ऐसा खूब करते हैं। पिछले 10 वर्षों में यह टेलीविजन पर किया जाता तो नरेन्द्र मोदी की हस्ती आज वो नहीं होती जो है। अगर पहले चुनाव हार गये होते तो वोट चोर गद्दी छोड़ का नारा नहीं सुनना पड़ता। पर वह सब अलग मु्द्दा है।
आइये मैं बताऊं कि अभी स्वदेशी की बात करने वाले नरेन्द्र मोदी पहले क्या-क्या कहते करते रहे हैं। तमाम विदेशी वाहन और अन्य निर्माताओं को भारत में निर्माण (असेम्बली) की सुविधा दी है। यह अलग बात है कि सरकार के निमंत्रण पर यहां आने वाले कम परेशान नहीं रहे हैं। चैट जीपीटी ने बताया कि इकनोमिक टाइम्स की एक खबर के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र सतत विकास शिखर सम्मेलन में उन्होंने कहा था – “I represent a culture where the earth is considered our mother. We see the entire world as one family.” यानी मैं एक ऐसी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता हूं जिसमें धरती माता है। हम पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखते हैं। जी20 की अध्यक्षता और वैश्विक मंचों पर मोदी ने इस दर्शन को दोहराया है। उन्होंने “वसुधैव कुटुम्बकम” के विषय वाक्य को अपनाया और इसे केवल नारा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और ध्यानात्मक सोच की पूर्ण अभिव्यक्ति बताया। वे आत्म निर्भर भारत, वोकल फॉर लोकल, लोकल फॉर ग्लोबल और मेक फॉर द वर्ल्ड जैसे नारे देते रहे हैं। उनकी नीतियाँ वैश्विक सहयोग और साझा उत्पादन की रही हैं लेकिन कोविड के बाद आत्मनिर्भर भारत अभियान की शुरुआत की थी। कहने की जरूरत नहीं है कि निर्यात नहीं करना या निर्यात नहीं हो पाना बिल्कुल अलग समस्या है। आत्म निर्भर भारत तो ठीक है लेकिन निर्यात निर्भर भारत का क्या किया जाये या निर्यात न होने से जो होगा उसका सामना कैसे किया जायेगा। नवोदय टाइम्स ने भी टैरिफ की खबर को लीड बनाया है। स्वदेशी की खबर यहां भी प्रमुखता से है। शीर्षक है, स्वदेशी हर किसी के जीवन का मंत्र होना चाहिये।
प्रधानमंत्री ने मन की बात (अगस्त 2020) में कहा था, “भारत में अच्छे और सस्ते खिलौने बनाने की परंपरा रही है। हमें अपने बच्चों को भारतीय खिलौनों से जोड़ना होगा।” टैरिफ के बाद निर्माताओं का क्या होगा यह अखबारों को बताना चाहिये। देखा जाये, कब कौन, क्या बताता है। देशबन्धु ने टैरिफ आज से लागू होगा को पहले पन्ने पर सबसे नीचे, बॉटम लीड बनाया है। इसके साथ यह भी कि, इससे नौकरियां जाने का खतरा है। इससे ऊपर, भारत मेक फॉर द वर्ल्ड की ओर बढ़ रहा है और दुनिया में दौड़ेगी मेड इन इंडिया ईवी जैसी खबरें पहले पन्ने पर छापी हैं। अमर उजाला ने स्वदेशी की प्रधानमंत्री की परिभाषा भी बताई है और यह है, पैसा कोई लगाये, काम भारतीय करें। अब आइये भारतीयों के काम का हश्र देख लें। अंग्रेजी के मेरे छह अखबारों में चार में अमेरिकी टैरिफ आज से लागू होने की खबर लीड है। इनकी चर्चा बाद में करूंगा पहले उन दो अखबारों की लीड की बात करता हूं जहां आज से टैरिफ प्रभावी होने की खबर लीड नहीं है। इनमें एक है, दि एशियन एज। इसमें प्रधानमंत्री ने जो कहा वह लीड है और फ्लैग शीर्षक है, गुजरात में मारुति की पहली ईवी पेश की या इसका लोकार्पण किया। दूसरा मुद्दा है, स्थानीयकरण की वकालत की। मुख्य शीर्षक है, सभी भारतीय स्वदेशी को जीवन मंत्र बनायें। ट्रम्प टैरिफ आज से प्रभावी होगा – यह खबर टॉप पर चार कॉलम में लीड के बराबर में है। इसके साथ उपशीर्षक ये सवाल हैं, 1) क्या मोदी ने ट्रम्प के चार कॉल नजरअंदाज किये 2) अमेरिका ने नई लेवी के लिए आदेश जारी कर दिये हैं। खबर है कि अमेरिका ने 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ का ड्राफ्ट नोटिस जारी किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने डिजिटल टैक्स वाले देशों के लिए भी अधिक टैरिफ की धमकी दी है। अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों को प्रभावित करने वाले डिजिटल सेवा करों और विनियमन के खिलाफ जवाबी कार्रवाई में नए टैरिफ लगाने और उन्नत टेक्नालॉजी तथा सेमीकंडक्टर निर्यात पर प्रतिबंध लगाने वालों पर नये टैरिफ लगाने की धमकी है। इससे एक और व्यापार संघर्ष शुरू हो गया है।
उल्लेखनीय है कि अगस्त 2023 में भारत ने लैपटॉप, टैबलेट, ऑल‑इन‑वन पीसी, अल्ट्रा‑स्मॉल फॉर्म फैक्टर कंप्यूटर और सर्वर्स के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था। इन उपकरणों के आयात के लिए वैध लाइसेंस आवश्यक कर दिया गया था। यह कदम “मेक इन इंडिया” पहल के तहत उठाया गया था ताकि घरेलू निर्माण को बढ़ावा मिले और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दूर किया जा सके। इसके बाद नवंबर 2023 में एक नया “इम्पोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम” लागू किया गया। इसमें आयातकों को केवल आयात की मात्रा और मूल्य की जनकारी सरकार को ऑनलाइन फॉर्म के माध्यम से देनी होती। यह लाइसेंसिंग से थोड़ा लचीला लेकिन मॉनिटरिंग युक्त तरीका माना गया। जनवरी 2025 से लागू होने वाले नियमों अनुसार कंपनियों को लैपटॉप, टैबलेट और पीसी आयात करने के लिए मंजूरी लेने की शर्त लगाई गई थी। जल्दी ही इसे रद्द करके वैकल्पिक तरीका अपनाना पड़ा। खबरों के अनुसार, अगस्त 2023 में लागू की गई लाइसेंसिंग की शर्त की काफी आलोचना हुई और उद्योग, विशेषकर अमेरिकी से दबाव आने पर कुछ ही हफ्तों में रद्द कर दिया गया। जिसके स्थान पर आयात मॉनिटरिंग प्रणाली अपनायी गई। आप समझ सकते हैं स्वदेशी (कंप्यूटर आदि) अपनाने के लिए देशवासियों को मजबूर भी किया गया है। अब तो सिर्फ सलाह है। पहले वाली खबर आपको मालूम थी? जाहिर है नहीं होगी क्योंकि वह सिर्फ बिजनेस वालों के लिए थी और यह उनके लिए है जो वोट देते हैं।
द टेलीग्राफ में फ्लैग शीर्षक है, कमजोर करने वाले ट्रम्प टैरिफ भारत पर आज लागू होंगे। मुख्य शीर्षक है, 10 साल की मेहनत बेकार होने के लिए रख दी गई। इस टैरिफ के प्रभाव के रूप में जो कुछ हाईलाइट किया गया है उसमें यह भी है कि भारत की कीमत पर चीन, वियतनाम और मैक्सिको को लाभ होगा। एक जानकारी यह भी है कि फार्मा (मुख्य रूप से दवाइयां), इलेक्ट्रॉनिक्स और पेट्रोलियम उत्पाद टैरिफ से बच गये हैं। खबर में बताया गया है कि एक उद्यमी ने गुजरे 10 वर्षों का बड़ा हिस्सा अमेरिका में व्यापार करने और उसे अपना प्रमुख बाजार बनाने में लगाया है और अब इस भारी-भरकम टैरिफ का असर उनके कारोबार की बुनियाद पर हुआ है। हिन्दुस्तान टाइम्स में 50 प्रतिशत टैरिफ आज से लागू खबर के साथ मोदी ने स्वदेशी की अपील की खबर दो कॉलम में है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने लीड के शीर्षक में लिखा है, भारत प्रभाव झेलने की तैयारी कर रहा है। इसके साथ यह भी खबर है कि जर्मन अखबार के अनुसार मोदी ने ट्रम्प के चार कॉल नजरअंदाज किये। द हिन्दू की लीड टैरिफ लागू होने और भारत की तैयारियों से संबंधित है लेकिन उपशीर्षक है, जवाबी टैरिफ या किसी अन्य उपाय की किसी योजना की घोषणा केंद्र सरकार ने नहीं की है। प्रधानमंत्री ने स्वदेशी का मंत्र छेड़ दिया है निर्यातकों का अनुमान है कि 47 बिलयन डॉलर का माल प्रभावित होगा। इंडियन एक्सप्रेस में टैरिफ लागू होने, उससे प्रभावित होने वाले निर्यात की खबर लीड है। साथ में एक विज्ञापन और उसके नीचे प्रधानमंत्री का स्वदेशी मंत्र।
जाहिर है कि ट्रम्प टैरिफ से होने वाले नुकसान की खबर वैसे नहीं छपी है जैसे छपनी चाहिये थी और इसमें दूसरी खबरों की उपेक्षा तो हुई ही है और ऐसी खबरों में जो प्रमुख है वह यह कि एनसीएलएटी के जज ने खुद को मामले की सुनवाई से अलग किया और दावा कि उनपर उच्च न्यायपालिका के सदस्य का दबाव है। यह पर्याप्त गंभीर खबर है और 2014 के पहले सभी अखबारों में लीड होती। पर इंडियन एक्सप्रेस में सिंगल कॉलम में है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह तीन कॉलम में है और शीर्षक में ही बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने जांच के आदेश दिये हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स में कॉलेजियम वाला मामला आज भी है। दि हिन्दू में (अंतरराष्ट्रीय) सीमा के आस-पास के क्षत्र में जनसांख्यिकीय बदलाव पर अमित शाह की चेतावनी प्रमुखता से छपी है। अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में इसे रेखांकित किया था। बिहार में एसआईआर से संबंधित खबरों में नेपाल से लगने वाली सीमा पर नेपालियों के रहने की खबर थी लेकिन भारत में नेपाल के लोग जमाने से रहते हैं और आने-जाने के लिए दोनों देशों के नागरिकों को पासपोर्ट की जरूरत नहीं होती है। एसआईआर के दौरान किसी विदेशी नागरिक के वोटर के रूप में पंजीकृत पाये जाने या किसी मोहल्ले में उनकी बसावट से संबंधित जानकारी, सूचना या खबर नहीं है। फिर भी अमित शाह इस तरह के आरोप लगा रहे है। व्हाट्सऐप्प पर बुर्के में दो महिलाओं की तस्वीर के साथ लिखा है, पाकिस्तान से कब और कैसे आईं फिरदौसिया और इमराना, बिहार में कैसे बनवाया वोट? गृहमंत्रालय ने मांगी रिपोर्ट।
खबर के अनुसार, फिरदौसिया जनवरी 1956 (जी हां 1956 ही, टाइपिंग की गलती नहीं है) में तीन महीने के वीजा पर भारत आई थीं। इमराना भी उसी साल तीन साल के वीजा पर भारत पहुंचीं। दोनों वीजा खत्म होने के बाद अवैध रूप रहीं और भूमिगत हो गईं। इसके बाद दोनों ने स्थानीय लोगों से शादी की और बाद में आधार व मतदाता पहचान पत्र भी बनवा लिया। बताया जाता है कि चुनाव में दोनों ने मतदान भी किया। इसे भेजने वाले ने लिखा है, ये दोनों मुहतरमा पाकिस्तान की है इनका नाम मतदाता सूची में पाए गये ये दोनों के पास आधारकार्ड वोटर आईडी मिली है बताओ ये पाकिस्तानी बंग्लादेशी रोहिंग्या किसके लिए वोटर बनाये गये पूरा हंगामा इनके फर्जी वोटरों का है सोचने वाली बात है इस देश के लिए कितना बडा खतरा बने हुए है विपक्ष। मुद्दा यह है कि जो 1956 से यहां रह रहा है उसके पास आधार या मतदाता पत्र होना कौन सी बड़ी बात है। खबर यह होती कि पिछली बार दोनों पाकिस्तान कब गई थीं और उनके पास पाकिस्तान का पासपोर्ट है या नहीं। अगर नहीं है तो 1956 में आना बेकार है और है तो केंद्र वह बिहार की भाजपा समर्थित सरकार 10 साल से क्या कर रही थी। आप जानते हैं कि बिहार में बीजेपी की सरकार है, बॉर्डर पर बीएसएफ है, दिल्ली में अमित शाह हैं और यूपी, एमपी होकर भी बिहार पहुंची हों तो सब जगह बीजेपी है। सिर्फ बंगाल में बीजेपी की सरकार नहीं है पर बीजेपी तो है ही। ये सब वोट चोरी का जवाब देने से बचने के लिए है। विपक्ष कैसे खतरा है?

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


