दुर्लभ व्यक्तित्व था पंकज सिंह का… श्रद्धांजलि सभा में जुटे संस्कृतिकर्मी

कवि, पत्रकार और कला समीक्षक पंकज सिंह का सोमवार को जब दिल्ली के निगमबोध घाट पर अन्तिम संस्कार हो रहा था, लखनऊ में भी उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए संस्कृतिकर्मी एकत्र हुए थे। कलास्रोत के तत्वावधान में सोमवार को श्रद्धांजलि सभा ‘हमारी छायाएं..’ का आयोजन किया गया था जिसमें नगर के साहित्यकारों, कलाकारों, रंगकर्मियों ने उन्हें याद करते हुए कहा कि उनका व्यक्तित्व बहुआयामी और दुर्लभ था। अच्छे साहित्यकार और पत्रकार होने के साथ ही वे शास्त्रीय संगीत, कला और सिनेमा में भी गहरी दखल रखते थे।

वक्ताओं ने ये भी रेखांकित किया कि उनकी छवि दबंग साहित्यकार की भी रही है लेकिन उनका विरोध कभी भी व्यक्तिगत कारणों से नहीं रहा। उन्होंने सामाजिक वजहों के कारण ही प्रतिरोध किया लेकिन इसके उलट वे व्यक्तिगत जीवन में नरमदिल थे और लोगों से स्नेह का व्यवहार रखते थे।

साहित्यकार रवीन्द्र वर्मा, नरेश सक्सेना, वीरेन्द्र यादव, अखिलेश, सामाजिक कार्यकर्ता एवं लखनऊ विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर रमेश दीक्षित, पत्रकार वन्दना मिश्र एवं पी.के.तिवारी, चित्रकार एवं कला महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य जयकृष्ण अग्रवाल, नाटककार राजेश कुमार, कलम विचार मंच के दीपक कबीर सहित काफी लोग दिवंगत साहित्यकार-पत्रकार को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए जुटे थे।वरिष्ठ साहित्यकार रवीन्द्र वर्मा ने पंकज सिंह के सम्पादन में निकले ‘सोच’ पत्रिका के अंक की प्रशंसा करते हुए कहा कि अच्छे कवि होने के साथ ही उन्होंने इसका बेहतरीन सम्पादन किया।

नरेश सक्सेना का कहना था कि वे मेरी कविताओं की चर्चा में कहते थे कि कविता को उसके शिल्प और संवेदना के कारण पहचाना जाना चाहिए, इस कारण नहीं कि उसमें विज्ञान आ गया है या कुछ और। पंकज सिंह के मित्र रहे रमेश दीक्षित ने अपने लम्बे वक्तव्य में कहा कि वे उसके पक्ष में खड़े होते थे जो सबसे कमजोर होता था। किसी प्रकाशक ने अगर लेखक की रायल्टी नहीं दी हो तो वे तुरन्त उसका विरोध शुरू कर देते। लेखन में हमेशा उपयुक्त शब्द ढूंढते। वास्तव में उनकी तलाश पूर्णता की थी।

‘तद्भव’ के सम्पादक अखिलेश ने विस्तार से उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा करते हुए कहा कि जब तक मैं उनसे नहीं मिला था तो मेरे मन में उनकी छवि दबंग व्यक्ति की थी लेकिन मिलने पर पता चला कि वे कितना स्नेह से मिलते थे। उनमें अद्भुत किस्म का साहस था। कविता, कला, संगीत, सिनेमा जैसे विभिन्न माध्यमों से जुड़ने के पीछे वास्तव में उनकी वह बेचैनी थी जो किसी सृजनकार का बुनियादी तत्व होता है। वीरेन्द्र यादव ने पिछले 23 अक्तूबर को दिल्ली में हुए साहित्यकारों के प्रदर्शन का जिक्र करते हुए कहा कि उनसे उस मौके पर आखिरी भेंट हुई थी। वे समग्र व्यक्तित्व थे।

पत्रकार वन्दना मिश्र का कहना था कि पंकज सिंह की कविताओं की उस तरह से चर्चा नहीं होती है जैसी होनी चाहिए। उन्होंने मृत्यु पर भी बहुत सारी कविताएं लिखी हैं। नाटककार राजेश कुमार ने कहा कि वे वामपंथी मूल्यों के पक्षधर थे। पत्रकार पी.के.तिवारी ने कहा कि वे क्षेत्रीय से लेकर अन्तरराष्ट्रीय मुद्दों तक गहरी जानकारी और दखल रखते थे।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए पत्रकार और ‘कलास्रोत’ के सम्पादक आलोक पराड़कर ने कहा कि वे भाषा और वर्तनी की शुद्धता के पक्षधर थे तथा किसी भी शब्द को लेकर बहुत सतर्क रहते थे। दीर्घा में पिछले दिनों उन्होंने ‘कलास्रोत’ के दूसरे अंक का लोकार्पण किया था और अपनी कविताएं भी सुनाईं थी। इस मौके पर दीर्घा के क्यूरेटर भूपेन्द्र अस्थाना ने पंकज सिंह से जुड़ी पारदर्शियों का प्रदर्शन किया। कलास्रोत फाउंडेशन के निदेशक अनुराग डिडवानिया एवं मानसी डिडवानिया ने धन्यवाद ज्ञापन किया। 

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