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आज के अखबार : राहुल गांधी की खबर है नहीं, द हिन्दू और टाइम्स ऑफ इंडिया में खबरें भाजपा का पक्ष बता रही हैं!

संजय कुमार सिंह

वैसे तो आज ज्यादातर अखबारों में मणिपुर की खबर लीड है लेकिन मुझे लगता है कि आज की सबसे बड़ी खबर यह है कि पश्चिम बंगाल के सरकारी चिकित्सा संस्थानों के रेजीडेंट डॉक्टर्स ने सुप्रीम कोर्ट की अपील के बावजूद अपना विरोध प्रदर्शन खत्म करने से मना कर दिया। आज की खबरें बता रही हैं कि अखबारों की अपनी राजनीति है और राजनीति करने वालों का अपना मकसद। कोई एक-दूसरे के प्रभाव में नहीं है। सब अपनी जरूरत के अनुसार काम कर रहे हैं। ज्यादातर अखबार जनहित से अलग हैं। ऐसे में एक महिला चिकित्सक से ड्यूटी के दौरान बलात्कार और हत्या के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन को राजनीतिक रंग दिये जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया था। इस बीच मामले से संबंधित तमाम झूठ सामने आ गये और जनता की मांग पर मामले की जांच सीबीआई को दिये जाने के बावजूद जांच आगे नहीं बढ़ी या नया कुछ नहीं मिला। इस बीच घटना के एक महीने गुजर गये। आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने आंदोलनकारी चिकित्सकों को काम पर वापस आने की अपील की, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी वार्ता के लिए आमंत्रित किया पर डॉक्टर्स ने अपना आंदोलन खत्म करने से इनकार कर दिया है।

आप कह सकते हैं कि यह कार्यस्थल पर सुरक्षा के मामले की गंभीरता के कारण है पर एक महिला डॉक्टर से बलात्कार और हत्या का उपयोग पूरा डॉक्टर समाज अपनी सुरक्षा के लिए करता दिख रहा है और सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान लेने का आंदोलन या उसके मकसद को लाभ नहीं मिला। जो भी हो, यह सब राजनीति से पूरी तरह मुक्त भी हो तो राज्य सरकार पर्याप्त दबाव में है और जिस पार्टी के कारण है वह हरियाणा व कश्मीर में चुनाव के कारण किसी भी तरह की बदनामी मोल लेने को तैयार नहीं है और राहुल गांधी अपने तरीके से भाजपा ही नहीं संघ परिवार का सच बताने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं। ऐसे में सत्तारूढ़ दल के समर्थन में अखबारों का पक्षपात देखने समझने और आनंद लेने लायक है। राहुल गांधी अमेरिका यात्रा पर हैं। अपनी राजनीति के अनुसार उन्हें जो जरूरी या ठीक लग रहा है कर रहे हैं लेकिन भाजपा को वह बुरा लग रहा है। अखबार इसकी खबर देने की बजाय भाजपा का हित साधते नजर आ रहे हैं और आज के मेरे अखबारों में राहुल गांधी की खबर द हिन्दू और टाइम्स ऑफ इंडिया में भाजपा के आरोप के साथ है या भाजपा की आलोचना के कारण खबर पहले पन्ने पर है, उन्होंने जो कहा उसकी खबर अकेले द टेलीग्राफ में है।

दोनों अखबारों के शीर्षक भाजपा के पक्ष के साथ हैं। कुल मिलाकर, राहुल गांधी ने जो कहा उसकी भाजपा ने आलोचना की है और यही खबर है वह भी सिर्फ दो अखबारों में पहले पन्ने पर। आज मणिपुर की खबर कुछ ज्यादा ही है। कश्मीर में चुनाव की तैयारियों के लिए चुनाव आयोग ने जो आदेश दिये हैं वह सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में लीड है। इसके अनुसार चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने जम्मू और कश्मीर प्रशासन से कहा है कि बूथ स्थानांतरित नहीं किये जायें ना रैलियां रद्द की जायें, निवारक रोकथाम भी न हो। आज के अखबारों में कश्मीर के बारामुला से सांसद शेख अब्दुल रशीद को दो अक्तूबर तक के लिए अंतरिम जमानत मिलने की खबर भी है। आपको याद होगा कि अरविन्द केजरीवाल को चुनाव के लिए सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली थी तो स्पेशल ट्रीटमेंट कहा गया था। ऐसे में इंजीनियर रशीद को जमानत निश्चित रूप से दिलचस्प है।

कश्मीर में चुनावी मामला अलग है। मुजफ्फर रैना ने इस बारे में द टेलीग्राफ ने लिखा है, इंजीनियर, घाटी में अपनी प्रतिष्ठा बचाने के साथ-साथ पार्टी के लिए एक अलग राजनीतिक जगह बनाने की कठिन चुनौती का सामना कर रहे हैं। वे कश्मीर में कदम रखने से पहले ही खुद को एक चुनौती के शिखर पर पाते हैं जबकि घाटी-आधारित पार्टियां उन्हें भाजपा के नये “प्रॉक्सी” के रूप में देखती हैं। हालांकि, उनके समर्थकों का मानना ​​​​है कि वे कश्मीरी प्रतिरोध के एक मजबूत प्रतीक हैं। जेल ने अगर उन्हें एक तरह के नायक में बदल दिया है, तो उनकी स्वतंत्रता इस छवि को उजागर करने का डर पैदा कर रही है। पूर्व मुख्यमंत्रियों उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के हमलों को देखते हुए ऐसा ही लगता है। इंजीनियर की अवामी इत्तेहाद पार्टी (एआईपी) ने इस आरोप से इनकार किया है कि वह भाजपा के इशारे पर काम कर रहे हैं। द हिन्दू की खबर भी ऐसी जानकारी देती है।

खबर के अनुसार दिल्ली की एक अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश चंदर जीत सिंह ने 18 सितंबर से शुरू होने वाले तीन चरण के चुनावों के प्रचार के लिए अंतरिम राहत के रूप में इंजीनियर की याचिका पर उन्हें जमानत दी है। 5 जुलाई को अदालत ने लोकसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने के लिए इंजीनियर को हिरासत में पैरोल दी थी। अदालत ने नियमित जमानत के लिए उनकी अर्जी पर अपना आदेश बुधवार तक के लिए सुरक्षित रखा है। इंडियन एक्सप्रेस में सेबी प्रमुख माधवी पुरी बुच पर कांग्रेस के नये आरोप भी टॉप पर हैं जो दूसरे अखबारों में पहले पन्ने से गायब हैं। खबर के अनुसार अगोरा के जरिये बुच को करोड़ों मिले। तीन फर्मों ने कहा कि उनके पति को नौकरी (काम) पर रखने के कारण उनकी सुविज्ञता है। कहने की जरूरत नहीं है कि माधवी पुरी बुच के खिलाफ रोज नय़े खुलासे होने के बावजूद कार्रवाई नहीं हो रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया में माधवी पुरी बुच के खिलाफ खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर है। बुलेट प्वाइंट की तरह बॉक्स में छपी इस खबर का शीर्षक कंपनियों ने मना किया के साथ है। आप जानते हैं कि हर आरोप से कंपनियां इनकार कर रही हैं, अखबार उनका ब्यौरा नहीं दे रहे और कांग्रेस के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। खबर या तो नहीं छपती है या खंडन के साथ।  

आज इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार जम्मू कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन (जेकेसीए) के मामले में ईडी ने फारुक अब्दुल्ला के खिलाफ श्रीनगर की विशेष अदालत में याचिका दायर की है। आज मुझे उस फर्जी गुजराती आईएएस अफसर की याद आ रही है जो खुद को पीएमओ में असिस्टेंट डायरेक्टर बताता था और कश्मीर प्रशासन से विशेष सेवा व सुरक्षा लेकर परिवार के साथ कई बार मौज करने के बाद पकड़ा गया था। अखबारों से मुझे आज तक यह पता नहीं चला है कि दिल्ली का उसका घर और पता सरकारी था या निजी। जहां तक सरकार के प्रचार की बात है, मणिपुर में हिंसा की तमाम घटनाएं दिल्ली के अखबारों में नहीं छपीं, 16 महीनों में बहुत कम खबरों को पहले पन्ने पर जगह मिली है। आज अमर उजाला की लीड मणिपुर की खबर है। शीर्षक है, छात्रों के उग्र प्रदर्शन के बाद दो जिलों में कर्फ्यू, पांच में इंटरनेट बंद। उपशीर्षक है, राजभवन मार्च कर रहे छात्रों और महिला प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा बलों से झड़प। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, “मणिपुर : छात्रों का गुस्सा फूटा”। इसके साथ एक खबर का शीर्षक है, केंद्र ने सीआरपीएफ के 2,000 और जवान भेजे। जाहिर है, सरकार ने जो किया उसकी खबर है। हिंसा और आंदोलन की खबरों को जगह नहीं मिली या कितनी मिली, आप जानते हैं।

द टेलीग्राफ में इस खबर का शीर्षक है, शांति के लिए छात्रों के प्रदर्शन के बाद मणिपुर में कर्फ्यू। खबर यह भी है कि पुलिस से भिड़ंत में 40 छात्र घायल हो गये। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर लीड है और शीर्षक है, मणिपुर के तीन जिलों में कर्फ्यू और 5 में इंटरनेट बैन वापस आया। मुझे लगता है कि इसके मुकाबले देहरादून की खबर कम महत्वपूर्ण नहीं है। पेज 17 पर विवरण होने की सूचना के रूप में छपी खबर के अनुसार, शिकायत के बाद दून में 134 गिरफ्तार, मुसलमानों को बाहर करने की अपील। खबर के अनुसार, देहरादून के पलटन बाजार में पुलिस ने 134 “संदिग्ध लोगों” को गिरफ्तार (डीटेन) किया है। एक जूता विक्रेता के खिलाफ किसी महिला की शिकायत पर यह कार्रवाई की गई है। आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है। दक्षिणपंथी समूहों ने सोमवार को दुकानें बंद रखी थीं और मांग कर रहे थे कि मुस्लिम व्यापारी इलाका छोड़ दें। पुलिस ने कहा है कि मंगलवार का वेरीफिकेश ड्राइव का मकसद राज्य के बाहर के लोगों के परिचय पत्र की जांच करना था।

राहुल गांधी की अमेरिका यात्रा की खबर द टेलीग्राफ में नई दिल्ली डेटलाइन से है और इसका शीर्षक है, राहुल को ‘परमात्मा प्रेषित’ का पतन नजर आता है। अनिता जोशुआ की खबर के अनुसार, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अमेरिका में कहा है कि चुनाव के बीच में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस दावे से कि उन्हें परमात्मा ने भेजा है, उनके “मनोवैज्ञानिक पतन” का पता चलता है और लोकसभा चुनाव के नतीजों ने “सावधानीपूर्वक बनाए गए 56 इंच के व्यक्तित्व” को तोड़ दिया है। कांग्रेस सांसद के मोदी पर ताजा कटाक्ष ने एक बार फिर देश के “अनेकता में एकता” के संस्थापक सिद्धांत को संरक्षित करने के लिए भाजपा-आरएसएस के साथ इंडिया समूह की वैचारिक लड़ाई पर जोर दिया। वाशिंगटन डीसी में छात्रों और प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए, राहुल ने कहा: “श्री मोदी का विचार, 56 इंच का सीना, भगवान के साथ सीधा संबंध, यह सब चला गया है; यह अब इतिहास है। उन्हें इसका अहसास है, भारत को इसका अहसास है, सरकार में उनके साझेदारों को इसका अहसास है, उनकी सरकार के तीन या चार वरिष्ठ मंत्रियों को इसका अहसास है।”

टाइम्स ऑफ इंडिया में इस खबर का शीर्षक है, राहुल ने कहा आस्था की आजादी कम हो रही है; भाजपा ने 1984 को याद किया। इस खबर के साथ हाइलाइट किया हुआ अंश है, राहुल गांधी ने कहा, मुद्दा यह है कि सिख को पंगड़ी बांधने …. या गुरद्वारा जाने दिया जायेगा कि नहीं ….। इसी पर संघर्ष है और यह सिर्फ सिखों के लिए नहीं है यह सभी धर्मों के लिए है। अखबार ने इसके साथ केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी का बयान छापा है। उन्होंने कहा है, 1984 में सिखों के खिलाफ एक कार्यक्रम चला था …. 3000 निर्दोष मारे गये थे … वही एक समय था जब सिखों को अपनी पगड़ी के कारण समस्या हुई। कहने की जरूरत नहीं है कि यह कोई नया या अनजाना या छिपाया हुआ मामला नहीं है। उसके बाद हरदीप पुरी की तरह एक सिख मनमोहन सिंह कांग्रेस की ओर से देश के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। एक-दो साल नहीं, पूरे 10 साल और पहले भी वित्त मंत्री थे। जहां तक 1984 की बात है हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व भाजपा करती है। पर 1984 में सिखों का कत्लेआम करने वाले हिन्दू नहीं कांग्रेसी थे। जो भी हो, आरएसएस के खिलाफ राहुल गांधी ने जो कहा वह तो बताया ही जाना चाहिये उसके साथ भाजपा का बचाव भी हो तो कोई बुराई नहीं है लेकिन खबर गायब नहीं होनी चाहिये थी और ऐसा नहीं है कि यह पहले पन्ने की खबर नहीं है।

द हिन्दू में चार कॉलम में छपी खबर का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, अमेरिका में राहुल के भाषण ने तूफान मचा दिया; भाजपा ने इसे एक खतरनाक नैरेटिव कहा। खबर के अनुसार, विदेश में एक संवेदनशील मुद्दे पर बोलकर राहुल गांधी ने खतरनाक नैरेटिव बनाया है। पर मुद्दा यह है कि भाजपा जब समान नागरिक संहिता की बात करती है तो यह उसका विस्तार है और जब नरेन्द्र मोदी विश्व गुरु बनने या दुनिया भर में महान नेता बनने की बात करते हैं, अपनी लोकप्रियता पर इतराते हैं तो दुनिया भर में यह क्यों नहीं बताया जाये कि उनकी लोकप्रियता क्यों है। जहां तक विदेश में संवेदनशील मुद्दे पर बात करने का मामला है नरेन्द्र मोदी यह सब पहले ही कर चुके हैं। प्रधानमंत्री के रूप में कर चुके हैं तो विपक्ष के नेता के लिए यह बताना लाजिमी है कि वे क्यों खिलाफ हैं या क्यों विरोध करते हैं और कल जिस ढंग से उन्होंने अपनी बात रखी वह उनका तरीका था और उनकी योग्यता क्षमता का हिस्सा। भाजपा अगर ऐसा करना चाहती है तो कहे कि क्यों करना है और नहीं करना है तो कहे कि नहीं करना है। लोगों को आधी-अधूरी जानकारी देकर, कांग्रेस के खिलाफ लोगों को भड़का कर वोट लेना भी तो ठीक नहीं है।

मीडिया का काम है, सच बताना तो उसका बड़ा वर्ग अक्सर भाजपा का समर्थन करता है। रूटीन की जो खबरें सरकारी प्रचार की होती हैं उनका तो मैं जिक्र भी नहीं करता। वैसे भी, राहुल गांधी की छवि खराब करने का काम नरेन्द्र मोदी ने जिस स्तर पर जितना खर्च करके किया है उसे ठीक करने के लिए राहुल गांधी जो भी कर रहे हैं कम है भले भाजपा को ज्यादा लगे। मुझे लगता है कि नरेन्द्र मोदी तो राहुल गांधी के आस-पास कहीं नहीं ही हैं उनकी पार्टी में भी कोई इस लायक नहीं है।

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1 Comment

1 Comment

  1. सैलानी

    September 12, 2024 at 12:20 pm

    यह व्यक्ति चाहता है कि अखबार खबरें न दें एक्टिविज्म करें। हर बार एक ही राग अलापता है कि अखबार भाजपा का हित साध रहे हैं। अगर राहुल ने अमेरिका में भारत विरोधी इल्हान उमर से मुलाकात की है, तो उसके औचित्य पर खुद बयान देकर स्थिति साफ करें न। अखबार क्यों उसका औचित्य तय करें। फिर जम्मू-कश्मीर चुनाव से पहले राहुल ने इल्हान से मुलाकात करके मुस्लिम और अलगाववादी विचारधार वाले वोटरों को ही तो साधने की कोशिश की है। पहले तो समीक्षाकार खुद अपना चश्मा उतारें, फिर यहां लिखें।

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