शुक्रिया गुजरात! अहंकार को आइना दिखाने के लिए

गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर। सत्ता का अहंकार जब जन भावनाओं से बड़ा हो जाता है, तब यही होता है, जैसा गुजरात मेँ हुआ। उस दौर मेँ जब सत्ता की आलोचना करना भी जान जोखिम मेँ डालना हो, तब सत्ता को आइना दिखाने का साहस करना बहुत हौसले का काम होता है। समझो दुस्साहस ही है ऐसा करना।   जब यह हौसला गुजरात की जनता करे तो इसके मायने भी दूर दूर तक जाने वाले और बहुत गहरे होते हैं। क्योंकि गुजरात मेँ नरेंद्र मोदी जितना प्यार किसी और नेता को नहीं मिला। कांग्रेस तो जैसे दिखनी ही बंद हो गई थी। सत्ता के अहंकार ने नरेंद्र मोदी के अंदर ऐसी जगह बनाई कि उनको जन भावना दिखाई देनी बंद हो गई।

कांग्रेस सहित दूसरे दलों की कमजोरी ने उनके इस अहंकार का पोषण किया, तभी वे कांग्रेस मुक्त भारत की बात करने लगे। दूसरी पार्टियों से निराश जनता ने जब उनका साथ देना शुरू किया तो नरेंद्र मोदी के इर्द गिर्द लिपटा सत्ता का अहंकार और अधिक पुष्पित और पल्लवित होने लगा। इस अहंकार ने उनके अंदर धीरे से यह फिट कर दिया कि अब कोई नहीं है उनके अतिरिक्त, इसलिए जो चाहे करो। अहंकार सिर चढ़ के जब बोलने लगा तो पीएम ताली बजा बजा के भाषण देने लगे। ना जाने कैसे कैसे शब्द और ना जाने कैसी कैसी बात। ये लगने लगा जैसे बीजेपी और नरेंद्र मोदी अजेय हैं। उन पर जीत तो दूर,उनको चुनावी रण मेँ ललकारा भी नहीं जा सकता। गुजरात ने इन सब बातों का जवाब दे दिया है।

गुजरात की जनता ने अपनी भावनाओं के माध्यम से बीजेपी को  आइना दिखाते हुए ये संकेत दिया कि हम आपको सचेत कर रहे  हैं कि अगर भविष्य मेँ भी ऐसा करते रहे तो ठीक नहीं होगा। यही  जनता कांग्रेस को यह कहती दिखी कि बढ़ते रहो, हम आपको भी निगाह मेँ रखेंगे। कांग्रेस की सरकार नहीं बना सकी, लेकिन उसने बढ़त बनाई भी और दिखाई भी। जो राहुल गांधी बात बात पे लतीफा बनते थे, वे गंभीरता से लिए गए। साथ मेँ सुने गए। गुजरात चुनाव का असर दोनों पार्टियों पर पड़ेगा। बीजेपी और उनके नेताओं का अहंकार टूटना चाहिए और कांग्रेस को अधिक मेहनत करनी चाहिए। राजस्थान के लिहाज से भी इस चुनाव का महत्व कम नहीं था। इधर एक साल बाद चुनाव होने है।

पूर्व सीएम और गुजरात कांग्रेस के प्रभारी अशोक गहलोत ने गुजरात मेँ ना केवल कांग्रेस की खोई पहचान बनाई बल्कि उसको खड़ा करने का काम भी किया। राजस्थान का चुनाव उसके लिए कोई सरल नहीं है। हां, अगर बीजेपी गुजरात मेँ छठी बार सत्ता पाकर इतराई रही तब  राजस्थान मेँ कांग्रेस का काम कुछ कुछ आसान हो सकता है। बीजेपी ने गुजरात से  थोड़ा भी सबक लिया तो फिर कांग्रेस को अभी से सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ तय करना पड़ेगा। यहाँ तक कि अपना सीएम का उम्मीदवार भी। ताकि उसी के अनुरूप टिकटों का वितरण हो सके। वह भी चुनाव के वक्त नहीं, बहुत पहले। जिससे कांग्रेस के भावी उम्मीदवार को वोटर्स तक पहुँचने मेँ आसानी हो। जो इधर उधर होने वाले हों, उनको साधने का काम किया जा सके। इसमें कोई शक नहीं कि अशोक गहलोत का कद बढ़ेगा। किन्तु केवल कद तब तक सत्ता नहीं दिलाते जब तक बाकी भी ठीक ठाक ना हो।

अभी तो लगभग हर विधानसभा सीट पर दो गुट साफ दिखाई दे रहे हैं। एक अशोक गहलोत गुट का दावेदार और दूसरा सचिन पायलट गुट का। इनको एक नहीं किया गया तो फिर परिणाम पक्ष मेँ आना मुश्किल होगा। कांग्रेस अगर ये सोचे कि वर्तमान बीजेपी सरकार से नाराज प्रदेश की जनता उसे पड़े पड़े ही सत्ता सौंप देगी तो यह इसकी भूल होगी। और बीजेपी ने ये मान लिया कि उसके अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं है तो यह उसकी नादानी होगी। सत्ता के अहंकार मेँ ऐसी नादानियाँ होना स्वाभविक होता है। संभावना यही है कि आने वाले कुछ माह मेँ दोनों पार्टियों मेँ बहुत कुछ बदला बदला दिखाई दे सकता है। सीएम और सीएम के वर्तमान दावेदार भी बदल जाएं  तो हैरानी नहीं। दो लाइन पढ़ो-

दो किनारों को मिलाने की कोशिश में हूँ
देखना किसी रोज टूट के बिखर जाऊंगा।

लेखक गोविंद गोयल श्रीगंगानगर (राजस्थान) के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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मीडिया का नेशनल इश्यू… हनीप्रीत! हनीप्रीत!! हनीप्रीत!!!

गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर। हनीप्रीत इस देश के मीडिया के लिए बड़ा मुद्दा है। उस मुद्दे से भी बड़ा जो जन जन से जुड़ा हो सकता है। इसीलिए तो तमाम मीडिया केवल और केवल हनीप्रीत की खबर दिखा और छाप रहा है। हनीप्रीत मिल भी जाए तो इससे जनता का क्या भला होने वाला है। वह मिल जाए तो बाद पेट्रोल-डीजल के दाम कम हो जाएंगे क्या! ना मिले तो नोट बंदी फिर से लागू होने वाली नहीं। सीधी बात सीधे शब्दों मेँ कि उसका मिलना ना मिलना देश हित मेँ कोई महत्व नहीं रखता।

अब मीडिया जिस  कदर उसके पीछे दीवाना हुआ है, उससे ऐसा लगने लगा है कि कहीं उससे संबन्धित खबरों की बाढ़ किसी का कोई छिपा एजेंडा तो नहीं! जनता को फुसलाए रहो हनीप्रीत के नाम से। बहलाते रहो उसके सच्चे झूठे किस्सों से। ताकि कोई और बात ही ना करे। क्योंकि जब जनता को  हर चैनल पर, अखबार मेँ हनीप्रीत ही दिखाई जाएगी तो और कुछ याद भी कैसे आएगा। चर्चा उसी की होनी है। एक सवाल जो सबसे बड़ा है, वो ये कि कोर्ट ने जब बाबा को दोषी करार दिया तब खुद सरकार हनीप्रीत को हेलिकॉप्टर मेँ लेकर गई, बाबा के साथ। सब जानते हैं,  हेलिकॉप्टर वहां तक गया, जहां कोई प्राइवेट गाड़ी जा नहीं सकती थी। उसे जेल मेँ तो रखा नहीं गया तो फिर वहां से हनीप्रीत गई कहाँ? अकेले अपने दम तो कहीं जा नहीं सकती थी। क्योंकि सुरक्षा व्यवस्था ही ऐसी थी कि मीडिया तक को जेल के पास तक नहीं फटकने दिया गया था।

जब कोई जेल के आस पास जा ही नहीं सका  तो ऐसे मेँ हनीप्रीत को उसका साथी तो कहीं ले जा नहीं सकता था। सवाल ये कि वहां से वो  गई कहां! इसका जवाब सरकार दे या वे अधिकारी, जो उसे बाबा के साथ लेकर गए। क्योंकि जहां हनीप्रीत गई थी वहां सरकारी इजाजत के बिना परिंदा भी नहीं आ सकता था। इसका अर्थ ये कि या वो सरकार के पास है, मतलब किसी सरकारी एजेंसी के पास। या फिर उसे किसी सरकारी माध्यम से कहीं भेजा गया। या प्राइवेट गाड़ी द्वारा  सरकारी संरक्षण मेँ! फिर उसे यहां वहां खोजने का नाटक क्यों? कभी नेपाल मेँ दिखने और कभी गुरुसर मोड़िया मेँ खोजने की कहानी क्यों! लेकिन आज तक मीडिया ने कभी किसी से ये सवाल किया ही नहीं। जो हर रोज सीरियल की तरह हनीप्रीत को दिखा और उसके बारे मेँ बता रहे हैं, वे इतने भोले, नादां तो नहीं हो सकते कि उनको इस बात का इल्म ही ना हो कि हनीप्रीत सुनारिया पहुँचने के बाद गायब हुई है। उसके बाद की उसकी कोई लोकेशन नहीं है।

जब अंतिम बार वह सरकार के अधिकारियों के साथ थी तो फिर वो गई कहां? इसका  जवाब केवल और केवल सरकार के पास ही होना चाहिए। उसी से इस बाबत पूछा भी जाना चाहिए। और मीडिया उसे बता रहा है नेपाल मेँ। क्या इससे ऐसा नहीं लगता कि  कुछ तो है जिसे छिपाया जा रहा है। कहीं तो पर्दा है, जिसे उठने नहीं दिया जा रहा। सवाल केवल यही नहीं और भी है। सवाल ये भी छोटा नहीं है कि लीव इन रिलेशनशिप के दौर मेँ किसी को किसी के आपसी रिश्ते से एतराज क्यों? बाबा जाने या हनीप्रीत कि उनमें क्या संबंध हैं!

हनीप्रीत को कोई एतराज नहीं तो फिर आप और हम कौन? नैतिकता! नैतिकता किसे कहते हैं? ये कहाँ रहती है और किस प्रकार की है।  कोई बता सकता है! नहीं बता सकता। क्योंकि नैतिकता नाम की आइटम  अब लुप्त हो चुकी है। चलो मान लिया नैतिकता है। है   तो उसका थोड़ा बहुत अंश मीडिया मेँ दिखाई क्यों नहीं दे रहा! क्या मीडिया की नैतिकता नहीं होती! क्या मीडिया नैतिकता से परे है! या फिर हनीप्रीत ने इसको समाप्त कर दिया है। कितनी हैरानी की बात है कि एक माह से मीडिया का नेशनल इश्यू केवल और केवल हनीप्रीत है। इसके लिए सब खत्म। खबरें भी और नैतिकता भी।  साथ वे सवाल भी, जो किए जाने चाहिए! सरकार से पूछे जाने चाहिए। दो लाइन पढ़ो-

सवाल मेरे पास रह गए, जवाब सारे तू ले गया
तेरा इक इश्क मुझे, हाय!  कैसे कैसे दर्द दे गया।

लेखक गोविंद गोयल श्रीगंगानगर (राजस्थान) के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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नागरिक करे तो जागरूकता, पत्रकार करे तो धौंस

गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर। फेसबुक की एक छोटी मगर बहुत प्यारी पोस्ट के जिक्र के साथ बात शुरू करेंगे। पोस्ट ये कि एक दुकानदार ने वस्तु का मूल्य अधिक लिया। ग्राहक ने उलाहना देते हुए वीडियो शूट किया। दुकानदार ने सॉरी करना ही था। हर क्षेत्र मेँ जागरूकता जरूरी है। बधाई, उस जागरूक ग्राहक को। तारीफ के काबिल है वो। लेकिन अगर यही काम किसी पत्रकार ने किया होता मौके पर हँगामा  हो जाता। लोग पत्रकार कि वीडियो बनाते। सोशल मीडिया पर बहुत से व्यक्ति ये लिखते, पत्रकार है, इसलिए धौंस दिखा रहा है। पत्रकारिता की आड़ लेकर दुकानदार को धमका रहा है। चाहे उस पत्रकार को कितने का भी नुकसान हुआ होता। पत्रकार के रूप मेँ किसी की पहचान उसके लिए मान सम्मान के साथ दुविधा, उलझन, कठिनाई भी लेकर आती है। क्योंकि हर सिक्के दो पहलू होते हैं। एक उदाहरण तो ऊपर दे दिया। आगे बढ़ते हैं।

किसी दूसरे फील्ड का व्यक्ति कहीं सम्मानित हो तो सब यही कहेंगे, भई! काबिल था, इसलिए सम्मान तो होना ही चाहिए। योग्यता का सम्मान हुआ है। हकदार था इस सम्मान का। और यही सम्मान किसी पत्रकार का हो जाए तो सभी की भाषा बदल जाती है। लोग कहेंगे, चमचा है साला प्रशासन का। चापलूस है। दल्ला है….और भी ना जाने क्या क्या! जनाब, आप सम्मानित होंगे तो आपकी उपलब्धि की खबर प्रिंट मीडिया मेँ होगी। लेकिन किसी पत्रकार का सम्मान होने पर उसके साथी ही खबर को हिचकिचाते, किचकिचाते हुए लगाएंगे। ना लगे तो ना भी लगे। कोई पूछने वाला हो इन सबसे कि क्या पत्रकार योग्य नहीं हो सकता?

वे क्या सम्मानित होने लायक नहीं होते! उनमें क्या योग्यता का अभाव होता है! कोई सरकारी विभाग ऐसा नहीं जहां अपने काम के लिए सुविधा शुल्क ना देना पड़ता हो। उस काम के लिए भी जो सरकारी अधिकारी/कर्मचारी का दायित्व है, पैसा देना पड़ता है। बिना जान पहचान तो कोई सरकारी कर्मचारी किसी की बात सुन ले तो समझो वह भाग्यशाली है। पत्रकार किसी से विज्ञापन मांग ले तो उसका सब मिट्टी हो जाता है। कोई किसी गिफ्ट द्वारा ओबलाइज कर दे तो ऐसे ऐसे कमेन्ट सुनने और पढ़ने को मिलते हैं कि क्या कहने! बिकाऊ मीडिया। ब्लेकमेलर पत्रकार।

कमाल है! दूसरे पैसे लें तो वे बहुत बढ़िया। व्यावहारिक। और पत्रकार लें तो बिकाऊ, ब्लैकमेलर। किसी की तारीफ कर दो तो सुनने को मिलेगा कि कुछ मिल गया होगा। आलोचना छाप दो ये कहेंगे, कुछ मिला नहीं होगा। सामान्य नागरिक द्वारा अपने अधिकार के लिए आवाज बुलंद  करने पर सब उसकी तारीफ करेंगे। उसका सम्मान करेंगे। उसके जज्बे को सलाम करेंगे, किन्तु कोई पत्रकार अपने हक के लिए कुछ बोले या लिखे तो बात उलटी हो जाएगी। कुछ बोलेंगे और कुछ खामोश रहेंगे। ऐसा सुनने को मिलेगा, पत्रकार है ना! इसलिए अपने रुतबे का गलत प्रयोग कर रहा है। एक नहीं अनेक बातें हैं। जो वही जानता है जिसने ये सब भोगा है। भोग रहा है। दुनिया चाहे कुछ भी करे लेकिन पत्रकार को  कहीं से किसी शो का कोई पास भी मिले तो चर्चा होने लगती है।

जनाब, पत्रकार होना कोई आसान नहीं है। और उसके लिए तो बहुत मुश्किल है जिसकी पहचान पत्रकार के रूप मेँ बन चुकी है। ऐसा नहीं है पत्रकार गलत नहीं होते। वे अपनी धौंस नहीं दिखाते। अपनी पोजीशन का का बेजा इस्तेमाल नहीं करते। होंगे ऐसे भी। क्योंकि वे भी हैं तो तो इसी समाज के। पत्रकारिता भी वैसा ही पेशा है जैसे और हैं। दूसरे पेशे मेँ भी बहुत सी बुराइयाँ होंगी। पेशे से जुड़े लोगों मेँ कमियाँ होंगी। ऐसा ही कुछ पत्रकारिता मेँ है। पत्रकारों मेँ है। ये शब्द धौंस दिखाने वाले, अपनी पोजीशन का बेजा इस्तेमाल करने वाले पत्रकारों /पत्रकारिता का बचाव नहीं कर रहे, बस वो बताने की कोशिश है जो पत्रकारों और पत्रकारिता को क्या क्या सहना पड़ता है। पीना पड़ता है। आज चार लाइन पढ़ो-

मेरा एक एक शब्द अब तो बिकाऊ है जनाब
ज़मीर! ज़मीर तो अब बस दिखाऊ है जनाब।
शहर तो पूरा मेरा सम्मान करता है जनाब
मगर पेट तो रोटी से ही भरता है ना जनाब। 

लेखक गोविंद गोयल गंगानगर (राजस्थान) के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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ऐसी-ऐसी खबरें गढ़ी जा रहीं जिनका कोई वजूद नहीं!

श्रीगंगानगर। समझ से परे है कि मीडिया/मीडिया कर्मियों को हुआ क्या है! ऐसी-ऐसी खबरें जिनका कोई वजूद नहीं! इसमें कोई शक नहीं कि कुछ खबरें होती हैं और कुछ वक्त की मांग के अनुसार गढ़ी भी जाती हैं, यूं कहिये की गढ़नी भी पढ़ती हैं, लेकिन गढ़ाई गढ़ाई जैसी तो हो! ये क्या कि सिर कहीं और पैर कहीं। बाबा गुरमीत सिंह राम रहीम और मंत्री परिषद के पुनर्गठन विषय पर मीडिया ने जो कुछ कहा, उसमें कब कितना सच था, सब सामने आ गया। झूठ, कोरे कयास और गढ़ाई सच की तरह परोसी जाती रही। आम जन के पास ऐसा कोई जरिया होता नहीं जो सच को जान सके। उसके  लिए तो मीडिया और मीडिया कर्मी ही भगवान होते हैं, ऐसे गरमा गरम विषयों पर।

बाबा के उत्तराधिकारी के संदर्भ मेँ क्या क्या ना छपा मीडिया मेँ और क्या नहीं दिखाया गया। गुप्त बैठक मेँ क्या हुआ, यह तक बता दिया। बैठक की जानकारी किसी को नहीं है, लेकिन मीडिया ने ये भी बता दिया कि उसमें हुआ क्या! कभी मुंह बोली बेटी को उत्तराधिकारी बताया तो कभी बेटे को। सभी कयास लगा लिए। सभी प्रकार की संभावना जता दी। सच के निकट एक भी नहीं। चूंकि बाबा के नाम पर आज के दिन हर खबर पढ़ी और देखी जाती है, इसलिए आने दो जो आ रहा है। जाने दो जो हवा मेँ जा रहा है। आखिर डेरा की ओर से आए वीडियो ने सच बता दिया कि ऐसा  कुछ भी नहीं है। जिसका जिक्र कहीं ना था, उसको खूब अधिकार थे।

बात यहाँ तक कि उत्तराधिकारी बनाने का कोई प्रस्ताव तक नहीं है। खैर! ये तो उस डेरे की बात है, जिसका मुखिया रेप के मामले मेँ सजा काट रहा है। अब बात नरेंद्र मोदी मंत्री परिषद के पुनर्गठन की। जबसे सरकार के  मुखिया ने पुनर्गठन के संकेत दिये, मीडिया मेँ सूत्रों का काम शुरू हो गया। पता नहीं कौन-कौन जानकारी देने के नाम पर मीडिया का मज़ाक बनाता  रहा, मज़ाक उड़ाता रहा। ये सच है कि मीडिया को अपने सूत्रों पर भरोसा करना पड़ता है, किन्तु ये भी तो देखो कि नरेंद्र मोदी हर बार अपने निर्णय से मीडिया को ही नहीं देश भर को चौंकाते रहे हैं, ऐसी स्थिति मेँ अपने सूत्र द्वारा दी गई जानकारी को क्रॉस चैक करने मेँ हर्ज क्या! किसी के मन मेँ क्या है, ये जान लेना असंभव है।

राजनीति मेँ किसी का अगला कदम क्या होगा, ये बता पाना नामुमकिन है। इसलिए कयास लगते रहे। संभावित नामों की घोषणा होती रही। बात वही, जो संभावित नाम मीडिया बता रहा था उसमें से इक्का दुक्का ही मोदी जी की असली लिस्ट मेँ थे। संभावित मंत्रियों के नामों वाली लिस्ट मेँ उन व्यक्तियों और नेताओं के नाम थे, जिनके आस पास तक भी मीडिया के कयास नहीं पहुँच पाए। ऐसा तो नहीं कि  मोदी जी मीडिया से कोई खेल ही खेल रहे हों, जो मीडिया कहे उसके अलग हट के किया जाए। राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के चुनाव मेँ भी सेम टू सेम हुआ था। नए नाम। वो नाम, जिनके बारे मेँ मोदी जी के अलावा किसी ने सोचा तक नहीं होगा।

हरियाणा मेँ सीएम मनोहर लाल खट्टर होंगे, किसने बताया! कहीं एक लाइन भी ना तो बोली गई और प्रकाशित हुई थी। कितने ही उदाहरण है। इसमें कोई शक नहीं कि राजनीति की हर खबर जन जन की पसंद होती है, किन्तु इसका मतलब ये तो नहीं कि इस पसंद के लिए वह परोस दिया जाए जो सच के आस पास ही ना हो। जनता मीडिया मेँ परोसे गई ऐसी खबरों को हर हाल मेँ सच मानती है, क्योंकि उसकी नजर मेँ मीडिया का हर शब्द सच के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। पता नहीं मीडिया और इस पवित्र काम से जुड़े व्यक्ति व्यक्तियों की किसी के प्रति कोई जवाबदेही भी होती है या नहीं। किसी और से नहीं तो खुद से तो होती ही होगी। भाई, किसी को बुरा लगा हो तो सॉरी। मगर इतना तो कहना ही पड़ेगा कि सच नहीं तो आधा सच तो हो। आधा सच नहीं तो कम से कम सच के निकट तो हो। दो लाइन पढ़ो-

उसकी आँखें जो गीली रहती है
कुछ ना कुछ तो जरूर कहती है।

लेखक गोविंद गोयल श्रीगंगानगर, राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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न्यूज चैनलों का लाइव पाखंड

श्रीगंगानगर। धर्म के नाम पर पाखंड होता ही आया है, अब तो मीडिया द्वारा सच के नाम भी पाखंड किया जाने लगा। सच के नाम पर झूठ बोलने, दिखाने का पाखंड। पाखंड चाहे धर्म के नाम पर बाबाओं द्वारा किया गया हो या मीडिया द्वारा सच के नाम पर, पाखंड तो पाखंड है। पाखंड की चकाचौंध से इंसान पूरा अंधा तो नहीं होता लेकिन उसकी हालत अंधे जैसी ही हो जाती है।  धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड का जब पर्दाफाश होता तब जन जन की आस्था, श्रद्धा और भावना आहत होती हैं।  जब मीडिया सच के नाम पर कोरा झूठ, आधा झूठ पेश करता है तो विश्वास टूटता है। यह मीडिया का आम जन से विश्वासघात है। विश्वासघात भी किसने किया, उस मीडिया ने जिसे लोकतन्त्र का  चौथा स्तम्भ कहा जाता है। हालांकि संविधान मेँ इसका कोई उल्लेख नहीं है, लेकिन उसकी भूमिका के मद्देनजर मीडिया को यह दर्जा दे दिया गया, चाहे वह उचन्ती ही सही। कल सोमवार को सुनारिया जेल से लगभग दो किमी दूर इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया ने सच के नाम पर झूठ का जो लाइव पाखंड रचा, उसकी मिसाल शायद ही कोई और हो।

न्यूज चैनलों के बड़े बड़े कीमती से कीमती कैमरे जूम के बावजूद जेल की दीवार तक तो दिखा नहीं पा रहे थे, उन चैनलों के पत्रकार जेल के अंदर लगी सीबीआई कोर्ट का आँखों देखा हाल बता  रहे थे।  ये सब वरिष्ठ सुना और बता भी यूं रहे थे जैसे वे खुद वहीं बैठे हों। कभी यूं भी लगा जैसे उनके पास  द्वापर के संजय की तरह दूर तक देखने की दिव्य दृष्टि है। ये आभास भी होता रहा कि ये भाई दौड़ के जेल के अंदर जाते हैं और सब कुछ देख दौड़ के आते हैं और फिर कोर्ट मेँ क्या हो रहा है, बताते हैं। सांस फूला हुआ। हेयर स्टाइल अस्त व्यस्त। भाग कर जाने और उलटे पैर भाग कर आने मेँ ऐसा होना स्वाभाविक है।

ये तमाम जाँबाज, जो कोर्ट की कार्रवाई की लाइव कमेंट्री कर रहे थे, ये नहीं बता सके कि रेप के आरोप मेँ बाबा को सजा कितनी हुई। कोर्ट ने जुर्माना कितना लगाया। कई घंटे तक पहले मैं, पहले मैं करते हुए 10-10 साल की सजा परोसते रहे। अपने आप ही  पहले मैं बोल के, अपनी ही पीठ थपथपाते रहे। कई घंटे तक किसी ने भी फैसले की प्रति पढ़ने की  कोशिश नहीं की । बस, 10 के फेर मेँ लगे रहे। विवेचना, मीमांसा होती रही। कई घंटे तक सच की आड़ मेँ चैनल वाले झूठ का पाखंड रचते रहे। ठीक ऐसे जैसे बाबा धर्म के नाम पर पाखंड करते हैं। चैनलों के इस लाइव झूठ को सभी ने सच माना। ना मनाने का कोई सवाल नहीं था, क्योंकि मीडिया पर हर कोई विश्वास करता है। जैसे बाबाओं पर आस्था और श्रद्धा होती है वैसे ही मीडिया पर विश्वास होता है। जिस जिस बाबा के पाखंड की पोल खुली वह जेल मेँ पहुँच गया। लेकिन मीडिया तो मीडिया है। दादा तो घर में सबको लड़े, दादा को कौन लड़े! यही स्थिति है मीडिया की। वह किसी को कुछ भी कह सकता है, उसे कोई कुछ नहीं कह सकता। जो कहे उसकी ऐसी की तैसी। देता रहे बाद में सफाई।

जिस मुद्दे पर दुनिया भर की निगाह थी, उस पर ये झूठ बोलते रहे। करोड़ों लोगों के विश्वास से खेलते रहे। है कोई ऐसी संस्था जो इस झूठ के खिलाफ कोई एक्शन लेने की हिम्मत दिखाएगा! चैनलों के मालिक करेंगे कोई कार्रवाई अपने जाँबाज पत्रकारों के के खिलाफ! पहले मैं, पहले बस मैं की इस दौड़ मेँ सच का इंतजार किसी ने नहीं किया। सुना जाता है कि हजार दोषी छूट जाएं लेकिन किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए। यही बात मीडिया के लिए कुछ ऐसे कही जा सकती है कि खबर छूटे  तो छूट जाए। सच मेँ देरी हो तो हो, किन्तु झूठ किसी कीमत पर नहीं परोसेंगे। ना जाने ऐसा कब होगा! घर मेँ सभी को लताड़ लागने वाले दादा को लताड़ कौन लगाएगा, राम जाने। दो लाइन  पढ़ो-

कौन-सा पहली दफा है
जो तू मुझसे खफा है।

लेखक गोविंद गोयल श्रीगंगानगर (राजस्थान) के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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देश को ‘कांग्रेस मुक्त’ करने के मायने

श्रीगंगानगर। कांग्रेस मुक्त भारत। कांग्रेस मुक्त देश। बीजेपी के महापुरुष नरेंद्र मोदी के ये शब्द लगभग 3 साल से मेरे कानों मेँ गूंज रहे हैं। अकेले मेरे ही नहीं और भी ना जाने कितने करोड़ देश वासियों के कानों मेँ होंगे ये शब्द। किसी के कानों मेँ मिठास घोल रहे होंगे और किसी के जहर। इन शब्दों का मायने ना जानने वालों के लिए ये शब्द गुड़ है और जो समझ रहे हैं उनके लिए कड़वाहट है। चिंता भी है  साथ मेँ चिंतन भी।

देश को कांग्रेस मुक्त बनाना है… भारत को कांग्रेस से मुक्त करने का सपना है…. इन शब्दों को राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रभक्ति के साथ इस प्रकार से जोड़ दिया गया कि यूं लगने लगा जैसे फिर किसी ने अंग्रेज़ो भारत छोड़ो का नारा बुलंद किया हो। देश  मेँ ना जाने कितनी राजनीतिक पार्टियां हैं। मगर देश को मुक्त केवल कांग्रेस से करना है। क्यों? क्योंकि मोदी जी कांग्रेस का अर्थ जानते हैं ! मोदी जी समझते हैं कि कांग्रेस क्या है! कांग्रेस के रहने के परिणाम से भी मोदी जी अंजान नहीं। मोदी जी के नेतृत्व वाली बीजेपी कांग्रेस से डरती है। मोदी जी जानते हैं कि मात्र कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जिसका भारत के हर गली कूचे मेँ प्रभाव है। जिसका नाम है।

यही एक पार्टी है जो किसी दिन उनकी सरकार को, बीजेपी को सत्ता से बाहर करने की क्षमता रखती है। कांग्रेस ही है जिसमें गिर गिर के उठ जाने की अपार क्षमता है। कांग्रेस के अतिरिक्त कोई और चुनौती है ही नहीं। जब चुनौती देने वाला ही कोई नहीं रहेगा तब अपना राज, केवल और केवल अपना राज। कुछ भी करो, कोई विरोध नहीं। कुछ भी करो, कोई बोलने वाला नहीं। और, जब सरकार की नीतियों, निर्णयों का विरोध करने वाला ही ना रहे तो फिर लोकतन्त्र खतरे मेँ पड़ जाता है। शासक मनमर्जी करता है। क्योंकि उसे किसी राजनीतिक विरोध की चिंता ही नहीं रहती। पब्लिक का विरोध अर्थ हीन हो जाता है। मोदी जी जानते हैं कि जब बीजेपी 30 साल बाद 2 सीटों से यहां तक आ सकती है तो कांग्रेस क्यों नहीं?

बस, इस डर ने मोदी जी और उनके खास दो चार नेताओं ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा इस प्रकार से उछाला कि यह देश प्रेम का प्रतीक हो गया। राष्ट्रवाद की पहचान बन गया। असल मेँ कांग्रेस मुक्त भारत का अर्थ है, विपक्ष का ना रहना। हालांकि लगभग हर स्टेट मेँ राजनीतिक पार्टी है, लेकिन मोदी जी और आज की बीजेपी ने कभी भारत को उनसे मुक्त करने का नारा नहीं दिया। जरूरत भी नहीं है, क्योंकि उनके साथ तो सत्ता का बंटवारा कर उनको अपने साथ लिया जा सकता है। किसी से विचार मिले ना मिले कोई खास बात नहीं। सिद्धांतों मेँ जमीन-आसमान का अंतर है, तब भी चलेगा।

सत्ता का सवाल है। उसे पाने और फिर उसे बनाए रखने की बात है। छोटे छोटे दलों की औकात ही कितनी है! सत्ता के लालच मेँ वे बीजेपी के साथ आने मेँ क्यों हिचकिचाएंगी। कश्मीर और अब बिहार इसके उदाहरण है। जब छोटे दलों को सत्ता का टुकड़ा मिल गया तो वे उसी मेँ मस्त हो जाएंगे और कांग्रेस रहेगी नहीं, तब! तब देश मेँ एक मात्र बीजेपी। बीजेपी मेँ एक मात्र मोदी जी और उनके अमित शाह। बीजेपी के अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी नहीं कहा कि देश को कांग्रेस से मुक्त करना है। जे पी नारायण ने भी ऐसा तो नहीं कहा होगा। चूंकि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है, इसलिए उसको मार दो, उसके बाद राज अपना ही अपना।

असली लोकतन्त्र उसी देश मेँ है जहां विपक्ष मजबूत हो। लोकतन्त्र वहीं समृद्ध होता है जहां पक्ष के साथ साथ विपक्ष भी ताकतवर  हो। सत्ता के कामों का विश्लेषण करने वाला हो। उसको रोकने और टोकने वाला हो। परंतु मोदी जी एंड कंपनी ने राजनीति की परिभाषा ही बदल ही। बड़े विरोधी को खत्म कर दो, छोटे मोटे तो खुद शरणागत हो जाएंगे दंडवत करते हुए। कांग्रेसियों से कोई परहेज नहीं, बस देश को कांग्रेस मुक्त करना है। ताकि मोदी जी एंड कंपनी निष्कंटक राज कर सके। लोकतन्त्र ! जब राजनीति की नई परिभाषा गढ़ दी गई है तब लोकतन्त्र की परिभाषा भी तो बदलेगी ही। दो लाइन पढ़ो-

बिहार ने हरयाणा को साफ कर दिया
नितीश ने गिरगिट को मात कर दिया।

लेखक गोविंद गोयल श्रीगंगानगर (राजस्थान) के वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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किसानों को छींक भी आ जाए तो सरकारें कांपने लगती हैं

सरकार को केवल किसानों की चिंता है…  लगता है कोई और तबका इस देश में रहता ही नहीं…

श्रीगंगानगर। पटाखा फैक्ट्री मेँ आग से दो दर्जन से अधिक व्यक्ति मारे गए। एमपी मेँ सरकारी गोली से आंदोलनकारी 6 किसानों की मौत हो गई। दो दर्जन से अधिक संख्या मेँ मारे व्यक्तियों का जिक्र कहीं कहीं है और किसानों के मरने का चप्पे चप्पे पर। राजनीतिक गलियारों मेँ। टीवी की डिबेट मेँ। अखबारों के आलेखों मेँ। संपादकीय में। बड़े बड़े कृषि विशेषज्ञ लेख लिख रहे है। उनकी इन्कम का लेख जोखा निकाला जा रहा है। उनके कर्ज माफ करने की चर्चा है। उस पर चिंतन और चिंता है। कुल मिलाकर देश का फोकस किसानों पर है।
लगता है कोई और तबका इस देश मेँ रहता ही नहीं।

किसानों को छींक भी आ जाए तो सरकारें कांपने लगती हैं। राजनीतिक दलों मेँ हल चल मच जाती है। नेताओं के दौरे शुरू होते हैं। किसानों के अतिरिक्त किसी की चिंता नहीं। कमाल है! हद है! बड़े शर्म की बात है इस लोकतन्त्र मेँ, जो केवल एक वर्ग की बात करता है। मात्र एक तबके पर अपना पूरा ध्यान लगाता है। सबसिडी किसानों को। कर्ज माफ किसानों का। फसल खराब तो मुआवजा किसान के खाते मेँ। टैक्स की फुल  छूट किसानों को। सस्ती बिजली किसानों को।

कोई पूछने वाला हो इनसे कि ऐसा क्यों! करो माफ किसानों के कर्ज, क्योंकि आधे से अधिक विधायक, सांसद के प्रोफाइल में किसान लिखा मिलेगा। अपने क्षेत्र मेँ देख लो, पूर्व मंत्री गुरजंट सिंह बराड़ किसान। पूर्व मंत्री गुरमीत सिंह कुन्नर किसान। पूर्व मंत्री राधेश्याम गंगानगर, संतोष सहारण, विधायक राजेन्द्र भादू किसान। पूर्व विधायक गंगाजल मील किसान। मंत्री सुरेन्द्रपाल सिंह टीटी, डॉ राम प्रताप किसान….अनगिनत हैं इस लिस्ट मेँ। देश मेँ कितने होंगे! कोई भी कल्पना करके देख ले। कर दो इन सबके कर्जे माफ। क्योंकि ये सब के सब बेचारे हैं। हालत के मारे हैं। इससे बड़ा मज़ाक कोई और हो भी सकता है क्या!

एक दुकानदार को घाटा हो गया। कर्ज नहीं चुका सका। बैंक वाले आ गए ढ़ोल लेकर। उसके घर के सामने खूब बजाए। उस बंदे की इज्जत का तो हो गया सत्यानाश। कोई मुसीबत का मारा नहीं चुका सका कर्ज, कर दिया उसका मकान नीलाम। आ गया बंदा सड़क पर। क्योंकि ये किसान नहीं थे। ये बड़े लोग नहीं थे। देश मेँ हर प्रकार की छूट किसान को। हर प्रकार का टैक्स कारोबारी पर । व्यापारियों से टैक्स लेना, चंदा लेना और फिर इसी तबके को बात बात पर चोर कहना। इससे अधिक अपमान किसी तबके का इस देश मेँ क्या होगा! जो सरकार, अफसरों और नेताओं का पेट भर रहा है वह तो चोर और जिनको सरकार हर प्रकार की सुविधा दे रही है, वे बेचारे। कभी इन का रहन सहन भी देख ले सरकार।

बड़े बड़े नेता बेचारे हो जाते हैं, क्योंकि ये किसान कहलाते हैं और गली मोहल्ले मेँ छोटे छोटे दुकानदार, जो जीएसटी की परिभाषा पूछते घूम रहे हैं वकीलों के पास, वे धनवान है। जो किसान ईमानदारी से लिया कर्ज वापिस कर देते हैं, उन पर क्या गुजरती है, कर्ज माफी से।  वे मूर्ख कहलाते हैं। इस कर्ज माफी से सरकारों पर कितना बोझ पड़ता है, इसका आंकलन करने की योग्यता इन शब्दों मेँ तो है नहीं। सरकार कोई खेती थोड़ी ना करती है जो बोझ को वहन कर लेगी। वह जनता पर टैक्स लगाएगी। कोई नई तरकीब निकालेगी।

कमजोर का कल्याण सरकार की प्राथमिकता हो, परंतु उसे केवल इसलिए पोषित किया जाए कि वह किसान है, ये गलत है। जो मदद का हकदार है, मदद उसकी होनी चाहिए। ताकि किसी दूसरे का मन ना दुखे। उसे ऐसा ना लगे कि उसके अपने ही देश मेँ उसके साथ भेदभाव किया जा रहा है। इस देश मेँ तो यही हो रहा है। दो लाइन पढ़ो-

परिंदे ने तूफान से पूछा है
मेरा आशियाना क्यों टूटा है।

लेखक गोविंद गोयल Govind Goyal राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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राष्ट्रभक्ति किसी की जागीर नहीं है

गोविंद गोयल


श्रीगंगानगर। जनाब! जिसे आप राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ति कहते हो ना, वो व्यक्तिपूजा है। खास व्यक्ति की चापलूसी है। पता नहीं आपने किस  किताब मेँ पढ़ ली, क्या मालूम कहाँ से सुन ली, देशभक्ति, राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ति की ये नई  परिभाषा। जिसमें श्री नरेंद्र मोदी जी की जय घोष, उनकी सरकार की जय जय कार, बीजेपी की प्रशंसा को ही देशभक्ति, राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ति माना गया है। उनकी कार्यशैली, उनकी सरकार की नीतियों की आलोचना देशद्रोह हो चुका है। राष्ट्रद्रोह की श्रेणी मेँ मान लिया जाता है मोदी जी और उनकी सरकार की आलोचना को।

मोदी जी के नेतृत्व मेँ जो कुछ किया जाए मात्र वही अब राष्ट्रहित है। आपकी नजर मेँ पहले वाली सरकारों ने कुछ नहीं किया था। देश मेँ आज जो कुछ भी है, वह सब तीन सालों मेँ मोदी जी की सोच और उनकी सरकार के कार्यों का परिणाम है। कांग्रेस को गाली देना, मोदी सरकार की आलोचना करने वालों के लत्ते पाड़ना, सरकारी नीतियों के खिलाफ लिखने वालों को परोक्ष रूप से धमकाना भी अब देशभक्ति, राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ति की श्रेणी मेँ आ चुका है। आपकी परिभाषा के अनुसार हमारे जैसे व्यक्ति देशभक्त, राष्ट्रप्रेमी  नहीं है। अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है और सच्ची बात भी यही है कि आप भी नहीं हो वो, जिसे देश भक्त, राष्ट्रप्रेमी कहते हैं। क्योंकि राष्टभक्ति एक जज्बा है। राष्ट्रप्रेम एक भावना है। राष्ट्रभक्ति एक साधना है।

सरकार के पक्ष मेँ, आतंकवाद के खिलाफ फेसबुक पर दो पोस्ट डालने, कॉपी पेस्ट करने से देशभक्ति, राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ति नहीं आ जाती । सरकार की नीतियों की खिलाफत करने वाले को धमकाना आतंक है, देशभक्ति, राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ति  नहीं। किसी को डरा के पक्ष मेँ करना राष्ट्रप्रेम नहीं है। इसे सत्ता का आतंक  कहते हैं। उजले कपड़े वाला हर इंसान देशभक्त हो ये जरूरी नहीं। ईमानदार ही देशप्रेमी हो ये आवश्यक नहीं। टुच्चे से टुच्चा इंसान भी बहुत बड़ा देशभक्त हो सकता है और एक चरित्रवान, बड़ा व्यक्ति, समाज का मुखिया देशद्रोही।

जनाब! एक बात ये भी याद रखना, भूखे पेट भजन नहीं होते। इंसान को पहले भर पेट रोटी चाहिए, रहने को मकान और तन ढकने को कपड़ा। उसके बाद उसे समाज और देश की याद आती है। पेट भूखा होने के बावजूद भी जो देश को नुकसान नहीं पहुंचाता, वह है देशभक्त। समाज को लूट कर देश हित मेँ प्राण दे देने वाला है राष्ट्रप्रेमी। न्याय के लिए अदालतों मेँ चक्कर काटते लोगों से पूछो देशप्रेम की परिभाषा। थानों मेँ प्रताड़ित होते पीड़ित व्यक्ति बताएँगे राष्ट्रभक्ति की बातें। घर बैठे बैठे देश भक्ति की बात करना वहुत आसान है। उस से भी आसान है लेपटॉप, मोबाइल से फेसबुक और व्हाट्सएप पर देशभक्ति की कहानी लिखना। असल मेँ बहुत मुश्किल है अपने अंदर राष्ट्रप्रेम को जागृत करना।

बड़ी कठिन है भीतर मेँ राष्ट्रभक्ति की साधना और आराधना। देश का भला करे ना करे जो देश के बारे मेँ बुरा नहीं सोचता वह भी देशभक्त है। अपने काम को ज़िम्मेदारी से, देश को कोई नुकसान पहुंचाए बिना करने वाला व्यक्ति राष्ट्रप्रेमी है। उन लोगों से राष्ट्रभक्ति का  प्रमाण पत्र लेने की कोई जरूरत नहीं है जो राष्ट्र की नहीं एक व्यक्ति की पूजा कर रहे हैं । आँख बंद कर उसी की साधना और आराधना मेँ लगे हैं। उस व्यक्ति से भी राष्ट्रभक्ति का प्रमाण पत्र नहीं चाहिए जो मात्र जयघोष करना जानते हैं, किसी से निष्पक्ष होने का सर्टिफिकेट भी नहीं चाहिए, क्योंकि जो खुद एक पक्ष के साथ खड़े हैं वे लोग  किसी की निष्पक्षता पर संदेह करने वाले होते कौन हैं। देश को याद रखना चाहिए कि मोदी जी के आने से पहले भी देशभक्ति थी और उनके बाद भी रहेगी।  दो लाइन पढ़ो-

कौन है जो मुझे यूं छू के जाता है
तन मन सब निरमल हुआ जाता है।

लेखक गोविंद गोयल श्रीगंगानगर (राजस्थान) के वरिष्ठ पत्रकार हैं. संपर्क : gg.ganganagar@yahoo.com 

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राजस्थान में लोकतंत्र नहीं राजशाही है

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर

बुजुर्गों से राजशाही के बारे मेँ खूब सुना। इतिहास मेँ पढ़ा भी। राजाओं, महारानियों के एक से एक किस्से। उनका राज चलाने का ढंग। उनकी प्रजा के प्रति लगाव और दुराव। राजघरानों मेँ षडयंत्र और राजाओं को हटाने की चालें। राजा की फोटो वाले सिक्के। उनकी तस्वीर वाले दस्तावेज़। ये सब सुन और पढ़ मन मेँ इच्छा होती कि काश! काश मेरा जन्म भी उस दौर मेँ होता जब राजशाही थी। मैं भी देख लेता विभिन्न स्थानों पर उनके फोटो। लेकिन नहीं हुआ। जन्म नहीं हुआ तो नहीं हुआ।

मगर किस्मत देखो, मेरी यह इच्छा लोकतन्त्र में जन्म लेने के बावजूद पूरी हो ही गई। मेरी क्या पूरी हुई, कई करोड़ लोगों की पूरी हो गई। आज के दिन जो भी राजस्थान का निवासी है, वह राजशाही को देख सकता है। अनुभव करने की सुविधा भी है उनके पास। बस, नजर होनी चाहिए राजशाही देखने और अनुभव करने की। मज़ाक नहीं है। ना ही ये कोई व्यंग्य है।

प्रदेश मेँ राजशाही की बात उसी प्रकार सत्य है जैसे देश मेँ नरेंद्र मोदी के नेतृत्व मेँ बीजेपी का राज। कहने को तो प्रदेश मेँ लोकतान्त्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार है और  विधायकों की ओर से चुना गया मुख्यमंत्री भी। बेशक मुख्यमंत्री के रूप मेँ बीजेपी नेता वसुंधरा राजे सिंधिया सरकार चला रहीं है। किन्तु ये भी याद  रखने की बात है कि वे महारानी भी हैं । उनके खून मेँ राजशाही है। वे बहुत बड़े राजघराने की राजकुमारी और बाद मेँ स्टेट की महारानी बनीं। हो गया होगा राजशाही का खात्मा। नहीं रहीं होंगी राजाओं/महारानियों की रियासतें। किन्तु वसुंधरा राजे सिंधिया की नजर मेँ राजस्थान प्रदेश उनकी रियासत है और वे उस रियासत की महारानी। विश्वास नहीं तो श्रीगंगानगर मेँ जारी हो रहे भूखण्डों के पट्टे  देख लो। कोई भी नया पट्टा हाथ मेँ लो। ऊपर ही ऊपर देखो। एक ओर दीनदयाल उपाध्याय का चित्र है और दूसरी तरफ महारानी वसुंधरा राजे सिंधिया का मुख्यमंत्री के रूप में। है कि नहीं।

ये वैसा ही दस्तावेज़ हैं ना जैसे राजशाही में जारी हुआ करते थे। जिनके बारे मेँ सभी ने सुना और पढ़ा हुआ है। देश को आजाद हुए सात दशक हो गए। राजस्थान मेँ रियासतों का विलय हुए भी साठ साल से अधिक हो चुके हैं। खुद जनता अपने वोट से अपनी पसंद की सरकार चुनती है। जनता द्वारा, जनता की, जनता के लिए चुनी गई सरकार को राजशाही मेँ बदलते मैंने पहली बार देखा है। सरकार की ओर से जारी हो रहे पट्टों पर सीएम  वसुंधरा राजे सिंधिया की फोटो तो यही साबित करती है। इससे यही लगता है कि सीएम महारानी की तरह राजस्थान को अपनी निजी स्टेट समझ के शासन कर रहीं है। तभी तो सरकारी दस्तावेज़ पर उनकी तस्वीर है। राजशाही का इससे बड़ा उदाहरण और कोई हो भी नहीं सकता।

यह फैसला चूंकि महारानी का है, इसलिए कोई इसके खिलाफ बोल ही नहीं रहा। सब जानते हैं कि  राज आज्ञा के खिलाफ बोलना राजद्रोह कहलाता है और राजद्रोही को मृत्युदंड तय है। जनता तो बेचारी है, विपक्षी दल कांग्रेस भी खामोश है। वह कांग्रेस  जो यह दावा करती है कि प्रदेश मेँ अगली सरकार उसी की ही होगी। कांग्रेस नेताओं को यह ज्ञान होना चाहिए कि केवल बोलने से ही तो सरकार नहीं बन सकती।  कांग्रेस ने अपने अंदर गुटबाजी बढ़ाने के अतिरिक्त प्रदेश मेँ ऐसा कुछ भी नहीं किया, जिससे ये  लगे कि प्रदेश मेँ राजशाही नहीं लोकतन्त्र है और लोकतन्त्र मेँ सरकार के तुगलकी निर्णयों का विरोध सभी का हक है। कांग्रेस की कांग्रेस जाने। राजशाही मेँ कुछ दिन जीने की अपनी तमन्ना तो पूरी हो गई। बस एक कसक रह गई, वह यह कि कोई भूखंड अपना भी होता तो हम भी महारानी की फोटो वाला पट्टा बनवा उसे सहेज कर रख लेते और आने वाले बच्चों को दिखा गर्व से ये कहते, लोकतन्त्र मेँ भी राजशाही देखी है हमने। शुक्रिया लोकतन्त्र। शुक्रिया महारानी। और जय हो आपकी राजशाही की। दो लाइन पढ़ो-

भला, बुरा कुछ सोच मत पूरा कर तू स्वार्थ,
जीवन इसी से धन्य होगा व्यर्थ है परमार्थ।

लेखक गोविंद गोयल श्रीगंगानगर, राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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माँ के पास खाट थी, मेरे पास लोकतन्त्र है

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर (राजस्थान)

मेरी माँ थी। इसमें तो कोई खास बात नहीं, आप यही सोचेंगे। क्योंकि माँ तो जन्म लेने वाले हर जीव की होती है। रंग, रूप, सूरत भिन्न भिन्न होने के बावजूद सब माएं होती एक जैसी हैं, ममता, करुणा, दया, वात्सल्य, त्याग और उदारमना। कम शब्दों मेँ माँ जैसा कोई है ही नहीं। खैर, मेरी माँ थी। जैसे सबकी माँ होती है। माँ के पास एक खाट थी। लकड़ी के चार पाये वाली। एकदम मजबूत। कसी हुई। चारों पाये पूरी तरह चाक चौबन्द। पाये चमकते थे। खाट का वजन तो था ही, उनके ऊपर इसके साथ-साथ उस पर बैठने वालों का वजन भी उठाते पाये। बड़े होनहार थे। बड़े प्यारे और स्वाभिमानी भी। मजाल कोई उसमें कमी निकाल दे।

समय कहां रुकता है। सालों गुजर गए। माँ बड़ी  होती गई। खाट की उम्र भी माँ के साथ साथ बढ़ती रही। कसी खाट ढीली होने लगी। माँ पैर रख पांत को कस देती। नीवार होता तो बच्चों को साथ लगा, उसकी कसाई कर देती। फिर पायों मेँ दरार पड़ने लगी। किसी मेँ छोटी तो किसी मेँ बड़ी। खाट मेँ खटमल जा घुसते। पायों की दरारों मेँ घुन और कोई दूसरे जीव। माँ उनको थापी, जिससे कपड़े धोते थे, से खूब कूटती। खटमल निकल जाते। मर जाते। कुछ बचे हुए खटमल माँ की मार से शहीद हो जाते। पायों की दरारों मेँ घुसे घुन, दूसरे कीड़े मकोड़ों का इलाज भी माँ करती।

माँ की उम्र होने लगी थी। विभिन्न प्रकार के कीड़ों की वजह से पाये पहले जैसे मजबूत ना रह सके। कई बार माँ ने सोचा कि पाये बदल दूँ, किन्तु नहीं कर सकी। अब तो खाट के मूँज, नीवार मेँ खटमल के साथ साथ दूसरे कीड़े मकोड़े भी अपनी जगह बनाए रहते। माँ ने उसे घर के आँगन से निकाल चबूतरे ओर रख दिया। खाट पर हर पंथी आ बैठता।  दक्षिण पंथी भी और वाम पंथी भी। इधर का भी और उधर का भी। जिसके कोई विचारधारा नहीं होती वह भी जम जाता। कभी चौकड़ी मार के तो कभी पैर लटका के। बाज दफा तो सब आपस मेँ लड़ भी पड़ते। उनकी लड़ाई से पाये चूँ चूँ करते रहते। परंतु कुछ नहीं। ऐसा ही चलता रहा।

एक दिन माँ ने उनको ठोका। कई दिन बाद फाचर फंसा दी। उनमें सुधार नहीं हुआ। कद छोटा भी करवाया, लेकिन उनमें सिवाए बुरादे के कुछ नहीं था। एक दिन पायों के साथ ही खाट भी जमीन पर। माँ को आया गुस्सा, उसने नीवार/ मूँज को काट दिया। पायों को फेंक दिया। नए लगा दिये। दृश्य मेरे सामने आज भी हैं, लेकिन लोकतन्त्र को खाट तो नहीं कह सकता ना। खाट मेरी माँ की थी, उसे कुछ भी कहने का हक है मुझे।

जो माँ ने खाट के साथ किया वह लोकतन्त्र के साथ नहीं कर सकते। क्योंकि खाट खाट है और लोकतन्त्र लोकतन्त्र।  चारों पायों मेँ घुन लग गया तो लग गया। खोखले होते हैं तो होते रहें। हमें तो इन्हीं से काम चलाना पड़ेगा। अफसोस तो इस बात का है कि कह भी नहीं सकते कि ये खोखले हैं। क्योंकि पायों की ताकत बहुत अधिक है। ताकत इसलिए अधिक है, क्योंकि जो महापुरुष  खाट  पर बैठे हैं उनमेँ कोई भार नहीं है। वे खाली हैं। जो इनमें घुसे कीड़ों को निकालने की कोशिश करता है, घुन को मिटाने के वास्ते आगे बढ़ता है, खाट पर बैठे महापुरुष शोर मचाना शुरू कर देते हैं। पायों मेँ घर बनाकर बैठे कीड़े, मकोड़े और दूसरे जन्तू काटना शुरू कर देते हैं। कोई इनका सामना नहीं कर पाता ।

….मेरी माँ थी। माँ के पास एक खाट थी। खाट के चार पाये थे। जिसे माँ ठीक कर सकती थी। बदल सकती थी।  ….मेरे पास लोकतन्त्र है। पाये तो उसके भी चार हैं। लेकिन माँ की तरह पायों को बदल नहीं सकता। बदलना तो बहुत दूर की बात है, उनको ठीक भी नहीं कर सकता। ठीक करने का भाव भी बड़ा गुनाह है। दो लाइन पढ़ो-

प्रेम नदी बहे बीच मेँ जिसके दो हैं छोर
तुम्हारा छोर ये रहा मेरा है उस ओर।

गोविंद गोयल
वरिष्ठ पत्रकार
श्रीगंगानगर
राजस्थान
gg.ganganagar@yahoo.com

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हे न्यूज चैनल वालों, युद्ध से पहले तो युद्ध मत कराओ…

श्रीगंगानगर। बेशक देश की सेनाएं हर पल युद्ध के लिये तैयार रहती हैं, लेकिन ये भी सच है कि युद्ध पल मेँ ही शुरू नहीं किया जा सकता। बहुत कुछ सोचना और करना पड़ता है। जन भावनाओं से सरकार चुनी तो जा सकती है। परंतु जनभावनाओं से युद्ध नहीं लड़ा जाता। ना ही जनभावना युद्ध आरंभ करवाने में सक्षम है। हां, राज अविवेकी, नासमझ और लाचार व्यक्तियों के हाथ में हो तो दोनों बातें संभव हैं। युद्ध पल में शुरू भी हो सकता है और जनभावनाएं को देख सरकार भी युद्ध शुरू कर दे तो कोई बड़ी बात नहीं। कल रात को एक बड़े टीवी चैनल पर ‘राजस्थान गंगानगर सीमा पर हलचल’ की बात ने ऐसी हलचल मचाई कि फेसबुक और व्हाट्सएप पर चर्चा होने लगी। स्वाभाविक है। क्योंकि हम बार्डर पर रहते हैं। हलचल हमें भी प्रभावित करेगी। परंतु कुछ हो तो! केवल खबर बनाने के लिये सनसनी फैलाना ऐसे हालात में ठीक नहीं है।

असल में बड़े चैनल के पास इस बार्डर की ग्राउंड रिपोर्ट तो होती नहीं। हम जैसे ये काम करते हैं। अब ये मेरी समझ और विवेक पर निर्भर है कि मैंने लोगों में युद्ध का भय पैदा करना है या संतुलित जानकारी जन जन को देनी है। सीमा पर हलचल, बार्डर पर अलर्ट, सामान्य बात है। कौन-सा ऐसा क्षण है, जब बार्डर पर बीएसएफ अलर्ट नहीं रहती। चौकस नहीं होती। उसका तो काम ही यही है। बीएसएफ अलर्ट है, चौकस है, तभी तो सुरक्षित हैं सब। गंगानगर से दूर रहने वाले गंगानगर के परिवारों ने जब यह खबर देखी, सुनी होगी तब उनके मन में क्या हुआ होगा, इसकी कल्पना करके देखो। वह बेचैन हो जाता है। उसे अपने परिजनों की फिक्र होने लगती है। तमाम काम छोड़ व्यक्ति इसी सोच मेँ पड़ जाता है कि गंगानगर में क्या हो रहा होगा?

बेशक, बच्चे युद्ध के नाम से रोमांच महसूस करते होंगे। उनको युद्ध की बातों मेँ रस भी मिलता होगा, किन्तु जिसे 1971 का युद्ध याद है, वह जानता है कि युद्ध में क्या होता है! युद्ध केवल सेना नहीं लड़ती, पूरा देश भी साथ लड़ता है। एक एक व्यक्ति युद्ध में शामिल होता है।

सेना बार्डर पर युद्ध लड़ती है और व्यक्ति अपने अंदर। सामान्य काम काज होता दिखता  जरूर है, मगर होता नहीं। निश्चित रूप से दशकों मेँ बहुत कुछ बदला है। फिर भी ये दिल है तो हिन्दुस्तानी ही ना। अपने देश के लिये इसने धड़कना बंद नहीं किया है। थोड़ा बहुत ही सही उसके लिये धड़कता आज भी है। इसलिये जैसे ही सीमा पर हलचल, अलर्ट जैसे समाचार पढ़ने को मिलते हैं, सुनाई देते हैं, उसके अंदर भी हलचल शुरू हो जाती है। खबर पढ़ और सुन कर उसमें सत्यता की तलाश करता है। बेचैन हो जाता है। कोई माने या ना माने, लेकिन ये सच है कि कोई भी सरकार देश की जनता को बता कर युद्ध शुरू नहीं करती। ये त्रेता या द्वापर युग नहीं है जब योद्धा दुश्मन को सावधान कर वार किया करते थे।

अब तो घात और प्रतिघात है। ना तो दुश्मन देश ये कहेगा कि मोदी जी, सावधान, हम परमाणु बम डालने वाले हैं। और ना ही मोदी जी ऐसा कुछ बताने वाले। युद्ध की जानकारी तो युद्ध शुरू होने के बाद ही होती है। हां, कोई पीएम जब ऐसी परिस्थिति मेँ अचानक जनता को संदेश देते हुए इशारों इशारों मेँ कुछ कह दे तो बात अलग है। वरना युद्ध की सूचना ना तो मीडिया के पास होती है, ना आम जन के पास। कोई ऐसा सूत्र नहीं होता जो ये बता सके कि इस दिन, इतने बजे युद्ध शुरू हो जाएगा। सब अंदाज हैं। कयास है। मीडिया का अपना अनुभव और नजरिया है। सभी को भी ऐसे मौके पर बहुत अधिक विवेक का इस्तेमाल करना होता है। युद्ध से पहले युद्ध लड़ना कोई समझदारी नहीं। युद्ध के लिये खुद को मानसिक रूप से तैयार करना अलग बात है और बिना युद्ध शुरू हुए युद्ध लड़ना दूसरी बात। अफवाह युद्ध से पहले का युद्ध है। दो लाइन पढ़ो-

ख्वाब में आने का वादा था
रात नींद दगा दे गई।

लेखक गोविंद गोयल भारत पाक सीमा पर स्थित जिला श्रीगंगानगर के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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