राजस्थान में लोकतंत्र नहीं राजशाही है

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर

बुजुर्गों से राजशाही के बारे मेँ खूब सुना। इतिहास मेँ पढ़ा भी। राजाओं, महारानियों के एक से एक किस्से। उनका राज चलाने का ढंग। उनकी प्रजा के प्रति लगाव और दुराव। राजघरानों मेँ षडयंत्र और राजाओं को हटाने की चालें। राजा की फोटो वाले सिक्के। उनकी तस्वीर वाले दस्तावेज़। ये सब सुन और पढ़ मन मेँ इच्छा होती कि काश! काश मेरा जन्म भी उस दौर मेँ होता जब राजशाही थी। मैं भी देख लेता विभिन्न स्थानों पर उनके फोटो। लेकिन नहीं हुआ। जन्म नहीं हुआ तो नहीं हुआ।

मगर किस्मत देखो, मेरी यह इच्छा लोकतन्त्र में जन्म लेने के बावजूद पूरी हो ही गई। मेरी क्या पूरी हुई, कई करोड़ लोगों की पूरी हो गई। आज के दिन जो भी राजस्थान का निवासी है, वह राजशाही को देख सकता है। अनुभव करने की सुविधा भी है उनके पास। बस, नजर होनी चाहिए राजशाही देखने और अनुभव करने की। मज़ाक नहीं है। ना ही ये कोई व्यंग्य है।

प्रदेश मेँ राजशाही की बात उसी प्रकार सत्य है जैसे देश मेँ नरेंद्र मोदी के नेतृत्व मेँ बीजेपी का राज। कहने को तो प्रदेश मेँ लोकतान्त्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार है और  विधायकों की ओर से चुना गया मुख्यमंत्री भी। बेशक मुख्यमंत्री के रूप मेँ बीजेपी नेता वसुंधरा राजे सिंधिया सरकार चला रहीं है। किन्तु ये भी याद  रखने की बात है कि वे महारानी भी हैं । उनके खून मेँ राजशाही है। वे बहुत बड़े राजघराने की राजकुमारी और बाद मेँ स्टेट की महारानी बनीं। हो गया होगा राजशाही का खात्मा। नहीं रहीं होंगी राजाओं/महारानियों की रियासतें। किन्तु वसुंधरा राजे सिंधिया की नजर मेँ राजस्थान प्रदेश उनकी रियासत है और वे उस रियासत की महारानी। विश्वास नहीं तो श्रीगंगानगर मेँ जारी हो रहे भूखण्डों के पट्टे  देख लो। कोई भी नया पट्टा हाथ मेँ लो। ऊपर ही ऊपर देखो। एक ओर दीनदयाल उपाध्याय का चित्र है और दूसरी तरफ महारानी वसुंधरा राजे सिंधिया का मुख्यमंत्री के रूप में। है कि नहीं।

ये वैसा ही दस्तावेज़ हैं ना जैसे राजशाही में जारी हुआ करते थे। जिनके बारे मेँ सभी ने सुना और पढ़ा हुआ है। देश को आजाद हुए सात दशक हो गए। राजस्थान मेँ रियासतों का विलय हुए भी साठ साल से अधिक हो चुके हैं। खुद जनता अपने वोट से अपनी पसंद की सरकार चुनती है। जनता द्वारा, जनता की, जनता के लिए चुनी गई सरकार को राजशाही मेँ बदलते मैंने पहली बार देखा है। सरकार की ओर से जारी हो रहे पट्टों पर सीएम  वसुंधरा राजे सिंधिया की फोटो तो यही साबित करती है। इससे यही लगता है कि सीएम महारानी की तरह राजस्थान को अपनी निजी स्टेट समझ के शासन कर रहीं है। तभी तो सरकारी दस्तावेज़ पर उनकी तस्वीर है। राजशाही का इससे बड़ा उदाहरण और कोई हो भी नहीं सकता।

यह फैसला चूंकि महारानी का है, इसलिए कोई इसके खिलाफ बोल ही नहीं रहा। सब जानते हैं कि  राज आज्ञा के खिलाफ बोलना राजद्रोह कहलाता है और राजद्रोही को मृत्युदंड तय है। जनता तो बेचारी है, विपक्षी दल कांग्रेस भी खामोश है। वह कांग्रेस  जो यह दावा करती है कि प्रदेश मेँ अगली सरकार उसी की ही होगी। कांग्रेस नेताओं को यह ज्ञान होना चाहिए कि केवल बोलने से ही तो सरकार नहीं बन सकती।  कांग्रेस ने अपने अंदर गुटबाजी बढ़ाने के अतिरिक्त प्रदेश मेँ ऐसा कुछ भी नहीं किया, जिससे ये  लगे कि प्रदेश मेँ राजशाही नहीं लोकतन्त्र है और लोकतन्त्र मेँ सरकार के तुगलकी निर्णयों का विरोध सभी का हक है। कांग्रेस की कांग्रेस जाने। राजशाही मेँ कुछ दिन जीने की अपनी तमन्ना तो पूरी हो गई। बस एक कसक रह गई, वह यह कि कोई भूखंड अपना भी होता तो हम भी महारानी की फोटो वाला पट्टा बनवा उसे सहेज कर रख लेते और आने वाले बच्चों को दिखा गर्व से ये कहते, लोकतन्त्र मेँ भी राजशाही देखी है हमने। शुक्रिया लोकतन्त्र। शुक्रिया महारानी। और जय हो आपकी राजशाही की। दो लाइन पढ़ो-

भला, बुरा कुछ सोच मत पूरा कर तू स्वार्थ,
जीवन इसी से धन्य होगा व्यर्थ है परमार्थ।

लेखक गोविंद गोयल श्रीगंगानगर, राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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