Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

साहित्य

राहत इंदौरी : ग़ज़ल के एक युग का अंत (देखें वीडियो)

जनाब राहत इंदौरी का जाना ग़ज़ल के एक युग का जाना है। 1 जनवरी 1950 को इंदौर में उनका जन्म हुआ था। इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक 1369 हिजरी थी और तारीख 12 रबी उल अव्वल थी। उन्होंने 1969-70 के दौरान शायरी शुरू की थी। वह जोश मलीहाबादी, साहिर लुधियानवी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, अहमद फ़राज़ और हबीब जालिब की परंपरा के शायर थे। सचबयानी के उतने ही कायल। हुकूमत किसी भी रहनुमा की हो, राहत इंदौरी की ग़ज़ल ने उसे नहीं बख्शा। उन्होंने 1986 में कराची में एक शेर पढ़ा और पाकिस्तान के नेशनल स्टेडियम में हजारों लोग खड़े होकर पांच मिनट तक ताली बजाते रहे। उसी शेर को कुछ अर्से बाद दिल्ली के लाल किले के मुशायरे में पढ़ा, तब भी उसी तरह की शोरअंगेजी हुई। शेर था: ‘अब के जो फ़ैसला होगा वो यहीं पे होगा/हमसे अब दूसरी हिजरत नहीं होने वाली…।’ यह शेर पाकिस्तान और हिंदुस्तान के अवाम के मुश्तरका गम को बखूबी बयान करता है। उनका एक और शेर है: ‘ मेरी ख्वाहिश है कि आंगन में न दीवार उठे/मेरे भाई मेरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले…।’ यह शेर भी गौरतलब है: ‘हम ऐसे फूल कहां रोज़-रोज़ खिलते हैं/सियह गुलाब बड़ी मुश्किलों से मिलते हैं…।’

राहत इंदौरी दुनिया भर में घूमे लेकिन मन हिंदुस्तान और अपने घर ही रमा। उनकी शरीके-हयात सीमा जी ने कहीं एक इंटरव्यू में कहा था कि वह एक बार एक महीने अमेरिका रहकर लौटे तो सीधे रसोई में पहुंच गए और कहने लगे-“घर का खाना लाओ, इससे अच्छा खाना पूरी दुनिया में कहीं नहीं मिलता।” उनका एक शेर है: ‘फुर्सतें चाट रही हैं मेरी हस्ती का लहू/मुंतज़िर हूं कि कोई मुझको बुलाने आए…।’ उनकी तीन संतानें हैं–शिब्ली, फैसल और सतलज। बेहतरीन ग़ज़लकार और गीतकार के साथ-साथ वह उम्दा चित्रकार भी थे। मुसव्विरी में भी उनके जज्बात खूब-खूब उभरते थे। जिन्होंने उनकी चित्रकारिता देखी है वे बताते हैं कि ब्रश और रंगों से भी वह नायाब ग़ज़ल रचते थे। राहत साहब ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि चित्रकारी की प्रेरणा उन्हें गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर से हासिल हुई। पेंटिंग सीखने की बकायदा शुरुआत उन्होंने इंदौर के ज्योति स्टूडियो (ज्योति आर्ट्स) से की, जिस के संचालक छगनलाल मालवीय थे। इंदौर के गांधी रोड पर हाईकोर्ट के पास यह स्टूडियो था। उन दिनों ज्यादातर सिनेमा के बैनर और होर्डिंग का काम यहां होता था। इसी स्टूडियो के पास सिख मोहल्ला था, जहां किवदंती गायिका लता मंगेशकर जी का जन्म हुआ। प्रसंगवश, राहत साहब ने नायाब गीत भी लिखे और उनमें कुछ को लता जी ने स्वर दिया।

राहत इंदौरी नौवीं जमात में थे। उनके नूतन हायर सेकेंडरी स्कूल में मुशायरा हुआ। जांनिसार अख्तर की खिदमत उनके हवाले थी। वह उनसे ऑटोग्राफ लेने गए तो कहा कि मैं भी शेर कहना चाहता हूं, इसके लिए मुझे क्या करना होगा। अख्तर साहब का जवाब था कि पहले कम से कम-से-कम पांच हजार शेर याद करो। राहत साहब ने कहां की इतने तो मुझे अभी याद हैं। जनाब जांनिसार ने सिर पर हाथ रखा और कहा कि तो फिर अगला शेर जो होगा वह तुम्हारा खुद का होगा। ऑटोग्राफ देने के बाद अख्तर साहिब ने अपनी ग़ज़ल का एक शेर लिखना शुरू किया: ‘हम से भागा न करो दूर, ग़जालों की तरह…।’ राहत साहब के मुंह से बेसाख्ता दूसरा मिसरा निकला: ‘हमने चाहा है तुम्हें चाहनेवालों की तरह…।’ वह ताउम्र जांनिसार अख्तर का बेहद एहेतराम करते रहे लेकिन शायरी में उनके उस्ताद कैसर इंदौरी साहब थे। उनकी शागिर्दी में आने के बाद राहत साहब ने अपना नाम ‘राहत कैसरी’ रख लिया था। उनके पहले मज्मूआ ‘धूप-धूप’ राहत कैसरी नाम से छाया हुआ था। बाद में अपने उस्ताद की सलाह पर ही उन्होंने अपना नाम राहत इंदौरी कर लिया। शुरुआती मुशायरों में उन्हें ‘इंदौरी’ होने का खामियाजा भी भुगतना पड़ा। खासतौर पर जो मुशायरे दिल्ली, लखनऊ और भोपाल में होते थे। उनका गोशानशीन उस्तादों और उनके नामनिहाद शागिर्दों को जवाब होता था: ‘जो हंस रहा है मेरे शेरों पे वही इक दिन/क़ुतुबफरोश से मेरी किताब मांगेगा..।’ शुरुआती दिनों का ही उनका एक शेर है: ‘मैं नूर बन के ज़माने में फैल जाऊंगा/तुम आफ्ताब में कीड़े निकालते रहना..।’

https://www.youtube.com/watch?v=mRCYxo8xCus

राहत इंदौरी वस्तुतः सियासी शायर थे। इन दिनों के मुशायरों में भी अक्सर वह विपरीत हवा पर शेर कहते थे। उनके ये अल्फ़ाज़ जिक्र-ए-खास हैं: ‘जिन चराग़ों से तअस्सुब का धुआं उठता है/ उन चराग़ो को बुझा दो तो उजाले होंगे..।’ इस शेर के जरिए वह सीधा फिरकापरस्त सियासत पर कटाक्ष करते हैं। उनके बेशुमार प्रशंसकों का एक पसंदीदा शेर है : ‘ज़रूर वो मेरे बारे में राय दे लेकिन/यह पूछ लेना कभी मुझसे वो मिला भी है?’ कोरोना उनके जिस्मानी अंत की वजह बना और कोरोनाकाल में हिजरत ने दुनिया भर में इतिहास बनाया। बहुत पहले उन्होंने लिखा था: ‘तुम्हें पता ये चले घर की राहतें क्या हैं/अगर हमारी तरह चार दिन सफ़र में रहो…।’ जनाब इंदौरी के यह अल्फ़ाज़ भी रोशनी की मानिंद हैं: ‘रिवायतों की सफें तोड़कर बढ़ो वर्ना, जो तुमसे आगे हैं वो रास्ता नहीं देंगे..।’। जिस प्रगतिशील रिवायत से उनकी शायरी थी, उसी में यह लिखना संभव था: ‘हम अपने शहर में महफूज भी हैं, खुश भी हैं/ये सच नहीं है, मगर ऐतबार करना है..।’ इसी कलम से यह भी निकला: ‘मुझे ख़बर नहीं मंदिर जले हैं या मस्जिद/मेरी निगाह के आगे तो सब धुआं है मियां..।’ यह भी लिखा: ‘महंगी कालीनें लेकर क्या कीजिएगा/अपना घर भी इक दिन जलनेवाला है…।’ और यह भी कि: ‘गुजिश्ति साल के ज़ख्मों हरे-भरे रहना/जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा..।’

बहरहाल, अब आप जिस्मानी तौर पर नहीं हैं राहत इंदौरी साहब लेकिन आपका यह शेर आपके चाहने वालों के अंतर-कोनों में जरूर है: ‘घर की तामीर चाहे जैसी हो/उसमें रोने की कुछ जगह रखना..!’ आमीन!!

लेखक अमरीक पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

इसे भी पढ़ें-

लाजवाब! राहत इंदौरी को सुनें : …किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है… (देखें वीडियो)

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन