Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

मोदी सरकार की इस काम के लिए ज़रूर तारीफ़ होनी चाहिए!

जे सुशील-

इस सरकार की कई बातों के लिए आलोचना हो सकती है और होनी भी चाहिए लेकिन पद्म पुरस्कारों में ज़मीन पर काम करने वालों तक पहुंचने और ऐसे लोगों को सम्मानित करने के लिए इस सरकार की तारीफ होनी चाहिए.

आज से दस साल पहले तक पद्म पुरस्कार पाने वालों में ज्यादातर अंग्रेज़ीदां एलीट या नेटवर्क वाले लोग यानी जिनका दिल्ली में कोई कनेक्शन हो,वही लोग हुआ करते थे. ऐसे लोग जो अच्छा बोलते, अच्छा पहनते थे. फैबइंडिया का कुर्ता, जोधपुरी कोट और सलीके से कंघी वाले बालों के बीच पिछले कुछ सालों में जो सेंधमारी हुई है और उसमें ज़मीन से जुड़े लोग अपनी वेशभूषा, अपनी भाषा और अपने परिवेश को साथ लेकर आते हैं पुरस्कार लेने वो देखना सुखद है.

गलत कामों के लिए सरकार की आलोचना हम करते ही हैं. लेकिन पद्म पुरस्कारों में हर साल सरकार ने कई अच्छे लोगों को पुरस्कार दिया है. इसके लिए साधू साधू.

तस्वीर में तुलसी गौडा हैं. उनके बारे में गूगल कर के और पढ़ा जा सकता है.

पंकज कुमार झा-

ये हैं आज की पद्मश्री। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लोक के कदमों के नीचे बिछी यह लाल कालीन आज की तस्वीर है।

भारतवर्ष ने अभी तक वही ज़माना देखा है जब एक ही ख़ानदान के प्रधानमंत्रियों ने खुद को ही भारत रत्न देते रहने का कारनामा किया हुआ था बार-बार।

जिस देश के प्रधानमंत्रियों ने भारत रत्न जैसे सम्मान को ‘अंधों की रेवड़ी’ बना दिया हो, वहां पद्म सम्मान लेती भारत की इस मालकिन को देखिये और आनंदित होईए।


अनिल कुमार-

आतंकियों के लिये रोने वाली सरकारें बहुत आई हैं, रोने वाली चाची भी आईं, भतीजा भी आया, लेकिन शरीफ चचा जैसे लोगों के लिये उनकी आंखों में ना आंसू होते हैं और ना सम्‍मान!!

केंद्र सरकार ने शरीफ चचा को पद्मश्री से नवाजा है। सरकार के इस कदम से सम्‍मान को भी उतना ही सम्‍मान मिला है, जितना शरीफ चचा के हिस्‍से में आया है। रामनगरी अयोध्‍या के शरीफ चचा की पहचान यह है कि वह किसी भी लावारिश लाश के वारिश हैं। वह अयोध्‍या में किसी भी लावारिश शव की दुगर्ति नहीं होने देते हैं। बीते पचीस सालों में 25000 से ज्‍यादा लावारिश लोगों के अपने बनकर उनके धर्म के अनुसार अंतिम संस्‍कार खुद के खर्चों पर किया है।

जवान बेटे की लावारिश मौत से आहत शरीफ चचा ने प्रण लिया कि अब अयोध्‍या में कोई लावारिश शव दुगर्ति को प्राप्‍त नहीं होगा, फिर उसके बाद उन्‍होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। खुद किराये के घर और गरीबी में रहने वाले शरीफ चचा ने अपने खुद की कमाई से पिछले ढाई दशक से यह नेक काम करते चले आ रहे हैं, लेकिन आंतकियों के लिये रोने वाले या उनकी सजा माफी वाले किसी भी सरकार की नजर इस नेक इंसान के पवित्र काम पर नहीं पड़ी।

आखिरकार अल्‍लाह के इस बंदे पर नजर पड़ी भी तो उस सरकार के लोगों की पड़ी जिन्‍हें रोने वाले अल्‍पसंख्‍यक विरोधी बताते हैं। चचा आपको पद्मश्री मुबारक। रोने वालों को आंसू मुबारक।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन