
प्रभाकर मणि तिवारी-
लंबे अखबारी जीवन के दौरान तीन अखबारों—जनपथ समाचार (सिलीगुड़ी), पूर्वांचल प्रहरी (गुवाहाटी) औऱ जनसत्ता (कोलकाता संस्करण) में काम करने के दौरान कई मित्रों ने सलाह दी थी और कभी-कभी मैं भी सोचता था कि रिटायर होने के बाद संस्मरणों पर किताब लिखूंगा. लेकिन तय समय से दो साल पहले ही नौकरी छोड़ने के अब पांच साल बीत गए हैं. अब किताब की बजाय फेसबुक पर ही सिलसिलेवार तरीके से कुछ लिखने का प्रयास करूंगा.
इसकी पहली कड़ी पिछले सप्ताह लिखी थी. संस्मरण लिखने की राह में सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि अगर सच लिखें तो कुछ लोग नाराज हो जाएंगे औऱ झूठ लिखने पर वह संस्मरण नहीं बल्कि कहानी या उपन्यास बन कर रह जाएगा. इसलिए लेखन के दौरान संतुलन बनाते हुए किसी पर कोई तोहमत लगाने या उसका नाम लेने से बचने का प्रयास रहेगा. यादें मीठी भी हैं और कड़वी भी. तो कड़वाहट से यथासंभव बचने का प्रयास करूंगा.
पढ़ें पत्रकारनामा का दूसरा हिस्सा….
मेरा पत्रकारिता में आना महज एक संयोग था. कई दिग्गज पत्रकारों की तरह पूत के पांव पालने में ही नजर आने का दावा नहीं करता. छात्र जीवन में अखबार पढ़ने में दिलचस्पी तो थी. लेकिन कभी उसमें नौकरी को बारे में ख्याल तक नहीं आया था.
वह शायद मार्च, 1987 का कोई दिन था. उस समय मैं सिलीगुड़ी हिंदी हाई स्कूल में दसवीं तक सहपाठी रहे श्रवण कुमार अग्रवाल के साथ रोजाना सुबह की सैर पर निकलता था. हमलोग हिंदी स्कूल के विशाल मैदान के कई चक्कर लगाने के बाद एक टपरी पर चाय पीने के बाद घर लौटते थे.
उसी दौरान एक दिन उसने मुझसे पूछा कि जनपथ समाचार में काम करोगे. मैंने आगा-पीछे सोचे बिना हां कर दी. इससे पहले कभी कोई नौकरी नहीं की थी. कालेज सुबह की शिफ्ट में था. दोपहर बाद जनपथ समाचार पहुंचना था. अगले दिन मित्र के साथ साथ जनपथ के मालिक-संपादक राजेंद्र बैद (अब स्वर्गीय) के पास पहुंचा. उन्होंने एकाध अनुवाद कराया और अगले दिन से आने को कह दिया. वेतन तय हुआ चार सौ रुपए. मेरे जिम्मे अनुवाद का काम था.
प्रेस ट्रस्ट की तार से खबरों का अनुवाद करता था. उस समय दार्जिलिंग की पहाड़ियों में गोरखालैंड आंदोलन चरम पर था. गोरखा नेता सुभाष घीसिंग ने अलग राज्य की मांग में पहाड़ियों में बड़े पैमाने पर हिंसक आंदोलन छेड़ रखा था. अखबार में एक रिपोर्टर थे मनोज राउत. वो दार्जिलिंग जाकर रिपोर्ट ले आते थे. तब फैक्स वगैरह की कल्पना भी नहीं की गई थी.
कई-कई दिनों बाद कभी पैदल तो कभी ट्रकों पर सवार होकर सिलीगुड़ी लौटने पर मनोज दर्जनों खबरें लिख मारते थे. लेकिन लिखते थे सिर्फ बांग्ला में. मैं उनका अनुवाद करता था. उसके बाद एक दिन संपादक ने मुझे एक मोटी-सी अंग्रेजी पुस्तक थमाते हुए कहा कि इसका अनुवाद करना है. रोजाना पहले पेज की बाटम स्टोरी यहीं से छपेगी. मैं उसमें जुट गया और करीब 15 दिनों में उसका अनुवाद कर दिया. तब हाथ से लिखना होता था. न्यूजपेपर रील से बने राइटिंग पैड पर.
महीने भर में राजेंद्र जी मेरे काम के मुरीद हो गए. उन्होंने पहले महीने ही सौ रुपए वेतन वृद्धि कर दी. यह लिखने में कोई हिचक नहीं है कि उनके जैसा दिलदार और काम की कद्र करने वाले संपादक मैंने कम ही देखे हैं. संपादकों पर आगे लिखी जाने वाली सीरीज में इस पर विस्तार से चर्चा करूंगा.
जनपथ में सब कुछ ठीक चल रहा था. इस बीच, मैंने किशोर कुमार की जयंती पर संपादकीय पेज पर लेख भी लिखा. संपादक ने प्रोत्साहित करते हुए कुछ औऱ लेख भी लिखवाए. हां, यह लेख ड्यूटी टाइम के बाद लिखता था और इसका कोई पैसा नहीं मिलता था.
जनवरी, 1989 में अचानक वेतनवृद्धि के मुद्दे पर मालिक औऱ कर्मचारियों में ठन गई. कुछ दिनों तक कर्मचारी ही अखबार चलाते रहे. उसी साल फरवरी में पता चला कि गुवाहाटी के जी.एल.अग्रवाल नामक कोई सज्जन वहां से हिंदी का पहला अखबार निकालना चाहते हैं. पूर्वांचल प्रहरी के नाम से.
मेरे साथ काम करने वाले सत्यानंद पाठक (अब स्वर्गीय) ने मुझसे कहा तो कुछ सोच-विचार के बाद मैं भी तैयार हो गया. नई जगह पर काम करने का उत्साह भी था. वहां बात पक्की हो गई और नियुक्ति पत्र भी मिल गया. यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि तब जनपथ समाचार में नियुक्ति पत्र का कोई रिवाज नहीं था. लेकिन वेतन औऱ सुविधाएं ठीक-ठाक थी.
सिलीगुड़ी का इकलौता हिंदी अखबार होने के कारण मैदान इलाके से लेकर पहाड़ों तक उसकी धाक थी और विज्ञापन भी खूब मिलते थे. अब राजेंद्र जी के पुत्र विवेक बैद बखूबी अखबार चला रहे हैं.
तो, बात हो रही थी गुवाहाटी से निकलने वाले अखबार की. आपसी सलाह-मशविरे के बाद एक दिन जनपथ समाचार के छह या सात लोग गुवाहाटी के लिए निकल पड़े. अनजान प्रदेश में एक नई शुरुआत के लिए….(क्रमशः)
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