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जनसत्ता से रिटायर एक मीडियाकर्मी का पत्रकारनामा (पार्ट-3) : उन दिनों ‘अल्फा’ के खिलाफ लिखना चुनौती भरा था

प्रभाकर मणि तिवारी-

दिन तो अब ठीक से याद नहीं, लेकन वह 15 मार्च, 1989 की तारीख थी. उसी दिन गुवाहाटी से हिंदी दैनिक पूर्वांचल प्रहरी शुरू करने के लिए सिलीगुड़ी से हम कोई सात-आठ लोग गुवाहाटी पहंचे थे. नए उत्साह और जोश के साथ आंतकवाद के लिए मशूहर असम के इस प्रवेशद्वार में पत्रकारिता के लिए आने से पहले तमाम मित्रों, शुभचिंतकों और घरवालों ने न जाने कितनी ही बार इस फैसले पर दोबारा विचार करने की सलाह दी थी. लेकन नए इलाके में नया अखबार शुरू करने की ललक ऐसी तमाम सलाह पर भारी पड़ी थी.

हमारे पहुंचने तक वहां देश के अलग-अलग राज्यों से कई और लोग आए थे. एक से बढ़ कर एक जुनूनी और प्रतिभावान युवा.

अगले दिन से ही आपसी तालमेल बिठाने और डेस्क तथा रिपोर्टिंग के प्रशिक्षण का सिलसिला शुरू हो गया. उत्साह इतना कि हम लोग जब कंपनी की ओर क्रिश्चियन बस्ती में मिले अपने हास्टलनुमा कमरे से सुबह कंपनी की कार से उलूबाड़ी स्थित जीएल पब्लिकेशंस के परिसर में पहंचते तो फिर देर रात ही वापसी होती थी. पूर्वोत्तर में संगठित हिंदी पत्रकारिता का इतिहास कोई बहुत पुराना नहीं है.

जब हम पूर्वांचल प्रहरी शुरू करने गुवाहाटी पहुंचे तब असम में हिंदी का कोई दैनिक अखबार नहीं था. हालांकि उसी समय जीएल पब्लिकेशंस के मालिक और प्रबंध निदेशक जीएल अग्रवाल की देखा-देखी दो अन्य संस्थानों ने भी हिंदी अखबार निकालने की योजना बनाई.

दिलचस्प बात यह है कि जीएल अग्रवाल ने काफी पैसे खर्च कर जिन पत्रकारों को देश के विभिन्न हिस्सों से गुवाहाटी में जुटाया था उनमें से ही कुछ को तोड़ कर एक स्थानीय मीडिया हाउस ने सेंटिनल नाम से अपना हिंदी अखबार शुरू कर दिया. वह पहले द सेंटिनल नाम से ही अंग्रेजी का अखबार निकालता था. उत्तरकाल नामक एक अन्य अखबार के लिए भी बिहार से ज्यादातर पत्रकार वहां पहुंचे थे. लेकिन उस अखबार ने भी जल्दी ही दम तोड़ दिया. बाद में उसके भी कुछ लोग पूर्वांचल प्रहरी में रख लिए गए.

वह दौर यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम (अल्फा) के उत्थान का दौर था. अलग संप्रभु राज्य की मांग को लेकर उसका आंदोलन लगातार तेज हो रहा था. उस आंदोलन की काली छाया राज्य में दुधारू गाय समझे जाने वाले चाय उद्योग पर भी पड़ने लगी थी और वहां जबरन वसूली का दौर शुरू हो गया था.

असमिया और वहां से निकलने वाले अंग्रेजी अखबारों के लिए तो ठीक था. लेकिन उस दौर में हिंदी अखबार निकालना और उसमें भी अल्फा की जबरन वसूली और उसकी कार्यप्रणाली के खिलाफ खबर छापना किसी चुनौती से कम नहीं था.

खैर, करीब दो महीने तक तालमेल बिठाने और मशीन लग जाने के बाद आखिर पूर्वांचल प्रहरी के प्रकाशन की तारीख भी आ गई. हमारे पहले कार्यकारी संपादक कृष्ण मोहन अग्रवाल ने प्रवेशांक के साथ निकलने वाले रंगीन परिशिष्ट के लिए सबको कुछ न कुछ लिखने की सलाह दी. सबने उत्साह से लिखा भी. पहले दिन का अखबार निकालने के लिए जो टीम सुबह दस बजे दफ्तर पहंची वह अगले दिन सुबह अखबार छपने के बाद उसका अंक हाथ में लेकर ही अपने कमरों पर लौटी.

यह सिलसला कोई तीन महीने तक चला. इस बीच, विनोदानंद ठाकुर, बद्रीनाथ तिवारी और रामदत्त त्रिपाठी समेत कई नाम अखबार से जुड़े और कुछ इसी कम समय में ही बिछड़े भी. इसी दौरान पूर्वोत्तर की सात बहनों को जोड़ने के लिए सप्तसेतु नामक एक साप्ताहिक पत्रिका निकालने की भी योजना बनी. तमाम लोगों ने उसमें खूब लिखा और उस पत्रिका ने इलाके के हिंदीभाषियों को जोड़ने में अपने नाम के अनुरूप ही अहम भूमिका निभाई. उस पत्रिका के लिए भी खासकर बिहार से कई नए संघर्षशील और प्रतिभाशाली पत्रकार आए थे.

उनमें से कुछ तो आज पत्रकारिता जगत के बड़े नाम बन चुके हैं.

कई शहरों और मीडिया घराने में काम करने के बाद अब मुझे लगता है कि उस समय वहां जो माहौल था, अब तो उसकी कल्पना तक करना मुश्किल है. दूर-दराज से आए युवा पत्रकारों की सामाजिक हैसियत और आर्थिक पृष्ठभूमि में अंतर होने के बावजूद जीएल परिसर में तमाम फासले मिट गए थे. वहां लोग एक परिवार की तरह थे. आज के दौर की पत्रकारिता में तो सीनियर से जूनियर तक मौका मिलते ही पीठ में छूरा घोंपने की फिराक में रहते हैं. ऐसे में वह माहौल अब एक सपना बन कर रह गया है.

उस परिसर से खट्टी-मीठी न जाने कितनी ही यादें जुड़ी हैं. वहां नीचे शर्मा जी के ढाबे के खाने का स्वाद आज तक याद है. वहां काम करने वाले कई सहयोगी अब बहुत ऊपर पहुंच गए हैं और याद नहीं करते. कई अच्छे लोग, जिनसे नौकरी छोड़ने के बाद कभी मुलाकात नहीं हुई, अक्सर याद आते हैं. तब मोबाइल भी नहीं होता था. इसी अखबार में काम करते हुए जीवन के कुछ कड़वे यथार्थ से भी पाला पड़ा और कुछ बेहतर अनुभव भी हुए.

अब भी याद है कि छुट्टी के दिन लोग कैसे बिन बुलाए घर पहुंच जाते थे और जनता स्टोव के उस दौर में भी बिना खाए-पिए नहीं लौटते थे. होली और दीवाली जैसे कितने ही त्यौहार मिल-जुल कर मनाए जाते रहे.

वहां मैंने रिपोर्टिंग से लेकर खबरों के संपादन और पेज पर खबर लगवाने तक तमाम काम किए. खेल से लेकर बिजनेस पेज और बाद में पहले पन्ने की जिम्मेदारी भी निभाई. (क्रमशः)

पिछला पार्ट…

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