उत्तराखंड में पीडीएफ का काम केवल दाल-भात खाना था?

उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री हरीश रावत के साथ ही विजय बहुगुणा, हरक सिंह रावत समेत नौ विद्रोही विधायकों की छवि पर हालिया घटनाओं से ऐसा बट्टा लगा है, जिसे सुधारने के लिए उन्हें शायद दूसरा जन्म रखना पड़े, लेकिन सरकार की बैसाखी बने पीडीएफ के विधायक भी इस राजनीति की इस काली कोठरी से बेदाग़ नहीं निकल पाए। राज्य में स्थायी सरकार के लिए समर्थन करने की पीडीएफ की जितनी मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की गयी थी, स्टिंग प्रकरण के बाद भी सरकार से इनके गलबहियां किये रहने की उतनी ही भर्त्सना हुई है। पीएडीएफ के नेता मन्त्री प्रसाद नैथानी सतपाल महाराज के ख़ास लोगों में एक माने जाते रहे हैं। जब कॉंग्रेस महासचिव होते हुए भी पिछले विधानसभा चुनाव में मन्त्री को देवप्रयाग से टिकट न मिला तो मन्त्री प्रसाद निर्दलीय लड़े और जीत गए थे।

बताते हैं कि सतपाल महाराज ने उन्हें टिकट दिलवाने की खूब पैरवी की, पर उनकी वकालत बेअसर रही। मन्त्री के पार्टी छोड़ने और जीतने के बाद भी सतपाल महाराज के प्रति उनकी आस्था बरकरार रही। विजय बहुगुणा और सतपाल में 36 का आंकड़ा माना जाता रहा, इसलिए महाराज बहुगुणा को मुख्यमंत्री नहीं बनना देखना चाहते थे। मन्त्री प्रसाद भी पहले इसी विचार मार्ग पर थे, लेकिंन जब सीएम के लिए बहुगुणा के नाम की घोषणा हुई तो वे बहुगुणा की गोद में बैठ गए। मन्त्री का तर्क था कि राज्य के विकास और स्थायित्व के लिए वे छोटे-मोटे सिद्धांतों से समझौता कर लेंगे। फिर तख्तापलट के बाद हरीश रावत सीएम बने तो मन्त्री प्रसाद उनके भी खास हो गए।

इन करीब सवा चार सालों में शायद ही कभी ऐसा मौका आया हो, जब मन्त्री तो क्या उनके खेमे के किसी भी विधायक ने सरकार या मुख्यमंत्रियों के किसी गलत फैसलों का विरोध किया हो। हाँ, दिनेश धनै को मन्त्री बनवाने के लिए पीडीएफ ने जरूर आँखें दिखाईं। इन मंत्रियों का रवैया ठीक वैसा रहा, जैसे भाजपा काल में यूकेडी के कोटे से मन्त्री बने दिवाकर भट्ट का। हरक सिंह ने कुछ मामलों में मन्त्री के विभाग (शिक्षा) के नियमों की अवहेलना कर अपने हित साधे, तब भी मन्त्री प्रसाद कुछ नहीं कर पाये। लालच और मजबूरी में सरकार से चिपके रहे पीडीएफ को इसका परिणाम बदनामी के रूप में मिला।

जब नौ विधायक बागी हुए तो पीडीएफ ने हरीश रावत को आश्वस्त भले ही किया, लेकिन स्टिंग प्रकरण के बाद भी इनका सरकार से चिपके रहना कई सवाल पैदा कर गया है। पीडीएफ के पास इस परिस्थिति में जनता का विश्वास बनाये रखने के लिए दो विकल्प थे-पहला मुख्यमंत्री बदलने की मांग और दूसरा पदों से त्यागपत्र। पीडीएफ का यह त्याग उसके विधायकों को फिर से पांच साल की सत्ता का रास्ता खोल सकता था। उन्हें भाजपा-कांग्रेस के दामन पर लगे दागों का भी लाभ मिल सकता था, लेकिन हो सकता है आठ महीने की सत्ता और पार्टी से टिकट मिलने की आस का लालच उन्हें ऐसा करने से रोक गया। ऐसे में तो हरीश, नौ विद्रोहियों और पीडीएफ के विधायकों में क्या फर्क रह गया। एक बाग़ में एक जैसे फूल।

डॉ.वीरेन्द्र बर्त्वाल
वरिष्ठ पत्रकार
देहरादून
veerendra.bartwal8@gmail.com
9411341443

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