खबरों से हो रहा सामूहिक बलात्कार

हमें यह लिखने में कताई संकोच नहीं हो रहा है कि आज मीडिया में खबरों के साथ सामूहिक बलात्कार होने लगा है। हम मीडिया से करीब ढाई दशक से जुड़े हैं, इसके बाद भी हम कहते हैं कि आज का मीडिया इतना ज्यादा पेशेवर हो गया है कि उनको महज विज्ञापनों के अलावा कुछ नजर नहीं आता है। यह बात काफी दिनों से लिखने का मन था, लेकिन आज अचानक यह लिखने का अवसर इसलिए निकला क्योंकि आज फेसबुक पर हमने अपने ढाई दशक पुराने मित्र अनिल पुस्दकर का खेलों को लेकर एक दर्दभरा बयान पढ़ा।

हम कहना चाहते हैं कि खेलों की कदर अगर आज अपने देश की सरकार के साथ मीडिया को होती तो खेलों की यह दुगर्ति नहीं होती। हम तो सरकार से ज्यादा खेलों की दुगर्ति के लिए मीडिया को दोषी मानते हैं। हम खुद 25 सालों से खेल पत्रकारिता से जुड़े हैं, खेल और खिलाड़ियों के दर्द को हमने काफी करीब से महसूस किया है, लेकिन इस बात को आज तक अपनी सरकार और मीडिया नहीं सम­ा पाई है। जिस तरह से खेल और खिलाड़ियों को सरकार ने किनारे कर रखा है और उसकी कदर नहीं होती, ऐसा ही कुछ हाल मीडिया में खेल और खेल पत्रकारों का है। जो आप लिखना चाहते हैं, वह लिखने नहीं दिया जाता है। हमने इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए अपनी खेल पत्रिका खेलगढ़ का प्रकाशन छत्तीसगढ़ बनने के बाद से प्रारंभ किया है। इसमें हमने हमेशा खेल और खिलाड़ियों के भले के लिए लिखा है और जिंदगी की अंतिम सांस तक लिखते रहेंगे। हमें भले इस पत्रिका को निकालने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन इसको हम निकाल रहे हैं और इसको निकालते रहेंगे।

बहरहाल हम बात करें मीडिया की। कहने को मीडिया का विकास हुआ है, लेकिन विकास के नाम पर विनाश ज्यादा हुआ है। पहले जब सुविधाएं नहीं थीं, तब मीडिया में फिर भी खेलों को ज्यादा महत्व मिलता था, लेकिन अब उतना महत्व नहीं मिलता है। आज का मीडिया पूरी तरह से पेशेवर हो गया है। पेशेवर होना गलत नहीं है, लेकिन इस तरह का पेशेवरपन किस काम का जिसमें खबरों के साथ गलत नहीं बल्कि बलात्कार हो जाए। हमारा तो मानना है कि आज अखबारों में खबरों के साथ गलत नहीं बल्कि बलात्कार हो रहा है, और यह बलात्कार ऐसा है कि इसको रोकने की ताकत किसी में नहीं है। यह ठीक उसी तरह का सामूहिक बलात्कार है जैसा किसी अहसाय अबला के साथ कई बलशाली करते हैं। खबरों से बलात्कार का एक बड़ा कारण खबरों की प्रस्तुति भी अहम हो गई है। इस प्रस्तुति के चक्कर में खबरों के साथ और ज्यादा बलात्कार हो रहा है।

एक तो विज्ञापन का फंडा जिसमें खबरों के लिए स्थान कम हो गया है, दूसरे प्रस्तुति के चक्कर में खबरों की जान निकालने का काम हो रहा है। इस प्रस्तुति के कारण खबरों को इस तरह से काट दिया जाता है जिससे खबरों की जान ही निकल जाती है। यहां पर एक सबसे बड़ी कमजोरी अखबारों में यह नजर आती है। आज अखबारों में खबरों का महत्व समझने वाले गिनती के रह गए हैं। नए नवेल पत्रकारों पर अपने को डिजाइन का मास्टर मानने वाले आपरेटर हावी हो गए। ये आपरेटर यूं ही हावी नहीं हुए हैं, इनके सिरों पर अखबारों में बैठे मालिकों के खास लोगों का हाथ है जिनके दम पर ये पत्रकारों से ज्यादा अपने को समझने लगे हैं। कुल मिलाकर आज की तारीख में अखबारों में काफी बुरी स्थिति हो गई है। अखबारों में आज काम करने वाले पत्रकार पत्रकार नहीं बल्कि मीडिया कर्मी हो गए हैं।

अब मीडिया कर्मी को कर्मी की तरह ही काम करेंगे, इनके लिए पत्रकारिता कोई मिशन नहीं है, जैसा हम लोगों के समय में होता था। हमारे जितने पुराने साथी हैं, सब पत्रकारिता को एक मिशन मानकर इससे जुड़े थे, और आज भी जुड़े हुए हैं, लेकिन अब हम जैसे साथियों के पत्रकारिता के मिशन के रास्ते काफी कठिन हो गए, लेकिन फिर भी हम लोग इस रास्ते पर चलने के अपने प्रयास में जुटे हैं, और इस रास्ते पर चलते ही रहेंगे, चाहे जिनती परेशानी आए। बहुत सी बातें हैं लिखने को फिर दूसरे एपीसोड में लिखेंगे, यह एपीसोड लंबा हो गया है, वैसे भी आज कल एपीसोड का जमाना है, फिल्में भी आज कई भागों में बनने लगी है, जिस तरह से ज्यादा लंबी फिल्म और एपीसोड बोर करते हैं, हम अपने मित्रों को बोर नहीं करना चाहते हैं, जल्द ही दूसरे अध्याय के साथ मिलेंगे।

लेखक राजकुमार ग्वालानी दो दशक से ज्यादा समय से रायपुर छत्तीसगढ़ में पत्रकार हैं, इनसे 09302557200 या 9826711852 पर सपंर्क किया जा सकता है.

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