पीएम ने पत्रकारों को किया निराश, ना कोई आर्थिक मदद घोषित की और ना ही बीमा कवर में शामिल किया!

पीएम साहब ! लॉकडॉउन में बेरोजगार हो गए हैं तमाम पत्रकार

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कोरोना संक्रमण के दौरान किए गए लाक डाउन के दौरान जनता को राहत देने के लिए कई पैकेज घोषित किए हैं। इसमें गरीब मजदूर किसान व महिलाओं का ध्यान तो रखा गया है लेकिन पत्रकारों के लिए ना तो कोई आर्थिक मदद घोषित की गई और ना ही उन्हें बीमा कवर में शामिल किया गया। जबकि प्रधानमंत्री कोरोना सेनानियों में मेडिकल स्टाफ, पुलिस आदि के साथ पत्रकारों को भी शामिल कर चुके हैं और राष्ट्र के नाम संबोधन में आभार भी जता गए हैं।

पत्रकारों को इसलिए मिले मदद

सरकार को बेरोजगार हुए पत्रकारों को ऐसे मुसीबत भरे समय में आर्थिक मदद देनी चाहिए साथ ही 5000000 का स्वास्थ्य बीमा जो मेडिकल कर्मियों को दिया गया है वह पत्रकारों को भी दिया जाना चाहिए। यह मामला पूरनपुर के पत्रकार संजय शुक्ला ने विधायक बाबूराम पासवान द्वारा मीडिया के लिए बनाये गए एक ग्रुप में उठाया। उनका कहना है कि अधिकांश पत्रकारों की हालत चैनल, पोर्टल व अखबार वाले आईडी तो दे देते हैं परंतु कोई मासिक वेतन या मानदेय नहीं देते। अधिकांश पत्रकार विज्ञापन के कमीशन पर ही निर्भर रहते हैं। इस मुसीबत भरे समय में जब जनता, व्यापारी व अन्य वर्ग खुद त्रस्त है तो वह विज्ञापन कहां से देगा। जब विज्ञापन नहीं मिल रहा तो कमीशन मिलना बंद हो गया और सैकड़ों पत्रकारों की रोजी रोटी लटक गई है। बड़े अखबारों में भी यही सब शोषण हो रहा है। मिनिमम बेज तक नही दिया जा रहा। 12 माह 24 घंटे काम करने वालों को उनके अपने ही अपना मानने को तैयार नहीं हैं।

केंद्र व राज्य सरकार ले संज्ञान

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व स्थानीय जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि वे इस मामले को प्रमुखता से उठाते हुए पत्रकारों के लिए भी राहत पैकेज बीमा आदि घोषित कराएं ताकि उन्हें भी इस मुसीबत की घड़ी में राहत मिल सके। योगी सरकार द्वारा घोषित राहत में पत्रकारों को बाहर रखा गया है।

वित्त मंत्री की पीसी में भी नहीं उठी समस्या

वित्त मंत्री की पीसी में पत्रकारों ने सबाल तो पूछे पर अपने पर सवाल करने की या तो उनकी हिम्मत नही हुई या वे हाई प्रोफाइल पत्रकार थे और गांव देहात के साथियों की समस्या से वे अनजान बने हैं। हालांकि सरकारों का मानना है कि पत्रकार जिस मीडिया संस्थान से जुड़े हैं वो उनका ख्याल रख रहा होगा पर ऐसा कदापि नही है।

तर्क यह भी है साहब

मान लीजिए कि संस्थान अपने कर्मियों को वेतन भत्ता दे भी रही होगी तो भी मेडिकल स्टॉप की तर्ज पर 50 लाख के मेडिकल इंसोरेंस के हकदार तो पत्रकार हैं ही। कोरोना कवरेज में वे अस्पताल भी जा रहे हैं। जब मोटा वेतन भत्ता लेने वाले स्वास्थ्य विभाग के लोग 50 लाख का मेडिकल कवर पा सकते हैं तो हर पत्रकार, सुरक्षा कर्मी, अधिकारी कर्मचारी भी इसके हकदार हुए और यह हक उन्हें दिया जाना चाहिए।

लेखक सतीश मिश्रा समाचार दर्शन के संपादक हैं.

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