प्रधानमंत्री जी, अखबार तो इमरजेंसी के दिनों से भी बुरे हैं!

संजय कुमार सिंह-

जब प्रधानमंत्री को यह बताना पड़े कि आठ साल में उन्होंने देश को गांधी और पटेल के सपनों का भारत बनाने का ‘प्रयास’ किया और उनकी सरकार ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे जनता को ‘शर्म’ आए तो अखबारों का काम था कि उनके काम-काज का कुछ लेखा-जोखा प्रकाशित करते। मैं जो अखबार पढ़ता हूं उनमें सिर्फ द टेलीग्राफ ने यह काम किया है और पहले पन्ने पर बताया है कि आर्यन खान के मामले में हमें सॉरी कहना क्यों सीखना चाहिए।

बहुत सीधी सी बात को हिन्दुस्तान टाइम्स ने जलेबी बनाते हुए लिखा है, “एनसीबी प्रमुख ने सभी इकाइयों से कहा कि सिर्फ बड़े मामलों पर नजर डाला जाए”। सुशांत सिंह की मौत के मामले में रिया चक्रवर्ती को जिस ढंग से लपेटा गया उसपर किसे शर्म नहीं आई? और अब आर्यन मामले में यह सार्वजनिक स्वीकारोक्ति सीधे शब्दों में क्यों नहीं छपी है? आठ साल में यह हाल क्यों हुआ है। क्या यह शर्मनाक नहीं है?

आज इंडियन एक्सप्रेस में खबर है, “मद्रास हाईकोर्ट के लिए कॉलेजियम ने छह लोगों को जज बनाने की सिफारिश की, चार क्लीयर कर दिए गए दो पर केंद्र सरकार बैठ गई”। हिन्दुस्तान टाइम्स ने प्रधानमंत्री के दावे को ही लीड बनाया है, “योजनाओं की 100 प्रतिशत पहुंच का लक्ष्य”। पर आठ साल का समय लक्ष्य बताने का नहीं, उसकी सफलता बताने का होता है। प्रधानमंत्री ने बताया नहीं, अखबारों ने ना पूछा ना अपनी तरफ से बताया। मैं सिर्फ पहले पन्ने की बात कर रहा हूं। मेरा मानना है कि ऐसी खबरें अंदर के पन्ने पर छिपाकर छापने का कोई मतलब नहीं है। इसी तरह हिन्दुस्तान टाइम्स में गृहमंत्री का कहा शीर्षक है, “तटीय सुरक्षा हमारा लक्ष्य है”। मुंबई हमले के बाद ही साबित हो गया था कि हम तटीय सुरक्षा में मार खा गए। ध्यान नहीं देंगे तो जोखिम उठाएंगे। यह तो जरूरी और सामान्य काम है। यह पहले पन्ने की खबर कैसे? कहने की जरूरत नहीं है कि दावों का सच नहीं बताना है तो दावे पहले पन्ने पर क्यों?

उदाहरण के लिए, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने दावा किया है कि 88 प्रतिशत लोगों को कोविड से बचाव के लिए पूरी तरह टीका लग चुका है। आप जानते हैं कि टीके की तीसरी खुराक लग रही है। मुझे यकीन नहीं है कि 88 प्रतिशत लोगों को तीनों खुराक लग गई होगी। अगर यह एक या दो खुराक लगने की संख्या है तो तीसरी किसलिए लग रही है और अगर सबको तीनों खुराक लग चुकी है तो 12 प्रतिशत बाकी क्यों रह गए। हो सकता है इसका विवरण अंदर के पन्नों पर होगा लेकिन पहले पन्ने पर इस तरह के दावे और प्रचार का क्या मतलब है। वैसे भी, सरकार का काम है महामारी में जनता के बचाव के उपाय करना। अभी तक 12 प्रतिशत लोग बाकी हैं – खबर तो यह है। पर सरकारी दावे को महत्व देने का अखबारों का यह रिवाज मुझे तो शर्मिन्दा करता है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड का इंट्रो है, “राष्ट्र सेवा में कोई प्रयास नहीं छोड़ा है”। पर मुद्दा तो यह है कि आपके प्रयासों का उल्टा असर हुआ है चाहे नोटबंदी हो या अनुच्छेद 370 हटाना। उसके लिए आप क्या कर रहे हैं – यह ना बता रहे हैं और ना कोई पूछ रहा है। द हिन्दू ने लीड का उपशीर्षक लगाया है, “चुनाव वाले गुजरात में, प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के क्ल्याणकारी उपायों की सूची गिनाई”। यह सबसे सुरक्षित विरोध या समर्थन है। इसके जरिए बता दिया गया कि प्रधानमंत्री प्रचारक की भूमिका में हैं परेशान होने की जरूरत नहीं है। या आप बहुत ही प्रभावित हो जाएं तो सच साथ में है कि यह प्रचार है। लेकिन अभी का समय ऐसा नहीं है। प्रधानसेवक जब खुलकर प्रचार कर रहे हैं तो उनका सच खुलकर बताया-पूछा जाना चाहिए – वरना आप देश के साथ गद्दारी करने का मौका दे रहे हैं।

इस लिहाज से मुझे द टेलीग्राफ हमेशा ठीक लगता है। अखबार ने बताया है कि बुकर पुरस्कार पाने वाली लेखिका को प्रधानमंत्री ने अभी तक बधाई नहीं दी है। अखबार ने इसका संबंध गीतांजलि श्री के 2003 के एक आलेख की टिप्पणी से जोड़ा है जो बताया है कि शुक्रवार को इंडियन कल्चरल फोरम ने उसे पुनर्प्रकाशित किया है। पहले पन्ने पर पांच कॉलम में प्रकाशित इस एंकर खबर का फ्लैग शीर्षक है, “प्रधानमंत्री ने दंगे की चर्चा करने वाली लेखिका को अभी तक बधाई नहीं दी है”। अनिता जोशुआ ने इस खबर में लिखा है, “यह जरूरी नहीं है कि प्रधानमंत्री हर भारतीय को पुरस्कार मिलने पर बधाई दें। मनमोहन सिंह ने 2006 में किरण देसाई को बुकर मिलने पर आधिकारिक तौर पर बधाई नहीं दी थी लेकिन दो साल बाद अरविन्द अडिगा को यही पुरस्कार मिलने बधाई दी।”

आगे लिखा है, “मोदी और खासकर भाजपा की चुप्पी इसलिए उत्सुकता जगाती है कि यह पुस्तक मूल रूप में हिन्दी में लिखी गई थी और यह वह भाषा है जिसे सरकार बढ़ावा देना चाहती है। बुकर प्राइज के वेबसाइट के अनुसार यह किसी भी भारतीय भाषा में लिखी गई पहली पुस्तक है जिसे यह पुरस्कार मिला है और हिन्दी से अनुदित पहला उपन्यास है जिसे पुरस्कार के लिए पहचान मिली। ऐसे में दक्षिणपंथियों की चुप्पी पुस्तक पर प्रतिक्रिया लगती है जिसे जो बुकर के निर्णायकों ने जताई और इसे ‘मधुर कोलाहल’ कहा है। पुस्तक एक 80 वर्षीय महिला की कहानी है जो अपने पति की मृत्यु के बाद गहरे अवसाद में चली जाती है। आखिरकार, वह अपने अवसाद पर काबू पाती है और विभाजन के दौरान अपने पीछे छोड़े गए अतीत का सामना करने के लिए पाकिस्तान जाने का फैसला करती है।

दया शंकर राय-

बिलकुल कितने फक्र की बात है कि नोटबन्दी के चलते करीब तीन सौ लोगों ने लाइन में लगकर जानें गवां दी..! कोरोना के चलते ऑक्सीजन के अभाव में लाखों लोगों ने घर में, सड़क पर, एम्बुलेंस में और अस्पताल में दम तोड़ दिया..! यह सब शर्म नहीं इतने गौरव की बात है कि दुनिया में हमारा नाम काफी रोशन हुआ..! ऐसे गौरव की लिस्ट बहुत लंबी है, आख़िर क्या-क्या गिनायें..!!



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One comment on “प्रधानमंत्री जी, अखबार तो इमरजेंसी के दिनों से भी बुरे हैं!”

  • ees pure lekh me ek baat mujhe bahut aakarshit karti hai …
    “इसी तरह हिन्दुस्तान टाइम्स में गृहमंत्री का कहा शीर्षक है, “तटीय सुरक्षा हमारा लक्ष्य है”।”
    Agar Amit Shah ko eeski itani chinta hai to fir aisa kyon hai Kuchch ke port me eetane bade paimane par Drugs kaise mil raha wo bhi lagatar.
    Delhi ke bade media house ko shayad hi pata hoga ki ye drugs sirf Adani/mundra port par nahi pakda jaa raha balki, Bhuj/Madavi City jo bilkul Pakistan border ke saath hai waha bhi choti choti matra me (5 se 20 KG) drugs pakde jaa rahe hai jo border paar se aa raha hai.
    Ab log kahange ki security shakht hai tabhi to pakdi jaa rahi hai to aisi kya shakhti hai log lagatr drug India me bhej rahe hai. our agar pakde jaa rahe hai to matlab saaf hai bahut sara drug bina nazzar me aaye India ke anek hisso me supply bhi ho gaya hoga.

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