इंदौर में हिंदी अखबार ‘प्रजातंत्र’ के साथ अंग्रेजी टैबलायड ‘फर्स्ट प्रिंट’ मुफ्त मिलेगा, देखें कौन-कौन जुड़ा

इंदौर वाले पत्रकार हेमंत शर्मा पितृ पक्ष में कर रहे हैं नया प्रयोग…. हिंदी पत्रकारिता की चर्चा कहीं भी हो इंदौर के बिना अधूरी रहती है। अब यहीं से हिंदी का एक और अखबार शुरू हो रहा है नाम इसका ‘प्रजातंत्र’ जरूर है लेकिन ये आम नहीं, खास लोगों का इस लिहाज से है कि जो वार्षिक ग्राहक बनेंगे, उनके लिए ही रहेगा। हॉकर से या स्टॉल पर शायद ही मिले। इसी तरह इंदौर की पत्रकारिता में मार्केटिंग का यह प्रयोग भी पहली बार किया जा रहा है कि हिंदी के साथ अंग्रेजी का टेबलॉयड साइज वाला ‘फर्स्ट प्रिंट’ अखबार मुफ्त मिलेगा।

जब हेमंत शर्मा दावा कर रहे हैं तो मान लेना चाहिए कि श्राद्ध पक्ष में दो अक्टूबर से भव्य लांचिंग के साथ शुरुआत हो जाएगी। वो ये धारणा भी तोड़ना चाहते हैं कि श्राद्ध पक्ष में कोई नया काम शुरु नहीं किया जाता। इलेक्ट्रानिक मीडिया के बाद भास्कर ग्रुप (इंदौर के संपादक रहे) हेमंत भाई ने जिस तरह अखबार की टीम से लेकर प्लानिंग पर काम किया है तो यह कहने में हर्ज नहीं कि प्रजातंत्र का झंडा फहरा कर वे खुद एक ब्रांड बन चुके हैं। मीडिया घरानों के भी अपने कारपोरेट ऑफिस हैं लेकिन इंदौर तो ठीक देश में भी शायद ही किसी मीडिया हाउस का ऐसा कलात्मक दफ्तर हो। ऑफिस की बनावट-खूबसूरती को लेकर वैसे भी मित्र-पत्रकार खूब लिख चुके हैं।

मैंने हेमंत भाई से कहा स्कूली बच्चों को अखबार की प्रिटिंग दिखाने वाले पारंपरिक ट्रेंड में भी अब बदलाव आ सकता है, ऐसे सारे संस्थान अब ये ऑफिस देखने भी आ सकते हैं और निश्चित ही उनके दिलोदिमाग में अखबारों के कार्यालयों की जो छवि अब तक बनी हुई है वह इस पेन-पेपरलेस ऑफिस में एक बार आने के बाद ध्वस्त हो जाएगी। उन्होंने पहले दिन से ही सारे स्टॉफ को लेपटॉप मुहैया करा दिए हैं, यही वजह है कि महानगरों की तरह उन्हें ऑफिस में ही बैठकर स्टोरी फाइल करने की मजबूरी भी नहीं है।डेस्कटॉप का उपयोग है ही नहीं, वर्किंग पेपरलेस है लिहाजा सारी टेबल रात में चकाचक रहती हैं।

इंदौर भास्कर से जुड़े रहने के बाद हाल ही के वर्षों में जिन मित्रों ने चुनौती स्वीकारी-अपना एम्पायर खड़ा किया उनमें पहला नाम हृदयेश दीक्षित (शम्मी बाबू) का तो दूसरा हेमंत भाई का है। इन दोनों से पहले अनिल धूपर ने शहर को टेनिस क्लब की सौगात दी थी। यूं तो अभय जी खेल प्रशाल र्निमित कर चुके थे किंतु उनके साथ नईदुनिया की ताकत रही। धूपर तो जीएम से लेकर वाइस प्रेसीडेंट तक रहे भास्कर में, उन्हीं दिनों तो टेनिस क्लब ने आकार लिया था।

यदि रिश्ते बनाने की गॉड गिफ्ट से हृदयेश भाई को प्रदेश टुडे अखबार के विस्तार में मदद मिली तो हेमंत भाई ने भास्कर इंदौर को ऊंचाइयां देने के दौरान ही अपने रिश्तों को प्रगाढ़ और विश्वसनीय बनाने का काम किया। यही वजह रही कि वे जब ब्रांड के साए से मुक्त हुए उसी दिन से माना जाने लगा था कि वे मीडिया जगत में कुछ अनूठा ही करेंगे। आईएएस,आईपीएस, मंत्रियों से मित्रता के चलते जिस तरह शम्मी बाबू भोपाल में पॉवर सेंटर के रूप में पहचान बना चुके हैं, बहुत संभव है कि अगले कुछ समय में हेमंत भाई भी इंदौर से लेकर दिल्ली तक प्रजातंत्र/फर्स्ट प्रिंट को बेलेंसिंग पॉवर के रूप में स्थापित कर दें। यह अच्छी बात है कि दोनों विप्र बंधुओं के साथ उन ध्यान योगी महर्षि उत्तम स्वामी का आशीर्वाद है जिनकी संघ और सत्ता के गलियारों से लेकर औद्योगिक घरानों तक बात टाली नहीं जाती। शहर के जनप्रतिनिधियों में यूं तो सभी से इन दोनों के बेहतर रिश्ते हैं लेकिन रिश्ते निभाने वाले विधायकों का शम्मी बाबू के साथ ही हेमंत भाई के साथ भी चट्टान की तरह खड़े रहने का मतलब है दृश्य-अदृश्य सभी शक्तियों का नतमस्तक होते जाना।

प्रजातंत्र में आना जाना तो चलता रहा है कुछ दिन श्रवण जी सलाह देने आए। पटना से राजेंद्र तिवारी भी आए थे। दीपक शिंदे की तरह वे भी चले गए। एमडी सुधीर अग्रवाल के कभी जो निजी सहायक हुआ करते थे उनके साथ ही भास्कर में रहे कई पत्रकार मित्रों के साथ ही भाई पंकज मुकाती से भी यहीं मुलाकात हुई। वेबदुनिया के पहले संपादक रहे प्रकाश हिंदुस्तानी इन अखबार के डिजिटल एडिशन देखेंगे। मैंने हेमंत भाई से मजाक में कहा शहर में ऐसा मैसेज भी जा सकता है कि भास्करवालों ने ही यह नया अखबार प्लान किया है।

मुंबई के भी कई पत्रकार, खासकर लड़कियां, इस शहर में पहली बार पत्रकारिता करेंगी। स्पोर्ट्स सहित अन्य फिल्ड में भी रिपोर्टिंग के मास्टर गौरीशंकर दुबे परिचय कराने लगे, ये कृतिका वाजपेयी गोरखपुर की हैं, पंजाब से क्रिकेट खेलती रही हैं, ये अमृता सिंह हैं। ये दोनों अब स्पोर्टस टीम की साथी हैं। यूं तो सिटी और क्राइम की खबरों के लिए विनोद शर्मा, संतोष शितोले, अंकुर जायसवाल हैं लेकिन क्राइम कवर करने में खुद तेजश्री पुरंदरे ने दिलचस्पी दिखाई है। रिपोर्टर को पहले इंसान होना चाहिए, इस बात को तेजश्री साबित भी कर चुकी हैं, बेवजह बड़े अफसरों के गुस्से का शिकार हुए ट्रैफिक जवान को डीआईजी से न्याय दिलाकर। एलमार जाधव लंबे समय बाद फिर अखबारी दुनिया (मार्केटिंग) में लौट आए हैं।

इन सब के साथ ही टीम में जो एक बड़ा नाम जोड़ा है वो हैं मुंबई के फोटो जर्नलिस्ट प्रदीप चंद्रा। इन पत्रकार मित्रों का मुंबई के बच्चे इंदौर को ठिकाना बनाना यह भी तो साबित कर रहा है कि गंगा उल्टी बहने लगी है। फिल्मी दुनिया में आज जैसा बिग बी का नाम है, वहां के फोटो जर्नलिस्ट में प्रदीप चंद्रा का भी उतना ही सम्मान रहा है। बॉलीवुड को जानने वाला शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो प्रदीप चंद्रा के नाम/काम से वाकिफ न हो।

बड़े से हॉल वाले संपादकीय में घूमते वक्त लगता नहीं कि आप अखबार के कार्यालय में हैं। रोचक जानकारी के साथ यहां वहां नॉलेज बिखरा पड़ा है।अर्धेंदु भूषण बता रहे थे गांधीजी के सम्मुख रखा यह चरखा मात्र शो पीस ही नहीं है, रोज सूत काता भी जाता है। गांधी जी के बंदर भी यहां इंसानी चेहरों में देखे जा सकते हैं। ऑफिस का हर कोना जब हेमंतभाई के सौंदर्य बोध की तारीफ करता नजर आता है तो अपने इस दोस्त की सोच पर रश्क होता है। यह कामना करें कि ऑफिस के लेआउट की ही तरह प्रजातंत्र भी खास पाठक (एलिट) वर्ग पर अपनी छाप छोड़ेगा। इंदौर की पारंपरिक पत्रकारिता में कुछ नया करने की जो चुनौती ब्लेक एंड व्हाइट प्रकाशन समूह ने स्वीकारी है उसे भरपूर कामयाबी मिले। नए अखबार तो निकलते रहना चाहिए, यह पत्रकार बिरादरी के हित में भी है क्योंकि जो काम के होंगे उनकी जरूरत हर जगह रहेगी।

लेखक कीर्ति राणा इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई अखबारों में संपादक रह चुके हैं. 

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Comments on “इंदौर में हिंदी अखबार ‘प्रजातंत्र’ के साथ अंग्रेजी टैबलायड ‘फर्स्ट प्रिंट’ मुफ्त मिलेगा, देखें कौन-कौन जुड़ा

  • पत्रकारिता में कुछ नया करने की जो चुनौती ब्लेक एंड व्हाइट प्रकाशन समूह ने स्वीकारी है उसे भरपूर कामयाबी मिले

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  • विपुल रेगे says:

    दुख के साथ बताना चाहता हूं कि इस अखबार में उन लोगों को मौका नहीं मिला जो प्रजातंत्र को भास्कर के समकक्ष खड़ा कर सकते थे। सिटी रिपोर्टिंग में वही पुराने चेहरे जो टाइप्ड हो चुके हैं। एक ही बीट में कई साल काम करने के बाद उनसे निष्पक्ष पत्रकारिता की अपेक्षा कैसे करेंगे। हेमंत जी ने अखबार तो अच्छा निकाला लेकिन ज्वलंत पत्रकारों के बिना प्रतियोगियों का सामना कैसे करेंगे। हालिया टीम तो कभी भास्कर-०पत्रिका को हरा न सकेगी। जो हाल राज एक्सप्रेस और पीपुल्स का इन्दौर में हुआ, वही इनका होगा। और मजे की बात उनको डुबाने वाले और इनको भविष्य में डुबाने वाले लोग लगभग एक ही है। एक ही खेमे के हैं। ये अखबार निजी हितों को पूरा करेगा लेकिन पत्रकारिता में इतिहास बना दे, ऐसा माद्दा नहीं दिखता।

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