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पीआईबी के मुर्दा अफसरों की मौज और दिल्ली के जिंदा पत्रकारों की दुर्दशा

: केन्द्र सरकार के पत्रकार कल्याण कोष को नौकरशाही के चंगुल से मुक्ति जरूरी : जरूरतमंद पत्रकार जब मर जाते हैं तब भी समय से नहीं मिलता आर्थिक सहयोग :  प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के कार्यकाल में सूचना एवं प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज ने पत्रकारों के कल्याण के लिए केन्द्र सरकार का एक कोष बनाया था। पत्रकार कल्याण कोष का उद्देश्य विशेषरूप से गंभीर बीमारी से जूझ रहे या फिर आर्थिक तंगी के शिकार पत्रकारों की आर्थिक रूप से मदद करना था। लेकिन नौकरशाही की नुक्ताचीनी और लाल फीताशाही का यह आलम है कि शायद ही किसी जरूरतमंद पत्रकार को समय रहते इस कोष से मदद मिल सकी हो।

: केन्द्र सरकार के पत्रकार कल्याण कोष को नौकरशाही के चंगुल से मुक्ति जरूरी : जरूरतमंद पत्रकार जब मर जाते हैं तब भी समय से नहीं मिलता आर्थिक सहयोग :  प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के कार्यकाल में सूचना एवं प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज ने पत्रकारों के कल्याण के लिए केन्द्र सरकार का एक कोष बनाया था। पत्रकार कल्याण कोष का उद्देश्य विशेषरूप से गंभीर बीमारी से जूझ रहे या फिर आर्थिक तंगी के शिकार पत्रकारों की आर्थिक रूप से मदद करना था। लेकिन नौकरशाही की नुक्ताचीनी और लाल फीताशाही का यह आलम है कि शायद ही किसी जरूरतमंद पत्रकार को समय रहते इस कोष से मदद मिल सकी हो।

बताते हैं कि गंभीर बीमारी से जूझते जूझते इस संसार से विदा होने वाले वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर को इलाज के लिये उनके जीवनकाल में इस कोष से मदद नहीं मिल सकी। इसी तरह बताया जाता है कि मुंबई के क्राइम रिपोर्ट जे डे की हत्या के बाद जब उनके परिवार को आर्थिक मदद देने का सुझाव आया तो भी नौकरशाही ने उसमे जी भर के अडंगेबाजी की। कुछ इसी तरह की लाल फीताशाही का शिकार दूसरे पत्रकार भी हो रहे हैं। पीआईबी से बाकायदा संस्तुति किये जाने के बावजूद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के आला अफसर किसी न किसी बहाने से पत्रकारों को इस कोष का लाभ पाने से वंचित करने में लगे रहते हैं।

एक पत्रकार हैं जिनकी पिछले करीब चार साल से डायलिसिस हो रही है। एम्स, आरएमएल और सफदरजंग जैसे सरकारी अस्पतालों ने ओपीडी मरीज के रूप में नियिमित डायलिसिस करने से हाथ खडे कर लिये। आरएमएल के चिकित्सा अधीक्षक ने तो उन्हें दो टूक शब्दों में कह दिया कि ओपीडी मरीज के रूप में यहां नियमित डायलिसिस संभव ही नहीं है। यही स्थिति एम्स की भी है।  ऐसी स्थिति में मजबूरी में किडनी के मरीज को प्रायवेट अस्पतालों के ही चक्कर लगाने पडते हैं जो बहुत ही खर्चीला है। एक बार की डायलिसिस पर 2500 से 3000 रूपए खर्च आता है और यह सप्ताह में कम से कम दो बार करानी पडती है।

इसी सिलसिले में मार्च 2011 को इस पत्रकार ने किसी सरकारी अस्पताल में डायलिसिस की सुविधा मुहैया कराने के बारे में तत्कालीन स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नबी आजाद को खत लिखा गयाा। केन्द्रीय स्वास्थ्य सेवा योजना के मुख्यालय से भी पत्राचार करके अनुरोध किया कि चूंकि सरकारी अस्पताल में ओपीडी मरीज के रूप में नियमित डायलिसिस की सुविधा नहीं मिल रही है, इसलिए सीजीएचएस के डायलिसिस केन्द्र में यह सुविधा प्रदान करने का अनुरोध किया गया लेकिन कहीं कुछ नहीं हुआ।

केन्द्र सरकार के पत्रकार कल्याण कोष से मदद के लिये पत्र सूचना कार्यालय को पत्र लिखा गया।  साथ में  सीजीएचएस मुख्यालय से मिले जवाब भी संलग्न किये गये। लेकिन अचानक दो साल बाद नवंबर 2013 में पत्रकार को पीआईबी से एक पत्र मिलता है कि सक्षम प्राधिकारी आरएमएल ने डायलिसिस करने से जो इंकार किया है उसका दस्तावेजी साक्ष्य चाहते है।   खैर, एक बार फिर सारे पत्राचार संलग्न करके पीआईबी को सौंपे गये और उसमे पत्रकार आलोक तोमर को जीवन काल के दौरान मदद नहीं मिल पाने की घटना का जिक्र भी किया गया।

अब करीब आठ महीने बाद फिर पीआईबी से पत्र मिलता है कि जिसमे पुराना राग अलापा गया है कि सक्षम प्राधिकारी आरएमएल अस्पताल द्वारा डायलिसिस करने से इंकार किये जाने संबंधी दस्तावेजी साक्ष्य चाहते हैं जबकि यह सर्वविदित है कि अस्पताल में उपचार से इंकार करते समय कोई लिखित में नहीं देता है। सक्षम अधिकारी या फिर उनके अधीन कर्मचारी चाहें तो स्वास्थ्य सेवा महानिदेश के माध्यम से वस्तुस्थिति की जानकारी ले सकते हैं लेकिन वे इतना कष्ट उठाना ही नहीं चाहते। यह है सरकारी तंत्र के उदासीन और लालफीताशाही का नमूना।

यह ठीक है कि चार साल में दो पत्र तो मिले लेकिन इस दौरान नौकरशाही ने अपने स्तर पर स्वास्थ्य मंत्रालय या फिर स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय से यह पता करने का प्रयास नहीं किया कि क्या वास्तव में भारत सरकार से मान्यता प्राप्त और सीजीएचएस के कार्ड धारक पत्रकारों को एम्स, अरएमएल या फिर आरएमएल जैसे अस्पताल में नियमित डायलिसिस की सुविधा उपलब्ध करायी जाती है या नहीं।  इसमें संदेह नहीं है कि किसी भी गंभीर बीमारी से उत्पन्न स्थिति का सामना पीडित पत्रकार और उसके परिजन अपने मित्रों और शुभचिंतक के साथ मिलजुल कर ही लेंगे लेकिन सवाल उठता है कि ऐसे पत्रकार कल्याण कोष का औचित्य ही क्या रह जाता है जो गंभीर बीमारी जैसे दौर में पत्रकार की सहायता नहीं कर सके। 

बेहतर होगा कि पत्रकार कल्याण कोष से पत्रकारों की मदद करने के उद्देश्य को अधिक तर्कसंगत बनाया जाये और यदि लाल फीताशाही ऐसा नहीं करने देती है तो इसे उसके चंगुल से मुक्त करके पीआईबी को ही यह जिम्मेदारी दे दी जाये ताकि जरूरतमंद पत्रकारों को समय से आर्थिक सहयोग मिल सकें।

मनोज वर्मा

अध्यक्ष

दिल्ली जर्नलिस्ट एसोसिएशन

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