राहुलजी, आपकी बातें भी हवा-हवाई, वजन लाइये जनाब, कब तक करेंगे जुमलेबाजी

सालों तक सत्ता में रहने वाली कांग्रेस को आज तक विपक्ष का रोल अदा करना नहीं आया है, दूसरी तरफ भाजपा आज भी सत्ता में होने के बावजूद विपक्ष की पार्टी लगती है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी गायब होने के बाद अचानक प्रकट होते हैं और भाषण से लेकर टीवी कैमरों के सामने जुमलेबाजी करते नजर आते हैं। अभी राहुल गांधी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि वे हवा में बातें करते हैं और उनकी बातों में वजन होना चाहिए। ललित गेट और व्यापमं के मुद्दे पर उन्होंने प्रधानमंत्री की चुप्पी पर भी सवाल उठाए मगर मोदीजी जहां इन मुद्दों पर चुप हैं, लेकिन उनकी पूरी पार्टी पलटवार करने में पीछे नहीं है। 

कांग्रेस के पास जबरदस्त मुद्दे हैं मगर दिक्कत यह है कि उसके तमाम बड़े नेताओं से लेकर प्रवक्ताओं का अध्ययन कमजोर है। टीवी चैनलों की बहस में भी कांग्रेस के तमाम प्रवक्ता एक जैसे आरोप दोहराते नजर आते हैं, बजाय दस्तावेजों के साथ तथ्यों को रखने के। इसके विपरित भाजपा के तमाम मंत्री, पदाधिकारी और प्रवक्ता अदालती आदेशों से लेकर दस्तावेजों के साथ बैठते हैं और घोटालों में घिरने के बावजूद दमदारी से अपना पक्ष रखते हैं। राहुल गांधी अगर प्रधानमंत्री को हवाई बातें करने वाला बता रहे हैं तो वे खुद आज तक यही करते आए हैं। चूंकि देश पर 60 साल से कांग्रेस का राज रहा और तमाम संस्थाओं और मीडिया तक में कांग्रेस की तगड़ी घुसपैंठ रही है और भरपूर ऑब्लाइज भी कांग्रेसियों ने कर रखा है और चूंकि वे गांधी परिवार से हैं इसीलिए उन्हें इतना जबरदस्त मीडिया कवरेज भी मिल जाता है, जबकि उनसे लाख गुना अधिक प्रतिभाशाली अरविंद केजरीवाल हैं, जिन्होंने शून्य से शुरुआत की और नई दिल्ली में सरकार तक बनाकर दिखा दी। 

इसके विपरित राहुल गांधी ने तो कांग्रेस जैसी देश की सबसे बड़ी पार्टी का सत्यानाश ही किया है और उनके नेतृत्व में कांग्रेस केन्द्र के साथ-साथ तमाम राज्यों से भी साफ होती रही। कई-कई दिनों तक राहुल गांधी गायब रहते हैं और जब प्रकट होते हैं तो रटी-रटाई पुरानी बातें ही दोहराते हैं, बावजूद इसके मीडिया उन्हें जबरदस्त तवज्जो देता रहा है। कल भी राहुल गांधी ने एक भी नई बात नहीं कही, वे भूमि अधिग्रहण से लेकर भाजपा के तमाम घोटालों पर पुराने बयानों को ही दोहराते नजर आए और इन बयानों में भी चुटिला और पैनापन  गायब दिखा, जबकि विपक्ष में होने के नाते राहुल गांधी के पास हवाई नहीं, तार्किक बातें और तथ्य होना चाहिए ताकि उन पर टीवी चैनलों से लेकर राजनीतिक गलियारों और शहर-गांव के ठियों पर चर्चा हो सके। पहले राहुल गांधी खुद हवाई बातें करना बंद करें और अपनी बातों में तथ्यों के साथ वजन लेकर आएं वरना कुछ समय बाद उनकी सारी बातें ना सिर्फ दोहराई हुई, बल्कि उकताने वाली भी नजर आएंगी। 

भूमि अधिग्रहण से लेकर ललित गेट और मध्यप्रदेश के बहुचर्चित व्यापमं घोटाले पर तथ्यों के साथ उन्होंने एक भी बात नहीं की और चुनावी सभाओं की तरह आरोप लगाते हुए जुमलेबाजी ही कर रहे हैं। मोदी की सरकार गरीब और किसान विरोधी है और अडानी-अम्बानी की सरकार है, जैसी बातें वे पचासों मर्तबा बोल चुके हैं। इसके बदले उन्हें तार्किक तरीके से मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए अपनी और कांग्रेस पार्टी का विजन भी देश के सामने रखना चाहिए। व्यापमं घोटाला किस तरह और कैसे अंजाम दिया गया इसकी भी स्टडी करने की उन्हें जरूरत है और अगर अरुण जेटली यह सवाल पूछते हैं कि सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे ने ललित मोदी की मदद कर कौन-से कानून का उल्लंघन किया, तो उसका भी तथ्यात्मक जवाब राहुल गांधी को पता होना चाहिए, जबकि अभी तक ऐसा नजर नहीं आता है, जबकि देश का मीडिया और खासकर न्यूज चैनल तो ऐसे तथ्यों और उनसे जुड़ी खबरों के भूखे हैं और वे दिन-दिनभर इस पर बहस कर सकते हैं, लेकिन अभी तो राहुल गांधी के बयान जो कि जुमलों की तरह होते हैं, थोड़ी देर की ब्रेकिंग न्यूज के बाद गायब हो जाते हैं। 

हकीकत यह है कि राहुल गांधी उस खिलौने की तरह हैं, जिसमें जितनी चाबी भरी जाए वह उतना ही चलता है। टीवी कैमरों के सामने राहुल गांधी को सुनते वक्त वाकई अपना माथा ठोंकने की इच्छा होती है कि ये बंदा इन मुद्दों को किस तरह बेहतर तार्किक तरीके से उठा सकता था और सत्ता पक्ष की सफाई को दस्तावेजी तथ्यों के साथ हाशिए पर पटक देता… लिहाजा अब समय आ गया है कि राहुल बाबा मुद्दों को समझें और अपनी खुद की पार्टी पर लगे 2-जी स्पैक्ट्रम और कोयला घोटाले पर भी तथ्यों के साथ बोलना शुरू करें। अभी भाजपा ललित गेट से लेकर व्यापमं पर सीधे-सीधे दोषी पाए गए मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को इसी चतुराई के साथ बचाते हुए क्लीन चिट तक थमा चुकी है और बार-बार कांग्रेस के घोटालों को सुर्खियों में लाकर खुद का बचाव बेहतर तरीके से कर लेती है। मध्यप्रदेश में पिछले 12 सालों के दौरान भाजपा को सबसे बड़ा फायदा इसी बात का मिला कि यहां पर विपक्ष अत्यंत ही नकारा और निकम्मा साबित हुआ है, जिसका जिम्मा कांग्रेस आज तक ढंग से वहन नहीं कर पाई और जनता के सामने कोई विकल्प भी नहीं है, जिसके चलते सभी चुनावों में भाजपा को सफलता मिलती गई। अगर कांग्रेस ने सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाई होती तो भाजपा को ये कामयाबी हरगिज नहीं मिल सकती थी। 

इसका एक मात्र सबसे बड़ा उदाहरण नई दिल्ली है, जहां पर जनता के सामने आम आदमी पार्टी ने  बेहतर विकल्प के रूप में खुद को प्रस्तुत किया और कांग्रेस और भाजपा के घोटालों से लेकर उसकी नीतियों को जनता के सामने एक्सपोज करते हुए विराट बहुमत के साथ सरकार बनाई। यही कारण है कि आज केन्द्र की मोदी सरकार नई दिल्ली की केजरीवाल सरकार को परेशान करते हुए असफल करार देना चाहती है, क्योंकि अगर दिल्ली का प्रयोग सफल हो गया तो भाजपा के साथ-साथ इसका खामियाजा सबसे अधिक कांग्रेस को भुगतना पड़ेगा। लिहाजा अगर केन्द्र में कांग्रेस को फिर सत्ता में लौटना है तो उसे सशक्त विपक्ष की भूमिका अदा करना होगी और इसके लिए राहुल गांधी को खुद को तैयार करना पड़ेगा, तभी वे कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी के लायक भी बनेंगे।

लेखक-पत्रकार राजेश ज्वेल से संपर्क : jwellrajesh@yahoo.co.in

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