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सुख-दुख

रोहित सरदाना ने सीने में जकड़न को हल्के में लिया और चल बसे!

दया शंकर शुक्ल सागर-

शरीर नश्वर है. हम सबको एक दिन मर कर इसी प्रकृति में मिल जाना है. इंसान और प्रकृति का एक रहस्यमय रिश्ता है. प्रकृति ने इंसान को इतनी ताकत दी है कि वो खतरनाक से खतरनाक वायरस को पराजित कर सकता है. फिर भी लोग मर रहे हैं. जानते हैं कि क्यों? क्योकि उन्हें इस वायरस से लड़ने का सही तरीका नहीं मालूम. रोहित की मौत इसका जीवन्त उदाहरण है.

रोहित दो हफ्ते पहले कोरोना की चपेट में आए थे. लेकिन उनकी इम्यूनिटी मजबूत थी इसलिए उनका बुखार एक दिन ठीक हो गया. वे निश्‍चिंत हो गए. बाहर से उन्हें कोई लक्षण नहीं दिख रहे थे. आक्सीजन का स्तर भी सामान्य चल रहा था. केवल छाती में जकड़न थी जिसे उन्होंने हल्के में लिया. जैसा कि उनके एक मित्र ने बताया कि वो कोई दवा भी नहीं ले रहे थे. उन्हें लगा वो ठीक हो रहे हैं. लेकिन सच तो यह था कि वायरस का असर उनके फेफडों में फैल गया था. सीने में जकड़न की वजह यही थी. फिर भी वे अस्पताल जाने को राजी नहीं थे.

एक दिन पहले उनकी पत्नी प्रमिला ने उन्हें जबरन अस्पताल भेजा. और अगली सुबह तक सीने में संक्रमण इतना फैल गया कि उनके दिल की धड़कन थम गई. आप सोचिए जब हर विषय पर इतनी गहरी जानकारी रखने वाले एक पत्रकार का ये हाल है तो आम आदमी का क्या हाल होगा. इसलिए लोग मर रहे हैं. बीते 24 धंटे में 40 लाख नए संक्रमित हो गए. कल तक 30 की दहाई में चलने वाला आंकड़ा आज 40 की दहाई में पहुंच गया. कोरोना वायरस के काम करने के तरीके को ‌अच्छे चिकित्सक समझ चुके हैं. लेकिन मरीज इतने हो गए हैं कि वे किस किस का इलाज करें. अस्सी फीसदी रोहित जैसे मरीज तो घरों में अपना इलाज खुद कर रहे हैं. इसलिए इतने लोग मर रहे हैं कि श्मशान में जगह नहीं बची है.

कोरोना पर अब तक मैंने जितना अध्ययन किया है उसके हिसाब से थोड़ी सी समझदारी से आप इस वायरस से लड़ सकते हैं. बस आपको वायरस की हर गतिविधि पर नजर रखनी है. मानव शरीर में इस वायरस की जिन्दगी सिर्फ दस दिन की है. दस दिन में ये वायरस खुद अ खुद मर जाता है. लेकिन तब तक ये आपके शरीर को बुरी तरह से नष्ट कर देता है. शुरू के पांच दिन सबसे अहम हैं. हल्का सा भी बुखार हो आप सतर्क हो जाइए. छटे दिन ये वायरस आपके फेफड़े में दस्तक देता है. तब शरीर का तापमान 102 या 103 तक पहुंच जाता है. ये खतरे की घंटी है. अब डाक्टर कहते हैं कि अगर इस छटे दिन हम इस वायरस पर मिसाइल से हमला करें तो वो वहीं खत्म हो जाता है. इसलिए डाक्टर अब छटे दिन अपने मरीजों को स्टेरायट दे रहे हैं.

ये रामबाण है जिससे राम ने रावण को मारा था. अगर आपके घर में किसी कोरोना मरीज का परचा है तो इसमें स्टेरायट जरूर लिखी होगी. अमेरिकल मेडिकल एसोसिएशन के जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक अलग अलग 7 स्टडी करने के बाद यह देखा गया है कि स्टेरॉयड से कोविड के गंभीर मरीजों की जान बच सकती है. रिपोर्ट के अनुसार कोरोना वायरस से जूझ रहे ऐसे मरीज, जिन्हें ऑक्सीजन की जरूरत होती है, उनके इलाज में ये स्टेरॉयड मददगार साबित हो सकते हैं और उनके जान जाने का जोखिम एक तिहाई तक कम हो जाता है. स्टेरायट बहुत सस्ती दवा है. जिसकी एक टेबलेट की कीमत एक रुपए से भी कम है. लेकिन इसे भी खुद से न लें इसे लेने से पहले किसी डाक्टर से बात जरूर कर लें. तो छटे दिन अगर आपने स्टेराइड ले ली तो न आपको ऑक्सीजन की जरूरत पड़गी न रेमडेसिवीर जैसे महंगे इंजेक्‍शन की जिसे अब डब्ल्यू एचओ भी रिजेक्ट कर चुका है.

हो ये रहा है कि बुखार102 या 103 डिग्री होने पर भी लोग सिर्फ पैरासिटामॉल से काम चला रहे हैं. नतीजतन दसवें दिन तक ये वायरस मरीजों के फेफड़े का तहस नहस कर दे रहा है. इसके बाद न आक्सीजन किसी काम न रेमडेसिवीर. 85 फीसदी मरीज जिन्हें छटे दिन बुखार नहीं होता, न सीने में जकड़न होती है न सांस फूलती ‌है वे सुरक्षित हैं. वे बस डाक्टर के सम्पर्क में रहे और उन्हें अपना हाल बताते रहें. लेकिन बाकी 15 फीसदी लोग जिन्हें 5वें या छटे दिन तेज बुखार होता है वे अपने डाक्टर से स्टेरायट लेने के बारे में पूछें. इसमें दिन की गिनती में चूक नहीं होनी चाहिए.

जिस दिन हल्का बुखार हो या कोविड के लक्ष्मण आपको दिखाई दें उसे आप पहला दिन मान लें. इसके बाद पांच दिन आप अपने शरीर पर वायरस के असर को मानीटर करें. डरे या घबराएं बिलकुल नहीं. आधा प्राण तो ये डर ले ले रहा है. बस इस रोग को हल्के में न लें.
नोट- घर पर कोरोना प्रबंधन के लिए ये चार्ट देखें जो विशेषज्ञों की सलाह पर तैयार किया गया है.

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