नाकामी छुपाने के लिए 2019 चुनाव में राम मंदिर कार्ड खेलेगी भाजपा

राम मंदिर मुद्दे पर मोदी की गंभीरता को समझने में भारी भूल कर रहा मीडिया!  2014 में मोदी सरकार बनने के बाद से मीडिया में राम मंदिर पर चर्चा होती रही है। यूपी में बीजेपी की भारी जीत के बाद ये चर्चा आम हो गई है। अक्सर टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर, पत्रकार, मुस्लिम धर्मगुरू, बुद्धिजीवी जब खुले तौर पर  मंदिर कब बनेगा या निर्माण की तारीख बताने जैसे असहज सवालों पर सरकार के प्रवक्ताओ को घेरने की कोशिश करते हैं तो शायद इन सभी महानुभावों को ये समझ मे नहीं आता कि अगर वाकई में इन्हें तारीख बता दी गयी तो इन्हें न्यूज़रूम से सीधे आईसीयू में भर्ती कराना पड़ेगा।

जो नेता  नोटबन्दी, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे दुस्साहसी निर्णय लेने की हिम्मत रखता है और उसे सफलतापूर्वक कार्यान्वित कर सकता हो तो उसे  मंदिर बनाने में क्या दिक्कत हो सकती है। नोटबन्दी के नकारात्मक परिणामों को लेकर विपक्ष 8 नवम्बर से  आज तक मोदी को कभी घेर नहीं पाया क्योंकि देश की जनता मोदी के लिए ढाल बनकर खड़ी थी। मोदी को इस बात का आकलन जरूर था कि नोटबन्दी जैसे फैसले अपनी लोकप्रियता के चरम पर ही लिए जा सकते हैं अन्यथा इसके परिणाम वेनेजुएला या इमरजेंसी जैसे हो सकते थे।
वर्तमान परिस्थितियों में इस मुद्दे पर मोदी बहुत सावधानी से एक-एक कदम बढ़ा रहे है।

केंद्र राज्य दोनों में ही उनकी सरकार होने से उन पर मंदिर निर्माण के वादे का भारी दबाव है इसलिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बेसब्री से इंतजार है। एक ठोस आधार के जरिये वे 2019 चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश करेंगे कि अगर उन्हें अगला कार्यकाल मिलता है तो मंदिर निर्माण के वादे को वो अंजाम तक पहुचाएंगे। सभी को विदित है कि सुप्रीमकोर्ट के फैसले को भी एक पक्ष या दोनों ही पक्ष कभी स्वीकार नहीं करेंगे। यानी इस मुद्दे को लंबे समय तक लटकाने की कवायद आगे भी जारी करने का भरपूर प्रयास होगा। लेकिन अगर सरकार मुखर एवं प्रतिबद्ध हो तो इस मामले को लटकाना बिल्कुल आसान नहीं होगा।

देश का मीडिया मोदी के 3 साल के कार्यकाल के बाद भी उनके निर्णयों को समझने में नाकाम रहा है। उनके निर्णय लगातार मीडिया के आकलन के बिल्कुल उलट साबित होते रहते हैं। शायद 2019 चुनाव तक मीडिया का सिर चकरा जाए। मोदी का योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाने के पीछे उनके गूढ़ निहितार्थ है। वे गुजरात की तरह यूपी को भी हिंदुत्व की प्रयोगशाला के रूप में स्थापित करना  चाहते हैं। उनके कार्यकाल में अगर अनेक बाधाओं के बाद भी अगर राम मंदिर का निर्माण कार्य प्रशस्त होता  है तो वे सीधे-सीधे देश के 80% हिन्दू जनमानस के दिलों पर स्थायी तौर पर राज करेंगे। बंगाल, केरल जैसे मुस्लिम बहुल राज्यों में जहाँ लम्बे समय से बीजेपी सत्ता पाने का ख्वाब देख रही है, वहाँ उसका आधार बनाना  बेहद आसान होगा। बेरोजगारी, महंगाई, गिरती विकास दर जैसे अनेक मुद्दों पर घिरी सरकार अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए 2019 चुनाव में 2014 की तरह ध्रुवीकरण के लिए  हिंदुत्व के मुद्दे को धार देने के लिए राम मंदिर का मुद्दा सबसे  उपयुक्त मानती है।

अभय सिंह
abhays170@gmail.com

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2019 के अंत तक बंद होंगे 90% छोटे और मध्यम अखबार बंद हो जाएंगे!

आज़ादी के 70 साल बाद अभी वर्तमान का यह समय छोटे और मध्यम अखबारो के लिए सबसे कठिन है। यदि सरकार के DAVP पॉलिसी को देखा जाय तो लघु समचार पत्रों को न्यूनतम १५ प्रतिशत रुपये के रूप में तथा मध्यम समाचार पत्रों को न्यूनतम ३५ प्रतिशत रुपये के रूप में विज्ञापन देने का निर्देश है। गौरतलब है कि भारत विविधताओं का देश है यहां विभिन्न भाषाएं हैं। ग्रामीण तथा कस्बाई इलाकों में भिन्न-भिन्न प्रकार के लोग रहते हैं। बड़े अखबार समूह की पहुंच वहां तक नहीं है। यदि विज्ञापन के आवंटन में भाषा और मूल्य वर्ग का ध्यान नहीं रखा गया तो निश्चित ही उस विज्ञापन की पहुंच विस्तृत तथा व्यापक नहीं होगी और विज्ञापन में वर्णित संदेश का प्रसार पूरे देश के समस्त क्षेत्रों तक नहीं हो पायेगा। पूर्व मंत्री द्वारा राज्यसभा में एक प्रश्र के उत्तर में नीति के पालन की बात कही गयी थी। परन्तु आज वह बयान झूठ साबित हो रहा है।

गांव का सरपंच यदि मजदूरी का भुगतान नहीं करता। पटवारी खसरे की नकल देने में रिश्वत मांगता है। दफ्तर का बाबू हर काम के लिए गरीब को दौड़ाता है। शुद्ध पानी नहीं मिल रहा। बिजली नहीं है। ठेकेदार ने मजदूरी हड़प ली। सड़के टूटी हैं। गन्दगी है। तो ऐसे सवालों के लिए आम जनता बड़े अखबारों के दफ्तर में नहीं पहुंचती है। वह जिंदगी की जद्दोजहद से परेशान अपने गांवों तथा कस्बों से छपने वाले अखबारों के दफ्तरों में पहुंचता है। लेकिन मोदी सरकार तो पूंजीपतियों के इशारे पर चल रही है। उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा है। स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर एक बार फिर इमरजेन्सी की तलवार लटक रही है। कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारों को अंग्रेजों के जमाने की याद ताजा हो रही है। आज़ादी के बाद नेहरू जी ने अखबारों को जगह जगह जमीनें दिया था। अखबारी कागज पर सब्सिडी मिलती थी ताकि चौथा खम्भा जीवित रहे। परन्तु वर्तमान सरकार को ना जाने कौन सलाह दे रहा है कि सिर्फ बड़े मीडिया हाउस पर मेहरबान है यह।

सरकार की डीएवीपी पालिसी 2016 और जीएसटी के कारण 90 फीसदी अखबार बंद होने के कगार पर हैं, या फिर बंद हो रहे हैं। इसका दूसरा बड़ा कारण कारण है बड़े अखबारों का लागत से 90% कम पर अखबार बेचना या कहें कि एक तरह से फ्री में देना। आज अखबार के सिर्फ एक पेज के कागज का दाम 30 पैसे पड़ता है। इस तरह 12 पेज के अखबार के कागज की कीमत 3.60 रुपये होती है। इसके बाद प्रिंटिंग, सैलरी तथा अन्य खर्च कम से कम प्रति अखबार रु 2.40 आता है। कुल मिलाकर 6 रुपये होता है। इसके बाद हॉकर तथा एजेंट कमीशन, टांसपोर्टशन 50%, यानी 3 रुपये। टोटल 9 रुपये खर्च पर एक पेज की लागत 75 पैसे आती है। इस प्रकार 20 पेज का अखबार का 15 रुपये होता है। जितना ज्यादा पेज उतना ज्यादा दाम होने चाहिए। तब छोटे औऱ मध्यम अखबार बिक सकते हैं और तभी प्रसार बढ़ेगा, नहीं तो असम्भव है।

जैसे छोटे उद्योगों को बचाने लिए सरकार की पॉलिसी है, एन्टी डंपिंग डयूटी, विदेशी कंपनियों से यहां के उद्योग धंधों को बचाने के लिए इम्पोर्ट ड्यूटी लगाया जाता है, उसी तरह लागत से कम पर अखबार नहीं बिके, मोनोपोली कमीशन भी इसमें सहयोग नहीं कर रहा है। जबतक ये नहीं होता है, तबतक कभी भी छोटे और मध्यम अखबार नहीं बिक सकेंगे, क्योंकि इन्हें प्राइवेट विज्ञापन नहीं मिलता है। इसलिए लागत से कम बेचना सम्भव नहीं है। बड़े अखबारों का फर्जी प्रसार सबसे ज्यादा है। अखबार फ्री देकर प्रसार बढ़ाते हैं। सिर्फ इतना ही दाम रखते हैं कि हॉकर रद्दी में बेचे तो उसे नुकसान हो। बड़े अखबारों का ज्यादातर प्रसार बुकिंग के द्वारा होता है। घर की महिलाएं बुकिंग से मिलने वाले गिफ्ट के लिए स्कीम वाले अखबार खरीदती हैं। बुकिंग के बाद हर महीने हॉकर को जो कुछ राशि देनी पड़ती है वो भी अखबार का रद्दी बेचकर निकल जाता है। इस तरह अखबार फ्री में मिलता है। सभी बड़े अखबारों के मालिक बड़े उद्योगपति हैं या बड़े उद्योगपतियों ने इनके शेयर खरीद रखे हैं। उनके प्राइवेट विज्ञापन एक तरह से उनके ही अखबारो में आते हैं। एक तरह से एक जेब से अपना पैसा दूसरे जेब में डालते हैं।

सभी बड़े अखबार एक होकर छोटे और मध्यम अखबार को सरकार की नीतियों में बदलाव करवा कर निबटाने में लगे हैं। इसी का नतीजा है नई डीएवीपी पालिसी और जीएसटी। जो हालात दिख रहा है, उसके मुताबिक 2019 तक 90% छोटे और मध्यम अखबार बंद हो जाएंगे। उसके बाद सिर्फ बड़े अखबार रहेंगे और सरकार के गुणगान में लगे रहेंगे। सभी सरकारी विज्ञापन भी उनकी झोली में जायेंगे और उसके मालिक लोग अपने उद्योगों की दलाली करते रहेंगे।

अखबार को विज्ञापन लेने का हक है क्योंकि सिर्फ अखबार ही ऐसा माध्यम है जिससे रोजाना 2 से 4 पेज सिर्फ सरकार और उसके सभी अंगों की खबरें, चाहे प्यून से PM या चपरासी से CM, मुखिया से लेकर सभी नेताओं तक, की छपती है। यह किसी अन्य माध्यम में नहीं होता है। फिर भी आज इस चौथे खंभा की आज़ादी पर चारों तरफ़ से हमले हो रहे हैं। अखबार को विज्ञापन लेने का हक है। कम से कम दो पेज रोजाना। जितना एरिया न्यूज का, उतना कम से कम विज्ञापन का होना चाहिए। पहले सरकार अखबार को प्राइम जगहों पर जमीन देती थी, सब्सिडी पर कागज, अब GST लगाकर वसूली के साथ-साथ इंस्पेक्टर राज। कोई भी आकर लेखा जोखा चेक करने लगेगा।

सरकारें कहती हैं कि सरकार के फेवर में लिखो, विरोध में लिखोगे तो विज्ञापन बंद। जज का वेतन सरकार देती है लेकिन क्या सरकार कहती है कि सरकार के विरोध में जजमेंट दोगे तो वेतन और सुविधा बंद कर दिया जाएगा? यही नहीं, समय समय पर इनके वेतन इत्यादि में वृद्धि होती है। परन्तु आज अखबार के विज्ञापन में कमी की गई और अब इसे खत्म करने की साजिश हो रही है। आज देश में एक दूसरे तरह का संकटकाल है।  बड़े बड़े उद्योगों के मालिक मीडिया के शेयर खरीद रहे हैं और मीडिया उनका गुलाम बनता जा रहा है। अमेरिका की तरह भारत में भी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति एक व्यापारी बन सकता है या फिर पाकिस्तान की तरह सेना का कठपुतली प्रधानमंत्री बन सकता है। पाकिस्तान में पहले सेना तख्ता पलट कर देती थी। अब कठपुतली प्रधानमंत्री और सरकार के सभी बड़े पदों के लोग सेना के कठपुतली हैं।

छोटे और मध्यम अखबार से जुड़े लोग सड़क पर आ जायेंगे और बड़े मीडिया हाउस के जुड़े पत्रकार भी परेशान होंगे क्योंकि जब प्रिंट मीडिया के पत्रकार बेरोजगार होंगे तो वो TV ईत्यादि हर जगह नौकरी की लाइन में लगेगा। ऊपर से सरकार पेनाल्टी का केस डाल कर वसूली करने की तैयारी में है। हमें मिलकर सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर कर लागत से कम पर अखबार नहीं बिके, इसके लिए दबाव बनाना होगा। अमेरिका में 1 डॉलर (70रु) ब्रिटेन में 1 पौंड (80रु) और पड़ोसी पाकिस्तान में 20 रुपये में अखबार बिक सकता है तो भारत में क्यों नहीं? पाकिस्तान के लोग ज्यादा अमीर हैं? ज्यादा पढ़े लिखे हैं? करांची की आबादी 2 करोड़ है पर उस शहर में सबसे ज्यादा प्रसार वाले अखबार की प्रसार संख्या कितनी है? पाकिस्तान का सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार ‘जंग’ है जिसका पूरे पाकिस्तान में प्रसार 8.5 लाख है। हमारे यहां तो Metro Cities के कुछ अखबार 10 लाख से ज्यादा ABC सर्कुलेशन दिखाते हैं। जब 15-20 या ज्यादा पेज के कारण ज्यादा दाम होगा तब दस लाख सर्कुलेशन दिखाने वाला अखबार एक लाख भी नहीं बिक पायेगा।

दूसरी बात अगर सरकार सचमुच में छोटे और मध्यम अखबार को बचाना चाहती है तो 5000 कॉपी सर्कुलेशन तक के लिए कम से कम 25 रुपये डीएवीपी दर दे और इससे ज्यादा सर्कुलेशन के लिए आरएनआई चेकिंग का नियम बना दे। हर 5000 सर्कुलेशन बढ़ने पर 10% दर बढ़े। साथ ही बिग कैटेगरी के स्लैब की दर में कोई बदलाव नहीं हो, क्योंकि बड़े अखबारो को प्राइवेट विज्ञापन बहुत मिलते हैं।

सरकार ये नियम भी बनाये कि जो भी व्यक्ति अखबार या कोई मीडिया हाऊस चलाता हो, वो कोई धंधा नहीं करे या दूसरा बड़ा काम नहीं करे या छोटे-छोटे धंधे जो पूर्व से संचालित है, उसे 75 लाख टर्नओवर की लिमिट कर दे क्योंकि इससे कोई अखबार किसी का सपोर्ट या विरोध नहीं करेगा, उसका हित प्रभावित नहीं होगा। जज जिस कोर्ट से रिटायर होता है उसे उस कोर्ट में वकील के रुप मे प्रैक्टिस करने की मनाही होती है। समाचार पत्र अब जीएसटी के चलते बन्द हो जायेंगे। पं. दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा के कथनी करनी में अन्तर स्पष्ट दिख रहा है।

एक छोटे अखबार के प्रकाशक द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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मोदी पर मिमिक्री दिखाने में क्यों फटती है टीवी चैनलों की?

वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त ने प्रेस क्लब आफ इंडिया में पत्रकार विनोद वर्मा की छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा की गई अवैधानिक गिरफ्तारी के खिलाफ बोलते हुए खुलासा किया कि टीवी चैनलों पर मोदी की मिमिक्री दिखाने पर पाबंदी है. इस वीडियो को सुनिए विस्तार से, जानिए पूरा प्रकरण क्या है…

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चार महीने पहले रेल टिकट कटाने वाले इंजीनियर का दिवाली पर घर जाने का सपना ‘वेटिंग’ ही रह गया!

Yashwant Singh : हरिद्वार में कार्यरत इंजीनियर गौरव जून महीने में तीन टिकट कटाए थे, दिल्ली से सहरसा जाने के लिए, अपनी बहनों के साथ। ट्रेन आज है लेकिन टिकट वेटिंग ही रह गया। चार्ट प्रीपेयर्ड। लास्ट मोमेंट में मुझे इत्तिला किया, सो हाथ पांव मारने के बावजूद कुछ कर न पाया। दिवाली अपने होम टाउन में मनाने की उनकी ख्वाहिश धरी रह गई। दिवाली के दिन अपने जिला-जवार में होने की चार महीने पहले से की गई तैयारी काम न आई।

धन्य है अपना देश। धन्य है भारतीय रेल। हां, सत्ता के नजदीकियों के चिंटू पिंटू मिंटू जब चाहें टिकट कटा कर सीधे रेल मंत्रालय से कन्फर्म करा सकते हैं। सरकार चाहें कांग्रेसियों की हो या संघियों की, इस देश में दो देस होने का एहसास बना रहेगा।

भड़ास एडिटर यशवंत की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Dushyant Rai प्रभु ने जुलाई में वेटिंग खत्म करने की बात कभी नहीं की थी।वाजपेयी सरकार के मालगाड़ियों के लिए अलग लाइनों (DFC)को अगर यूपीए सरकार ने पूरा किया होता तो आज किसी को टिकट के लिए रोना नहीं पड़ता। इस सरकार को एक साथ कई मोर्चों पर काम करना पड़ रहा है।मालगाड़ी में अधिकतम लोडिंग करने से पुरानी पटरियों की भी हालत गंभीर हो गई थी।हजारों किलोमीटर के ट्रैक पर 2 करोड़ यात्रियों को ढोते हुए भी यह सरकार अगले साल से कई रूटों पर DFC शुरू कर देगी। लगभग 3 साल में सबको बर्थ मिलने लगेगी और यात्रा का समय भी काफी कम हो जाएगा।

Rajiv Tiwari दूर तक साफ दिखाने वाला चश्मा लगाइए, मोदी लेंस को बदलकर।

Dushyant Rai अलीगढ़ से कानपुर की यात्रा ट्रेन यात्रा आम आदमी बन कर कीजिए, काम की गति और क्वालिटी देखकर आप को अपने कमेंट के लिए बड़ी शर्म आएगी।

Rajiv Tiwari शर्म आती है दुष्यंत जी, आप जैसे अंध समर्थकों पर, जो यह मानते है भारत निर्माण केवल 3 वर्षों में हुआ है। वरना पहले तो विशाल बियाबान जंगल था यहां। ट्रेन तो लोगों ने देखी ही नहीं थी…हैं ना सही बात।

Yashwant Singh भाई Rajiv Tiwari, दुष्यंत जी अपने पुराने मित्र और खरे आदमी हैं। रेल मंत्रालय से जुड़े हैं। हम लोगों को इनकी बात को गंभीरता से सुनना चाहिए। दूसरा पक्ष हमेशा महत्वपूर्ण होता है। मालगाड़ी और यात्री रेल की लाइन अलग किए जाने की व्यवस्था से निश्चित रूप से फर्क पड़ेगा।

Rajiv Tiwari सहमत हूँ यशवंत भाई, लेकिन पक्ष को संतुलित तरीके से रखना भी एक कला होती है।

Sanjaya Kumar Singh दुष्यंत राय जी, दो नहीं तीन मोर्चों पर कहिए। यूपीए सरकार ने बुलेट ट्रेन भी चला दी होती तो मोदी जी को उसपर भी मेहनत नहीं करनी पड़ती। और मेट्रो चलाया था तो उसका किराया बढ़ाकर खुश होने का मौका भी नहीं मिलता।

Yashwant Singh और ये भी सच है कि 60 साल में कांग्रेस अगर सबको यात्रा सुविधा प्रदान नहीं कर पाई तो प्राइमरी अपराधी हाथ का पंजा ही है। हां, bjp चीजों को ठीक करने के नारे के साथ आई थी तो इससे उम्मीद ज्यादा है और फिलहाल उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सकी है। हो सकता है सही नीति पर अमल करके आगे चीजें ठीक कर दी जाएं, जिसका हम सबको इंतज़ार है।

Rajiv Tiwari संजय जी, बुलेट ट्रेन आने से देश का चहुँमुखी विकास हो जाने वाला है, जैसा पहले की सरकारों ने मेट्रो लाकर किया। चारों ओर सुख शांति, कहीं कोई परेशान नहीं, सर्व सुविधाओं की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है और हर देशवासी उसमें गोते लगाकर पुण्य बटोर रहा है।

Rajiv Tiwari ठीक कहा आपने यशवंत भाई, कांग्रेस ने 60 साल में जो कुछ किया उसका परिणाम उसके सामने है। लेकिन 3 साल में 6 दशकों पुरानी मैली गंगा साफ करने का दावा करने वाले ये बातों के शेर खुद कहाँ खड़े हैं।

Sanjaya Kumar Singh मूल मुद्दा ये है Yashwant Singh जी कि वेटिंग लिस्ट लेने की भी तमीज नहीं है। जब तीन या चार महीने पहले बुकिंग शुरू होती है और छठ के लिए महीने भर बाद ही वेटिंग शुरू हो जाता है तो ये तय होना चाहिए कि वेटिंग कितना बुक करना है, कब तक और जो बुक हो जाए उसे कंफर्म मिलना ही चाहिए। वैसे भी अब जब अंतिम समय पर कैंसल कराने वालों को नहीं के बराबर पैसे मिलते हैं तो कुछ सीटें खाली रह जाएं पर तीन महीने पहले बुक कराने वालों को अंतिम दिन पता चले कि कंफर्म नहीं हुआ और उसे डिफेंड किया जाए कि फलाने ने वो नहीं किया और ढिमाके ने वो नहीं किया – खरा आदमी होना तो नहीं हो सकता। नौकरी हो रही है – उससे मुझे कोई एतराज नहीं है।

Dushyant Rai भाई साहब रेल का नेटवर्क इतना विशाल और इतने बोझ से दबा है कि नई सरकार रेल लाइन बिछाने, विद्युतीकरण और पुरानी लाइन सुधार में लगभग तीन गुना गति से काम कर रही है फिर भी अभी तीन साल लगेगा जनता को अपेक्षित सुविधा मिलने में।

Sanjaya Kumar Singh आप ठीक कह रहे हैं। फिर भी, जब अंतिम समय में कैंसल कराने वाले को टिकट नहीं मिलता है तो क्या यह सुनिश्चित नहीं किया जाना चाहिए (जैसे भी और उसमें छठ स्पेशल ट्रेन में वैकल्पिक आरक्षण मिलने पर चाहिए कि नहीं पूछ लेना शामिल है) कि तीन महीने पहले अपनी जरूरत बताने वाले को निराश नहीं किया जाए। क्या इस जरूरत से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि रेलवे की लाचारी को डिफेंड किया जाए? निश्चित रूप से यह लाचारी 130 करोड़ की आबादी के कारण है और हर कोई नरेन्द्र मोदी होता तो यह स्थिति नहीं आती। पर ये कर दूगां, वो कर दूंगा – कहने से पहले भी यही स्थिति थी।

Shyam Singh Rawat मैं ट्रेन नंबर 15035 व 15036–उत्तरांचल सम्पर्क क्रान्ति एक्सप्रेस का इसकी शुरुआत से ही नियमित यात्री हूं जो काठगोदाम-दिल्ली रूट पर चलती है। यह ट्रेन पहले ISO 9000 तथा ISO 2001-2008 द्वारा प्रमाणित एक अच्छी सेवा थी। अभी 25 सितंबर को इस ट्रेन से दिल्ली जाना हुआ (Coach No.D-9), गाड़ी की हालत बहुत बुरी है। समय-पालन, डिब्बे के भीतर सफाई, कैटरिंग, पानी आदि सब चौपट। यहाँ तक कि मोबाइल चार्जिंग सुविधा भी खत्म। 4 अक्टूबर को इसी ट्रेन नं.–15036 से वापस आने के लिए जब दिल्ली स्टेशन पहुंचा तो नैशनल ट्रेन इक्वायरी सिस्टम पर इसका आगमन-प्रस्थान निर्धारित समय-सारणी के अनुसार ही क्रमश: 15.25 और 16.00 बजे दिखाया जा रहा था। जबकि सच्चाई यह थी कि यह ट्रेन 16.05 पर प्लेट फार्म सं―5 पर पहुंची और वहां से 16.35 पर काठगोदाम के लिए चली। यह ट्रेन अपने गंतव्य पर डेढ़ घंटा विलंब से पहुंची। इसकी शिकायत नये रेल मंत्री पीयूष गोयल से उनके फेसबुक पेज पर की जिसे कुछ ही पलों में डिलीट कर दिया गया था। शायद यह मोदी सरकार की कपटपूर्ण नीति के अनुसार ‘आल इस वैल’ दिखा कर देश में भ्रम का वातावरण बनाने का एक हिस्सा है।

Prashant M Kumar ऐसे में बस यही लगता है कि अपना देश भी परदेस हो गया

Sarwar Kamal इस देश मे दो देश होने का अहसास बना रहेगा

निखिलेश त्रिवेदी भारतीय रेलवे जैसी थी और है वैसी ही आगे भी रहेगी। कायाकल्प की उम्मीद नहीं है।

Pramod Patel यह सरकार भी फेल. . . जनता ने मौका दिया और जनता को ही लुट लिया. . .

Pankaj Kumar अरे बाबा, मैने खुद कोलकाता से मोतिहारी जाने के लिये आज से तीन महीने पहले दो टिकट एसी टू टियर की ली थी। वेटिंग 1 और 2 मिला था। आज तक सीट कंफर्म नहीं हुआ हैं। परिवार को ले जाना है इस हताशे से फ्लाइट से दूसरे रूट से टिकट लिया। जो सबकुछ मिलाकर करीब करीब चौगुना बजट बढ़ गया। सभी रेलवे के मिनिस्टर , अधिकारी कहते फिरते है कि रेलवे घाटे में चल रही है, कोई आदमी बतावें कि जिस दिन उसे यात्रा करना है और उस दिन टिकट उसे आराम से मिल जाये। सभी ट्रेनें सालों भर फ़ूल रहती है। ट्रेन की सीटों से ज्यादा रेलवे के कर्मचारी है। जो दिनभर ऑफिस में गप व डींगें हाँकते और मारते है। सैलरी लेते है सबसे ज्यादा। आखिर क्यों न रेलवे घाटे में जाये।

Sushant Saurav Kya kahein iske liye bjp se jyada congg jimmedar h agar 50 salon m Cong Kam krti to bjp aati hi nhi

Gajendra Kumar Singh प्रभु जी तो जुलाई से वेटिंग खत्म करने की घोषणा की थी । अब तो खुद ही खिसक गये ।

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मोदी को भगवान न बनाओ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर मंदिर बनाने की घोषणा क्रांति की जमीन मेरठ में एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने की है। सिचाई विभाग से रिटायर इंजीनियर जेपी सिंह की माने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू लोगों के सिर पर चढ़कर बोल रहा है। ऐसे में उनके नाम का मंदिर बनना चाहिए। ऊपरी तौर पर देखा जाए तो इस ऐलान के पीछे किसी की व्यक्तिगत इच्छा और भावना ही दिखाई देती है। पर रिटायर इंजीनियर की घोषणा एक लोकतांत्रिक देश में किसी नेता को भगवान बनाने की कोशिश भी दिखाई देती है। मामले को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता।

ऐसा नहीं है कि ऐसी घोषणा कोई पहली दफा देश में हुई है। प्रायः दक्षिण भारत से नेताओं और फिल्मी सितारों के मंदिर बनाने और पूजा करने की खबरे आती रही हैं। देश के कई राज्यों में कई लोगों ने अपने पंसदीदा नेताओं, फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों के मंदिर बनाये हैं। वहीं अपने पंसदीदा सितारों और नेताओं की तस्वीर की पूजा करने वाले भी बढ़ी संख्या में है।

समर्थकों की ओर से अपने नेताओं के प्रति प्रेम दर्शाने के कइ्र्र मामले प्रकाश में आये हैं। लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ऐसी नेता हैं जिन्होंने खुद ही अपनी मूर्तियां लगवाई हैं। यूपी की मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने राज्य के पार्कों, स्मारकों में दलित नेताओं, चिंतकों, और सुधारकों के साथ-साथ अपनी प्रतिमाएं भी लगवाई हैं। इन प्रतिमाओं को लेकर यूपी की सियासत भी कई बार गर्मा चुकी है। लेकिन मूर्तियां वहीं की वहीं हैं। मायावती की शान में ‘माया पुराण’ की रचना भी की गई है। जिसमें मायावती को समता मूलक समाज की आराध्य देवी कहा गया है।

मोदी संघर्ष के नेता हैं। स्टेशन पर चाय बेचने से लेकर देश के सबसे शक्तिशाली पद तक का उनका सफर आसान नहीं रहा। एक गरीब परिवार का लड़का आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का ध्वजवाहक है। मोदी का जीवन चरित्र और संघर्ष देश के लाखों-लाख देशवासियों के लिये प्रेरणादायी है। उनका जीवन अभाव और गरीबी में बीता। ऐसे में समाज का वंचित, पिछड़ा, गरीब, मजदूर, किसान और अभाव में जीवन यापन करने वाला हिस्सा मोदी को अपना रोल माडल मानता है। आबादी का यह बड़ा हिस्सा मोदी केे जीवन से किसी न किसी तरीके से प्रेरणा पाता है। विधार्थी और युवा विशेषकर बड़ी संख्या में प्रधानमंत्री मोदी को अपना रोल माडल मानते हैं।

भारत में फिल्मी सितारों के नाम पर मंदिर बनाया जाना कोई नई बात नहीं है। पहले इस तरह की खबरें केवल दक्षिण भारत से ही आती थीं। लेकिन अब देश के दूसरे हिस्सों से भी ऐसी खबरें सुनने में आती हैं। अभिनेत्री खुशबू के नाम का मंदिर तमिलनाडु के तिरूचिरापल्ली में मौजूद है और वो इस पर आश्चर्य व्यक्त कर चुकी हैं। खुशबू के अलावा ममता कुलकर्णी, नमीता, पूजा उमाशंकर के नाम पर भी मंदिर बातें की जाती हैं लेकिन अब तक उनकी पुष्टि नहीं हो सकी है। अमिताभ को पसंद करने वालों ने कुछ समय पहले कोलकाता में उनके नाम पर एक मंदिर बनाया था जहां उनकी पूजा होती है। शिवसेवा के संस्थापक बाल ठाकरे का भव्य मंदिर बनाया जा रहा है। चंद्रपुर जिले के भद्रावती में इस मंदिर के निर्माण के लिए भद्रावती नगर परिषद ने करीब पांच एकड़ जमीन दी है।

तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एम करुणानिधि का मंदिर राज्य के वैलूर जिले में उनके समर्थको ने स्थापित किया है। डॉक्टर येदुगुड़ी सनदिंति राजशेखर रेड्डी को वाईएसआर के रूप में जाना जाता रहा. वे आंध्र प्रदेश के एक करिश्माई और लोकप्रिय नेता थे। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी की इकाई ने विशाखापटनम में उनकी याद में एक मंदिर का निर्माण कराया। राजगोपालापुरम गांव में बने इस मंदिर को राजशेखरा रेड्डी अलायम नाम दिया गया है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में 15 साल पहले देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजेपयी का मंदिर बनवाया गया था। सत्यनारायण टेकरी नाम की पहाड़ी पर बने इस मंदिर में बाकायदा एक पुजारी भी रखा गया हैै। उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के एक गांव में मोदी की मूर्ति की रोज पूजा-अर्चना की जाती है। आरएसएस के कारसेवक और विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी रह चुके बृजेंद्र मिश्र ने भगवानपुर गांव के शिव मंदिर में मोदी की प्रतिमा स्थापित की थी। उसके बाद मंदिर को नाम दिया गया था ‘नमो नमो मंदिर’। इस मंदिर में रोज सुबह और शाम मोदी की आरती और पूजा की जाती है. जिसमें गांव के लोग भी भाग लेते हैं।

आंध्र प्रदेश के महबूब नगर में एक कांग्रेसी नेता ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की एक बड़ी मूर्ति बनवाई। नौ फीट की इस मूर्ति को तेलंगाना टाल्ली नाम दिया गया। जिसका अर्थ होता है तेलंगाना की माता। इस काम को अंजाम दिया कांग्रेस नेता पी. शंकर राव ने. अलग तेलंगाना राज्य बनाने के पार्टी के फैसले के बाद सोनिया गांधी की यह मूर्ति स्थापित की गई। इसके अलावा कई बार सोनिया के देवी रूप वाले पोस्टर भी चर्चाओं में रहे हैं। बिहार के भभुआ जिले में भोजपुरी फिल्मों अभिनेता मनोज तिवारी ने पूजा-पाठ के साथ साल 2013 में क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर की मूर्ति का अनावरण किया था। उनका मंदिर कैमूर जिले में बनवाया गया है। राजस्थान में बीजपी नेता और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की पूजा करने वाले भी बहुत हैं। जोधपुर जिले में एक भाजपा नेता ने शहर के एक मंदिर में राजे का बड़ा सा पोस्टर लगाकर उनकी पूजा करनी शुरू कर दी। उस पोस्टर में वसुंधरा राजे को अन्नपूर्णा देवी के रुप में दिखाया गया है।

गुजरात के राजकोट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंदिर एक स्थानीय संगठन ओम युवा समूह ने बनवाया है। करीब 300 लोगों के इस संगठन ने आपस में चंदा एकत्र कर मंदिर बनाने का सारा खर्च उठाया। मंदिर बनाने में 4-5 लाख रुपये का खर्च आया है। मंदिर का उद्घाटन एक केंद्रीय मंत्री को करना था लेकिन मोदी की नाराजगी के बाद कार्यक्रम रद्द हो गया।
मीडिया खबरों के मुताबिक यह मंदिर मेरठ के सरधना क्षेत्र में मेरठ-करनाल हाईवे पर बनेगा। इसके लिए पांच 5 एकड़ की जमीन भी तय कर ली गई है। इसमें मोदी की 100 फीट ऊंची मूर्ति लगेगी। मंदिर निर्माण में दस करोड़ का खर्च आएगा। मंदिर बनाने में आने वाली लागत मोदी भक्तों से चंदे के रूप में लिया जाएगा। मंदिर का भूमि पूजन 23 अक्टूबर को होगा। इसको बनने में करीब 2 वर्ष का समय लगेगा। इस मंदिर के उद्घाटन के लिए बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को बुलाने की कोशिश की जा रही है। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में भी पुष्पराज सिंह यादव नाम के एक व्यक्ति ने जलालपुर में मोदी का मंदिर बनाने का काम शुरू किया था। करुणानिधि का भक्त कहने वाले एक व्यक्ति ने वेल्लूर में उनका मंदिर बनाया है।

किसी की पसंद-नापंसद और भावनाओं को रोका नहीं जा सकता। पर सवाल यह है कि इस सबसे क्या होगा, क्या देश का कुछ भला होगा? मोदी समर्थकों को शायद यह मालूम नहीं होगा कि मोदी खुद कभी ऐसा नहीं चाहेंगे। जिस देश में आज भी करीब 20 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने को मजबूर हैं, करोड़ों लोगों को सिर ढकने के लिए एक अदद छत का सहारा नसीब नहीं है, न जाने कितने ही लोग भूखे पेट सोते हैं, वहां ऐसे मंदिरों की क्यों जरूरत पड़ने लगी।

इससे पूर्व भी गुजरात के राजकोट में 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंदिर बनवाने की कोशिश की गई थी। ये कोशिश प्रधानमंत्री के समर्थकों की ओर से की गई थी। इस पर प्रधानमंत्री मोदी ने नाखुशी जताते हुए खबर को ‘स्तब्धकारी’ और ‘भारत की महान परंपराओं’ के खिलाफ बताया था। उन्होंने ट्वीट कर कहा था कि ‘किसी इंसान का मंदिर बनाना हमारी सभ्यता नहीं है, मंदिर बनाने से मुझे दुख हुआ है। मैं लोगों से ऐसा नहीं करने का आग्रह करता हूं।’ प्रधानमंत्री के ट्वीट के बाद राजकोट प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए वहां से मोदी की मूर्ति को हटवा दिया था। लेकिन उस प्रकरण से भी कोई सीख ना लेते हुए अब उत्तर प्रदेश के मेरठ में प्रधानमंत्री मोदी का भव्य मंदिर बनाने की बात कही जा रही है। हालांकि अभी तक मेरठ में मंदिर बनाए जाने के ऐलान पर पीएम मोदी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन संभावना है कि प्रधानमंत्री जल्द ही इस पर पिछली बार की तरह कोई ठोस कदम उठाएंगे।

लोकतंत्र में किसी नेता को भगवान का दर्जा देना उसका सम्मान बढ़ाना कतई नहीं हो सकता। जनप्रिय नेता तो प्रत्येक देशवासी के दिल में बसता है। उसके लिये किसी मंदिर या पूजा स्थल की जरूरत नहीं होती है। जब जनता अपने प्रिय नेता के कंधे से कंधा मिलाकर देश विकास के कार्यों में जुटती है तो ज्यादा सकारात्मक परिणाम हासिल होते हैं। पीएम मोदी का मंदिर बनाने वाला रिटायर अधिकारी अगर उनका मंदिर बनाने की बजाय गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने के लिये विधालय, भूखों के लिये अन्न सेवा, पर्यावरण बचाने की मुहिम, नदियों की सफाई, स्वच्छता अभियान या विभिन्न सामाजिक कुरीतियों की दिशा में काम करे तो देशवासियों व प्रधानमंत्री को ज्यादा खुशी होगी।

मोदी पहले से ही 15 लाख वाले कोट के कारण काफी आलोचना झेल चुके हैं और अब यह मंदिर। ऐसे शगूफे वे नेता, समर्थक या प्रशंसक छोड़ते हैं जो जनता की सेवा करने में तो विफल रहते हैं, लेकिन अपने आकाओं की सेवा करना और चापलूसी का कोई अवसर गंवाना नहीं चाहते हैं। मोदी को भगवान बनाने से बेहतर है कि उन्हें सुशासन देने में ये नेता मदद करें। स्वयं प्रधानमंत्री खुद को प्रधान सेवक बता चुके हैं। इससे पूर्व जिन नेताओं या अभिनेताओं की मूर्तियां लगी या मंदिर उनके चाहने वालों न बनाएं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि किसी गलत परिपाटी को लगातार आगे बढ़ाया जाए। समाज में इस चेतना का संचार भी जरूरी है। ऐसी प्रवृति पर रोक लगनी चाहिए, किसी लोकतांत्रिक देश में किसी नेता का मंदिर बनना शुभ लक्ष्ण नहीं है। क्योंकि इससे नेता या लोकतंत्र दोनों में से किसी एक का नुकसान होना लाजिमी है।

डॉ. आशीष वशिष्ठ
स्वतंत्र  पत्रकार
लखनऊ, उ0प्र0, (भारत)
मोबाइल: (+91) 94 5100 5200  
E-mail : avjournalist@gmail.com

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अमित शाह की ओर से पीयूष गोयल ने ‘द वायर’ पर 100 करोड़ का आपराधिक मुकदमा ठोकने की बात कही

‘द वायर’ की पड़ताल ने कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक को हिला दिया है

Nitin Thakur : अमित शाह के बेटे की कमाई का हिसाब किताब जान लीजिए। जब आपकी नौकरियां जा रही थीं, तब कोई घाटे से 16 हज़ार गुना मुनाफे में जा रहा था। द वायर की पड़ताल ने कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक को हिला दिया है।

Nitesh Tripathi : जब लगभग अधिकांश मीडिया हाउस सरकार के चरणों में लोट रही हैं ऐसे में ‘द वायर’ की एक स्टोरी ने सरकार के नाक में दम कर दिया. हालांकि इस खबर पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी लेकिन सरकार इतना तो जाने ले कि सब कुछ पक्ष में होने के बाद भी कोई तो ऐसा है जो अब भी धारा के विपरीत चलने का माद्दा रखता है. अमित शाह की ओर से पीयूष गोयल ने प्रेस कांफ्रेंस कर ‘वायर’ पर 100 करोड़ का आपराधिक मुकदमा ठोकने की बात कही है.

Abhishek Parashar : भक्तों ने मोटा भाई के बेटे की कंपनी में रातों रात हुई बेतहाशा बढ़ोतरी की खबर सामने लाने वाली रोहिणी सिंह के खिलाफ अपना काम शुरू कर दिया है. अभी कुछ लंपट यह कह रहे हैं कि उन्होंने ईटी से निकाल दिया गया, हो सकता है कल को यह बात कहीं और पहुंच जाए. लेकिन इन मूर्खों को यह समझ में नहीं आएगा, यह वही रोहिणी सिंह हैं, जिन्होंने वाड्रा के खिलाफ भी स्टोरी की थी. वही स्टोरी, जिसकी दम पर सवार होकर बीजेपी सत्ता में आई. भक्त भूलते बहुत तेजी से हैं, उन्हें याद नहीं रहता कुछ भी.

Manish Shandilya : न्यूज़ वेबसाइट ‘द वायर’ की ख़बर में दावा किया गया कि भारतीय जनता पार्टी के नेता अमित शाह के बेटे जय अमितभाई शाह की कंपनी का टर्न-ओवर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री और उनके पिता के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद बेतहाशा बढ़ा है. ये ख़बर सोशल मीडिया में बहुत तेज़ी से फैली और ट्विटर और फ़ेसबुक पर टॉप ट्रेंड्स में शामिल हो गई. @ishar_adv नाम के हैंडल ने लिखा, ”बीजेपी ने अपना स्लोगन बदल लिया है. विकास की जय के बजाय जय का विकास. कोई ज्यादा अंतर नहीं है. अब हमें समझ आया कि आख़िर विकास कहां छिपा बैठा है.”

पत्रकार नितिन ठाकुर, नीतेश त्रिपाठी, अभिषेक पराशर और मनीष शांडिल्य की एफबी वॉल से.

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‘भक्तों’ से जान का खतरा बताते हुए पीएम को लिखा गया रवीश कुमार का पत्र फेसबुक पर हुआ वायरल, आप भी पढ़ें

Ravish Kumar : भारत के प्रधानमंत्री को मेरा पत्र…

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी,

आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप सकुशल होंगे। मैं हमेशा आपके स्वास्थ्य की मंगल कामना करता हूं। आप असीम ऊर्जा के धनी बने रहें, इसकी दुआ करता हूं। पत्र का प्रयोजन सीमित है। विदित है कि सोशल मीडिया के मंचों पर भाषाई शालीनता कुचली जा रही है। इसमें आपके नेतृत्व में चलने वाले संगठन के सदस्यों, समर्थकों के अलावा विरोधियों के संगठन और सदस्य भी शामिल हैं। इस विचलन और पतन में शामिल लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।

दुख की बात है कि अभद्र भाषा और धमकी देने वाले कुछ लोगों को आप ट्वीटर पर फोलो करते हैं। सार्वजनिक रूप से उजागर होने, विवाद होने के बाद भी फोलो करते हैं। भारत के प्रधानमंत्री की सोहबत में ऐसे लोग हों, यह न तो आपको शोभा देता है और न ही आपके पद की गरिमा को। किन्हीं ख़ास योग्यताओं के कारण ही आप किसी को फोलो करते होंगे। मुझे पूरी उम्मीद है कि धमकाने, गाली देने और घोर सांप्रदायिक बातें करने को आप फोलो करने की योग्यता नहीं मानते होंगे।

आपकी व्यस्तता समझ सकता हूं मगर आपकी टीम यह सुनिश्चित कर सकती है कि आप ऐसे किसी शख्स को ट्वीटर पर फोलो न करें। ये लोग आपकी गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं। भारत की जनता ने आपको असीम प्यार दिया है, कोई कमी रह गई हो, तो आप उससे मांग सकते हैं, वो खुशी खुशी दे देगी। मगर यह शोभा नहीं देता कि भारत के प्रधानमंत्री ऐसे लोगों को फोलो करें जो आलोचकों के जीवित होने पर दुख जताता हो।

आज जबसे altnews.in पर पढ़ा है कि ऊं धर्म रक्षति रक्षित: नाम के व्हाट्स ग्रुप में जो लोग मुझे कुछ महीनों से भद्दी गालियां दे रहे थे, धमकी दे रहे थे, सांप्रदायिक बातें कर रहे थे, मुझ जैसे सर्वोच्च देशभक्त व दूसरे पत्रकारों को आतंकवादी बता रहे थे, उनमें से कुछ को आप ट्वीटर पर फोलो करते हैं, मैं सहम गया हूं। प्रधानमंत्री जी, इस व्हाट्स अप ग्रुप में मुझे और कुछ पत्रकारों को लेकर जिस स्तरहीन भाषा का इस्तमाल किया गया वो अगर मैं पढ़ दूं तो सुनने वाले कान बंद कर लेंगे। मेरा दायित्व बनता है कि मैं अपनी सख़्त आलोचनाओं में भी आपका लिहाज़ करूं। महिला पत्रकारों के सम्मान में जिस भाषा का इस्तमाल किया गया है वो शर्मनाक है।

सोशल मीडिया पर आपके प्रति भी अभद्र भाषा का इस्तमाल किया जाता है। जिसका मुझे वाक़ई अफसोस है। लेकिन यहां मामला आपकी तरफ से ऐसे लोगों का है, जो मुझे जैसे अकेले पत्रकार को धमकियां देते रहे हैं। जब भी इस व्हाट्स अप ग्रुप से अलग होने का प्रयास किया, पकड़ इसे, भाग रहा है, मार इसे, टाइप की भाषा का इस्तमाल कर वापस जोड़ दिया गया।

राजनीति ने सोशल मीडिया और सड़क पर जो यह भीड़ तैयार की है, एक दिन समाज के लिए ख़ासकर महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगी। इनकी गालियां महिला विरोधी होती हैं। इतनी सांप्रदायिक होती हैं कि आप तो बिल्कुल बर्दाश्त न करें। वैसे भी 2022 तक भारत से सांप्रदायिकता मिटा देना चाहते हैं। 15 अगस्त के आपके भाषण का भी इन पर प्रभाव नहीं पड़ा और वे हाल हाल तक मुझे धमकियां देते रहे हैं।

अब मेरा आपसे एक सवाल है। क्या आप वाक़ई नीरज दवे और निखिल दधीच को फोलो करते हैं? क्यों करते हैं? कुछ दिन पहले मैंने इनके व्हाट्स अप ग्रुप का कुछ स्क्रीन शाट अपने फेसबुक पेज @RavishKaPage पर ज़ाहिर कर दिया था। altnews.in के प्रतीक सिन्हा और नीलेश पुरोहित की पड़ताल बताती है कि ग्रुप का सदस्य नीरज दवे राजकोट का रहने वाला है और एक एक्सपोर्ट कंपनी का प्रबंध निदेशक है। नीरज दवे को आप फोलो करते हैं। जब मैंने लिखा कि इतनी अभद्र भाषा का इस्तमाल मत कीजिए तो लिखता है कि मुझे दुख है कि तू अभी तक जीवित है।

व्हाट्स अप ग्रुप का एक और सदस्य निखिल दधीच के बारे में कितना कुछ लिखा गया। पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई तब निखिल दधीच ने उनके बारे में जो कहा, वो आप कभी पसंद नहीं करेंगे, ये और बात है कि आप उस शख़्स को अभी तक फोलो कर रहे हैं। अगर मेरी जानकारी सही है तो। हाल ही में बीजेपी के आई टी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ग़लत तरीके से एडिट की हुई मेरे भाषण का वीडियो शेयर किया था। इससे भ्रम फैला। altnews.in ने उसे भी उजागर किया मगर अमित मालवीय ने अफसोस तक प्रकट नहीं किया।

पर सर, मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि ये निखिल दधीच मेरे मोबाइल फोन में आ बैठा है। घोर सांप्रदायिक व्हाट्स अप ग्रुप का सदस्य है जिससे मुझे ज़बरन जोड़ा जाता है। जहां मेरे बारे में हिंसक शब्दों का इस्तमाल किया जाता है। वाकई मैंने नहीं सोचा था कि इस ग्रुप के सदस्यों के तार आप तक पहुंचेंगे। काश altnews.in की यह पड़ताल ग़लत हो। निखिल दधीच की तो आपके कई मंत्रियों के साथ तस्वीरें हैं।

यही नहीं ऊं धर्म रक्षति रक्षित: ग्रुप के कई एडमिन हैं। कई एडमिन के नाम RSS, RSS-2 रखे गए हैं। एक एडमिन का नाम आकाश सोनी है। भारत की दूसरी महिला रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण जी, स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा जी और दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी के साथ आकाश सोनी की तस्वीर है। तस्वीर किसी की भी किसी के साथ हो सकती है लेकिन यह तो किसी को धमकाने या सांप्रदायिक बातें करने का ग्रुप चलाता था। आपके बारे में कोई लिख देता है तो उसके व्हाट्स अप ग्रुप के एडमिन को गिरफ्तार कर लिया जाता है। मैंने ऐसी कई ख़बरें पढ़ी हैं।

क्या आकाश सोनी RSS का प्रमुख पदाधिकारी है? आकाश सोनी ने मेरे सहित अभिसार शर्मा, राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त के फोन नंबर को अपने पेज पर सार्वजनिक किया है। altnews.in की रिपोर्ट में यह बात बताई गई है।

पहले भी आपके नेतृत्व में चलने वाले संगठन के नेताओं ने मेरा नंबर सार्वजनिक किया है और धमकियां मिली हैं। मैं परेशान तो हुआ परंतु आपको पत्र लिखने नहीं बैठा। इस बार लिख रहा हूं क्योंकि मैं जानना चाहता हूं और आप भी पता करवाएं कि क्या इस व्हाट्स ग्रुप के लोग मेरी जान लेने की हद तक जा सकते हैं? क्या मेरी जान को ख़तरा है?
मैं एक सामान्य नागरिक हूं और अदना सा परंतु सजग पत्रकार हूं। जिसके बारे में आज कल हर दूसरा कहकर निकल जाता है कि जल्दी ही आपकी कृपा से सड़क पर आने वाला हूं। सोशल मीडिया पर पिछले दिनों इसका उत्सव भी मनाया गया कि अब मेरी नौकरी जाएगी। कइयों ने कहा और कहते हैं कि सरकार मेरे पीछे पड़ी है। हाल ही में हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक बॉबी घोष को आपकी नापसंदगी के कारण चलता कर दिया गया। इसकी ख़बर मैंने thewire.in में पढ़ी। कहते हैं कि अब मेरी बारी है। यह सब सुनकर हंसी तो आती है पर चिन्तित होता हूं। मुझे यकीन करने का जी नहीं करता कि भारत का एक सशक्त प्रधानमंत्री एक पत्रकार की नौकरी ले सकता है। तब लोग कहते हैं कि थोड़े दिनों की बात है, देख लेना, तुम्हारा इंतज़ाम हो गया है। ऐसा है क्या सर?

ऐसा होना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। परंतु ऐसा मत होने दीजिएगा। मेरे लिए नहीं, भारत के महान लोकतंत्र की शान के लिए वरना लोग कहेंगे कि अगर मेरी आवाज़ अलग भी है, तल्ख़ भी है तो भी क्या इस महान लोकतंत्र में मेरे लिए कोई जगह नहीं बची है? एक पत्रकार की नौकरी लेने का इंतज़ाम प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के स्तर से होगा? ऐसी अटकलों को मैं व्हाट्स अप ग्रुप में दी जाने वाली धमकियों से जोड़कर देखता हूं। अगर आप इन लोगों को फोलो नहीं करते तो मैं सही में यह पत्र नहीं लिखता।

मेरे पास अल्युमिनियम का एक बक्सा है जिसे लेकर दिल्ली आया था। इन 27 वर्षों में ईश्वर ने मुझे बहुत कुछ दिया मगर वो बक्सा आज भी है। मैं उस बक्से के साथ मोतिहारी लौट सकता हूं, लेकिन परिवार का दायित्व भी है। रोज़गार की चिन्ता किसे नहीं होती है। बड़े बड़े कलाकार सत्तर पचहत्तर साल के होकर विज्ञापन करते रहते हैं ताकि पैसे कमा सकें। जब इतने पैसे वालों को घर चलाने की चिन्ता होती है तो मैं कैसे उस चिन्ता से अलग हो सकता हूं। मुझे भी है।

आप मेरे बच्चों को तो सड़क पर नहीं देखना चाहेंगे। चाहेंगे ? मुझसे इतनी नफ़रत? मेरे बच्चे तब भी आपको दुआ देंगे। मुझे सड़क से प्यार है। मैं सड़क पर आकर भी सवाल करता रहूंगा। चंपारण आकर बापू ने यही तो मिसाल दी कि सत्ता कितनी बड़ी हो, जगह कितना भी अनजान हो, नैतिक बल से कोई भी उसके सामने खड़ा हो सकता है। मैं उस महान मिट्टी का छोटा सा अंश हूं।

मैं किसी को डराने के लिए सच नहीं बोलता। बापू कहते थे कि जिस सच में अहंकार आ जाए वो सच नहीं रह जाता। मैं ख़ुद को और अधिक विनम्र बनाने और अपने भीतर के अंतर्विरोधों को लेकर प्रायश्चित करने के लिए बोलता हूं। जब मैं बोल नहीं पाता, लिख नहीं पाता तब उस सच को लेकर जूझता रहता हूं। मैं अपनी तमाम कमज़ोरियों से आज़ाद होने के संघर्ष में ही वो बात कह देता हूं जिसे सुनकर लोग कहते हैं कि तुम्हें सरकार से डर नहीं लगता। मुझे अपनी कमज़ोरियों से डर लगता है। अपनी कमज़ोरियों से लड़ने के लिए ही बोलता हूं। लिखता हूं। कई बार हार जाता हूं। तब ख़ुद को यही दिलासा देता कि इस बार फेल हो गया, अगली बार पास होने की कोशिश करूंगा। सत्ता के सामने बोलना उस साहस का प्रदर्शन है जिसका अधिकार संविधान देता है और जिसके संरक्षक आप हैं।

मैं यह पत्र सार्वजनिक रूप से भी प्रकाशित कर रहा हूं और आपको डाक द्वारा भी भेज रहा हूं। अगर आप निखिल दधीज, नीरज दवे और आकाश सोनी को जानते हैं तो उनसे बस इतना पूछ लीजिए कि कहीं इनका या इनके किसी ग्रुप का मुझे मारने का प्लान तो नहीं है। altnews.in का लिंक भी संलग्न कर रहा हूं। पत्र लिखने के क्रम में अगर मैंने आपका अनादर किया हो, तो माफ़ी मांगना चाहूंगा।

आपका शुभचिंतक

रवीश कुमार

पत्रकार

एनडीटीवी इंडिया

रवीश कुमार का उपरोक्त पत्र फेसबुक पर लाखों की संख्या में शेयर, लाइक और कमेंट हासिल कर चुका है..

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क्या वाकई नरेंद्र मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया है?

Dilip Khan : हार्ड वर्क वाले अर्थशास्त्री मोदी जी जब सत्ता में आए तो इन्होंने आर्थिक सलाह परिषद को ख़त्म कर दिया। जब अर्थव्यवस्था की बैंड बजने लगी तो दो दिन पहले यूटर्न लेते हुए परिषद को फिर से बहाल कर दिया। अर्थशास्त्री नरेन्द्र मोदी ने आंकड़ों को ‘खुशनुमा’ बनाने के लिए GDP गणना के पुराने नियम ही ख़त्म कर दिए। लेकिन गणना के नए नियमों के मुताबिक़ भी GDP दर तीन साल के न्यूनतम पर आ गई है। पुराना नियम लागू करे तो 3% का आंकड़ा रह जाता है।

अनुपम खेर समेत कई सहिष्णु अर्थशास्त्रियों ने जब नोटबंदी का समर्थन किया तो मोदी-जेटली फूलकर कुप्पा हो गए। अब ख़ुद सरकारी एजेंसियां दावा कर रही है कि इससे अर्थव्यवस्था की कमर टूट गई है। अमित शाह भले ही ‘तकनीकी कारण’ का जुमला फेंके, देश का सबसे बड़ा बैंक SBI परेशान है। खुलेआम अपना दयनीय हाल बता रहा है। निर्यात गिर गया, विनिर्माण क्षेत्र बैठ गया, रोज़गार पांच साल के निचले स्तर पर है। लघु-मध्यम उद्योग वाले रो रहे हैं। छोटे कारोबारी खस्ताहाल हैं। जो नोटबंदी से रह गई थी, वो कसर जीएसटी ने पूरी कर दी।

RBI में लगभग 100% नोट जमा हो गए। इसका क्या मतलब निकाला जाएगा? अनुमान के मुताबिक़ देश में क़रीब 6% कालाधन कैश में था। ज़्यादातर बड़े नोटों में। अब, जब क़रीब-क़रीब सारा पैसा जमा होकर एक्सचेंज हो गया है तो ज़ाहिर है कि ये कालाधन वैध धन बन गया। यानी नोटबंदी ने बाक़ी नुकसानों के साथ-साथ सबसे बड़ा काम ये किया कि कालेधन को वैध बना दिया। जो चालाक थे, उन्होंने सेटिंग कर कई खातों में पैसे जमा करवाए, कई लोगों के मार्फ़त पैसे बदले। जो कच्चे थे, उन्होंने अपने खाते में पैसे डाल लिए। पैसे से यहां मेरा मतलब कालाधन से है। अब क्या हो रहा है? ऐसे कई लोग आयकर विभाग की निगरानी में हैं। आयकर इंस्पेक्टर इनसे मिलकर घूस खाकर ओके कर दे रहा है। यानी कालाधन तो सफ़ेद हुआ ही, भ्रष्टाचार भी बढ़ गया। और मोदी जी ने जो इंस्पेक्टर राज ख़त्म करने की बात कही थी, वो वादा अरब सागर में डूब गया।

इंस्पेक्टर राज को ख़त्म करने का जुमला फेंकने वाले प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के बाद आयकर इंस्पेक्टरों को सांढ़ बना दिया है। जिसके खाते में हेर-फेर है, सब आयकर अधिकारियों से सेटिंग कर रहे हैं। नोटबंदी से भ्रष्टाचार रोकने की बात कही गई थी, देख लीजिए बढ़ गया है। काला धन ख़त्म करने की बात कही गई थी। लगभग 100% पुराने नोट बैंक पहुंचकर अब वैध करेंसी बन गए हैं। मोदी जी, और डुबोइए देश को। काम पूरा नहीं हुआ है।

Chandan Srivastava : इंडियन एक्सप्रेस में आज यशवंत सिन्हा का जो आर्टिकल छपा है, वह पढ़ा जाना चाहिए। रोहिंग्या, बीएचयू, जेएनयू आदि तो ठीक है लेकिन अर्थव्यवस्था ही दम तोड़ देगी तो क्या बचेगा? अरूण जेटली को लेकर भाजपा का कोर वोटर कभी कम्फर्टेबल नहीं रहा। लेकिन उन्होंने मोदी को भाजपा का चेहरा बनने में सहयोग किया था, यही वजह है कि उनका हर पाप मोदी जी गले लगाने को तैयार हैं। लेकिन पापी को किसी भी प्रकार का समर्थन करने वाला और यहां तक कि उसके कृत्यों से नजरें फेर लेने वाला भी बराबर का पापी होता है। कुछ ऐसा ही कृष्ण ने गीता में भी कहा था जब अर्जुन भीष्म, द्रोण आदि के प्रति आसक्त हो रहे थे।

यशवंत सिन्हा से कांग्रेस जैसी पार्टियों को सीखना चाहिए कि आलोचना कैसे की जाती है। रोहिंग्या और भारत तेरे टुकड़े होंगे का समर्थन करके वे कभी मोदी से पार नहीं पा सकते। इतनी साधारण सी बात न जाने क्यों कांग्रेस के पल्ले नहीं पड़ रही। बहरहाल बात यशवंत सिन्हा के लेख की। पूर्व वित्त मंत्री लिखते हैं कि निजी निवेश में आज जितनी गिरावट है उतनी दो दशक में नहीं हुई। औद्योगिक उत्पादन का बुरा हाल है, कृषि क्षेत्र परेशानी में है, बड़ी संख्या में रोजगार देने वाला निर्माण उद्योग भी संकट में है। नोटबंदी फेल रही है, गलत तरीके से GST लागू किए जाने से आज कारोबारियों के बीच खौफ का माहौल है। लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं।

वह आगे लिखते हैं, पहली तिमाही में विकास दर गिरकर 5.7 पर पहुंच गई जो तीन साल में सबसे कम है। सरकार के प्रवक्ता कहते हैं कि नोटबंदी की वजह से मंदी नहीं आई, वो सही हैं क्योंकि इस मंदी की शुरुआत पहले हो गई थी। नोटबंदी ने सिर्फ आग में घी डालने का काम किया। आर्टिकल के अंत में वह एक पंच लाइन देते हैं, ‘pm claims dat he has seen poverty from close quarters. His fm is working over time to make sure dat all indians also see itfrom equally close quarters.’ माने- ‘प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि उन्होंने काफी करीब से गरीबी देखी है। अब उनके वित्त मंत्री यह सुनिश्चित करने के लिए ओवरटाइम कर रहे हैं कि देश का हर नागरिक भी करीब से गरीबी देखे।’

Vikas Mishra : 27 अप्रैल, 2012 को संसद में उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ये शेर पढ़ा था- ”मेरे जवाब से बेहतर है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रख ली।” उन दिनों यूपीए सरकार हर मोर्चे पर फेल हो रही थी। घोटाले पर घोटाले उजागर हो रहे थे, विपक्ष मनमोहन सिंह को बार-बार बोलने के लिए उकसा रहा था, उनकी चुप्पी पर सवाल उठ रहे थे, उन्हें ‘मौन’मोहन सिंह का खिताब दिया जा रहा था। फिर भी इस सरदार की चुप्पी नहीं टूटी। जब टूटी तो वही शेर पढ़ा, जो मैंने ऊपर लिखा है।
मनमोहन सिंह जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद देश में सबसे ज्यादा वक्त तक प्रधानमंत्री रहे। देश के सबसे ताकतवर पद पर रहे, लेकिन कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर सबसे ज्यादा बदनाम भी हुए। एक ऐसे प्रधानमंत्री, जिनकी खामोशी को विपक्ष ने चुनावों में मुद्दा तक बना लिया। पहली बार ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री कार्यालय को बाकायदा प्रेस कान्फ्रेंस करके बताना पड़ा कि प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने कितनी बार चुप्पी तोड़ी है।

मनमोहन सिंह न तो कभी राजनीति में रहे और न ही राजनीति से उनका कोई खास लेना-देना रहा। हालात की मजबूरियों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाया तो मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री का तमगा उनके नाम के आगे से बीजेपी ने कभी हटने नहीं दिया। दस साल की सत्ता में मनमोहन सिंह ने बहुत कुछ देखा। देश को विकास की राह पर चलते देखा तो अपनी ही सरकार को भ्रष्टाचार की गर्त में जाते देखा। कॉमनवेल्थ गेम में करोड़ों का वारा न्यारा करने वाला कलमाड़ी देखा तो किसी राजा का अरबों का टूजी घोटाला देखा। ‘कोयले’ की कालिख ने तो मनमोहन सिंह का भी दामन मैला कर दिया।

तो क्या भारत के राजनीतिक इतिहास में मनमोहन सिंह को सबसे मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर आंका जाएगा? क्या सबसे भ्रष्टाचारी सरकार चलाने वाले प्रधानमंत्री के तौर पर याद किए जाएंगे? क्या रिमोट कंट्रोल से चलने प्रधानमंत्री के तौर पर इतिहास याद करेगा मनमोहन सिंह को? ये सवाल मनमोहन सिंह को भी भीतर से चाल रहे थे। तभी तो सत्ता के आखिरी दिनों में उन्होंने कहा था-मुझे उम्मीद है कि इतिहास उदारता के साथ मेरा मूल्यांकन करेगा। मनमोहन में काबीलियत की कमी नहीं थी। उनकी ईमानदारी को लेकर कभी कोई सवाल नहीं उठा। उनके कमिटमेंट पर कोई सवाल नहीं उठा। मनमोहन सिंह, जो रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे, चंद्रशेखर ने जिन्हें प्रधानमंत्री बनने के बाद अपना वित्तीय सलाहकार बनाया। राजीव गांधी ने जिन्हें प्लानिंग कमीशन का उपाध्यक्ष बनाया, नरसिंह राव ने जिन्हें बुलाकर देश का वित्तमंत्री बनाया था।

दरअसल नरसिंह राव कुशल कप्तान थे, मनमोहन सिंह उनकी टीम के ‘सचिन तेंदुलकर थे’। वो 1991 का साल था, जब मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री बने थे। तब अर्थव्यवस्था गर्त में जा रही थी। देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आ चुकी थी। महंगाई चरम सीमा पर थी। मनमोहन ने जब आर्थिक सुधारों की छड़ी घुमाई तो कायापलट होने लगा। विपक्ष मनमोहन पर सवालों की बारिश कर रहा था, लेकिन मनमोहन के सिर पर छतरी ताने नरसिंह राव खड़े थे। मनमोहन सिंह ने विदेशी निवेश का रास्ता खोल दिया था। जिस तरह से आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खोल रहे हैं। नतीजा ये हुआ कि आर्थिक सुधार रंग लाने लगे। देश का गिरवी रखा सोना भी वापस आया। अर्थव्यवस्था भी पटरी पर लौटी। 1991-92 में जो जीडीपी ग्रोथ सिर्फ 1.3 थी, वो 1992-93 में 5.1 और 1994-95 तक 7.3 हो गई। उदारीकरण के चलते इन्फार्मेशन टेक्लनोलॉजी और टेलिकॉम सेक्टर में क्रांति हुई और उन दिनों इस क्षेत्र में करीब 1 करोड़ लोगों को रोजगार मिला। ये मनमोहन सिंह की बतौर खिलाड़ी जीत थी तो उससे बड़ी जीत नरसिंह राव की कप्तानी की भी थी।

2004 में मनमोहन सिंह जब खुद कप्तान (प्रधानमंत्री) बने तो पहले पांच साल उनकी सरकार बड़े मजे में चली। कई मोर्चे फतेह किए, सड़कें बनीं, अर्थव्यवस्था को पंख लगे, जीडीपी ग्रोथ 8.1 तक पहुंची। मनमोहन सरकार ने सूचना का अधिकार देकर जनता के हाथों में एक बहुत बड़ी ताकत थमाई। लालकृष्ण आडवाणी शेरवानी पहने खड़े रह गए, 2009 में देश की जनता ने फिर मनमोहन को सत्ता के सिंहासन पर बिठा दिया।ये मनमोहन सिंह के काम का इनाम था। लेकिन दूसरी पारी में मनमोहन न खुद संभल पाए और न सरकार संभाल पाए। बस रिमोट कंट्रोल पीएम बनकर रह गए।

यूपीए-1 में मनमोहन सिंह ने जितना कमाया था, यूपीए-2 में सब गंवा दिया। घोटालों की झड़ी लग गई, महंगाई आसमान छूने लगी। पाकिस्तानी सैनिक हमारे सैनिकों के सिर तक काट ले गए। चीन भारत की सीमा में कई बार घुस आया। मनमोहन सिंह की कई बार कांग्रेस के भीतर भी बेइज्जती हुई, लेकिन उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया, बाकायदा पद पर बने रहकर वफादारी की कीमत चुकाई। तमाम आरोपों का ठीकरा उनके सिर फोड़ा गया, वे खामोश रहे। ये मनमोहन सिंह की चुप्पी नहीं थी, वे चुपचाप सत्ता का ‘विष’ पी रहे थे। जुबान खोलते तो उनके ही आसपास के कई खद्दरधारी जेल में होते, चुप रहे, बहुतों की इज्जत बचा ली।

मनमोहन सिंह बद नहीं थे, लेकिन बदनाम ज्यादा हो गए। मनमोहन सिंह की जिंदगी नाकामियों और कामयाबियों की दास्तानों से भरी पड़ी है। इतिहास भी उन पर फैसला करने में हमेशा कश्मकश में रहेगा। उनकी आलोचना तो हो सकती है, लेकिन उन्हें नजरअंदाज करना उनके साथ बेईमानी होगी। वैसे बता दें कि आज पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जन्मदिन है।

तीन पत्रकारों दिलीप खान, चंदन श्रीवास्तव और विकास मिश्र की एफबी वॉल से. दिलीप खान राज्यसभा टीवी में लंबे समय तक कार्यरत रहे हैं. चंदन श्रीवास्तव लखनऊ में पहले पत्रकार थे और अब वकालत कर रहे हैं. विकास मिश्र आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर हैं.

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मोदी राज में भी महंगाई डायन बनी हुई है!

अजय कुमार, लखनऊ
2014 के लोकसभा चुनाव समय बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने तत्कालीन यूपीए की मनमोहन सरकार के खिलाफ मंहगाई को बड़ा मुद्दा बनाया था। चुनाव प्रचार के दौरान सबसे पहले हिमाचल प्रदेश की रैली में महंगाई का मुद्दा छेड़कर मोदी ने आम जनता की नब्ज टटोली थी। मंहगाई की मार झेल रही जनता को मोदी ने महंगाई के मोर्चे पर अच्छे दिन लाने का भरोसा दिलाया तो मतदाताओे ने मोदी की झोली वोटों से भर दी। आम चुनाव में दस वर्ष पुरानी यूपीए सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने में मंहगाई फैक्टर सबसे मोदी का सबसे कारगर ‘हथियार’ साबित हुआ था, लेकिन आज करीब साढ़े तीन वर्षो के बाद भी मंहगाई डायन ही बनी हुई है।

मंहगाई नियंत्रण करने की नाकामी मोदी सरकार पर भारी पड़ती जा रही है। ऐसा लगता है कि अब तो जनता ने भी यह मान लिया हैकि कम से कम मंहगाई के मोर्चे पर मोदी और मनमोहन सरकार में ज्यादा अंतर नहीं हैं। बस, फर्क है तो इतना भर कि मनमोहन सरकार की नाकामी का ढ़िढोरा बीजेपी वालों ने ढोल-नगाड़े के साथ पीटा था, जबकि कांग्रेस और विपक्ष मंहगाई को मुद्दा ही नहीं बना पा रहा है।

शायद यही वजह है, जनता के बीच अब मंहगाई पर चर्चा कम हो रही है। एक समय था जब प्याज या टमाटर के दाम में जरा सी भी वृद्धि होती थी तो बीजेपी वाले पूरे देश में हाहाकार मचा देते थे, लेकिन आज हमारे नेतागण और तमाम बुद्धिजीवी मोदी सरकार को घेरने के लिये मंहगाई को मुद्दा बनाने की बजाये साम्प्रदायिकता, विचारधारा की लड़ाई, राष्ट्रवाद की बहस में ही उलझे हुए हैं।

हाल ही में टमाटर सौ रूपये किलो तक बिक गया, मगर यह सरकार के खिलाफ मुद्दा नहीं बन पाया। इसी प्रकार आजकल प्याज भी गृहणियों को रूला रहा है। पिछले वर्ष दाल के भाव आसमान छूने लगे थे, उरद सहित कुछ अन्य दालें तो 200 रूपये किलो तक बिक गई। गरीब की थाली से दाल गायब हुई, मगर विपक्ष गरीबों का दर्द नहीं बांट सका।
इन दिनों सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्वीटर आदि पर एक पुरानी तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें दिखाया जा रहा है कि कांग्रेस के समय जब रसोई गैस के दाम बढ़ते थे तो किस तरह से बीजेपी के नेता अरुण जेटली एवं सुषमा स्वराज आदि धरने पर बैठ जातै थें।

अभी, रसोई गैस के दाम बढ़ते ही स्‍मृति ईरानी की पुरानी तस्वीर और ट्विट सोशल मीडिया पर वायरल होने लगी थी,जिसमें वह मनमोहन सरकार के समय एलपीजी सिलेंडर के दाम बढ़ने पर सिलेंडर को लेकर सड़क पर प्रदर्शन करती नजर आ रही हैं,लेकिन कांग्रेस की तरफ से ऐसा नजारा नहीं देखने को मिलता है।

बीते अगस्त महीने की बात है केंद्र की मोदी सरकार ने बिना सब्सिडी वाले एलपीजी गैस सिलेंडर के दाम में 86 रुपये की बढ़ोतरी कर दी थी। सरकार ने इसके पीछे अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में एलपीजी के दाम बढ़ना वजह बताया। जो बिना-सब्सिडी वाला एलपीजी सिलेंडर 466.50 रुपए का था। उसके बाद से छह किस्तों में यह 271 रुपए यानी 58 प्रतिशत महंगा हो चुका है। तेल कंपनियों ने सब्सिडीशुदा रसोई गैस सिलेंडर का दाम भी मामूली 13 पैसे बढ़ाकर 434.93 रुपए प्रति सिलेंडर कर दिया। इससे पहले इसमें 9 पैसे की वृद्धि की गई। दो मामूली वृद्धि से पहले सब्सिडीशुदा गैस के दाम आठ बार बढ़े हैं और हर बार करीब दो रुपए की इसमें वृद्धि की गई। मगर कहीं कोई हाय-तौबा नहीे हुई।

बात 2014 से आज तक बढ़ती मंहगाई की कि जाये तो 26 मई 2014 को एक किलो आटा देश के विभिन्न शहरों में 17 से 43 रुपये के बीच मिल जाता था जबकि मई 2017 में आटे की कीमत 19 से 50 रुपये प्रतिकिलो के बीच है। चावल के दाम 20 से 40 रुपये की जगह 18 से 47 रुपये प्रति किलो हैं। अरहर की दाल पहले 61 से 86 रुपये प्रति किलो पर मिल रही थी जबकि अब ये कीमत 60 से 145 रुपये के बीच है. बीच में ये 200 रु. प्रतिकिलो तक जा पहुंची थी। 31 से 50 रुपये के बीच मिलने वाली चीनी अब 34 से 56 रुपये प्रतिकिलो मिल रही है। दूध की कीमत 25 से 46 रुपये से बढ़कर 28 से 62 रुपये प्रति लीटर है. यानि खाने पीने की प्रमुख वस्तुओं की महंगाई कम होने के बजाय बढ़ गई है।

हालांकि महंगाई का सरकारी आंकड़ा मनमोहन सरकार के मुकाबले राहत भरा है। मई 2014 में खुदरा महंगाई दर जहां 8.2 प्रतिशत के आसपास थी तो अप्रैल 2017 का आंकड़ा 2.99 प्रतिशत रहा। इसी तरह खाने पीने की चीजों की खुदरा महंगाई दर 8.89 फीसदी से घटकर 0.61 पर आ गई। दिल्ली में सब्सिडी वाला रसोई गैस का सिलिंडर मई 2014 के 414 रुपये के मुकाबले अब 442.77 रुपये में मिल रहा है। जबकि डीजल और पेट्रोल के दामों में अंतर नहीं आया है, लेकिन विरोधियों की दलील है कि दुनिया के बाजार में तेल-डीजल बनाने का कच्चा माल पहले की अपेक्षा जितना सस्ता हुआ है मोदी सरकार उस अनुपात में पेट्रोल डीजल सस्ता नहीं कर रही है।

अगस्त में खुदरा महंगाई दर भी थोक महंगाई दर की तरह चार महीने की ऊंचाई पर पहुंच गई। अगस्त में थोक महंगाई की दर जुलाई के 1.88 फीसद से बढ़कर 3.24 फीसदी के स्तर पर पहुंच गयी। अगस्त 2016 में थोक महंगाई सूचकांक में 1.09 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई थी। अगस्त में थोक महंगाई में आई इस तेजी की वजह खाद्य पदार्थो और ईंधन की कीमतों में आई तेजी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई में और इजाफा हो सकता है, ऐसे में ब्याज दरों में कटौती के लिए अभी इंतजार करना पड़ सकता है। थोक महंगाई सूचकांक में आई तेजी की सबसे बड़ी वजह सब्जियों के दामों में हुई बढ़ोतरी रही है। जुलाई में सब्जियों की महंगाई दर्शाने वाले सूचकांक में 21.95 फीसद की वृद्धि हुई थी। लेकिन अगस्त में यह वृद्धि 44.91 फीसद के स्तर पर पहुंच गयी। इसके पीछे बड़ी वजह प्याज की कीमतों में आई तेजी रही।

प्याज की कीमत अगस्त महीने में 88.46 फीसद की दर से बढ़ी जो जुलाई में 9.50 फीसद के स्तर पर थी। इसके अलावा फल, सब्जियों, मीट, मछली की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ईधन जनित महंगाई भी अगस्त में दोगुनी हो गई। जुलाई में फ्यूल एंड पावर सेगमेंट में महंगाई दर 9.99 फीसद रही जो जुलाई 1016 में 4.37 फीसद पर थी। पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ रहीं कीमतें और पावर टैरिफ में की गई बढ़ोतरी ही फ्यूल एंड पावर सेगमेंट में आई तेजी का असली कारण है।

लेखक अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क ajaimayanews@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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मोदी और जेटली के ‘कुशल’ नेतृत्व के कारण विनिर्माण क्षेत्र भयंकर मंदी का शिकार!

Ashwini Kumar Srivastava : आठ साल पहले…यानी जब दुनियाभर में मंदी के कारण आर्थिक तबाही मची थी और भारत भी मनमोहन सिंह के नेतृत्व में वैश्विक मंदी से जूझ रहा था… हालांकि उस मंदी में कई देश रसातल में पहुंच गए थे लेकिन भारत बड़ी मजबूती से न सिर्फ बाहर आया था बल्कि दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में अमेरिका और चीन से लोहा लेने लगा….

मगर आज यह विनिर्माण क्षेत्र वापस उस वैश्विक मंदी वाले रसातल में कैसे पहुंच गया? आज तो दुनिया में कहीं मंदी भी नहीं है…फिर मोदी जी के कुशल नेतृत्व और अरुण जेटली जैसे मेधावी वित्त मंत्री के निर्देशन में भारत की अर्थव्यवस्था तो अमेरिका और चीन को भी पीछे छोड़ने की तैयारी कर रही है।

हो न हो, ये आंकड़े ही गलत हैं। सब साले मोदी के दुश्मन, मुस्लिमपरस्त और राष्ट्रद्रोही हैं। इन फर्जी आंकड़ों को आज के अखबार में छाप कर वे यह समझ रहे हैं कि मैं मोदी या जेटली पर संदेह करूँगा? मूर्ख हैं ऐसे लोग।

खुद मोदी के सबसे बड़े आर्थिक सूरमा पनगढ़िया भले ही मोदी और जेटली के डूबते हुए आर्थिक जहाज से भाग खड़े हुए हों लेकिन मैं किसी भी हालत में मोदी का समर्थन करना नहीं छोडूंगा। कभी सपने में भी मोदी के किसी फैसले पर उंगली नहीं उठाऊंगा।

दुनिया भले ही इस तरह के आंकड़े देकर हमें भारत की आर्थिक बदहाली का डर दिखाती रहे, मैं तो वही देखूंगा, सुनूंगा और मानूँगा, जो मोदी चाहते हैं।

हटा दो इस तरह की सारी नकारात्मक खबरें मेरे सामने से। मुझे तो वह खबर दिखाओ, जिसमें लिखा हुआ है कि महाराणा प्रताप ने अकबर को हरा दिया था, डोभाल ने पाकिस्तान को घुटने टिकवा दिए थे और चीन हमारी ताकत से थर थर कांप रहा है…

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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मोदी जी! कब सुनोगे ‘बेरोजगारों’ के मन की बात

बेरोजगारों को रोजगार का सपना दिखाकर भारी बहुमत से सत्ता में आये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अच्छे दिन के वादे शिक्षित बेरोजगारों के लिये शेखचिल्ली के ख्वाब साबित हुए हैं। चपरासी की 5 पास नौकरी के लिये जहां एमबीए, बीटेक, एमटेक, ग्रेजुएट युवा लाइनों में लगे हुए हैं वहीं दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी रिपोर्ट में मोदी सरकार को तो कटघरे में खड़ा ही किया गया है बल्कि भारत में बढ़ती बेरोजगारों की संख्या ने भी भयावह कहानी बयां की है। जो आने वाले दिनों में बड़े विवादों का कारण बन सकती है।

पिछले दिनों मोदी की बीजेपी सरकार को आए तीन साल पूरे हो गए हैं, लेकिन मोदी के वादे अभी भी अधूरे पड़े हैं। मोदी ने सरकार बनने से पहले युवाओं से वादा किया था कि जैसे ही उनकी सरकार आती है, वे सबसे पहले देश के 1 करोड़ युवाओं को नौकरी देने का काम करेंगे, लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद अभी भी देश में करोड़ों की संख्या में युवा बेरोजगार बैठे है। बेरोजगारों का सपना था कि अगर मोदी जी की सरकार बनी तो उनके अच्छे दिन आ जायेंगे और उन्होंने मोदी जी की रैलियांे में तो जय-जयकार की ही बल्कि गांव की गलियों से लेकर महानगरों तक घूम-घूमकर मोदी के पक्ष में जमकर वोटिंग भी कराई। उस समय युवाओं में मोदी के प्रति जो जोश और जुनून था वह सरकार बनने के बाद ठण्डा होता नजर आ रहा है। बल्कि सरकार के प्रति आक्रोश की झलक भी दिखाई दे रही है, जो कभी भी लावा के रूप में उभर सकती है। आखिर हो भी क्यों ना, जब आज तीन साल बाद भी ना तो बेरोजगारों के चेहरों पर चमक दिखाई दे रही है और न ही उनके सपने साकार होते नजर आ रहे हैं।

कहने को तो आजादी के बाद ही रोजगार की गंभीर समस्या रही है लेकिन 1991 से 2013 के बीच भारत में करीब 30 करोड़ लोगों को नौकरी की जरूरत थी. इस दौरान केवल 14 करोड़ लोगों को रोजगार मिल सका। बेरोजगारों की बढ़ती संख्या और उनके आक्रोश को देखते हुए मोदी जी ने अच्छे दिनों का सपना दिखाकर उनका दिल तो जीता ही बल्कि प्रधानमंत्री की कुर्सी भी हासिल कर ली। मोदी सरकार ने युवाओं के सपनों को साकार करने के लिये स्किल इंडिया के तहत 2 अक्टूबर 2016 को प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना एक और दो शुरू की। जिसके माध्यम से 2016 से लेकर 2020 तक यानी चार साल में 20 लाख लोगों को ट्रेनिंग दी जानी है, का पूरे देश में संचालन किया जा रहा है। लेकिन यह योजना जमीन पर कम कागजों पर ज्यादा दौड़ रही है। जिसमें एक तरफ सरकार ने हर साल 5 लाख युवाओं को ट्रेनिंग देने का दावा कर रही है वहीं पिछले दिनों आयी एक मीडिया रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि 29 जून 2017 तक प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना दो के तहत एक लाख 70,000 लोगों को ट्रेनिंग दी गई है। जबकि इस योजना के तहत हर साल पांच लाख लोगों को ट्रेनिंग दी जानी थी यानी इस साल यह योजना काफी पीछे चल रही है।

छः जून की प्रेस काॅन्फ्रेंस में कौशल विकास मंत्री राजीव प्रताप रूडी ने कहा था कि जुलाई 2015 में लॉन्च हुई प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना एक के तहत साढ़े छब्बीस लाख लोगों को ट्रेनिंग दी चुकी है, जबकि कौशल विकास मंत्रालय की वेबसाइट पर लिखा है कि इस योजना के तहत करीब-करीब 20 लाख लोगों को ट्रेनिंग दी जा चुकी है। लेकिन इस रिपोर्ट में मंत्री और मंत्रालय के बयान में साढ़े छह लाख काअंतर साफ नजर आता है। कौशल विकास योजना से जुड़े प्रशिक्षिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता दीपक गोस्वामी कहते हैं कि भारत सरकार प्रशिक्षण के नाम पर एनजीओ को 16 हजार रुपये का भुगतान कर रही है। जिसमें सांसद द्वारा सर्टिफिकेट के माध्यम से बेरोजगारों को शिक्षित करने का दावा किया जा रहा है। जबकि जमीनी धरातल पर इस योजना में बड़े पैमाने पर घोटाला और भ्रष्टाचार हो रहा है। जिससे बेरोजगारों के लिए यह योजना मात्र छलावा साबित हो रही है और एनजीओ मालामाल हो रहे हैं। जबकि भारतीय मजदूर संघ के मुताबिक नोटबंदी की वजह से 20 लाख नौकरियां चली गईं।

एक ओर प्रधानमंत्री मोदी देश और युवाओं की तकदीर बदलने का दावा कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की रिपोर्ट उनके दावांे और भाषणों को ही कटघरे में खड़ा कर रही है। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2017 और 2018 के बीच भारत में बेरोजगारी में इजाफा होने के पूरे आसार हैं। नया रोजगार भी पैदा होने में कई अड़चनें आ सकती है। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि पिछले साल के 1.77 करोड़ बेरोजगारों की तुलना में 2017 में भारत में बेरोजगारों की संख्या 1.78 करोड़ और उसके अगले साल 1.8 करोड़ हो सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक बेरोजगारी दर और स्तर अल्पकालिक तौर पर उच्च बने रह सकते हैं क्योंकि वैश्विक श्रम बल में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। विशेषकर वैश्विक बेरोजगारी दर में 2016 के 5.7 प्रतिशत की तुलना में 2017 में 5.8 प्रतिशत की मामूली बढ़त की संभावना है।

आईएलओ के महानिदेशक गाइ राइडर के मुताबिक इस वक्त हमलोग वैश्विक अर्थव्यवस्था के कारण उत्पन्न क्षति एवं सामाजिक संकट में सुधार लाने और हर साल श्रम बाजार में आने वाले लाखों नवआगंतुकों के लिए गुणवत्तापूर्ण नौकरियों के निर्माण की दोहरी चुनौती का सामना कर रहे हैं। आईएलओ के वरिष्ठ अर्थशास्त्री और रिपोर्ट के मुख्य लेखक स्टीवेन टॉबिन ने कहा कि उभरते देशों में हर दो कामगारों में से एक जबकि विकासशील देशों में हर पांच में से चार कामगारों को रोजगार की बेहतर स्थितियों की आवश्यकता है।
मोदी सरकार के तीन साल से अधिक के कार्यकाल में तमाम योजनाओं की घोषणाएं की गईं लेकिन जमीनी धरातल पर कोई भी एक योजना साकार रूप लेती नजर नहीं आ रही है। जिसमें उच्च शिक्षित बेरोजगार सफाई कर्मचारी, चपरासी, होमगार्ड, चैकीदार, सिपाही, कांस्टेबल जैसे पदों के लिये आवेदन कर बेरोजगारी का खौफनाक सच उजागर कर रहे हैं।

लेखक मफतलाल अग्रवाल मथुरा के वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं। संपर्क : 08865808521 , mafatlalmathura@gmail.com

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हिंदू और यहूदी सभ्यताओं ने अपने काम से काम रखने की बहुत कीमत चुकाई है!

Rajeev Mishra : प्रधानमंत्री की इजराइल यात्रा एक सरकारी दौरा नहीं है…एक राष्ट्र प्रमुख की दूसरे राष्ट्राध्यक्ष से मुलाक़ात भर नहीं है…यह दो प्राचीन सभ्यताओं का मिलन है… दो सभ्यताएं जिनमें बहुत कुछ कॉमन है…एक समय, इस्लाम की आपदा से पहले दोनों की सीमाएं मिलती थीं, पर दोनों में किसी तरह के टकराव की कहानी हमने नहीं सुनी. दोनों में से किसी को भी किसी और को अपने धर्म में शामिल करने की, अपने धर्म प्रचार की, मार्केटिंग की खुजली नहीं थी…

पर इतिहास में दोनों ने कुछ कॉमन गलतियाँ भी की हैं…सबसे बड़ी गलती की है; अपने काम से काम रखा है…हमने अपनी रोजी रोटी कमाने पर ध्यान दिया है…अपने बच्चे पाले हैं, अपने खेत जोते हैं, अपनी फसल काटी है, अपना सौदा बेचा खरीदा है. हिंदुओं और यहूदियों, दोनों सभ्यताओं ने विज्ञान, कला और संस्कृति को बहुमूल्य योगदान दिया है…पर दोनों में किसी को भी दुनिया जीतने का शौक कभी नहीं चढ़ा. दोनों के लिए धर्म का मतलब रहा, अपनी आत्मा का उत्थान…अपने बच्चों के संस्कार….

पर मानें या ना मानें, दोनों सभ्यताओं ने अपने काम से काम रखने की बहुत कीमत चुकाई है. दोनों को अपने घर में घुसे आ रहे आक्रांताओं को झेलना पड़ा है. यहूदियों को डेढ़ हजार साल तक बिना घर के रहना पड़ा है. लेकिन दुनिया भर में फैले यहूदियों ने कभी कोई शिकायत नहीं की. जहाँ रहे, कुछ दिया ही है. कोई आतंकवादी नहीं बना…किसी ने बदला लेने की नहीं सोची…किसी ने कड़वाहट और घृणा नहीं बाँटी… लेकिन हमेशा सबकी घृणा का शिकार हुए.

कुछ ऐसे ही आज हिन्दू हैं, पूरी दुनिया में फैले हुए…अपने काम से काम रखने वाले, अपने बच्चों को स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी भेजने वाले, उन्हें डॉक्टर-इंजीनियर-अकाउंटेंट बनाने के फिक्रमंद…दुनिया से बेखबर…अपने हाथ से अपना देश निकलता जा रहा है…कोई बात नहीं, कहीं भी रोटी कमा लेंगे… पर एक दिन यहूदियों की नींद खुली, जब उन्होंने अपने आप को कंसंट्रेशन कैम्प्स में पाया…अपने बिस्तर पर सोये थे, गैस चैंबरों में जागे…लाखों जीवन गँवाने के बाद एक सबक सीखा…अपना एक देश बनाने के लिए लड़े, जीते, जिये…

आज हिन्दू अपने ऐतिहासिक गंतव्य पर यहूदियों से सिर्फ कुछ पीढ़ी पीछे-पीछे चल रहे हैं. जो खो रहा है उसकी समझ नहीं है. जो आने वाला है उसकी खबर नहीं है. अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में उलझे हैं. 70 साल बाद देश ने हिन्दू जनमत वाला एक नेतृत्व चुना है. उसे भी अपने इस ऐतिहासिक दायित्व का बोध है कि नहीं पता नहीं…सड़क, बिजली-पानी, नोट बदलने और टैक्स के गणित में उलझे हैं. पूरा देश, पूरी सभ्यता ही इसी गणित में उलझी है…

नानी पालकीवाला का एक लेख पढ़ा था इजराइल के बारे में. लिखते हैं…भारत और इजराइल को एक दूसरे से बहुत कुछ सीखना है….भारत को इजराइल से सीखना है कि एक गणतंत्र को कैसे चलाना चाहिए…इजराइल को भारत से सीखना है कि एक गणतंत्र को कैसे “नहीं” चलाना चाहिए…

मोदी जी इजराइल जाएंगे, यह एक ऐतिहासिक क्षण है. 70 सालों में किसी भी भारतीय नेता को यह नहीं सूझा…अब जब वो गए हैं तो सवाल उठता है कि वे वहाँ से क्या लेकर आएंगे. सिर्फ मेक इन इंडिया के एमओयू, रक्षा समझौते, नई तकनीक ले कर आएंगे…या वो सबक भी लेकर आएंगे जो यहूदियों ने औस्विज़ के गैस चैंबरों में सीखा था…

लंदन में मेडिकल फील्ड में कार्यरत राजीव मिश्रा की एफबी वॉल से.

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पेट्रोल-डीजल को जीएसटी से बाहर रखने की मोदी की दोगली नीति पर भाजपाई चुप क्यों हैं?

Yashwant Singh : ये तो सरासर मोदी की दोगली नीती है. देश को एक कर ढांचे में लाने की वकालत करने वाले मोदी आखिर पेट्रोल डीजल को जीएसटी से क्यों बाहर रखे हुए हैं. ये तर्क बेमानी है कि राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल से भारी टैक्स से काफी पैसा पाती हैं, जिसे वह खोना नहीं चाहतीं.

भाजपा की केंद्र सरकार और भाजपा की राज्य सरकारें अगर अपना अपना हिस्सा खत्म करते हुए पेट्रोल डीजल को जीएसटी के दायरे में ले आएं तो जनता को भारी राहत मिलती. पर ऐसा नहीं करेंगे ये लोग क्योंकि थोक में फायदा तो ये बड़े लोगों को देते हैं. माल्य से लेकर अडानी तक. अंबानी से लेकर टाटा-बिड़ला तक. पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने से इनका दाम आधा हो जाता. यही कारण है कि केंद्र सरकार इसे तो जीएसटी से बाहर रखे हुए है ताकि इससे भारी मात्रा में जनता से पैसा वसूला जाता रहे और बाकी सामान को जीएसटी में लाकर महंगाई बढ़ाने की कवायद कर रहे हैं.

नारा दे रहे हैं एक देश और एक कर का. लेकिन ये नारा बेकार साबित हो जाता है पेट्रो प्रोडक्ट्स को जीएसटी से बार रखने के फैसले से. आजकल ह्वाट्सअप पर ये वाला मैसेज खूब भेजा जा रहा है, आप भी पढिए-

Why petrol and diesel prices are not brought under GST. Now for petrol and diesel the central exise duty is 23% and state VAT is 34%. Total tax is 57%. If these essential products are brought under GST , the maximum tax will be only 28%, which means the prices of petrol and diesel can come down by almost 50%. The public at large will be benefited.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. इस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं–

Harshendra Singh Verdhan : Dada, It’s somehow difficult in Fertiliser sector too..18% for processed complex on raw materials & 12% on Imported. So; nothing for homemade indigenous Fertilisers. An easy way to Chinese poor quality fertilisers.

Care Naman : यदि जीएसटी सब पर तो पेट्रोल और दारु दोनों पर भी लागू करें… ये तो वही हुआ कड़ुआ कड़ुआ थू थू… मीठा मीठा गप गप…

Vijayshankar Chaturvedi : Larger public interest will not be bothering to them until 2019.

Divakar Singh : State governments opposed centre’s move to bring petroleum under gst. As you mentioned, state govts earn huge money from it, so they don’t want to bring it under gst. Centre wants to bring everything under gst. So we should ask respective state govts.

Yashwant Singh : जो बुरा है, वो दूसरों का है। जो अच्छा है, वो सब मेरा है। 🙂

Divakar Singh : बुरा भी अपना हो सकता है, पर इस केस में नही है। बेचारे जेटली जी बहस करते रह गए पर कोई राज्य तैयार नही हुआ पेट्रो उत्पादों के लिए gst लागू करने के लिए। ऐसे में केंद्र सरकार को दोषी बताना तथ्यात्मक नही है। देखें इस लिंक को : Petroleum products to be under GST if states agree: Minister

Yashwant Singh सेंटर को अपना हिस्सा छोड़ देना चाहिए था ताकि मोदी जी की नीयत तो साफ सही दिखती. साथ ही जिन स्टेट्स में बीजेपी है, वहां भी हटवा सकती थी. इसके बाद बीजेपी के लोग गैर बीजेपी राज्यों की सरकारों को एक्सपोज कर सकते थे. पर ऐसा नहीं, क्योंकि पेट्रोल डीजल बहुत ज्यादा सस्ता हो जाने से गरीबों को फायदा होता, महंगाई कम होती. बड़े उद्यमी घरानों को लाभ पहुंचाने वाले मोदी भला बल्क में यानि थोक में गरीबों को राहत कैसे दे सकते थे.

Rajeev Verma : पेट्रोल डीजल यदि gst के दायरे में कर देते तो input credit देने में सरकार का धुंआ निकल जाता. चीजें आश्चर्य जनक रूप से सस्ती हो जातीं.

Rajeev Pandey : Modi dhongi pakhandi hai uske maalik Ambani ki kamayi kam ho jayega jo Modiya kabhi nahi chahta.

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मोदी सरकार पर राजस्थान पत्रिका समूह के मालिक गुलाब कोठारी का हमला- ”झूठ बोलने के लिए मीडिया को खरीदने का काम चल रहा है”

राजस्थान पत्रिका समूह के मालिक गुलाब कोठारी ने मोदी सरकार पर हमला बोल दिया है. उन्होंने आरोप लगाया कि झूठ बोलने के लिए मीडिया और लोगों को खरीदने का काम चल रहा हैं. गुलाब कोठारी ने ये बात मुंबई में 14वें अंतरराष्ट्रीय कंसर्न्ड कम्यूनिकेटर अवॉर्ड (सीसीए) समारोह में कही. पत्रिका समूह को सामाजिक सरोकार के श्रेष्ठ रचनात्मक विज्ञापनों के लिए इस समारोह में पुरस्कृत किया गया. कोठारी ने कहा कि आजादी को 70 साल हो गए हैं लेकिन हम आज भी सच को सुनना ही नहीं चाहते हैं. सरकार मीडिया हाउस को शॉर्टलिस्ट कर जनता तक झूठी बातें पहुंचा रही है. झूठ को सच बताकर रखने की कोशिश में लोगों को दिग्भ्रमित किया जा रहा है. क्योंकि यदि झूठ को सौ बार बोला जाए तो वह सच मान लिया जाता है और आज यही हो रहा है.

सरकार व मीडिया को आईना दिखाते हुए कोठारी ने कहा कि आज अभिव्यक्ति की आजादी पर अतिक्रमण हो रहा है. आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है. जिसे हमने लोकतंत्र व जनता के बीच सेतु माना था, वही मीडिया आज कहां है? कुछ मीडिया समूहों ने आज जनता का पाला छोड़ दिया है और सरकार के साथ जाकर बैठ गए हैं. यह सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में हो रहा है. सोशल मीडिया का अवतार ही झूठ बोलने के लिए हुआ है, क्योंकि कौन आधिकारिक तौर पर कह रहा है और क्या सही है, इसका पता ही नहीं चल पाता. पत्रिका के साथ ऐसा करने की कोशिश की गई, लेकिन हमने ऐसा नहीं होने दिया. हम सुप्रीम कोर्ट तक भी गए. मीडिया लोकतंत्र का वॉचडॉग नहीं दिखाई दे रहा है. जनता की सोचने वाला कौन बचा है?

देश में किसान आंदोलनों पर पीड़ा जताते हुए कोठारी ने कहा कि आज इन आंदोलनों को ताकत के साथ ढहाया जा रहा है, जो देशहित में नहीं है. सभी को नोटबंदी को लेकर समस्या हुई, लेकिन हम नोटबंदी के बाद के हालात पर चर्चा नहीं करना चाहते हैं. सरकार की नई भर्तियां बंद हो गई हैं, वहीं कई लघु उद्योगों के उजड़ जाने से बड़ी संख्या में बेरोजगारी भी बढ़ी है. न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख का हवाला देते हुए कोठारी ने कहा कि वैश्विक स्तर पर तानाशाह सरकारों का दौर है. ऐसे में सिर्फ अपना प्रोपेगंडा मीडिया के माध्यम से चलाया जा रहा है. ऐसे में विपक्ष को कुछ जिंदा रखने की कोशिश की जाती है, जिससे लोकतंत्र का भ्रम बना रहे. ऐसे हालात में नई पीढ़ी को कफन बांधकर आगे आना चाहिए कि जो आजादी हमें संविधान ने दी है वह बची रहे.

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किसानों की वायरल हुई ये दो तस्वीरें ‘मोदी गान’ में रत टीवी और अखबार वालों को न दिखेंगी न छपेंगी

Mahendra Mishra : ये तमिलनाडु के किसान हैं। दक्षिण भारत से दिल्ली पीएम मोदी के सामने अपनी फरियाद लेकर आये हैं। इनमें ज्यादातर के हाथों में ख़ुदकुशी कर चुके किसानों की खोपड़ियां हैं। बाकी ने हाथ में भीख का कटोरा ले रखा है। पुरुष नंगे बदन हैं और महिलाओं ने केवल पेटीकोट पहना हुआ है। इसके जरिये ये अपनी माली हालत बयान करना चाहते हैं। इन किसानों के इलाकों में 140 वर्षों बाद सबसे बड़ा सूखा पड़ा है।

ये किसान चाहते हैं कि उन्हें सूखे में खराब हुई फसलों का मुआवजा मिले। साथ ही उनके कर्जे माफ़ कर दिए जाएं। और बुजुर्गों के लिए सरकार पेंशन की व्यवस्था करे। पीएम आवास की तरफ मार्च कर रहे इन किसानों को पुलिस ने रास्ते में ही रोक दिया। और फिर इन्हें जंतर-मंतर पर लाकर पटक दिया। इनका कहना है कि अब ये लौटकर जाने से रहे। क्योंकि इनके पास वहां खाने के लिए कुछ नहीं बचा है। भले उन्हें यहां भीख ही क्यों न मांगनी पड़े ये यहीं रहेंगे।

देश के लोगों का पेट भरने वाले किसान के हाथ में अगर भीख का कटोरा आ गया है। तो यह समझ पाना मुश्किल नहीं है कि हालात किस कदर बदतर हो गए हैं। ऊपर से अपनी बदहाली दिखाने के लिए अगर उसे अपने परिजनों की कब्रें खोदकर उनकी खोपड़ियां हाथ में लेनी पड़े तो समझिए सरकारी संवेदना पाताल के किस हिस्से में पहुंच गई है। कहां तो हम दुनिया की महाशक्ति बनने जा रहे हैं। लेकिन सामाने की हकीकत है कि उसे देखना ही नहीं चाहते। या फिर देखकर भी अनदेखा कर देना चाहते हैं।

महेंद्र मिश्रा सहारा समय, न्यूज एक्सप्रेस समेत कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं.


Satyendra PS : ये​ हरियाणा के किसान हैं,खेतों के लिए पानी मांग रहे थे। नहर का काम पूरा कराए जाने का वादा था वही पूरा कराना चाहते थे ! इस चेहरे में अपना चेहरा देखें, पिता, चाचा, भाई का चेहरा देखें। उन सबका चेहरा देखें जो सरकार से कुछ उम्मीद करते हैं, जो सरकार से कुछ छोटी मोटी सुविधाओं की उम्मीद करते हैं। लोकतंत्र लहूलुहान है। अपने रक्त में नहाया यह देश का किसान है!

सत्येंद्र प्रताप सिंह बिजनेस स्टैंडर्ड हिंदी अखबार के दिल्ली एडिशन में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.


उपरोक्त तस्वीरों पर कुछ टिप्पणियां…

Anil Mishra पानी मांग रहे थे तो सिर्फ लाठी खाये। अगर सरकार इनकी जमीन मांगती तो गोली खाते। इसमें कांग्रेस बीजेपी सपा बसपा का कोई लेना देना नहीं। यही परम्परा है। लोकतंत्र धोखा है। असल लड़ाई पूँजीवाद वर्सेस सर्वहारा है। गरीब को मार ही खाना है। सरकार किसी की भी हो।

Mahendra K. Singh लोग इस समय “राष्ट्रवाद” की अफीम खाकर मस्त हैं, वे इस तस्वीर में अपने पिता, चाचा, भाई का चेहरा तब तक नहीं देख पाएंगे जब तक उन के चाचा, पिता, भाई खुद इस जुल्म का शिकार न हो जाएँ। वैसे राष्ट्रभक्तों का यह मानना है कि खेती बारी आम लोगों के बस की बात नहीं है, इन लोगों को अपने खेत “राष्ट्रभक्त कॉर्पोरेट” जैसे अम्बानी और अडानियों को सौंप देने चाहिए, वे सेठ लोग फिर इन्ही गरीब लोगों को अपना मज़दूर बना कर उन्ही के खेतों में खेती करवाएंगे, फिर नफे-नुक्सान की कोई चिंता नहीं रह जायेगी, इन सब लोगों को एक निश्चित तनख्वाहें मिलेंगी और फिर सब खुश। अमेरिका में बड़ी-बड़ी कंपनियों ने यही किया, छोटे-छोटे किसानों के खेत खरीद लिए अब उन पर बड़े पैमाने पर खेती करवाते हैं – जैसे चिप्स बनाने वाली कंपनियां लाखों एकड़ बड़े खेतों में आलू के खेती, ब्रेड बनाने वाली कंपनियां ऐसे ही मीलों तक फैले खेतों में गेहूं की खेती। वही मॉडल भारत में लाकर मोदी जी देश का विकास करना चाहते हैं और इस किसान जैसे कुछ “राष्ट्रद्रोही” मोदी की योजना पर पानी फेरना चाहते हैं – कपार तो फूटना ही चाहिए ऐसे “राष्ट्रद्रोहियों” का।

Shaukat Ali Chechi मैं तहे दिल से लानत भेजता हूं ऐसी सरकारों पर अगर इस देश में ईमानदार है खून पसीने की खाता है गरीब है 70 परसेंट देश को चला रहा है देश की सरहदों की रक्षा करने में सबसे ज्यादा योगदान दे रहा है जिनको सरकार के मंत्री कायर कहते हैं वह है किसान हमारे पूर्वजों ने नारा दिया था जय जवान जय किसान आज उनकी यह हालत उनकी दुर्गति उनका अपमान जो देश का भी पेट भरता है पशु पक्षियों का भी पेट भरता है उसके पैदा करे हुए माल से देश की पहचान व तरक्की है आखिर इनका कौन सा गुनाह है कोई देशवासी तो बताएं

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पीएम मोदी के घर पर एसपीजी की महिलाएं रात में ड्यूटी क्यों नहीं करना चाहतीं?

Sanjaya Kumar Singh : प्रधानमंत्री के घर और निजता से संबंधित ये कैसी खबर? इस बार के “शुक्रवार” (24 फरवरी – 02 मार्च 2017) मैग्जीन में एक गंभीर खबर है। पहले पेज पर प्रमुखता से प्रकाशित इस खबर का शीर्षक है, “फिर विवादों में घिरी एसपीजी” लेकिन यह प्रधानमंत्री निवास से संबंधित विवाद खड़ा कर रही है। खबर के मुताबिक एसपीजी की महिला सुरक्षा कर्मियों ने अपने आला अफसरों से गुहार लगाई है कि उन्हें रात की ड्यूटी पर न रखा जाए।

यहां यह गौरतलब है कि प्रधानमंत्री के घर में परिवार की कोई महिला सदस्य नहीं रहती है। आम जानकारी यही है कि प्रधानमंत्री अपने घर पर अकेले रहते हैं। ऐसे में भारतीय संस्कारों के लिहाज से महिला सुरक्षा कर्मियों की रात की ड्यूटी लगनी ही नहीं चाहिए। उन्हें अधिकारियों से गुहार लगाने की आवश्यकता ही क्यों पड़े? यही नहीं, खबर में आगे कहा गया है, “माना जा रहा है कि वे किसी विवाद का साक्षी बनना नहीं चाहती हैं।” यह और गंभीर है।

खबर में (टाइपिंग की कुछ गड़बड़ी है) कहा गया है कि एसपीजी के तत्कालीन निदेशक दुर्गा प्रसाद को हटा दिया गया था। हटाने की कोई वजह नहीं बताई गई थी। हालांकि जिस तरह से यह कार्रवाई की गई थी उसमें तमाम अटकलों को बल मिला था। इनमें एक अटकल यह भी थी कि दुर्गा प्रसाद चाहते थे कि प्रधानमंत्री से जो भी मिलने आए उसे कैमरों के सामने से गुजरना पड़े और उसका पूरा रिकार्ड रखा जाए। इसमें कोई बुराई नहीं है और यह जरूरी भी लगता है। पर उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी (और पद से हटा दिया गया)। खबर में यह नहीं लिखा है कि दुर्गाप्रसाद के बाद कौन निदेशक हैं और अब क्या होता है। ना ही अभी के निदेशक से कोई बातचीत की गई है।

खबर में आगे लिखा है, अब यह अफवाह जोर पकड़ रही है कि प्रधानमंत्री नहीं चाहते हैं कि उनके निवास में लगे कैमरे कमरों के अंदर नजर रखें। इसमें कोई बुराई नहीं है। अगर प्रधानमंत्री नहीं चाहते हैं तो शयन कक्षों में कैमरे नहीं होने चाहिए और दरवाजे तक को कैमरे की नजर में लाकर अंदर छोड़ा जा सकता है और इस पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए। पर विवाद हैं औऱ महिलाएं रात में ड्यूटी करना नहीं चाहती हैं – सबको जोड़ कर देखिए तो एक बड़ी खबर बनती है। अगर अधिकृत खबर नहीं छपी तो तरह-तरह की अफवाहें उड़ती रह सकती हैं और प्रधानमंत्री के घर के बारे में ऐसी खबरें, जैसे अंदर जाने वालों के लिए कैमरा नहीं है – सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं…

Pratima Rakesh दाल में काला है या पूरी दाल काली है ?स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप कहीं साहब के पास आने वाले लोगों की सूचना लीक ना कर दे इसलिये ये मनाही हो रही है!

Surendra Grover इस खबर को पढ़ कर लग रहा है कि दाल में कुछ काला ज़रूर है जिसकी साक्षी वे महिला सुरक्षा कर्मी नहीं बनना चाहती..

Sanjaya Kumar Singh है कोई जो कर सके इस खबर का फॉलो अप? कांग्रेसी इस स्तर तक नहीं गिरते।

Pankaj Pathak लगता है ‘साहेब’ खुद घर में रेनकोट पहने घूमते हैं, नहाने का तो पता नहीं।

Sunil Kumar Singh गुजरात में मुख्यमंत्री रहने के दौरान मोदी के आवास पर एक महिला आती थी जिससे वो अकेले में मिलते थे । ऐसा एक आईपीएस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा है इस मुद्दे पर दिल्ली विधानसभा में चर्चा भी हो चुकी है जो ऑन दी रिकॉर्ड है ।

आलोक पाण्डेय कांग्रेसी अफवाह उड़ाने में माहिर है

Sanjaya Kumar Singh हां भाई। कैमरा ही नहीं रहेगा तो सबूत कहां से आए। वो तो एनडी तिवारी जैसे लोग लगवाते हैं और खुद वीडियो बांटते हैं।


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सहारा समूह ने छह महीने में नौ बार दिए नरेंद्र मोदी को करोड़ों रुपये : राहुल गांधी

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आखिरकार बम फोड़ ही दिया. उन्होंने आज मेहसाणा (गुजरात) में आयोजित एक रैली में कहा कि सहारा समूह पर पड़े छापे के बाद छह महीने में सहारा समूह के लोगों ने नरेंद्र मोदी को नौ बार करोड़ों रुपए दिए. मोदी को सहारा के बाद बिड़ला ग्रुप के लोगों ने भी पैसे दिए. इसकी पूरी जानकारी तारीख-दर-तारीख और विस्तार से मौजूद है.

6 mahine mein 9 baar Sahara ke logon ne apni diary mein likha hai ki humne Narendra Modi ji ko paisa diya hai. The records are with IT Dept for last 2 and half years yet no action has been taken. An independent enquiry must be initiated. IT Department raided Sahara Company on 22 Nov, 2014. As per record with IT, Rs 2.5 cr was given to PM Modi on 30 Oct ’13; Rs 5cr on 12 Nov ’13; Rs 2.5 cr on 27 Nov ’13; Rs 5cr on 29 Nov ’13 : Rahul Gandhi

राहुल के इस सनसनीखेज आरोप से हड़कंप मच गया है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आज आखिर उस आरोप का खुलासा कर ही दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें प्रधानमंत्री के निजी भ्रष्टाचार की जानकारी है. मेहसाणा में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री के निजी भ्रष्टाचार की जानकारी है. राहुल ने कहा कि पीएम मोदी ने गुजरात का सीएम रहने के दौरान सहारा कंपनी से 6 महीने में 9 बार पैसे लिए थे. आईटी के छापे में इसका खुलासा हुआ था. उन्होंने बकायदा रैली के मंच से चिट लहराते हुए ये आरोप लगाया.

राहुल ने कहा कि 2013 में पड़े आईटी के छापे के बाद सामने आया कि सहारा ने नरेंद्र मोदी को पैसा दिया. सहारा के लोगों ने अपनी डायरी में लिखा है कि हमने 6 महीने में 9 बार नरेंद्र मोदी जी को पैसा दिया है. आपने मुझे संसद में बोलने नहीं दिया. आप मेरे सामने खड़े होने को तैयार नहीं थे. पता नहीं क्या कारण था? कोई बिजनेस चलाता है तो वो उसका रिकॉर्ड रखता है. किसको कितने पैसे दिए कितने लिए. 22 नवंबर 2014 को सहारा पर रेड हुई. सहारा के रिकॉर्ड में जो लिखा था वो बताता हूं.

30 अक्टूबर 2013 को ढाई करोड़ मोदी जी को दिया गया. 12 नवंबर 5 करोड़ दिया गया. 29 नवंबर को 5 करोड़ लिखा था. 6 दिसंबर को 5 करोड़ दिया गया. 19 दिसंबर को 5 करोड़ दिया गया. 14 जनवरी 2104 को 5 करोड़. 28 जनवरी को 5 करोड़. 22 फरवरी को 5 करोड़ दिए गए.

राहुल ने कहा कि छह महीने में 9 बार सहारा ने मोदी जी को पैसा दिया है. ये जानकारी ढाई साल से आयकर के पास है. इस पर जांच होनी चाहिए. इस पर जांच क्यों नहीं हुई? ये सच है या झूठ, देश को बताइए मोदी जी. आपने पूरे देश को लाइन में रखा, उनकी ईमानदारी पर सवाल उठाया. अब मैं देश की ओर से पूछ रहा हूं जो ये इनफार्मेशन इनकम टैक्स के पास है, क्या यह सच है और इसमें जांच कब होगी? ऐसा ही एक रिकॉर्ड बिरला कंपनी का है. मोदीजी आप प्रधानमंत्री हैं, आपके ऊपर सवाल उठाए जा रहे हैं अब आप देश को बताओ कि यह सच है कि नहीं? आप एक निष्पक्ष जांच इस मामले में कराइए. बिरला का भी रिकॉर्ड है. आप पीएम हैं, आप पर सवाल है. आयकर के साइन हैं. आप खुद बताइए कि यह सच है या नहीं?

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नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल : इन दो नेताओं का घमंड तो देखो…

Sheel Shukla : ये घमंडी! अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि अभी नरेंद्र मोदी इतने शिक्षित नहीं है कि देश के अर्थ शास्त्र को समझ सके। अरविन्द केजरीवाल के ऐसा बोलते समय एक बू आ रही थी कि मैं तो IRS रहा हूँ और मेरी किताबी शिक्षा की कोई तुलना नरेंद्र मोदी की शिक्षा से नहीं है। यह कोई राष्ट्रहित या नोटबंदी के खिलाफ दिया गया बयान नहीं था बल्कि ये अरविन्द केजरीवाल का दम्भ था, घमंड था।

इसी घमंड का शिकार तो बुरी तरह से नरेंद्र मोदी भी है, अभी हाल के बयान सुनिये तो आप को खुद ही पता चल जायेगा की कितना घमंड भरा है नरेंद्र मोदी में, 8 नवम्बर 2016 नोटबंदी की घोषणा वाली तारीख, जिस तरह अपनी हथेलियों को आपस में पीटते हुए बोल रहे थे ऐसा लग रहा था मानो कोई देश का प्रधानमंत्री नहीं बल्कि कोई भगवन बोल रहा हो। नरेंद्र मोदी का कहना कि कांग्रेस की औकात चवन्नी की थी तो उन्होंने चवन्नी बंद की और मैंने अपनी औक़ात के हिसाब से हजार के नोट बंद किये, पहले लोग मनी मनी करते थे अब मोदी मोदी कर रहे है, कितना बेतुका दम्भ था ये।

नरेंद्र मोदी तो अपने घमंड में इस स्तर तक उतर गए कि अपने आप को जमीन से उठा हुआ नेता कहने वाले ने डेल्ही के चुनाव को नसीब वाला और बदनसीब के बीच की लड़ाई बता दिया. जिसमे नसीबवाले नरेंद्र मोदी थे और बदनसीब अरविन्द केजरीवाल। क्या होगा देश का जहा ये घमंडी देश और प्रदेश की बागडोर संभाल रहे है।

पत्रकार और उद्यमी शील शुक्ला की एफबी वॉल से.

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मोदी को मैदान में उतार बीजेपी ने जो रामबाण चलाया वह कितना कारगर साबित होगा

पिछले कुछ हफ़्तों में केंद्र सरकार की कई मोर्चों पर किरकिरी हुई है. पहला मामला बीजेपी की आतंरिक कलह से जुड़ा है. सुब्रमण्यम स्वामी ने अरुण जेटली पर अप्रत्यक्ष रूप से हमले किये हैं. रघुराम राजन से लेकर वित्त मंत्रालय से जुड़े अन्य अधिकारियों तक उनके लगातार हमले बीजेपी को परेशान किये हुए हैं. मीडिया में इस मामले को जोरशोर से उछाला गया है. बीजेपी बैकफुट पर है.  दूसरा मामला है भारत की अंतर्राष्ट्रीय नीति से संबंधित. भारत को NSG की सदस्यता की कितनी आवश्यकता थी, थी भी कि नहीं, ये शायद हम अच्छे से नहीं जानते, पर ये अवश्य जानते हैं कि चीन ने हमारा खेल बिगाड़ दिया. यहाँ भी भारत सरकार की किरकिरी हुई. नरेन्द्र मोदी की एग्रेसिव अंतर्राष्ट्रीय छवि को धक्का पहुंचा है.

तीसरा मामला भी सरकार के लिए बड़ा झटका है. ये मामला आंतरिक सुरक्षा और पाकिस्तानी मामलों से जुड़ा हुआ है. कश्मीर में पिछले एक महीने में सुरक्षा बलों पर अनेकों भीषण हमले हुए हैं. कहा जा रहा है कि पिछले कई वर्षों में कश्मीर में हालात कभी इतने बुरे नहीं रहे. यहाँ बीजेपी न केवल केंद्र सरकार में होने की वजह से बल्कि राज्य में भी सत्ता में होने की वजह से मुसीबत के केंद्र में है. आज के समय में किसी सरकार के विरोध में माहौल बनाने के लिए विपक्ष को ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ता, बशर्ते मीडिया ख़बरों को अच्छे से पेश कर रहा हो. भारत का मीडिया जैसा भी हो, पर अलग अलग धड़ों में बंटे होने के कारण जब विरोधी खेमा ज्यादा मुखर होता है, तो सरकार के हाथ पाँव फूलना लाजमी है.

ये वो समय है, जहाँ बीजेपी और नरेन्द्र मोदी की नीतियों पर मीडिया और कुछ हद तक आम जनता भी सवाल उठा रही है, भले ही दबे स्वरों में. बीजेपी को कुछ ऐसा करना ही था जिससे वो लोगों तक अपनी बात पहुंचाए. तो कौन बने बिल्ली और कौन बांधे घंटी? बीजेपी ने यहाँ अपने जांचे परखे ट्रम्प कार्ड को फिर से खेला है. संकटमोचन नरेन्द्र मोदी जी को उतारा गया है. ऐसा पहली बार हुआ है कि एक भारतीय प्रधानमन्त्री ने अपने कार्यकाल के दौरान किसी न्यूज़ चैनल को विस्तारपूर्वक इंटरव्यू दिया है. इस इंटरव्यू में नरेन्द्र मोदी ने इन सारे मुद्दों पर सकारात्मक तरीके से अपना पक्ष रखा है. कोशिश है भारतीय जनता और भारतीय जनता पार्टी को ढाढ़स बंधाने की, ये देखने योग्य होगा कि प्रधानमन्त्री की ये कोशिश इस नकारात्मक माहौल को सकारात्मक बनाने में कितने काम आती है.  

लेखक दिवाकर सिंह आईटी फील्ड से जुड़े हुए हैं और नोएडा में रहते हुए खुद की कंपनी संचालित करते हैं. उनसे संपर्क dsingh@qtriangle.in के जरिए किया जा सकता है.


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सियासत के मामले में मोदी की स्टाइल को कॉपी कर रहे हैं नीतीश कुमार!

अजय कुमार, लखनऊ

2014 के लोकसभा चुनाव के समय गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिये जो रास्ता चुना था, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिये उसी राह पर थोड़े से फेरबदल के बाद आगे बढ़ते दिख रहे हैं। मोदी ने जहां गुजरात मॉडल को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया था, वहीं नीतीश कुमार संघ मुक्त भारत, शराब मुक्त समाज की बात कर रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के समय पूरे देश में मोदी और उनके गुजरात मॉडल की चर्चा छिड़ी थी, जिसका मोदी को खूब फायदा मिला था।

2019 में नीतीश कुमार मोदी की तर्ज पर ही बिहार में शराबबंदी से हो रही उनकी सरकार की वाहवाही को देशव्यापी मुद्दा बनाना चाहते हैं। 2014 में मोदी गुजरात के सोमनाथ मंदिर का काशी विश्वनाथ मंदिर और गंगा से रिश्ता जोड़ कर वाराणसी से चुनाव लड़े थे, वहीं 2019 के लिये नीतीश भी गंगा मईया, बाबा विश्वनाथ के सहारे वाराणसी को नाप रहे हैं। मोदी ने वाराणसी पहुंच कर कहा था कि मुझे मां गंगा ने बुलाया है। नीतीश भी अपनी यात्रा के दूसरे दिन मां गंगा का आशीर्वाद लेने पहुंचे, परंतु मोदी से अलग दिखने की चाह में उन्होंने इसके उलट कहा, ‘मां गंगा ने मुझे बुलाया नहीं है, खुद आशीर्वाद लेने आया हॅं।” मोदी ने जब स्वच्छ भारत अभियान चलाया तो वह जनता को बताने से नहीं भूले की महात्मा गांधी से प्रेरित होकर वह स्वच्छता अभियान को आगे बढ़ा रहे है। नीतीश ने जब बिहार में शराब बंदी कानून बनाया तो वह भी लोगों को बताने से नहीं भूले की गांधी जी शराब को देश और समाज के पतन का कारण मानते थे। मोदी वाराणसी से पूरे प्रदेश को संदेश देना चाहते थे। नीतीश भी ऐसा ही कर रहे हैं। मोदी जब वाराणसी से चुनाव लड़ने आये थे तो उन्हें यहां बसे गुजरात वोटरों पर काफी भरोसा था। वहीं नीतीश कुमार को अपनी बिरादरी के कुर्मी वोट लुभा रहे हैं। लब्बोलुआब यह है कि जनता दल युनाइटेड के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी सियासत को मोदी की शैली में आगे बढ़ा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश पहुंच कर नीतीश के तेवर काफी बदले-बदले नजर आये। यहां तक की भीड़ और उसके हौसले को देखकर मंच से यह घोषणा तक कर दी गई कि महागठबंधन यूपी में अपने दम पर चुनाव लड़ेगा, लेकिन ऐसा स्वभाविक नहीं है। पूर्वाचल के एक मात्र सम्मेलन में जुटी भीड़ को देखकर सियासत की जमीनी हकीकत नहीं पहचानी जा सकती है। नीतीश को अच्छी तरह से पता है कि पूर्वांचल में उनकी बिरादरी के कुर्मियों का अच्छा खासा वोट बैंक है। यह लोग संगठित तरीके से वोटिंग करते हैं, लेकिन पूरे प्रदेश में यह स्थिति नहीं है। पूर्वांचल में कुर्मी वोट बैंक की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इन्हीं वोटरों के चक्कर में अपना दल के सोने लाल पटेल (अब स्वर्गीय) ने पूर्वांवल में अपनी सियासी पारी खेली थी, जबकि वह मूल रूप से पूर्वांचल के बाहर के नेता थे। उनका जन्म कन्नौज में तो शिक्षा-दीक्षा कानपुर में हुई थी।

सोने लाल ने अपना राजनैतिक कैरियर पूर्वांचल से आगे बढ़ाया था। सोने लाल पटेल की मौत के बाद उनकी बेटी सुप्रिया पटेल भी पूर्वांचल से ही अपनी ताकत में इजाफा करने में जुटी हैं। कुर्मी वोटर सभी दलों के लिये काफी अहम हैं। कभी यह वोट बैंक जनसंघ का हुआ करता था। आज की तारीख में यह बिखरा हुआ है। इस समय प्रदेश में कुर्मियों का कोई ऐसा नेता भी नहीं है जिसके पीछे सभी कुर्मी एकजुट हो सकें। सपा कुर्मी वोट बैंक को बचाये रखने के लिये काफी बेचैन है। वह इन्हें खोना नहीं चाहती है। इसी लिये मुलायम अपने नाराज मित्र और सपा छोड़कर कांग्रेस में गये बेनी प्रसाद वर्मा को मना करके एक बार फिर अपने पाले में ले आये है।

नीतीश ने काफी सोच-विचार के बाद वाराणसी में अपनी पहली सभा रखी थी, ताकि जनता को उनकी ताकत का अहसास हो सके। एक तो वाराणसी में कुर्मियों की बड़ी आबादी और दूसरा बिहार से सटा जिला होने के कारण वाराणसी हमेशा बिहार के करीब रहता है। कुर्मियों के अलावा बिहारियों की भी यहां अच्छी खासी जनसख्ंया है। नीतीश ने मोदी की तरह ही सभा में हिस्सा लेने आये लोंगो से शराब बंदी के मसले पर हाथ उठाकर सहमति देने को कहा। अपने भाषण के दौरान नीतीश ने कहा कि क्या यूपी के लोग नहीं चाहते कि यहां भी शराब बंदी हो। इसके लिए उन्होंने हाथ उठवाकर हामी भरवाई। बोले, मैं किसी बात को थोपना नहीं चाहता। शराबबंदी के फायदे भी गिनवाए, कहा जो नहीं पीते वे खुश हैं, महिलाएं खुश हैं। अब एक माह की बंदी के बाद जो पीने के आदती थे, वे भी खुश रहने लगे हैं कि चलो बंद हो गई।

अपने आप को डा0 राम मनोहर लोहिया का अनुयायी बताने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जब शराब बंदी के लिये लोंगों से हाथ उठाकर सहमति मांगी तो अनायास ही अखिलेश सरकार और डा0 लोहिया के ही एक और अनुयायी सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की याद ताजा हो गईं। एक तरफ नीतीश यूपी में भी शराब बंदी की बात कर रहे हैं तो दूसरी तरफ मुलायम की पार्टी 2012 के विधान सभा चुनाव इस शर्त पर जीतकर आई थी कि अगर उसकी सरकार बनेगी तो शाम की दवा (शराब) सस्ती कर दी जायेगी। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यह कर भी दिखाया। चौथे साल में उन्होंने शराब के दामों में भारी कटौती करके पियक्कड़ो का दिल जीत लिया था।डा0लोहिया के चेलों मुलायम-नीतीश में एक विरोधाभास और है। डा0 लोहिया की सियासत जहां कांग्रेस के विरोध पर टिकी थी, वहीं नीतीश कुमार पिंछले दो वर्षो से कांग्रेस की जगह संघ मुक्त भारत की बात कर रहे हैं।

यूपी की सियासत को गरमाने आये नीतीश अपने पहले सफल दौरे से काफी खुश दिखे। वाराणसी के पिंडरा में आयोजित जनता दल युनाइटेड के कार्यकर्ता सम्मेलन में भीड़ तो खूब थी, लेकिन इसमें बिहार की भी गाड़ियों की अच्छी खासी तादात थीं। गाजियाबाद से लेकर गाजीपुर तक के वाहनों से कार्यकर्ताओं की जुटान भी। शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर हुए सम्मेलन में शहर के भी कई चेहरे थे। भीड़ का जो आलम था, वह अपने आप में बहुत कुछ कह रहा था। आमतौर पर जदयू का कोई खास अस्तित्व न तो बनारस में अब से पहले दिख रहा था, न ही आसपास के जिलों या सूबे के अन्य क्षेत्र में,लेकिन सच्चाई यह भी है कि पड़ोसी राज्य बिहार में अपना वर्चस्व रखने वाली इस पार्टी के लोगों का पूर्वाचल, खासकर बनारस से काफी जुड़ाव है। बिहार के नंबर की गाड़ियां यहां हमेशा देखने को मिल जाती हैं। नीतीश का भाषण काफी सधा हुआ था। नीतीश ने जब मोदी के खोखले वादों की बात की तब भी तालियां बटोरी और संघ का नाम लिया तब भी समर्थन मिला। 45 मिनट के भाषण में जब-जब शराबबंदी की बात आई, आधी आबादी ने दिल खोलकर तालियां बजाई। इसके साथ ही यह भी तय हो गया कि यूपी में नीतीश अपनी ताकत बढ़ाने के लिये बिहार में शराब बंदी को मजबूत हथियार बनायेंगे,लेकिन इस मुद्दे पर उन्हें मोदी सरकार को घेरना आसान नहीं होगा। गुजरात में पिछले 55 वर्षो से शराब बंदी चल रही है।  

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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मोदी की आंबेडकर पर अशिष्टता

-आनंद तेल्तुम्ब्ड़े-

हाल में मोदी जी ने अपने आप को आंबेडकर भक्त कहा था और दलितों को यह भरोसा दिलाया था कि वह आरक्षण के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं होने देंगें चाहे आंबेडकर ही आ कर इस की मांग क्यों न करें. मोदी की यह अशिष्टता यह दर्शाती है कि हिंदुत्व की ताकतों के लिए दलितों को पटाने के लिए आंबेडकर को गलत ढंग से पेश करने तथा शासक वर्गों की राजनीतिक रणनीति में आरक्षण की कितनी नाज़ुक भूमिका है. आरक्षण जो कि दलितों के लिए वरदान है वास्तव में उनकी गुलामी का औज़ार बन गया है.

मोदी ने 22 मार्च को विज्ञान भवन, नयी दिल्ली में आंबेडकर मेमोरियल व्याख्यान देते हुए कई दिलचस्प बातें कहीं. उनमे से दो बातें ख़ास तौर पर महत्वपूर्ण हैं जो कि डॉ. आंबेडकर को जानबूझ कर गलत ढंग से पेश करने के कारण उन्हें शासक वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में दर्शाती हैं. उनकी पहली घोषणा थी कि वह आंबेडकर भक्त है. दूसरी उनकी यह दावेदारी थी कि वह आरक्षण को किसी भी तरह से हल्का नहीं करने देंगें चाहे आंबेडकर स्वयं भी जीवित होकर इसे ख़त्म करने की मांग क्यों न करें. निस्संदेह उस की यह दोनों घोषणाएं और आंबेडकर प्रेम का दिखावा वास्तव में दलितों को भाजपा के पाले में खींचने के लिए ही हैं.

आंबेडकर प्रेम के पीछे का तर्कशास्त्र 
दलित संघ परिवार की चाल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. यह उनकी भारतीय जनता का हिन्दू बनाम अन्य के तौर पर ध्रुवीकरण की रणनीतिक चाल को पलटने की ताकत रखता है. उनके सामाजिक, एतहासिक, वैचारिक और सांस्कृतिक परिवेश के कारण दलित एक बड़ा खेल बिगाड़ने वाले हो सकते हैं. इस बात का भरोसा नहीं है कि दलित अपने आप को हिन्दुओं के रूप में चिन्हित ही करेंगे.

यह स्वाभाविक है कि 1909 में जब भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता के बीज बोए गए उसी समय यह मुद्दा भी उभरा था. मिन्टो-मार्ले सुधारों पर बातचीत के दौरान मुस्लिम लीग ने कांग्रेस को यह चुनौती दी थी कि दलित और आदिवासी हिन्दू समाज का अंग नहीं हैं. प्रारंभिक दलित आन्दोलन जो अभी मानव होने के नाते अपने मानवाधिकारों की मांग तक ही सीमित था अभी अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं बना पाया था. तब भी कांग्रेस को मुस्लिम लीग के साथ लखनऊ समझौता करने के बाद मान्टेग्यु-चेमस्फोर्ड सुधारों के परिपेक्ष्य में गवर्नमेंट  आफ इंडिया एक्ट के लागू होने पर दलितों की ओर ध्यान देना पड़ा. संकेत के तौर पर गाँधी जी को जून 1916 को छुआछूत की प्रथा के खिलाफ बोलना पड़ा और दलितों के लिए चिंता जतानी पड़ी.

दलितों का समर्थन लेने के लिए कांग्रेस को अकेले बम्बई प्रान्त में ही चार सम्मलेन करने पड़े. 1927 में महाड़ तालाब संघर्ष से हिन्दुओं से मोहभंग होने के बाद आंबेडकर ने दलितों के लिए एक राजनीतिक पह्चान बनानी शुरू कर दी थी. उनके हिन्दुओं और हिन्दू धर्म पर हमलों जिनकी परिणति उनके परिनिर्वाण से दो माह पहले बौद्ध धम्म अपनाने में हुयी, ने दलितों को हमेशा के लिए एक अलग सामाजिक-धार्मिक पहचान दे दी. यह इतिहास है जो कि संघ परिवार के भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाने के आड़े आ रहा है. उनकी यह सोच उच्च वर्णीय अधिनायक्वादी और ब्राह्मणवादी है जो कि नाज़ीवाद की एक लोग, एक राष्ट्र, एक नेता की अवधारणा पर आधारित है.

इस कारण से संघ परिवार की रणनीति में डॉ. आंबेडकर का आलोचनात्मक महत्व हो जाता है. जब तक वे आंबेडकर का पर्याप्त भगवाकरण नहीं करेंगे तब तक उन्हें इस का डर बना रहेगा. डॉ. आंबेडकर के प्रति नया उपजा प्रेम इसी राजनीतिक मजबूरी की उपज है. दलित आन्दोलन की वैचारिक दुर्बलता, दलित नेतृत्व का दिवालियापन, आत्ममुग्ध मध्य दलित वर्ग और हिन्दू देवताओं जिन्हें उन्होंने आंबेडकर के आह्वान पर त्याग दिया था, के स्थान पर आंबेडकर का बड़े स्तर पर देवकरण ने संघ परिवार के आंबेडकर के भगवाकरण के असंभव कार्य को बहुत आसान बना दिया है. यह वास्तव में बालासाहेब देवरस जो कि आरएसएस के सब से लो – प्रोफाइल वाले सरसंघचालक थे के समय में ऐसी कुछ चालें चली गयीं.

उसके समय में ही दलित उत्थान के नाम पर “सेवा भारती” संगठन के नाम से दलितों में काम शुरू किया गया. इस में डॉ. आंबेडकर को प्रात:स्मरणीय सूचि में रखना, और मध्य वर्ग के दलित जो कि उच्च जातियों में अपनी सामाजिक पहचान बनाना चाहते थे, के लिए एक विशेष अभिप्राय से “समरसता मंच” का सृजन करना था. तब तक उन द्वारा पवित्र माने जाने वाले पर डॉ. आंबेडकर द्वारा कटु हमले किये जाने के कारण वे उन के लिए अभिशाप थे. इस रणनीतिक बदलाव के कारण उन्होंने डॉ. आंबेडकर को के.बी.हेडगेवार का दोस्त, हिन्दुओं के महानतम हितैषी, आरएसएस के प्रशंसक, मुस्लिम और कम्युनिस्ट विरोधी, घर वापसी के समर्थक, भगवा झंडे के राष्ट्रीय झंडे के तौर पर समर्थक, एक महान राष्ट्रवादी के तौर पर पूरे जोर शोर के साथ सत्य के रूप में प्रचारित किया गया.

चाहें तो आप इन्हें तमाशा कह कर नकार सकते हैं परन्तु इन्हें नज़रंदाज़ नहीं कर सकते. इन्होने दलित नेताओं के सहयोजन करने की ठोस ज़मीन बनायी.  पिछले कुछ चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सभी पार्टियों को मिला कर सब से ज्यादा आरक्षित सीटें जीतती रही है. परन्तु केवल अरक्षित सीटें ही काफी नहीं हैं. उनकी ध्रुवीकरण की रणनीति में दलितों का अमूल परिवर्तन करना और जीतना भी था. तभी उनका ध्रुवीकरण संभव हो सकता है. क्योंकि इस का उल्टा अल्पसंख्यक जो दलितों को मिला कर 30 प्रतिशत वोटर हैं जो उन की हिन्दू राष्ट्र की योजना में रोड़ा बन सकते हैं, का पृथकीकरण संभव है. इस रणनीति में रोहित वेमुला जैसे रेडिकल्स का बहिष्कृतीकरण और आदिवासियों को माओवादी कह कर दमन करना शामिल है.

आंबेडकर को भक्त पसंद नहीं थे
मोदी जी को जानना चाहिए के उन्हें भक्त पसंद नहीं थे. उन्हें नायक पूजा से नफरत थी. वे राजनीतिक जीवन में इस के घोर विरोधी थे क्योंकि इस से अन्वेषण की स्फूर्ति, सृजन की भावना और सोच का स्वतंत्र नजरिया बाधित हो जाते हैं. उनके जीवनी-लेखक धनंजय कीर लिखते हैं: मार्च 1933 के प्रथम सप्ताह में बम्बई में एक मीटिंग में उन्हें एक प्रशस्ति पत्र देने पर उन्होंने कहा,” इस पत्र में मेरे कार्यों और गुणों का बहुत बखान किया गया है. इस का मतलब है कि आप लोग मेरे जैसे आदमी को देवता बना रहे हैं. अगर आप लोगों ने नायक पूजा के इन विचारों को शुरू में ही ख़त्म नहीं किया तो यह तुम्हें बर्बाद कर देगा. एक व्यक्ति को देवता बना कर आप अपनी सुरक्षा और मुक्ति के लिए एक व्यक्ति पर विश्वास करने लगते हैं और आप में दूसरों पर निर्भरता और अपने कर्तव्य के प्रति उदासीनता की भावना घर कर जाती है. अगर आप इन विचारों के शिकार हो गए तो जीवन की राष्ट्रीय धारा में लकड़ी के लठ्ठों की तरह हो जायेंगे. आप का संघर्ष ख़त्म हो जायेगा..

1943 में महादेव गोविन्द रानाडे जी के 101वें जन्म दिन पर भाषण में उन्होंने बताया था कि वे नायक पूजा खिलाफ क्यों है. नागपुर में 1956 में धर्म परिवर्तन के समारोह के दौरान लोग उनका अभिवादन करने और उन के चरणों पर सम्मान में गिरने लगे. यद्यपि उन की तबियत ठीक नहीं थी उन्होंने छड़ी उठा कर एक को मारी और चिल्लाये कि वे उनका गुलामों वाला व्यवहार पसंद नहीं करते हैं. अगर वे आज जीवित होते तो मोदी को भी इसी प्रकार की झिड़की सुननी पड़ती. आंबेडकर उन्हें दलितों को सामाजिक भेदभाव से बचाने के लिए उनके संवैधानिक कर्तव्य का स्मरण दिलाते.

मोदी जी दलित विकास के लिए बजट में फंड की कमी करके दलित विद्यार्थियों की उन्मुक्त अभिव्यक्ति को कुचलने की खुली छूट दे रहे हैं और रोहित वेमुला जैसे होनहार छात्रों की संस्थागत हत्या की परिस्थितयां पैदा कर रहे हैं. न्याय मांगने पर पुलिस उन्हें बुरी तरह पीट रही है जैसा कि 22 मार्च को हैदराबाद विश्वविद्यालय में हुआ. वह उसी समय आंबेडकर का स्तुतिगान कर रहे थे. मोदी जी को मालूम होना चाहिए कि आंबेडकर कोई टुच्चे नेता नहीं थे जिन्हें चापलूस पटा सकते थे. उनका चित्रण करना अपमान है.

आरक्षण का फंदा
दूसरा बिंदु जो मोदी जी ने उठाया वह अधिक जटिल एवं महत्वपूर्ण है. दलितों के लिए आरक्षण एक भावनात्मक मुद्दा रहा है और इसी  लिए इसे किसी ने कभी भी निष्पक्ष दृष्टि से नहीं देखा है. जब मोदी जी ने आश्वस्त करने वाले स्वर में कहा कि आरक्षण को छुया नहीं जायेगा बेशक आंबेडकर भी आ कर इस की मांग क्यों न करें, इससे उन्होंने अपने वर्ग को इस के महत्व के बारे में समझा दिया है.

आरक्षण के लिए अकेले आंबेडकर ही ज़िम्मेदार हैं: पहले राजनैतिक प्रतिनिधित्व के लिए और बाद में सरकारी सेवाओं और शैक्षिक  संस्थानों में. पहले का मंतव्य तो शुरू में ही परास्त हो गया था. इस का इरादा दलितों के प्रतिनिधियों को विधायिका संस्थाओं में दलित प्रतिनिधियों को उनके हित संवर्धन के लिए भेजना था. दलितों के सच्चे प्रतिनिधियों को चुनने के लिए डॉ. आंबेडकर ने अलग मताधिकार की व्यवस्था चुनी थी. उन्होंने इसे गोलमेज़ कांफ्रेंस (1930-1932) में गाँधी जी के कट्टर विरोध के बावजूद प्राप्त किया था. परन्तु इस की घोषणा के तुरंत बाद गाँधी जी ने मरण व्रत रख कर उन्हें ब्लैकमेल किया. आंबेडकर जी को अलग मताधिकार छोड़ कर संयुक्त मताधिकार व्यवस्था स्वीकार करनी पड़ी जिसे पूना पैकट कहते हैं.

अलग मताधिकार जिस से दलितों के सच्चे प्रतिनिधि चुनना सुनिश्चित हो सकता के विरुद्ध संयुक्त मताधिकार से केवल वे चुने जाते हैं जो गैर दलितों के बहुमत को स्वीकार होते हैं जिस से कांशी राम के कथनानुसार केवल चमचे ही पैदा होते हैं. इस द्वारा दलितों के सच्चे प्रतिनिधि को चुनने की कोई सम्भावना नहीं होती है. इस का सब से पहला सबूत डॉ. आंबेडकर खुद हैं जो कि स्वतंत्र भारत में छुट भैय्या नेताओं के विरुद्ध भी कभी चुनाव नहीं जीत सके.

आंबेडकर इस (राजनैतिक) आरक्षण को पचा नहीं सके परन्तु इन के संविधान में समावेश के समय 10 वर्ष की समय सीमा लगाने के सिवाय कुछ भी नहीं कर सके. शासक वर्ग के लिये इस की उपयोगिता का यह सबूत है कि 10 वर्ष की समय सीमा समाप्त होने पर बिना कोई मांग उठे इसे हर बार बढ़ा दिया जाता है. यह आरक्षण स्पष्ट तौर पर दलित हितों के खिलाफ है क्योंकि इस ने दलितों के स्वतंत्र आन्दोलन को बर्बाद कर दिया है और दलालों के रूप में दलित नेता पैदा किये हैं..

सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण पहले वरीयता व्यवस्था के रूप में आया और 1943 में डॉ. आंबेडकर जो उस समय वायसराय की कार्यकारिणी के सदस्य थे, के जोर देने पर कोटा सिस्टम बनाया गया. शुरू में यह बहुत लाभदायिक रहा क्योंकि आज हम शहरों में जो दलित मध्य वर्ग देखते हैं वह इसी की ही देन है. परन्तु इस के बाद इस का प्रतिगामी और सीमान्तिक प्रभाव उभरना शुरू हो गया. शासक वर्गों के हाथ में आरक्षण जाति बनांये रखने और भारतीय जनमानस को विभाजित रखने का एक सशक्त औजार बन कर रह गया है.

संविधान बनाते समय सामाजिक न्याय का सारा मुद्दा अलग से हल किया जा सकता था परन्तु इसे व्यवस्थित तौर पर न केवल जाति को बनाये रखने बल्कि उन्हें मज़बूत करने की दिशा में ले जाया गया. क्योंकि आरक्षण अंग्रेजों के समय में ही कोटा की शक्ल धारण कर गया था और इसे अनुसूचित जाति की सरकारी पहचान से दिया गया था जिस से उन का हिन्दू धर्म से सम्बन्ध कट गया था तो जाति को आसानी से छोड़ा जा सकता था जब कि जोरशोर से छुआछूत को गैर क़ानूनी घोषित करके गायब कर दिया गया था.

इस के साथ ही आरक्षण को एक अपवाद की नीति के तौर पर और विशेष लोगों के लिए जिन्हें अधिकतर समाज बराबर के मनुष्यों के रूप में स्वीकार नहीं कर सका है अपनाया जाना चाहिए था. इस अवधारणा के तहत आरक्षण समाज की जाति समाप्त करने की असमर्थता के कारण इस प्रकार की जननीति के लिए एक आखरी सशक्त ताकत बन सकता था. केवल बड़ा समाज ही जाति का विनाश कर सकता है. आरक्षण में पिछड़ेपन की अवधारणा जो कि अदृश्य रहती है ने समाज में निचली जातियों की हीनता के बारे में व्याप्त बुनियादी अवधारणा  को मज़बूत किया है.

एक निरीह कृत्य नहीं
नीति की इस निर्णायिक अवधारणा की अनुपस्थिति दुर्भाग्य से संविधान निर्मात्री सभा का एक निरीह कृत्य या कल्पनाहीनता नहीं है बल्कि आरक्षण को शासक वर्गों के राजनैतिक सत्ता पर एकाधिकार को चुनौती देने के लिए सशाक्त हथियार बनने को असंभव बनाना था. इस की प्रक्रिया  ने यह भी सुनिश्चित किया है कि यह लगातार लाभार्थियों को ही मिलेगा जिस से इन्हीं लोगों में ही लाभार्थी वर्गों का गठजोड़ बन जायेगा.

सरकारी क्षेत्र की नौकरियों को छोडिये जो कि 1991 से नव-उदारवादी नीतियों के दबाव में लगातार कम हो रही हैं जिस से सरकारी क्षेत्र  में आरक्षण लगभग समाप्त हो गया है. हमारे प्रमुख संस्थानों में सीटें बराबर भरी नहीं जा रही हैं. आईआईएम और आईआईटी में पिछले कई सालों से आरक्षित सीटें भरी नहीं जा रही हैं दलितों और आदिवासियों का उपलब्ध करने का क्षेत्र लगातार घट रहा है. कई विसंगतियां हैं जिन के सामाजिक सद्भाव के लिए गंभीर निहितार्थ हैं. आरक्षण का लाभ लाभार्थी के परिवार को मिलता है परन्तु वह जाति के नाम पर दिया जाता है जिस का खामियाजा समाज को भुगतना पड़ता है. इन्हें ग्रामीण क्षेत्र में दलितों पर लगातार बढ़ रहे अत्याचारों के लिए उत्तरदायी भी माना जा सकता है.

आरक्षण को दलित समुदाय के लिए बाधक के रूप में देखा जा सकता है क्योंकि इन्हें उन के शहरी तबके द्वारा शुरू से ही हथियाया जा रहा है. आरक्षण को निस्संदेह तौर पर लाभकारी माना जाता है परन्तु इस के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक मूल्यों को नहीं देखा जाता. आरक्षण की सब से बड़ी कीमत जातियों के जीवित रहने और डॉ. आंबेडकर की “जाति विनाश” की योजना को चुकानी पड़ी है. प्राइमरी स्तर पर इसका जो कहर बच्चों पर गुजरता है कि वे कोई निम्न प्रजाति के हैं, उन्हें अपने आप में हीन भावना से भर देता है. आरक्षण ने शासक वर्गों को इन जातियों को बुनियादी सुविधाएँ जैसे बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएँ, शिक्षा और रोज़गार आदि देने की जुम्मेदारी से बचने का बहाना भी दे दिया है.

डॉ. आंबेडकर अपने सपने की कमियों को समझ गए थे जिस ने उच्च शिक्षित दलितों का अलग वर्ग पैदा कर दिया था. उन्होंने 1953 में आगरा में एक भाषण में खुले तौर पर कहा था कि पढ़े लिखे दलितों ने मुझे धोखा दिया है. उन्होंने अपने जैसी उदहारण का सपना देखा था कि कुछ पढ़े लिखे दलित महत्वपूरण प्रशासनिक पदों पर बैठ जायेगे और दलित हित का समर्थन करेंगे. उन्होंने अपने जीवन काल में ही देख लिया था कि दलितों की परवाह करने के स्थान पर पढ़े लिखे दलित उन से ही कटने लगे थे. दुर्भाग्यवश वे इस बात को नहीं देख सके कि उच्च शिक्षित दलितों का वर्ग परिवर्तन उन्हें दलित वर्ग के साथ सम्बन्ध रखने में बाधक होगा.

अगर आंबेडकर इन नीतियों को देखने के लिए आज जीवित होते तो वे निश्चित तौर पर इन्हें समाप्त करने की मांग करते जैसी की मोदी जी ने भी आशंका व्यक्त की है. आरक्षण का असली अभिप्राय इस बात से समझना चाहिए कि इस का लाभ कौन ले रहा है और इनकी कीमत कौन अदा कर रहा है.

(अनुवादक– एस.आर. दारापुरी)

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चीन के दबाव में झुकी 56 इंच के सीने वाली सरकार!

Priyabhanshu Ranjan : तो क्या वाकई चीन के दबाव में झुक गई 56 इंच के सीने वाली मोदी सरकार? पिछले दिनों खबर आई कि UN में आतंकवादी मसूद अजहर पर पाबंदी लगाने के भारत के प्रस्ताव पर चीन की ओर से अड़ंगा (Veto) लगाए जाने के जवाब में मोदी सरकार ने चीन के विद्रोही उइगुर नेता Dolkun Isa को भारत आने का वीजा दिया है ताकि वो यहां चीन के विद्रोही नेताओं (Dissident Leaders) की बैठक में शिरकत कर सके।

गौरतलब है कि अब जर्मनी के नागरिक बन चुके Dolkun Isa को चीन ‘आतंकवादी’ मानता है। मोदी सरकार के इस कदम से जुड़ी खबरों में कुछ अति-उत्साही पत्रकारों ने जनता को बताया कि मसूद अजहर के मुद्दे पर चीन ने UN में जो कुछ भी किया है, ये उस पर मोदी सरकार की ओर से की गई जवाबी कार्रवाई है और चीन को दिया गया एक STRONG MESSAGE है।

मैं अमूमन मोदी सरकार की आलोचना करता हूं, लेकिन ये खबर पढ़ कर मुझे बड़ी खुशी हुई। मैंने उस खबर को फेसबुक पर शेयर भी किया। सोचा कि चलो 56 इंच के सीने वाली ये सरकार कुछ काम तो आई। कम से कम इसमें चीन को आंख दिखाने की हिम्मत तो है।

लेकिन कल मैंने विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप का बयान देखा कि मोदी सरकार को तो पता ही नहीं कि Dolkun Isa को वीजा कैसे मिला। विकास ने कहा कि हम देख रहे हैं कि Dolkun को वीजा कैसे मिला। मुझे तभी समझ आ गया था कि लगता है बीजिंग ने मोदी सरकार पर दबाव बना दिया है।

और अब खबर आई है कि भारत ने Dolkun का वीजा रद्द कर दिया है। यानी मसूद अजहर के मुद्दे पर मोदी सरकार के STRONG MESSAGE की हवा निकल गई।

हाय रे 56 इंच का सीना!

पत्रकार प्रियभांशु रंजन के फेसबुक वॉल से.

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जिस अखबार के प्रबंधन पर धोखाधड़ी के आरोप हैं, उस अखबार के सम्पादक को मोदी जी ने बनाया एनबीटी का चेयरमैन

नोएडा । नेशनल दुनिया प्रबंधतंत्र की धोखाधड़ी की जिस जांच के लिए पीएमओ ने चार सदस्य टीम गठित की थी, उस जांच में अब कोई प्रगति नहीं है। नेशनल दुनिया पीड़ित कर्मी शरद त्रिपाठी की पीएफ आदि से जुडी शिकायतों पर संज्ञान लेते हुए गत 4 नवंबर को पीएमओ ने जांच के लिए 4 सदस्यों की एक टीम गठित की थी। सूत्रों की मानें तो इस मामले में अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुयी है। जांच के आदेश जारी हुऐ भी दो माह से ज्यादा हो गये हैं।

इस जांच को दबवाने में नेशनल दुनिया दिल्ली के वरिष्ठ स्थानीय सम्पादक और नेशनल बुक ट्रस्ट के चेयरमैन बलदेव भाई शर्मा और इनके चाटुकार लगे हुए हैं। आश्चर्य की बात यह है कि जिस अखबार पर धोखाधड़ी और कर्मचारियों के उत्पीड़न के आरोपों की लम्बी फेहरिस्त हो, उस अखबार के सम्पादक को मोदी सरकार ने कैसे नेशनल बुक ट्रस्ट का चेयरमैन बना दिया। यह पद केंद्र सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय के अधीन आता है। चेयरमैन साहब को मिली गाड़ी को अखबार के पीआर कार्य और दर्ज मामलों की पैरवी के लिए भी जोता जाता है। सरकारी गाड़ी को नोएडा कार्यालय के मुख्य परिसर के अंदर अक्सर शाम के वक्त खड़ा हुआ देखा जा सकता है। केंद्र सरकार ने जो बत्ती वाली गाड़ी बलदेव भाई शर्मा को दी है उसका प्रयोग वह अखबार के कार्यों में कैसे कर सकते हैं। सू़त्रों का कहना है कि जांच दल जब नोएडा कार्यालय में आया तो उसे यह कह कर टरका दिया गया कि हमारे सम्पादक जी खुद भाजपा के सिपाही हैं, यह घोड़ा गाड़ी इसीलिए सरकार ने उन्हें दी है।

अखबार का एबीसी सर्टिफिकेट भी रद्द हो चुका है। अखबार ने फर्जी ढंग से अखबार की प्रसार संख्या 2 लाख से ज्यादा दर्शायी थी। अखबार के मुख पृष्ठ पर श्लोगन लिखा है- देश का सबसे तेजी से बढता अखबार। बलदेव भाई और उनकी चाटुकार टीम अखबार की प्रसार संख्या तो नहीं बढा पायी, अपितु अखबार को फाइल कापी में जरूर समेट दिया। ताजा जानकारी मिली है कि अखबार को डीएवीपी दर की रिनीवल नहीं मिली है। सूत्रों का कहना है कि जिस तरह से बलदेव भाई ने अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए पूरे सम्पादकीय विभाग के बड़े खिलाड़ियों को खत्म कर दिया, अब अखबार को भी बर्फ में लगा रहे हैं।

सूत्रों का कहना है कि कर्मियों के पीएफ एकाउंट में पिछले छह माह से कोई पैसा जमा नहीं किया गया है। इसके अलावा आयकर विभाग में भी टैक्स जमा नहीं किया गया है। ईएसआई में आजतक एक पैसा जमा नहीं किया गया है। दिवाली पर्व के दौरान नेशनल दुनिया के फोटोग्राफर ओमपाल का एक्सीडेंट हो गया था। वह इस समय भी कोमा में हैं और जिंदगी व मौत से जूझ रहे हैं। यदि ओमपाल ईएसआई में रजिस्टेशन होता तो उसका इलाज ईएसआई कराता। पैसे की दिक्कत के कारण ओमपाल का इलाज कारगर ढंग से नहीं हो पा रहा है। नेशनल दुनिया प्रबंधन का कोई पदाधिकारी उसका हाल लेने तक नहीं गया। सू़त्रों का कहना है कि शिकायत मिलने पर जब ईएसआई की टीम नेशनल दुनिया कार्यालय आती है तो अपनी जेब गर्म करके चली जाती है।

एक पीड़ित कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा ने यह गंभीर आरोप मोदी पर लगाया या केजरीवाल पर, पढ़िए और बूझिए

Deepak Sharma : ब्रांड चाहे एक करोड़ की मर्सीडीज़ बेंज हो या 4 रूपए का विमल गुटखा , बाज़ार में बिकने के लिए उसे बाज़ार के उसूल स्वीकार करने ही होंगे. उसे लोगों के हाथ अगर बिकना है तो बाज़ार में दिखना होगा. मार्केटिंग के ये नियम कोका कोला ने बाज़ार में आज से कोई 129 साल पहले तय कर दिए थे. कोका कोला ने दुनिया को तब पहली बार बताया था कि बाज़ार में होने से कहीं ज्यादा बाज़ार में दिखना ज़रूरी है. दिखेंगे तो ब्रांड बनेंगे. ब्रांड बनेगे तो खुद ब खुद बिकेंगे.

ब्रांड निश्चित तौर पर कोई उत्पाद हो सकता है. पर ब्रांड किसी फिल्म का हीरो भी हो सकता है. ब्रांड किसी पेशेवर खेल का खिलाडी भी हो सकता है. ब्रांड कोई आर्किटेक्ट हो सकता है. डिज़ाइनर हो सकता है. क्यूंकि ये सभी लोग एक प्रोडक्ट के तरह बाज़ार से जुड़े हैं. अगर बाज़ार है तो हीरो की फिल्म है. अगर रियल एस्टेट है तो आर्किटेक्ट है.

लेकिन क्या ब्रांड नेता भी हो सकता है ? जिसे गरीबी की अंतिम पंक्ति में खड़े सबसे गरीब के दर्द को महसूस करना है. जिसे कटे हुए शीश वापस लाने है ? क्या ऐसा नेता भी ब्रांड हो सकता है ? जिसे सरकारी कार नही चाहिए ? जिसे सिर्फ दो कमरे का मकान चाहिए ? क्या ऐसा नेता भी ब्रांड हो सकता है.

कंफ्यूज मत हो जाईये …मे किसी एक नेता की बात नही कर रहा. मै तो एक आम सवाल उठा रहा हूँ की क्या नेता ब्रांड हो सकता है ? वो नेता जो कहता है की उसे खरीदने वाला पैदा नही हुआ है ? लेकिन वही नेता रोज़ आपके पैसों से ही खुद को बेच रहा है ? टीवी पर. रेडियो पर. अखबार पर. दीवार पर. होर्डिंग पर. १०००० हज़ार रूपए प्रति दस सेकंड के रेट पर. १०००० हज़ार रूपए प्रति सेंटीमीटर की दर पर.

और सच तो ये है कि आज जितना कोकाकोला का विज्ञापन नहीं दिखता उतना आपका नेता दिखता है. दरअसल कोका कोला को ब्रांडिंग के लिए कम्पनी से पैसे भरने होते हैं लेकिन नेताजी की ब्रांडिंग नेता की जेब से नहीं होती. मित्रों…सोचियेगा….आपका पसंदीदा ब्रांड जो भी हो पर सोचियेगा. क्या नेता ब्रांड है, उत्पाद है ..बाज़ार है?

आजतक में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके और इन दिनों इंडिया संवाद नामक पोर्टल संचालित कर रहे पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से.

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छप्पन इंच का लिजलिजा सीना और केजरीवाल का हिम्मत भरा प्रयोग

Sanjaya Kumar Singh : 56 ईंची का लिजलिजा सीना… नई सरकार ने सत्ता संभालने के बाद से सूचना के सामान्य स्रोतों और परंपरागत तरीकों को बंद करके सेल्फी पत्रकारिता और मन की बात जैसी रिपोर्टिंग शुरू की है। प्रधानमंत्री विदेशी दौरों में पत्रकारों को अपने साथ विमान में भर या ढो कर नहीं ले जाते हैं इसका ढिंढोरा (गैर सरकारी प्रचारकों द्वारा ही सही) खूब पीटा गया पर रिपोर्टर नहीं जाएंगे तो खबरें कौन भेजेगा और भेजता रहा यह नहीं बताया गया। प्रचार यह किया गया कि ज्यादा पत्रकारों को नहीं ले जाने से प्रधानमंत्री की यात्रा का खर्च कम हो गया है लेकिन यह नहीं बताया गया कि कितना कम हुआ? किस मद में हुआ? क्योंकि, विमान तो वैसे ही जा रहे हैं, अब सीटें खाली रह रही होंगी। जो जानकारी वेबसाइट पर होनी चाहिए वह भी नहीं है। कुल मिलाकर, सरकार का जनता से संवाद नहीं है।

प्रधानमंत्री भले दावा करें कि वे गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले से सोशल मीडिया पर ऐक्टिव हैं पर यह नहीं बताते कि उस समय कौन सी मीडिया पर ऐक्टिव थे। एकतरफा संवाद चल रहा है। जवाब वो देते नहीं सिर्फ मन की बात करते हैं। औचक भौचक लाहौर की यात्रा कर आए लेकिन उससे देश का क्या भला हुआ या होने की उम्मीद है इस बारे में कुछ बताया नहीं गया और पठानकोट हो गया। इसमें कोई शक नहीं कि पहले मामले को दबाने और कम करने के साथ-साथ लापरवाहियों को छिपाने की कोशिश की गई। अभी भी कोई अधिकृत खबर नहीं आ रही है और मीडिया ने मुंबई हमले के समय जो जैसी रिपोर्टिंग की थी वैसे ही कर रही है।

ना मीडिया को जनता या देश या मुश्किल में फंसे लोगों की चिन्ता है और ना सरकार में उनकी भलाई की ईच्छा शक्ति। नुकसान कम या मामूली है यह बताने की कोशिश हर कोई कर रहा है। सरकारें अमूमन ऐसी ही होती हैं। इस सरकार से भी कोई उम्मीद नहीं करता अगर ये लव लेटर लिखने का मजाक उड़ाकर सत्ता में नहीं आए होते। पर लव लेटर लिखने वाले उतना तो कर रहे थे तुमसे तो जिसपर लव लेटर लिखना बनता है उधर गर्दन नहीं घुमाई जा रही। 56 ईंची सीना इतना लिजलिजा हो सकता है यह अंदाजा किसी को नहीं था। बात सिर्फ पठानकोट या पाकिस्तान पर हमला करने या उससे निपटने की नहीं है। आप तो अरविन्द केजरीवाल को हैंडल नहीं कर पा रहे हैं। आरोप लगा दिया कि ऑड ईवन फार्मूला भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए है और पर्दा डालने के लिए नजीब जंग को छोड़ दिया। वो भी ऐसे कि खुद को छूट मिल गई तो ऑड ईवन में जनता की याद नहीं आई पर दिल्ली सरकार डीडीसीए की जांच नहीं कर सकती है।

दिल्ली सरकार पूरी दिल्ली को (उपराज्यपाल और केंद्रीय मंत्रियों को छोड़ दे तो) नचा सकती है लेकिन डीडीसीए के घोटाले की जांच नहीं कर सकती (क्योंकि घोटाला तब हुआ तब भाजपा का असरदार नेता उसका अध्यक्ष था)। गैर सरकारी प्रचारक ये बताने में लगे हैं कि आज मेट्रो में बहुत भीड़ है। जो मेट्रो से नहीं चलता है वो जानता है कि बहुत भीड़ होती है। फोटो देखता रहा है और जो चलता है उसे पता है शुरू से हो रही है। फिर भी।

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यह प्रयोग गैर जरूरी नहीं है… दिल्ली में ऑड ईवन फॉर्मूला के बारे में आप जो चाहें कहने और राय बनाने के लिए स्वतंत्र हैं (भाषा की शालीनता उसे गंभीर बनाती है) और मैं इस स्वतंत्रता का घनघोर समर्थक हूं। पर केजरीवाल जो कर रहे हैं वह प्रयोग है, शुरू से। कहा था कि जनता अगर नहीं चाहेगी तो इसे लागू नहीं किया जा सकता है और दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट कर दिया था कि स्वयंसेवी लोगों को रोक नहीं सकेंगे। फिर भी ऑड-ईवन चल रहा है तो इसलिए कि इसे जनता का समर्थन है। हो सकता है विरोधी फेस बुक पर ही हों या फिर 2000 रुपए के जुर्माने या किसी और कारण से [इसमें सरकार विरोधी, (मोटे तौर पर भक्त) कहलाना शामिल है] मेट्रो में यात्रा कर रहे हों। कुछेक भक्त समझते हैं कि सत्ता चाटुकार या भक्त ही बनाती है पर सच यह है कि सत्ता के समर्थक और विरोधी होते ही हैं। ऐसे में, दिल्ली में प्रदूषण के मद्देनजर यह प्रयोग लाजमी हो ना हो, गैर जरूरी नहीं है।

इसके बावजूद केजरीवाल सरकार ने यह जोखिम उठाया है तो वह इसके विरोध के लिए तैयार होगी ही। लेकिन तथ्य यह है कि अमूमन सरकारें ऐसा जोखिम भी नहीं उठातीं। केजरीवाल को ड्रामा करना होता तो एलजी और केंद्रीय मंत्रियों को भी इसके दायरे में ले आते और अपने एलजी साब कहां पीछे रहने वाले थे। पर ऐसा नहीं करके उन्होंने यह प्रयोग करने का निर्णय किया है। शुरू के तीन दिन ठीक-ठाक गुजर जाने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि आज कुछ हो जाएगा पर अभी तक सब ठीक ही लगता है। विरोधी भी अभी तक यही कह रहे हैं कि मेट्रो में भीड़ बहुत ज्यादा है। सड़क पर आम सोमवार के मुकाबले ट्रैफिक बहुत कम है इससे कोई इनकार नहीं कर रहा है। अगर ऐसा है तो मेट्रो में भीड़ नियंत्रित करने के उपाय करने होंगे, किए जा सकते हैं। कर दिए जाएंगे।

मेट्रो से चलने वालों या अपनी गाड़ी छोड़कर जाने वालों को कैसी क्या दिक्कत हुई यह अभी पता नहीं चला है। अभी सिर्फ फोटुएं ही आई हीं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कहा है कि 15 तारीख के बाद इसपर विचार करके आगे की योजना बनाई जाएगी। अपने बारे में खुद उन्होंने सुबह ही रेडियो पर कहा था कि वे दो अन्य मंत्रियों के साथ उनकी नैनो कार से दफ्तर जाएंगे। आरोप लगाने और मजाक उड़ाने के लिए कुछ भी कहा जा सकता है।

स्कूल बसों की तरह ऑफिस बसें क्यों नहीं? सम-विषम का फार्मूला लोगों को जागरूक करने के लिए तो ठीक है। कार पूलिंग के लिए प्रेरित करने के लिए भी ठीक है। अपील करने के लिए भी अच्छा है। पर जबरदस्ती लागू करने के लिए ठीक नहीं है। अभी स्थिति यह है कि जिसके पास एक गाड़ी है वह दूसरी खरीदने की सोच रहा है और जिसके पास नहीं है उसे लिफ्ट मिलने की संभावना आधी रह गई है या उससे भी कम क्योंकि वह पूलिंग वाले साथियों को प्राथमिकता देगा। बगैर सार्वजनिक परिवहन को ठीक और दुरुस्त किए कोई भी पाबंदी लगाई जाए गाड़ियों की संख्या बढ़ेगी, घटेगी नहीं। और भारत में सार्वजनिक परिवहन को ऐसा बनाना कि कार वाले उसमें (स्वेच्छा से) चलने लगें, दुरुह है।

दिल्ली में प्रदूषण का कारण पड़ोसी राज्यों से रोज आने और वापस चले जाने वाले वाहनों की बड़ी संख्या भी होती है। ऑड ईवन में इनके मामले में भी वही व्यवहार होगा पर गाजियाबाद, गुड़गांव, नोएडा और फरीदाबाद में चलने वाली गाड़ियां अपने इलाके में जो प्रदूषण फैलाती हैं उसका असर क्या दिल्ली नहीं पहुंचेगा? ऐसे में सिर्फ दिल्ली वालों से उम्मीद करना उनके साथ ज्यादती भी है। जहां तक सड़कों पर गाड़ियों के कारण प्रदूषण का सवाल है, मेट्रो चलने के बाद बहुत सारे लोग वैसे ही गाड़ी और मोटर साइकिलों से दफ्तर नहीं जाते हैं और इसका पता मेट्रो स्टेशन पर खड़ी गाड़ियों से लगता है। ज्यादातर मेट्रो स्टेशन पर पार्किंग की जगह कम पड़ जाती है। और भी लोग सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें इसके लिए सार्वजनिक परिवहन को बेहतर करना होगा।

कार से दफ्तर जाने वाले के लिए मेट्रो से दफ्तर जाना मुश्किल ही नहीं कई मामलों में असंभव भी है। हर कोई खड़े होकर यात्रा नहीं कर सकता। बाकी पार्किंग से प्लैटफॉर्म तक पहुंचना भी आसान नहीं है। इतनी परेशानी के बाद जो प्रदूषण कम होगा वह किसी मंत्री या लाट साब की सरकारी गाड़ी किसी भी क्षण पूरा कर देगी। अगर वाकई सड़क पर गाड़ियां कम करनी है तो स्कूल बसों की तरह ऑफिस बसें (गाड़ियां) चलाई जानी चाहिए। हालांकि, बहुत सारे अभिभावक भिन्न कारणों से बच्चों को भी कार से स्कूल छुड़वाते हैं। इसके कारण देखते हुए ऐसे उपाय किए जाने चाहिए कि ऐसी गाड़ियों का बंदोबस्त किया जाए जो लोगों को घर से ले जाए और वापस घर छोड़े समय से, आराम से। यह काम ऑफिस वाले भी कर सकते हैं और कर्मचारी भी आपसी सहयोग से कर सकते हैं। रोज गाड़ी से दफ्तर जाने वालों के लिए इससे कम कोई उपाय उन्हें मजबूर करना है। कभी-कभी जाने वालों या जिसके पास कार खरीदने के पैसे ही ना हों उसकी बात अलग है। प्रदूषण के प्रति लोगों को जागरूक और प्रेरित करने का लाभ यह हो कि लोग मोहल्ले के बाजार तक पैदल जाने लगें, मेट्रो स्टेशन तक पैदल चले जाएं – वह भी कम नहीं होगा और भीड़-भाड़ भी काफी कम हो जाएगी।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने अनुवादक हैं. उनका ये लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

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Modi and his diplomacy

By Prasoon Shukla (CEO & Editor-in-Chief, News Express)

The diplomacy of Prime Minister Narendra Modi is paying dividends. Increasingly ostracized leader, Russian President Vladimir Putin met Modi at Hyderabad House, Thursday, marking the beginning of Annual India-Russia Summit. United States President Barrack Obama is arriving New Delhi on the occasion of Republic Day. In fact, both Moscow and the United States are looking to revitalize relations and foster economic ties with India. This is the Modi’s diplomatic success and such enthusiasm has probably never been witnessed earlier.

The dream of the Prime Minister Narendra Modi to transform India into one of the most powerful nation in the world is assuming shape albeit slowly. Most of the world powers are eager to strengthen relationship with India be it United States, Russia, Japan or even China.

It is no fluke that when Prime Minister Modi invited President Obama to be the chief guest at the Republic Day ceremony next year, he readily accepted it. Shortly after receiving the official letter from the White House, Prime Minister Modi posted a message on Twitter to say, “This Republic Day, we hope to have a friend over, invited President Obama to be the 1st US President to grace the occasion as Chief Guest.”

On Putin’s visit to India, America issued a cautious note saying – “ Putin’s visit to India would not cast a shadow on President Barack Obama’s trip in January, but now is not the time for business as usual with Russia.”

“I know there’s a lot of rumours, often of trade deals or economic deals, but let’s see what’s actually put into practice here,” US State Department spokesperson Marie Harf told reporters. In fact US and Russia relationship are tense over Russia’s aid to separatists in Ukraine. Inteational sanctions have been imposed against Russia. After being browbeaten over Ukraine at the Group of 20 summit meeting in Australia, Putin left before the event officially ended. But now, US should also understand that it can’t guide the world politics at the wish.

Of course, Modi is doing balancing act. Modi had reassured Putin that nothing had changed. “Ask any child in India who is India’s best friend inteationally, and they will tell you that it is Russia,” he had earlier said. But it is clear that the new decision makers in New Delhi say they are less interested in geopolitics than in jump-starting the economy as fast as possible. With its own economy swooning, Russia is unlikely to offer game-changing investment or trade agreements. And it is not the only world power vying for India’s attention. China’s president visited for two days in September, and President Obama will attend Republic Day celebrations in January.

Putin seeks ways to shore up his sagging economy and support with Cold War-era friend India, the wildly popular Modi — who just won Time magazine’s reader poll for “Person of the Year” — will be operating from a position of strength. The Russian ambassador to India, Alexander Kadakin, quipped to reporters Monday that India was like “a rich fiancee with many bridegrooms.”

Putin’s visit comes at a time when the Russian economy is buffeted by Weste economic sanctions over Ukraine and falling oil prices that has led to a sharp fall in the trouble. Narendra Modi and Russian President Vladimir Putin would unveil on December 11 a grand vision document to meet India’s energy needs and boost trade and investment ties across wide-ranging sectors including a deal on sovereign fund and in doing this, Modi has shown the courage to by-pass a recent veiled threat from US official of the risks of doing business with Moscow.

Modi has reassured Russian leader that the two countries’ historical ties remain important while keeping the U.S.-India relationship moving forward. “Modi will likely go heavy on the pro-Russia rhetoric, particularly by playing up the historical friendship between the two countries, while pursuing deals — such as energy ones — when the opportunity arises, while with the U.S., he’ll likely pursue deeper defense ties and a deeper overall relationship.

India’s Ministry of Exteal Affairs officials have stressed India’s decades-long association with the former Soviet Union and reiterated support for Russia as the country faces economic fallout from sanctions imposed by the West for Putin’s annexation of Crimea in March and Russia’s intervention in the conflict in Ukraine. Russia and India have ties dating to the Soviet era, when economic aid flowed freely to Indian leaders who sought healthy connections to communist leaders as Pakistan aligned itself with the United States.

“India is a reliable and time-tested partner,” Putin said recently. “Russia and India have a huge potential of bilateral trade and economic cooperation.”

The Kremlin has tried to play up new ties to Asia as a way of showing that Russia can survive sharply constricted economic relations with the West. But with recession looming, Russia’s economy tells a different story. The country is in the unfamiliar position of seeking more from India than it might have to offer in retu.

Military and technological cooperation is one of the most important aspects of the Russian-Indian strategic partnership.

In fact Russia needs India much more than India needs Russia. Modi is likely to push for greater economic investment and trade with Russia — as he has during visits with other allies — in energy and defense manufacturing.

लेखक प्रसून शुक्ला न्यूज एक्सप्रेस चैनल समूह के सीईओ और एडिटर इन चीफ हैं.

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भाजपाई कब तक मुसलमानों और दलितों के लिए कुत्ता और कुत्ते के बच्चे जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते रहेंगे?

(मोहम्मद अनस)

Mohammad Anas : हरियाणा में दो दलित बच्चों को जिंदा जलाए जाने पर रक्षा राज्य मंत्री वीके सिंह ने कहा, ‘कोई कुत्ते को पत्थर मार दे तो सरकार ज़िम्मेदार नहीं होती।’ मंत्री जी कुत्ते के मारने पर किसी ने सरकार को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया, हम सब तो इंसानियत की हिफाजत करने में जानबूझ कर पीछे रहने वाली सरकार से सवाल कर रहे हैं कि आखिर कब खत्म होगा हिंसा का सिलसिला। आखिर कब तक मुसलमानों और दलितों के लिए कुत्ता और कुत्ते के बच्चे का शब्द इस्तेमाल करते रहेंगे भाजपाई?

केंद्रीय राज्य मंत्री वीके सिंह प्रधानमंत्री मोदी जी के बहुत खास हैं. इन्हीं वीके सिंह ने हरियाणा के जलाकर मारे गए उपरोक्त दो दलित बच्चों को कुत्ता कहा है, जिन्हें ऊंची जाति के अपराधियों ने बंद कमरे में जला कर मार डाला था। क्या आप सभी पाठकों को ये बच्चे कुत्ते नज़र आते हैं? अगर नहीं तो हर मिलने जुलने वाले भाजपाई को यह तस्वीर दिखा कर सवाल कीजिए कि आखिर वीके सिंह ने इन बच्चों की तुलना कुत्ते से क्यों की? शर्म कीजिए मंत्री जी।

एक मंत्री जिसने भारतीय गणतंत्र को संगठित और सुदृढ़ रखने की संवैधानिक शपथ खाई थी उसने डकार ले कर कहा है, ‘कुत्ते को पत्थर मारने पर सरकार ज़िम्मेदार नहीं होती।’ अपने ही देश के नागरिकों को कुत्ता कहने वाले वीके सिंह को ज़रूर नरेंद्र मोदी से शाबाशी मिलेगी, क्योंकि कुछ दिनों पहले साहब ने भी देश की जनता को कुत्ते का बच्चा कहा था। कुत्ता कहलाए जाने की परंपरा को बनाए रखने की अगली कड़ी में हो सकता है सेक्यूलर हिंदू जिसमें अगड़ी जाति के लोग, महिलाएं और वे हिंदू आ जाएं जो भाजपा को नहीं पसंद करते। मुसलमानों और दलितों के बाद जो बचते हैं वे हिंदू ही हैं। मुझे उन बुरे दिनों की याद शिद्दत से आती है जब टू जी घोटाला करके कुछ मंत्रियों और सांसदों ने सस्ते दर पर फोन कॉल और इंटरनेट की सुविधा मुहैय्या कराई थी। घोटाले तो अब भी हो रहे हैं लेकिन उसका लाभ जनता को नहीं मिल पा रहा है। छह हजार करोड़ से ऊपर का काला धन ‘बैंक ऑफ बड़ौदा’ की एक शाखा से बाहर चला गया और मोदी जी कहते रह गए, ‘सौ दिनों में काला धन वापस न लाऊं तो फांसी पर चढ़ा देना।’

वीके सिंह जी हों या फिर नरेंद्र मोदी जी। दोनों ने सुनियोजित हिंसा में मारे गए भारतीयों की तुलना कुत्ते और कुत्ते के बच्चे जैसी उपमाओं से की है। आखिर देश यही तो चाहता था। देश को विकास से भला क्या मतलब। सोशल मीडिया पर भाजपा समर्थकों की भाषा जैसी है वैसी ही भाषा कैबिनेट मिनिस्टर्स और पीएम तक की है। मेरी बात पर यक़ीन न हो तो नरेंद्र मोदी के भाषण यू ट्यूब से उठा कर सुन लीजिए। ऐसी विषम परिस्थितियों में धैर्य बना कर रखना चाहिए, क्योंकि हम या आप अंग्रेजों के दलाल कभी रहे नहीं। जिनके कथित महापुरूषों ने अंग्रेजों से माफी मांगी, क्रांतिकारियों की मुखबिरी की वे देश में सहिष्णुता और बेहतरी कभी ला नहीं सकते। अब जो करना है हमें ही करना है। संघियों का जब तक बहिष्कार नहीं होगा तब तक ये ज़हर बोते रहेंगे।

युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से. अनस से फेसबुक के जरिए संपर्क करने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: Facebook.com/anas.journalist


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सपा से रामगोपाल यादव और अक्षय यादव को तुरंत निकाल देना चाहिए

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ओम थानवी के लिए एक लाख रुपये चंदा इकट्ठा करने की अपील ताकि वो फिर किसी कल्याण के हाथों एवार्ड न लें

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वो माखनलाल के वीसी बनाए ही इसलिए गए हैं ताकि नए मिथक गढ़ सकें….

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रजत शर्मा की नाक के नीचे चलता रहा यह सब सिलसिला…

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मोदी और केजरी स्टाइल का ‘आदर्श’ मीडिया… जो पक्ष में लिखे-बोले वही सच्चा पत्रकार!

: मीडिया समझ ले, सत्ता ही है पूर्ण लोकतंत्र और पूर्ण स्वराज! : मौजूदा दौर में मीडिया हर धंधे का सिरमौर है। चाहे वह धंधा सियासत ही क्यों न हो। सत्ता जब जनता के भरोसे पर चूकने लगे तो उसे भरोसा प्रचार के भोंपू तंत्र पर होता है। प्रचार का भोंपू तंत्र कभी एक राह नहीं देखता। वह ललचाता है। डराता है। साथ खड़े होने को कहता है। साथ खड़े होकर सहलाता है और सिय़ासत की उन तमाम चालों को भी चलता है, जिससे समाज में यह संदेश जाये कि जनता तो हर पांच बरस के बाद सत्ता बदल सकती है। लेकिन मीडिया को कौन बदलेगा? तो अगर मीडिया की इतनी ही साख है तो वह भी चुनाव लड़ ले… राजनीतिक सत्ता से जनता के बीच दो-दो हाथ कर ले… जो जीतेगा, उसी की जनता मानेगी!

इस अंदाज को 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने कहना चाहा। मोदी सरकार ने अपनाना चाहा। इसी राह को केजरीवाल सरकार कहना चाहती है। अपनाना चाहती है। और, पन्नों को पलटें तो मनमोहन सरकार में भी आखिरी दिनों यही गुमान आ गया था जब वह खुले तौर पर अन्ना आंदोलन के वक्त यह कहने से नहीं चूक रही थी कि चुनाव लड़कर देख लीजिये। अभी हम जीते हैं तो जनता ने हमें वोट दिया है, तो हमारी सुनिये। सिर्फ हम ही सही हैं। हम ही सच कह रहे हैं। क्योंकि जनता को लेकर हम ही जमींदार हैं। यही है पूर्ण ताकत का गुमान। यानी लोकतंत्र के पहरुये के तौर पर अगर कोई भी स्तंभ सत्ता के खिलाफ नजर आयेगा तो सत्ता ही कभी न्याय करेगी तो कभी कार्यपालिका, कभी विधायिका तो कभी मीडिया बन कर अपनी पूर्ण ताकत का एहसास कराने से नहीं चूकेगी। ध्यान दें तो बेहद महीन लकीर समाज के बीच हर संस्थान में संस्थानों के ही अंतर्विरोध की खिंच रही है।

दिल्ली सरकार का कहना है, मानना है कि केन्द्र सरकार उसे ढहाने पर लगी है। बिहार में लालू यादव को इस पर खुली आपत्ति है कि ओवैसी बिहार चुनाव लड़ने आ कैसे गये। नौकरशाही सत्ता की पसंद नापसंदी के बीच जा खड़ी हुई है। केन्द्र में तो खुले तौर पर नौकरशाह पसंद किये जाते हैं या ठिकाने लगा दिये जाते हैं लेकिन राज्यो के हालात भी पसंद के नौकरशाहों को साथ रखने और नापसंद के नौकरशाहों को हाशिये पर ढकेल देने का हो चला है। पुलिसिया मिजाज कैसे किसी सत्ता के लिये काम कर सकता है और ना करे तो कैसे उसे बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है, यह मुबंई पुलिस कमिश्नर मारिया के तबादले और तबादले की वजह बताने के बाद उसी वजह को नयी नियुक्ति के साथ खारिज करने के तरीको ने बदला दिया। क्योंकि मारिया जिस पद के लाय़क थे वह कमिश्नर का पद नहीं था और जिस पद से लाकर जिसे कमिश्नर बनाया गया वह कमिश्नर बनते ही उसी पद के हो गये, जिसके लिये मारिया को हटाया गया। यानी संस्थानों की गरिमा चाहे गिरे लेकिन सत्ता गरिमा गिराकर ही अपने अनुकूल कैसे बना लेती है, इसका खुला चेहरा पीएमओ और सचिवों को लेकर मोदी मॉडल पर अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक की रिपोर्ट बताती है तो यूपी सरकार के नियुक्ति प्रकरण पर इलाहबाद हाईकोर्ट की रोक भी खुला अंदेशा देती है कि राजनीतिक सत्ता पूर्ण ताकत के लिये कैसे मचल रही है। और, इन सभी पर निगरानी अगर स्वच्छंद तौर पत्रकारिता करने लगे तो पहले उसे मीडिया हाउस के अंतर्विरोध तले ध्वस्त किया गया। और फिर मीडिया को मुनाफे के खेल में खड़ा कर बांटने सिलसिला शुरू हुआ। असर इसी का है कि कुछ खास संपादक-रिपोर्टरो के साथ प्रधानमंत्री को डिनर पसंद है और कुछ खास पत्रकारों को दिल्ली सरकार में कई जगह नियुक्त कर सुविधाओं की पोटली केजरीवाल सरकार को खोलना पसंद है।

इसी तर्ज पर क्या यूपी क्या बिहार हर जगह ‘निगाहों में भी मीडिया को और निशाने पर भी मीडिया को’ लेने का खुला खेल हर जगह चलता रहा है। तो क्या यह मान लिया जाये कि मीडिया समूहों ने अपनी गरिमा खत्म कर ली है या फिर मुनाफे की भागमभाग में सत्ता ही एकमात्र ठौर हर मीडिया संस्थान का हो चला है। इसलिये जो सत्ता कहे उसके अनुकूल या प्रतिकूल जनता के खिलाफ चले जाना है या फिर सत्ता मीडिया के इसी मुनाफे के खेल का लाभ उठाकर सबकुछ अपने अनुकूल चाहती है। और वह यह बर्दाश्त नहीं कर पाती कि कोई उस पर निगरानी रखे कि सत्ता का रास्ता सही है या नहीं। इतना ही नहीं सत्ता मुद्दों को लेकर जो परिभाषा गढ़ता है उस परिभाषा पर अंगुली उठाना भी सत्ता बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। हिन्दू राष्ट्र भारत कैसे हो सकता है, कहा गया तो सत्ता के माध्यमों ने तुरंत आपको राष्ट्रविरोधी करार दे दिया। अब आप वक्त निकालिये और लड़ते रहिये हिन्दू राष्ट्र को परिभाषित करने में।

इसी के समानांतर कोई दूसरा मीडिया समूह बताने आ जायेगा कि हिन्दू राष्ट्र तो भारतीय रगों में दौड़ता है। अब दो तथ्य ही मीडिया ने परिभाषित किये। जो सत्ता के अनुकूल, उसे सत्ता के तमाम प्रचार तंत्र ने पत्रकारिता करार दिया बाकियों को राष्ट्र विरोधी। इसी तर्ज पर किसी ने विकास का जिक्र किया तो किसी ने ईमानदारी का। अब विकास का मतलब दो जून की रोटी के बाद वाई फाई और बुलेट ट्रेन होगा या बुलेट ट्रेन और डिजिटल इंडिया ही। तो मीडिया इस पर भी बंट गई। जो सत्ता के साथ खड़ा, वह देश-हित में सोचता है। जो दो जून की रोटी का सवाल खड़ा करता है, वह बिका हुआ है। किसी पत्रकार ने सवाल खड़ा कर दिया कि सौ स्मार्ट सिटी तो छोडिये सिर्फ एक स्मार्ट सिटी बनाकर तो बताईये कि कैसी होगी स्मार्ट सिटी। तो झटके में उसे कांग्रेसी करार दिया गया। किसी ने गांव के बदतर होते हालात का जिक्र किया तो सत्ता ने भोंपू तंत्र बजाकर बताया कि कैसे मीडिया आधुनिक विकास को समझ नहीं पाता। और जब संघ परिवार ने गांव की फिक्र की तो झटके में स्मार्ट गांव का भी जिक्र सरकारी तौर पर हो गया।

इसी लकीर को ईमानदारी के राग के साथ दिल्ली में केजरीवाल सरकार बन गयी तो किसी पत्रकार ने सवाल उठाया कि जनलोकपाल से चले थे लेकिन आपका अपना लोकपाल कहां है तो उस मीडिया समूह को या निरे अकेले पत्रकार को ही अपने विरोधियो से मिला बताकर खारिज कर दिया गया। पांच साल केजरीवाल का नारा लगाने वाली प्रचार कंपनी पायोनियर पब्लिसिटी को ही सत्ता में आने के बाद प्रचार के करोड़ों के ठेके बिना टेंडर निकाले क्यों दे दिये जाते हैं। इसका जिक्र करना भी विरोधियो के हाथों में बिका हुआ करार दिया जाता है। जैन बिल्डर्स को लेकर जब दिल्ली सरकार से तार जोड़ने का कोई प्रयास करता है तो उसे बीजेपी का प्रवक्ता करार देने में भी देर नहीं लगायी जाती। और, इसी दौर में मुनाफे के लिये कोई मीडिया संस्थान सरकार से गलबिहयां करता है या फिर सत्ता नजदीक जाता है कि किसी एक मीडिया संस्थान से गलबहियां कर उससे पत्रकारो के बीच अपनी साख बनाये रखी जाती है तो बकायदा मंच पर बैठकर केजरीवाल यह कहने से नहीं हिचकते कि हम तो आपके साझीदार हैं।

यानी कैसे मीडिया को खारिज कर और पत्रकारों की साख पर हमला कर उसे सत्ता के आगे नतमस्तक किया जाये, यह खेल सत्ता के लिये ऐसा सुहावना हो गया है जिससे लगने यही लगा है कि सत्ता के लिये मीडिया की कैडर है। मीडिया ही मुद्दा है। मीडिया ही सियासी ताकत है और मीडिया ही दुश्मन है। यानी तकनीक के आसरे जन जन तक अगर मीडिया पहुंच सकती है और सत्ता पाने के बाद कोई राजनीतिक पार्टी एयर कंडिशन्ड कमरों से बाहर निकल नहीं सकती तो फिर कार्यकर्ता का काम तो मीडिया बखूबी कर सकती है। और मीडिया का मतलब भी अगर मुनाफा है या कहें कमाई है और सत्ता अलग अलग माध्यमों से यह कमाई कराने में सक्षम है तो फिर दिल्ली में डेंगू हो या प्याज। देश में गांव की बदहाली हो या खाली एकाउंट का झुनझुना लिये 18 करोड़ लोग। या फिर किसी भी प्रदेश में चंद हथेलियों में सिमटता समूचा लाभ हो, उसकी रिपोर्ट करने निकलेगा कौन सा पत्रकार या कौन सा मीडिया समूह चाहेगा कि सत्ता की जड़ों को परखा जाये।

पत्रकारों को ग्राउंड जीरो पर रिपोर्ट करने भेजा जाये तो क्या मौजूदा वक्त एक ऐसे नेक्सस में बंध गया है, जहां सत्ता में आकर सत्ता में बने रहने के लिये लोकतंत्र को ही खत्म कर जनता को यह एहसास कराना है कि लोकतंत्र तो राजनीतिक सत्ता में बसता है। क्योंकि हर पांच बरस बाद जनता वोट से चाहे तो सत्ता बदल सकती है। लेकिन वोटिंग ना तो नौकरशाही को लेकर होती है ना ही न्याय पालिका को लेकर ना ही देश के संवैधानिक संस्थानों को लेकर और ना ही मीडिया को लेकर। तो आखिरी लाइन उन पत्रकारों को धमकी देकर हर सत्ताधारी अपने अपने दायरे में यह कहने से नहीं चूकता की हमें तो जनता ने चुना है। आप सही हैं तो चुनाव लड़ लीजिये। और फिर मीडिया से कोई केजरीवाल की तर्ज पर निकले और कहे कि हम तो राजनीति के कीचड़ में कूदेंगे तभी राजनीति साफ होगी। और जनता को लगेगा कि वाकई यही मौजूदा दौर का अमिताभ बच्चन है। बस हवा उस दिशा में बह जायेगी। यानी लोकतंत्र ताक पर और तानाशाही का नायाब लोकतंत्र सतह पर।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी जाने-माने पत्रकार हैं और आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.


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दिल्ली में लोग डेंगू से मर रहे हैं, बिंदेश्वरी पाठक और उनके कर्मचारी मोदी के बर्थडे डांस में जुटे हैं!

नई दिल्ली : एमसीडी ने एक जमाने में सुलभ शौचालय वाले बिंदेश्वरी पाठक को ब्लैकलिस्ट कर दिया था. भाजपा के ही एक नेता की शिकायत के बाद बिंदेश्वरी पाठक ब्लैकलिस्ट किए गए थे. अब भाजपा के ही जमाने में सुलभ शौचालय वाले पाठक जी ब्लैकलिस्ट से न सिर्फ बाहर आ चुके हैं बल्कि एमसीडी द्वारा संचालित किए जाने वाले अस्पतालों की हाउसकीपिंग का काम भी हथिया चुके हैं.

दरअसल बिंदेश्वरी पाठक को समझना पूरे सिस्टम को समझ लेना होगा इसलिए इनकी कहानी इतनी छोटी और एकरूपीय नहीं है. बिदेश्वरी पाठक के बारे में विस्तार से फिर कभी. ताजी सूचना जान लें कि कल नरेंद्र मोदी का जन्मदिन मनाने के लिए बिंदेश्वरी पाठक ने करोड़ों रुपया फूंका है और अपने कर्मचारियों को कई दिनों से डांस से लेकर तरह तरह के उत्सवधर्मी उछलकूद के लिए ट्रेनिंग दिलवा रहे हैं. डेंगू से दिल्ली के लोग मर रहे हैं लेकिन बिंदेश्वरी पाठक की टीम अस्पतालों को अपने हाल पर बजबजाने के लिए छोड़ मोदी स्तुतिगान के रिहर्सल में लगी है.

बताने वाले बताते हैं कि करामाती बिंदेश्वरी पाठक पर नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद लक्ष्मी जैसे टूट कर मेहरबान हो गई हों. एमसीडी के ठेके मिले. उनके हाथ में आ गया एमसीडी द्वारा चलाए जा रहे अस्पताल. इनके नाम हैं- हिंदू राव अस्पताल. कस्तूरबा अस्पताल. आरबीपीएमसी अस्पताल त्रिनगर, स्वामी दयानंद अस्पताल. आईबी अस्पताल त्रिनगर. इन पांचों अस्पतालों की हाउस कीपिंग का ठेका पाठक जी की संस्था सुलभ को मिला हुआ है. इसके अलावा केंद्र द्वारा संचालित दिल्ली के अस्पतालों राम मनोहर लोहिया, लेडी हार्डिंग अस्पताल, कलावती सरन अस्पताल आदि का ठेका भी दुबे जी के सुलभ के हाथ में है. यही नहीं, मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान में इनको उड़ीसा सहित कई राज्यों के सैकड़ों करोड़ के शौचालय का काम दिया है. पाठक जी को अभी बहुत कुछ मिलना है. बनारस से लेकर विशाखापत्तनम तक के प्रोजेक्टस पर पाठक जी की नजर है. ऐसे में मोदी जी के हैप्पी बर्थडे पर कल पाठक जी फ़िक्की में पाँच करोड़ का समारोह कर रहे हैं. सारे वर्कर हफ़्ते भर से अस्पताल को सड़ता छोड़ इस जन्मदिन के समारोह की तैयारी में लगे हैं.

दिल्ली डेंगू से बजबजा रही है और ये पाठक जी जश्न में लगे हैं. कोई भाजपा से पूछे कि जिन बीजेपी के विधायक दल के नेता बिजेंद्र गुप्ता की शिकायत पर सुलभ को ब्लैकलिस्ट किया गया था एमसीडी में कई साल पहले, अब ऐसा क्या हो गया कि बीजेपी की एमसीडी से ही सारे ठेके पाठक जी ने ले लिए हैं. यह सब बिंदेश्वरी पाठक के मैनेजमेंट का फल है. पाठक जी ने मीडिया मैनेजमेंट के लिए भी अच्छा खासा बजट निकाल रखा है. त्रिदिब रमन नामक शख्स एक न्यूज एजेंसी चलाता है जिसे फंड पाठक जी करते हैं. पार्लियामेंटेरियन नामक मैग्ज़ीन का प्रकाशन ये लोग करते हैं. इस मैग्जीन की प्रिंटिंग और कागज आप देख लेंगे तो चकित रह जाएंगे. इस मैग्जीन को ओरीजनल कास्ट ही हजारों रुपये है.

हजारों रुपये का एक एक न्योता भेजा जा रहा है, मोदी जी के बर्थडे में शरीक होने के लिए, सुलभ की तरफ से. महंगे निमंत्रण पत्र की होम डिलीवरी के दौरान पूरा ध्यान रखा जा रहा है कि कहीं कोई छूट न जाए. खास लोगों को बाई हैंड के साथ साथ मेल से भी बर्थडे के आयोजन में शिरकत करने के लिए बुलाया जा रहा है. आखिर इतना खर्चा क्यों. पाठक जी समझदार आदमी हैं. वे जानते हैं कि इस पैसे का बड़ा रिटर्न तो पहले ही मिल चुका है, इससे बड़ा रिटर्न आगे मिलने वाला है. मोदी ने पाठक जी को ओएनजीसी से सोशल रिस्पांसिबिलिटी फ़ंड में सौ करोड़ रुपये दिलाया है. 90 करोड़ रुपये का तो भुगतान हो चुका है. यह उड़ीसा आन्ध्र में ख़र्च हो रहा है. एवज़ में बनारस के घाटों की सफ़ाई में पाठक जी ने टीम लगाई है और इस पार्लियामेंटेरियन मैग्ज़ीन के जरिए बीजेपी के प्रचार में जुटे हैं.

मजेदार है कि हर बार की तरह इस बार भी कारपोरेट और मुख्यधारा की मीडिया इन सब मसलों पर चुप्पी साधे है और जय जय का माहौल बनाए हुए है. कोई मीडियावाला अगर बिंदेश्वरी पाठक, सुलभ, मोदी, बीजेपी, अस्पताल, ठेका, स्वच्छता अभियान, मैग्जीन, बर्थडे आदि के बीच ठीक से काम करे तो उसे एक से बढ़कर एक बड़ी स्टोरीज मिलेगी, लेकिन कोई काहे मोदी और मोदी की सरकार से पंगा लेगा. आखिर सेंटर से बिजनेस भी तो मिलता है चैनलों अखबारों को. इसलिए सब तरफ जय जय है. आम जनता मरे तो मरे. मरते रोते लोगों के आंसू दिखाकर टीआरपी काटो और बाकी गरिष्ठ मसलों मामलों पर चुप्पी साधे रहो. सोचिए, अगर केजरीवाल के बर्थडे की तैयारी इसी तरह कोई उनका नजदीकी ठेकेदार कर रहा होता तो नेशनल मीडिया की सबसे बड़ी खबर क्या होती? इसे कहते हैं असली मीडिया मैनेजमेंट. पाठक जी का पठनीय कहानियां जारी रहेगी. अगर आपके पास भी पाठक जी और सुलभ को लेकर कोई कहानी है तो भड़ास के पास भेजें, मेल आईडी bhadas4media@gmail.com है.

एक बात और बता दें. पाठक जी के सुलभ में कार्यरत वो कर्मचारी जो दिल्ली सरकार व केंद्र सरकार के अस्पतालों की हाउसकीपिंग का काम करते हैं, उन्हें नियमत: जो जो लाभ सुविधाएं मिलनी चाहिए, वो नहीं मिलती. क्यों भई? जब आप प्रोफेशनली कामर्शियल काम कर रहे हैं और इसके एवज में जमकर पैसे ले रहे हैं तो अपने कर्मचारियों को मेडिकल से लेकर पीएफ आदि तक की सुविधाएं क्यों नहीं दे रहे हैं. क्या कि ये कर्मचारी एनजीओ के हैं और ये सेवा भावना से जुड़े हैं. सोचिए. लाला अपना लाभ बढ़ाने के लिए कैसे कैसे नाटक करता है. पाठक जी भी कम बड़े लाला नहीं हैं. मैला ढोने वाली महिलाओं से लेकर शौचालय बनाने तक के काम को कब कब समाजसेवा बता दिया और कब कब कामर्शियल काम दिखाकर पैसा कमा लिया, कोई नहीं जानता. समाजहित काम के नाम पर पदमश्री तक ले चुके हैं. अब भारत रत्न की तैयारी है. यकीन कर लीजिए. बिंदेश्वरी पाठक भारत रत्न के लिए फिलहाल इस सरकार की बेस्ट च्वायस बनते जा रहे हैं. बस देखते जाइए. 

भड़ास के संपादक यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

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भूमि अधिग्रहण पर मोदी सरकार का पीछे हटना किसानों की जीत

: समग्र भूमि व किसान नीति बनने तक संघर्ष अपरिहार्य : प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने रविवार 29 अगस्त को आकाशवाणी के कार्यक्रम ‘मन की बात’ में यह घोषणा की कि भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा तथा वह किसानों का हर सुझाव मानने को तैयार हैं। यह घोषणा देश भर के किसानों और जनता के प्रतिरोध की जीत है, जिसकी वजह से ही मोदी सरकार को अपने पांव पीछे खींचने पर मजबूर होना पड़ा है। नहीं तो चंद रोज पहले तक श्रीमान मोदी, उनकी पार्टी भाजपा और उनके रणनीतिकार जिस तरह से इसे किसानों और देश के हित में बताकर शोर मचा रहे थे और इसे हर हाल में लागू करने के लिए ताल ठोंक रहे थे, यह बात किसी से छिपी नहीं है। भाजपा-विरोधी शासकवर्गीय पार्टियां इसका श्रेय लेने का चाहे जितना ढिंढोरा पीटें लेकिन आज जब मोदी सरकार ने अध्यादेश को आगे न बढ़ाने का फैसला ले लिया है तब एक राजनीतिक मुद्दा, जिसके नाम पर वे अपनी खोयी जमीन को वापस पाने के प्रयास में थे, उनके हाथ से चला गया है।

कांग्रेस की सरपरस्ती में ये विरोधी दल यूपीए के 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून का जिस तरह से महिमामंडन कर रहे थे और कह रहे थे कि यह बहुत प्रगतिशील और किसानहितैषी कानून है, वह देश की जनता को सीधे-सीधे बरगलाने के सिवा और कुछ नहीं था। आज भाजपा के विरोध में खड़े कांग्रेस समेत अन्य विरोधी दल जो भी दावा करें लेकिन देश की राजधानी दिल्ली से लेकर गांव-गांव तक देश के किसान और जनता जिस बहादुरी और जुझारू तेवर के साथ इस काले अध्यादेश के खिलाफ प्रतिरोध संघर्ष में उतरे और डटे रहे, वह काबिलेतारीफ है। किसानों के इस आंदोलन की वजह से ही देशी-विदेशी कार्पोरेट के लाड़ले मोदी को इस अध्यादेश को आगे न बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इस प्रतिरोध संघर्ष के लिए देश के किसान और मेहनतकश जनता निश्चय ही बधाई के पात्र हैं।

खास बात यह है कि इस प्रतिरोध संघर्ष में वाम-लोकतांत्रिक शक्तियों की अहम भूमिका रही है। उन्होंने आंदोलनों की एक अनवरत श्रंखला विकसित की और प्रतिरोध के लोकतांत्रिक तरीकों के जरिए लगातार उसे जारी रखा।  संशोधन अध्यादेश लागू होने के दिन से ही देश भर में धरना-प्रदर्शन जैसे प्रतिरोध के लोकतांत्रिक रूपों के साथ ही दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों को निरंतर बनाए रखना इस संघर्ष के अहम पहलू रहे। 9 अगस्त को दिल्ली में समग्र राष्ट्रीय भूमि व किसान नीति और भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश को वापस लेने जैसे मुद्दों पर धरना एक महत्वपूर्ण पहलकदमी थी। इस कड़ी में 10 अगस्त को ‘स्वराज अभियान’ का किसान मार्च, जो पिछले कुछ महीनों से जारी किसान यात्राओं का पड़ाव था, इस लड़ाई को निर्णायक मुकाम तक ले जाने में कामयाब रहा। इसमें प्रधानमंत्री आवास के सामने रेस कोर्स पर उन शहीद किसानों, जिन्होंने पिछले वर्षों में कर्ज के बोझ एवं फसल की भारी पैमाने पर हुयी तबाही के चलते आत्महत्या की थी, की याद में स्मारक बनाने की मांग ने इसे एक नया आयाम प्रदान किया। ‘स्वराज अभियान’ के नेता योगेंद्र यादव व आइपीएफ प्रवक्ता किसान नेता अजित सिंह यादव समेत सैकड़ों कार्यकताओं की 10-11 अगस्त की रात में गिरफ्तारी ने इसे एक नयी धार प्रदान की। गिरफ्तारी के विरोध में संघर्षरत सैकड़ों किसान कार्यकताओं ने थाने को घेर लिया जिसके दबाव में मोदी सरकार को सभी आंदोलनकारियों को उसी दिन छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। इस आंदोलन का महत्वपूर्ण योगदान यह था कि इसने किसान प्रश्न को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में लाने का काम किया।

इन अनवरत आंदोलनों का ही दबाव था कि 10 अगस्त के ‘किसान मार्च’ के दो सप्ताह बाद मोदी जी को आकाशवाणी के कार्यक्रम ‘मन की बात’ में मन मसोस कर यह कहने के लिए मजबूर होना पड़ा कि अध्यादेश को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा तथा हम किसानों के सभी सुझाव मानने को तैयार हैं। आज जब किसानों ने लड़ाई के एक चरण को जीतने में कामयाबी हासिल कर ली है, तब क्या यह मान लिया जाए कि किसानों का संघर्ष समाप्त हो गया है और उनकी सभी समस्यायों का समाधान यूपीए सरकार द्वारा बनाए गए भमि अधिग्रहण कानून के जरिए हो जाएगा! हालांकि मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण के सवाल पर पीछे जरूर हटी है। लेकिन भविष्य में वह दोबारा अधिग्रहण कानून में संशोधन नहीं करेगी, इस पर यकीन करना एक तरह से धोखा ही होगा। एक ऐसी सरकार जो भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करने के लिए इतनी बेकरार थी कि सारी लोकतंत्रिक परंपराओं और हदों को ताक पर रखकर संसद का सहारा न लेकर उसने अध्यादेश का सहारा लिया और संसद में पारित न होेने की स्थिति में अध्यादेश को तीन-तीन बार बढ़ाया, वह जरूर किसी न किसी मौके की ताक में रहेगी। ऐसी हालत में, जनपक्षधर, किसानहितैषी शक्तियों को खामोश बैठ जाने के बजाए इस पर बराबर सजग एवं सतर्क नजरिया अपनाना होगा।

यहां यह बात महत्वपूर्ण है कि मोदी और मनमोहन के विकास का माडल एक ही है। दोनों ही कार्पोरेट विकास के माडल पर एकमत हैं। दोनों का मकसद किसानों से उनकी जमीनें छीनना है। जहां भाजपा यह काम किसानों की मर्जी के बगैर जोर-जबर्दस्ती के तौर पर करना चाहती है, वहीं कांग्रेस इसी काम को किसानों को बहला-फुसलाकर नरम ढंग से करना चाहती है। हालांकि दोनों का मकसद येन-केन-प्रकारेण किसानों की जमीनें छीनना है। इस काम के लिए उन्हें बरगलाकर उनकी सहमति से जमीनें छीनना कोई मुश्किल काम नहीं है। हम देख रहे हैं कि ‘लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे’ समेत तमाम परियोजनाओं के लिए किस तरह से किसानों की लाखों हेक्टेयर जमीन उनसे छीन ली जा रही है। ऐसी अनगिनत मिसालें हमारे सामने हैं जहां किसानों से विकास और रोजगार के नाम पर उनसे जमीनें ले ली गयीं। आज कांग्रेस किसानों के नाम पर भले ही घड़ियाली आंसू बहा रही हो मगर सच्चाई यही है कि केंद्र में कांग्रेस सरकारों के दौर में औने-पौने और कहीं तो बिना कोई मुआवजा दिए बगैर ही किसानों से जमीनें छीनीं गयीं और उनका समुचित पुनर्वास भी नहीं किया गया।

आज देशी-विदेशी कार्पोरेट की गिद्धदृष्टि किसानों की जमीन पर लगी हुयी है। वे बड़ी ललचाई नजरों से उसे हड़पने के मौके की ताक में हैं। आर्थिक उदारीकरण के प्रक्रिया के दौरान मालामाल हुए उच्च वर्ग के ऐशो-आराम की खातिर 100 स्मार्ट सिटी बनाने की जिस परियोजना का देश की जनता को सब्जगाग दिखाया जा रहा है, क्या वह किसानों की बेशकीमती जमीनों को हड़पे बगैर मुमकिन है? हमारी खेती-किसानी जिस तरह के संकट का सामना कर रही है, उसमें उन्हें फुसलाकर जमीनें हासिल करना सरकारों के लिए कोई बड़ा मुश्किल काम नहीं होगा। जमीन का सवाल हमारी खाद्य सुरक्षा, जनता की आजीविका, रोजगार, पर्यावरण संरक्षण जैसे अहम मसलों से सीधे तौर पर जुड़ा है। खेती लायक जमीनों का रकबा कम होने से निश्चित तौर पर खाद्य सुरक्षा पर भी असर पड़ेगा। देश भर में दाल, तेल, प्याज, टमाटर जैसी रोजमर्रा की खाद्य वस्तुओं के दाम इसीलिए आसमान छू रहे हैं क्योंकि खाद्य सुरक्षा के प्रश्न पर सरकारें गंभीर नहीं है।

कितनी शर्मनाक बात है कि आज भी जमीन का सही हिसाब हमारे सामने नहीं रखा जाता है। सरकारें आजादी हासिल होने के बाद भी इस बात को जनता से छिपाती रही हैं। कितनी जमीन खेती में, कितनी उद्योगों में, कितनी बुनियादी अधिसंरचना में इस्तेमाल हुयी है और ऐसी कितनी जमीन है, जो किसानों से अधिग्रहीत की गयी मगर अभी उसका कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा है तथा खाली पड़ी हुयी है। और विकास की खातिर कितनी जमीन की अभी और जरूरत है, इसे देश की जनता को जानने का पूरा हक होना चाहिए। लेकिन देश और प्रदेश की सरकारों ने यह करने के बजाए देशी-विदेशी निजी कंपनियों को फायदा पहंुचाने के लिए तथाकथित विकास के नाम पर किसानों से जोर-जबर्दस्ती से उनकी जमीनें छीनीं। होना तो यह चाहिए था कि कृषि को प्रोत्साहित किया जाता, देश के बजट में खेती के लिए समुचित धन का प्रबंध किया जाता, सहकारी खेती को बढ़ावा दिया जाता और उसे रोजगार से जोड़ा जाता। लेकिन इसके बजाए खेती की उपेक्षा की गयी, थोड़ा बहुत जो मिल भी हो रहा था उसे भी एक-एक कर बंद कर दिया जा रहा है। आज खेती की बदहाली का आलम यह है कि हजारों की तादाद में किसान आत्महत्या कर चुके हैं और अभी भी यह सिलसिला अनवरत जारी है। बड़ी तादाद में वे भारी कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं और खेती के लगातार घाटे में जाने की वजह से बेहतर रोजगार की तलाश में बड़े पैमाने पर गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।

तब यह सवाल हमारे सामने उत्पन्न होता है कि गंभीर संकट के इस दौर में इसका रास्ता और विकल्प क्या हो सकता है? आज सर्वोपरि, इस बात की जरूरत है कि एक भूमि नीति और कृषि नीति का निर्माण किया जो कृषि और उससे जुड़े सभी पहलुओं पर समग्रता में विचार करे। इसके लिए विकास के मौजूदा कार्पोरेट माडल को उलटना होगा और उसकी जगह जनपक्षधर किसान माडल को स्थापित करना होगा। ऐसा करके ही खेती को बचाया जा सकता है, खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है और खेती में ही भारी पैमाने पर रोजगार का सृजन कर बेरोजगारी जैसी समस्यायों का समाधान भी किया जा सकता है। इसलिए समूचे देश, खासकर किसानों के समक्ष जो सबसे बड़ी चुनौती है, वह यह कि समग्र भूमि नीति और कृषि नीति को प्रमुखता से राजनीतिक संघर्ष के एजेण्डे पर लाया जाए और इसके लिए संघर्ष को तेज किया जाए। इसे हासिल किए बगैर देश को सही मायनों में विकास के पथ पर अग्रसर नहीं किया जा सकता है और जब तक इसे हासिल नहीं कर लिया जाता है तब तक इस संघर्ष को निरंतर जारी रखना होगा।

देश की वाम, लोकतात्रिक, जनपक्षधर, न्यायप्रिय और प्रगतिशील ताकतों को इसी राजनीतिक दिशा पर आगे बढ़ने का कार्यभार है। नहीं तो किसानों के पक्ष में आज जो लड़ाई जीती गयी है, उसके व्यर्थ चले जाने का खतरा मंडराता रहेगा। देश की विविध संघर्षशील ताकतें, जो देश और जनता के प्रति सही मायनों में समर्पित हैं, को वैकल्पिक नीतियों और वैकल्पिक राजनीति के ऐजेण्डे के साथ इसी दिशा में संघर्ष को संचालित करने की जरूरत है,। बदलाव की इस लड़ाई में साझा मंच और साझा प्रयास आज वक्त की जरूरत है।

लेखक कौशल किशोर लखनऊ में पदस्थ हैं और दशकों से कामरेड के रूप में पूर्णकालिक तौर पर सक्रिय हैं. पहले सीपीआईएमएल के साथ थे. अब आल इंडिया पीपुल्स फ्रंड से जुड़े हुए हैं. इनसे संपर्क 08795387675 के जरिए किया जा सकता है.

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