अगर यही पदयात्रा बीजेपी की होती और अमित शाह 26 दिनों से पैदल चल रहे होते तो उसका कवरेज़ कैसा होता!

रवीश कुमार-

अमर उजाला और दैनिक जागरण हिन्दी प्रदेश के दो बड़े अख़बार हैं। इन दोनों अख़बारों के मुख्य हिस्से में 12-12 पन्ने होते हैं। तब भी भारत जोड़ो यात्रा की ख़बर के लिए जगह नहीं मिलती है। दैनिक जागरण में कोई ख़बर और तस्वीर नहीं है। अमर उजाला में सिंगल कॉलम के चौथाई हिस्से में एक सूचना है कि सोनिया गांधी यात्रा में शामिल होंगी। इस तरह से हिन्दी के अख़बारों से कांग्रेस की यात्रा को ग़ायब कर दिया गया है।

इस तरह से मीडिया को विपक्ष को ग़ायब रखता है ताकि जनता हर दिन याद रखें कि वह असहाय है। विकल्प नहीं है।गोदी मीडिया विपक्ष और लोकतंत्र का हत्यारा है। उसने विपक्ष को अदृश्य कर दिया है। मेरा शुरू से यह मानना रहा है कि जो भी विपक्षी दल अगर गोदी मीडिया से नहीं लड़ता है तो वह लोकतांत्रिक भूमिका नहीं निभा रहा है। विपक्ष के कई नेता अब मीडिया को लेकर जनता को जागृत करने लगे हैं मगर उनका रवैया बहुत ढीला है। ट्विटर पर ट्विट कर अपना काम समझ लेते हैं।

जयराम रमेश ने गोदी मीडिया और अर्ध गोदी मीडिया के झूठ को चुनौती दी है मगर अपर्याप्त है। कई ऐंकरों को माफ़ी माँगनी पड़ी है लेकिन केवल ट्विटर पर हल्ला करने से दुनिया को पता नहीं चलता। इसकी ख़बर भी कहीं नहीं छपती है। आप कह सकते हैं कि जयराम रमेश ने गोदी मीडिया की हरकतों से लोहा लेना शुरू किया है लेकिन उनका ध्यान बहुत छोटी लड़ाई पर है। वे मीडिया के उस दानव स्वरूप को नहीं समझ पा रहे हैं, जिसके बारे में उन्हीं के नेता राहुल गांधी ने कई बार बेहतर तरीक़े से बताया था। पदयात्रा की घोषणा के लिए बुलाई गई पहली प्रेस कांफ्रेंस और रामलीला मैदान में राहुल ने साफ़ कहा था कि मीडिया ने जनता की आवाज़ और विपक्षी आवाज़ ग़ायब कर दी है इसलिए पदयात्री बन रहे हैं। कांग्रेस ने उनके इस बयान को ही ग़ायब कर दिया।

जयराम रमेश को हिन्दी के अख़बारों और चैनलों का सही आँकलन करना चाहिए, उसके बाद बयान देते कि मीडिया भारत जोड़ो यात्रा को कवर कर रहा है। यह यात्रा ग़ायब कर दी गई है। मेरी नज़र में गोदी मीडिया और अर्ध गोदी मीडिया ने भारत जोड़ो यात्रा को प्रतिबंधित कर दिया है। टीवी चैनलों से भी यात्रा ग़ायब है। एक चैनल तो और भी चालू है। उसके मेन चैनल पर यात्रा नहीं है लेकिन यू ट्यूब पर दिखाता रहता है। इसी तरह से सबने ख़ानापूर्ति की है। बाक़ी जयराम रमेश ज़्यादा समझदार हैं।

अगर यही पदयात्रा बीजेपी की होती और अमित शाह 26 दिनों से पैदल चल रहे होते तो उसका कवरेज़ देखते। हर पन्ने पर अमित शाह के पैदल चलने और आशाओं के नव युग और नव संचार से लैस ख़बरें और विश्लेषण भरे होते। राहुल गांधी की तरह अमित शाह या नरेंद्र मोदी बारिश में भीगते हुए भाषण दे रहे होते तो उस तस्वीर को पूरे पन्ने पर छापा जाता। उन्हें अवतार बताया जाता। टीवी चैनल दिन रात चला रहे होते कि मोदी कितने महान हैं। कांग्रेस को सीखना चाहिए। बारिश होती रही और रैली को संबोधित करते रहे।

जब तक हर नागरिक, हर नेता हज़ारों करोड़ रुपये की ताक़त से चलने वाले मीडिया से नहीं लड़ेगा, हर दिन सवाल नहीं करेगा तब तक इस लोकतंत्र में संतुलन नहीं आएगा। बिना शक्ति संतुलन के लोकतंत्र तानाशाही में बदल जाता है।



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One comment on “अगर यही पदयात्रा बीजेपी की होती और अमित शाह 26 दिनों से पैदल चल रहे होते तो उसका कवरेज़ कैसा होता!”

  • डॉ अशोक कुमार शर्मा says:

    पता नहीं क्यों जब मैं आपका कोई तर्क पढ़ता हूं, तो रेत में सर घुसाए एक शुतुरमुर्ग याद आ जाता है। रेत में घुसा लेने के बहुत सारे फायदे हैं। आपके दिमाग का, आपकी आंखों का, आपके मुख का, आपकी सोच का और आपकी गर्दन का सीधे जमीन से जुड़ाव हो जाता है। तब आपको यह हक पहुंच जाता है कि आप कह सकें कि आप रेत से जुड़े, अरेरेरे.. गलती हो गई, मेरा मतलब है ख़ाक से जुड़े इंसान हैं। बेशक आप भक्त नहीं है क्योंकि भक्ति भावना अधिक गाली हो गई है। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि आप को राष्ट्र से कोई मतलब नहीं है, क्योंकि राष्ट्र तो मां बहन की गाली से भी बड़ा हो गया है। आपको सेकुलर मैं कह नहीं सकता क्योंकि सेकुलर होना तो गद्दार से भी बड़ी गाली हो गई। दुख की बात यह है कि अभी देश की सियासत मानसिक चिंतन से नहीं एजेंडे और स्पॉन्सरशिप से चलती है।
    देश की पत्रकारिता की यह हालत हो गई है की जनता को प्रभावित करने की ताकत तो रही नहीं अब आप खुद अपने भाई बंधुओं को गरियाने लगे हैं। सीधे जनता को ही कोसने लगे हैं, क्योंकि अगर 26 दिन से राहुल गांधी पैदल चल रहे हैं और एक जनसभा में जिसमें सर पर कुर्सी उठाए हुए कुछ लोगों का फोटो आपको पसंद आ गया तो उसमें आपको मोदी और शाह की साजिश नजर आने लगी। जैसे इन लोगों ने आसमान में कुछ छिड़काव कराके कर बारिश करा दी। मीडिया वाले इस खबर को उठा नहीं रहे हैं और उनकी पदयात्रा की खबर को सिंगल कॉलम में छाप रहे हैं तो आप उन्हें जूते लगा रहे हैं। आपकी खुद हैसियत इतनी रह गई है कि अब आप कॉलम लिखकर गुस्सा निकालते हैं। आपकी सारी एरोगेंस वक्त ने तबाह कर दिया है और अब आप दूसरों को गाली देने से ज्यादा कुछ कर ही नहीं सकते। मुझे तो यह भी मालूम है कि आपकी एरोगेंस इतनी है कि आप इस आलेख को और इस पर आई टिप्पणियों को भी नहीं पढ़ेंगे।
    अगर आप इसे पढ़ रहे हैं तो आपको शुभकामनाओं के साथ मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि एक जमाना था कहा जाता था कि जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। आज दौर बदल गया है आज कल तक फटी गद्दी वाली साइकिल पर गांव से शहर जाने वाले पत्रकार 50 करोड़ से अधिक के मालिक हो गए हैं और अंग रक्षकों के बीच महंगी से महंगी गाड़ियों में चलते हैं। यह वह लोग हैं जिन का नारा है अगर नोट कमाने है तो अखबार निकालो। इन लोगों में ही वह लोग शामिल हैं जो कश्मीर से नाता रखते हैं और करोड़पति हैं। जिनके खानदान फटेहाल थे और वह करोड़पति हो गए हैं। जिनके पास कोई ज्ञान नहीं है और वह यूट्यूब चैनल चलाने लगे हैं तथा अपनी सरकुलेशन और हिट्स बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया ऑप्टिमाइजेशन एक्सपर्ट का सहारा ले रहे हैं और उस पर पैसा खर्च कर रहे हैं।
    पत्रकारिता के छुट भैया इन माफियाओं के खिलाफ लिखने का बूता मुझे तो सिर्फ उस एक ही आदमी में, नजर आता है जिसकी कुछ दिन पहले इस षड्यंत्र के तहत गिरफ्तारी होने पर और जेल जाने पर भारत का मीडिया खामोश बैठा हुआ था। जिसके ऊपर अत्याचार और मारपीट जैसे कांड होने के बावजूद भारत का मीडिया चूं तक नहीं बोला था।
    मैं उस आदमी की बात कर रहा हूं किसके खानदान में फटे हाल कोई भी नहीं हुआ था और जिसने पत्रकारिता से सरमाया नहीं बनाया है बल्कि देश के बड़े से बड़े मीडिया हाउस से टक्कर लेते हुए उन अनजाने पत्रकारों की जंगों को एक दिशा दी है जो शायद कभी यशवंत सिंह को आभार व्यक्त करने उसके पास ना तो गए होंगे और ना कभी उसे फोन किया होगा।
    मैं उस यशवंत सिंह की बात कर रहा हूं जिसके भड़ास फॉर मीडिया यानी इस प्लेटफार्म को पत्रकारिता में कुछ समय तक एक घटिया और पीत पत्रकारिता से नीचे की चीज समझा जाता था। लेकिन अपने अकेले बूते के प्रयास से उसने यह मुकाम हासिल किया कि पत्रकारिता में अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले लोग आज उसके प्लेटफार्म पर लिखने पर मजबूर हैं।
    बेशक यशवंत व्यवस्था के विरोधी हैं और विरोधी नहीं बल्कि बागी हैं। वह आप लोगों के कॉलम्स और स्पॉन्सर्ड पत्रकारिता तक को महत्व देते हैं।
    सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि धुर मोदी, योगी और भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद विरोधी नजर आने वाले इस इंसान को ना तो अपनी सुरक्षा की परवाह है ना अपने संस्थान की ना अपनी सेहत की ना अपने परिवार की और ना आने वाले कल की। वह एक योद्धा की तरह इन बेमतलब की जंगो को लड़े जा रहा है।
    अब अगर पूरे भारत के मीडिया में सिर्फ एक ही प्लेटफार्म ऐसा है जो 26 दिन से भारत जोड़ो आंदोलन को लगातार हर तरीके से समर्थन देता आ रहा है, तो यह तो तय है कि वह बिका नहीं है।
    मैं आपकी उन तेजाबी गालियों का हकदार हूं जिनसे, आप भक्त और राष्ट्रवादी कह के अपने हर विरोधी को गरियाते हैं। इसके बावजूद मैं सिर्फ एक ही बात कहता हूं कि अगर मोदी कुछ गलत कर रहे हैं अमित शाह कुछ गलत कर रहे हैं भारतीय जनता पार्टी कुछ गलत कर रही है। तो उसे ईमानदार आना सबूत देते हुए दिखाना, जताना, बताना, बोलना, सुनाना और शेयर करना जारी रखिए। मीडिया को गरियाने ने से कुछ नहीं होगा। सब समय का फेर है। आजकल कांग्रेसका समय ठीक नहीं चल रहा है। उसे ठीक करने की कोशिश राहुल गांधी कर रहे हैं। बहुत अच्छी बात है। उसमें देश के मीडिया को रुचि लेनी चाहिए। यह भी बहुत अच्छी बात है। लेकिन इस बात के खयाली पुलाव मत पकाइए कि आप मीडिया के जरिए आप देश की जनता को भड़का कर इस देश में खूनी क्रांति करवा सकते है। मैं जितना भी बदलाव और जब भी आया है, उसका आधार जनचेतना ही रही है चाहे वह अट्ठारह सौ सत्तावन का गदर हो, या 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन। सत्ता के केंद्र को जब हिलाने की कोशिश की जाती है तब वह सारे हथकंडे अपनाता है। यह काम अंग्रेजों ने भी किया था और यह काम करने में मुगल बादशाह भी किसी से पीछे नहीं थे। तब चैनल नहीं थे जब शिवाजी इस काम को कर रहे थे। मीडिया ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का साथ नहीं दिया था और स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों का भी नहीं दिया।
    किस महान व्यक्ति की पदयात्रा की विफलता से आप बहुत खिन्न और दुखी हो गए हैं, उनकी दादी जी ने अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल में आपातकाल लगाने के साथ सबसे पहला काम मीडिया का गला घोटने का किया था और सेंसरशिप लागू कर दी थी।
    लेकिन तब हुआ क्या था उनकी सरकार को आम जनता ने हटा दिया। इंदिरा इज इंडिया का नारा फेल हो गया। विज्ञापन और मीडिया की बैसाखी पर टिका अटल बिहारी वाजपेई का इंडिया शाइनिंग वाला नारा भी फेल हुआ।
    मीडिया किसी देश का भाग्य विधाता नहीं होता है। भारत की जनता के बारे में अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की धारणा यह है कि कम पढ़े लिखे होने के बावजूद भारतीय सब मुद्दों को समझते हैं।महसूस करते हैं और सही मौके पर सही फैसला लेते हैं। उन्हें दबाया, धमकाया, डराया और प्रभावित नहीं किया जा सकता।
    आज भाजपा मोदी योगी की जय जय हो रही है। इससे पहले और लोगों की हुई थी। भविष्य में कुछ और लोगों की होगी। समय का यह चक्र चलता ही रहेगा। जनता सप्ताह को तवे पर रखी रोटी की भांति मनमर्जी से उलट पलटती रहेगी। वह किसी पद यात्रा में शामिल हो या ना हो या किसी एक लंगोट पहनने वाले लाठी लेकर चलने वाले कमजोर से आदमी के कहने पर महंगे से महंगे विदेशी वस्त्र जलाने को तैयार हो जाए या आकार में मोदी जी के आधे रहे लाल बहादुर शास्त्री जैसे दुबले पतले और कमजोर से दिखने वाले प्रधानमंत्री कहने पर सप्ताह में एक व्रत रखने को तैयार हो जाए ताकि विदेशों से अनाज आयात ना करना पड़े। तो यह मीडिया का चमत्कार नहीं है शब्दों और भावनाओं का खेल अधिक है। इसे समझिए और इसका इस्तेमाल उस तरह से करिए ताकि आप अपने भीतर भरे मोदी, शाह, योगी और भाजपा घृणा का तेजाब साफ कर सकें और अपना डायलिसिस करके अपने भीतर लोक कल्याण की सत्य भावना का अमृत भर सकें।
    निसंदेह उन लोगों की आलोचना करने का हक आपको है और आपको करनी भी चाहिए। लेकिन इसके साथ में यह भी बहुत जरूरी है कि आप इस पर भी ध्यान दें कि विपक्ष की राजनीति में क्या गलतियां और गुनाह किए जा रहे हैं? बेशक अभी तक आपका कद बड़ा ही है। आपके पास एक अलग शैली है। आपका एक अच्छा दिमाग भी है। आप यह काम बहुत अच्छी तरह से कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए नजरिया रवैया और भावनाएं ऋषि जैसी होनी चाहिए।
    जिस दिन आप मीडिया के शहंशाह और भारत भाग्य विधाता होने के अभिमान से बाहर निकल आएंगे। सर्व स्वीकार्य पत्रकार रवीश कुमार फिर से जिंदा हो जाएगा और इस बार उसकी आवाज में तेजाब नहीं अमृत होगा। उसके लिखे, कहे और बोले पर वह सब होगा, जो आज तो नामुमकिन ही है।

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