राख होती मीडिया की साख और रोज़ी-रोटी की कशमकश!

जनता में मीडिया को किस नज़रिए से देखा जाने लगा है ये किसी से छुपा नहीं है। माइक आईडी और खबर का लहजा समझते ही खबर को तैयार करने में दृष्टिकोण से ज्यादा कोण यानी एंगिल प्रभावी होता है जो ये बताता है कि ‘नेपथ्य’ के ‘घटनाक्रम’ क्या रहे होंगे। अब मीडिया की चाल, उसका चरित्र और चेहरा समझना बेहद आसान सा लगने लगा है। मीडिया का हिस्सा और मीडिया की जानकारी रख रहे लोगों के लिए ही नहीं, उनके लिए भी जो महज आम दर्शक और पाठक के रूप में इससे जु़ड़े हुए हैं। सवाल करने वाला मीडिया ही अब ज्यादा सवालों में रहने लगा है।

टीआरपी का गणिच जो भी कहे कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आम लोगों की खबरिया चैनलों में दिलचस्पी कम होने लगी है। यानी नहीं के बराबर रह गई है। उतनी ही जितनी खबरिया चैनलों की निष्पक्षता में दिलचस्पी है। सब कुछ प्रेरित, पोषित और प्रभावित सा लगता है चुनाव के दौर में और भी इस प्रयास का परचम लहराता हुआ नजर आता है। बड़े चैनलों का बड़ा दायरा है, बड़ी शान है, सुनियोजित आक्रामकता भी बड़ी है, हां बड़प्पन ज़रा कम है। जाहिर है तटस्थ नज़रिए से सोचने-समझने और काम करने वाले लोगों को खबरें परोसने का अंदाज़ अब कायल नहीं करता बल्कि एक तरह से घायल करता है।

अपने स्वार्थ, भय और प्रीत के हिसाब से टीवी में जहां कई खबरों को उठाने और गिराने का एक सिलसिला सा रहा हैं, वहीं ये सिलसिला अब कुछ मध्यम और निम्न स्तर के चैनलों के लिए खबरे न दिखाओं और पैसे वसूलों, खबरें दिखाओं और पैसे वसूलो तक पहुंच गया है। यानी खबरों के भय और प्रीत दोनों को रेवेन्यू में बदलो। टीआरपी के आधार पर मिलने वाले रेवेन्यू और डीएवीपी के इश्तहार से वंचित इन चैनलों के लिए बस यही एक रास्ता है या यूं कहें कि आखिरी रास्ता है। टीआरपी इनके पास नहीं के बराबर होती है और डीएवीपी के मानदंड में ये आते भी नहीं। अगर आ जाएं तो इन चैनलों का गुज़ारा इससे मिलने वाले इश्तहार से नहीं होगा। चैनलों से जुड़े लोग और जानकार ये जानते हैं कि बाज़ार के विज्ञापन और डीएवीपी के विज्ञापन दर बड़े चैनलों का भी खर्च नहीं जुटा सकते तो निम्न और मध्यम वर्ग के चैनलों की बिसात ही क्या है।

चैनलों की चमक से प्रभावित लोगों को इस धंधे में शुभ लाभ के सपने दिखाकर चैनल की शुरुआत करने वाले और ज्यादातर छह महीने से साल भर तक चैनल चलाने वाले लोगों की इसके बाद उल्टी गिनती शुरू हो जाती है। पहले पार्टनर पीछा छु़ड़ाता है उसके बाद बकाएदार उसके पीछे पड़ जाते हैं, फिर चैनल को बेचने की कवायद शुरू होती है और उसके लिए चैनल के ऑफिस में उन लोगों को घुमाया जाता है, जिनमें ज्यादातर लोग या तो जलेबी की दुकान पर बैठे लाला की तरह दिखते हैं या फिर इतने घाघ होते हैं कि चैनल मालिक ये कन्वींस करने में नाकाम रहता है कि चैनल खरीदना आखिरकार उनके लिए फायदे का सौदा क्यों है। नतीजा ये होता है कि चैनल जिस भी तरीके से चल रहा हो, उसमें काम करने वाले लोग अनिश्चय और अनिर्णय की स्थिति में होंते हैं और आगे बढ़ने के लिए उस वेतन की तारीख का इंतजार कर रहे होते हैं, जो उन्हें करीब बताई जाती है, लेकिन खिसकते हुए दूर दिखाई पड़ने लगती है।

बड़े चैनलों में काम के माहौल में तमाम दबाव जरूर होते हैं लेकिन सैलरी को लेकर आराम रहता है, वो भी तभी तक जब तक आपके नसीब में हो, कभी भी नौकरी और आपके बीच कोई अनजाना सा कारण अनहोनी के रूप में खड़ा हो जाता है और आप महीने की आखिरी तारीख या अगले महीने की एक से सात तारीख के बीच वेतन पाने वाली प्रणाली से कही दूर अपने आपको खड़े पाते हैं। कभी-कभी तो गई नौकरी और नई नौकरी के बीच फासला इतना लंबा हो जाता है कि आपकी छोटी-मोटी दुनिया को पूरी तरह हिलाडुला देता है और आप उससे उबरने की कोशिश में पूरा जी-जान लगा देते हैं। आपकी नौकरी और आपके बीच खूबसूरत तालमेल तभी तक बना रहेगा, जब तक वक्त आपके साथ चल रहा है।

फिल्मसिटी के कई चैनलों में सैकड़ों की संख्या में अचानक हुई छंटनी के किस्से डरा रहे होते हैं। हाल में भी कुछ चैलनों में छंटनी की घटनाएं हुई हैं, ऐसे चैनल ने भी अपनी खराब आर्थिक सेहत का हवाला देकर कॉस्ट कटिंग के नाम पर अपने स्टाफ की छंटनी की है जो सरकार की आर्थिक नीतियों के गुण गाने के लिए जाना जाता रहा है। एक और चैनल में तो एक महीने से तीन महीने के बीच स्टाफ को बदल देने या उन्हें हटा देने की परंपरा सी बना रखी है। ये अलग बात है कि इस परंपरा के तहत विदा किए गए कुछ लोग वापस भी बुलाए गए हैं, लेकिन चैनल का चल पाना फिर भी मुमकिन नहीं लगता है। करोड़ों के कारोबार वाले बिस्कुट के बड़े कारोबारी इस चैनल के मालिक ने अपने ब्यूरो प्रभारी को साफ तौर पर ईमेल भेजकर सरकारी विज्ञापनों के जरिए पचीस लाख रुपए मासिक रेवेन्यू जुटाने को कहा है।

चैनल की नाउम्मीद करने वाली कमाई की दुहाई देते हुए भेजा गया ये मेल उस चैनल में काम करने वाले लोगों के मन में क्या नौकरी को लेकर कशमकश पैदा नहीं करेगा। जब इतने बड़े बिस्कुट कारोबारी के लिए चैनल की आर्थिक चुनौतियां बड़ी हैं तो उन लोगों के बारे में क्या कहा और सोचा जाए जो बिना किसी निश्चित बजट और प्लानिंग के चैनल खोलकर बैठ गए है और पचास से सौ लोगों को अपने चैनल में काम करवा रहे हें और अपने स्टाफ को घंटे और मिनट से लेकर छुट्टी तक, एच आर के सारे नियम समझाते नहीं थकते। बस ये बताना भूल जाते हैं कि वो किस नियम के तहत अपने स्टाफ को अप्वाइंटमेंट लेटर और आई कार्ड नहीं देते और सैलरी क्यों एकाउंट में नहीं देकर नगद देते हैं। जहां तक जिला संवाददाताओं की बात है कि उन्हें पैसे देने की बजाय उनसे पैसे लेकर माइक आईडी दी जाती है। कुछ लोगों से इस शर्त पर ही खबर मंगाई जाती है कि अपने जिले या शहर से उस चैनल के लिए विज्ञापन भी जुटाएं।

अनियमितता और अनिश्चितता के आलम वाले कई चैनलों में काम करना मई के महीने में पचास के करीब पहुंच चुके तापमान को झेलने जैसा है। मई में तो फिर भी उम्मीद होती है कि वो अपने बाद जून और जुलाई लेकर आएगा, जिसमें बारिश की संभावनाएं होंगी, जो तपिश को कम करेगी और राहत देगी, लेकिन ऐसे चैनलों में न तो आपको आगे का रास्ता दिखेगा और न ही सफर की कोई गुंजाइश। ऐसे में दृढ़ इच्छाशक्ति और आत्मबल ही आपको आगे का रास्ता दिखाएगा। कुछ हटकर सोचिए और बढ़े चलिए।

वरिष्ठ पत्रकार अमर आनंद का विश्लेषण. संपर्क : amaranand07@gmail.com

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Comments on “राख होती मीडिया की साख और रोज़ी-रोटी की कशमकश!

  • दीपक says:

    अमर आनंद जी के साथ काम कर चुका हूं. कहना ही होगा कि सिर्फ अपना ही नहीं, टीवी के सभी आम पत्रकारों का यर्थाथ कहा है उन्होंने. विचारणीय ये भी है कि इसी व्यवस्था में कैसे कुछ लोग करोड़पति, प्रभावशाली संपर्कों वाले पुरोधा पत्रकार बन जाते हैं.

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  • अज़ीम मिर्ज़ा says:

    अमर आनन्द जी आपने बहुत सटीक आलेख लिखा है, आपही कुछ सुझाइए पत्रकारों के अच्छे दिन कब आएंगे। जब योग्यता के हिसाब से पत्रकारों की नियुक्ति हो, ज़िले के पत्रकारों को भी नियक्ति पत्र, कार्ड और सम्मानजनक तनख्वाह मिल सके? आखिर कब तक संस्थान करेंगें दोहन ज़िले के पत्रकारों का? समाज को आइना दिखाने वाले संस्थान क्यों जिलों के पत्रकारों को दलाल बनने पर मजबूर कर रहे हैं?

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