एक पत्रकार की आपबीती : मेरे कुछ समझने से पहले ही कुछ आंदोलनकारियों ने डंडों से कार के शीशे तोड़ना शुरू कर दिया

दहशत की वो रात : 20 फरवरी को सुबह जब घर से निकला था तब ये सोचा न था कि आज रात घर न आ पाउंगा। हर रोज की तरह पत्‍नी नाश्‍ता लेकर आई और कहा रात में आते समय घर की सब्‍जियां लेते आना। मैं अपनी धुन में अपनी गाड़ी उठाए हवा से बात करे हुए दिल्‍ली पहुंचा। रास्‍ते में कुछ आंदोलनकारी दिखे, लेकिन उनको अनदेखा कर मैं आगे बढ़ता गया। पूरे दिन काम खत्‍म करने के बाद जब घर की तरफ निकला तो एक दोस्‍त ने फोन किया कि आज सोनीपत न आना। घर फोन किया तो फोन नहीं लग रहा था। दिल में बेचैनी थी और घबराहट भी कि जाने कैसे होंगे घर और मोहल्‍ले वाले।

बार-बार ये ख्‍याल आ रहा था कि कहीं कुछ हुआ तो नहीं होगा। लगातार फोन लगाने की कोशिश कर रहा था और गाड़ी को घर की ओर बढ़ा रहा था। ताकि जल्‍दी से जल्‍दी घर पहुंच सकूं। लेकिन जब बार्डर पर पहुंचा तो पता चला कि रास्‍ता बंद है। आगे जा नहीं सकता। आस-पास कुछ लोग थे, उनसे मैंने पूछा कि क्‍या ऐसा कोई रास्‍ता है कि जिससे मैं घर जा सकूं। लेकिन किसी से कोई माकूल जवाब नहीं मिला। निराशा हाथ लगी। दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थी। मैं सोच रहा था कि अपनी मांगों को लेकर इस तरह के प्रदर्शन कहां तक जायज हैं। सामने खड़ी पुलिस को देखकर गुस्‍सा और बढ़ता जा रहा था और जी कर रहा था कि एक बार सुना दूं कि तुम यहां खड़े-खड़े कर क्‍या रहे हो। तभी किसी ने मुझे कहा कि अपनी गाड़ी दिल्‍ली की ओर घुमा लो, क्‍योंकि आंदोलनकारी बार्डर के नजदीक आ रहे हैं।

फिर क्‍या था कि मजबूरन दिल्‍ली की तरफ मोड़नी ही पड़ी। अभी तक घर पर फोन नहीं लगा था। इसी बीच मुझे पास में रहने वाले एक दोस्‍त जयदीप का ध्‍यान आया। मैंने जयदीप को फोन कर उससे पूछा कि घर और मोहल्‍ला ठीक तो है। जब उसने कहा सबकुछ ठीक है तो मेरी जान में जान आई। मैंने उससे कहा कि जरा मेरे घर पर कहा कि कहदेना कि आज मैं घर देर से आउंगा। सकून भरी सांस ली कि घर पर सब ठीक है। उसके बाद मैं दिल्‍ली के हर उस बार्डर से हरियाणा में जाने की कोशिश करने लगा, जिसके बारे में मुझे लोगों ने बताया। मैं सबसे पहले नरेला से सफियाबाद के रास्‍ते सोनीपत जाने वाले रास्‍ते पर गया तो वहां भी आंदोलनकारी बैठे थे। इसके बाद मैंने वहां से बवाना नहर का मार्ग चुना, मगर वहां भी स्‍थिति पहले से बदतर ही मिली। वहां पर सफल न होने के कारा मैंने नजफगढ़ की तरफ से जाने वाले एक रास्‍ते पर भी कोशिश किया, मगर सफलता नहीं मिली।

उसके बाद मैं नरेला से होते हुए बुराड़ी के रास्‍ते सोनीपत जाने की कोशिश करने लगा, मगर हालात फिर पहले जैसे ही मिले। अंत में सोचा क्‍यों न दिल्‍ली की बजाए मैं यूपी के रास्‍ते घर पहुंच जाऊं। मैंने लोनी से बागपत होते हुए सोनीपत जाने वाले रास्‍ते पर कार दौड़ा दी। वहां से बार्डर पार कर मैं सोनीपत में प्रवेश कर गया और खुश था। मगर यह खुशी ज्‍यादा देर तक न कायम रही। खेवड़ा गांव के पास जाट आंदोलनकारियों द्वारा एक वाहन में आग लगा दी गई। वहां का दृश्‍य देखा तो कांप गया और वापस गाड़ी घुमा ली। कई लोगों से पूछा कि सोनीपत कैसे जाया जाए, मगर कोई नहीं बता सका। अंत में मजबूर होकर वापस यूपी में घुसना पड़ा।

मैं हताश व निराश था कि मैं अपने घर नहीं पहुंच पा रहा हूं। मैंने कार के मीटर पर नजर डाली तो पता चला कि घर पहुंचने के चक्‍कर में मैं 200 किलोमीटर से अधिक कार चला चुका हूं। शरीर में थकावट थी। रूआंसे मन से पत्‍नी को फोन कर कहा कि आज मैं घर नहीं आ पाउंगा। मैंने अपनी कार को साहिबाबाद में अपनी बहन के घर की ओर दौड़ा दिया। वहां पहुंच कर जब टीवी पर मैंने जाट आंदोलन का हाल देखा तो घर के लोगों की चिंता और सताने लगी। मैं वहां पर लेटा, मगर नींद आंखों से कोसों दूर थी। जयदीप से फोन पर बात हुई तो उसने कहा कि सुबह सवेरे अगर आने की कोशिश करो तो सड़क खाली मिल सकती है।

जैसे-तैसे मैंने सुबह 4 बजे तक का समय काटा। घड़ी में सुबह के 4 बज रहे थे। अब जी न लगा। अब सोचा कि अब तो चला ही जाउंगा। फिर क्‍या था कि कार उठाई और सोनीपत की ओर निकल पड़ा। जयदीप ने ठीक कहा था कि सुबह सड़क खाली मिलेगी। सड़कों के किनारे जाट थे तो जरूर, लेकिन सोए हुए। एक घंटे की दूरी मैंने 35 मिनट में तय कर ली। मैंने नरेला के रास्‍ते सोनीपत में दाखिल होने में कामयाब हो गया। मुझे डर सता रहा था, मगर घरवालों का ख्‍याल, मुझे उस डर से लड़ने की ताकत दे रहा था। मैं जठेड़ी व राठधना को पार करते हुए सोनीपत शहर में दाखिल हो गया। घड़ी सुबह के पांच बजा रही थी और मैं बंदेपुर गांव को पार कर रहा था।

घर से महज एक किलोमीटर पहले एक आंदोलनकारियों का झुंड अचानक गाड़ी के सामने आ गया। मैंने ब्रेक लगाया, इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता या कह पाता, कुछ आंदोलनकारियों ने डंडों से मेरे शीशों को तोड़ना शुरू कर दिया। मैंने चिल्‍ला कर कहा कि भाई मैं भी यहीं का हूं। तभी एक ने कहा कि यहां कार लेकर आए ही क्‍यों, अब कार नहीं बचेगी। मेरी कार के सभी शीशे तोड़ने के बाद एक आंदोलनकारी ने मुझसे कार की चाबी छीनने का प्रयास किया और मुझे जबरन कार से बाहर निकालने का प्रयास किया, मगर मैंने उनकी हाथापाई का मुकाबला किया। तभी एक आंदोलनकारी ने मेरी कार पर बोतल से पैट्रोल फेंक दिया।

वो कार में आग लगाने की बात कहकर मुझे निकलने को कह रहा था, मगर मैंने कार से निकलने से मना कर दिया। तभी एक आंदोलनकारी हरियाणवी भाषा में चिल्‍लाया- ”भाई याड़ै माणस नहीं मारणा, कार मैं जो नुकसान कर दिया बतेरा सै।” इस बात को लेकर हमलावरों में बहस हो रही थी कि मुझे कार में पड़ी मेरी चाबी मिल गई। मैंने कार स्‍टार्ट की ओर मैं अपनी कार से सामने खड़ी एक मोटरसाइकिल को टक्‍कर मारता हुआ वहां से कार लेकर भागा। मैं इस कदर घबराया हुआ था कि मैंने पीछे नहीं देखा कि कौन आ रहा है या नहीं। मेरी कार के ब्रेक सीधे मेरे घर के बाहर जाकर लगे।

मैंने कार की हालत देखी और घर का दरवाजा खटखटाया। दरवाजा मेरे पिता ने खोला। वो मेरे फटे कपड़े और गाड़ी की हालत देखकर चिंता में आ गए। फिर भी उन्‍होंने अपनी चिंता मेरे सामने जाहिर न करते हुए कहा कि बेटा कपड़े बदल कर थोड़ा सो जाओ, बाद में बात करेंगे। मैं सो गया और सुबह 8 बजे उठा। मेरी गली में मेरा हाल-चाल जानने वालों का हुजूम था। मैंने हाथ मुंह धोया और सीधे पुलिस थाना जाकर अपनी आपबीती बताई और शिकायत दर्ज कराई। इस घटना के बाद कई सवाल मन में उठ रहे थे। मैं तो घर पहुंच गया था, लेकिन उन लोगों का क्‍या जो हरियाणा के अलग-अलग जगहों पर फंसे हुए हैं।

पत्रकार पवन कुमार ने अपनी यह आपबीती फेसबुक पर साझा की है.



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